बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 151–160
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
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- अध्याय १ वामश्चेति णा समो समो ऽनेन सलो-] ' अम ' है । क्योंकि यह के समान है, यह साम है । और उसकी कस प्रकार? ' ' है । वाच्य है वह सर्वनाम शब्द द्वारा कही को विषय म ' यह प्राण त पुल्लिङ्ग-ली वस्तुओं-“ [ यदि कोई को तू किसके तो ' प्राणसे ' कि ] स्त्रीलिङ्ग करता है तो ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५ उ ० १ । ७ ) इति श्रुत्यन्तरात् । वाक्प्राणाभिधानभूतोऽयं | साम-शब्दः, तथा प्राणनिर्वर्त्यस्वरादि-समुदायमात्रं गीतिः सामशब्दे नाभिधीयते; छातो न प्राणवा-व्यतिरेकेण सामनामास्ति कि-श्चित, स्वरवर्णादेश्व प्राणनिर्वर्त्य -त्वात्प्राणतन्त्रत्वाच्च । एष उ एव प्राणः साम । यस्मात्साम सामेति वाक्प्राणात्मकम् - सा चामश्चेति, तत्तस्मात्साम्नो गीतिरूपस्य स्वरादिसमुदायस्य सामत्वं तत्प्रगीतं भुवि । यद् उ एव समस्तुल्यः सर्वेण वक्ष्यमाणेन प्रकारेण तस्माद्वा सामेत्यनेन सम्बन्धः । वाशब्दः सामशब्दलाभनिमित्तप्रकारान्तर-निर्देशसामर्थ्य लभ्यः ॥ केन पुनः प्रकारेण प्राणस्य तुल्यत्वम् १ वृ ० उ ० १०– ' वाणीसे ' ऐसा कहे " इस अन्य श्रुति भी यही सिद्ध होता है । यह ' साम ' शब्द वाक् और प्राणका अभिधानभूत हैं तथा प्राणसे निष्पन्न होनेवाला जो स्वरादिका समुदाय-मात्र गान है वह भी ' साम ' शब्दसे कहा जाता है; अतः प्राणरूप वाणीके व्यापारके सिवा ‘ साम ’ नामकी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि स्वर और वर्णादि भी प्राणसे निष्पन्न होनेवाण होनेवाले और प्राणके ही अधीन हैं । अतः यह प्राण ही साम है । क्योंकि ' सा ' और ' अम ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' साम साम ' इस प्रकार कहा जानेवाला पदार्थ वाक् और प्राणरूप ही है, इसलिये गीतिरूप जो सामसंज्ञक स्वरादि-समुदाय है उसका लोकमें सामत्व विख्यात है । अथवा क्योंकि आगे कहे जाने-वाले प्रकारसे यह सबके समान यानी तुल्य है, इसलिये साम है-• साथ व वाक्यका सम्बन्ध है । ' वा ' श शब्द सामशब्दलाभके निमित्तभूत प्रका-रान्तरका निर्देश करनेकी सामर्थ्यंसे प्राप्त होनेवाला है । तो फिर किस | प्रकारसे प्राणकी तुल्यता है? यह
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१४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय१ ब्राह्म इत्युच्यते — समः प्लुषिणा पुत्तिका- अब बतलाया जाता है -- [ यह शरीरेण समो मशकेन मशक-शरीरेण, समो नागेन हस्तिशरी-रेण, सम एभिस्त्रिभिर्लोक त्रैलोक्य-शरीरेण प्राजापत्येन, समोऽनेन जगद्रूपेण हैरण्यगर्भेण । पुत्तिका प्राण ] प्लुषि -- पुत्तिका ( छोटी तत्फ मक्खी ) के शरीरके समान है, साम्न मशक अर्थात् मच्छरके शरीरके समान है, नाग — हाथीके शरीरके. संयु समान है, इन तीनों लोकों अर्थात् मान त्रिलोकीरूप प्रजापतिके शरीरके लोक समान है तथा इस जगद्रूप हिरण्य-- ग्रर्भके शरीरके समान है । जिस य दिशरीरेषु गोत्वादिवत्कात्स्र्त्स्न्येन परिसमाप्त इति समत्वं प्राणस्य; न पुनः शरीरमात्रपरिमाणेनैव, अमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च । न च घटप्रासादादिप्रदो पवत्संकोचवि-कासितया शरीरेषु तावन्मात्रं समत्वम् । “ त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः ” ( बृह ० उ ० १ । ५ । १३ ) इति श्रुतेः ॥ सर्वगतस्य तु शरीरपरिमाणवृत्तिलाभो न विरुध्यते । एवं समत्वात्सामाख्यं प्राणं वेद यः श्रुतिप्रकाशितमहत्त्वं तस्यै -प्रकार गोशरीरमें गोत्वकी पूर्णतया वेद-व्याप्ति होती है उसी प्रकार यह व्यर पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त है -- इसलिये ही प्राण उनके समान है, शरीरमात्रके बराबर होनेके कारण ही नहीं; क्योंकि यह अमूर्त्त और सवंगत है । घट और महल मु आदिके दीपकके समान संकुचित और विकसित होनेवाला होनेसे उत्त शरीरोंमें उन्हींके बराबर रहनेसे गीथ इसका समत्व नहीं है; जैसा कि “ वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त ना हैं " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । नो सर्वंगत प्राणका शरीरके परिमाणा-नुसार वृत्ति लाभ करनेमें कोई विरोध नहीं है | उत इस प्रकार सम होनेके कारण सामसंज्ञक प्राणको, जिसका महत्त्व वि श्रुतिने प्रकाशित किया है, जो पुरुष
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[ अध्याय १ ता है [ यह त्तिका ( छोटी के समान है, च्छरके शरीरके हाथीके शरीरके. लोकों अर्थात् ति शरीरके जगद्रूप हिरण्य-मन है । ज त्वकी पूर्णतया श्री प्रकार यह पूर्णतया व्याप्त उनके समान बराबर होनेके ोकि यह अमूर्त नट और महल मान संकुचित निवाला होनेसे बराबर रहनेसे जैसा कि " वे सभी अनन्त सद्ध होता है । रके परिमाणा-करनेमें कोई होनेके कारण जिसका महत्त्व है, जो पुरुष ब्राह्मण ३ ] तंत्फलम् - अश्नुते व्याप्नोति । साम्नः - प्राणस्य सायुज्यं सयुग्भावं समान देहेन्द्रियाभि-मानत्वम्, सालोक्यं समान-लोकतां वा भावनाविशेषतः,
य एवमेतद्यथोक्तं साम प्राणं ।
वेद - प्राणात्माभिमानाभि-व्यक्तरुपास्ते इत्यर्थः ॥ २२ ॥
१४७ जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है -- वह सामसंज्ञक प्राणका सायुज्य – सयुग्भाव अर्थात् उसके साथ एक ही देह और इन्द्रियादिका अभिमान प्राप्त करता है तथा भावनाविशेषसे सालोक्य यानी समानलोकता प्राप्त करता है, जो इस प्रकार इस उपर्युक्त सामरूप प्राणको जानता है अर्थात् प्राणा-त्मत्वका अभिमान उदय होनेपर्यन्त उसकी उपासना करता है ॥ २२ ॥
प्राणके उद्गीथत्वकी -8980 उपपत्ति एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्व-मुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
यह ही उद्गीथ है । प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही.यह सब उत्तब्ध — धारण किया हुआ है । वाक् ही गीथा है । वह ह उत है और गीथा भी है; इसलिये उद्गीथ है ॥ २३ ॥
एष उ वा उद्गीथः । उद्गीथो यह ही ' उद्गीथ ' है । ' उद्गीथ ' शब्दसे सामकी अवयवभूत भक्ति-नाम सामावयवो भक्तिविशेषो विशेष अभिप्रेत है, उद्गान नहीं; नोद्गानम्, सामाधिकारात् । क्योंकि यहाँ सामका ही अधिकरण कथमुद्गीथः प्राणः? प्राणो वा है । प्राण उद्गीथ किस प्रकार है? -यस्मादिदं सर्वं प्राण ही ' उत् है '; क्योंकि प्राणसे ही उत्प्राणेन हि यह सब जगत् उत्तब्ध – ऊपरकी जगदुत्तब्धमूर्ध्व स्वब्धमुत्तम्भितं ओर ठहरा हुआ अर्थात् विघृत है । विधृतमित्यर्थः । उत्तब्धार्थाव । ' उत्तब्ध ' अर्थका द्योतन करनेवाला
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१४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म द्योतको ऽयमुच्छन्दः प्राणगुणाभि । धायकः, तस्मादुत्प्राणः । वागेव गीथाशब्दविशेषत्वादुद्गीथभक्तेः । गायतेः शब्दार्थत्वात्सा वागेव! न ह्युद्गीथभक्तेः शब्दव्यतिरेकेण किञ्चिद्रूपमुत्प्रेक्ष्यते । तस्माद्युक्त-मवधारणं वागेव गीथेति । उच्च प्राणो गीथा च प्राणतन्त्रा वागि-त्युभयमेकेन शब्देनाभिधीयते स उद्गीथः ॥ २३ ॥
