बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 201–210

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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[ अध्याय१ र्थात् विशिष्टरूपसे निश्चयकी मर्यादासे प्राप्त हुआ । इस पद ' अ ' किसी प्रकारका कर श्रुति नाम-करती है - देव-त्यादि इसके नाम पुरुष ' असौनामा ' यह शुक्ल- कृष्णादि वाचक है — यह इ ' कृष्ण ' इसका यह इदंरूप है । बाकृत वस्तु इस - रूपके द्वारा ही ', ' इस रूपवाली क्त होती है । सारे शाखका जसमें स्वाभाविकी किया और फलका या है, जो सारे है, जिसके स्वरूप-रूप स्वच्छ जलसे समान अव्याकृत-ही व्याकृत होते - उत्पत्ति के अनुकूल इन्द्रियव्यापार इन ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १ ९ ५ नामरूपाभ्यां विलक्षणः स्वतो । नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः, स एषोऽव्याकृते आत्मभूते नामरूपे व्याकुर्वन्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु देहेष्विह कर्मफलाश्रयेष्वशना-यादिमत्सु प्रविष्टः । ननु अव्याकृतं स्वयमेव व्याकृतप्रपञ्चे पर- व्याक्रियतेत्युक्त -मात्मानुप्रवेश- मूव, कथमिदमिदा-मीमांसा नीम् उच्यते, पर एव तु आत्माव्याकृतं व्याकुल-fore प्रविष्ट इति । नैष दोषः परस्याप्यात्मनो-ऽव्याकृतजगदात्मत्वेन विवक्षित-त्वात् । आक्षिप्तनियन्तृकर्तृक्रिया-निमित्तं हि जगदव्याकृतं व्या-क्रियतेत्यवोचाम । इदंशब्दसामा -नाधिकरण्याच्चाव्याकृतशब्दस्य । यथेदं जगन्नियन्त्राद्यनेककारक-निमित्तादिविशेषवद्वयाकृतम्, हैं और जो उन नामरूपसे विलक्षण स्वयं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वरूप है वह यह [ आत्मा ] अव्याकृत एवं आत्मभूत नामरूपोंको व्यक्त करता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इन कर्मफलके आश्रयभूत एवं क्षुधादि -मान् समस्त देहोंमें प्रवेश किये हुए है । शङ्का — किंतु पहले यह कहा गया है कि अव्याकृत स्वयं ही व्याकृत होता है । अब यह कैसे कहा जाता है कि परमात्मा ही अव्याकृतको व्यक्त करता हुआ इसमें प्रविष्ट है । समाधान — यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँ परमात्मा ही अव्या-कृत जगद्रूपसे विवक्षित है । हमने कहा था कि [ सामर्थ्यंसे ] आक्षिप्त हुए नियन्ता और कर्ता [ एवं साधन ] रूप क्रियाके निमित्तोंसे युक्त अव्याकृत जगत् ही व्याकृत होता है । इसके सिवा ' अव्याकृत ' शब्दका ' इदम् ' शब्दके साथ सामानाधिक-रण्य होनेसे भी यही सिद्ध होता है । जिस प्रकार यहव्याकृत जगत् प्रेरक आदि अनेक कारणरूप निमित्तादि विशेषसे युक्त है उसी प्रकार वह

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१ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तथा अपरित्यक्तान्यतमविशेषव- । देव तदव्याकृतम् । व्याकृताव्या-कृतमात्रं तु विशेषः । दृष्टश्च लोके विवक्षातः शब्द-प्रयोगो ग्राम चागतो ग्रामः शून्य इति । कदाचिद् ग्रामशब्देन निवासमात्रविवक्षायां ग्रामः शून्य इति शब्दप्रयोगो भवति, कदा-चिन्निवासिजनविवक्षायां ग्राम श्रागत इति, कदाचिदुभय विवक्षा -यामपि ग्रामशब्दप्रयोगो भवति ग्रामं च न प्रविशेदिति यथा । तद्वदिहापि जगदिदं व्याकृतमव्या-कृतं चेत्यभेदविवक्षायाम् आत्मा नात्मनोर्भवति व्यपदेशः । तथेदं जगदुत्पत्तिविनाशात्मकमिति के-चलजगद्व्यपदेशः । तथा " महा-नज आत्मा ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २२ ) " अस्थूलोऽनणुः " " स एप नेति नेति ” ( बृ ० उ ० ३ । ९ । २६ ) इत्यादि केवलात्म-व्यपदेशः । अव्याकृत भी उनमें से किसी विशेष-का त्याग न करके उनसे युक्त ही है । उनमें व्याकृत और अव्याकृत होने का ही अन्तर है । लोकमें भी विवक्षाके अनुसार शब्दका प्रयोग होता देखा गया है जैसे ' गाँव आ गया ', ' गाँव सूना है ' इन वाक्योंमें कभी तो ' गाँव ' शब्दसे निवासस्थानमात्र बतलाना अभीष्ट होनेपर ' गाँव सूना है ' ऐसा शब्द प्रयोग होता है और कभी गाँवमें रहनेवाले लोगोंकी विवक्षासे गाँव आ गया ' ऐसा प्रयोग होता है । तथा कभी दोनोंकी विवक्षासे भी ' गाँव ' शब्दका प्रयोग होता है जैसे ' गाँव में प्रवेश न करे ' इस वाक्यमें । इसी प्रकार यहाँ भी ' यह जगत् व्याकृत और अव्याकृत है ' इस वाक्यमें अभेदकी विवक्षासे आत्मा और अनात्माका निर्देश हुआ है तथा ‘ यह जगत् उत्पत्ति - विनाशात्मक है ' इस वाक्यमें केवल जगत्का ' व्यपदेश है । इसी तरह " यह महान् अजन्मा आत्मा है ", " यह न स्थूल है, न अणु ( सूक्ष्म ) ", " वह यह आत्मा ऐसा ( कारणरूप ) नहीं है, ऐसा ( कार्यरूप ) नहीं है ” इत्यादि श्रुतियों में केवल आत्माका व्यपदेश है । ब्राह्मण ननु सर्वतो सक अप्रवि प्रवेष्टुं ग्रामादि त्यप्रवि पा चेत् । आत्मा तर्हि? जायत यथा नालि शत् " ( उस

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नध्याय १ सी विशेष-युक्त ही अव्याकृत के अनुसार खा गया है । गाँव ' सूना तो ' गाँव ' बतलाना है ' ऐसा और कभी विवक्षासे योग होता नवक्षा से भी ता है जैसे - वाक्यमें । यह जगत् आमा हुआ है तथा शात्मक है ' काव्यपदेश न् अजन्मा है, यह आत्मा हीं है, ऐसा • इत्यादि व्यपदेश है । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १ ९ ७ ननु परेण व्याकर्त्रा व्याकृतं सर्वतो व्याप्तं सर्वदा जगत्, । स कथमिह प्रविष्टः परिकल्प्यते? अप्रविष्टो हि देशः परिच्छिन्नेन प्रवेष्टुं शक्यते, यथा पुरुषेण ग्रामादिः । नाकाशेन किश्चिन्नि-त्यप्रविष्टत्वात् । पाषाण सर्पादिवद्धर्मान्तरेणेति चेत् । अथापि स्यात्, न पर श्रात्मा स्वेनैव रूपेण प्रविवेश, किं तर्हि १ तत्स्थ एव धर्मान्तरेणोप-जायते, तेन प्रविष्ट इत्युपचर्यते । शङ्का - किंतु जगत्को व्यक्त करनेवाले परमात्माने उसे व्यक्त कर सर्वदा सब ओरसे व्याप्त कर रखा है; फिर ' उसने इसमें प्रवेश किया ' ऐसी कल्पना क्यों की जाती है? किसी परिच्छिन्न पदार्थद्वारा अपनेसे अप्रविष्ट देशमें ही प्रवेश किया जा सकता है, जैसे पुरुपसे ग्रामादि | आकाशके द्वारा किसी भो पदार्थमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो सबमें नित्य प्रविष्ट ही है । सिद्धान्ती - किंतु यदि पाषाण और सर्पादिके समान उसने धर्मा-न्तररूपसे प्रवेश किया हो तो? अर्थात् ऐसा भी हो सकता है कि परमात्माने अपने ही रूपसे प्रवेश नहीं किया, तो फिर क्या हुआ? वह उसमें स्थित हुआ ही धर्मान्तर-रूपसे उत्पन्न हो गया, इसीसे ' उसने प्रवेश किया ' ऐसा उपचार होता है, जिस प्रकार कि पत्थरमें यथा पाषाणे सहजोऽन्तःस्थः सर्पो उसके भीतर रहनेवाला एवं उसके साथ उत्पन्न हुआ सर्प अथवा नालिकेरे वा तोयम् । नारियलमें जल । न, “ तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि " उसे रचकर वह उसीमें शत् " ( तै ० उ ० २ । ६ । १ ) अनुप्रविष्ट हो गया " - ऐसी श्रुति है । १. पाषाणमें स्थित जो पञ्चमहाभूत हैं उन्हींका परिणाम होने सर्पको सहज ( उसके साथ उत्पन्न होनेवाला ) कहा है ।

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१ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ इति श्रुतेः । यः स्रष्टा स भावा- । न्तरमनापन्न एव कार्यं सृष्ट्वा पश्चा-स्प्राविशदिति हि श्रूयते ॥ यथा । भुक्त्वा गच्छतीतिभुजिगमिक्रि-ययोःपूर्वापरकालयोरितरेतरविच्छे दोऽविशिष्टश्च कर्ता तद्वदिहापि स्यात् । न तु तत्स्थस्यैव भावान्त-रोपजनन एतत्सम्भवति । न च स्थानान्तरेण वियुज्य स्थानान्तर-संयोग लक्षणः प्रवेशो निरवयवस्या -परिच्छिन्नस्य दृष्टः । सावयव एव प्रवेशश्रवणा-दिति चेत् १ न; “ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः ” ( मु ० उ ० २।१।२ ) " निष्कलं निष्क्रियम् ” ( श्वे ० उ ० ६।१ ९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः, सर्वव्यपदेश्य धर्मविशेषप्रतिषेघश्रुतिभ्यश्च । प्रतिबिम्बप्रवेश वदिति चेत् १ ब्राह्म जो स्रष्टा था उसने भ E प्राप्त हुए बिना ही कार्यकी रचना कर पीछेसे उसमें प्रवेश किया — ऐसा पप श्रुतिमें कहा गया है । जिस प्रकार ' भोजन करके जाता है ' इस वाक्य में पूर्वापरकालमें होनेवाली भोजन और गमनक्रियाओंका पर-स्पर विभेद है और उनका कर्ता तन अलग - अलग नहीं है, उसी प्रकार प्रव यहाँ भी समझना चाहिये । यह उसमें स्थितका ही भावान्तरको स्व प्राप्त होनेपर सम्भव नहीं है । तथा जो निरवयव और अपरिच्छिन्न उ होता है उसका एक स्थानसे वियुक्त होकर दूसरे स्थान से संयुक्त होना-रूप प्रवेश नहीं देखा जाता । सिद्धान्ती - उसका प्रवेश सुना वि गया है, इसलिये यदि वह सावयव होतो? पूर्व ० नहीं; " शरीररूप पुरमें रहनेवाला आत्मा दिव्य और इ अमृतं है " " वह निरवयव और निष्क्रिय है " इत्यादि श्रुतियोंसे तथा सब प्रकारके व्यपदेश्य धर्मोका निषेध करनेवाली श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता । सिद्धान्ती - [ दर्पणादिमें ] प्रति-बिम्बके प्रवेशके समान. उसका प्रवेश हो तो?

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[ अध्याय १ भावान्तरको कार्यकी रचना -किया- ऐसा - है । जिस जाता है ' इस में होनेवाली -याओंका पर-उनका कर्ता उसी प्रकार चाहिये । यह भावान्तरको नहीं है । तथा अपरिच्छिन्न न्यानसे वियुक्त संयुक्त होना-जाता । प्रवेश सुना वह सावयव नीररूप पुरमें दिव्य और स्वयव और दश्रुतियोंसे देश्य धर्मोका सुतियोंसे ऐसा दिमें ] प्रति-नान उसका ब्राह्मण ४ ] न, वस्त्वन्तरेण विप्रकर्षानु-पपत्तेः । द्रव्ये गुणप्रवेशवदिति चेत्? न, अनाश्रितत्वात् । नित्यपर-तन्त्रस्यैवाश्रितस्य गुणस्य द्रव्ये प्रवेश उपचर्यते । न तु ब्रह्मणः स्वातन्त्र्यश्रवणात्तथा प्रवेश उपपद्यते । फले बीजवदिति चेत? न; सावयवत्ववृद्धिक्षयोत्पत्ति-विनाशादिधर्मवच्चप्रसङ्गात् । न १ ९९ पूर्व ० - नहीं, क्योंकि वस्त्वन्तर-रूपसे उसका दूरस्थ होना सम्भव नहीं । ' सिद्धान्ती - द्रव्यमें गुणके प्रवेशके समान उसका प्रवेश माना जाय तो? पूर्व ० - नहीं, क्योंकि वह किसीके आश्रित नहीं है । जो नित्यपरतन्त्र और पराश्रित है उस गुणके ही द्रव्यमें प्रवेशका उपचार किया जाता है । ब्रह्मका उस प्रकार प्रवेश करना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका तो स्वातन्त्र्य सुना गया है । सिद्धान्ती - यदि वह [ प्रवेश ] फलमें बीजके समान हो तो? पूर्व ० - नहीं, ऐसा मानने से उसके सावयवत्व तथा वृद्धि, क्षय एवं उत्पत्ति - विनाशादि धर्मयुक्त होने का प्रसंग होगा । किंतु ब्रह्मा चैवं धर्मवत्त्वं ब्रह्मणः " अजोऽजरः " ऐसे धर्मोवाला होना सम्भव नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेपर " वह इत्यादि श्रुतिन्यायविरोधात् । अजन्मा और अजर है " इत्यादि श्रुति और युक्तिसे विरोध उपस्थित एव संसारी परिच्छिन्न होगा । अतः यदि ऐसा मानें कि तस्मादन्य परमात्मासे भिन्न किसी संसारीने इह प्रविष्ट इति चेत् १ ही इसमें प्रवेश किया है तो? १ क्योंकि प्रतिविम्ब तभी पड़ता है जब कोई वस्तु प्रतिविम्बके आश्रयभूत जल या दर्पणसे दूरस्थ हो । ब्रह्म व्यापक है, इसलिये उसका प्रतिविम्वरूपसे प्रवेश नहीं हो सकता ।

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२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

न; " सेयं देवतैक्षत ' ( छा ० उ ० ।

६ । ३ । २ ) इत्यारम्प “ नाम-रूपे व्याकरवाणि " ( ६ । २ ॥

३ ) इति तस्या एव प्रवेशव्याकरण-कर्तृत्वश्रुतेः । तथा " तत्सृष्ट्वा । तदेवानुप्राविशत् " ( तै ० उ ० २ । ६ । १ ) " स एतमेव सीमानं । विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत " ( ऐ ० उ ० ३ | १२ ) “ सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभि-वदन्यदास्ते " " त्वं कुमार उत वा कुमारी त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि " ( श्वे ० उ ० ४ । ३ ) " पुरचक्रे द्विपदः " ( वृ ० उ ० २५ ॥ १८ ) " रूपं रूपम् ” ( क ० उ ० २ । २ । ९ ) इति च मन्त्रवर्णान्न परादन्यस्य प्रवेशः । प्रविष्टानामितरेतरभेदात्पराने-कत्वमिति चेत्? न, " एको देवो बहुधा सन्नि-विष्ट: ' " ' " एकः सन्बहुधा विचचार " " त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः" “ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्व-ब्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ” ( श्वे ० ब्राह सिद्धान्ती - ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि " उस इस देवताने उ ० ईक्षण किया " यहाँसे लेकर " मैं नाम - रूपोंकी अभिव्यक्ति करूँ " यहाँतक श्रुतिसे उसीका प्रवेश और अभिव्यक्त करना सिद्ध होता है । ति तथा " उसे रचकर वह पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया ”, “ वह इसी त्व प्रकार मस्तकके अन्तिम भागको त्व विदीर्ण कर उसके द्वारा प्रवेश कर गया ", " वह धीर समस्त रूपोंको जानकर उनके नाम रख उनके द्वारा बोलता रहता है ", " तू कुमार है, तू ही कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर लाठीके सहारे चलता है ", " उसने दो चरणवाले शरीर बनाये ", " रूप - रूपके [ अनुरूप हो गया ] " इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे भी परमात्मा से भिन्न किसी अन्यका प्रवेश सिद्ध नहीं होता । पूर्व ० - किंतु प्रविष्ट होनेवाले पदार्थोंका एक दूसरेसे भेद हुआ करता है, इसलिये परमात्माका अनेकत्व प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - नहीं, " एक ही देव अनेक प्रकारसे प्रविष्ट हुआ ", " एक होकर भी उसने अनेक रूपसे संचार किया ", " तुम एक ही अनेकोंमें अनुप्रविष्ट हो ”, “ सर्वभूतों में निहित एक देव है, वह सबमें व्याप्त और

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[ अध्याय १ मानना ठीक इस देवता से लेकर " मैं व्यक्ति करूँ " का प्रवेश और द्ध होता है । - वह पीछेसे T ", " वह इसी न्तिम भागको रा प्रवेश कर मस्त रूपोंको म रख उनके है ", " तू कुमार और तू ही वृद्ध रे चलता है ", शरीर बनाये ", हो गया ] " नी परमात्मासे प्रवेश सिद्ध नष्ट होनेवाले से भेद हुआ परमात्माका 1 " एक ही देव हुआ ", " एक रूपसे संचार ही अनेकों में भूतोंमें निहित व्याप्त और ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ उ ० ६ । ११ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । प्रवेश उपपद्यते नोपपद्यत इति तिष्ठतु तावत् । प्रविष्टानां संसारि । त्वात्तदनन्यत्वाच्च परस्य संसारि-त्वमिति चेत्? न, अशनायाद्यत्ययश्रुतेः । सुखित्वदुःखित्वादिदर्शनान्नेति चेन्न, " न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ” ( क ० उ ० २ । २ । ११ ) इति श्रुतेः । प्रत्यक्षादिविरोधादयुक्त मिति चेत् १ न, उपाध्याश्रयजनित विशेष-विषयत्वात्प्रत्यक्षादेः । " न दृष्टे-द्रष्टारं पश्येः " ( वृ ० उ ० ३ । समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ” इत्यादि श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता । पूर्व०- ० - उत्पन्न किये हुए कार्यवर्ग-के भीतर परमात्माका प्रवेश होना सम्भव है अथवा नहीं है — यह प्रश्न तबतक अलग रहे, किंतु जो प्रविष्ट हैं वे संसारी हैं और उससे अभिन्न हैं, इसलिये परमात्माका भी संसारी होना प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि परमात्माको क्षुधादि सांसा-रिक धर्मोसे परे बतानेवाली श्रुति है । यदि कहो कि उसको सुखी-दुःखी होना देखा जाता है, इसलिये यह कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि “ सबसे ' अलग रहनेवाला परमात्मा लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता " ऐसी श्रुति है । पूर्व ० - किंतु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे इस कथनका विरोध होनेके कारण यह मान्य नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रत्यक्षादि तो उपाधिके आश्रयसे होनेवाले विशेषको ही विषय करने-वाले होते हैं । " दृष्टिके द्रष्टाको मत ४ । २ ) “ विज्ञातारमरे केन देखो, ” “ अरे, विज्ञाताको किसके विजानीयात् " ( बृ ० उ ०४ । ५ । द्वारा जाने? " " वह स्वयं अविज्ञात १ ९ ) " अविज्ञातं विज्ञात् " ( बृ ० रहकर दूसरोंको जाननेवाला है " 1360

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२०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ उ ० ३ । ८ । ११ ) इत्यादि श्रुतिभ्यो नात्मविषयं विज्ञानम् । किं तर्हि? बुद्धयाद्युपाध्यात्मप्रति-च्छायाविषयमेव सुखितोऽहं दुःखितोऽहमित्येवमादि प्रत्यक्ष - । विज्ञानम् | यमहमिति विषयेण विष-यिणः सामानाधिकरण्योपचारात् " नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ” ( बृ ० उ ० ३ । ८ । ११ ) इत्यन्यात्मप्रति -षेधाच्च, देहावयवविशेष्यत्वाञ्च्च सुखदःखयोर्विषयधर्मत्वम्! । " आत्मनस्तु कामाय " ( वृ ० उ ० २ । ४ । ५ ) इत्यात्मार्थ-स्वश्रुतेरयुक्त इति चेन, " यत्र वा अन्यदिव स्यात् " इत्यविद्याविषया-| इत्यादि श्रुतियोंसे [ प्रमाणजनित ] ज्ञान आत्माको विषय करनेवाला नहीं है । तो फिर कैसा है? ' मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ ' इत्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान बुद्धि आदि उपाधिमें पड़ने-वाले आत्माके प्रतिबिम्बको ही विषय करनेवाला है । इसके सिवा ' यह ( देह ) मैं हूँ ' इस प्रकार विषयके साथ विषयीके सामानाधिकरण्का उप-चार होनेसे " इससे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा नहीं है " इस श्रुति - वाक्यसे अन्य आत्माका निषेध होनेसे तथा देहके अवयवोंसे विशेष्य होनेके कारण सुख - दुःखकी विषयधर्मंता सिद्ध होती है । ' यदि कहो कि " आत्माके लिये ही सब प्रिय होते हैं " ऐसी आत्मार्थत्वको प्रकट करनेवाली श्रुति होनेसे ऐसा कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि " जहाँ कोई अन्य - सा होता है ” इस श्रुतिके | अनुसार उसकी अविद्याजनित १ तात्पर्यं यह है कि अज्ञानवश देहके साथ आत्माका तादात्म्य सुख - दुःखादिका आत्मामें उपचार किया जाता है, आत्मासे भिन्न होनेसे देहके नहीं है और द्रष्टा सर्वथा शुद्ध होता हैं, इसलिये आत्मामें कोई और द्रष्टा रह सकते तथा सुख - दुःखकी जो प्रतीति होती है उसका आश्रय सुख - दुःखादि धर्म नहीं ही देहका सिद्ध अवयव ही होता है, जैसे शिरःपीडा, उदरशूलादि भी कोई - न - कोई होते हैं ॥ इससे भी वे अनात्मगत ३६ ब्राह्म त्मा पश्य १५ ( ब " त मद दिन ना ति वि न f 5 म

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[ अध्याय १ माणजनित ] करनेवाला T है? ' मैं सुखी = यादि प्रत्यक्ष पाधिमें पड़ने-( देह ) मैं के साथ रण्य का उप-न कोई अन्य श्रुति वाक्य होनेसे तथा शेष्य होनेके विषयधर्मता मलये हैं " ऐसी नेवाली श्रुति नहीं है क्योंकि “ जहाँ , विद्याजनित - होने से देह कोई और द्रष्टा बादि धर्म नहीं कोई - न - कोई वे अनात्मगत ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३ त्मार्थत्वाभ्युपगमात् " तत्केन कं । पश्येत् ”, ( बृ ० उ ० ४ । ५ । १५ ) " नेह नानास्ति किञ्चन " ( बृ ० उ ० ४ । ४ । १ ९ ) " तत्र को मोहः कः शोक एकत्व-मनुपश्यतः " ( ईशा ० ७ ) इत्या- । दिना विद्याविषये तत्प्रतिषेधाच्च नात्मधर्मत्वम् । तार्किकसमय विरोधादयुक्तमि-ति चेत्? न; युक्त्याप्यात्मनो दुःखि-आत्मार्थता मानी जाती है; " वहाँ कौन किसके द्वारा देखे, ” “ वहाँ नाना कुछ नहीं है, ” “ वहाँ एकत्व देखनेवालेको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है? " इत्यादि वाक्योंसे ज्ञानदृष्टिमें तो उनका निषेध होनेके कारण आत्मघर्मत्व होना सम्भव नहीं है । पूर्व ० - किंतु नैयायिकों के. सिद्धान्तसे विरोध होनेके कारण यह ( आत्माका असंसारित्व ) अयुक्त है । ' सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो,. क्योंकि युक्तिसे भी आत्माका दुःखी त्वानुपपत्तेः । न हि दुःखेन प्रत्यक्ष - होना सिद्ध नहीं हो सकता । विषयेण आत्मनो विशेष्यत्वम् प्रत्यक्षाविषयत्वात् । आकाशस्य शब्दगुणवश्ववदात्मनो दुःखित्व-मिति चेन्न, एकप्रत्ययविषयत्वा-नुपपत्तेः । न हि सुखग्राहकेण प्रत्यक्षविषयेण प्रत्ययेन नित्यानु-प्रत्यक्षके विषयभूत दुःखसे आत्मा विशिष्ट नहीं हो सकता; क्योंकि वह स्वयं प्रत्यक्षका अविषय है । यदि कहो कि जिस प्रकार आकाश शब्द-गुणवाला माना जाता है उसी प्रकार आत्माका दुःखित्व भी सिद्ध हो सकता | है तो यह भी होना सम्भव नहीं, क्योंकि उसका एक ज्ञानका विषय होना असम्भव है । सुखको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षविषयक ज्ञानके द्वारा नित्य अनुमेय आत्माको विषय मेयस्यात्मनो विषयीकरणमुपपद्यते । करना सम्भव नहीं है । यदि वह उसे १ क्योंकि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें आत्मा बुद्धि आदि चौबीस गुणोंवाला है ।

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२०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म तस्य च विषयीकरणे आत्मन । एकत्वाद्विषय्यभावप्रसङ्गः । एकस्यैव विषयविषयित्वं दीपवदिति चेत्? न; युगपदसम्भवात्, आत्मन्यंशानुपपत्तेश्च । एतेन विज्ञा-नस्य ग्राह्यग्राहकत्वं प्रत्युक्तम् । प्रत्यक्षानुमानविषययोश्च दुःखात्म -नोर्गुणगुणित्वेनानुमानम् । दुःखस्य नित्यमेव प्रत्यक्षविषय-त्वात्, रूपादिसामानाधि-' करण्याच्च । मनःसंयोगजत्वेऽप्यात्मनि विषय कर ले तो विषयी के अभावका पय प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय, क्योंकि निर आत्मा तो एक ही है । पूर्वं०- दीपकके समान एकका दनि ही विषय और विषयी भी होना चा सम्भव है । तय सिद्धान्ती - नहीं, एक साथ ऐसा न्त होना सम्भव नहीं है । इसके सिवा आत्मामें अंश होना सम्भव न होनेसे भी यही सिद्ध होता है । इससे विज्ञानका ग्राह्य ग्राहक - उभयरूप होना भी खण्डित हो जाता है । प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय दुःख और अनुमान प्रमाणके विषय आत्माके गुण और गुणी होनेमें अनुमान प्रमाण भी नहीं हो सकता; क्योंकि स दुःख सर्वदा प्रत्यक्षका ही विषय है तथा रूपादिसे उसका सामानाधि-करण्य है । आत्मामें दुःखको मनः संयोग-दुःखस्य सावयवत्वविक्रियावत्वा- जनित माना जाय तो भी आत्मा नित्यत्वप्रसङ्गात् । न ह्यविकृत्य संयोगि द्रव्यं गुणः कश्चिदुपयन्न-१ इसलिये यदि वह प्रत्यक्षविषयक कौन होगा? क्योंकि एक ही पदार्थ एक हो सकता । सावयवत्व, विकारित्व एवं अनित्यत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होता है, क्योंकि संयोगी द्रव्यको विकृत किये बिना कोई गुण ज्ञानका विषय हो जायगा तो विषय ही ज्ञानका विषय और विषयी दोनों नहीं