बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 211–220
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
पृष्ठ 211
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ यी के अभावका जाय, क्योंकि । ' समान एकका यी भी होना एक साथ ऐसा | इसके सिवा सम्भव न होने से ता है । इससे हक उभयरूप हो जाता है । वषय दुःख और विषय आत्मा के अनुमान सकता; क्योंकि ही विषय है सामानाधि-मनः संयोग-तो भी आत्मा के कारित्व एवं उपस्थित होता गद्रव्यको कोई गुण न्यगा तो विषयी विषयी दोनों नहीं ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५ पयन्वा दृष्टः क्वचित् । न च । निरवयवं विक्रियमाणं दृष्टं क्वचि । दनित्यगुणाश्रयं वा नित्यम् | न चाकाश श्रागमवादिभिर्नित्य-तयाभ्युपगम्यते, न चान्यो दृष्टा-न्तोऽस्ति । विक्रियमाणमपि तत्प्रत्यया-निवृत्तेर्नित्यमेवेति चेत् १ न, द्रव्यस्य अवयवान्यथात्व-व्यतिरेकेण विक्रियानुपपत्तेः । कहीं आता - जाता नहीं देखा गया । तथा निरवयव वस्तुको कहीं विकत होते और नित्य वस्तुको अनित्य गुणोंका आश्रय होते नहीं देखा गया । आगमोक्तमतावलम्बियोंने आकाशको तो नित्य नहीं माना ' और इसके सिवा कोई दूसरा ष्ट नहीं है । पूर्व ० - विकृत होनेपर भी ' यह वही है ' ऐसा ज्ञान निवृत्त न होनेके कारण वह नित्य ही है - ऐसा मानें तो? सिद्धान्ती - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य पदार्थ के अवयवोंमें परि-वर्तन हुए बिना विकार होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि सावयव चेन्न होनेपर भी वह नित्य है ' तो ऐसा सावयवत्वेऽपि नित्यत्वमिति हो नहीं सकता, क्योंकि सावयव पदार्थ अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न सावयवस्यावयवसंयोगपूर्वकत्वे होनेके कारण उसके अवयवोंका विभाग होना सम्भव है । यदि कहो सति विभागोपपत्तेः । वज्रादिष्व कि वज्रादिमें तो ऐसा नहीं देखा जाता तो ऐसा कहना ठीक दर्शनान्नेति चेन्न, अनुमेयत्वात्सं- नहीं,, क्योंकि उनकी अवयवसंयोग-आकाशः सम्भूतः " ( तै ० उ ० २ । १ ) इस श्रुतिसे १. क्योंकि “ आत्मन सिद्ध होती है और उत्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य आत्मासे आकाशको उत्पत्ति नहीं हो सकता । २. यह परिणामवादियोंका मत है । ३. ऐसा जैनी लोग मानते हैं । ( बिजली आदि ) सावयव होनेपर भी अवयवसंयोग-४. अर्थात् होते वज्रादि हों, ऐसा नहीं देखा जाता । पूर्वक उत्पन्न
पृष्ठ 212
