बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 181–190

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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अध्याय १ है तथा न् या गुण-नों के भेद हो नैकत्वज्ञान में कर्म निमित्त नजापतिका; ताकि " तप-इच्छा करो " ना है और को ज्ञान पुरुष ज्ञान-प्रणिपात के द्वारा प्राप्त होती द्रष्ट ति - स्मृतियों-अधर्मादिके रण होनेसे निमित्त हैं । और निदि-ज्ञेय वस्तु करनेवाले बन्धका क्षय मनका भी पत्त होना श्रद्धा और उत्पत्तिमें सकता ॥२ ॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ प्रजापति से मिथुनकी उत्पत्ति इतश्च संसारविषय एव प्रजा- प्रजापतित्व इसलिये भी पतित्वम्, यतः । संसारका ही विषय है, क्योंकि— स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीय-मैच्छत् । स हैतावानास यथा स्त्रीपुमा सौ सम्परिष्वक्तौ • स इममेवात्मानं द्वे धापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धवृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्य-स्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥

वह रममाण नहीं हुआ । इसीसे एकाकी पुरुष रममाण नहीं होता । उसने दूसरेकी इच्छा की । वह जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं वैसे ही परिमाणवाला हो गया । उसने इस अपने देहको ही दो भागों में विभक्त कर डाला । उससे पति और पत्नी हुए । इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल ( द्विदल अन्नके एक दल ) के समान है - ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । इसलिये यह [ पुरुषार्द्धं ] आकाश स्त्रीसे पूर्णं होता है । वह उस ( स्त्री ) से हुए हैं ॥ ३ ॥

स प्रजापतिर्वै नैव रेमे रतिं नान्वभवत्, अरत्याविष्टोऽभूदि-त्यर्थः अस्मदादिवदेव यतः, " इदानीमपि तस्मादेकाकित्वादि-न रमते रतिं धर्मवत्त्वादेकाकी संयुक्त हुआ; उसीसे मनुष्य उत्पन्न वह प्रजापति रममाण नहीं हुआ— उसने रतिका अनुभव नहीं किया अर्थात् वह हमारे ही समान अरतिसे भर गया । क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये इस समय भी एका-कित्वादि धर्मवान् होनेसे पुरुष अकेले - -में नहीं रमता – रतिका अनुभव नानुभवति । रतिर्नामेष्टार्थसंयोगजा नहीं करता । इष्टविषयके संयोगसे

पृष्ठ 182

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ १७६ क्रीडा, तत्प्रसङ्गिन इष्टवियोगा- । न्मनस्याकुलीभावो ऽरतिरित्युच्यते । स तस्या अरतेरपनोदाय द्विती-यम् श्ररत्यपघातसमर्थं स्त्रीवस्त्वै-च्छद्गृद्धिमकरोत् । तस्य चैवं स्त्रीविषयं गृध्यतः स्त्रिया परि -ष्वक्तस्येवात्मनो भावो बभूव । स तेन सत्येप्युत्वाद् एतावानेत-त्परिमाण आस बभूव ह । किं परिमाणः ९ इत्याह - यथा लोके स्त्रीपुमांसौ चरत्यपनोदाय सम्परिष्वक्तौ यत्परिमाणौ स्यातां तथा तत्परिमाणौ बभूवेत्यर्थः ॥ होनेवाली क्रीडाका नाम रति है, उसमें आसक्त पुरुषके मनसे इष्ट तर्हि वस्तुका वियोग होनेपर जो व्या-कुलता होती है उसे अरति कहते हैं । विरा उस अरतिकी निवृत्तिके लिये तिरि उसने अरतिका नाश करनेमें समर्थ शरी दूसरी वस्तु — स्त्री की इच्छा यानी अभिलाषा की । इस प्रकार स्त्री-विरा विषयक इच्छा करनेपर उसे अपने देहका स्त्री से आलिङ्गित हुएके समान साम भाव हो गया । सत्यसंकल्प होने के त कारण वह उस भावसे इतना अर्थात् चार ऐसे ही परिमाणवाला हो गया । लौ किस परिमाणवाला हो गया? यस सो श्रुति बतलाती है - जिस प्रकार येय लोकमें स्त्री और पुरुष अरतिकी नो । निवृत्तिके लिये परस्पर आलिङ्कित वि होते हैं, वे जिस परिमाणवाले होते हैं उसी परिमाणवाला वह हो गया- मि स तथा तत्परिमाणमेव इममात्मानं ऐसा इसका तात्पर्य है । उसने वैसे- - स्य उस परिमाणवाले अपने इस देहको द्वेधा द्विप्रकारमपातयत्पातितवान् ही द्व ेधा - दो प्रकारसे पतित किया । व इममेवेत्यवधारणं मूलकारणाद्वि- ' इमम् एव ' ( इस देहको ही ) इस व राजो विशेषणार्थम् ॥ न क्षीरस्य । प्रकार निश्चय करना मूल कारणसे र विराट्की विशेषता बतलानेके लिये सर्वोपमर्देन दधिभावापत्तिवद्विराट है । दूधके सारे स्वरूपका नाश करके होनेवाली दधिभावकी प्राप्तिके समान सर्वोपमर्देनैतावानास; किं | विराट् अपने पूर्ववर्ती सारे स्वरूपका