यह ' उत् ' शब्द प्राणका गुण बतलान बतलानेवाला है । अतः प्राण उत् ब्रह्म है । वाक् ही गीथा है; क्योंकि पत्य उद्गीथभक्त शब्दविशेष ही है । चैवि | ' गे ' धातुका अर्थ शब्द करना है, अतः गीथा वाक् ही है । उद्गीथ- भत भक्ति स्वरूपकी शब्दके सिवा चम और कोई उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती । अतः वाक् ही गीथा है— त्यस ऐसा निश्चय करना उचित ही है । उत् प्राण है और गीथा प्राणतन्त्रा मृध वाक् है, अतः इन दोनोंका एक पात ही शब्दसे कथन होता है, वह शब्द ' उद्गीथ ' है ॥ २२ ॥ आ
उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिकां यह तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चेकितानेयो राजानं भक्षयन्नु-वाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य इत आङ्गिरसोऽन्येनोद्गायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन कु चोदगायदिति ॥ २४ ॥ आ
. उस [ प्राण ] के विषयमें यह आख्यायिका भी है -- चेकितानेय ब्रह्मदत्तने य॒ज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा । " यदि अयास्य और आङ्गि- प रसनामक मुख्य प्राणने वाक्संयुक्त प्राणसे अतिरिक्त देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा शिर गिरा दे । " अतः उसने प्राण और वाक्के अ ही द्वारा उद्गान किया था - ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥ प
तद्वापिः तत्तत्रैतस्मिन्नुक्तेऽर्थे ‘ तद्धांपि ' -- उस अर्थात् इस भ च हाप्याख्यायिकापि उपर्युक्त विषयमें यह - आख्यायिका श्रूयते ह स्म । भी सुनी जाती है -- ब्रह्मदत्तनाम-
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[ अध्याय १ प्राणका गुण अतः प्राण उत् है; क्योंकि विशेष ही है । शब्द करना है, है । उद्गीथ-शब्दके सिवा नहीं की जा ही गीथा है-ही है । था प्राणतन्त्रा दोनोंका एक ना है, वह शब्द भक्षयन्तु-इतोऽयास्य स.प्राणेन - चेकितानेय य और आङ्गि-उद्गान और वाक्के अर्थात् इस आख्यायिका ब्रह्मदत्त नाम-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४ ९ ब्रह्मदत्तो नामतः चिकितानस्या- । पत्यं चैकितानस्तदपत्यं युवा चैकितानेयः, राजानं यज्ञे सोमं । भक्षयन्नुवाच । किम्? अयं चमसस्थो मया भक्ष्यमाणो राजा त्यस्य तस्य ममानृतवादिनों मूर्धानं शिरो विपातयताद्विस्पष्टं पातयतु । तोरयं तातङ्ङादेशः आशिषि लोट्, विपातयतादिति । यमनृतवादी स्यामित्यर्थः । कथं पुनरनृतवादित्वप्राप्तिः १ इत्युच्यते — यद्यदीतोऽस्मात्प्र-कृतात् प्राणाद्वाक्संयुक्तात्, वाला चेकितानेय - चिकितानके पुत्र चैकितानका युवसंज्ञक ' अपत्य ( संतान ) यज्ञमें राजा अर्थात् सोमका भक्षण करता हुआ बोला । क्या बोला – “ यह मेरेद्वारा भक्षण किया जाता हुआ चमसस्थ सोम ' त्यस्य ' – उस मुझ मिथ्यावादीके मस्तकको विपतित - विस्पष्टतया पतित कर दे, अर्थात् यदि मैं मिथ्यावादी होऊँ तो ऐसा हो । ” यहाँ [ आशिषि लिङ्लोटो इस सूत्र के नियमानुसार ] आशीर्वाद अर्थमें लोट् लकार है । ' विपातयतु ' के ' तु ' प्रत्ययको तातङ् आदेश होकर ' विपातयतात् ' यह रूप सिद्ध हुआ किंतु मुझे मिथ्यावादित्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? सो बतलाया जाता है - " यदि इस प्रकृत वाक्सं-युक्त प्राणसे अथास्यने, जो मुख्यप्राण-अयास्यः - मुख्यप्राणाभिधायकेन के वाचक अयास्याङ्गिरस शब्दद्वारा १. व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें अपत्य तीन प्रकारके माने गये हैं, १ अनन्तरा-पत्य, २ गोत्रापत्य और ३ युवापत्य । पुत्रको अनन्तरापत्य कहते हैं, पौत्रसे लेकर जितनी भी होनेवाली पीढ़ियाँ हैं, सभी गोत्रापत्य कहलाती हैं, किंतु जिसके पिता आदिमेंसे कोई भी जीवित हो, वह संतान यदि मूल पुरुषसे नीचेकी चौथी आदि पीढ़ियोंमेंसे है अर्थात् पौत्रका पुत्र आदि है तो उसको युवापत्य कहते हैं । २. संस्कृतमें आज्ञा अर्थ में ' लोट् ' लकार होता है । उसका आशीर्वादके अर्थमें भी प्रयोग होता है । उसके प्रथमपुरुषका एक वचन प्रत्यय ' ति ' है, उसीके इकार-को उकार आदेश होनेसे ' तु ' होता है और फिर उसका ' तातङ ' आदेश होकर ' तात् ' रूप बनता है ।
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१५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ · ब्राह्मण श्रयास्याङ्गिरसशब्देनाभिधीयते | कहा जाता है और जो विश्व कर्म व विश्वसृजां पूर्वर्षीणां सत्रे उद्गाता- रचना करनेवाले पूर्ववर्ती ऋषियोंके सम्पन्न सत्रमें उद्गाता था, उसने यदि देखनेव सोऽन्येन देवतान्तरेण वाक्प्राण- वाक्संयुक्त प्राणसे भिन्न किसी व्यतिरिक्तेनोदगायदुद्गानं कृत- अन्य देवताद्वारा उद्गान किया [ उस है उस वान्, ततोऽहमनृतवादी स्याम्, हो तो मैं मिथ्यावादी ठहरूंगा, तस्य मम देवता विपरीत प्रतिपत्त - अतः देवता मुझ विपरीत ज्ञान मूर्धानं विपातयतु, इत्येवं शपथं रखनेवालेका मस्तक गिरा दे । ” सम्ब इस प्रकार उसने जो शपथ की चकारेति विज्ञाने प्रत्ययदाढ्य - | यह विज्ञान में प्रत्ययकी दृढ़ता करनी व्यप कर्तव्यतां दर्शयति । चाहिये- इस बातको प्रकट करती साम तमिममाख्यायिका निर्धारित-मथ स्वेन वचसोपसंहरति श्रुतिः - वाचाच प्राणप्रधानया प्राणेन च स्वस्यात्मभूतेन सो-ज्यास्य आङ्गिरस उद्गातोद्गाय-दित्येषोऽर्थो निर्धारितः शपथेन ॥ २४ ॥
है ॥ आख्यायिकाद्वारा निश्चित इस अर्थका श्रुति अपने वचनसे उप-संहार करती है— उस अयास्य आङ्गिरस उद्गाताने प्राणप्रधान वाणीसे और अपने आत्मभूत प्राणसे ही उद्गान किया था — यही अर्थ इस शपथसे निश्चित होता है ॥ २४ ॥
सामके स्वभूत स्वरको सम्पादन करनेकी श्रावश्यकता तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादात्र्त्विज्यं करिष्यन्वाचि-स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसम्पन्नयात्र्त्विज्यं कुर्यात्तस्मा-यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥
है उसे जो धन उस प्राप्त इस सामशब्दवाच्य मुख्य प्राणके स्व ( धन ) को जानता होता है । निश्चय स्वर ही उसका धन है । अतः ऋत्विक्-धनं भवा भ्या तस्य स्वर वास I वि च्छ स्व
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[ अध्याय १ जो विश्वक र्ती ऋषियोंके उसने यदि भिन्न किसी दुगान किया ठहरूंगा, विपरीत ज्ञान गिरा दे । " शपथ की दृढ़ता करनी प्रकट करती निश्चित इस चचनसे उप-उस अयास्य प्राणप्रधान हमभूत प्राणसे यही अर्थ ता है | २४ || यकता ति हास्य व्यवाचि-र्यात्तस्मा-चं भवति ॥ २५ ॥
को जानता तः ऋत्विक्-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१ कर्म करनेवालेको वाणीमें स्वरकी इच्छा करनी चाहिये । उस स्वर-' सम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे । इसीसे यज्ञमें स्वरवान् उद्गाताको देखने की इच्छा करते ही हैं । लोकमें भी जिसके पास धन होता है [ उसे ही देखना चाहते हैं ] । जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
