बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 221–230
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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[ अध्याय १ कि आत्मामें पड़े हुए सूर्य-एक हो जाते बतलाये हुए नों से कहे जाने-योंके कारण शेष एक होते को प्राप्त हो त ' यह अपूर्व-ोंकि यह एक " जो साक्षात् नात्मा कौन - सा - यह जो विज्ञा-की आत्माका ली श्रुतियोंसे उत्पन्न होता पके ज्ञान से ही ननात्माभिमान-दिक्रिया एवं - अविद्या निवृत्त के निवृत्त हो बोंकी सम्भावना की जाती है उसे नहोत्र करे ' यहाँ है वह अपूर्वविधि स्पष्ट हो जायगी । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५ अनात्मचिन्तानुपपत्तिः । पारि- । शेष्यादात्मचिन्तैव । तस्मात्तदु-पासनमस्मिन्पक्षे न विधातव्यम्, प्राप्तत्वात् । तिष्ठतु तावत्पाक्षिक्पात्मोपा-सनप्राप्तिर्नित्या उक्तार्थमीमांसा वेति, अपूर्व विधिः स्यात्; ज्ञानोपासनयोरेकत्वे सत्यप्राप्तत्वात् । ' न स वेद ' इति विज्ञानं प्रस्तुत्य ' आत्मेत्येवोपा-सीत ' इत्यभिधानाद्वेदोपासन-शब्दयोरेकार्थतावगम्यते । न रहनेसे अनात्मचिन्तनको सम्भा-वना नहीं रहती । फलतः आत्म-चिन्तन ही रह जाता है । अत: इस पक्षमें आत्मोपासनाका विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः प्राप्त है । शङ्का — आत्मोपासनकी प्राप्ति पाक्षिक है अथवा नित्य है - इस विचारको अभी रहने दो, यह तो अपूर्वंविधि ही है, क्योंकि यहाँ ज्ञान । और उपासनाका एक ही अर्थ होने-के कारण वह स्वतः प्राप्त नहीं है । ' न स वेद ' ( वह नहीं जानता ) इस वाक्यसे विज्ञानका आरम्भ कर ' आत्मेत्येवोपासीत ' इस प्रकार कहनेके कारण यहाँ ' वेद ' और ' उपासन ' इन शब्दोंकी एकार्थंता " अनेन ह्य ेतत्सव वेद " " आत्मा- ज्ञात होती है । " इससे इस सबको नमेवावेत् ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च विज्ञान -मुपासनम् । तस्य चाप्राप्तत्वाद्वि-ध्यर्हत्वम् । न च स्वरूपान्वाख्याने पुरुष-प्रवृत्तिरुपपद्यते, तस्मादपूर्व -जान लेता है ". " आत्माको ही जाना " इत्यादि श्रुतियोंसे भी विज्ञान उपासनाहीका नाम है । और वह ( उपासना ) अप्राप्त होने के कारण विधिकी योग्यता रखती है । ' इसके सिवा स्वरूपके अनुवादमें | पुरुषकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं १. क्योंकि उपासना मानस कर्म है, वह स्वतः प्राप्त नहीं होता; इसलिये उसके लिये विधिकी आवश्यकता है ।
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२१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विधिरेवायम् । कर्मविधिसामा । न्याच्च । यथा ' यजेत ' ' जुहुयात् ' इत्यादयः कर्मविधयः, न तैरस्य " श्रात्मेत्येवोपासीत " ( १।४।७ ) " आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः " ( २ । ४ । ५ ) इत्याद्यात्मोपासनविधे-विशेषोऽवगम्यते । मानसक्रिया-त्वाच्च विज्ञानस्य तथा ' यस्यै देवतायै हविगृ हीतं स्यात्तां मनसा ध्यायेद्वषट्करिष्यन् ' इत्याद्या मानसी क्रिया विधीयते, तथा “ च।