पृष्ठ 183

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1 अध्याय १ नाम रति है, के मनसे इष्ट पर जो व्या-अरति कहते हैं । निवृत्तिके लिये करनेमें समर्थ इच्छा यानी प्रकार स्त्री-पर उसे अपने व्रत हुएके समान न्यसंकल्प होनेके से इतना अर्थात् ला हो गया । वाला हो गया? - जिस प्रकार पुरुष अरतिकी पर आलिङ्गित रिमाणवाले होते ला वह हो गया-है । उसने वैसे— अपने इस देहको से पतित किया । देहको ही ) इस ना मूल कारणसे बतलानेके लिये रूपका नाश करके चकी प्राप्तिके समान र्ती सारे स्वरूपका ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ तर्हि? आत्मना व्यवस्थितस्यैव । तिरोभाव करके ऐसा नहीं हुआ? विराजः सत्यसंकल्पत्वादात्मव्य-तिरिक्तं स्त्रीपुंस परिष्वक्त परिमाणं शरीरान्तरं वभूव । स एव च विराट् तथाभूतः स हैतावानासेति सामानाधिकरण्यात् । ततस्तस्मात्पातनात्पतिश्च पत्नी चाभवतामिति दम्पत्योर्निर्वचनं । लौकिकयोः । अत एव तस्मात्, यस्मादात्मन एवार्थः पृथग्भूतो येयं स्त्री, तस्मादिदं शरीरमात्म-नोऽर्घवृगलमर्थं च तद् बृगलं तो फिर किस प्रकार हुआ । अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही विराट्-के सत्यसंकल्प होनेके कारण उसके उस शरीर से भिन्न परस्पर आलि-ङ्गित हुए स्त्री - पुरुषोंके परिमाणवाला एक देहान्तर हो गया; क्योंकि वही पूर्वरूपमें स्थित विराट् था और वही ऐसा हो गया - इस प्रकार यहाँ [ विराट्के वाचक ] ' स ' का ‘ एता-वान् ' से सामानाधिकरण्य है । उससे – उस द्विधा पातनसे पति और पत्नी हुए - यह लौकिक पति-पत्नियों [ के पति - पत्नी नाम ] का निर्वाचन किया गया है । इसीसे, | क्योंकि यह जो स्त्री है शरीरका ही | पृथग्भूत अर्धभाग है, इसलिये यह. शरीर आत्माका अर्धबृगल है । जो अर्ध ( आधा ) हो और बृगल— विदलं च तदर्धबृगलम् अर्धविदल- विदल हो उसे अर्धबृगल ( दो दलों-मिवेत्यर्थः । प्राक्स्त्र्युद्वहनात्क- मेंसे एक दल ) कहते हैं अर्थात्– अर्धविदल - सा है । किंतु स्त्रीसे स्यार्थवृगलम्? इत्युच्यते - स्व विवाह करनेसे पूर्व यह किसका इति । एवमाह स्मोक्त- अर्धवृगल होता है, आत्मन बतलाती है - स्व अर्थात् अपना ही वान्किल याज्ञवल्क्यः, यज्ञस्य - ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा वक्ता यज्ञवल्कस्तस्यापत्यं है । यज्ञका वल्क — वक्ता यज्ञवल्क वल्को । कहलाता है, उसका पुत्र याज्ञवल्क्य याज्ञवल्क्यो दैवरातिरित्यर्थः 1 अर्थात् दैवराति अथवा ब्रह्माका ब्रह्मणो वापत्यम् । पुत्र याज्ञवल्क्य । वृ ० उ ० १२-

पृष्ठ 184

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१७८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ यस्मादयं पुरुषार्थ आकाशः स्त्र्यर्धशून्यः पुनरुद्वहनात्तस्मा-त्पूर्यते स्त्र्यर्धेन, पुनः सम्पुटी । करणेनेव विदलार्थः । तां स प्रजापतिमेन्वाख्यः शतरूपाख्या-मात्मनो दुहितरं पत्नीत्वेन कल्पितां समभवन्मैथुनमुपगत-वान् । ततस्तस्मात्तदुपगमनाद् मनुष्या अजायन्तोत्पन्नाः ॥ ३ ॥ ।

क्योंकि यह पुरुषार्थं आकाश ब्राह्मण स्त्र्यर्धसे शून्य है, इसलिये पुनः सम्भो विवाह करनेपर यह स्त्र्यर्धसे पूर्णं शतरूप होता है, जिस प्रकार कि विदलाई और म पुनः सम्पुटित कर दिये जानेपर । भेड़ों की तब वह मनुसंज्ञक प्रजापति अपनी रूप ज पत्नीरूप कल्पना की हुई उस अपनी ही शतरूपा नामकी कन्यासे दुहित संयुक्त हुआ अर्थात् मैथुनधर्मं में प्रवृत्त स्मरन हुआ । उस मैथुनकी प्रवृत्तिसे कृत्यं मनुष्य उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥ यित्व

यद्य मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि तिरो स्कृत सो हेयमीक्षाञ्चक कथं नु मात्मन एव जनयि- सौ त्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इत- मभि रस्ता ँ समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त बडवेतराभवद- मति श्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताँ संमेवाभव- तत तत एकशफमजायताजेतराभवद्वस्त इतरोऽविरितरा भर्चा मेष इतरस्ता ँ समेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव गाव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्य स्तत्सर्वमस्सृजत ॥४ ॥

उस [ शतरूपा ] ने यह विचार किया कि ' अपनेहीसे उत्पन्न करके इतर यह मुझसे क्यों समाग़म करता है? अच्छा, मैं छिप जाऊँ, अतः वह इतर गौ हो गयी, तो दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय - बल उत्पन्न हुए । तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ सङ्ग हो गया, फिर वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ हो गया और उससे श्वत

पृष्ठ 185

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[ अध्याय १ षा आकाश इसलिये पुन: इस्त्रयर्धसे पूर्ण कि विदलार्धं दिये जानेपर | जापति अपनी की हुई उस नामकी कन्यासे युनधर्ममें प्रवृत्त नकी प्रवृत्तिसे ३ ॥ वजनयि-वदृषभ इत-वतराभवद-संमेवाभव-विरितरा यन्तैवमेव मसृजत | ४ | न उत्पन्न करके नाऊँ, अत: वह ोग करने लगा, मनु अश्वश्रेष्ठ और उससे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १७६ 2 सम्भोग करने लगा । इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया । फिर वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा होकर उससे समागम करने लगा । इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन ( स्त्री - पुरुष-रूप जोड़े ) हैं उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ ४ ॥

सा शतरूपा उ ह इयं सेयं । दुहितृगमने स्मार्त प्रतिषेधमनु-स्मरन्तीक्षाञ्चक्रे । कथं न्विदम-कृत्यं यन्मा मामात्मन एव जन-यित्वोत्पाद्य सम्भवत्युपगच्छति ॥ यद्यप्ययं निर्घृणोऽहं हन्तेदानीं तिरोऽसानि जात्यन्तरेण तिरं-स्कृता भवानि ॥ इत्येवमीक्षित्वा -सौ गौरभवत् । उत्पाद्यप्राणिक ममिवोद्यमानायाः पुनःपुनः सैव मतिः शतरूपाया मनोश्चाभवत् । ततश्च ऋषभ इतरः । तां समेवा-भवदित्यादि पूर्ववत् । ततो गावोऽजायन्त । तथा वडवेतराभवदश्ववृष इतरः । तथा गर्दभीतरा गर्दभ इतरः । तत्र वडवाश्ववृषादीनां वह यह शतरूपा स्मृतिके कन्यागमनसम्बन्धी प्रतिषेधवाक्यको स्मरण कर यह विचार करने लगी । यह ऐसा अकरणीय कार्य क्यों करता है जो मुझे अपनेहीसे उत्पन्नकर मेरे साथ सम्भोग करता है । यद्यपि यह तो निर्दय है तथापि मैं अब छिप जाती हूँ - जात्यन्तररूपसे अपनेको छिपाये लेती हूँ ॥ ऐसा विचारकर वह गौ हो गयी । किंतु उत्पन्न किये जाने योग्य प्राणियोंके कर्मोंसे प्रेरित हुई शतरूपाकी और मनुकी भी पुनः पुनः वैसी ही मति होती रही । अतः मनु वृषभ हो गया और पूर्व -वत् उसके साथ समागम करने लगा । उससे गाय - बेल उत्पन्न हुए । फिर शतरूपा घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ तथा उसके पश्चात् वह गर्दभी हो गयी और मन गर्दभ । तब उन घोड़ी और अश्वश्रेष्ठादिके समागमसे घोड़ा, सङ्गमात्तत एकशफमेकखुरम् अश्वा- खच्चर और गधा — ये तीन एक श्वतरगर्दभाख्यं त्रयमजायत । खुरवाले पशु उत्पन्न हुए ।

पृष्ठ 186

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१८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तथा अजेतराभवद्वस्तश्याग इतर:, तथा विरितरा मेष इतरः, तां समेवाभवत् । तां तामिति वीप्सा । तामजां तामविचेतिस -मभवदेवेत्यर्थः । ततोऽजाश्चावय-श्वाजावयोऽजायन्त । एवमेव यदिदं किञ्च यत्किञ्श्वेदं मिथुनं स्त्रीपुंस लक्षणं द्वन्द्वम्, आ पिपीलिका -भ्यः पिपीलिकाभिः सहानेनैव-न्यायेन तत्सर्वमसृजत जगत्सृ-ष्टवान् ॥ ४ ॥

ब्राह्म इसी प्रकार शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा तथा वह भेड़ सृष्टं हो गयी और मनु भेड़ा हो गया. नम और उससे समागम करने लगा । यहाँ ' ताम् ' शब्दकी ' तां ताम् ' ऐसी एतत द्विरुक्ति समझनी चाहिये अर्थात् जगद उस बकरीसे और उस भेड़से समा- दित्य गम करने लगा । तब भेड़ - बकरियों-श की उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार आपि-पीलिकाभ्यः - चींटीसे लेकर ये जो मेवार कुछ भी मिथुन – स्त्री - पुरुषरूप जोड़े त्सृष्टि हैं, उसने इसी न्यायसे इन सबकी सृष्ट्य रचना की, अर्थात् इस सारे जगत्- रेत को उत्पन्न किया ॥ ४ ॥ पतिच

प्रजापतिकी सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूप से उसकी उपासना करनेका फल नन्य एवं सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यह " हीद ँ सर्वमसृक्षीति ऽनन्य ततः सृष्टिरभवत्सृष्टया ँ हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद् || ५ || धिदैव उस प्रजापतिने ‘ मैं ही सृष्टि हूँ ' ऐसा जाना । मैंने इस सबको रचा है । इस कारण वह ‘ सृष्टि ’ नामवाला हुआ । जो ऐसा जानता है वह इस ( प्रजापति ) की इस सृष्टिमें [ स्रष्टा स प्रजापतिः सर्वमिदं जग-त्सृष्ट्वा अवेत् । कथम्? अहंवावाह -मेव सृष्टिः, सृज्यते इति सृष्टं जगदुच्यते सृष्टिरिति । यन्मया ] होता है ॥ ५ ॥।

उस प्रजापतिने इस सम्पूर्ण जगत्को रचकर जाना । मस्स प्रकार जाना? ' मैं ही सृष्टि हूँ । यो I उसका सर्जन ( ( निर्माण ) किया देवर I जाता है, इसलिये वह सृष्ट ( उत्पन्न ) हुआ जगत् सृष्टि कहलाता है । यति | [ उसने विचार किया - ] ' मेरेद्वारा

पृष्ठ 187

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[ अध्याय १ तरूपा बकरी हो रा तथा वह भेड़ भेड़ा हो गया म करने लगा । ' तां ताम् ' ऐसी चाहिये अर्थात् उस भेड़से समा-भेड़ - बकरियों-सी प्रकार आपि-टी से लेकर ये जो स्त्री - पुरुषरूप जोड़े यसे इन सबकी - इस सारे जगत्-॥ ४ ॥

ना करनेका फल सर्वमसृक्षीति एवं वेद ॥५ ॥

इस सबको रचा जानता है वह इस तिने इस सम्पूर्ण - जाना । किस में ही सृष्टि हूँ । ' निर्माण ) किया वह सृष्ट ( उत्पन्न ) ष्ट कहलाता है । क्या - ] ' मेरेद्वारा ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८१ सृष्टं जगन्मदमेदत्वादहमेवास्मि । न मत्तो व्यतिरिच्यते । कुत एतत्? अहं हि यस्मादिदं सव जगदसृति सृष्टवानस्मि तस्मा । दित्यर्थः । यस्मात्सृष्टिशब्देन आत्मान-मेवाभ्यधात्प्रजापतिः, ततस्तस्मा-त्सृष्टिरभवत् सृष्टिनामाभवत् । सृष्ट्यां जगति, हास्य प्रजापते-रेतस्यामेतस्मिञ्जगति, स प्रजा-पतिवत्स्रष्टा भवति स्वात्मनोऽ-नन्यभूतस्य जगतः, कः १ य एवं प्रजापतिवद्यथोक्तं स्वात्मनो-ऽनन्यभूतं जगत्साध्यात्मादिभूता-धिदैवं जगदहमस्मीति वेद || ५ || जो जगत् रचा गया है वह मुझसे अभिन्न होनेके कारण मैं ही हूँ, वह मुझसे अलग नहीं है । ऐसा क्यों है? क्योंकि मैंने ही इस सम्पूर्ण जगत्‌को रचा है, इसलिये ' - [ यह मुझसे अभिन्न है ] ऐसा इसका तात्पर्य है । क्योंकि प्रजापतिने ' सृष्टि ' नाम से अपनेको ही कहा था, इसलिये वह सृष्टि अर्थात् सृष्टि नामवाला हुआ । इस प्रजापतिकी सृष्टिमें अर्थात् इस जगत् में वह प्रजापतिके समान अपनेसे अनन्यभूत जगत्का स्रष्टा होता है; कौन? जो इस प्रकार प्रजापतिके समान उपर्युक्त अपनेसे अभिन्न जगत्को, ' अध्यात्म, अविभूत और अधिदैवके सहित सारा जगत् मैं हूँ ' इस प्रकार जानता है ॥ ५ ॥

प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि अथेत्यभ्यमन्यत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्नि-मस्सृजत तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः । तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवाः । अथ यत्किञ्चेदमार्गं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा

पृष्ठ 188

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१८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म इद ँ सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः चय सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः ॥ यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ ग्रहक यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्या य हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥ भयं

फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया । उसने मुखरूपी योनिसे दोनों मध्ये हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा । इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे लोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे लोमरहित ही होती है । किं अतः [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक - एक ( भिन्न - भिन्न ) देवता भ्यन्त मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि ' इस ( अग्नि ) का यजन करो, इस सामा ( इन्द्र ) का यजन करो ' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है । यह [ प्रजापति ] ही सर्व॑देवरूप है । इसके बाद जो कुछ यह गीला है उसे अल उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है । इतना ही यह सब अन्न और स्त्रीय अन्नाद है! सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है । यह ब्रह्माकी अति- मुखा सृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की - स्वयं मर्त्य • होनेपर भी अमृतोंको उत्पन्न किया । इसलिये यह अतिसृष्टि है । जो इस देकय प्रकार जानता है वह इसकी इस अतिसृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ६ ॥ ह्य

एवं स प्रजापतिर्जगदिदं मिथु -नात्मकं सृष्ट्वा ब्राह्मणादिवर्णनि -यत्रीदेवताः सिसृक्षुरादौ, अथेति शब्दद्वयमभिनय प्रदर्शना-र्थम्, अनेन प्रकारेण मुखे हस्तौ प्रक्षिप्याभ्यमन्यदाभिमुख्येन म-न्थनमकरोत् । स मुखहस्ताभ्यां मथित्वा मुखाच्च योनेहस्ताभ्यां इस प्रकार उस प्रजापति ने इस दूब्रा मिथुनात्मक जगत्की रचना कर इंच | ब्राह्मणादि वर्णोंका नियन्त्रण करने-वाली देवताओंको रचना करनेकी इच्छासे पहले - यहाँ ' अथ '. और बला ' इति ' ये दो शब्द अभिनय प्रदर्शित करनेके लिये हैं - इस प्रकारसें न्वार मुखमें हाथ डालकर ' अभ्यमन्यत्'- बाह अभिमुखतासे मन्थन किया । उसने मुखको हाथोंसे मथकर मुखरूप चाव योनिसे हाथरूप योनियोंके द्वारा

पृष्ठ 189

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[ अध्याय १ मग्निरन्नादः वानसृजताथ तिसृष्ट्याँ योनि से दोनों दोनों भीतरकी हत ही होती है । न्न - भिन्न ) देवता न्यजन करो, इस विसृष्टि है । यह यह गीला है उसे ह सब अन्न और ब्रह्माकी अति-की स्वयं मर्त्य सृष्टि है । जो इस है ॥ ६ ॥

स प्रजापतिने इस नकी रचना कर नियन्त्रण करने-रचना करनेकी यहाँ ' अथ ', और अभिनय प्रदर्शित हैं - इस प्रकार कर ' अभ्यमन्थत्'-थन किया । उसने मथकर मुखरूप योनियोंके द्वारा ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्याथ १८३ च योनिभ्यामग्निं ब्राह्मणजातेरनु । ग्रहकर्तारमसृजत सृष्टवान् । यस्माद्दाहकस्याग्नेर्योनिरेतदु-भयं हस्तौ मुखं च, तस्मादुभय-मप्येतदलोमकं लोमविवर्जितम् । किं सर्वमेव? न, अन्तरतोऽ भ्यन्तरतः अस्ति हि योन्या सामान्यमुभयस्यास्य । किम्? अलोमका हि योनिरन्तरतः स्त्रीणाम् । तथा ब्राह्मणोऽपि मुखादेव जज्ञे प्रजापतेः । तस्मा -देक योनित्वाज्ज्येष्ठेने वानुजोऽनुगृ-ह्यते अग्निना ब्राह्मणः । तस्मा-ब्राह्मणोऽग्निदेवत्यो मुखवीर्य श्चेति श्रुतिस्मृति सिद्धम् । तथा बलाश्रयाभ्यां बाहुभ्यां बलभिदादिकं क्षत्रियजातिनिय -न्तारं चत्रियं च । तस्मादैन्द्रं चत्रं बाहुवीर्यं चेति श्रुतौ स्मृतौ चावगतम् । तथोरुत ईहा चेष्टा । ब्राह्मण जातिपर अनुग्रह करनेवाले अग्निदेवको उत्पन्न किया । क्योंकि ये हाथ और मुख दोनों दाह करनेवाले अग्निदेवकी योनि हैं । इसलिये ये दोनों ही लोमशून्य हैं ॥ क्या सारे ही लोमशून्य हैं? — नहीं, अन्तरतः – भीतरसे । इन दोनोंकी योनिसं समानता है । क्या समानता है? स्त्रियोंकी योनि भी भीतरसे लोमशून्य ही होती है । इसी प्रकार ब्राह्मण भी प्रजापतिके मुखसे ही उत्पन्न हुआ है । अतः एक ही योनिसे उत्पन्न होनेवाले होनेसे जिस प्रकार बड़े भाईका छोटे भाईपर अनुग्रह रहता है उसी प्रकार अग्नि भी ब्राह्मणपर अनुग्रह करता है । अतः अग्नि ही ब्राह्मण-की देवता है और वह मुखरूप. वीर्यवाला है - यह बात श्रुति-स्मृतिसिद्ध है । इसी प्रकार बलकी आश्रयभूता भुजाओंसे उसने क्षत्रियजातिके नियन्ता इन्द्रादि और क्षत्रियोंको रचा । इसीसे क्षत्रिय इन्द्रदेव-ताका अनुग्राह्य और बाहुरूप वीर्यवाला होता है - यह बात श्रुति और स्मृतिमें विख्यात है । तथा ईहा यानी चेष्टा उसके आश्रय-

पृष्ठ 190

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१८४ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तदाश्रयाद्वस्वादिलक्षणं विशो । नियन्तारं विशं च । तस्मात्कृ- । प्यादिपरो वस्वादिदेवत्यश्च वैश्यः । तथा पूषणं- पृथ्वीदैवतं शूद्रं च पद्भ्यां परिचरणक्षमम-सृजतेति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेः । तत्र तत्रादिदेवता सर्गमिहानुक्तं वक्ष्यमाणमप्युक्तवदुपसंहरति सृष्टिसाकल्यानुकीर्त्यै । यथेयं श्रुतिर्व्यवस्थिता तथा प्रजापति -रेव सर्वे देवा इति निश्चितोऽर्थः । ब्राह्मण भूत ऊरुओं वैश्यजातिके नियन्ता वसु आदिको और वैश्य- याज्ञि जातिको उत्पन्न किया । अतः आहु वैश्य कृषि आदि कर्मोंमें संलग्न यज रहनेवाला और वसु आदि देव- कर्मा ताओंसे अनुगृहीत होता है । इसी दिदे तरह पृथ्वीदैवत पूषा और परि- भिप्र चर्यापरायण शूद्रजातिको चरणोंसे यस्म रचा - ऐसा श्रुति स्मृति जति विस प्रसिद्धिसे सिद्ध होता है । प्रज उनमें क्षत्रियादिके देवताओंकी सृष्टिका यद्यपि यहाँ ( मूलमें ) उल्लेख I नहीं है, और वह आगे कही जाने-वाली है तो भी सृष्टिकी सर्वाङ्गता- परे का अनुकीर्तन करनेके लिये श्रुति उसका कहे हुएके समान उपसंहार " ड करती है । जैसी कि इस श्रुतिकी इति व्यवस्था है उसके अनुसार प्रजा-प्रज पति ही सर्व देवरूप है - यह इसका स्रष्टुरनन्यत्वात्सृष्टानाम् । प्रजापति- ५ नैव तु सृष्टत्वाद् देवानाम् । अथैवं प्रकरणार्थे व्यवस्थिते तत्स्तुत्यभिप्रायेणाविद्वन्मतान्तर-निन्दोपन्यासः; अन्यनिन्दान्य-स्तुतये । तत्तत्र कर्मप्रकरणे केवल निश्चित अर्थ है, क्योंकि सृष्ट पदार्थ 44 स्रष्टासे अभिन्न होते हैं और प्रजा-पतिने ही सब देवोंकी सृष्टि की है । प्र - अब इस प्रकार इस प्रकरणका १ अर्थ निश्चित होनेपर उसकी स्तुति-के लिये अविद्वानके मतान्तरकी निन्दाका उपन्यास किया जाता है, त क्योंकि एककी निन्दा दूसरेकी स्तुति-। के लिये होती है । इसलिये अभिप्राय ७ यह है कि वहाँ कर्मप्रकरणमें केवल