' तस्येति प्रकृतं प्राणमभि-सम्बध्नाति । हैतस्येति मुख्यं व्यपदिशत्यभिनयेन । साम्नः सामशब्दवाच्यस्य प्राणस्य यः स्वं धनं वेद, तस्य ह किं स्यात्? भवति हास्य स्वम् । फलेन प्रलो-म्याभिमुखीकृत्य शुश्रूषवे आह— तस्य वै साम्नः स्वर एव स्वम् । स्वर इति कण्ठगतं माधुर्यं तदे-वास्य स्वं विभूषणम् । तेन हि भूषितमृद्धिमल्लक्ष्यत उद्गानम् । यस्मादेवं तस्मादात्र्त्विज्यं ऋत्विक्कर्मोगानं करिष्यन्वाचि विषये वाचि वागाश्रितं स्वरमि-च्छेत इच्छेत् साम्नो धनवत्तां स्वरेण चिकीषु रुद्राता । इदं तु ' तस्य ' इस सर्वनामसे श्रुति प्रकृत प्राणका सम्बन्ध दिखाती है । ' ह एतस्य ' इन पदोंसे श्रुति मुख्यप्राणको अङगुलिनिर्देशद्वारा बतलाती है । साम अर्थात् साम-शब्दवाच्य मुख्यप्राणके स्त्र यानी धनको जो पुरुष जानता है उसे क्या फल मिलता है? - — उसे धनकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार फलके द्वारा प्रलोभित कर उसे अपनी ओर अभिमुख करके श्रुति श्रवणके इच्छुकसे कहती है- निश्चय उस सामका स्वर ही धन है । स्वर कण्ठगत मधुरताको कहते हैं, वही इसका धन - विभूषण है । उसके द्वारा भूषित होनेपर ही उद्गान समृद्धिमान् दिखायी देता है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये आत्विज्य यानी उद्गानरूप ऋत्विकर्म करते हुए स्वरके द्वारा सामकी समृद्धि सम्पादन करनेकी इच्छावाले उद्गाताको वाणीके विषयमें अर्थात् । वाणीके आश्रित स्वरकी इच्छा करनी
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१५२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ प्रासङ्गिकं विधीयते, साम्नः सौस्व- । र्येण स्वरवत्त्वप्रत्यये कर्तव्ये इच्छा-मात्रेण सौस्वयं न भवतीति दन्त-धावनतैलपानादि सामर्थ्यात्कर्त -व्यमित्यर्थः 1 ।. तयैवं संस्कृतया वाचा स्वरसम्यन्नयात्र्त्विज्यं कुर्यात् । तस्माद्यस्मात्साम्नः स्वभूतः स्वरस्तेन स्वेन भूषितं साम अतो यज्ञे स्वरवन्तमुद्गातारं दिदृक्षन्त एव द्रष्टुमिच्छन्तं एव धनिनमिव लौकिकाः । प्रसिद्धं हि लोकेऽथ अपि यस्य स्वं धनं भवति तं धनिनं दिदृक्षन्ते इति सिद्धस्य गुणविज्ञानफल-सम्बन्धस्य उपसंहारः क्रियते- -भवति हास्य स्वं य एव-मेतत्साम्नः स्वं वेदेति || २५ || | N ब्राह चाहिये । यह तो प्रासङ्गिक विध किया गया है; सामकी सुस्वरता पूर्वं अर्थात् स्वरवत्त्व - प्रतीति कर्तव्य होने-पर इच्छामात्र से ही उसकी सुस्वरता णिव नहीं हो जाती । इसलिये तात्पर्यं यह है कि दन्तधावन और तैलपा-नादिके बलसे सुस्वरताका सम्पादन सु करना चाहिये ॥ इस प्रकार संस्कार- एव युक्त हुई उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक्कर्म करे । अतः क्योंकि स्वर सामका धन उस है है, इसलिये उसीसे साम विभूषित होता है । इसीसे लौकिक पुरुष जिस प्रकार धनीको देखना चाहते हैं उसी प्रकार वेद यज्ञमें स्वरसम्पन्न उद्गाताको हो देखनेकी इच्छा करते हैं । लोकमें श यह प्रसिद्ध ही है कि जिसके पास कि स्व - धन होता है, उस धनीको लोग देखना चाहते हैं; इस प्रकार भ सिद्ध हुए गुणविज्ञानरूप फलके सम्बन्धका ' जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है ' इस वाक्यद्वारा उप- प संहार किया जाता है ॥ २५ ॥
सामके सुवर्णको जाननेका फल श्रथान्यो गुणः सुवर्णवत्ता- अब सुवर्णवत्ता रूप दूसरे गुणका लक्षणो विधीयते । श्रसावपि विधान किया जाता है । वह भी सौस्वर्यमेव । एतावान्विशेषः— । सुस्वरता ही है । अन्तर इतनाही