त्मेत्येवोपासीत ” ( १ । ४ । ७ ) “ मन्तव्यो निदिध्यासि तव्यः ” ( २ । ४ । ५ ) इत्याद्या क्रियैव विधं यते ज्ञानात्मिका । तथावोचाम वेदोपासनशब्दयो-रेकार्थत्वमिति । भावनांशत्रयोपपत्तेश्च – यथा ब्राह्म है; इसलिये यह अपूर्वंविधि ही है । तथा कर्मविधिसे इसकी समानता हिय होनेके कारण भी [ यही बात सिद्ध केन होती है ] । जिस प्रकार ' यजन करे ' ' हवन करे ' इत्यादि कर्मविधियाँ पन हैं, उनसे “ आत्मा है - इस प्रकार उपा उपासना करे ” “ अयि मैत्रेयि! यह विध आत्मा द्रष्टव्य है " इत्यादि आत्मो-पासनसम्बन्धी विधियोंका कोई केन अन्तर नहीं जान पड़ता । तथा स्य विज्ञान भी मानस क्रिया ही है सी [ इसलिये भी यह विधि है ] | जिस प्रकार ' जिस देवताके लिये हवि पर ग्रहण किया जाये उसका ‘ वषट्कार ’ इ करते हुए मनसे ध्यान करे ' इत्यादि-रूपसे मानसी क्रियाका विधान किया जाता है उसी प्रकार " आत्मा मा है - इस प्रकार उपासना करे ”, दि " आत्माका मनन करना चाहिये, मौ निदिध्यासन करना चाहिये " इत्यादि रूपसे ज्ञानात्मिका क्रियाका प्र ही विधान किया जाता है । तथा श ' वेद ' और ' उपासन ' शब्दोंका एक ' ही अर्थ है - यह हम कह ही ( चुके हैं । इसके सिवा इस वाक्यमें भावना के [ फल, करण और इतिकर्तव्यता-इ रूप ] तीनों अंश सम्भव होने के
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अध्याय १ वही है । की समानता ही बात सिद्ध कार ' यजन कर्मविधियाँ - इस प्रकार मैत्रेयि! यह बाद आत्मो-योंका कोई ड़ता । तथा क्रिया ही है है ] | जिस लिये हवि ' वषट्कार ' करे ' इत्यादि-TET विधान कार " आत्मा बसना करे ", ना चाहिये, चाहिये " नका क्रियाका है । तथा शब्दोंका एक कह ही यमें भावना के इतिकर्तव्यता-म्भव होने के ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१७ हि यजेत इत्यस्यां भावनायाम् - किं केन कथम् इति भाव्याद्याकाङ्क्षा -पनयकारणमंशत्रयमवगम्यते, तथा उपासीत इत्यस्यामपि भावनायां विधीयमानायाम् किमुपासीत १ केनोपासीत? कथमुपासीत? इत्य-स्यामाकाङ्क्षायाम् आत्मानमुपा-सीत मनसा त्यागब्रह्मचर्यशमदमो -परम तितिक्षादीति कर्तव्यतासंयुक्तः इत्यादिशास्त्रेणैव समर्थ्यतेंऽशत्र-यम् । यथा च कृत्स्नस्य दर्शपूर्ण मासादिप्रकरणस्य दर्शपूर्णमासा -दिविध्युद्देशत्वेनोपयोगः, एव-मौपनिषदाम् आत्मोपासन-प्रकरणस्य आत्मोपासनविध्युद्दे -शत्वेनैवोपयोगः । “ नेति नेति " ( २ । ३ । ६ ) “ अस्थूलम् ” ( ३।८।८ ) ' एकमेवाद्वितीयम् ” ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) ' अशना-कारण भी यह विधिवाक्य है । जिस प्रकार ' यजेत ' ( यजन करे ) इस भावनामें ' किस उद्देश्यसे किस साधनसे और किस प्रकार [ यजन करे ] ' ऐसी भाव्यादिसम्बन्धिनी आकाङ्क्षाओंकी निवृत्तिके कारणभूत तीन अंश देखे जाते हैं, उसी प्रकार ' उपासीत ' इस विधान की जाने-वाली भावनामें भी ' किसकी उपा-सना करे? ' ' किसके द्वारा उपासना करे? ' और ' किस प्रकार उपासना करे? ' ऐसी आकाङ्क्षा होनेपर ' आत्माकी उपासना करे ’ ‘ मनसे करे ' तथा ' त्याग, ब्रह्मचर्य, शम, दम, उपरति तथा तितिक्षादिरूप इतिकर्तव्यतासे युक्त होकर करे ' इत्यादि शास्त्रसे ही तीन अंशोंका समर्थन होता है । तथा जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादिसम्बन्धी शास्त्र के सम्पूर्ण प्रकरणका दर्शपूर्णमासकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है उसी प्रकार उपनिषदोंके आत्मो-पासनसम्बन्धी प्रकरणका भी आत्मो-पासनकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है 1 " नेति नेति " " अस्थूलम् " " एकमेवाद्वितीयम् ” १. ‘ शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत् ' इत्यादि शास्त्र आत्मज्ञानके साधनका निरूपण करता है ।
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• २१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ याद्यतीतः " इत्येवमादिवाक्यानाम् उपास्यात्मस्वरूपविशेषसमर्पणेनो-पयोगः । फलं च मोक्षोऽविद्या-निवृत्तिर्वा । अपरे वर्णयन्ति उपासनेना-त्मविषयं विशिष्ट विज्ञानान्तरं भावयेत्, तेनात्मा ज्ञायते, श्रवि -द्यानिवर्तकं च तदेव, नात्मविषयं वेदवाक्यजनितं विज्ञानमिति । एतस्मिन्नर्थे वचनान्यपि - " वि-ज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत " ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २१ ) ' द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः " ( २।४।५ ) " सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः " ( छा ० उ ० ४ । ७ । १ ) इत्यादीनि । न अर्थान्तराभावात् । न च ' आत्मेत्येवोपासीत ' इत्यपूर्व- । विधिः; कस्मात्? आत्मस्वरूप-कथनानात्मप्रतिषेधवाक्यजनित-विज्ञानव्यतिरेकेण अर्थान्तरस्य कर्तव्यस्य मानसस्य बाह्यस्य । ब्राह्म " अशनायाद्यतीतः " इत्यादि शास्त्र-वाक्योंका उपयोग उपास्य आत्माके वाभा विशेष रूपको समर्पण करनेमें है यत्र तथा उसका फल मोक्ष या अविद्या- विज्ञ की निवृत्ति है । कुछ अन्य लोगोंका कथन है भ्या कि उपासनाके द्वारा आत्मविषयक माद अन्य विशिष्ट विज्ञानकी भावना बाक करनी चाहिये, उससे आत्माका ज्ञान होता है और वही अविद्याकी मास निवृत्ति करनेवाला है । आत्मविषयक पेक्ष वेदवाक्यजनित विज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है । इस ३ विषयमें ये वचन भी हैं - " उसे वाव जानकर तद्विषयक बुद्धि करें " दश आत्माका साक्षात्कार करे तथा सम उसका श्रवण, मनन और निदि- त्व ध्यासन करे ", " उसका अन्वेषण करना चाहिये तथा उसे जानने की ज इच्छा करनी चाहिये ” इत्यादि । नि समाधान - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्यका कोई अर्थान्तर ( नहीं हो सकता । ' आत्मेत्येवोपासीत ' म यह अपूर्वविधि नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मस्वरूपके कथन त और अनात्मप्रतिषेघवाक्यजनित वि विज्ञान से भिन्न इसका मानसिक या बाह्य कर्तव्यसम्बन्धी कोई दूसरा अर्थ
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[ अध्याय १ इत्यादि शास्त्र-पास्य आत्माके करने में है क्ष या अविद्या-का कथन है आत्मविषयक नकी भावना से आत्माका आत्मविषयक ज्ञान उसकी नहीं है । इस भी हैं- " उसे बुद्धि करें " -र करे तथा - और निदि-का अन्वेषण उसे जानने की ' इत्यादि । बात नहीं है, कोई अर्थान्तर सत्येवोपासीत ' क्यों नहीं रूपके कथन वाक्यजनित मानसिक या कोई दूसरा अर्थ ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ ९ वाभावात् । तत्र हि विधेः साफल्यं नहीं हो सकता । विधिकी सफलता यत्र विधिवाक्यश्रवणमात्रजनित " | वहीं होती है जहाँ विधिवाक्यके श्रवणमात्रसे होनेवाले विज्ञानके सिवा विज्ञानव्यतिरेकेण पुरुषप्रवृत्ति-गम्यते । यथा “ दर्शपूर्णमासा-भ्यां स्वर्गकामो यजेत " इत्येव मादौ । न हि दर्शपूर्णमासविधि -वाक्यजनितविज्ञानमेव दर्शपूर्ण मासानुष्ठानम्; तच्चाधिकाराद्य-पेक्षानुभावि । न तु " नेति नेति " ( २ । ३ । ६ ) इत्याद्यात्मप्रतिपादक-वाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण दर्शपूर्णमासादिवत्पुरुषव्यापारः सम्भवति 1 । सर्वव्यापारोपशम हेतु-स्वात् तद्वाक्यजनितविज्ञानस्य । न ह्युदासीन विज्ञानं प्रवृत्ति-जनकम्, ब्रह्मानात्मविज्ञान-निवर्तकत्वाच्च ' एकमेवाद्वितीयम् " कोई अन्य पुरुषप्रवृत्ति भी जानी जाय । जैसे " स्वर्गकी कामनावाला दर्श - पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे " इत्यादि वाक्योंमें । यहाँ दर्श - पूर्णंमास-सम्बन्धी विधिवाक्यसे होनेवाला विज्ञान ही दर्श - पूर्णमास यज्ञोंका अनुष्टान नहीं है; वह तो अधिकारी आदिकी अपेक्षासे पीछे होनेवाला है । किंतु " नेति नेति " इत्यादि आत्मप्रतिपादक वाक्योंसे होनेवाले विज्ञानके सिवा उससे, दर्श - पूर्ण-मासादिके समान, कोई और पुरुष -व्यापार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंसे होनेवाला विज्ञान तो सत्र प्रकारके व्यापारकी निवृत्तिका हेतु है । अतः उदासीन विज्ञान प्रवृत्ति-का जनक नहीं हो सकता । इसके सिवा " एकमेवाद्वितीयम् " " तत्त्व-( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) " तत्त्व - मसि " इत्यादि वाक्य अब्रह्म और मसि " ( छा ० उ ० ६ । ८-१६ ) इत्येवमादिवाक्यानाम् । न च तन्निवृत्तौ प्रवृत्तिरुपपद्यते; विरोधात् । अनात्मविषयक विज्ञानकी निवृत्ति-करनेवाले भी हैं और उसकी निवृत्ति होनेपर प्रवृत्तिका होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अनात्मविज्ञान की निवृत्ति और पुरुषप्रवृत्तिमें विरोध है । पूर्व ० - किंतु वाक्यजनित विज्ञान-वाक्यजनितविज्ञानमात्रान्नात्र-
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२२० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म ह्मानात्मविज्ञाननिवृत्तिरिति चेत्? । न; " तत्त्वमसि ' ( छा ० उ ० ६। ८–१६ ) “ नेति नेति ” ( वृ ० उ ०२ ॥ ३ । ६ ) " आत्मै-वेदम् ” ( छा ० उ ० ७ | २५ । २ ) " एकमेवाद्वितीयम् " ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) ब्रह्मैवेदम-मृतम् ” ( मु ० उ ० २ । २ । ११ ) " नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट " ( वृ ० उ ० ३ । ८ । ११ ) " तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि " ( के ० उ ० १ । ४ ) इत्यादिवाक्यानां तद्वादित्वात् । द्रष्टव्य विधेर्विषय समर्पकाण्येता-नीति चेत् १ न, अर्थान्तराभावादित्युक्तो-तरत्वात् । श्रात्मवस्तुस्वरूपसम-कैरेव वाक्यैः “ तमसि " इत्यादिभिः श्रवणकाल एव तद्द -र्शनस्य कृतत्वाद् द्रष्टव्यविधेर्ना-नुष्ठानान्तरं कर्तव्यमित्युक्तोत्तर -मेतत् । १. ‘ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो होनेवाली विधि । मात्र से ही अब्रह्म एवं अनात्मविज्ञान-की निवृत्ति नहीं हो सकती । सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, आत क्योंकि " तू वह है ', " यह ( कार्य ) प्रवत आत्मा नहीं है, यह ( कारण ) आत्मा नहीं है ", " यह सब आत्मा ही है ", " एक ही अद्वितीय है " आत " यह अमृत ब्रह्म ही है ", " इससे भो भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है ", " उसीको तू ब्रह्म जान " इत्यादि वाक्य उस s ( अनात्मप्रतिषेध ) का ही प्रति-पादन करनेवाले हैं । अन पूर्व ० - ये तो ' द्रष्टव्यविधिके विषयको समर्पण करनेवाले हैं । वा सिद्धान्ती - – ऐसा मत कहो; क्योंकि ' इनका अर्थान्तर नहीं हो न सकता ' ऐसा कहकर हम इसका श्रव उत्तर पहले ही दे चुके हैं । आत्म-वस्तुके स्वरूपको समर्पण करनेवाले तिं " तत्त्वमसि ' इत्यादि वाक्योंसे ही उनके श्रवणकालमें ही आत्मदर्शन तथ हो जानेके कारण द्रष्टव्यविधिसे कोई अन्य अनुष्ठान कर्त्तव्य नहीं अर है— इस प्रकार इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है । त मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इस वाक्यसे ख
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[ अध्याय १ वं अनात्मविज्ञान-सकती । मत कहो, " यह ( कार्य ) यह ( कारण ) यह सब आत्मा अद्वितीय है " ही है ", " इससे Ï है ", " उसीको दिवाक्य उस का ही प्रति-1 द्रष्टव्यविधि के रनेवाले हैं । मत कहो; र्यान्तर नहीं हो कर हम इसका के हैं । आत्म-मर्पण करनेवाले दिवाक्योंसे ही ही आत्मदर्शन द्रष्टव्यविधि - कर्त्तव्य नहीं उत्तर पहले य: ' इस वाक्यसे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१ श्रात्मस्वरूपान्वाख्यानमात्रेण आत्मविज्ञाने विधिमन्तरेण न प्रवर्तत इति चेत्? न, आत्मवादिवाक्यश्रवणेन आत्मविज्ञानस्य जनितत्वात् - किं भो कृतस्य करणम्? तच्छ्रुव-णेऽपि न प्रवर्तत इति चेन्न, अनवस्थाप्रसङ्गात् । यथा आत्म-वादिवाक्यार्थश्रवणे विधिमन्तरेण न प्रवर्तते तथा विधिवाक्यार्थ-श्रवणेऽपि विधिमन्तरेण न प्रत्र-तिंष्यत इति विध्यन्तरापेक्षा । तथा तदर्थश्रवणेऽपीत्यनवस्था प्रसज्येत । वाक्यजनितात्मज्ञानस्मृतिसं-ततेः श्रवणविज्ञानंमात्रादर्थान्तर-त्वमिति चेत्? पूर्व ० - किंतु बिना विधिके केवल ग्रात्मस्वरूप के अनुवादमात्रसे ही पुरुष आत्मविज्ञानमें प्रवृत्त नहीं हो सकता । सिद्धान्ती - ऐसा नहीं है क्योंकि आत्मविज्ञान तो आत्मवादी वाक्यके श्रवणमात्रसे ही उत्पन्न हो जाता है । फिर किये हुएको करनेका अर्थ ही क्या है? यदि कहो कि [ विधिके बिना ] पुरुष उसे सुननेमें भी प्रवृत्त नहीं होता तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्थादोषका प्रसंग उपस्थित होता है । जिस प्रकार [ तुम्हारे मतानुसार ] पुरुष विधिके बिना आत्मवादी वाक्यके अर्थको श्रवण करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, इसी प्रकार वह विधिके बिना विधिवाक्यार्थको श्रवण करने में भी प्रवृत्त नहीं होगा, इसलिये एक दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी । इसी प्रकार उस विध्यन्तरका अर्थ श्रवण करनेमें भी अन्य विधिके बिना प्रवृत्त नहीं होगा - इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा । पूर्वं ० - तो भी श्रवणविज्ञानमात्रसे वाक्यजनित आत्मज्ञानकी स्मृतिका प्रवाह तो दूसरी ही चीज है?
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२२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म न, अर्थ प्राप्तत्वात् । यदैवात्म- । प्रतिपादकवाक्यश्रवणाद् आत्म-विषयं विज्ञानमुत्पद्यते, तदैव तदुत्पद्यमानं तद्विषयं मिथ्याज्ञानं । निवर्तयदेवोत्पद्यते । आत्मविषय-मिथ्याज्ञाननिवृत्तौ च तत्प्रभवाः । स्मृतयो न भवन्ति स्वाभावि - । क्योऽनात्मवस्तुभेदविषयाः । अनर्थत्वावगतेच, श्रात्माव-गतौ हि सत्यामन्यद्वस्त्वनर्थत्वे-नावगम्यते, अनित्यदुःखाशुद्धया -दिबहुदोषवत्त्वाद् श्रात्मवस्तुनश्च । तद्विलक्षणत्वात् । तस्मादनात्म-विज्ञानस्मृतीनाम् आत्मावगतेरभा-सिद्धान्ती नहीं, वह तो अर्थत: " त प्राप्त है । जिस समय भी आत्म- “ चि प्रतिपादक वाक्यके श्रवणसे आत्म-( त विषयक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी समय वह उत्पन्न होनेवाला ज्ञान आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति ४ । ग्रनि करता हुआ ही उत्पन्न होता है; तथा आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी इत्य निवृत्ति हो जानेपर तज्जनित अना-त्मवस्तुभेदविषयक स्वाभाविकी अ स्मृतियाँ भी नहीं होतीं । इसके सिवा अनात्मवस्तुविप बेद यक स्मृतियाँ अनर्थकारिणी हैं— न्त ऐसा बोध हो जानेसे भी उनकी आवृत्ति नहीं होती । आत्मज्ञान हो व्य जानेपर अन्य वस्तुएँ अनर्थरूपसे चेत ज्ञात होती हैं, क्योंकि वे अनित्यता, दुःख एवं अशुद्धि आदि अनेकों न दोषोंसे युक्त हैं और आत्मवस्तु उनसे भिन्न स्वभावकी है । अतः आत्म- अ ज्ञान होनेपर अनात्मविज्ञानजनित गय चप्राप्तिः । पारिशेष्यादात्मैकत्व-: स्मृतियोंका अभाव प्राप्त होता विज्ञानस्मृति सन्ततेरर्थत एव भावान्न विधेयत्वम्, शोकमोह-भयायासादिदुःखदोषनिवर्तकत्वाच्च तत्स्मृतेः । विपरीतज्ञानप्रभवो हि शोकमोहादिदोषः । तथा च है । अन्ततोगत्वा आत्मैकत्ववि- 44. ज्ञानसम्बन्धी स्मृतिका प्रवाह १ अर्थतः प्राप्त होनेके कारण विधिका ( विषय नहीं है, क्योंकि आत्मस्मृति तो शोक, मोह, भय, श्रम आदि बहुत - से दुःख और दोषोंकी भ निवृत्ति करनेवाली है । शोकमो- 44 हादि दोष तो विपरीत ज्ञानसे ही उ । होनेवाला है । इस विषयमें “ उस
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[ अध्याय १ - वह तो अर्थतः मय भी आत्म-श्रवणसे आत्म-होता है उसी होनेवाला ज्ञान ज्ञानकी निवृत्ति = त्पन्न होता है; मिथ्या ज्ञानकी तज्जनित अना-स्वाभाविकी तीं । चनात्मवस्तुविष-थंकारिणी हैं-निसे भी उनकी | आत्मज्ञान हो तुएँ अनर्थरूपसे कि वे अनित्यता, आदि अनेकों आत्मवस्तु उनसे । अतः आत्म-त्मविज्ञानजनित प्राप्त होता आत्मैकत्ववि-तिका प्रवाह कारण विधिका ोकि आत्मस्मृति नय, श्रम आदि और दोषोंकी नी है । शोकमो-रीत ज्ञानसे ही - विषय में " उस ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२३ " तत्र को मोह: " ( ईशा ० ७ ) | “ विद्वान्न विभेति कुतश्चन ' " ( तै ० उ ०२ । ९ । १ ) " अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि " ( पृ ० ४ । २ । ४ ) " भिद्यते हृदय-ग्रन्थिः ” ( मु ० उ ० २ । २ । ८ ) इत्यादिश्रुतयः । निरोधस्तर्ह्यर्थान्तरमिति चेत् । अथापि स्याच्चित्तवृत्तिनिरोधस्य वेदवाक्यजनितात्म विज्ञानादर्था -न्तरत्वात्, तन्त्रान्तरेषु च कर्त-व्यतयावगतत्वाद्विधेयत्वमिति चेत् १ न मोक्षसाधनत्वेनानवगमात् । न हि वेदान्तेषु ब्रह्मात्मविज्ञानाद् अन्यत्परमपुरुषार्थसाधनत्वेनाव गम्यते । " आत्मानमेवावेत् " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) " तस्मात्तत्सर्वमभवत् " ( १ । ४ । १० ) " ब्रह्मविदाप्नोति परम् " ( तै ० उ ० २ । १ । १ ) “ स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति " ( मु ० उ ० ३ । २ । ९ ) " श्राचार्यवान्पुरुषो वेद " ( छा ० उ ० ६ । १४ । २ ) " तस्य ताव -अवस्थामें क्या मोह है ”, “ आत्म-ज्ञानी किसीसे भी भय नहीं मानता ”, “ हे जनक! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है ", " हृदय-की ग्रन्थि टूट जाती है ” इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं । पूर्व ० - तथापि ज्ञानसे भिन्न निरोध भी तो एक मोक्षका साधन है । तात्पर्य यह है कि वेदवाक्य-जनित आत्मविज्ञानसे अर्थान्तर होने और शास्त्रान्तरमें [ मोक्षप्राप्ति-के लिये ] कर्तव्यरूपसे ज्ञात होनेके कारण चित्तवृत्तिनिरोधकी विधेयता तो है ही । सिद्धान्ती - ऐसा कहना ठीक | नहीं, क्योंकि वह मोक्षके साधनरूपसे नहीं जाना जाता । वेदान्तशास्त्रों में | ब्रह्मात्मविज्ञानके सिवा अन्य कुछ भी परमपुरुषार्थंकी प्राप्तिके साधनरूपसे नहीं जाना जाता; जैसा कि " आत्माको ही जाना ”, “ अतः वह सर्वरूप हो गया ”, " ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है ”, " जो भी उस परब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है, " “ आचार्य-वान् पुरुषको ज्ञान होता है, "
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२२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रा देव चिरम् " ( ६ । १४ । २ ) | “ अभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद “ ( वृ ० उ ० ४ । ४ । २५ ) इत्येवमादिश्रुतिशतेभ्यः । अनन्यसाधनत्वाच्च निरोधस्य । न ह्यात्मविज्ञानतत्स्मृतिसन्तान -व्यतिरेकेण चित्तवृत्तिनिरोधस्य साधनमस्ति । अभ्युपगम्येदमु-क्तम्, न तु ब्रह्मविज्ञानव्यतिरेकेण अन्यन्मोक्षसाधनमवगम्यते । श्राकाङ्क्षाभावाच्च भावनाभावः । भावनात्रय- यदुक्तं यजेतेत्यादौ खण्डनम् किं केन कथम् इति भावनाकाङ्क्षायां फलसाधनेति-कर्तव्यताभिराकाङ्क्षापनयनं यथा, तद्वदिहाप्यात्मविज्ञानविधावप्यु-पपद्यत इति, तदसत्, “ एक-मेवाद्वितीयम् ” ( छा ० उ ० ६ । “ उसके लिये तभीतक देरी है " " जो इस प्रकार जानता है अभय, ब्रह्म ही हो जाता है " इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों से सिद्ध होता है । र इसके सिवा निरोध भी किसी अन्य साधनसे सिद्ध होनेवाला नहीं है । अर्थात् आत्मविज्ञान और उसकी इत स्मृतिके प्रवाहके सिवा चित्तवृत्ति-निरोधका कोई अन्य साधन नहीं, ६ है । यह बात भी हम उसे मोक्षका साधन मानकर कहते हैं, वस्तुतः तो ब्रह्मविज्ञानके सिवा मोक्षका कोई दूसरा साधन जानने में ही नहीं आता । [ अब भावनात्रयका खण्डन करते हैं- ] आत्मविज्ञान में आकाङ्क्षा-| का अभाव होनेके कारण भावनाका भी अभाव है । तुमने जो कहा कि ' यजेत ' इत्यादि विधिमें ‘ किसका, किसके द्वारा, किस प्रकार [ यजन करे ], ' ऐसी भावनाकी आकाङ्क्षा होनेपर जैसे फल, साधन और इति-कर्तव्यताके द्वारा उस आकाङ्क्षाकी निवृत्ति की जाती है उसी प्रकार यहाँ आत्मविज्ञानसम्बन्धी विधिमें भी उसका होना सम्भव हैं, सो तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि “ एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ”