बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 191–200
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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[ अध्याय १ वैश्यजातिके को और वैश्य-किया । अतः कर्मोंमें संलग्न सु आदि देव-होता है । इसी षा और परि-तिको चरणोंसे -स्मृति जनित T है । दिके देवताओंकी ( मूलमें ) उल्लेख नागे कही जाने-ष्टिकी सर्वाङ्गता-नेके लिये श्रुति समान उपसंहार इस श्रुतिकी ' अनुसार प्रजा-है - यह इसका कि सृष्ट पदार्थ ते हैं और प्रजा-की सृष्टि की है । र इस प्रकरणका उसकी स्तुति-के मतान्तरकी - किया जाता है, दा दूसरेकी स्तुति-इसलिये अभिप्राय मप्रकरणमें केवल ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८१ याज्ञिका यागकाले यदिदं वच । आहु: - ' मुमग्निं यजामुमिन्द्र यज ' इत्यादि - नामशस्त्रस्तोत्र -कर्मादिभिन्नत्वाद्भिन्नमेवाग्न्या-दिदेवमेकैकं मन्यमाना आहुरित्य भिप्रायः । तन्न तथा विद्यात्, यस्मादेतस्यैव प्रजापतेः सा विसृष्टिर्देवभेदः सर्व एष उ ह्यव प्रजापतिरेव प्राणः सर्वे देवाः । अत्र विप्रतिपद्यन्ते — पर एव हिरण्यगर्भ इत्येके । संसारीत्य परे । पर एव तु मन्त्रवर्णात् । " इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः " याज्ञिकलोग यज्ञके समय जो अग्नि आदि देवताओंमेंसे प्रत्येकके नाम, शस्त्र, स्तोत्र और कर्मं भिन्न - भिन्न होनेके कारण एक - एकको अलग-अलग मानते हुए ऐसा वचन बोलते हैं कि ' इस अग्निका यजन करो, इस इन्द्रका यजन करो ' उसे उस रूपमें ( ठीक ) नहीं समझना चाहिये; क्योंकि यह सम्पूर्ण विसृष्टि– देवभेद इस प्रजापतिका ही है, अतः प्राणरूप प्रजापति ही सर्वदेव है । इस विषय में विद्वानोंका मतभेद है - किन्हींका तो कथन है कि परमात्मा ही हिरण्यगर्भ है और कोई कहते हैं कि वह संसारी है । प्रथम पक्ष- मन्त्राक्षरोंसे सिद्ध होनेके कारण परमात्मा ही हिरण्य-गर्भ है । “ उसे इन्द्र, मित्र, वरुण और इति श्रुतेः । “ एष ब्रह्मैष इन्द्र एष अग्नि कहते हैं " इस श्रुतिसे तथा प्रजापतिरेते सर्वे देवा: " ( ऐ ० उ ० " यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है, यह ५ । ३ ) इति च श्रुतेः । स्मृतेश्च - प्रजापति ( विराट् ) है और यह · वदन्त्यग्नि मनुमन्ये सम्पूर्ण देवगण है " इस श्रुतिसे, एवं " एतमेके । “ इस परमात्माको कोई अग्नि, कोई प्रजापतिम् " ( मनु ० १२ कहते हैं ", मनु और कोई प्रजापति १२३ ) इति, “ योऽसावतीन्द्रि- " यह जो अतीन्द्रिय, अग्राह्य, सूक्ष्म, योऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सना- अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय और तनः । सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स अचिन्त्य परमात्मा है वही स्वयं एव स्वयमुद्वभौ " । ( मनु ० १ । प्रकट हुआ " इन स्मृतियोंसे यही ७ ) इति च । सिद्ध होता है ।
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१८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ संसार्येव वा स्यात् । " सर्वा-न्पाप्मन औषतु ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । १ ) इति श्रुतेः । न ह्यसंसा रिणः पाप्मदाहप्रसङ्गोऽस्ति । भयारतिसंयोगश्रवणाच्च 1 । “ अथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । ६ ) इति च । " हिरण्यगर्भ पश्यति जायमा नम् ” ( श्वे ० उ ० ४ । १२ ) इति च मन्त्रवर्णात् । स्मृतेश्च कर्मविपाकप्रक्रियायाम् - " ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च । उत्तमां सात्रिकीमेतां गति-माहुर्मनीषिणः ” ( मनु ० १२ । ५० ) इति । अथैवं विरुद्धार्थानुपपत्तेः प्रामाण्यव्याघात इति चेत्? न, कल्पनान्तरोपपत्तेरविरोधात् । उपाधिविशेषसम्बन्धाद्विशेषकल्प-नान्तरमुपपद्यते । “ आसीनो दूरं । ब्राह्म द्वितीय पक्ष - अथवा संसारी ही हिरण्यगर्भं होना चाहिये, जैसा कि " उसने समस्त पापोंको दग्ध कर करत दिया " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, मही क्योंकि असंसारी परमात्माके लिये तो पापदाहका प्रसंग ही नहीं है । इत्य इसके सिवा उसका भय और अरति- त्संस के साथ संयोग भी सुना गया है; ऽसं यहाँ यह भी कहा है कि " उसने स्वयं मर्त्य होकर भी अमृतों ( देवताओं ) की रचना की । " ण्य तथा “ उसने उत्पन्न होनेवाले हिर- 66-गर्भको देखा " इस मन्त्रवर्णसे भी १६ यही सिद्ध होता है । और कर्मविपाक-स्त प्रक्रियामें " ब्रह्मा ( हिरण्यगर्भं ), प्रजापतिगण, धर्म, महत्तत्त्व और प्रा अव्यक्त — इन्हें मनीषिगण उत्तम व सात्त्विकी गति बतलाते हैं " इत्यादि क स्मृति भी है । शङ्का - किंतु इस प्रकार विरुद्ध अर्थं तो संगत नहीं हो सकता । f इसलिये इससे श्रुतिके प्रामाण्यका · - I विघात होता है । समाधान- - ऐसा मत कहो, स क्योंकि एक अन्य कल्पना सम्भव होनेके कारण इनमें अविरोध हो सकता है । उपाधिविशेषके सम्बन्ध-से एक विशेष प्रकारकी कल्पना होनी सम्भव है । " वह स्थिर होने-
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[ अध्याय १ नवा संसारी ही हिये, जैसा कि को दग्ध कर सिद्ध होता है, मात्मा के लिये ही नहीं है । जय और अरति-सुना गया है; है कि " उसने भी अमृतों रचना की । " होनेवाले हिर-मन्त्रवर्णसे भी र कर्मविपाक-हिरण्यगर्भं ), महत्तत्त्व और षिगण उत्तम ते हैं " इत्यादि प्रकार विरुद्ध हो सकता । = प्रामाण्यका • मत कहो, पना सम्भव अविरोध हो षिके सम्बन्ध-रकी कल्पना इस्थिर होने-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७ व्रजति शयानो याति सर्वतः । । पर भी दूर चला जाता है, शयन कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातु-मर्हति ” ( क्र ० उ ० १ । २ । २१ ) इत्येवमादिश्रुतिभ्य उपाधिवशा -त्संसारित्वं न परमार्थतः । स्वतो-संसार्येव । एवमेकत्वं नानात्वं च हिर-' ण्यगर्भस्य । तथा सर्वजीवानाम् " तत्त्वमसि ' ( छा ० उ ० ६ । ८ -१६ ) इति श्रुतेः । हिरण्यगर्भ । स्तु उपाधिशुद्धयतिशयापेक्षया प्रायशः पर एवेति श्रुतिस्मृति -वादाः प्रवृत्ताः । संसारित्वं तु क्वचिदेव दर्शयन्ति । जीवानां उपाधिगताशुद्धिबाहुन्यात्संसा: रित्वमेव प्रायशोऽभिलप्यते । किये होनेपर भी सब ओर जाता है, उस हर्ष और विषादयुक्त देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है? " " इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उसका उपाधिके ही कारण संसारित्व है, परमार्थतः नहीं । स्वतः तो वह असंसारी ही है | इस प्रकार हिरण्यगर्भका एकत्व भी है और नानात्व भी । इसी तरह सब जीवोंका भी एकत्व और नानात्व है, जैसा कि " तू वह है " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । हिरण्य-गर्भ तो उपाधिकी शुद्धिकी अति-शयताकी अपेक्षासे प्रायः परमात्मा ही है - ऐसी श्रुति - स्मृतिवादोंकी प्रवृत्ति है । वे उसका संसारित्व तो कहीं - कहीं ही दिखाते हैं । किंतु जीवोंका तो उपाधिगत अशुद्धिक अधिकता के कारण प्रायः संसारित्व. ' ही बतलाया जाता है । तथा तु सम्पूर्णं उपाधिभेदके बाघकी अपेक्षा-व्यावृत्तकृत्स्नोपाधिभेदापेक्षया से श्रुति और स्मृतिके वादोंद्वारा सर्वः परत्वेनाभिधीयते श्रुति- सबका परमात्मभावसे निरूपण स्मृतिवादैः । किया जाता है । परित्यक्तागमबलै- जो शास्त्रका बल छोड़ चुके हैं तार्किकैस्तु तथा ' आत्मा है— नहीं है, वह रस्ति नास्ति कर्ताकर्तेत्यादि । कर्ता है - अकर्ता है ' इस प्रकार
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१८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ • विरुद्धं बहुत केयद्भिराकुलीकृतः शास्त्रार्थः, तेनार्थनिश्रयो दुर्लभः । ये तु केवलशास्त्रानुसारिणः शान्तदर्पास्तेषां प्रत्यक्षविषय इव निश्चितः शास्त्रार्थो देवतादि-विषयः । तत्र प्रजापतेरेकस्य देवस्या-श्राद्यलक्षणो मेदो विवक्षित इति तत्राग्निरुक्तोऽत्ता, श्रद्यः सोम इदानीमुच्यते — प्रथ यत्किञ्चेदं लोक आर्द्र द्रवात्मकं तद्रेतस आत्मनो बीजादसृजन; " रेतस आपः " ( ऐ ० उ ० १ । ४ ) इति श्रुतेः । द्रवात्मकश्च सोमः । तस्माद्यदार्द्र प्रजापतिना रेतसः सृष्टं तदु सोम एव । एतावद्वै एतावदेव नातोऽधि-कमिदं सर्वम् । किं तत्? अन्नं चैव सोमो द्रवात्मकत्वादाप्याय-। ब्राह्मण | बहुत से विरुद्ध तर्क करते हैं उन तार्किकोंने तो शास्त्रको दुर्विज्ञेय कर कम् दिया है, इससे उसके तात्पर्यका रूक्षत निश्चय होना कठिन हो गया है । किंतु जो केवल शास्त्रका ही सोम अनुसरण करनेवाले और दर्पहीन इत्यथ पुरुष हैं उन्हें तो शास्त्रका देवतादि-विषयक अभिप्राय प्रत्यक्षके समान अर्थ निश्चित है । रपि इतना निश्चय हो जानेपर अब एक देव प्रजापतिके अत्ता ( भोक्ता ) स्यैव और आद्य ( भोग्य ) रूप भेदका वात्त निरूपण करना अभीष्ट है, उसमें ' अत्ता ' रूप अग्निका वर्णन तो कर जग दिया गया, अब ' आद्य ' रूप सोम-दोघ का वर्णन किया जाता है । यह जो कुछ लोकमें आर्द्र- - द्रवात्मक है भव उसे उसने अपने बीज रेतस् ( वीर्य ) से उत्पन्न किया; जैसा कि “ रेतस्से जल हुआ " इस श्रुतिसे सिद्ध होता रात है । सोम भी द्रवात्मक होता है । इत्य अतः प्रजापतिके द्वारा जो कुछ ना अपने वीर्यसे द्रवात्मक रचा गया देव है वह सोम ही है । क यह सब इतना ही है, इससे इत अधिक नहीं है । वह क्या है? स यही कि द्रवात्मक होनेके कारण
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[ अध्याय१ करते हैं उन को दुर्विज्ञेय कर के तात्पर्यका हो गया है । शास्त्रका ही और दर्पहीन त्रका देवतादि-= यक्ष के समान जानेपर अब अत्ता ( भोक्ता ) • रूप भेदका ष्ट है, उसमें वर्णन तो कर ' रूप सोम-है । यह ई- द्रवात्मक है रेतस् ( वीर्य ) कि " रेतस्से सिद्ध होता क होता है । रा जो कुछ क रचा गया ही है, इससे ह क्या है? होनेके कारण ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८ ९ कम् । अन्नादश्चाग्निरौष्ण्याद् । सोम पोषक अन्न है और उष्णता तथा रूक्षता कारण अग्नि अन्नाद रूक्षत्वाच्च । तत्रैवमवधियते, है । यहाँ यह निश्चय होता है कि सोम एवान्नं यदद्यते तदेव सोम । इत्यर्थः । य एवात्ता स एवाग्निः अर्थबलाद्भयवधारणम् ॥ अग्नि-रपि क्वचिद् हूयमानः सोमपक्ष -स्यैव ॥ सोमोऽपीज्यमानोऽग्निरे वात्तृत्वात् । एवमग्नीषोमात्मकं जगदात्मत्वेन पश्यन्न केनचिद्-दोषेण लिप्यते, प्रजापतिश्च भवति । सैषा ब्रह्मणः प्रजापतेर तिसृष्टि-रात्मनोऽप्यतिशया । का सा? इत्याह- इत्याह - यच्छ्रेयसः यच्छ्रेयसः प्रशस्यतरा -नात्मनः सकाशाद्यस्मादसृजत देवांस्तस्माद्देव सृष्टिरति सृष्टिः । कथं पुनरात्मनोऽतिशया सृष्टिः? इत्यत आह - अथ यद्यस्मान्मर्त्यः सोम ही अन्न है, अर्थात् जो भक्षण किया जाता है वही सोम है । इसी प्रकार जो ही अत्ता ( भक्षण करने-वाला ) है वही अग्नि है, अर्थंके बलसे ही ऐसा निश्चय किया जाता है । कहीं हवन किया जानेवाला होनेसे अग्नि भी सोमपक्षका ही हो जाता है और कहीं यजन किया जानेवाला होनेपर अत्ता हो कारण सोम भी अग्नि ही HTT जाता है । इस प्रकार अग्नीषो-मात्मक जगत्को आत्मभावसे देखने-वाला पुरुष किसी भी दोषसे लिप्त नहीं होता तथा वह प्रजापति हो जाता है । वह यह प्रजापति ब्रह्माकी अति-सृष्टि अर्थात् अपनेसे भी बढ़ी हुई. सृष्टि है । वह क्या है? इसपर | श्रुति कहती है- क्योंकि प्रजापतिने देवताओंको अपनी अपेक्षा श्रेयसः ---प्रशस्यतर रचा है, इसलिये देवसृष्टि अतिसृष्टि है । [ प्रजापतिकी ] यह सृष्टि अपनी अपेक्षा बढ़कर क्यों है? इसपर श्रुति कहती है — क्योंकि सन्नमृतानमरण- | इसने स्वयं मर्त्य -- मरणघर्मा होनेपर सन्मरणधर्मा
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१ ९ ० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ धर्मिणो देवान् कर्मज्ञानवह्निना ' । सर्वानात्मनः पाप्मन घोषित्वा-सृजत, तस्मादियमतिसृष्टिरुत्कृ- । टज्ञानस्य फलमित्यर्थः । तस्मा -देतामतिसृष्टिं प्रजापतेरात्मभूतां यो वेद स एतस्यामतिसृष्टयां प्रजापतिरिव भवति प्रजापतित्र देव स्रष्टा भवति ॥ ६ ॥
AVALA ब्राह्मण भी कर्मज्ञानरूप अग्निसे अपने समस् पापोंको दग्धकर इन अमृत — अम- तदुद्धर रणधर्मा देवताओंकी रचना की है । तथा इसलिये यह अतिसृष्टि अर्थात् शाखः उत्कृष्ट ज्ञानका फल है । इसलिये गीतास प्रजापतिकी आत्मभूता इस अति- शाखम सृष्टिको जो जानता है वह इस च अतिसृष्टिमें प्रजापतिके समान होता है, अर्थात् प्रजापतिके समान ही जगत्का स्रष्टा होता है ॥ ६ ॥ क्रिय
रूपा अव्याकृत कारण ब्रह्मसे व्यक्त जगत् की उत्पत्ति, दोनोंका अभेद स ए और इस अभेदोपासनाका फल धाने. सर्व वैदिकं साधनं ज्ञानकर्म-लक्षणं कर्त्राद्यनेककारका पेक्षं प्रजा-पतित्व फलावसानं साध्यमेतावदेव यदेतद्वयाकृतं जगत्संसारः । अथैतस्यैव साध्यसाधनलक्षणस्य व्याकृतस्य जगतो व्याकरणात्प्रा-ग्वीजावस्था या तां निर्दिदिन-त्यकुरारादिकार्यानुमितामिव वृक्षस्य, कर्मबीजोऽविद्याक्षेत्रो सौ संसारवृक्षः समूल उद्धर्तव्य इति ॥ कर्तादि अनेक कारकोंकी पश्य अपेक्षावाला ज्ञान और कर्मरूप बदन सम्पूर्ण वैदिक साधन तथा प्रजा- स्यैत पतित्वरूप फलमें समाप्त होनेवाला सव साध्य इतना ही है जो कि यह व्याकृत जगत् यानी संसार है । ' तात्र अब, जिसका बीज कर्म है और क्षेत्र सर्वस अविद्या है उस संसारवृक्षको समूल नानु उखाड़ना है— इसलिये अङ्कुरादि व कार्यसे अनुमित होनेवाली वृक्षको पूर्व नाम - स बीजावस्था के समान इस साध्यसाधन- है ' इस रूप व्याकृत जगत्के व्याकृत होनेसे ' इस न पूर्व इसकी जो बीजावस्था थी उसका ( व्याव श्रुति निर्देश करना चाहती है; क्योंकि
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[ अध्याय१ नसे अपने समस्त न अमृत - अम-- रचना की है । सृष्टि अर्थात् है । इसलिये इस अति-है वह इस के समान होता के समान ही है ॥ ६ ॥
नोंका भेद 5 कारकों की और कर्मरूप न तथा प्रजा-प्त होनेवाला जो कि यह संसार है । है और क्षेत्र वृक्षको समूल नये अङ्कुरादि बाली वृक्षको पूर्व इस साध्यसाधन-व्याकृत होनेसे स्था थी उसका बहती है; क्योंकि ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १ ९ १ तदुद्धरणे हि पुरुषार्थ परिसमाप्तिः । उस संसारवृक्षके उखड़नेमें ही तथा चोक्तम् - " ऊर्ध्वमूलोऽवाक्- पुरुषार्थंकी परिसमाप्ति होती है । शाखः ” ( २ । ३ । १ ) इति काठके । ऐसा ही कठोपनिषद् “ ऊर्ध्वमूलो-गीतासु च “ ऊर्ध्वमूलमध: - ऽवाक्शास्त्रः ”, गीतामें “ ऊर्ध्वमूल-शाखम् ” ( १ ५ । १ ) इति ॥ पुराणे वृक्षः मधःशाखम् सनातनः ” और " इत्यादि .पुराणमें " ब्रह्म-वाक्योंले च - " ब्रह्मवृक्षः सनातनः " इति । कहा भी है । तद्धेदं तर्ह्य व्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्या-क्रियतासौनामायमिदँ रूप इति तदिदमप्येतर्हि नाम-रूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौनामाऽयमिद रूप इति । स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्र ेभ्यो यथा क्षुरः क्षुर-धानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुला ये तंन पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । वदन्वाक्पश्यचक्षुः v शृण्वञ्श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्य-स्यैतानि कर्मनामान्येव । स यो त एकैकमुपास्ते न स वेदाकृत्स्नो ह्यषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासी-तात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन ह्य तत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदे-नानुविन्देदेवं कीर्ति श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥७ ॥
वह यह जगत् उस समय ( उत्पत्ति से पूर्व ) अव्याकृत था । वह नाम - रूपके योगसे व्यक्त हुआ; अर्थात् ' यह इस नाम और इस रूपवाला है ' इस प्रकार व्यक्त हुआ । अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु ' इस नाम और इस रूपवाली है ' इस प्रकार व्यक्त होती है । वह यह. ( व्याकर्ता ) इस ( शरीर ) में नखाग्रपर्यंन्त प्रवेश किये हुए है, जिस
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१ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्मण प्रकार कि छुरा छुरेके घर में छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करते. वाला अग्नि अग्नि के आश्रय ( काष्ठादि ) में गुप्त रहता है । परंतु उसे लोग वस्थां: देख नहीं सकते । वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रिया के कारण ही वह प्राण राजासी है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण व्याकर श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है । ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं । अतः इनमेंसे जो एक - एककी उपासना करता है वह नहीं जानता । धनल वह असम्पूर्णं ही है । वह एक - एक विशेषणसे ही युक्त होता है । अतः तदिद ‘ आत्मा है ' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस ( आत्मा ) में जगद्द ही वे सब एक हो जाते हैं । यह जो आत्मा है वही इस सबका प्राप्तव्य है, क्योंकि यह आत्मा है, इस आत्मा के ज्ञात होनेसे ही इस सब जगत्को देकत्व जानता है । जिस प्रकार पदों ( खुर आदिके चिह्नों ) द्वारा [ खोये हुए जगत पशुको ] प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह इसके द्वारा मेव यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
तद्भेदं तदिति बीजावस्थं जगत्प्रागुत्पत्तेस्तहिं तस्मिन्काले; परोक्षत्वात्सर्वनाम्नाप्रत्यक्षाभिधा-मेनाभिधीयते, भूतकालसम्बन्धि त्वादव्याकृतभाविनो जगतः सुखग्रहणार्थमैतिह्यप्रयोगो हशब्दः । एवं ह तदा श्रासीदित्युच्यमाने सुखं तां परोक्षामपि जगतो बीजा -१. उस समय वह ऐसा था । अथैव ' तद्वेदम् ' - तत् अर्थात् उत्पत्ति-से पूर्वं बीजरूपमें स्थित जगत् ' तर्ह ' सतो उस उस समय समय — – – यहाँ यहाँ अव्याकृतसे भवत होनेवाला जगत् भूतकालसे सम्बद्ध होनेके कारण परोक्ष होनेसे ' तत् ' सन्न और ' इदम् ' इन दो सर्वनामोंद्वारा जैव परोक्षरूपसे कहा गया है । तथा ' है ' कर्मव इस ऐतिह्यवाचक अव्ययका प्रयोग व्या उस ( परोक्ष जगत् ) का सुगमता- स्पष्ट से ग्रहण ( बोघ ) करानेके लिये व्यत किया गया है । अर्थात् ' एवं ह तदा आसीत् ' – इस प्रकार कहनेपर । परोक्ष होनेपर भी उस जगत् की । बीजावस्थाको श्रोता अनायास है
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[ अध्याय१ श्वका भरण करते-है । परंतु उसे लोग रण ही वह प्राण , सुननेके कारण मनुसारी नाम ही वह नहीं जानता । होता है । अतः इस ( आत्मा ) में इस सबका प्राप्तव्य इस सब जगत्को द्वारा [ खोये हुए है वह इसके द्वारा तत् अर्थात् उत्पत्ति-- स्थित जगत् ' तर्ह ' नहीं अव्याकृतसे - भूतकालसे सम्बद्ध परोक्ष होनेसे ' तत् ' दो सर्वनामोंद्वारा गया है । तथा ' है ' क अव्ययका प्रयोग गत् ) का सुगमता-ब ) करानेके लिये अर्थात् ' एवं ह तदा कहने पर, प्रकार भी उस जगत् की श्रोता अनायास ही ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १ ९ ३ वस्थां प्रतिपद्यते, युधिष्ठिरो ह किल राजासीदित्युक्ते यद्वत् । इदमिति व्याकृतनामरूपात्मकं साध्यसा -धनलक्षणं यथावर्णितमभिधीयते । तदिदंशब्दयोः परोक्षप्रत्यक्षावस्थ-जगद्वाचकयोः सामानाधिकरण्या-देकत्वमेव परोक्षप्रत्यक्षावस्थस्य जगतोऽवगम्यते । तदेवेदमिद-मेव च तदव्याकृतमासीदिति । अथैवं सति नासत उत्पत्तिर्न सतो विनाशः कार्यस्येत्यवधृतं भवति । तदेवम्भूतं जगदव्याकृतं सन्नामरूपाभ्यामेव नाम्ना रूपे -जैव च व्याक्रियत । व्याक्रियतेति कर्मकर्तृप्रयोगात्तत्स्वयमेवात्मैव व्याक्रियत, वि या अक्रियत, वि-ग्रहण कर लेता है, जैसे ' यु ' धिष्टिरो ह किल राजासीत् ' ऐसा कहनेपर [ युधिष्ठिरको ] । ' इदम् ' इस शब्दसे जिसके नाम और रूप अभिव्यक्त हो गये हैं वह साध्यसाधनरूप पूर्वोक्त जगत् ही कहा जाता है । [ इस प्रकार ] परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे स्थित जगत् के वाचक ' तत् और ' इदम् ' शब्दोंका सामानाधिकरण्य होनेसे प्रत्यक्ष और परोक्षावस्थ जगत्की एकता ज्ञात होती है । वह ( अव्याकृत ) ही यह जगत् है और यही वह अव्याकृत था । ऐसा होनेसे यह निश्चय होता है कि असत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती और सत्कार्यका नाश नहीं हो सकता । वह इस प्रकारका जगत् अव्याकृत रहकर ' नामरूपाभ्याम् — नाम और रूपके द्वारा ही व्याकृत हुआ । ' व्याक्रियत ' ऐसा ' कर्मकर्तृ प्रयोग होनेके कारण [ यह निश्चय होता है कि ] वह आत्मा ' सामर्थ्यसे आक्षिप्त हुए नियन्ता, कर्ता और स्पष्टं नामरूपविशेषावधारणमर्यादं साधनरूप त क्रियाके निमित्तोंवाले व्यक्तीभावमापद्यत सामर्थ्या- जगत्के रूपमें स्वयं ही ‘ व्याक्रियत’– १. प्रसिद्ध है कि युधिष्ठिरनामक एक राजा हुआ था । २. जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो वह कर्मकर्ता कहलाता है । ३. कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति होनी असम्भव है — इस सामर्थ्य से वृ ० उ ० १३–
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१ ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ दाक्षिप्तनियन्तु कर्तृसाधनक्रिया / निमित्तम् । सौनामेति सर्वनाम्नाविशेषा-भिधानेन नाममात्रं व्यपदिशति । देवदत्तो यज्ञदत्त इति वा नामास्य इत्यसौनामायम् । तथेदमिति शुक्लकृष्णादीनामविशेषः ॥ इदं शुक्लमिदं कृष्णं वा रूपमस्येतीदं रूपः । तदिदमव्याकृतं वस्तु एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले नामरूपा-स्यामेव व्याक्रियते असौनामा-यमिदंरूप इति । यदर्थः सर्वशास्त्रारम्भः, यस्मि-नविद्यया स्वाभाविक्या कर्तृक्रिया-फलाध्यारोपणा कृता, यः कारणं सर्वस्य जगतः, यदात्मके नामरूपे सलिलादिव स्वच्छान्मलमित्र फेन -मव्याकृते व्याक्रियेते, यश्च ताभ्यां ब्राह्मण विआ अक्रियत अर्थात् विशिष्टरूप नामरूपविशेषके निश्चयको मर्यादाले नामर युक्त व्यक्तीभावको प्राप्त हुआ । नित्य ' असौनामा ' इस पदके ‘ असौ ' एषोऽ इस | सर्वनामसे किसी प्रकारका विशेष न बतलाकर श्रुति नाम- व्याक मात्रका प्रतिपादन करती है— देव- देहेष दत्त या यज्ञदत्त इत्यादि इसके नाम यादि हैं, इसलिये यह पुरुष ' असौनामा ' है । तथा ' इदम् ' यह शुक्ल कृष्णादि व्याकृत वर्णोंका सामान्य वाचक है – यह मात्म ' शुक्ल ' अथवा यह ' कृष्ण ' इसका रूप है इसलिये यह इदंरूप है । एव इसीसे यह अव्याकृत वस्तु इस निह समय भी नाम - रूपके द्वारा ही ' इस नामवाली है ', ' इस रूपवाली है ' इस प्रकार व्यक्त होती है । ऽव्य जिसके लिये सारे शास्त्रका आरम्भ हुआ है, जिसमें स्वाभाविकी स्वात अविद्यासे कर्ता, क्रिया और फलका निम आरोप किया गया है, जो सारे जगत्का कारण है, जिसके स्वरूप- क्रिय भूत नाम और रूप स्वच्छ जलसे मलरूप फेनके समान अव्याकृत- नाध रूपसे स्थित हुए ही व्याकृत होते यथे जिनका आक्षेप करना आवश्यक है उन नियन्ता - प्रेरक, कर्ता - उत्पत्ति के अनुकूल शरीर एवं इन्द्रियादिका व्यापार करनेवाला तथा साधन - - इन्द्रियव्यापार इन निि क्रियाके निमित्तोंसे युक्त होकर व्यक्त हुआ ।