बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 171–180

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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[ अध्याय १ करने के लिये भी प्रकार तृषाहीन-वृत्ति नहीं होती व्यसाधनादि भेद-यसे विरक्त नहीं एकत्वज्ञानरूप नहीं है । अतः फलोत्कर्षका ( ब्रह्मविद्या ) के ति कहेगी भी-है ", " यह है " इत्यादि । उसकी इस चीक्ष्य नान्य-तोऽहंनामा-म उक्त्वाथान्य-सर्वस्मात्स-ह स लोचना करनेपर नस्मि " ऐसा कहा, पुकारे जानेपर जो दूसरा नाम ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ, १६५ होता है वह बतलाता है; क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [ आत्मासंज्ञक प्रजापति ] ने समस्त पापोंको उषित — दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ । जो ऐसी उपासना करता है वह उसे दग्ध कर देता है जो उससे पहले प्रजापति होना चाहता है आत्मैवात्मेति प्रजापतिः प्र-थमोऽण्डजः शरीर्यभिधीयते । वैदिकज्ञानकर्मफलभूतः स एव । किम् १ इदं शरीरभेदजातं तेन प्रजापतिशरीरेणाविभक्तम् । श्रा-त्मैवासीदग्रे प्राक्शरीरान्तरोत्प-तेः ॥ स च पुरुषविधः पुरुष-प्रकारः शिरः पाण्यादिलक्षणो विराट् । स एव प्रथमः सम्भूतोऽनु-वीक्ष्यान्वालोचनं कृत्वा, कोऽहं किंलक्षणो वास्मीति नान्यद्वस्त्व-न्तरम् आत्मनः प्राणपिण्डात्म-कार्यकरणरूपान्न अपश्यन्न ददर्श । केवलं त्वात्मानमेव सर्वात्मानमपश्यत् । तथा पूर्व-जन्मश्रौत विज्ञानसंस्कृतः, सोऽहं प्रजापतिः सर्वात्माहमस्मीत्यग्रे व्याहरद्वयाहृतवान् । ततस्तस्मा -द्यतः पूर्वज्ञानसंस्काराद् श्रात्मानमेवाहमित्यभ्यधादग्रे ॥ १ ॥

' आत्मैव ' - यहाँ ' आत्मा ' इस शब्दसे अण्डेसे उत्पन्न हुआ प्रथम शरीरी प्रजापति ही कहा जाता है । वही वैदिक ज्ञान और कर्मका फल-भूत है । ऐसा क्यों है? क्योंकि यह शरीरादि भेदसमुदाय उस प्रजापतिके शरीरसे अभिन्न है । कारण, शरीरान्तरकी उत्पत्तिसे पूर्वं आत्मा ही था । वह पुरुषविध-पुरुषकी तरह शिर एवं हाथ - पैर आदि लक्षणवाला विराट् पुरुष था । प्रथम उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने अन्वीक्ष्य - अन्वालोचन कर ' मैं कौन हूँ और कैसे लक्षणोंवाला हूँ ' इत्यादि रूपसे विचारकर अपने प्राण-समुदायरूप देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न कोई और पदार्थ नहीं देखा । केवल अपनेको ही सर्वात्मरूपसे देखा तथा पूर्वजन्मके ' वह मैं सर्वात्मा प्रजापति हूँ ' इस श्रौतविज्ञानजनित संस्कारसे युक्त होनेके कारण सबसे पहले " अहमस्मि " ऐसा कहा । इसीसे, क्योंकि पूर्वज्ञानके संस्कारसे उसने आरम्भमें अपनेको ' अहम् ' ऐसा

पृष्ठ 172

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१६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तस्मादहंनामाभवत् । तस्योपनि -षदहमिति श्रुतिप्रदर्शितमेव नाम वक्ष्यति । तस्माद्यस्मात्कारणे प्रजापता-वेवं वृत्तं तस्मात्, तत्कार्यभूतेषु प्राणिषु एतर्ह्येतस्मिन्नपि काल आमन्त्रितः कस्त्वमित्युक्तः सन्नहमयमित्येवाग्र उक्त्वा कारणात्माभिधानेन आत्मान-मभिधायाग्रे पुनर्विशेषनाम जिज्ञा-सवेऽथानन्तरं विशेषपिण्डाभि-धानं देवदत्तो यज्ञदत्तो वेति प्रब्रूते कथयति यन्नामास्य विशेषपिण्डस्य मातापितृकृतं । भवति तत्कथयति । स च प्रजापतिरतिक्रान्त-जन्मनि सम्यक्कर्मज्ञानभावनानु-ष्ठानैः साधकावस्थायां यद्यस्मा-त्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः प्रजा-पतित्वं प्रतिपित्सूनां पूर्वः प्रथमः सन् अस्मात्प्रजापतित्वप्रतिपित्सु - । सप्मुदायात्सर्वस्माद् आदौ औषद-कहा था, इसलिये वह अहंनामवा ब्राह हुआ । उसका श्रुतिप्रदर्शित हो दह ' अहम् ' यह नाम उपनिषद् आगे णा प्रत इसीसे, क्योंकि कारणरूप देव प्रजापतिमें यह वृत्तान्त घटित हुना पुर इसीलिये एतर्हि — इस समय भी उसके कार्यभूत जीवोंमें जब किसी-को ' तू कौन है ' ऐसा कहकर बन पुकारा जाता है तो पहले ' यह मैं मज हूँ ' इस प्रकार अपनेको कारणरूप ज्ञा . नामसे बतलाकर फिर जो विशेष केव नामको जानना चाहता है उसे कर अपने विशेष शरीरका ' देवदत्त ' या ' यज्ञदत्त ' ऐसा कोई नाम बतलाता S है अर्थात् जो नाम इसके विशेष प पिण्डके माता - पिताका रखा हुआ र्ता होता है, उसे बतलाता है । वेव उस प्रजापतिने अपने पूर्वजन्म- प्रव में साधकावस्था में सम्यक् कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंद्वारा, इस कर्म और ज्ञानकी भावनाके पि अनुष्ठानोंसे प्रजापतित्वकी प्राप्तिकी इच्छावालोंसे पूर्ववर्ती अर्थात् पहला भ होने के कारण, इस प्रजापतित्वप्राप्ति-| की इच्छावाले सम्पूर्ण समुदायसे पूर्व भ

पृष्ठ 173

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[ अध्याय १ अनामवाला श्रुतिप्रदर्शित हो उपनिषद् आगे कि कारणरूप न्त घटित हुआ इस समय भी चोंमें जब किसी-ऐसा कहकर पहले ' यह में निको कारणरूप फिर जो विशेष चाहता है उसे का ' देवदत्त ' या नाम बतलाता इसके विशेष का रखा हुआ ता है । अपने पूर्वजन्म-नम्यक् कर्म और अनुष्ठानोंद्वारा, नकी भावना तत्वकी प्राप्तिकी अर्थात् पहला जापतित्वप्राप्ति-समुदाय से पूर्व ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७ दहत् । किम्? आसङ्गाज्ञानलक्ष - । णान्सर्वान्पाप्मनः प्रजापतित्व-प्रतिबन्धकारणभूतान् । यस्मा-देवं तस्मात्पुरुषः, पूर्वमौपदिति पुरुषः । यथायं प्रजापतिरोषित्वा प्रति-बन्धकान्पाप्मनः सर्वान्पुरुषः प्रजापतिरभवत् एवमन्योऽपि. ज्ञानकर्म भावनानुष्ठानवह्निमा केवलं ज्ञानबलाद्वौषति भस्मी करोति ह वै स तम्; कम् १ यो-ऽस्माद्विदुषः पूर्वः प्रथमः प्रजा-पतिर्बुभूषति भवितुमिच्छति तमित्यर्थः । तं दर्शयति य एवं वेदेति । सामर्थ्याज्ज्ञानभावना -प्रकर्षवान् । नन्वनर्थाय प्राजापत्यप्रति-पिप्सा, एवंविदा चेद्दह्यते । नैष दोषः, ज्ञानभावनोत्कर्षा-भावात्प्रथमं प्रजापतित्वप्रतिपश्य-भावमात्रत्वाद्दाहस्य । उत्कृष्ट -उषन - दग्ध कर दिया था; किसे? — प्रजापतित्वके प्रतिबन्धक कारणरूप अभिनिवेश और अज्ञानादि सम्पूर्ण पापोंको । क्योंकि ऐसा हुआ, इसलिये यह ' पुरुष ' हुआ । पूर्वमें ओषण किया, इसलिये ' पुरुष ' कहलाया । जिस प्रकार यह प्रजापति सम्पूर्ण प्रतिबन्धक पापोंका ओषण करके पुरुषरूप प्रजापति हुआ उसी प्रकार दूसरा भी ज्ञान और कर्मकी भावनाके अनुष्ठानरूप अग्नि से अथवा केवल ज्ञानबलसे उसका ओषण करता है - उसे भस्म कर देता है, किसे? जो इस विद्वान्से पहले प्रजापति होना चाहता है उसको — ऐसा इसका तात्पर्य है । उस ( विद्वान् ) को श्रुति दिखलाती है - जो इस प्रकार जानता ( उपा-सना करता ) है । उसकी सामर्थ्यसे जाना जाता है कि वह ज्ञानभावना-में बढ़ा - चढ़ा होता है । शङ्का - यदि वह इस प्रकार उपासना करनेवालेसे दग्ध कर दिया जाता है तब तो प्रजापतित्वप्राप्ति-की इच्छा अनर्थकी ही हेतु है । समाधान — यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि ज्ञानभावनाके उत्कर्षका अभाव होनेके कारण पहले प्रजा-पतित्व प्राप्त न कर सकना ही उसका

पृष्ठ 174

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१६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ साधनः प्रथमं प्रजापतित्वं प्राप्नुवन् न्यूनसाधनो न प्राप्नो-तीति, स तं दहतीत्युच्यते ॥ न पुनः प्रत्यक्षमुत्कृष्टसाधनेन इतरो दह्यते । यथा लोके याजिसृतां यः प्रथममाजिमुपसर्पति तेनेतरे दग्धा इवापहृतसामर्थ्या भवन्ति तद्वत् ॥ १ ॥

ब्राह । दाह है । तात्पर्य यह है कि जो उत्कृष्ट साधनवाला होता है वह PhC? पहले IIT करता है क्यो और न्यून साधनवाला प्राप्त नहीं करता; अतः वह उसे भस्म कर देता है — ऐसा कहा गया है । उत्कृष्ट साधनवाला अपनेसे प्रथ भिन्न- न्यून साधनवालेको साक्षात् ख्य जला ही डालता हो - ऐसी बात नहीं है ॥ जिस प्रकार लोकमें किसी दा मर्यादा तक दौड़कर जानेवालोंमें जो पुरु पहले मर्यादापर पहुँचता है उसके नाश द्वारा दूसरे लोग दग्ध - से होकर | अपहृतसामर्थ्य - हतोत्साह हो जाते मेन हैं, उसी प्रकार यहाँ समझना S चाहिये ॥ १ ॥

स्म प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति नाप यदिदं तुष्टूषितं कर्मकाण्ड-विहितज्ञानकर्मफलं प्राजापत्य-लक्षणं नैव तत्संसारविषयमत्य-यहाँ जिस प्रजापतित्वरूप कर्म- नम काण्ड विहित ज्ञान और कर्मके फल- क्षण की स्तुति करनी अभीष्ट है वह इत्य सांसारिक विषयसे बाहर नहीं है-त्म इस बातको दिखानेके लिये श्रुति क्रामदितीममर्थं प्रदर्शयिष्यन्नाह— कहती है— प्रत सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षां चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं त्म बि वीयाय कस्माद्धयभेष्यद् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥२ ॥ भूत

वह भयभीत हो गया । इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है । उसने यह विचार किया ' यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता वी

पृष्ठ 175

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[ अध्याय १ यह है कि जो - होता है वह प्राप्त करता है नवाला प्राप्त तः वह उसे - ऐसा कहा गया वाला अपने से वालेको साक्षात् हो - ऐसी बात - लोकमें किसी जानेवालोंमें जो चता है उसके दग्ध से - होकर त्साह हो जाते यहाँ समझना निवृत्ति नतित्वरूप कर्म-और कर्मके फल-अभीष्ट है वह बाहर नहीं है-के लिये श्रुति मीक्षां चक्रे स्वास्य भयं वति ॥२ ॥

नता है । उसने किससे डरता ब्राह्मण ४ ] हूँ? ' तभी उसका भय निवृत्त हो क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है सोऽविभेत्स प्रजापतिर्योऽयं प्रथमः शरीरी पुरुषविधो व्या-ख्यातः । सोऽबिभेद्भीतवानस्म-दादिवदेवेत्याह । यस्मादयं | पुरुषविधः शरीरकरणवान् आत्म-नाशविपरीतदर्शनवच्चाद् अबि-भेत्, तस्मात्तत्सामान्यादद्यत्वे-ऽप्येकाकी विभेति । किञ्चा-स्मदादिवदेव भयहेतुविपरीतदर्श-नापनोदकारणं यथाभूतात्मदर्श-नम् । सोऽयं प्रजापतिरीक्षामी-क्षणं चक्रे कृतवान्ह । कथम्? इत्याह — यद्यस्मान्मत्तोऽन्यदा-त्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरं प्रतिद्वन्द्वीभूतं नास्ति, तस्मिन्ना-त्मविनाशहेत्वभावे कस्मान्नु बिभेति । तत एव यथा भूतात्मदर्शनादस्य प्रजापतेर्भयं वीयाय विस्पष्टमपगतवत् ॥ १६ ९ गया । किंतु उसे भय क्यों हुआ? ॥ २ ॥

वह भयभीत हो गया । अर्थात् वह प्रजापति, जिसकी पुरुषाकार प्रथम शरीरीके रूपमें व्याख्या की गयी है, हमारे समान ही भयभीत हो गया – ऐसा श्रुति कहती है । क्योंकि यह पुरुषविध शरीरेन्द्रिय-वान् प्रजापति आत्मनाशरूप विप-रीत ज्ञानवाला होनेके कारण डर गया था, इसलिये उससे समानता होनेके कारण आज भी अकेला । होनेपर पुरुष डरता है । इसके सिवा हमारे समान ही प्रजापतिके भी भयके हेतुभूत विपरीत ज्ञानकी निवृत्तिका कारण यथार्थ आत्म-ज्ञान ही हुआ । उस इस प्रजापतिने ईक्षा - ईक्षण ( विचार ) किया । किस प्रकार विचार किया? सो श्रुति बतलाती है यदि इस मेरेसे भिन्न अर्थात् आत्माके सिवा इसका प्रतिद्वन्द्वी कोई और पदार्थ नहीं है, तो उस आत्मनाशके कारणके अभावमें मैं किससे डरता हूँ? उसीसे यानी उस यथार्थ आत्म-दर्शनसे ही इस प्रजापतिका भय विगत - — विस्पष्टतया निवृत्त हो गया ।

पृष्ठ 176

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१७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रा तस्य प्रजापतेर्यद्भयं तत्केवला-विद्यानिमित्तमेव परमार्थदर्शने-ऽनुपपन्नमित्याह - कस्माद्धयभेष्यत् किमित्यसौ भीतवान्परमार्थनि-रूपणायां भयमनुपपन्नमेवेत्यभि-प्रायः । यस्माद् द्वितीयाद्वस्त्व-न्तराद्वै भयं भवति । द्वितीयं च वस्त्वन्तरमविद्याप्रत्युपस्थापित-मेव न ह्यदृश्यमानं द्वितीयं भयजन्मनो हेतुः “ तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः " ( ईशा ० ७ ) इति मन्त्रवर्णात् । यच्चैकत्वदर्शनेन भयमपनुनोद तद्युक्तम् 1 । कस्मात्? द्वितीया -द्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति, तदेक-स्वदर्शनेन द्वितीयदर्शनमपनी-तमिति नास्ति यतः । १. यदि कोई कहे कि प्रजापतिका उस प्रजापतिको जो भय था वह केवल अविद्याके ही कारण था, परमार्थज्ञान होनेपर उसका होना । पत असम्भव था, यही बात श्रुति कहती वा है – ' वह क्यों डरा? ' – इसका क्या कारण है कि उसे भय हुआ? ष्टम | तात्पर्य यह है कि परमार्थतः विचार त किया जाय तो उसे भय होना अयुक्त ही है; क्योंकि भय तो दूसरे- कृ से ही होता है । और [ आत्मासे ना भिन्न ] दूसरी वस्तु तो अविद्या- पत द्वारा प्रस्तुत की हुई ही है; क्योंकि न दीखनेवाली कोई दूसरी वस्तु ख भयकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो का सकती; जैसा कि " उस अवस्थामें निरन्तर एकत्वदर्शन करनेवाले सं पुरुषको क्या मोह और क्या शोक एक हो सकता है? ” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है । ' प्रजापतिने जो एकत्व- प्रा दर्शनके द्वारा अपने भयको निवृत्त मि किया सो उचित ही है । क्यों उचित है? क्योंकि द्वितीय यानी ना अन्य वस्तुसे ही भय होता है । वह द्वितीयदर्शन आत्माके एकत्वदर्शन- क से निवृत्त हो गया; क्योंकि वास्तव-में द्वितीय है नहीं । भय विराट् पुरुषके साथ एकत्वज्ञानसे ही निवृत्त हुआ था, अद्वैतदृष्टि कारण नहीं तो इसका उत्तर व ति आगेके वाक्यसे देती है ।

पृष्ठ 177

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[ अध्याय १ जो भय था ही कारण था, उसका होना श्रुति कहती रा? ' – इसका उसे भय हुआ? मार्थतः विचार उसे भय होना भय तो दूसरे-र [ आत्मासे तो अविद्या-ही है; क्योंकि ोई दूसरी वस्तु कारण नहीं हो - ' उस अवस्थामें दर्शन करनेवाले और क्या शोक मन्त्र से सिद्ध जो एकत्व-भयको निवृत्त ही है । क्यों द्वितीय यानी होता है । वह एकत्वदर्शन-क्योंकि वास्तव-एकत्वज्ञान से ही ति आगे वाक्यसे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ अत्र चोदयन्ति - कुतः प्रजा-पतेरेकत्वदर्शनं जातम् १ को वास्मै उपदिदेश १ अथानुपदि ष्टमेव प्रादुरभूत्, अस्मदादेरपि तथा प्रसङ्गः । अथ जन्मान्तर-कृतसंस्कारहेतुकम् एकत्वदर्श-नानर्थक्यप्रसङ्गः । यथा प्रजा-पतेरतिक्रान्तजन्मावस्थस्य एक-१७१ | यहाँ यह शङ्का करते हैं कि प्रजापतिको किससे एकत्वज्ञान हुआ? उसे किसने उपदेश किया था? अथवा बिना उपदेशके ही उसका प्रादुर्भाव हो गया, तब तो हमारे लिये भी वैसा ही प्रसङ्ग हो सकता है । यदि उसे जन्मान्तरकृत संस्कारसे होनेवाला माना जाय तो एकत्वदर्शनकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होता है । अर्थात् जिस प्रकार अपने पूर्वजन्ममें स्थित प्रजा-पतिके एकत्वदर्शनने विद्यमान त्वदर्शनं विद्यमानमप्यविद्याबन्ध- रहनेपर भी अविद्यारूप बन्धनके कारणं नापनिन्ये, यतः अविद्या-संयुक्त एवायं जातोऽविमेत्, एवं सर्वेषामेकत्वदर्शनानर्थक्यं प्राप्नोति । अन्त्यमेव निवर्तक-मिति चेन्न, पूर्ववत्पुनः प्रसङ्ग-नानैकान्त्यात् । तस्मादनर्थ-कमेचैकत्वदर्शनमिति । नैष दोषः, उत्कृष्टहेतूद्भव-वाल्लोकवत् । यथा पुण्यकर्मो-कारणकी निवृत्ति नहीं की — क्योंकि अविद्यासंयुक्त उत्पन्न होनेके कारण ही उसे भय हुआ था - इसी प्रकार सभी के एकत्वदर्शन की व्यर्थता । प्राप्त होती है । यदि कहो कि सबके अन्तमें होनेवाला एकत्वज्ञान ही. अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला | होता है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि पूर्ववत् पुनः प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर उसका अव्यभिचारित्व नहीं रह सकेगा अतः एकत्वदर्शन व्यर्थं ही है । समाधान — यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि व्यवहारमें अन्य लोगोंके समान प्रजापतिका जन्म उत्कृष्ट ' हेतुसे हुआ है । जिस प्रकार पुण्य-

पृष्ठ 178

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह १७२ द्भवैर्विविक्तैः कार्यकरणैः संयुक्ते । जन्मनि सति प्रज्ञामेघास्मृतिवै-शारद्यं दृष्टम्, तथा प्रजापतेः घर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यविपरीत हेतु-सर्वपाप्मदाहात् विशुद्धैः कार्य-करणः संयुक्तमुत्कृष्टं जन्म, तदु-द्भवं चानुपदिष्टमेव युक्तमेकत्व -दर्शनं प्रजापतेः । तथा च स्मृति: - " ज्ञानमप्रतिघं यस्य चैराग्यं च जगत्पतेः । ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सदसिद्धं चतुष्टयम् ॥ ” इति । सहसिद्धत्वे भयानुपपत्तिरिति चेत् । न ह्यादित्येन सह तम उदेति । न, अन्यानुपदिष्टार्थत्वात्सह-सिद्धवाक्यस्य । श्रद्धा तात्पर्य प्रणिपातादीनाम् कर्मोसे प्राप्त हुए पवित्र देह संय इन्द्रियोंसे युक्त जन्म होनेपर बुद्धि, 66- " त मेधाशक्ति और स्मृतिकी विशदता देखी जाती है उसी प्रकार धर्मं, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयंके स्म विपरीत अधर्मादिके कारण होने- हेत वाले समस्त पापोंका दाह हो जाने- कृ से प्रजापतिका, विशुद्ध देह और इन्द्रियोंसे युक्त उत्कृष्ट जन्म है, उससे होनेवाला प्रजापतिका एक- वव त्वदर्शन भी बिना उपदेश किया नै हुआ ही है ऐसा मानना युक्तिसङ्गत भ ही है । ऐसा ही यह स्मृति भी कहती है- " जिस जगत्पतिका निरंकुश ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यं और नि धर्म – ये चारों सहसिद्ध ( जन्म- व सिद्ध ) हैं " इत्यादि । शङ्का - किंतु इनके सहसिद्ध होने- तद्य पर उसे भय होना अनुपपन्न है, C सूर्यके साथ अन्धकारका उदय नहीं हो सकता । समाधान - ऐसा मत कहो; क्योंकि इस सहसिद्धवाक्यका तात्पर्यं उसके ज्ञानको इसके द्वारा अनुपदिष्ट बतलाने में है । शङ्का - यदि ऐसा माना जायगा श्रहेतुत्वमिति चेत् स्यान्मतम् । | तो श्रद्धा, तत्परता एवं प्रणिपातादि-' ' श्रद्धावाँल्लभते की ज्ञानोत्पत्तिमें अहेतुता प्राप्त होगी । ज्ञानं तत्परः अर्थात् - यदि प्रजापतिके समान

पृष्ठ 179

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- अध्याय १ देह और नेपर बुद्धि, की विशदता प्रकार धर्म, र ऐश्वर्यके कारण होने-दाह हो जाने-देह और ष्टजन्म है, पतिका एक-उपदेश किया युक्तिसङ्गत स्मृति भी जगत्पतिका न, ऐश्वर्य और सिद्ध ( जन्म-सहसिद्ध होने-अनुपपन्न है, का उदय नहीं मत कहो; इसिद्धवाक्य का इसके द्वारा है । माना जायगा चं प्रणिपातादि-क्षुता प्राप्त होगी । पति के समान ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३ संयतेन्द्रियः " ( गीता ४।३ ९ ) " तद्विद्धि प्रणिपातेन " ( गीता ४ | ३४ ) इत्येवमादीनां श्रुति-स्मृतिविहितानां ज्ञानहेतूनाम-हेतुत्वम्, प्रजापतिरिव जन्मान्तर-कृतधर्महेतुत्वे ज्ञानस्येति चेत्? न; निमित्त विकल्पसमुच्चयगुण-वदगुणवश्व भेदोपपत्तेः । लोके हि नैमित्तिकानां कार्याणां निमित्त भेदोऽनेकधा विकल्प्यते । तथा । निमित्तसमुच्चयः । तेषां च विक-पितानां समुच्चितानां च पुनर्गुण-वदगुणवत्कृतो मेदो भवति । तद्यथा - रूपज्ञान एव तावन्नैमित्तिके कार्ये - तमसि विनालोकेन चक्षू रूपसन्निकर्षो नक्तञ्चराणां रूप-ज्ञाने निमित्तं भवति । मन एव जन्मान्तरकृत धर्मं ही ज्ञानका हेतु होगा तो “ जितेन्द्रिय एवं तत्पर श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है " " " उस ज्ञानको प्रणिपात करके जानो " इत्यादि प्रकारके श्रुति-स्मृतिवाक्योंद्वारा विहित ज्ञानके. तुओंकी अहेतुता प्राप्त होगी । समाधान- - ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि निमित्तोंके विकल्प, समुच्चय,. गुणवत्त्व, अगुणवत्त्व— ऐसे भेद हो सकते हैं । लोकमें निमित्तसे होने-वाले कार्योंके निमित्तका भेद अनेक प्रकारसे विकल्पित किया जाता: है । इसी प्रकार निमित्तका समुच्चय भी अनेक प्रकारसे होता है । उन विकल्पित और समुच्चित हेतुओंका भी गुणवत्त्व और अगुणवत्त्वके कारणः भेद होता है । सो इस प्रकार है— पहले नैमित्तिक कार्यंभूत रूपज्ञान-में ही [ निमित्त - भेद यों है- ] निशाचरोंको बिना प्रकाशके अन्ध-कारमें ही होने वाला नेत्र और रूपका संनिकर्ष रूपज्ञानमें कारण होता है, केवलं रूपज्ञाननिमित्तं योगिनाम् । योगियोंका मन ही रूपज्ञान में हेतु है अस्माकं तु सन्निकर्षालोकाभ्यां तथा हमें चक्षुःसंनिकर्षं और प्रकाश दोनोंके होनेपर रूपज्ञान होता है । सह तथादित्यचन्द्राद्यालोकभेदैः इसी प्रकार सूर्य और चन्द्र आदि समुचिता निमित्तभेदा भवन्ति । । प्रकाशोंके भेदसे भिन्न - भिन्न

पृष्ठ 180

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१७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तथा श्रालोकविशेषगुणवदगुण- । चत्वेन भेदाः स्युः । एवमेव श्रात्मैकत्वज्ञानेऽपि ' क्वचिज्जन्मान्तरकृतं कर्म निमित्तं भवति, यथा प्रजापतेः । क्वचि -तपो निमित्तम्, “ तपसा ब्रह्म

विजिज्ञासस्व " ( तै ० उ ० ३।२ ।

१ ) इति श्रुतेः । कचित् " प्राचार्य-वान्पुरुषो वेद " ( छा ० उ ० ६ ॥

१४।२ ) " श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् " ” ( गीता ४ । ३ ९ ) " तद्विद्धि श्रणिपातेन " ( गीता ४ । ३४ ) " श्राचार्याद्वैव " ( छा ० उ०४।९। ३ ) “ द्रष्टव्यः श्रोतव्यः ' ( वृ ० उ ० २ । ४ । ५ ) इत्यादिश्रुति-स्मृतिभ्य एकान्तज्ञानलाभनिमि-तत्वं श्रद्धाप्रभृतीनाम् अधर्मादि-निमित्तवियोगहेतुत्वात् । वेदान्त-श्रवणमनन निदिध्यासनानां च साक्षाज्ज्ञेय विषयत्वात् । पापादि प्रतिबन्धक्षये चात्ममनसोभूता-र्थज्ञाननिमित्तस्वाभाव्यात् । तस्मा-दहेतुत्वं न जातु ज्ञानस्य श्रद्धा-प्रणिपातादीनामिति ॥ २ ॥

निमित्तोंका समुच्चय होत प्रकाशविशेषोंके गुणवान् या गुण-हीन होनेसे भी निमित्तोंके भेद हो हैं । इसी प्रकार आत्मैकत्वज्ञान में भी कहीं जन्मान्तरंकृत कर्मं निमित्त होता है, जैसा कि प्रजापतिका; कहीं तप निमित्त है, जैसा कि " तप-से ब्रह्मको जाननेकी इच्छा करो " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है और कहीं " आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है ", " श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान-लाभ करता है ", " उसे प्रणिपात करके जानो ”, “ आचार्यके द्वारा ही [ विद्या स्थिरताको प्राप्त होती है ] " एवं " यह आत्मा द्रष्टव्य है, श्रोतव्य है " इत्यादि श्रुतिस्मृतियों-के अनुसार श्रद्धाप्रभृति, अधर्मादिके हेतुओंकी निवृत्तिके कारण होनेसे ज्ञानलाभके नियत निमित्त हैं । वेदान्तके श्रवण, मनन और निदि-ध्यासन तो साक्षात् ज्ञेय वस्तु ( ब्रह्म ) को ही विषय करनेवाले हैं तथा पापादि प्रतिबन्धका क्षय होनेपर आत्मा और मनका भी परमार्थज्ञानमें निमित्त होना स्वाभाविक है; इसलिये श्रद्धा और प्रणिपातादिका ज्ञानकी उत्पत्तिमें अहेतुत्व कभी नहीं हो सकता ॥२ ॥

ब्राह्मण इ पतित मैच्छ स तस्य स्तर मन उसन और देह इस है-पूर्ण हु नान त्यथ इदा धर्म नानु