बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 241–250
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250
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[ अध्याय१ IIIII है, अनात्मलाभके अप्राप्तकी प्राप्ति योंकि यहाँ लाभ लब्ध होनेवाली हीं है । जहाँ अना धन्य होता है वहाँ करनेवाला और - होने योग्य होता अर्थात् उत्पाद्यादि होता है पादानसे क्रिया-करके उसे प्राप्त न तो मिथ्या ज्ञान-क्रिया से उत्पन्न कारण स्वप्नमें न अप्राप्तप्राप्तिरूप है; किंतु यह विपरीत स्वभाव-ही होने के कारण व्यवहित नहीं होनेपर भी व्यवधान है । न ज्ञानवश रजत-गृह्यमाण शुक्ति-अग्रहण विपरीत वाला ही है सका ग्रहण है, वपरीत ज्ञानरूप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५ नव्यवधानापोहार्थत्वाज्ज्ञानस्य । । व्यवधानकी निवृत्ति करनेवाला है । एवमिहाप्यात्मनोऽलाभोऽविद्या-मात्रव्यवधानम् । तस्माद्विद्यया । तदपोहनमात्रमेव लाभो नान्यः कदाचिदप्युपपद्यते । तस्मादा-त्मलाभे ज्ञानादर्थान्तरसाधनस्य आनर्थक्यं वक्ष्यामः । तस्मान्नि-राशङ्कमेव ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वं विवक्षन्नाह – ज्ञानं प्रकृत्य, अनु-विन्देदिति । विन्दतेर्लाभार्थ-त्वात् । गुणविज्ञानफलमिदमुच्यते-यथायमात्मा नाम-उपासनफलम् इसी प्रकार यहाँ भी आत्माका अलाभ अविद्यामात्र व्यवधानवाला ही है । अतः विद्यासे उसे दूर कर देना ही आत्माका लाभ करना है, इसके सिवा और किसी प्रकारका आत्मलाभ होना कभी सम्भव नहीं है । इसीसे आत्मलाभमें हमने ज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधन की व्यर्थंता बतलायी है । अत: ' ज्ञान ' और ' लाभ ' इन दोनों की एकार्थतामें कुछ भी शङ्का नहीं है - यह बतलानेकी इच्छासे ही श्रुतिने ज्ञानका प्रकरण उठाकर ' अनुविन्देत् ' ( लाभ करता है ) ऐसा कहा है, क्योंकि [ तुदादि--गणपठित लृकारानुबन्धी ] ' विद् ' धातुका अर्थ लाभ है । इस गुणविज्ञानका यह फल | बतलाया जाता है - जिस प्रकार यह आत्मा नाम - रूपके अनुप्रवेशसे रूपानुप्रवेशेन रूपा - ख्यातिको तथा आत्मा इत्यादि नाम--तिंगत आत्मेत्यादिनामरूपाभ्यां प्राणादिसंहतिं च श्लोकं प्राप्तवा-नित्येवं यो वेद, स कीर्ति ख्यातिं श्लोकं च सङ्घातमिष्टैः सह विन्दते लभते । यद्वा यथोक्तं वस्तु यो वेद मुमुक्षूणामपेक्षितं रूपोंके कारण प्राणादिसंघातरूप
श्लोक ( इष्टजनोंके समागम ) को
प्राप्त हुआ है उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह ख्याति - कीर्ति और
श्लोक- इष्टजनों के साथ समागम लाभ
करता है । अथवा जो उपर्युक्त वस्तु-। को जानता है वह मुमुक्षुओंके अपेक्षित
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२३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ कीर्तिशब्दित मैक्यज्ञानं तत्फलं
श्लोकशब्दितां मुक्तिमाप्नोतीति
मुख्यमेव फलम् ॥ ७ ॥
ब्राह । ' कीर्ति ' शब्दसे कहे जानेवाले ऐक्य-ज्ञान और उसके फल ' श्लोक ' प्रि शब्दसे कही जानेवाली मुक्तिको प्राप्त करता है । अर्थात् उसे आत्म- नि ज्ञानका मुख्य फल ही प्राप्त हो वि जाता है ॥ ७ ॥
स्म wwwww-तस निरतिशय प्रियरूपसे आत्माकी उपासना कुतश्वात्मतत्त्वमेव ज्ञेयमना- किंतु और सबकी उपेक्षा करके तर आत्मतत्त्व ही क्यों जानने योग्य है? हत्यान्यदित्याह - इसपर श्रुति कहती है-पि तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयो ऽन्यस्मात्सर्वस्मा- स दन्तरतरं यदद्यमात्मा । स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात्प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव I प्रियमुपासीत । स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति ॥ ८ ॥ नि
वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्रिय है और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है; क्योंकि यह आत्मा उनकी अपेक्षा स अन्तरतर है । वह जो आत्मप्रियदर्शी है यदि आत्मासे भिन्न ( अनात्मा ) को प्रिय कहनेवाले पुरुषसे कहे कि ' तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा ' तो वैसा त ही हो जायगा, क्योंकि वह समर्थ ही उपासना करे । जो आत्मा - रूप प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता तदेतदात्मतत्वं प्रेयः प्रियतरं पुत्रात् । पुत्रो हि लोके प्रियः होता है । अतः आत्मा - रूप प्रियकी इ प्रियकी ही उपासना करता है उसका ह ॥ ८ ॥
। वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे प्रेय-प्रियतर है । लोकमें पुत्र प्रियरूपसे
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[ अध्याय१ N जानेवाले ऐक्य-के फल ' श्लोक ' निवाली मुक्तिको नर्थात् उसे आत्म-कल ही प्राप्त हो ना की उपेक्षा करके - जानने योग्य है? है-स्मात्सर्वस्मा-प्रियं ब्रुवाणं वादात्मानमेव स्तेन हास्य धिक प्रिय है और - उनकी अपेक्षा न्न ( अनात्मा ) जायगा ' तो वैसा त्मा - रूप प्रियकी करता है उसका त्त्व पुत्रसे प्रेय-पुत्र प्रियरूपसे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७ प्रसिद्धस्तस्मादपि प्रियतरमिति । निरतिशयप्रियत्वं दर्शयति । तथा वित्ताद्धिरण्यरत्नादेः, तथा अन्य-स्माद्यद्यन्लोके प्रियत्वेन प्रसिद्धं तस्मात्सर्वस्मादित्यर्थः । तत्कस्मादात्मतत्त्वमेव प्रिय-तरं न प्राणादि १ इत्युच्यते-प्रसिद्ध है, आत्मा उससे भी प्रियतर है, ऐसा कहकर श्रुति उसका निरतिशय प्रियत्व प्रदर्शित करती है । तथा वह धन यानी सुवर्णं-रत्नादिसे और लोकमें जो प्रियरूप--से प्रसिद्ध है उस और सबसे भी प्रियतर है । किंतु यह क्या बात है कि आत्मतत्त्व ही प्रियतर है, प्राणादि नहीं हैं? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते अन्तरतरं बाह्यात्पुत्र वित्तादेः प्राण- हैं - यह अन्तरतर ( अत्यन्त समीप-पिण्डसमुदायो ह्यन्तरोऽभ्यन्तरः सन्निकृष्ट आत्मनः । तस्मादद्भ्य-न्तरादन्तरतरं यदयमात्मा यदे-तदात्मतत्त्वम् । यो हि लोके निरतिशयप्रियः स सर्वप्रयत्नेन लब्धव्यो भवति । तथायमात्मा सर्वलौकिक प्रियेभ्यः प्रियतमः । तस्मात्तल्लाभे महान्यत्न आस्थेय इत्यर्थः, कर्त्तव्यताप्राप्तमप्यन्य-प्रियलाभे यत्नमुज्झित्वा । कस्मात्पुनः श्रात्मानात्मप्रिय-योरन्यतरप्रियहानेन इतरप्रियो वर्ती ) है । पुत्र धन आदि बाह्य पदार्थों की अपेक्षा प्राण और पिण्ड-समुदाय अन्तर — अभ्यन्तर अर्थात् आत्माका समीपवर्ती है और उस अन्तरसे भी अन्तरतर यह जो आत्मा अर्थात् आत्मतत्त्व है वह है । लोकमें जो सबसे बढ़कर प्रिय होता है वह सर्वप्रयत्नद्वारा प्राप्तव्य होता है, तथा यह आत्मा समस्त लौकिक प्रिय पदार्थोंसे प्रियतम है; अतः अभिप्राय यह है कि अन्य प्रिय पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये यदि कोई यत्न अवश्यकर्तव्यतारूपसे प्राप्त हो तो भी उसे छोड़कर आत्माकी प्राप्तिके लिये ही महान् यत्न करना चाहिये | इसका क्या कारण है कि यदि आत्मा और अनात्मा- इन दो प्रिय | पदार्थोंमेंसे किसी एक प्रिय पदार्थका
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२३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म पादानप्राप्तौ आत्मप्रियोपादानेनै- । वेतरहानं क्रियते न विपर्ययः १ इत्युच्यते-- स यः कश्चिदन्यमना -त्मविशेषं पुत्रादिकं प्रियतर--मात्मनः सकाशाद् ब्रुवाणं ब्रूया--दात्मप्रियवादी । किम्? प्रियं - तवाभिमतं पुत्रादिलक्षणं रोत्स्य-- त्यावरणं प्राणसंरोधं प्राप्स्यति । बिनक्ष्यतीति । स कस्मादेवं ' ब्रवीति १ यस्मादीश्वरः समर्थः पर्याप्तोऽसावेवं वक्तुं ह यस्मात्त--स्मात्तथैव स्याद्यत्तेनोक्तं प्राण-संरोधं प्राप्स्यति । यथाभूतवादी हि सः, तस्मात्स ईश्वरो वक्तुम् । ईश्वरशब्दः क्षिप्रवाचीति केचित् । भवेद्यदि प्रसिद्धिः स्यात् । तस्मादुज्झित्वान्यत्प्रियमात्मान-मेव प्रियमुपासीत । 2 त्याग करनेपर ही दूसरे प्रिय पदा- स थंकी प्राप्ति होती हो तो आत्मा-रूप प्रियको ग्रहण करके अनात्माक यात ही त्याग किया जाता है, इसके प्रति विपरीत नहीं किया जाता? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं - वह जो प्रिय आत्मप्रियवादी है यदि किसी दूसरे यानी पुत्रादि अनात्म विशेषको चिन आत्माकी अपेक्षा प्रियतर बतलाने-प्रमा वालेसे कहे – क्या कहे? यही कि नि ' तेरा प्रिय यानी पुत्रादिरूप अभि-मत पदार्थं ' रोत्स्यति ' - आवरण विद यानी प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा अर्थात् नष्ट हो जायगा । ' ऐसा वह चाभ क्यों कहेगा? क्योंकि वह ऐसा त्यथ कहने में ईश्वर अर्थात् समर्थ— वा पर्याप्त है; क्योंकि ऐसा है, इसलिये वैसा ही होगा । यानी उसने जैसा अत्य कहा है वह प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा । क्योंकि वह यथार्थवादी है, इसलिये ऐसा कहने में समर्थ है । किन्हीं का मत है कि ' ईश्वर ' शब्द क्षिप्र ( शीघ्र ) इस अर्थमें है । किंतु यदि ऐसी प्रसिद्धि होती तो यह प्रत्य अर्थ हो सकता था । अतः अन्य प्रिय इस पदार्थोंको छोड़कर आत्मा - रूप प्रिय- क्षित की ही उपासना करनी चाहिये ।