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[ अध्याय १ ङ्गिक विधान की सुस्वरता ति कर्तव्य होने-इसकी सुस्वरता लिये तात्पर्य - और तैलपा-नाका सम्पादन नकार संस्कार-म्पन्न वाणी र सामका धन विभूषित होता जिस प्रकार हैं उसी प्रकार दुगाताको हो हैं । लोकमें जिसके पास उस धनीको ; इस प्रकार नरूप फलके प्रकार इस
क्यद्वारा उप-॥। २५ ॥
दूसरे गुणका है । वह भी तर इतना ही ब्राह्मण ३ ] १५३ पूर्वं कण्ठगत माधुर्यमिदं तु लाच हे कि पहली सुस्वरता कण्ठगत माधुर्य थी और वह सुवर्णशब्दवाच्य णिकं सुवर्णशब्दवाच्यम् । माधुर्य लाक्षणिक है । तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्ण तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्णं प्राप्त होता है । उसका स्वर ही सुवर्ण है । जो इस है । उसे सुवर्ण मिलता है ॥ २६ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्ण वेद भवति हास्य सुवर्णम् । सुवर्ण शब्दसामान्यात्स्वरसुवर्णयोः लौ-किकमेव सुवर्ण गुणविज्ञानफलं भवतीत्यर्थः । तस्य वै स्वर एव सुवर्णम् । भवति हास्य सुवर्णं य प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है । स्वर और सुवर्णं इन दोनोंके लिये सुवर्ण शब्दका प्रयोग समान-रूपसे होता है, इसलिये उस गुणके विज्ञानका फल लौकिक सुवर्णं ही होता है । निश्चय स्वर ही उस ( साम ) का सुवर्ण है । जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेदेति है उसे सुवर्णं मिलता है - इस प्रकार सब अर्थं पूर्ववत् समझना पूर्ववत्सर्वम् ॥ २६ ॥ चाहिये ॥ २६ ॥
, सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल तथा प्रतिष्ठागुणं विधित्स- इसी प्रकार सामके प्रतिष्ठागुण-का विधान करनेकी इच्छासे श्रुति नाह - कहती है-
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१५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७ ॥
जो उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है । उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है । निश्चय वाणीमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण गाया जाता है । कोई - कोई यह कहते गाया जाता है ' ॥ २७ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद । प्रतितिष्ठत्यस्यामिति प्रतिष्ठा वाक्तां प्रतिष्ठां साम्नो गुणं यो वेद स प्रतितिष्ठति छ । “ तं यथा यथोपासते " इति श्रुते-स्तद्गुणत्वं युक्तम् । पूर्ववत्फलेन प्रतिलोभिताय का प्रतिष्ठेति शुश्रूषवे आह - तस्य वै साम्नो वागेव, वागिति जिह्वा-मूलीयादीनां स्थानानामाख्या, सैत्र प्रतिष्ठा, तदाह – बाचि हि जिह्वामूलीयादिषु हि यस्मात्प्रति-हैं कि ' वह अन्नमें प्रतिष्ठित होकर जो पुरुष उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है । जिसमें [ साम ] प्रतिष्ठित है वह वाक् उसकी प्रतिष्ठा है, उस सामकी गुणभूत प्रतिष्ठाको जो जानता है वह प्रतिष्ठा होता है । “ उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है [ वही हो जाता है ] " इस श्रुतिके अनुसार उसका उसी गुणवाला हो जाना उचित ही है । · फलके द्वारा प्रलोभित हुए तथा ' वह प्रतिष्ठित क्या है ' यह सुनने की इच्छावाले पुरुषसे श्रुति पूर्ववत् कहती है - निश्चय उस सामकी वाक् ही, वाक् यह जिह्वामूलीयादि स्थानोंका नाम है, वही प्रतिष्ठा है । यही बात श्रुति कहती है- क्योंकि वाणी अर्थात् जिह्वामूलीयादि स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण ब्राह्म ष्ठितः गीति प्रति गीय न्दित प्रति प्रति वि कम प्र अ म क