बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 161–170
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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अध्याय १ ह तिष्ठति तत्प्राणः २७ ॥ होता है । यह प्राण -ष्ठित होकर इस साम । जिसमें वह वाक् उस सामकी जानता है “ उसे जो करता है इस श्रुति गुणवाला हो नत हुए तथा यह सुननेकी ति पूर्ववत् नामकी वाकू वामूलीयादि प्रतिष्ठा है । है— क्योंकि वामूलीयादि ही यह प्राण ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ ष्ठितः सन्नेष प्राण एतद्गानं गीयते गीतिभावमापद्यते तस्मात्साम्नः प्रतिष्ठा वाक् । अन्ने प्रतिष्ठितो गीयत इत्यु हैकेऽन्ये आहुः । इह प्रतितिष्ठतीति युक्तम् । अनि न्दितत्वादेकीयपक्षस्य विकल्पेन प्रतिष्ठागुणविज्ञानं कुर्याद् वाग्वा प्रतिष्ठान्नं वेति ॥ २७ ॥
यह गान गाया जाता है अर्थात् गीतिभावको प्राप्त होता है, अत: वाक् सामकी प्रतिष्ठा है । यह अन्नमें प्रतिष्ठित हुआ गाया जाता है — ऐसा कोई - कोई — अन्य लोग कहते हैं । अत: यह इसमें प्रतिष्ठित है - ऐसा मानना उचित है । यह अन्य पुरुषोंका मत भी निर्दोष है, इसलिये विकल्पसे प्रतिष्ठागुणविज्ञान करे अर्थात् वाक् प्रतिष्ठा है अथवा अन्न प्रतिष्ठा है - ऐसी दृष्टि करे ॥२७ ॥
प्राणोपासकके लिये जपका विधान एवं प्राणविज्ञानवतो जपकर्म । इस प्रकार प्राण - विज्ञानवान्के लिये जपकर्मका विधान इष्ट है । विधित्स्यते । यद्विज्ञानवतो जप- जिस विज्ञानसे युक्त पुरुषका जप-कर्म में अधिकार है वह विज्ञान कह कर्मण्यधिकारस्त द्विज्ञानमुक्तम् । दिया गया । अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः । स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत् । असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यो-ममृतं गमयेति । स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदसृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह । तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै १. अन्नके परिणामभूत शरीरमें ।
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१५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्ये-वैतदाह । मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहित-मिवास्ति । अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्य प्रयुत मागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत त फल स एष एवंविदुद्गातात्मने वा यजमानाय वा यं कामं यत कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्य-न्धा तायाः आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २८ ॥