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[ अध्याय१ दूसरे प्रिय पदा-हो तो आत्मा-करके अनात्माका जाता है, इसके या जाता? ऐसा हते हैं - वह जो यदि किसी दूसरे अनात्मविशेषको प्रियतर बतलाने-कहे? यही कि पुत्रादिरूप अभि-स्यति ' - आवरण को प्राप्त हो जायगा यगा । ' ऐसा वह क्योंकि वह ऐसा अर्थात् समर्थ-ऐसा है, इसलिये यानी उसने जैसा गसंरोधको प्राप्त हो क वह यथार्थवादी कहने में समर्थ है । त है कि ' ईश्वर ' च ) इस अर्थ में है । सिद्धि होती तो यह । अतः अन्य प्रिय कर आत्मा - रूप प्रिय-करनी चाहिये । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ सययात्मानमेव प्रियमुपास्ते, आत्मैव प्रियो नान्योऽस्तीति प्रतिपद्यतेऽन्यल्लौकिकं प्रियमध्य-प्रियमेवेति निश्चित्य उपास्ते चिन्तयति, न हास्यैवंविदः प्रियं श्रमायुकं प्रमरणशीलं भवति । नित्यानुवादमात्रमेतत्, आत्म-विदो s न्यस्य प्रियस्याप्रियस्य चाभावात् । आत्मप्रियग्रहणस्तु -त्यर्थं वा प्रियगुणफलविधानार्थं
वा मन्दात्मदर्शिनः । ताच्छील्य-प्रत्ययोपादानात् ॥ ८ ॥
२३ ९ जो ' पुरुष आत्मा - रूप प्रियकी ही • उपासना करता है अर्थात् आत्मा ही प्रिय है, और कोई पदार्थं नहीं— ऐसा जानता है. दूसरे लौकिक पदार्थ प्रिय होनेपर भी अप्रिय ही हैं- ऐसा निश्चय करके उपासना यानी चिन्तन करता है उस इस प्रकार उपासना करनेवालेका प्रिय प्रमायुक— प्रकृष्टतया मरणशील नहीं होता । आत्मवेत्ताकी दृष्टिमें तो किसी अन्य प्रिय या अप्रियकी सत्ता ही नहीं है, इसलिये यह नित्य वस्तुका अनुवादमात्र है । अथवा यह कथन आत्मप्रियग्रहणकी स्तुतिके लिये है । या जो अदृढ़ आत्मज्ञानी है उसके लिये प्रियगुणविशिष्ट आत्माकी उपासनाका फल बतलानेके लिये है, क्योंकि ' प्रमायुक ’ इस पदमें ‘ उक ’ यह ताच्छील्यंप्रत्यय ग्रहण किया गया है ॥ ८ ॥
ब्रह्मके सर्वरूप होनेके विषयमें प्रश्न सूत्रता ब्रह्मविद्या ' आत्मेत्ये- जिसके लिये यह सारी उपनिषद् है उस ब्रह्मविद्याका श्रुतिने ‘ आत्मेत्ये-१. यह उसका शील यानी स्वभाव है -- इस अर्थ में व्याकरणशास्त्र में ' उकञ् ’ प्रत्ययका विधान किया है । पदार्थ अपने स्वभावको सर्वथा नहीं त्याग सकता । ' इसलिये ' प्रमायुक ' नहीं होता । इस कथनसे प्राणादिका आत्यन्तिक अमरण विव-क्षित नहीं है; केवल यही समझना चाहिये कि वे दीर्घजीवी होते हैं ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ २४० ब्रा वोपासीत ' इस वाक्यसे सूत्ररूपसे ' वोपासीत ' इति यदर्थोपनिषत्कु- वर्णन किया है । उस इस सा त्स्नापि । तस्यैतस्य सूत्रस्य व्या- सूत्र की व्याख्या करनेकी इच्छावाली श्रुति ल चिख्यासुः प्रयोजनाभिधित्सयो- अब उसका प्रयोजन बतलानेकी पि पो.ज्जिघांसति- इच्छासे उपोद्घात करना चाहती है तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते । किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवदिति ॥ ६ ॥
स [ ब्राह्मणोंने ] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य ' हम सर्वं हो स जायँगे ' ऐसा मानते हैं; [ सो ] उस हो गया? ॥ ६ ॥
तदिति वक्ष्यमाणमनन्तर-वाक्येऽवद्योत्यं वस्त्वाहुः । ब्राह्मणा ब्रह्म विविदिषवो जन्मजरामरण-प्रबन्धचक्रभ्रमणकृतायासदुःखो-ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्वं ७ म ' तत् ' इस पदसे आगे कही जानेवाली तथा बिना किसी व्यव- प धान के ही अग्रिम वाक्यसे प्रकाश-नीय वस्तुका ग्रहण होता है उसके विषयमें ब्राह्मणोंने कहा । ब्राह्मण— ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाले अर्थात् जन्म, जरा और मरण इनके प्रवाह-में चक्र के समान निरन्तर भ्रमणसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख ही जिसमें जल है उस अपार संसार-दकापार महोदधिप्लवभूतं गुरु- महोदधिको पार करनेके लिये नौकारूप जो गुरु हैं उनके पास धर्मा- | आकर उसके तीर ( ब्रह्म ) पर मासाद्य तत्तीरमुत्तितीर्षवो इच्छावाले यानी धर्म और उतरनेकी अधर्म ही जिसके साधन और फल धर्मसाधनतत्फल लक्षणात् साध्य- हूँ उस साध्य - साधनरूप संसारसे
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[ अध्याय१ वाक्यसे सूत्ररूपसे 1. उस इस सूत्रकी 7 इच्छावाली श्रुति योजन बतलानेकी करना चाहती है व्यन्तो मनुष्या भवदिति ॥ ६ ॥
मनुष्य ' हम सर्व हो ना जिससे वह सर्वं पदसे आगे कही बिना किसी व्यव-ग्रम वाक्यसे प्रकाश-ग्रहण होता है उसके ोंने कहा । ब्राह्मण-की इच्छावाले अर्थात् र मरण इनके प्रवाह-न निरन्तर भ्रमणसे रिश्रमरूप दुःख ही उस अपार संसार-पार करनेके लिये गुरु हैं उनके पास तीर ( ब्रह्म ) पर छावाले यानी धर्म और सके साधन और फल संसार से य - साधनरूप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ साधनरूपान्निर्विण्णाः तद्वि- । लक्षणनित्यनिरतिशयश्रेयः प्रति-पित्सवः । किमाहुरित्याह — यद्ब्रह्मविद्य-या ब्रह्म , परमात्मा तद्यया वेद्यते सा ब्रह्मविद्या तया ब्रह्मविद्यया सर्वं निरवशेषं भविष्यन्तो भवि-ष्याम इत्येवं मनुष्या यन्मन्यन्ते । मनुष्यग्रहणं विशेषतोऽधिकारज्ञा-पनार्थम् । मनुष्या एव हि विशे-षतोऽभ्युदय निःश्रेयससाधनेऽधि -कृता इत्यभिप्रायः । यथा कर्मविषये फलप्राप्तिं ध्रुवां कर्मम्यो मन्यन्ते, तथा ब्रह्मविद्याया सर्वात्मभावफल-प्राप्तिं ध्रुवमेव मन्यन्ते । वेद-प्रामाण्यस्योभयत्राविशेषात् । तत्र विप्रतिषिद्धं वस्तु लक्ष्यतेऽतः पृच्छामः - किमु तद्ब्रह्म यस्य वृ ० उ ० १६-विरक्त और उससे विलक्षण स्व-भाववाले नित्य - निरतिशय श्रेयको जानने की इच्छावाले उन ब्राह्मणों-ने कहा । क्या कहा? सो श्रुति बतलाती है – ' यद्ब्रह्मविद्यया ' – - ब्रह्म परमा-त्माको कहते हैं, वह जिससे जाना जाता है वह ब्रह्मविद्या है; उस ब्रह्मविद्यासे जो मनुष्य ' हम सर्व यानी अशेष हो जायेंगे ' ऐसा मानते हैं [ उसके विषयमें पूछा ] । यहाँ ' मनुष्य ' पदका ग्रहण उनका विशेषरूपसे ब्रह्मविद्यामें अधिकार सूचित करनेके लिये है । तात्पर्यं यह है कि अभ्युदय और निःश्रेयस-के साधनमें विशेषतः मनुष्यों का ही अधिकार है । लोग जिस प्रकार कर्मविषय में कर्मोंसे होनेवाली जो फलप्राप्ति है उसे निश्चित मानते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यासे सर्वात्मभावरूप फलकी प्राप्ति भी निश्चित ही मानते हैं, क्योंकि वेदको प्रमाणता दोनोंहीके विषयमें समान है । किंतु [ ब्रह्मज्ञानसे मोक्ष होता है ] यह बात विपरीत - सी जान पड़ती है, इसलिये हम पूछते हैं कि वह ब्रह्म क्या है? जिसके
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२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विज्ञानात्सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या । | मन्यन्ते १ तत्किमवेद्यस्माद्विज्ञा-नात्तद्ब्रह्म सर्वमभवत् १ ब्रह्म च सर्वमिति श्रूयते । तद्यद्यविज्ञाय किञ्चित्सर्वमभवत्त-थान्येषामप्यस्तु, किं ब्रह्मविद्यया? अथ विज्ञाय सर्वमभवत्, विज्ञान-साध्यत्वात्कर्मफलेन तुल्यमेवेत्य-नित्यत्वप्रसङ्गः सर्वभावस्य ब्रह्म-विद्याफलस्य । अनवस्थादोषथ-तदप्यन्यद्विज्ञाय सर्वमभवत्ततः पूर्वमप्यन्य द्विज्ञायेति ॥ न तावद-विज्ञाय सर्वमभवत्, शास्त्रार्थ-बैरूप्यदोषात् । फलानित्यत्व -दोषस्तर्हि नैकोऽपि दोषोऽर्थ -वशेषोपपत्तेः ॥ ९ ॥
ब्रा विज्ञानसे मनुष्य ' सर्वरूप हो जायेंगे । ऐसा मानते हैं और उसने क्या ब्रह जाना, जिस विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । स ब्रह्म सर्वरूप है — यह तो सुना ह्न ही जाता है । वह यदि कुछ भी न जानकर ही सर्वरूप हुआ है तो प्राA दूसरोंके लिये भी ऐसी ही बात होनी चाहिये, फिर ब्रह्मविद्यासे क्या लाभ है? और यदि वह जानकर सर्वंरूप हुआ है तो विज्ञानसाध्य होने के कारण उसकी सर्वात्मता कर्मफलके II समान ही है – इससे ब्रह्मविद्याके त फलभूत सर्वात्मत्वकी अनित्यताका प्रसंग आता है तथा वह अपनेसे ह भिन्न पदार्थको जानकर सर्व हुआ और इससे पहले भी किसी अन्यको जानकर सर्व हुआ था — इस प्रकार अनवस्था दोष प्राप्त होता है । किंतु वह न जानकर तो सर्वं हुआ नहीं, क्योंकि इससे शास्त्रकी व्यर्थताका दोष आता है । तो फिर फलकी अनित्यताका दोष रहा? नहीं, इससे उ विशेष प्रयोजन सम्भव होनेके कारण एक भी दोष नहीं होगा ॥ ६ ॥
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[ अध्याय १ सर्वरूप हो जायेंगे ' और उसने क्या ज्ञानसे वह ब्रह्म है - यह तो सुना यदि कुछ भी न रूप हुआ है तो ऐसी ही बात होनी विद्यासे क्या लाभ जानकर सर्वरूप नसाध्य होने के त्मता कर्मफलके -ससे ब्रह्मविद्याके की अनित्यताका तथा वह अपनेसे नकर सर्व हुआ नी किसी अन्यको था — इस प्रकार स होता है । किंतु सर्व हुआ नहीं, की व्यर्थताका तो फिर फलक रहा? नहीं, इससे -भव होनेके कारण होगा ॥ ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३ ब्रह्मने क्या जाना? - इसका उत्तर यदि किमपि विज्ञायैव तद्द्ब्रह्म सर्वमभवत्पृच्छामः – किसु तन-लावेत् १ यस्मात्तत्सर्वमभवदिति । एवं चोदिते सर्वदोषानागन्धितं प्रतिवचनमाह-2 और उस प्रकार जाननेका फल-यदि वह ब्रह्म कुछ जानकर ही सर्व हुआ तो हम पूछते हैं-' उस ब्रह्मने क्या जाना? जिससे वह सर्व हुआ । ' ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति, जिसमें किसी भी प्रकारके दोषकी गन्ध नहीं है, ऐसा उत्तर देती है-ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत्तद्यो यो देवानां प्रत्य-बुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धै-तत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदे ऽहं मनुरभवँ सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद ँ सर्व भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषा ँस भवति । अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽ सावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेव स देवा-नाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्ज्युरेवमे-कैकः पुरुषो देवान्भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने-S प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेत-न्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
पहले यह ब्रह्म ही था; उसने अपनेको ही जाना कि " मैं ब्रह्म हूँ ' । अतः वह सर्वं हो गया । उसे देवोंमेंसे जिस - जिसने जाना वही तद्रूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे भी [ जिसने उसे जाना वह तद्रूप हो गया ] । उसे आत्मारूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना - ' ' मैं मनु हुआ और सूर्य भी ' उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि ' मैं ब्रह्म हूँ ', वह यह सर्वं हो जाता है । उसके पराभवमें
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २४४ ब्राह देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । और जो अन्य देवताकी ‘ यह अन्य है और में अन्य हूँ ' इस प्रकार ब्रह उपासना करता है वह नहीं जानता । जैसे पशु होता है वैसे ही वह ब्रह देवताओंका पशु है । जैसे लोकमें बहुत - से पशु मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक - एक मनुष्य देवताओं का पालन करता है । एक पशुका दप हो हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतों का हरण होनेपर कम तो कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य [ ब्रह्मात्मतत्त्वको ] जानें ॥ १० ॥
ब्रह्मापरम्, सर्वभावस्य साध्य-ब्रह्मशब्देन कि- त्वोपपत्तेः । न हि । मभिप्रेतमिति परस्य ब्रह्मणः सर्व-विचार्यते भावापत्तिर्विज्ञान-साध्या | विज्ञानसाध्यां च सर्व-भावापत्तिमाह — ' तस्मात्तत्सर्वम-भवत् ' इति । तस्माद्ब्रह्म वा इदमग्र आसीदित्यपरं ब्रह्मेह भवितुमर्हति । मनुष्याधिकाराद्वा तद्भावी ब्राह्मणः स्यात् । ' सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ' इति हि मनुष्याः प्रकृताः, तेषां चाभ्युदयनिःश्रेयस-साधमे विशेषतोऽधिकार इत्यु-क्तम्, न परस्य ब्रह्मणो नाप्यपरस्य प्रजापतेः । अतो द्वैतैकत्वापर-वि यहाँ ' ब्रह्म ' शब्दसे अपरब्रह्म समझना चाहिये; क्योंकि उसीका ऋ सर्वरूप होना विज्ञान - साध्य हो सकता शब है | परब्रह्म का सर्वभावको प्राप्त होना विज्ञानसाध्य नहीं है; और ' इसीसे इ वह सर्वरूप हो गया ' इस वाक्यसे श्रुति सर्वभावप्राप्तिको विज्ञानसाध्य सव बतलाती है । अत: ' ब्रह्म वा इद-मग्र आसीत् ' इस वाक्य में ' ब्रह्म ' तथ पद अपर ब्रह्मका वाचक होना चाहिये । पुर अथवा यहाँ मनुष्यका अधि-करण होनेसे ' ब्रह्म ' शब्दसे ब्रह्म-रूपताको प्राप्त होनेवाला ब्राह्मण समझा जा सकता है । ‘ सर्वं भवि- दो ष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ' इस वाक्य-से यहाँ मनुष्योंका प्रसंग है, क्योंकि प उन्हींका अभ्युदय और निःश्रेयसके साधन में विशेषरूपसे अधिकार वा है - ऐसा ऊपर कहा गया है; पर-ब्रह्म या अपरब्रह्म प्रजापतिका यह नहीं । अतः कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप