बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 231–240

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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[ अध्याय १ भीतक देरी है ", जानता है अभय है " इत्यादि सिद्ध होता है । निरोध भी किसी होनेवाला नहीं विज्ञान और उसकी सिवा चित्तवृत्ति-अन्य साधन नहीं, हम उसे मोक्षका कहते हैं, वस्तुत: सिवा मोक्षका धन जानने में ही नात्रयका खण्डन वज्ञान में आकाङ्क्षा-कारण भावनाका तुमने जो कहा कि विधिमें ' किसका, स प्रकार [ यजन बाकी आकाङ्क्षा साधन और इति-उस आकाङ्क्षाकी है उसी प्रकार सम्बन्धी विधिमें सम्भव है, सो थन. ठीक नहीं, चाद्वितीयं ब्रह्म " ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५ २ । १ ) “ तत्त्वमसि ' ( छा ० उ ० । ६ । ८ – - १६ ) " नेति नेति " ( वृ ० उ ० २ । ३ । ६ ) “ अनन्त-रमबाह्यम् " ( बृ ० उ ०२ । ५ । १ ९ ) । “ श्रयमात्मा ब्रह्म ” ( २ । ५।१ ९ ) इत्यादिवाक्यार्थविज्ञानसमकालमेव सर्वाकाङ्क्षाविनिवृत्तेः । न च वाक्यार्थविज्ञाने विधिप्रयुक्तः प्रवर्तते विध्यन्तरप्रयुक्तौ चान-वस्थादोषमवोचाम । न च " एक-मेवाद्वितीयं ब्रह्म " इत्यादिवाक्येषु विधिरवगम्यते । श्रात्मस्वरूपा-न्वाख्यानेनैवावसितत्वात् । वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वा-दप्रामाण्यमिति चेद । अथापि स्याद्यथा " सोऽरोदीद्यदरोदीचद्र-द्रस्य रुद्रत्वम् " इत्येवमादौ " तत्त्वमसि ”, “ नेति नेनि ", " अनन्तरमवाह्यम् ” " अयमात्मा ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंके अर्थका ज्ञान होते ही सब प्रकारकी आकाङ्क्षाएँ निवृत्त हो जाती हैं । तथा बाक्या-र्थंके ज्ञानमें पुरुष विधिसे प्रेरित होकर प्रवृत्त नहीं होता । उसमें विध्यन्तरका प्रयोग माननेसे अन-वस्था दोष आता है - यह हम ऊपर बतला चुके हैं । इसके सिवा “ एक-मेवाद्वितीयं ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंमें विधि देखी भी नहीं जाती, क्योंकि उनका पर्यवसान तो आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रमें ही हो जाता है । पूर्व ० - वस्तुस्वरूपके अनुवादमात्र होनेसे तो उनकी अप्रामाणिकता सिद्ध होती है । अर्थात् जैसे " सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् ” इत्यादि वाक्योंमें वस्तुके स्वरूपका अनुवादमात्र होनेसे उनकी प्रामाणि-वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वादप्रा- कता नहीं मानी जाती, उसी प्रकार माण्यम्, एवमात्मार्थवाक्यानाम-पीति चेत न; विशेषात् । न वाक्यस्य वस्त्वन्वाख्यानं क्रियान्वाख्यानं १. वह ( अग्नि ) रोया और वह वृ ० उ ० १५-आत्मविषयक वाक्योंकी भी प्रामा-णिकता नहीं है - ऐसी बात हो तो? सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन अर्थवादवाक्योंसे आत्मार्थं वाक्योंकी विशेषता है । वस्तु या | क्रियाका अनुवाद ही वाक्यको जो रोया वही उस रुद्रका रुद्रत्व है ।

पृष्ठ 232

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२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ वा प्रामाण्याप्रामाण्य कारणम्, किं । तर्हि निश्चित फलवद्विज्ञानोत्पाद-कत्वम् । तद्यत्रास्ति तत्प्रमाणं वाक्यम्, यत्र नास्ति तदप्रमाणम् । किश्च भो पृच्छामस्त्वाम् — आत्मस्वरूपान्वाख्यानपरेषु वाक्येषु फलवन्निश्चितं च विज्ञान -मुत्पद्यते, न वा १ उत्पद्यते चेत्कथ मप्रामाण्यमिति १ किं वा न पश्यसि अविद्याशोकमोहभयादिसंसारबीज-दोषनिवृत्तिं विज्ञानफलम् । न शृणोषि वा किम् “ तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः " ( ईशा ० ७ ) " मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित्सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तार-यतु " ( छा ० उ ० ७ । १ । ३ ) इत्येवमाद्युपनिषद्वाक्यशतानि १ एवं विद्यते किं सोऽरोदीदित्या-दिषु निश्चितं फलवच्च विज्ञानम् । न चेद्विद्यतेऽस्त्वप्रामाण्यम् । तद-ब्रा प्रामाणिकताका अथवा अप्रामा-णिकताका कारण नहीं है । तो फिर न क्या है? निश्चित फलवाले विज्ञान-को उत्पन्न करना । वह जिसमें है त्प वही वाक्य प्रामाणिक है और जिसमें नहीं है वही अप्रामाणिक है । त सो, भाई! हम तुमसे यह पूछते हैं कि आत्मस्वरूपका निरू-पण करनेवाले वाक्योंसे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न होता है या नहीं? यदि उत्पन्न होता है तो उनकी अप्रामाणिकता कैसे हो सकती है? क्या तुम उस विज्ञानका अविद्या, शोक, मोह और भय आदि संसारके बीजभूत दोषोंकी निवृत्तिरूप फल नहीं देखते? क्या तुम " उस अवस्थामें एकत्व देखने-वालेको क्या मोह और क्या शोक हे? ”, “ [ नारद कहते हैं— ] भग-वन्! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ । मैं शोक करता हूँ, ऐसे मुझको, हे भगवन्! शोकसे पार कर दीजिये " इत्यादि प्रकारके सैकड़ों उपनिषदद्वाक्य नहीं सुनते? क्या ‘ सोऽरोदीत् ' इत्यादि वाक्योंमें इसी प्रकार निश्चित और सफल विज्ञान है? यदि नहीं है तो भले ही उनकी अप्रामाणिकता

पृष्ठ 233

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- अध्याय १ III वा अप्रामा-है । तो फिर वाले विज्ञान-वह जिसमें है है और नामाणिक है । मह रूपका निरू-सफल और होता है या कैसे हो विज्ञानका और भय भूत दोषोंकी देखते? क्या इकत्व देखने-क्या शोक हैं- ] भग-मन्त्रवेत्ता ही | मैं शोक - हे भगवन्! नये " इत्यादि पनिषदवाक्य ' सोऽरोदीत् ' कार निश्चित ? यदि नहीं प्रामाणिकता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७ प्रामाण्ये फलवन्निश्चितविज्ञानो । त्पादकस्य किमित्यप्रामाण्यं स्यात्? । तदप्रामाण्ये च दर्शपूर्णमासादि-वाक्येषु को विश्रम्भः । ननु दर्शपूर्णमासादिवाक्यानां पुरुषप्रवृत्तिविज्ञानोत्पादकत्वात् श्रामाण्यम् । आत्मविज्ञानवाक्येषु तन्नास्तीति । सत्यमेवम्, नैष दोषः । श्रामाण्य कारणोपपत्तेः । प्रामाण्य -कारणं च यथोक्तमेव, नान्यत् । अलङ्कारश्चायम्, यत्सर्वप्रवृत्तिबीज-निरोधफलवदविज्ञानोत्पादकत्वम् आत्मप्रतिपादकवाक्यानां नाप्रा-माण्यकारणम् । यत्तक्तम् " विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २१ ) इत्यादिवचनानां वाक्याथ -विज्ञानव्यतिरेकेण उपासनार्थ-रहे । उनकी अप्रामाणिकतासे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न करने-वाले वाक्योंकी अप्रामाणिकता क्यों होनी चाहिये? यदि उनकी अप्रा-माणिकता मानी जाय तो दशैं-• पूर्णमासादिविषयक वाक्योंमें ही. " क्या विश्वास किया जा सकता है? पूर्व ० - दर्श - पूर्णमासादि वाक्यों-की प्रामाणिकता तो पुरुषप्रवृत्ति-सम्बन्धी विज्ञानके उत्पन्न करनेवाले होनेसे है; आत्मविज्ञान विषयक वाक्योंमें यह बात नहीं है । सिद्धान्ती - ठीक है, ऐसा ही है; किंतु यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि आत्मविज्ञानविषयक वाक्योंमें भो प्रामाणिकताका युक्तियुक्त कारण उपलब्ध है । प्रामाणिकताका कारण जैसा ऊपर बताया गया है वही है, दूसरा नहीं । सब प्रकारकी प्रवृत्तिके बीजका निरोध जिसका फल है - ऐसे विज्ञानका उत्पन्न करनेवाला होना तो आत्मप्रति-पादक वाक्योंका भूषण है, यह उनकी अप्रामाणिकताका कारण नहीं हो सकता । इसके सिवा यह जो कहा कि. “ आत्माको जानकर तद्विषयक बुद्धि करे " इत्यादि वाक्य वाक्यार्थविज्ञान. से अलग उपासना के लिये हैं, सो यह

पृष्ठ 234

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२२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ त्वमिति, सत्यमेतत्, किन्तु । नापूर्व विध्यर्थता; पक्षे प्राप्तस्य नियमार्थतैव 1 । कथं पुनरुपासनस्य पक्षप्राप्तिः १ यावता पारिशेष्यादात्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिः नित्यैवेत्यभिहितम् । बाढम्, यद्यप्येवम्; शरीरारम्भ-आत्मोपासन - कस्य कर्मणो नियत -वाक्यानां नियम- फलत्वात्, सम्य-विध्यर्थत्वसाधनम् ग्ज्ञानप्राप्तावप्यव-श्यम्भाविनी प्रवृत्तिर्वाङ्मनः काया-नाम्, लब्धवृत्तेः कर्मणो बलीय-स्त्वात् मुक्तेष्वादिप्रवृत्तिवत् । तेन पक्षे प्राप्तं ज्ञानप्रवृत्ति-दौर्बल्यम् । तस्मान्यागवैराग्यादि -साधनबलावलम्बेन आत्मविज्ञान -. I स्मृति सन्ततिर्नियन्तव्या भवति, न त्वपूर्वा कर्तव्याः प्राप्तत्वाद् तो ठीक है; किंतु यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती, बल्कि एक पक्षमें प्राप्त होनेवाली उपासनाका नियम करने के लिये ही है । पूर्व ० - किंतु एक पक्षमें उसासना-की प्राप्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि ऊपर यह कहा जा चुका है कि परिशेषतः आत्मविज्ञान-सम्बन्धिनी स्मृतिका प्रवाह नित्य प्राप्त ही है । सिद्धान्ती - ठीक है, यद्यपि ऐसा ही है; तथापि शरीरारम्भक कर्मका फल निश्चित होनेके कारण सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी वाणी, मन और शरीरकी चेष्टा अवश्यम्भाविनी ही है, क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो चुका है वह तो छूटे हुए बाण आदिकी प्रवृत्तिके समान अधिक बलवान् है ही । अतः एक पक्षमें ज्ञानप्रवृत्तिकी दुर्बलता प्राप्त होती है । अतः त्याग - वैराग्यादि साधनोंके बलका आश्रय लेकर आत्मविज्ञानस्मृतिके प्रवाहका नियमन ही करना होता है, उसे अपूर्वं रूपसे नहीं करना पड़ता, क्योंकि १. 1 अर्थात् आत्मज्ञानसे अनात्मचिन्तनकी निवृत्ति हो जानेपर अन्तमें ।

पृष्ठ 235

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[ अध्याय १ यह अपूर्वविि ल्कि एक पक्ष में वासनाका नियम क्षमें उसासना-सकती है? कहा जा चुका आत्मविज्ञान-प्रवाह नित्य है, यद्यपि ऐसा रम्भक कर्मका होनेके कारण हो जानेपर शरीरकी चेष्टा है, क्योंकि जो चुका है वह तो दिकी प्रवृत्तिके नवान् है ही । ज्ञानप्रवृत्तिकी है । अतः धनों बलका नविज्ञानस्मृतिके ही का अपूर्वं रूपसे ड़ता, क्योंकि अन्तमें । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२ ९ इत्यवोचाम । तस्मात् प्राप्तविज्ञान -स्मृतिसन्ताननियमविध्यर्थानि " विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत " इत्यादि-चाक्यानि, अन्यार्थासम्भवात् । नन्वनात्मोपासनमिदम्, इति-शब्दप्रयोगात्; यथा ' प्रियमित्ये- । तदुपासीत ' इत्यादौ न प्रियादि-गुणा एवोपास्याः, किं तर्हि? प्रियादिगुणवत्प्राणाद्येवोपास्यम्; तथेहापि इति परात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मगुणवदनात्मवस्तूपास्यमिति गम्यते । श्रात्मोपास्यत्ववाक्यवैलक्षण्याच्च, परेण च वक्ष्यति- " आत्मानमेव लोकमुपासीत " ( १ । ४ । १५ ) इति । तत्र च वाक्ये आत्मैवो-पास्यत्वेनाभिप्रेतो द्वितीयाश्रवणा -' दात्मानमेवेति । इह तु न द्वितीया | हम कह चुके हैं कि आत्मज्ञान होने-पर वह प्राप्त है ही । अतः " विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत " इत्यादि वाक्य प्राप्त विज्ञानकी स्मृतिके प्रवाहकी नियम-विधिके लिये ही हैं, क्योंकि उनका अन्य अर्थं होना असम्भव है । पूर्व ० - किंतु ' आत्मा ' शब्दके आगे ' इति ' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अनात्मोपासना जान पड़ती है । जिस प्रकार ' प्रियमित्येतदुपासीत ' इत्यादि वाक्योंमें प्रियादि गुण ही उपास्य नहीं हैं, तो फिर कौन उपास्य है? प्रियादि गुणवान् प्राणादि ही उपास्य हैं, उसी प्रकार यहाँ भी ' इति ' जिसके आगे है ऐसे ' आत्मा ' शब्दका प्रयोग होनेसे यही जान पड़ता है कि आत्माके समान गुणोंवाली अनात्मवस्तु ही उपास्य है । इसके सिवा आत्माका उपास्यत्व बतलानेवाले वाक्यसे इसकी विलक्ष-णता होनेके कारण भी यह वाक्य अनात्मोपासनसम्बन्धी ही है । आगे श्रुति कहेगी " आत्मानमेवं लोक-मुपासीत । " वहाँ इस वाक्यमें उपास्यरूपसे आत्मा ही अभिप्रेत है, क्योंकि ' आत्मानमेव ' इस प्रकार ' आत्मानम् ' पदमें वहाँ द्वितीया सुनी जाती है; किंतु यहाँ द्वितीया १. यह प्रिय है— इस प्रकार उपासना करे । २. ' आत्मा ' रूप ही लोककी उपासना करे ।

पृष्ठ 236

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२३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ श्रूयते । इतिपरश्चात्मशब्दः ' आत्मे-त्येवोपासीत ' इति । अतो नात्मो-पास्य आत्मगुणश्चान्य इति त्वत्र -गम्यते । न; वाक्यशेष आत्मन उपा-स्यत्वेनावगमात् । अस्यैव वाक्यस्य शेषे आत्मैवोपास्यत्वेनाव -गम्यते - " तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा ", ( बृ ० उ ० १। ४। ७ ) “ अन्तरतरं यदय-मात्मा " ( बृ ० उ ० १ । ४ । ८ ) " आत्मानमेवावेत् " ( १ । ४ । १० ) इति । प्रविष्टस्य दर्शनप्रतिषेधादनु-पास्यत्वमिति चेत् | यस्योत्मनः प्रवेश उक्तः तस्यैव दर्शनं वार्यते “ तं न पश्यन्ति ” ( ४ । ३ । २३ ) इति प्रकृतोपादानात् । तस्मादात्मनोऽनुपास्यत्वमेवेति चेत्! न, अकृत्स्नत्वदोषात् । दर्शन-१. उसे नहीं देखते । नहीं सुनी जाती और ' आत्मेत्येवो-पासीत ' इसमें ' आत्मा ' शब्दके आगे ' इति ' भी है । अतः यही ज्ञात होता है कि यहाँ ' आत्मा ' उपास्य नहीं है, अपितु आत्माके समान गुणवाला उससे भिन्न — अनात्मा उपास्य है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वाक्यशेषमें आत्मा ही उपा-स्यरूपसे जाना गया है । इसी वाक्यके अन्तमें उपास्यरूपसे आत्मा ही जाना जाता है, यथा – “ यह जो आत्मा है वही इस सम्पूर्ण जगत्का प्राप्तव्य है ", " यह जो आत्मा है अन्तरतर है ", " आत्माही -को जाना " इत्यादि । पूर्व ० - किंतु [ शरीरके भीतर ] प्रविष्ट आत्मा के दर्शनका प्रतिषेध होनेसे तो उसका अनुपास्यत्व सिद्ध होता है । जिस आत्माका प्रवेश बतलाया गया है उसीके दर्शनका " तं न पश्यन्ति " इस वाक्यके ' तम् ' पदसे ग्रहण करके निषेध करते हैं । अतः आत्माका अनु-पास्यत्व ही सिद्ध होता है । सिद्धान्ती - यह बात नहीं है,। वह तो असम्पूर्णंतारूपदोषके कारण

पृष्ठ 237

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[ अध्याय १ र ' आत्मेत्येवो-ना ' शब्दके आगे तः यही ज्ञात नात्मा ' उपास्य समान भिन्न - अनात्मा बात नहीं है, आत्मा ही उपा-गया है । इसी रूप से आत्मा → यथा - " यह इस सम्पूर्ण है ", " यह जो है ", " आत्माही -के भीतर ] निका प्रतिषेध नुपास्यत्व सिद्ध T त्माका प्रवेश सीके दर्शनका इस वाक्यके करके निषेध आत्माका अनु-ता है । बात नहीं है, = पदोषके कारण ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१ प्रतिषेधो ऽकृत्स्नत्वदोषाभिप्रायेण नात्मोपास्यत्वप्रतिषेधाय । प्राण-नादिक्रियाविशिष्टत्वेन विशेष -णात् । आत्मनश्चेदुपास्यत्वमन भिप्रेतं प्राणनाद्येकैकक्रियाविशि । ष्टस्यात्मनोऽकृत्स्नत्ववचनमनर्थकं स्यात् “ अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति ” ( १ । ४ । ७ ) इति । | तोऽनेकैकविशिष्टस्त्वात्मा कृत्स्नत्वादुपास्य एवेति सिद्धम् । यस्त्वात्मशब्दस्य इतिपरः प्रयोगः, आत्मशब्दप्रत्यययोः आत्मतत्त्वस्य परमार्थतोऽविषय-स्वज्ञापनार्थम्, अन्यथा आत्मान -मुपासीतेत्येवमवक्ष्यत् । तथा चार्थादात्मनि शब्दप्रत्ययाचनु-ज्ञातौं स्याताम्; तच्चानिष्टम्, “ नेति नेति ” ( २ । ३ । ६ ) “ विज्ञातारमरे केन विजानीयात् ", ( २ । ४ । १४ ) “ अविज्ञातं विज्ञातु " ( ३ | ८ | १२ ) " यतो है । अर्थात् आत्माके दर्शनका प्रतिषेध तो उसमें असम्पूर्णंतारूप दोषके अभिप्रायसे है, आत्मा के उपास्यत्वका प्रतिषेध करनेके अभि-प्रायसे नहीं है, क्योंकि प्राणनादि क्रियाविशिष्टत्वसे उसे विशेषित किया गया है । यदि आत्माका उपास्यत्व अभिप्रेत न होता तो " अकृत्स्नो ह्यषोऽत एकैकेन भवति " " इस वाक्यसे प्राणनादि एक - एक क्रियासे विशिष्ट आत्माको असम्पूर्ण बतलाना व्यर्थं होता । अतः यह सिद्ध होता है कि जो एक - एक क्रियासे विशिष्ट नहीं है, वह आत्मा तो पूर्ण होनेके कारण उपास्य ही है । तथा ' आत्मा ' शब्दका जो उसके आगे ' इति ' शब्द लगाकर प्रयोग किया गया है वह आत्मतत्त्वको परमार्थतः: आत्मशब्द और आत्म-प्रत्ययका अविषय सूचित करनेके लिये है । नहीं तो श्रुति ' आत्मा-नमुपासीत ' - आत्माकी उपासना करे - ऐसा ही कहती । ऐसा कहने-पर आत्मामें स्वतः ही आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययकी विषयता अनुमोदित हो जाती और ऐसा होना " यह नहीं है, यह नहीं है ", " अरे मैत्रेयि! विज्ञाताको किससे जाने ", " वह [ स्वयं ] अविज्ञात [ किंतु दूसरोंका ] विज्ञाता १. अतः एक - एक क्रियासे विशिष्ट होनेके कारण यह असम्पूर्ण ही होता है ।

पृष्ठ 238

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२३२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा । सह " ( तै ० उ ० २ ॥ ४ । १ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । यत्तु श्रात्मा -नमेव लोकमुपासीत ” ( १ । ४ । १५ ) इति तदनात्मोपासनप्रस -ङ्गनिवृत्तिपरत्वान्न वाक्यान्तरम् । निर्ज्ञातत्वसामान्यादात्मा कथमात्मैवो- ज्ञातव्योऽनात्मा च । पास्यः तत्र कस्मादात्मो-पासने एव यत्न आस्थीयते " श्रात्मेत्येवोपासीत " इति नेतर-विज्ञान इति १ अत्रोच्यते - तदेतदेव प्रकृतं पदनीयं गमनीयं नान्यत् । अस्य सर्वस्येति निर्धारणार्था षष्ठी । अस्मिन्सर्वस्मिन्नित्यर्थः । यदय-मात्मा यदेतदात्मतत्त्वम् । किं न विज्ञातव्यमेवान्यत्? नः किं तहिं? ज्ञातव्यत्वेऽपि न पृथग्ज्ञानान्तरमपेक्षत आत्म-ज्ञानात् । कस्मात्? अनेनात्मना ब्राह है " " जहाँसे वाणी उसे न पाकर मन के सहित लौट आती है " इत्यादि ज्ञात श्रुतियोंके अनुसार इष्ट नहीं है । जात चेद और " आत्मारूप ही लोक उपासना करे ” ऐसी जो श्रुति है इति वह अनात्मोपासन के प्रसंगी निवृत्ति करनेवाली होनेसे कोई भिन्न प्रकारका वाक्य नहीं है । ग्रन पूर्व ० - किंतु पूर्णतया ज्ञात न पद होनेमें समान होनेके कारण तो आत्मा और अनात्मा दोनों ही ल ज्ञातव्य हैं । फिर इनमें से “ आत्मेत्ये-वोपासीत " इस वाक्यके अनुसार द आत्मोपासना में ही यत्न करने की आस्था क्यों की जाय, अनात्मो-पासनामें क्यों नहीं? सिद्धान्ती - इसपर हमारा कथन + है कि इन सबमें यह प्रकृत आत्मा ही पदनीय - गन्तव्य है, अन्य ( अनात्मा ) नहीं । ' अस्य सर्वस्य ’ इन पदोंमें निश्चयार्थिका षष्ठी है; इसका तात्पर्य ' अस्मिन् सर्वस्मिन् ' ( इस सबमें ) ऐसा है । ' यदयमात्मा ' अर्थात् यह जो आत्मतत्त्व है [ वह सबमें गन्तव्य - ज्ञातव्य है ] । तो क्या अन्य ज्ञातव्य ही नहीं है? ऐसी बात नहीं है । तो क्या है? - ज्ञातव्य होनेपर भी उसे आत्मज्ञानसे भिन्न किस ज्ञानान्तर की अपेक्षा नहीं है । क्यों नहीं है?

पृष्ठ 239

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[ अध्याय १ उसे न पाकर T ती है " इत्यादि इष्ट नहीं है । ही लोककी जो श्रुति है प्रसंग होनेसे कोई न्य नहीं है । तिया ज्ञात न के कारण तो त्मा दोनों ही में से " आत्मेत्ये-क्य के अनुसार यत्न करने की य, अनात्मो-? र हमारा कथन - प्रकृत आत्मा व्य है, अन्य ' अस्य सर्वस्य ' थिका षष्ठी है; स्मिन् सर्वस्मिन् ' । ' यदयमात्मा ' मतत्त्व है [ वह व्य है ] । ज्ञातव्य ही नहीं हीं है । तो क्या नेपर भी उसे किस ज्ञानान्तर की क्यों नहीं है? ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३ ज्ञातेन हि यस्मादेतत्सर्वमनात्म- | क्योंकि इस आत्माके जान लेनेपर जातम् अन्यद्यत्तत्सर्वं समस्तं ही अन्य जो कुछ अनात्मजात है उस वेद जानाति । नन्न्यज्ञानेनान्यन्न ज्ञायत इति । अस्य परिहारं दुन्दुस्यादि-ग्रन्थेन वक्ष्यामः । कथं पुनरेतत् पदनीयमित्युच्यते - यथा ह वै लोके पदेन, गवादिखुराङ्कितो देश: पदमित्युच्यते तेन पदेन, नष्टं विवित्सितं पशुं पदेनान्वेष-माणोऽनुविन्देल्लमेत । एवमात्मनि लब्धे सर्वमनुलभत इत्यर्थः । नन्वात्मनि ज्ञाते सर्वमन्य-ज्ज्ञायत इति ज्ञाने प्रकृते, कथं लाभोऽप्रकृत उच्यत इति १ न; ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वस्य सभीको पुरुष जान लेता है । पूर्व ० - किंतु अन्य पदार्थंके ज्ञानसे दूसरेका ज्ञान तो हुआ नहीं करता । सिद्धान्ती - इसका निराकरण हम दुन्दुभ्यादि ग्रन्थसे करेंगे । किंतु यह आत्मा पदनीय ( गमनीय ) किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है - जिस प्रकार लोकमें पदसे— गौ आदिके खुरसे अङ्कित देश ‘ पद ’ कहा जाता है, उस पदसे. - उस पदके द्वारा खोजनेवाला पुरुष जिसको पाना अभीष्ट है ऐसे खोये हुए पशुको पा लेता है उसी प्रकार आत्माके प्राप्त हो जानेपर पुरुष सभी पा लेता है - ऐसा इसका तात्पर्य है । पूर्व ० - किंतु ‘ आत्माको जानने-पर अन्य सबको जान लेता है ' इस प्रकार यहाँ ज्ञानका प्रसंग होनेपर [ ' अनुविन्देत् ' इस पदसे ] जिसका कोई प्रसंग नहीं है उस लाभकी बात क्यों कही जाती है? सिद्धान्ती - ऐसो बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान और लाभ इनकी ज्ञानलाभयोरे- त्रित्रक्षितत्वात् 1 एकार्थता ही विवक्षित है । अज्ञान ही कार्थत्वम् श्रात्मनो ह्यलाभोऽज्ञा- | आत्माका अलाभ है, अतः ज्ञान ही

पृष्ठ 240

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२३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय नमेव, तस्माज्ज्ञानमेवात्मनो लाभः, नानात्मलाभवदप्राप्तप्राप्ति-लक्षण आत्मलाभः, लब्धलब्ध व्ययोर्भेदाभावात् । यत्र ह्यात्म -नोऽनात्मा लब्धा, लब्धव्यो-S नात्मा । स चाप्राप्त उत्पाद्यादि -क्रियाव्यवहितः कारकविशेषो पादानेन क्रियाविशेषमुत्पाद्य लब्धव्यः । सत्व प्राप्तप्राप्तिलक्षणोऽनित्यः, मिथ्याज्ञानजनितकामक्रियाप्रभव-त्वात्, स्वप्ने पुत्रादिलाभवत् । अयं तु तद्विपरीत आत्मा । आत्म-त्वादेव नोत्पाद्यादिक्रियाव्यव -हितः । नित्यलब्धस्वरूपत्वेऽपि सत्यविद्यामात्रं व्यवधानम् । यथा गृह्यमाणाया अपि शुक्तिकाया विपर्ययेण रजताभासाया अग्रहणं विपरीतज्ञानव्यवधानमात्रम्, तथा ग्रहणं ज्ञानमात्रमेव, विपरीतज्ञा-१ ब्राह II | आत्माका लाभ है, अनात्मलाभके नव समान आत्मलाभ अप्राप्तकी प्राप्ति | होना नहीं है, क्योंकि यहाँ लाभ एव करनेवाले और लब्ध होनेवाली मा वस्तुमें कोई भेद नहीं है । जहाँ अना-त्मा आत्माका लब्धव्य होता है वहाँ तद ही आत्मा उपलब्ध करनेवाला और अनात्मा उपलब्ध होने योग्य होता क है । वह अप्राप्त अर्थात् उत्पाद्यादि क्रियाओंसे व्यवहित हो स्म कारकविशेषके उपादानसे क्रिया-विशेषको उत्पन्न करके उसे प्राप्त अ करना होता है । रा वह अनात्मलाभ तो मिथ्या ज्ञान-जनित काम और क्रियासे उत्पन्न वि होनेवाला होनेके कारण स्वप्नमें चि पुत्रादिलाभके समान अप्राप्तप्राप्तिरूप और अनित्य होता है; किंतु यह स । आत्मा तो उससे विपरीत स्वभाव-वाला है । आत्मा ही होनेके कारण यह उत्पाद्यादि क्रियासे व्यवहित नहीं है । नित्यप्राप्तस्वरूप होनेपर भी f अविद्या ही उसका व्यवधान है । जिस प्रकार विपरीत ज्ञानवश रजत-रूपसे भासनेवाली गृह्यमाण शुक्ति-का ( सीप ) का अग्रहण विपरीत ज्ञानरूप व्यवधानवाला ही है तथा ज्ञान ही उसका ग्रहण है, क्योंकि वह ज्ञान विपरीत ज्ञानरूप