वच अब आगे पवमानोंका ही अभ्यारोह कहा जाता है । वह प्रस्तोता निश्चय सामका ही प्रस्ताव ( आरम्भ ) करता है । जिस समय वह प्रस्ताव व्य करे उस समय इन मन्त्रोंको जपे - ' असतो मा सद्गमय ', ' तमसो मा संव -ज्योतिर्गमय ',, ' मृत्योर्मामृतं गमय ' । वह जिस समय कहता है- ' मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ ' यहाँ मृत्यु ही असत् है और सत् प्रस है । अतः वह यही कहता है कि मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर कर दो । जब कहता है- ' मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ ' तो यहाँ मृत्यु ही अन्धकार है और अमृत ज्योति है यानी प्रस उसका यही कथन है कि मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे ए -अमर कर दो । मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ - इसमें तो कोई बात छिपी -सी है हो नहीं । इनके पीछे जो अन्य स्तोत्र हैं उनमें अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे । उनका गान किये जानेपर यजमान वर माँगे और अ जिस भोगकी इच्छा हो उसे माँगे । वह यह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी कामना करता है उसीका रो आगान करता है । वह यह प्राणदर्शन लोकप्राप्तिका साधन है । जो इस भ प्रकार इस सामको जानता है उसे अलोक्यताकी आशा ( प्रार्थना ) तो है ही नहीं ॥ २८ ॥ नी
१ – ‘ मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ ', ' मुझे अन्धकारसे प्रकाशका ओर - ले जाओ ', ' मुझे मृत्युसे अमरत्वकी ओर ले जाओ ' । हि
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[ अध्याय १ कुर्वित्ये-तिरोहित-मनेनाद्य नयेत त यं कामं वालोक्य-॥ वह प्रस्तोता य वह प्रस्ताव ' तमसो मा ता है- ' मुझे मृ लें जाओ रसे प्रकाशन ती अर्थात् मुझे तो कोई बात में अपने लिये वर माँगे और - जाननेवाला हता है उसीका है । जो इस प्रार्थना ) तो प्रकाशका ओर ब्राह्मण ३ ] शङ्क अथानन्तरं यस्माच्चैवं विदुषा प्रयुज्यमानं देवभावायाम्यारोह-फलं जपकर्म, श्रतस्तस्मात्तद्विधी यत इह । तस्य चोद्गीथसम्ब-न्धात्सर्वत्र प्राप्तौ पवमानानामिति । वचनात् पवमानेषु त्रिष्वपि कर्त-व्यतायां प्राप्तायां पुनः काल-संकोचं करोति - स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति । स प्रस्तोता यत्र यस्मिन्काले साम प्रस्तुयात्प्रारभेत तस्मिन्काल एतानि जपेत् । अस्य ' च जपकर्मण मण आख्या अभ्यारोह इति । श्रभिमुख्येना-रोहत्यनेन जपकर्मणैवंविद् देव-१५७ इसके पश्चात्, क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले उपासकके द्वारा प्रयोग किया हुआ अभ्यारोहफलवाला जपकर्म देवभावकी प्राप्ति करानेवाला है, इसलिये यहाँ उसका विधान किया जाता है । उद्गीथसे सम्बन्ध होनेके कारण उसकी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर ' पवमानानाम् ' ( पवमानोंके ) इस वचनसे तीन पवमानोंमें ही • उसकी प्राप्ति होती है - ऐसा प्राप्त होनेपर ' स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति ' इस वाक्यसे श्रुति उसका पुनः कालसंकोच करती है । अर्थात् जिस समय वह प्रस्तोता सामकां प्रस्ताव - प्रारम्भ करे उस कालमें इनका जप करे । इस जंपकर्मका ' अभ्यारोह ' यह नाम है । इस जपकर्मके द्वारा इस 1. प्रकार प्राणकी उपासना करनेवाला पुरुष अभिमुखतासे अपने देवभाव-को आरूढ — प्राप्त हो जाता है, इस-भावात्मानमित्यभ्यारोहः । एता- लिये यह अभ्यारोह है । ‘ एतानि ' यह । बहुवचनान्त होनेके कारण ये तीन नीति बहुवचनात्त्रीणि यजूंषि यजुर्मंन्त्र हैं तथा ' एतानि ' शब्दमें द्वितीयानिर्देशाद् ब्राह्मणोत्पन्न- द्वितीयानिर्देश और इन मन्त्रोंके
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१५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ त्वाच्च यथापठित एव स्वर: । प्रयोक्तव्यो न मान्त्रः । याज-मानं जपकर्म । एतानि तानि यजूंषि - ' असतो मा सद्गमय ' ' तमसो मा ज्योति-र्गमय ' ' मृत्योर्मामृतं गमय ' इति । मन्त्राणामर्थस्तिरोहितो भवतीति स्वयमेव व्याचष्टे ब्राह्मणं मन्त्रार्थम् - स मन्त्रो यदाह यदु-क्तवान्कोऽसावर्थः ११ इत्युच्यते— ' असतो मा सद्गमय ' इति मृत्यु-र्चा असत् - स्वाभाविककर्मवि-ज्ञाने मृत्युरित्युच्येते, असद् अत्यन्ताधोभावहेतुत्वात् । सद-मृतम् — सच्छास्त्रीय कर्मविज्ञाने --अमरणहेतुत्वादमृतम् । तस्माद-सतो असत्कर्मणोऽज्ञानाच्च मा मां सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञामे सच्छास्त्रीय कर्मविज्ञामे गमय देव -भावसाधनात्मभावमापादयेत्यर्थः । १. जहाँ मान्त्रस्वर विवक्षित होता ब्राह ब्राह्मणभागजनित होनेके कारण इनमें इनके पाठके अनुसार ही तत्र स्वरका प्रयोग करना चाहिये, कुवि मान्त्रस्वरका नहीं । ' यह जपकर्म यजमानका है । गंम वे यजुर्मंन्त्र ये हैं- ' असतो मा सद्गमय ', ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ',. ' मृत्योर्मामृतं गमय ' । मन्त्रोंका अर्थ च गूढ़ होता है, इसलिये ब्राह्म्ण रमृ स्वयं ही इन मन्त्रोंके अर्थकी व्याख्या करता है । जिसे वह मन्त्र कहता है, वह अर्थ क्या है? सो बतलाया ज्यो जाता है - ' असतो मा सद्गमय ' क इस मन्त्रमें मृत्यु ही असत् है, स्वाभाविक कर्म और विज्ञानको ग मृत्यु कहते हैं । वह अत्यन्त अधो- गम गतिका हेतु होनेके कारण असत् त्ये है । सत् अमृत है, सत् शास्त्रीय कर्म और विज्ञानका नाम है, वह फ अमरताका हेतु होनेके कारण अमृत है । अतः असत् — असत्कर्मं अर्थात् अज्ञानसे मुझे सत् - शास्त्रीय कर्म सा और विज्ञानको प्राप्त कराओ । अर्थात् य देवभावके साधनभूत आत्मभावकी प्राप्ति कराओ । यहाँ श्रुति वाक्यका है वह तृतीयासे निर्देश किया जाता है; म .जैसे— “ उच्चैर्ऋचा क्रियते ” “ उच्चैःसाम्ना ” “ उपांशु यजुषा ” इत्यादि वाक्योंमें कहा गया है । परंतु यहाँ ‘ एतानि ' ऐसा द्वितीया विभक्तिका निर्देश है । इसलिये इस सनमें जपकर्मकी ही प्रतीति होती है, मान्त्रस्वरकी प्रतीति नहीं होती । म
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[ अध्याय १ 2 होनेके कारण अनुसार ही ना चाहिये, यह जपकर्म - ' असतो मा ' ज्योतिर्गमय ', मन्त्रोंका अर्थ लिये ब्राह्मण अर्थ की व्याख्या मन्त्र कहता • सो बतलाया मा सद्गमय ' असत् है, र विज्ञानको अत्यन्त अधो-कारण असत् सत् शास्त्रीय नाम है, वह के कारण अमृत सत्कर्म अर्थात् - शास्त्रीय कर्म कराओ । अर्थात् ' आत्मभावकी किया जाता है; त्यादि वाक्यों में है । इसलिये नहीं होती । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ९ तत्र वाक्यार्थमाह - श्रमृतं मा । कुर्वित्येवैतदाहेति । तथा तमसो मा ज्योति-गंमयेति । मृत्युर्वै तमः सर्वं ह्यज्ञानमावरणात्मकत्वात्तमः तदेव च मरणहेतुत्वान्मृत्युः । ज्योति-रमृतं पूर्वोक्तविपरीतं दैवं स्व-रूपम् । प्रकाशात्मकत्वाज्ज्ञानं ज्योतिः, तदेवामृतमविनाशात्म-कत्वात् । तस्मात्तमसो मा ज्योति-र्गमयेति पूर्ववन्मृत्योर्मामृतं गमयेत्यादि । अमृतं मा कुविं-त्येवैतदाह – दैवं प्राजापत्यं फलभावमापादयेत्यर्थः । पूर्वो मन्त्रोऽसाधनस्वभावात् साधनभावमापादयेति । द्विती-यस्तु साधनभावादपि अज्ञान-रूपात् साध्यभावमापादयेति ॥ मृत्योर्मामृतं गमयेति पूर्वयोरेव मन्त्रयोः समुच्चितोऽर्थस्तृतीयेन फलित अर्थं बतलाती है— ' मुझे अमर करो ' यही कहता है । तथा ' तमसो मा ज्योतिर्गमय'-इस मन्त्रमें मृत्यु ही तम है; आवरणात्मक होनेके कारण सारा ही अज्ञान तम है और वही मरणका हेतु होनेके कारण मृत्यु है । अमृत ज्योति है; वह पहले बतलाये हुए मृत्युसे विपरीत देव - देवतासम्बन्धी स्वरूप है । प्रकाशस्वरूप होनेके कारण ज्ञान ही ज्योति है; वही अवि-नाशात्मक होनेके कारण अमृत है । अतः ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' इसका अर्थं पूर्ववत् ' मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ ' इत्यादि है [ उक्त वाक्य-द्वारा जप करनेवाला ] यही कहता है कि मुझे अमर करो अर्थात् मुझे देवता और प्रजापतिसम्बन्धी फल प्राप्त कराओ । इनमें पहला मन्त्र ' मुझे असाघन-स्वभावसे साधनस्वभावको प्राप्त करो ' ऐसा कहता है । दूसरा मन्त्र ' मुझे अज्ञानरूप साधनभावसे भी साध्य भावको प्राप्त करो ' ऐसा कहता है । तथा ' मृत्योर्मामृतं गमय ' इस तृतीय मन्त्रद्वारा पहले दोनों मन्त्रों-। का ही समुचित अर्थ कहा गया है ।
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१६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह मन्त्रेणोच्यत इति प्रसिद्धार्थतैव ॥ नात्र तृतीये मन्त्र े तिरोहितमन्त-हितमिवार्थरूपं पूर्वयोरिव मन्त्र-योरस्ति, यथाश्रुत एवार्थः । याजमानमुद्गानं कृत्वा पत्रमा नेषु त्रिषु, अथानन्तरं यानीतराणि शिष्टानि स्तोत्राणि तेष्वात्मने-ऽनाद्यमागायेत् प्राणविदुद्भावाप्राण भूतः प्राणवदेव । यस्मात्स एव उद्गातैवं प्राणं यथोक्तं वेत्ति, अतः प्राणवदेव तं कामं साधयितु ' समर्थः । तस्माद्यजमानस्तेषु स्तो-त्र ेषु प्रयुज्यमानेषु वरं वृणीत, यं कामं कामयेत तं कामं वरं वृणीत प्रार्थयेत । यस्मात्स एष एवंविदु-तस्माच्छब्दात्प्रागेव सम्बध्यते । आत्मने वा यजमा-नाय वा यं कामं कामयते इच्छ-त्युद्गाता तमागायत्यागानेन साधयति । एवं तावज्ज्ञानकर्मभ्यां प्राणा-त्मापत्तिरित्युक्तम् । तत्र नास्त्या -इसलिये इसका अर्थं तो प्रसिद्ध ही शङ्क है । पूर्वं दोनों मन्त्रोंके समान इस तृतीय मन्त्रमें कोई छिपा हुआ - सा प्राण अर्थका रूप नहीं है । इसका अर्थ शङ् यथाश्रुत ( प्रसिद्धिके अनुसार ) ही है । माह त तीन पवमान स्तोत्रोंमें यजमान-सम्बन्धी उद्गान कर इसके पश्चात् तदे जो अवशिष्ट स्तोत्र हैं उनमें प्राणो केव पासक उद्गाता प्राणभूत होकर साध प्राणके ही समान अपने लिये अन्ना-अल द्यका आगान करे; क्योंकि वह उद्गाता इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको प्राथ जानता है, इसलिये प्राणके समान त्मि ही वह उस कामनाको सिद्ध करनेमें समर्थ है । अतः उन स्तोत्रोंका तत्प्र प्रयोग किये जानेपर यजमानको वर हि माँगना चाहिये । उसे जिस भोगकी इच्छा हो उसी भोगका वर माँगे; मिल क्योंकि वह यह इस प्रकार जानने-वाला उद्गाता अपने या यजमान के न्नि लिये जिस भोगकी इच्छा करता है न उसीका आगाने कर सकता है अर्थात् आगानद्वारा उसे सिद्ध कर तस्म लेता है - इस वाक्यका [ ' तस्मादु त्मभ तेषु वरं वृणीत ' इस वाक्यके ] a तस्मादु शब्दके पहले अन्वय होगा । इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया प्राण गया कि ज्ञान और कर्म दोनोंके समु-ज्च्चयद्वारा प्राणात्मत्वकी प्राप्ति होती है । उसमें किसी आशङ्काकी
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[ अध्याय १ तो प्रसिद्ध ही के समान इस छपा हुआ - सा इसका अर्थ ननुसार ) ही है । त्रोंमें यजमान-इसके पश्चात् उनमें प्राणो-भूत होकर लिये अन्ना-क्योंकि वह उपर्युक्त प्राणको प्राणके समान को सिद्ध करने में उन स्तोत्रोंका यजमानको वर से जिस भोगकी का वर माँगे; प्रकार जानने-या यजमान इच्छा करता है कर सकता है उसे सिद्ध कर का [ ' तस्मादु इस वाक्यके ] - अन्वय होगा । क यह बतलाया दोनोंके समु प्राप्त आशङ्काकी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१ शङ्कासम्भवः । अतः कर्मापाये । प्राणापत्तिर्भवति वा न वा १ इत्या-शङ्क्यते । तदाशङ्कानिवृत्यर्थ-माह — तद्वैतल्लोकजिदेवेति । तंद्ध तदेतत्प्राणदर्शनं कर्मवियुक्तं केवलमपि, लोकजिदेवेति लोक-साधनमेव । न ह एवालोक्यतायै लोकात्वाय आशा आशंसनं प्रार्थनं नैवास्ति ह । न हि प्राणा-त्मनि उत्पन्नात्माभिमानस्य तत्प्राप्त्याशंसनं सम्भवति । न हि ग्रामस्थः कदा ग्रामं प्राप्नुया-मित्यरण्यस्थ इवाशास्ते । अस-न्निकृष्ट विषये ह्यनात्मन्याशंसनम्, न तत्स्वात्मनि सम्भवति । तस्मान्नाशास्ति कदाचित्प्राणा-त्मभावं न प्रपद्येयमिति । कस्यैतत् १ य एवमेतत्साम प्राणं यथोक्तं निर्धारितमहिमानं वृ ० उ ० ११-सम्भावना नहीं है । अतः अब यह शङ्का होती है कि कर्मके अभाव में [ केवल प्राणविज्ञानद्वारा ] प्राणा-त्मभावकी प्राप्ति होती है या नहीं? इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है - ' तद्धैतल्लोकजिदेव ' अर्थात् वह यह प्राणविज्ञान कर्मसे रहित अकेला होनेपर भी लोकजित् - लोक-प्राप्तिका साधन ही है । अलोक्यता अर्थात् लोकप्राप्तिकी अयोग्यताके लिये तो आशा - आशंसन अर्थात् प्रार्थना होती ही नहीं है । जिसे प्राणात्मामें आत्मत्वका अभिमान | उत्पन्न हो गया है उसे उसकी प्राप्ति-की आशा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जो पुरुष गाँवमें मौजूद है वह वनस्थ पुरुषके समान ' मैं कब गाँवमें पहुँच गा ' - – ऐसी आशा नहीं करता । अपनेसे दूर रहनेवाली अनात्मवस्तुके लिये ही ऐसी आशा हो सकती है, अपने आत्मा लिये उसका होना सम्भव नहीं है । अतः वह ' कदाचित् में प्राणात्मभावको प्राप्त न होऊँ ' ऐसी आशंसा नहीं करता । यह फल किसे प्राप्त होता है? जो इस प्रकार इस सामको अर्थात् ऊपर निश्चित हुई महिमावाले यथोक्त प्राणको
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बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय १ १६२ वेद – अहमस्मि प्राण इन्द्रिय- । विषयासङ्गैरासुरैः पाप्मभिरघर्ष-णीयो विशुद्धः, वागादिपञ्चकं च मदाश्रयत्वादग्न्याद्यात्मरूपं स्वा भाविकविज्ञानोत्थेन्द्रिय विषयास-ङ्गजनितासुरपाप्मदोषवियुक्तं सर्व-भूतेषु च मदाश्रयान्नाद्योपयोग बन्धनम्, आत्मा चाहं सर्वभूता-नामाङ्गिरसत्वात्, ऋग्यजुःसामो-द्गीथभूतायाश्च वाच आत्मा तद्व-थाप्तेस्तन्निर्वर्तकत्वाच्च, मम साम्नो गीतिभावमापद्यमानस्य बाह्यं धनं भूषणं सौस्वयं ततोऽप्यान्तरं सौवयं लाक्षणिकं सौस्वर्यम्, गीतिभावमापद्यमानस्य मम कण्ठादिस्थानानि प्रतिष्ठा । एवं-गुणोऽहं पुत्तिकादिशरीरेषु कात्स्न्र्त्स्न्येन परिसमाप्तोऽमूर्त-त्वात्सर्वगतत्वाच्च - इति श्रा एवमभिमानाभिव्यक्तेर्वेदोपास्त इत्यर्थः ॥ २८ ॥
जानता है । ' मैं इन्द्रियोंके विषयोंको आसक्तिरूप आसुर पापोंसे अधर्षणीय विशुद्ध प्राण हूँ । वागादि पाँच प्राण मेरे आश्रित होनेके कारण स्वाभा-विक विज्ञानजनित. इन्द्रिय - विषया-सक्तिसे होनेवाले आसुर पापरूप दोषसे रहित अग्न्यादि देवतास्वरूप प्रजाप और समस्त भूतोंमें मेरे आश्रयसे अन्नाद्यके उपयोगके हेतु हैं । आह्नि- प्राणत रस होनेके कारण मैं समस्त भूतोंका इत्या आत्मा हूँ । ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथरूपा वाणीका, उसमें व्याप्त सृष्टि और उसका निर्वर्तक होने के कारण तन्त्र्य में आत्मा हूँ । गीतिभावको प्राप्त कर्मण हुए मुझ सामका सुस्वरता बाह्य धन यानी भूषण है और लाक्षणिक यितव सुस्वरतारूप सुवर्णता उसकी अपेक्षा चकम आन्तर धन है । गीतिभावको प्राप्त हुए मेरी कण्ठादि स्थान प्रतिष्ठा कृता हैं । ऐसे गुणोंवाला में अमूर्त और वि सर्वंगत होनेके कारण पुत्तिकादि दशरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त हूँ -- इस ज्ञान | प्रकारका अभिमान उत्पन्न होनेतक जो प्राणको जानता अर्थात् उसकी रत्या उपासना करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ] ॥ २८ ॥ लक्षण
विषय इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयमुद्गीथब्राह्मरणम् ॥ ३ ॥ केवल
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[ अध्याय १ के विषयोंकी पोंसे अधर्षणीय दिपाँच प्राण कारण स्वाभा-इन्द्रिय - विषया-ासुर पापरूप द देवतास्वरूप मेरे आश्रयसे हेतु हैं । आङ्गि समस्त भूतोंका तुः, साम और , उसमें व्याप्त होनेके कारण भावको प्राप्त स्वरता बाह्य और लाक्षणिक - उसकी अपेक्षा तिभावको प्राप्त स्थान प्रतिष्ठा मैं अमूर्त और रण पुत्तिकादि व्याप्त हूँ ' इस उत्पन्न होनेतक अर्थात् उसकी उसे उपर्युक्त २८ ॥ 'ये चतुर्थ ब्राह्मण ग्रन्थ - सम्बन्ध ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां! प्रजापतित्वप्राप्तिर्व्याख्याता केवल-प्राणदर्शनेन च ' तद्वैतल्लोकजिदेव ' इत्यादिना । प्रजापतेः फलभृतस्य सृष्टिस्थितिसंहारेषु जगतः स्वा-तन्त्र्यादिविभूत्युपवर्णनेन ज्ञान-कर्मणोर्वैदिकयोः फलोत्कर्षो वर्ण-यितव्य इत्येवमर्थमारभ्यते । तेन च कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मस्तुतिः कृता भवेत्सामर्थ्यात् । विवक्षितं त्वेतत् - सर्वमप्येत-ज्ज्ञानकर्मफलं संसार एव, भया-रत्यादियुक्तत्वश्रवणात्, कार्यकरण लक्षणत्वाच्च स्थूलव्यक्तानित्य-विषयत्वाच्चेति । ब्रह्मविद्यायाः केवलाया वक्ष्यमाणाया मोक्षहेतु-[ तृतीय ब्राह्मणमें ] समुच्चित ज्ञान और कर्मसे तथा ' तद्धेतल्लोक -जिदेव ' इत्यादि वाक्यद्वारा केवल प्राणविज्ञानसे भी प्रजापतित्वकी प्राप्तिका व्याख्यान किया गया । अब उनके फलभूत प्रजापतिकी, जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार-में, स्वतन्त्रतारूप विभूतिका वर्णन करके वैदिक ज्ञान और कर्मके फलो-त्कर्षका वर्णन करना है, इसीलिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है । उस ( फलोत्कर्षंके वर्णंऩ ) से ही उसकी सामर्थ्यंके कारण, कर्म-काण्डविहित ज्ञान और कर्मकी स्तुति हो जायगी । कहना तो यह है कि यह ज्ञान और कर्मका सभी फल संसार ही है, क्योंकि इसका भय और अरति आदिसे युक्त होना सुना गया है, इसके अतिरिक्त यह कार्यं करणरूप है तथा स्थूल, व्यक्त और अनित्य-को विषय करनेवाला है । तथा अब कही जानेवाली केवल ब्रह्मविद्या मोक्षकी हेतु है— इस आगामी
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१६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ त्वमित्युत्तरार्थं चेति । न हि । | संसारविषयात्साध्यसाधनादिभेद-लक्षणाद् अविरक्तस्य आत्मैकत्व ज्ञानविषयेऽधिकारः, अतृषितस्येव शने । तस्माज्ज्ञानकर्मफलोत्कर्षो पवर्णनमुत्तरार्थम् । तथा च वक्ष्यति— “ तदेतत्पदनीयमस्य " ( बृ ० उ ० १ । ४।७ ) “ तदे-तत्प्रेयः पुत्रात् " ( वृ ० उ ० १ । ४ । ८ ) इत्यादि । विषयका प्रदर्शन करनेके लिये भी ब्राह्म यह कथन है । जिस प्रकार तृषाहीन- होत की जल पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होती प्रजा उसी प्रकार जो साध्यसाधनादि भेद-पुरुष रूप सांसारिक विषयसे विरक्त नहीं उसन है उसका आत्माके एकत्वज्ञानरूप I विषयमें अधिकार नहीं है । अतः थमो ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वैदि वर्णन आगेके विषय ( ब्रह्मविद्या ) के किस लिये है । ऐसा ही श्रुति कहेगी भी— " यह इसका प्राप्तव्य है ", " यह प्रजा पुत्रसे अधिक प्रिय है " इत्यादि । त्मैव तेः प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल प्रक विर · आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्य-दात्मनोऽपश्यत्सोऽहमस्मीत्यग्र व्याहरत्ततोऽहंनामा- चीक्ष भवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्य- किंव न्तर न्नाम प्रब्र ते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्स- काय र्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं दद योऽस्मात्पूर्वी बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥ सव
पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था । उसने आलोचना करनेपर जन अपनेसे भिन्न और कोई न देखा । उसने आरम्भमें ' अहमस्मि " ऐसा कहा, प्रज इसलिये वह ' अहम् ' नामवाला हुआ । इसीसे अब भी पुकारे जानेपर व्य पहले ' अयमहम् " ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम द्यत १. मैं हूँ । २. यह मैं हूँ । श्र