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह I योगपूर्वत्वस्य । तस्मान्नात्मभो । दुःखाद्यनित्यगुणाश्रयत्वोपपत्तिः । परस्यादुःखित्वेऽन्यस्य च दुः-खिनोऽभावे दुःखोपशमनाय शास्त्रारम्भानर्थक्यमिति चेत्? न, अविद्याध्यारोपितदुःखि-त्वभ्रमापोहार्थत्वात् आत्मनि ' प्रकृतसङ्ख्यापूरणभ्रमापोहवत् । कल्पित दुःख्यात्माभ्युपगमाच्च । जलसूर्यादिप्रतिबिम्बवदात्म-LAN पूर्वकताका अनुमान किया जा सकता आ है । अत: आत्माका अनित्य गुणों का बुद्ध आश्रय होना सम्भव नहीं है । प्रा पूर्व ० - किंतु यदि परमात्मा दुःखी नहीं है और उससे भिन्न प्र दूसरे दुःखी पदार्थका अभाव है तो 66. ऐसी स्थितिमें [ दुःखकी निवृत्तिके १ लिये ] शास्त्रका आरम्भ होना व्यर्थं ही सिद्ध होता है । चा वि सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि आत्मामें प्रकृत ( दशम ) संख्याकी | अपूर्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके समान ' ह शास्त्र अविद्यासे आरोपित दुःखित्व-रूप भ्रमकी निवृत्ति के लिये है । तथा उ कल्पित दुःखी आत्मा स्वीकार भी किया गया है ' । जलमें पड़े हुए सूर्यादिके प्रति-बिम्बके समान व्याकृत कार्य में प्रवेशश्च प्रतिबिम्बवद्वयाकृते कार्य आत्माका प्रतिबिम्बके समान उप-लब्ध होना ही उसका कार्य में प्रवेश उपलभ्यत्वम् । प्रागुत्पत्तेरनुपलब्ध है । जगत्की उत्पत्तिसे पूर्व जो १. यह आख्यायिका इस प्रकार है । एक वार दस आदमी विदेश गये । S मार्गमें उन्होंने एक नदी पार की । उस पार पहुँचनेपर यह देखनेके लिये कि हम दस हैं या नहीं, आपसमें गणना करने लगे । परंतु जो गिनता वह अपनेको छोड़-कर गिनता । इसलिये दस संख्याकी पूर्ति न होती । इतनेमें ही एक आप्त पुरुष आया, उसने उन्हें अलग - अलग गिनकर बता दिया कि तुम दस ही हो | इससे उनका भ्रमजनित दुःख दूर हो गया । २. इसलिये भी शास्त्रारम्भ सार्थक है ।
पृष्ठ 213
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ किया जा सकता अनित्य गुणों का नहीं है । दि परमात्मा उससे भिन्न - अभाव है तो की निवृत्तिके रम्भ होना है । न्त कहो, क्योंकि TH ) संख्या की वृत्तिके समान ' पित दुःखित्व-- लिये है । तथा स्वीकार भी सूर्यादिके प्रति-नाकृत कार्य में के समान उप-कार्य में प्रवेश तसे पूर्व जो मी विदेश गये । के लिये कि हम द अपनेको छोड़-एक आप्त पुरुष ही हो । इससे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ आत्मा पश्चात्कार्ये च सृष्टं व्याकृते । बुद्धेरन्तरुपलभ्यमानः सूर्यादि -प्रतिबिम्बवज्जलादौ कार्य सृष्ट्वा प्रविष्ट इव लक्ष्यमाणो निर्दिश्यते " स एष इह प्रविष्टः " ( वृ ० उ ० १ । ४ । ७ ) " ताः सृष्ट्वा तदे-BIRTH चानुप्राविशत " " स एतमेव सीमानं विदायैतया द्वारा प्रापद्यत " ( ऐ ० उ ० ३ । १२ ) " सेयं देवतेचत इन्ताहममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य " ( छा ० उ ० ६ । २ । ३ ) इत्येवमादिभिः । न तु सर्वगतस्य निरवयवस्य दिग्देशकालान्तरापक्रमणप्राप्तिल-क्षणःप्रवेशः कदाचिदप्युपपद्यते । न च परादात्मनोऽन्योऽस्ति द्रष्टा " नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट नान्यदतो-आत्मा उपलब्ध नहीं होता था वह व्यक्त कार्यकी रचना हो जानेपर बुद्धिके भीतर उपलब्ध होनेसे जलादिमें सूर्यादिके प्रतिविम्बके समान कार्यको रचकर उसमें प्रविष्ट हुआ - सा लक्षित होता है - ऐसा कहा जाता है; ' जैसा कि वह यह आत्मा इसमें प्रवेश किये हुए है, " " उन ( शरीरों ) को रचकर वह उनमें प्रवेश कर गया, ” “ वह इस मूर्धसीमाको विदीर्णकर इसके द्वारा प्रवेश कर गया, ” “ उस इस देवताने ईक्षण किया - अहो! मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें प्रवेश कर " इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । जो सवंगत और निरवयव है उस आत्माका एक दिशा, देश या कालको छोड़कर अन्य दिशा, देश या कालको प्राप्त होनारूप प्रवेश कभी सम्भव नहीं है । तथा यह हम पहले ही कह चुके हैं " इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है ” ” ( बृ ० उ ० ३।८ ३।८।११ । ११ ) ) " इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है ” ऽस्तिश्रोतृ इत्यादि श्रुतिके अनुसार परमात्मा-इत्यादि श्रु तेरित्यवोचाम । उपल - से भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है । वस्तुतः वह प्रतिबिम्वके समान प्रवेश करता हो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि १ प्रतिबिम्बके अर्थात् आश्रयसे बिम्बके पार्थक्यके समान आत्माका बुद्धि आदिसे व्यवधान नहीं है |
पृष्ठ 214
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्ध्यर्थत्वाच्च सृष्टिप्रवेशस्थित्यप्य - । यवाक्यानाम्, उपलब्धेः पुरुषार्थ-त्वश्रवणात् । “ आत्मानमेवावेत् ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) “ तस्मा-तत्सर्वमभवत् " ( वृ ० उ ० १ । ४ । १० ) " ब्रह्मविदाप्नोति परम् ” ( तै ० उ ० २ । १।१ ) " स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति " ( मु ० उ ० ३ । २ । ९ ) " आचार्यवान्पुरुषो वेद " ( छा ० उ ० ६ । १४। २ ) " तस्य तावदेव चिरम् " ( छा ० उ ० ६ । १४ । २ ) इत्यादि-श्रुतिभ्यः । " ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ” ( गोता १८ | ५५ ) " तद्धयग्रथ सर्व-विद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ” इत्यादिस्मृतिभ्यश्च । भेददर्शना-पवादाच्च सृष्ट्यादिवाक्यानाम् आत्मैकत्वदर्शनार्थ परत्वोपपत्तिः तस्मात्कार्यस्थस्य उपलभ्यत्वमेव प्रवेश इत्युपचर्यते । या नखाप्रेभ्यो नखाग्रमर्यादम् आत्मनश्चैतन्यमुपलभ्यते । तत्र ब्राह तथा सृष्टि, प्रवेश, स्थिति और कथ लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य आत्मोपलब्धिके ही लिये हैं, क्योंकि लो आत्मोपलब्धि ही पुरुषार्थ है - ऐसा नि सुना गया है; जैसा कि " उसने अपनेहीको जाना, ” “ अतः वह स्व सर्वरूप हो गया, " " ब्रह्मवेत्ता पर- ल मात्माको प्राप्त कर लेता है, " " वह जो कि उस परब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है, " " आचार्यवान् वि पुरुषको ज्ञान होता है ", उसके लिये तभीतक देरी है ” इत्यादि न श्रुतियोंसे, तथा “ तब मुझे तत्त्वत: जानकर उसके पश्चात् मुझहीमें म प्रवेश करता है, " " वही समस्त विद्याओंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे अमृतकी प्राप्ति होती है ” इत्यादि व स्मृतियोंसे भी सिद्ध होता है । इसके सिवा भेददर्शनकी निन्दा होनेसे भी ' सृष्ट्यादिविषयक वाक्योंका आत्मै-कत्वदर्शनपरक होना युक्त है । अतः । कार्यस्थ आत्माका उपलब्ध होना ही उसका प्रवेश है - ऐसा उपचारसे कहा जाता है । ‘ आ नखाग्र ेभ्यः ' अर्थात् नखाग्र-पर्यन्त आत्माका चैतन्य उपलब्ध होता
पृष्ठ 215
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ स्थिति और रनेवाले वाक्य लिये हैं, क्योंकि षार्थ है - ऐसा ताकि " उसने - " अतः वह ' ब्रह्मवेत्ता पर-लेता है, " " वह को जानता है - " आचार्यवान् है ", उसके है " इत्यादि ब मुझे तत्त्वतः आत् मुझही में " वही समस्त क्योंकि उससे ती है " इत्यादि होता है । इसके निन्दा होनेसे भी ' क्योंका आत्मै-युक्त है । अतः उपलब्ध होना ही ऐसा उपचारसे नः ' अर्थात् नखाग्र-न्य उपलब्ध होता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २० ९ कथमिव प्रविष्टः? इत्याह - यथा । है । वह उसमें किसके समान प्रविष्ट है, सो श्रुति बतलाती है— जिस लोके क्षुरधाने क्षुरो धीयते ऽस्मि -निति क्षुरधानं तस्मिन्नापितोप-स्कराधाने, क्षुरोऽन्तःस्थ उप-लभ्यते, अवहितः प्रवेशितः स्याद् यथा वा विश्वम्भरोऽग्निः ", विश्वस्य भरणाद्विश्वम्भरः कुलाये काष्ठादाववहितः स्यादित्यनुवर्तते ॥ तत्र हि स मथ्यमान उपलभ्यते । यथा च क्षुरः क्षुरधान एक-देशेऽवस्थितो यथा चाग्निः काष्ठादौ सर्वतो व्याप्यावस्थितः, एवं सामान्यतो विशेषतश्च देहं संव्याप्यावस्थित आत्मा । तत्र हि स प्राणनादिक्रियावान् दर्शना दिक्रियावांश्चोपलभ्यते । तस्मा-तत्रैवं प्रविष्टं तमात्मानं प्राण-नादिक्रियाविशिष्टं न पश्यन्ति नोपलभन्ते । नन्व प्राप्तप्रतिषेधोऽयं तं न प्रकार लोकमें क्षुरधानमें - जिसमें छुरा रखा जाय उसे क्षुरधान कहते हैं उसमें अर्थात् नापितके मुण्डन-सामग्री ( औजार ) रखनेके संदूकमें उसके भीतर रखा हुआ छुरा उप-लब्ध होता अर्थात् उसमें अवहित ( छिपा हुआ ) - प्रविष्ट रहता है । अथवा जिस प्रकार विश्वम्भर - अग्नि, जो विश्वका भरण करनेके कारण विश्वम्भर है, कुलाय - नीड यानी काष्ठादिमें छिपा रहता है - इस प्रकार यहाँ ' अवहितः स्यात् ' इसकी अनुवृत्ति होती है, वहाँ वह मन्थन करनेपर देखा जाता है । तथा जिस प्रकार छुरा क्षुर-धानके एक देशमें स्थित रहता है और अग्नि जैसे काष्ठादिमें उसे सब ओरसे व्याप्त करके विद्यमान रहता है इसी प्रकार आत्मा शरीरको सामान्य और विशेषरूपसे व्याप्त करके स्थित है । वहाँ वह प्राणनादि और दर्शनादि क्रियावाला देखा जाता है । अत: उस शरीरमें प्रविष्ट उस प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्मा-को लोग नहीं देखते- उन्हें उसकी उपलब्धि नहीं होती । शङ्का — किंतु ' उस आत्माको नहीं देखते यह तो अप्राप्तका प्रतिषेध वृ ० उ ० १४-
पृष्ठ 216
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ पश्यन्तीति, दर्शनस्याप्रकृतत्वात् । नैष दोषः, सृष्टयादिवा-क्यानाम् श्रात्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थ-परत्वात्प्रकृतमेव तस्य दर्शनम् । " रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रति चक्षणाय " ( वृ ० उ ० । २ । ५ । १ ९ ) इति मन्त्र-चर्णात् । तत्र प्राणनादिक्रिया विशिष्ट-क्रियाविशिष्टस्या- स्यादर्शने हेतुमाह -रमनोऽसमस्वत्व- अकृत्स्नोऽसमस्तो प्रदर्शनम् हि यस्मात्स प्राणना-दिक्रिया विशिष्टः । कुतः पुनरकु-त्स्नत्वम् १ इत्युच्यते- प्राणन्नेव | प्राणनक्रियामेव कुर्वन्प्राणो नाम प्राणसमाख्यः ब्रा है, क्योंकि यहाँ दर्शनका कोई प्रसंग नहीं है । क्त समाधान — यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सृष्टयादिपरक वाक्योंका तात्पर्य आत्मैकत्वबोध होनेके कारण त्र उसका दर्शन प्रकृत ही है, जैसा कि " वह प्रत्येक रूपके अनुरूप हो गया है, उसका यह रूप उसके इ दर्शन के लिये है " इस मन्त्रवर्णसे चि सिद्ध होता है | श्रुति प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्मा के दिखायी न देनेमें हेतु २ बतलाती है- क्योंकि वह प्राणनादि- f क्रियाविशिष्ट आत्मा अकृत्स्न— असम्पूर्ण है । उसकी असम्पूर्णता क्यों है? सो बतलाया जाता है— प्राणन अर्थात् प्राणनक्रिया करनेसे ही वह प्राण यानी प्राणनामवाला होता है । [ तात्पर्य यह है कि ] प्राणाभिधानो भव - प्राणन क्रियाका कर्ता होनेसे ही ति । प्राणनक्रियाकर्तृत्वाद्धि प्राणः प्राणितीत्युच्यते नान्यां क्रियां कुर्वन् । यथा लावक: पाचक इति । तस्मात्क्रियान्तरविशिष्टस्य अनुपसंहारादकृत्स्नो हि सः । तथा वदन्वदनक्रियां कुर्वन्व-' प्राण प्राणन कर्ता है ' ऐसा कहा जाता है, किसी अन्य क्रियाके करने-से नहीं जैसे लावक, पाचक इत्यादि । अतः उसमें क्रियान्तरविशिष्टका उपसंहार ( संग्रह ) न होनेके कारण वह असम्पूर्ण ही है । इसी प्रकार ' वक्तीति वाक् ' इस व्युत्पत्तिसे बोलने यानी वदनक्रिया करनेके कारण वह
पृष्ठ 217
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ · दर्शनका कोई कोई दोष नहीं रक वाक्योंका होने के कारण ही है, जैसा रूपके अनुरूप यह रूप उसके इस मन्त्रवर्णसे दिक्रियाविशिष्ट न देनेमें हेतु वह प्राणनादि-T अकृत्स्न-सम्पूर्णता जाता है-क्रिया करने से त्राणनामवाला यह है कि ] र्ता होनेसे ही ' ऐसा कहा क्रिया के करने-चिक इत्यादि । न्तरविशिष्टका होनेके कारण इसी प्रकार नुत्पत्तिसे बोलने ने के कारण वह ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११ तीति वाक्, पश्यंश्चक्षुष्ट इति । चक्षुर्द्रष्टा, शृण्वञ्शृणोतीति श्रो-त्रम् । ' प्राणन्नेव प्राण: ' ' वदन्याक ' इत्याभ्यां क्रियाशक्त्युद्भवः प्रद-शितो भवति । ' पश्यंश्चक्षुः ' ' शृण्वञ्श्रोत्रम् ' इत्याभ्यां विज्ञान-शक्त्युद्भवः प्रदर्श्यते, नामरूप-विषयत्वाद्विज्ञानशक्तेः । श्रोत्र-चक्षुषी विज्ञानस्य साधने, विज्ञानं तु नामरूपसाधनम् । न हि नाम-रूपव्यतिरिक्तं विज्ञेयमस्ति । तयोश्रोपलम्भे करणं चक्षुःश्रोत्र । क्रिया च नामरूपसाध्या प्राणसमवायिनी, तस्याः प्राणा-श्रयाया अभिव्यक्तौ वाकरणम् । तथा पाणिपादपायूपस्थाख्यानि । सर्वेषामुपलक्षणार्थी वाक् । एत-देव हि सर्वं व्याकृतम् । “ त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म " ( बृ ० उ ० १ । ६ । १ ) इति हि वक्ष्यति । MAAVA वाक् है, ' चष्टे इति चक्षु: ' इस व्युत्पत्तिसे देखनेवाले यानी द्रष्टाका नाम चक्षु है और ' शृणोतीति श्रोत्रम् ' इस व्युत्पत्तिसे जो सुनता है वह श्रोत्र है । ' प्राणन्नेव प्राणः ', ' वदन्वाक् ’ इन दोनों वाक्योंसे आत्मामें क्रिया-शक्तिका उद्भव दिखाया गया है । तथा ' पश्यंश्चक्षुः ', ' शृण्वञ्श्रोत्रम् ’ इन दोनों वाक्योंसे विज्ञानशक्तिका प्राकट्य प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि विज्ञानशक्ति नाम और रूप-को विषय करनेवाली होती है । श्रोत्र और नेत्र विज्ञानके साधन हैं तथा विज्ञान नाम - रूपका साधन है; क्योंकि नाम - रूपके सिवा और कोई विज्ञेय नहीं है तथा उनकी उपलब्धिमें नेत्र और श्रोत्र करण हैं । नाम और रूपसे साध्य जो क्रिया है वह प्राणके आश्रित है और उस प्राणाश्रिता क्रियाकी अभिव्यक्ति में वाक् साधन है । इसी प्रकार पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामकी कर्मेन्द्रियाँ भी हैं । वाक् इन सबके उपलक्षणके लिये है । यही संव व्याकृत जगत् है । आगे " यह सारा नामरूप कर्म त्रयरूप ही है " इस । श्रुतिसे यही बात कही जायगी ।
पृष्ठ 218
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ मन्वानो मनो मनुत इति । ज्ञानशक्तिविकासानां साधारणं करणं मनो मनुतेऽनेनेति । पुरु-षस्तु कर्ता सन्मन्वानो मन इत्युच्यते । तान्येतानि प्राणादीन्यस्या-विशिष्टात्मवेदि- त्मनः कर्मनामानि, नोऽकृत्स्नस्व- कर्मजानि नामानि निरूपणम् कर्मनामान्येव, न तु वस्तुमात्र विषयाणि । अतो न कृत्स्नात्मवस्त्ववद्योतकानि । एवं ह्यसावात्मा प्राणनादिक्रियया त-तत्क्रियाजनितप्राणादिनामरूपा-भ्यां व्याक्रियमाणोऽवद्योत्यमानो ' मनुते इति मन: ' इस व्युत्प- बा त्तिसे मनन करनेपर उसका नाम मन हुआ । मन ज्ञानशक्तिके विका- वि सोंका साधारण साधन है, क्योंकि रा इससे आत्मा मनन करता है । वे पुरुष ही कर्ता होनेपर जब मनन करता है तो ' मन ' इस नामसे कहा वा जाता है वे ये प्राणादि इस आत्माके कर्मनाम अर्थात् कर्मजनित नाम नि ही हैं, ये वस्तुमात्रको विषय करने- प वाले नहीं हैं । अतः ये सम्पूर्ण क आत्मवस्तुके द्योतक नहीं हैं । इस त प्रकार यह आत्मा प्राणनादि क्रियासे उस उस क्रियाके कारण इ होनेवाले प्राणादि नाम और रूपोंसे प व्यक्त होने अर्थात् प्रकाशित होनेपर भी पूर्णतया प्रकाशित नहीं व ऽपि । स योऽतोऽस्मात्प्राणनादि- होता । वह जो इस प्राणनादि- व क्रियासमुदायाद् एकैकं प्राणं चक्षु क्रियासमुदायमेंसे किसी क्रियासे रिति वा विशिष्टम् अनुपसंहते विशिष्ट प्राण या चक्षुकी, अन्य a | विशिष्टक्रियामय आत्माका उपसंहार 4 तरविशिष्टक्रियात्मकं मनसा अय- न करके, मनके द्वारा ' यह आत्मा मात्मेत्युपास्ते चिन्तयति, न स वेद है ' इस प्रकार उपासना यानी चिन्तन I न स जानाति ब्रह्म । कस्मात्? करता है वह नहीं जानता — उसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं है । क्यों नहीं कुत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मादेष है? क्योंकि इस प्राणनादिसमुदाय से आत्मा अस्मात्प्राणनादिसमुदा- विशिष्ट यह आत्मा अकृत्स्न - असम्पूर्णं है । इसलिये वह अन्य धर्मोंका यात् । अतः प्रविभक्त. एकैकेन । उपसंहार न करनेके कारण प्रविभक्त
पृष्ठ 219
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- अध्याय १ ' इस व्युत्प-उसका नाम क्तिकेविका-न है, क्योंकि करता है । र जब मनन नामसे ' कहा इस आत्मा जिनित नाम विषय करने-ये सम्पूर्ण नहीं हैं । इस प्राणनादि या कारण म और रूपोंसे काशित होनेपर काशित नहीं प्राणनादि -कसी क्रिया चक्षुकी, अन्य नाका उपसंहार ' यह आत्मा नायानी चिन्तन जानता — उसे । क्यों नहीं नादिसमुदायसे कृत्स्न- असम्पूर्णं अन्य धर्मोंका कारण प्रविभक्त ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३ विशेषणेन विशिष्ट इतरधर्मान्त- । रानुपसंहाराद्भवति । यावदयमेवं वेद पश्यामि शृणोमि स्पृशामीति वा स्वभावप्रवृत्तिविशिष्टं वेद तावदञ्जसा कृत्स्नमात्मानं न वेद । कथं पुनः पश्यन्वेद १ इत्याह-निरुपाधिकात्मो - यात्मेत्येव, आत्मेति पासनमेव प्राणादीनि विशेष-कृत्स्नत्वम् णानि यान्युक्तानि तानि यस्य स श्राप्नुवंस्तान्यात्मा इत्युच्यते । स तथा कृत्स्नविशेषो पसंहारी सन्कृत्स्नो भवति । वस्तुमात्ररूपेण हि प्राणाद्युपाधि-विशेषक्रियाजनितानि विशेषणानि - व्याप्नोति । तथा च वक्ष्यति — " ध्यायतीव लेलायतीव " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ७ ) इति । तस्मा-दात्मेत्येवोपासीत । एवं कृत्स्नो ह्यसौ स्वेन वस्तु-रूपेण गृह्यमाणो भवति । कस्मा त्कृत्स्नः? इत्याशङ्कयाह - अत्रा-यानी एक - एक विशेषणसे विशिष्ट होता है । अतः जबतक यह ' मैं देखता हूँ, में सुनता हूँ, में स्पर्श करता हूँ ' इस प्रकार आत्माको स्वाभाविक प्रवृत्तियोंसे विशिष्ट जानता है तबतक यह साक्षात् रूपसे सम्पूर्ण आत्माको नहीं जानता । तो फिर किस प्रकार देखनेपर वह उसे जानता है? इसपर श्रुति कहती है- ' आत्मा है ' इस प्रकार ही । आत्मा — ऊपर जिन प्राणनादि विशेषणोंका वर्णन किया गया है, वे जिसके हैं, उन्हें व्याप्त करनेके कारण वह आत्मा कहा जाता है । इस प्रकार सम्पूर्ण विशेषोंका अपने-में उपसंहार करनेवाला होनेसे वह सम्पूर्ण है । वह अपने वस्तुमात्ररूपसे प्राणादि विशेष उपाधियोंकी क्रियासे होनेवाले विशेषणोंमें व्याप्त है । ऐसा ही " मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है " इस वाक्यसे श्रुति कहेगी भी । अतः ' वह आत्मा है ' इस प्रकार ही उसकी उपासना करनी चाहिये । इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपसे ग्रहण किया जानेपर यह सम्पूर्ण है । क्यों सम्पूर्ण है? - ऐसी | आशङ्का करके श्रुति कहती है-
पृष्ठ 220
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्मिन्नात्मनि हि यस्मान्निरुपाधिक । जलसूर्यप्रतिबिम्बभेदा इवादित्ये प्राणाद्युपाधिकृता विशेषाः प्राणा-दिकर्मजनामाभिधेया यथोक्ता ह्येते एकमभिन्नतां भवन्ति प्रति- । पद्यन्ते । ' आत्मेत्येवोपासीत ' इति ना-आत्मोपासनस्या- पूर्वंविधिः । पक्षे विधेयत्वम् प्राप्तत्वात् “ यत्सा-चादपरोक्षाद्ब्रह्म " ( बृ ० उ ० ३ । ४ । १ ) " कतम आत्मेति -योऽयं विज्ञानमयः " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ७ ) इत्येव -माद्यात्मप्रतिपादनपराभिः श्रुति-भिरात्मविषयं विज्ञानमुत्पा-बा क्योंकि इस निरूपाधिक आत्मामें, जिस प्रकार जलमें पड़े हुए सूर्य- अ प्रतिबिम्बके भेद सूर्यमें एक हो जाते शेष हैं उसी प्रकार, ऊपर बतलाये हुए प्राणादि कर्मजन्य नामोंसे कहे जाने- पा वाले प्राणादि उपाधियोंके कारण द्मा होनेवाले सम्पूर्णं विशेष एक होते अर्थात् अभिन्नताको प्राप्त हो जाते हैं । ' आत्मेत्येवोपासीत ' यह अपूर्व- उ विधि नहीं है, क्योंकि यह एक पक्षमें स्वतः प्राप्त है । ' “ जो साक्षात् स्थ अपरोक्ष ब्रह्म है " " आत्मा कौन - सा स है, इसपर कहते हैं — यह जो विज्ञा- वि नमय है " इस प्रकारकी आत्माका स प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता " है । तहाँ आत्मस्वरूपके ज्ञानसे ही न दितम् । तत्रात्मस्वरूपविज्ञानेनैव उसमें होनेवाली अनात्माभिमान- १ तद्विषयानात्माभिमानबुद्धिः कार- बुद्धि अर्थात् कारकादि क्रिया एवं कादिक्रियाफलाध्यारोपणात्मिका फलकी अध्यारोपरूपा अविद्या निवृत्त अविद्या निवर्तिता । तस्यां निव- की जाती है । उसके निवृत्त हो I तिंतायां कामादिदोषानुपपत्तेः | जानेपर कामादिदोषोंकी सम्भावना १. जो अर्थ अत्यन्त अप्राप्त होता है उसके लिये जो विधि की जाती है उसे अपूर्वविधि कहते हैं । जैसे ‘ जिसे स्वर्गको इच्छा हो वह अग्निहोत्र करे ' यहाँ अग्निहोत्र अत्यन्त अप्राप्त था, अत: उसके लिये जो विधि की गयी है वह अपूर्वविधि है । आत्मा विधिका विषय नहीं है — यह बात आगेके विचारसे स्पष्ट हो जायगी ।