बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 251–260
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260
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[ अध्याय १ हो जाता है । हूँ ' इस प्रकार है वैसे ही वह पालन करते हैं, है । एक पशुका हरण होनेपर हीं है कि मनुष्य दसे अपरब्रह्म क्योंकि उसीका - साध्य हो सकता को प्राप्त होना है और ' इसीसे ' इस वाक्य को विज्ञानसाध्य ' ब्रह्म वा इद-वाक्यमें ' ब्रह्म ' वाचक होना मनुष्यका अधि-' शब्द से ब्रह्म-नेवाला ब्राह्मण है । ' सर्वं भवि-चन्ते ' इस वाक्य-प्रसंग है, क्योंकि नर निःश्रेयसके पसे अधिकार हा गया है; पर-झ प्रजापतिका हित द्वैतैकत्वरूप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५ ब्रह्मविद्यया कर्मसहितया अपर- । ब्रह्मभावमुपसम्पन्नो भोज्या-दपावृत्तः सर्वप्राप्त्योच्छिन्नकाम-कर्मबन्धनः परब्रह्मभावी ब्रह्म-विद्याहेतोर्ब्रह्मेत्यभिधीयते । दृष्टश्च लोके भाविनीं वृत्तिमाश्रित्य शब्दप्रयोगः - यथा'ओदनं पचति ' इति, शास्त्रे च - ' परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणाम् ' इत्यादि, तथेति केचित् - — ब्रह्म ब्रह्मभावी पुरुषो ब्राह्मणः - इति व्याचक्षते । तन्न, सर्वभावापत्तेरनित्यत्व-दोषात् । न हि सोऽस्ति लोके परमार्थतो यो निमित्तवशाद्भावा-अपर ब्रह्मविद्याके द्वारा अपरब्रह्म-भावको प्राप्त हुआ, हिरण्यगर्भ-सम्बन्धी भोगोंसे विरक्त एवं सब प्रकारके कर्मफल प्राप्त होनेके कारण जिसका काम और कर्मरूप बन्धन नष्ट हो गया है वह परब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला पुरुष ब्रह्मविद्याके कारण ' ब्रह्म ' – इस शब्दसे कहा गया है । लोकमें भी भाविनी वृत्तिको आश्रित करके शब्दका प्रयोग होता देखा गया है; जैसे ' भात पकाता है ' इस वाक्यमें । तथा शास्त्रमें भी — ' संन्यासी समस्त भूतोंको अभयरूप दक्षिणा [ देकर संन्यास करे ] ' इत्यादि ' वाक्यमें ऐसा ही प्रयोग है । उसी प्रकार यहाँ भी ' ब्रह्मभावको प्राप्त होने-वाला ब्राह्मण ही ' ब्रह्म ' है ' ऐसी व्याख्या कुछ लोग करते हैं । किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इससे सर्वभावप्राप्तिको अनित्यत्वका दोष प्राप्त होगा । लोकमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो वास्तवमें किसी निमित्तवश भावान्तरको प्राप्त होती १. चावलोंके पकनेपर उनकी ओदन ( भात ) संज्ञा होती है, किंतु इस वाक्यमें पकाये जाते हुए चावलोंको भात कहा है । २. संन्यासाश्रमकी दीक्षा लेनेके पीछे पुरुषको संन्यासी कहा जाता है, परंतु यहाँ दीक्षा लेनेवालेको भी संन्यासी कहा है ।
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२४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह न्तरमापद्यते नित्यश्चेति । तथा । हो और नित्य भी हो । इसी प्रकार ब्रह्मविज्ञाननिमित्तकृता चेत्सर्व-भावापत्तिः, नित्या चेति विरुद्धम् । अनित्यत्वे च कर्मफल तुल्यते -त्युको दोषः । श्रविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तिं चे-त्सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं मन्य-से, ब्रह्ममावि पुरुषकल्पना व्यर्था स्यात् प्राग्ब्रह्मविज्ञानादपि सर्वो जन्तुर्ब्रह्मत्वान्नित्यमेव सर्वभावा-पन्नः परमार्थतः, अविद्यया त्व-ब्रह्मत्वमसर्वत्वं चाध्यारोपितम् यथा शुक्तिकायां रजतम्, व्योम्नि वा तलमलवत्त्वादि, तथेह ब्रह्मण्य-ध्यारोपितमविद्यया अब्रह्मत्वम-सर्वत्वं च ब्रह्मविद्यया निवर्त्यत इति मन्यसे यदि, तदा युक्तम् ' यत्परमार्थत आसीत्परं ब्रह्म, ब्रह्म-शब्दस्य मुख्यार्थभूतम् ' ब्रह्म वा. इदमग्र आसीत् ' इत्यस्मिन्वाक्ये यदि सर्वभावकी प्राप्ति भो ब्रह्म- उच्च विज्ञानरूप निमित्तसे होनेवाली हो वा तो वह नित्य भी है — ऐसा कहना युक्त विरुद्ध होगा । और यदि उसे अनित्य माना जाय तो वह भी भाव कर्मफलके ही समान हुई [ उसमें श्रुत कोई विशेष्यता न रही ] - यह दोष बतलाया जा चुका है । यदि तुम अविद्याकृत असवं-पार त्वकी निवृत्तिको ही ब्रह्मविद्याका सर्वंभावप्राप्तिरूप फल मानते हो तो त्वा [ ' ब्रह्म ' शब्दके अर्थमें ] ब्रह्म होने-वाले पुरुषकी कल्पना करना व्यर्थं पत्त है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान होनेसे पूर्वं भी सब जीव ब्रह्मरूप ही होनेके कारण सदा ही परमार्थतः सर्वभावको प्राप्त ब्रह हैं | अब्रह्मत्व और असर्वत्व तो अवि- नि द्यासे ही आरोपित हैं । जैसे शुक्तिमें चाँदी और आकाशमें तलमालिन्यादि त्व आरोपित हैं, उसी प्रकार यहाँ ब्रह्ममें अविद्यासे आरोपित अब्रह्मत्व और असर्वत्वकी ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति मा हो जाती है - ऐसा यदि तुम ' मानते वा हो तब यही कहना उचित है श्र कि ' जो परमार्थतः ब्रह्म - शब्दका मुख्यार्थभूत परब्रह्म है वही ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् ' इस वाक्यमें कहा
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[ अध्याय १ हो । इसी प्रकार प्राप्ति भो ब्रह्म-से होनेवाली हो है - ऐसा कहना और यदि उसे य तो वह भी हुई [ उसमें रही ] - यह दोष है । विद्याकृत असर्व-ही ब्रह्मविद्य कल मानते हो तो में ] ब्रह्म होने-बना करना व्यर्थं न होनेसे पूर्व भी ही होने के कारण सर्वभावको प्राप्त असर्वत्व तो अवि-हैं । जैसे शुक्तिमें में तलमालिन्यादि प्रकार यहाँ ब्रह्ममें अब्रह्मत्व और विद्यासे निवृत्ति यदि तुम मानते हना उचित तिः ब्रह्म - शब्दका वही ' ब्रह्मवा इस वाक्यमें कहा ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७ उच्यते ' इति वक्तुम्; यथाभूतार्थ- । वादित्वाद्वेदस्य । न त्वियं कल्पना युक्ता, ब्रह्मशब्दार्थविपरीतो ब्रह्म-भावी पुरुषो ब्रह्मेत्युच्यत इति श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाया अन्याय्य -त्वान्महत्तरे प्रयोजनान्तरेऽसति । विद्याकृत व्यतिरेकेणाब्रह्मत्व-पारमार्थिकाब्रह्म- मसर्वत्वं च विद्यत स्वासर्वत्वयो- एवेति चेन्न, तस्य निषेधः ब्रह्मविद्ययापोहानुप-पत्तेः । न हि क्वचित्साचा-द्वस्तुधर्मस्यापोढ़ी दृष्टा कर्त्री वा ब्रह्मविद्या । अविद्यायास्तु सर्वत्रैव निवर्तिका दृश्यते । तथेहाप्यब्रह्म-त्वमसर्वत्वं चाविद्याकृतमेव निव-र्त्यतां ब्रह्मविद्यया । न तु पार-मार्थिकं वस्तु कर्तुं निवर्तयितुं वार्हति ब्रह्मविद्या ॥ तस्माद्वयर्थेव श्रुतहान्यश्रुतकल्पना । ब्रह्मण्यविद्यानुपपत्तिरिति चेत् । गया है ', क्योंकि वेद यथार्थवादी है | अतः ' ब्रह्म ' शब्दसे ब्रह्म शब्दके अर्थसे विपरीत ब्रह्म होनेवाला पुरुष कहा गया है — ऐसी कल्पना करनी उचित नहीं है, क्योंकि जब-तक कोई दूसरा बहुत बड़ा प्रयोजन न हो, श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना अन्याय्य है । यदि कहो कि अविद्याकृत नहीं, वस्तुत: अब्रह्मत्व और असर्वंत्व है ही, तो ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि उसकी ब्रह्मविद्याद्वारा निवृत्ति होनी असम्भव होगी । ब्रह्मविद्या साक्षात् रूपसे किसी वस्तुके धर्मोका लोप या प्रादुर्भाव करनेवाली कभी नहीं देखी गयी । किंतु वह अविद्याकी सर्वत्र ही निवृत्ति करनेवाली देखी जाती है । इसी प्रकार यहाँ भी जो अविद्याकृत अब्रह्मत्व और असर्वत्व है, उसकी ही ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति होनी चाहिये । ब्रह्मविद्या पारमार्थिक वस्तुको पैदा करने या निवृत्त करनेमें तो समर्थ है नहीं ॥ इसलिये श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना व्यर्थ ही है । पूर्व ० -- किंतु ब्रह्ममें अविद्या होना तो असंगत है?
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२४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ न, ब्रह्मणि विद्याविधानात् । न अविद्याधिष्ठान- हि शुक्तिकायां रज-विचार: ताध्यारोपणेऽसति शुक्तिकात्वं ज्ञाप्यते चक्षुर्गोचराप - । नायाम् इयं शुक्तिका न रजतम्, इति । तथा “ सदेवेदं सर्वम् ” ‘ “ ब्रह्म-वेदं सर्वम् ” “ आत्मैवेदं सर्वम् " " नेदं द्वैतमस्त्यब्रह्म " इति ब्रह्मण्ये-कत्वविज्ञानं न विधातव्यं ब्रह्मण्य-विद्याध्यारोपणायामसत्याम् । न ब्रूमः - शुक्तिकायामिव ब्रह्म-ण्यतद्धर्माध्यारोपणा नास्तीति किं तहिं? न ब्रह्म स्वात्मन्यतद्धर्माध्या-रोपनिमित्तम्, अविद्याकर्तृ चेति । भवत्त्वेवं नाविद्याकर्तृ भ्रान्तं ब्रह्म । किन्तु नैवाब्रह्माविद्या-कर्ता चेतनो भ्रान्तोऽन्य इष्यते । " नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता " ( बृ. उ ० ३।७।२३ ) “ नान्यदतो-ऽस्ति विज्ञातृ " ( ३ | ८ | ११ ) बा सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि ब्रह्ममें विद्याका विधान 44-किया गया है । यदि शुक्तिमें चाँदी- 44 का अध्यारोप न हो तो उसके ( 64 नेत्रेन्द्रियके विषय होनेपर ' यह स शुक्ति है चाँदी नहीं है ' इस प्रकार उसके शुक्तित्वका ज्ञान नहीं कराया जाता । इसी प्रकार यदि ब्रह्ममें 66 अविद्याका आरोप न होता तो २ " यह सब सत् ही है " " यह सब ब्रह्ममें ही है " " यह सब आत्मा ही है " " यह अब्रह्मरूप द्वैत नहीं है " इस प्रकार ब्रह्ममें एकत्वज्ञानका विधान नहीं किया जा सकता । पूर्व ० - हम यह नहीं कहते कि मि शुक्ति में रजतके समान ब्रह्म में अब्रह्मके धर्मोका आरोप नहीं है तो फिर क्या कहते हैं? हमारा कथन तो यह है ब्रह्म अपनेमें अब्रह्म धर्मों-के आरोपका निमित्त और अविद्या करनेवाला नहीं है । सिद्धान्ती - यह हो सकता है कि ब्रह्म अविद्याका कर्ता और भ्रान्त नहीं है, किंतु अविद्याका कर्ता कोई अन्य अब्रह्म भ्रान्त चेतन है - ऐसा भी नहीं माना जाता; जैसा कि “ इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है ”, “ इससे | भिन्न कोई जाननेवाला नहीं है ",
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[ अध्याय१ मत कहो, विद्या विधान दि शुक्तिमें चांदी-- हो तो उसके होनेपर ' यह है ' इस प्रकार ज्ञान नहीं कराया कार यदि ब्रह्ममें प न होता तो है " " यह सब इसब आत्मा ही रूप द्वैत नहीं है " में एकत्वज्ञानका जा सकता । इ नहीं कहते कि समान ब्रह्ममें आरोप नहीं है तो E? हमारा कथन अब्रह्म धर्मों-मित्त और अविद्या हो सकता है कि कर्ता और भ्रान्त वद्याका कर्ता कोई चेतन है - ऐसा भी ; जैसा कि " इससे नहीं है ", " इससे नेवाला नहीं है ", ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४ ९ " तन्त्र मसि " ( छा ० उ०६।८-१६ ) " आत्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मि " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) " अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद ” ( १ । ४ । १० ) इत्यादि -श्रुतिभ्यः । स्मृतिभ्यश्च - " समं सर्वेषु भूतेषु " ( गीता १३ । २७ ) " अहमात्मा गुडाकेश " ( गीता १० २० ) " शुनि चैव श्वपाके च ( गीता ५ । १८ ) " यस्तु सर्वाणि भूतानि ” इत्यादिभ्यः । “ यस्मि -न्सर्वाणि भूतानि ” ( ईशा ० उ ०७ ) इति च मन्त्रवर्णात् । नन्वेवं शास्त्रोपदेशानर्थक्य-मिति । बाढमेवम् अवगतेऽस्त्वेवानर्थ-क्यम् । अवगमानर्थक्यमपीति चेत्? न, अनवगमनिवृत्तेर्दृष्टत्वात् । तन्निवृत्तेरप्यनुपपत्तिरेकत्व इति चैत १ " वह तू है ", " अपनेको हो जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ", " यह अन्य हे और में अन्य हूँ — ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता । ' इत्यादि श्रुति-योंसे " जो समस्त भूतोंमें मुझे सम-भावसे स्थित [ देखता है ] ", " हे गुडाकेश! मैं आत्मा हूँ ", " कुत्ते और चाण्डालमें ”, “ जो समस्त भूतोंको [ अपनेहीमें देखता है ] " इत्यादि स्मृतियोंसे और “ जिस अवस्था में सब भूत आत्मा ही हो जाते हैं " इस मन्त्रवर्णंसे भी सिद्ध होता है । पूर्वं ० - किंतु इस प्रकार तो शास्त्रोपदेशकी व्यर्थता प्राप्त होती है । सिद्धान्ती - हाँ, ऐसा ही है; तत्त्वज्ञान होनेपर तो उसकी व्यर्थता होगी ही । पूर्व ० - किंतु इससे तो ज्ञानकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है! सिद्धान्ती- नहीं, क्योंकि उससे अज्ञानकी निवृत्ति होती देखी जाती है । पूर्व ० - ब्रह्मका एकत्व माननेपर तो उसकी निवृत्ति भी सङ्गत नहीं है - ऐसा कहें तो?? १. क्योंकि यदि अज्ञाननिवृत्तिको वास्तविक माना जाय तो ब्रह्म और अज्ञान-निवृत्ति दो पदार्थ सिद्ध होंगे, अतः इससे अद्वैतकी हानि होगी । और यदि उसे ब्रह्मरूप माना जाय तो उसका ब्रह्मज्ञानके अधीन होना सिद्ध नहीं हो सकता ।
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२५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ न, दृष्टविरोधात् । दृश्यते ह्येकत्व विज्ञानादेवानवगमनिवृत्तिः । दृश्यमानमप्यनुपपन्नमिति ब्रुवतो दृष्टविरोधः स्यात्; न च दृष्टविरोधः केनचिदप्यभ्युपगम्य-ते । न च दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, दृष्ट-त्वादेव । दर्शनानुपपत्तिरिति चेत्त-त्राप्येषैव युक्तिः । “ पुण्यं वै पुण्येन कर्मणः परजीवयोर्भेदे भवति ' ( बृ ० उ ० युक्तयः ३ । २ । १३ । ) तं विद्याकर्मणी समन्वारमेते ” ( ४ । ४ । २ ) " मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः ” ( प्र ० उ ० ४ । ९ ) इत्येवमादिश्रुतिस्मृति -न्यायेभ्यः परस्माद्विलक्षणोऽन्यः संसार्यवगम्यते । तद्विलक्षणश्च परः " स एष नेति नेति " "! ब्रा सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि इससे दृष्टविरोध आता है । ( एकत्वज्ञानसे ही अज्ञानकी निवृत्ति ना होती देखी जाती है । दिखलायी पा देनेपर भी वह अनुपपन्न ही उ है - ऐसा कहनेपर तो दृष्टविरोध अ ही होगा और दृष्टविरोधको कोई ३ भी स्वीकार नहीं करता । कोई भी क विषय दिखायी देनेपर वह दृष्टि- सं गोचर ( अनुभूत ) होनेके कारणं सा ही अनुपपन्न नहीं हो सकता । यदि प्र कहो कि दर्शन ( अनुभव ) की भी रस अनुपपत्ति हो सकती है, तो उसमें ना भी यही युक्ति है । " 46. पूर्व ० - " पुण्यकर्मके द्वारा पुरुष इ पुण्यात्मा होता है ", " पुरुषकी उपा-त सना और कर्म उसका [ पर- 44 | लोकमें ] अनुसरण करते हैं ” “ मनन करनेवाला, ज्ञाता, कर्ता और विज्ञानात्मा पुरुष है ” इत्यादि श्रुति- १ | स्मृति और न्यायसे संसारी जीव पर- उ । मात्मासे भिन्न ज्ञात होता है ॥ तथा उससे विलक्षण परमात्मा “ वह यह २ ( कार्य ) नहीं है, [ कारण ] नहीं है ” न १. यह मन्त्रांश इस उपनिषद्के ४ २ ४ ४ ४ । २२ और ४।५।१५ में भी है । २ इसलिये २. अर्थात् अनुभवके उसकी अनुपपत्ति भी अनुभवके ही आधारपर सिद्ध की जायगी । व अनुपपन्न होनेका कोई कारण नहीं है ।
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[ अध्याय १ मत कहो, विरोध आता है । ज्ञानकी निवृत्ति है । दिखलायी अनुपपन्न ही - तो दृष्टविरोध - विरोधको कोई करता । कोई भी नेपर वह दृष्टि-होनेके कारणं हो सकता । यदि अनुभव ) की भी ती है, तो उसमें के द्वारा पुरुष " पुरुषकी उपा उसका [ पर-करते हैं " " मनन ब, कर्ता और - " इत्यादि श्रुति-संसारी जीव पर-- होता है । तथा मात्मा " वह यह T रण ] नहीं है " ३५।१५ में भी है । द्ध की जायगी । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५१ ( बृ ० उ ०३ । ९ । २६ ) " श्रश | नायाद्यत्येति " " य आत्मापहत-पाप्मा विजरो विमृत्युः " ( छा ० उ ० ८ । ७ । १ ) “ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने " ( वृ ० उ ० ३ । ८ । ९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । कणादा क्षपादादितर्कशास्त्रेषु च संसारिविलक्षण ईश्वर उपपत्तितः साध्यते । संसारदुःखापनयार्थित्व-प्रवृत्तिदर्शनात्स्फुटमन्यत्वमीश्वरा त्संसारिणोऽवगम्यते । “ अवाक्य-नादरः " ( छा ० उ ०३ । १४ । २ ) " न मे पार्या स्ति " ( गीता ३ । २२ ) इति श्रुतिस्मृतिभ्यः । “ सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासि - । . तव्यः " ( छा ० उ ० ८।७।१ ) | " तं विदित्वा न लिप्यते " ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २३ ) “ ब्रह्मविदा-प्नोति परम् ” ( तै ० उ ० २ । १ । १ ) ‘ “ एकधैवानुद्रष्टव्यमेतत् ’ ( बृ ० उ ० ४।४।२० ) “ यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा " ( ३ । ८ । १० ) " तमेव धीरो विज्ञाय " ( ४ । ४ । २१ ) " प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तन्लक्ष्यमुच्यते " ( मु ० उ ० २ । २ । ४ ) इत्यादिकर्मकर्तृ-निर्देशाच्च । " क्षुधादिका उल्लङ्घन किये हुए है " " जो आत्मा निष्पाप, जराशून्य और मृत्युहीन है " " निश्चय इस अक्षरके प्रकृष्ट शासनमें ” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । कणाद और गौतमादिके तर्कशास्त्रोंमें भी युक्तिसे संसारी जीवसे पृथक् ईश्वर सिद्ध किया जाता है । संसारदुःख-की निवृत्तिके प्रयोजनसे जीवकी प्रवृत्ति देखी जाने के कारण ईश्वरसे जीवका अन्यत्व स्पष्टतया ज्ञात होता है; जैसा कि [ आत्मा ] " वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है ” इस श्रुतिसे और " हे पार्थं! मेरा कोई कर्तव्य नहीं है " इस स्मृतिसे सिद्ध होता है । इसके सिवा " वह अन्वेषण करने योग्य और विशेषरूपसे जिज्ञासा करने योग्य है ", " उसे जानकर लिप्त नहीं होता ”, “ ब्रह्मवेत्ता पर-मात्माको प्राप्त कर लेता है, " " इसे एक रूपसे ही देखना चाहिये ”, " हे गार्गि! जो कोई इस अक्षरको न जानकर, " " बुद्धिमान् पुरुष उसे ही जानकर ", " प्रणव धनुष है, आत्मा ( मन ) बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य है " इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरका कर्तृत्व और कर्मत्व बतलाये जानेसे भी [ उनमें भेद सिद्ध होता है ] ।
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२५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ मुमुक्षोश्व गतिमार्गविशेषदेशो- । पदेशात् । असति मेदेकस्य कुतो । गतिः स्यात् १ तदभावे च दक्षि-णोत्तरमार्गविशेषानुपपत्तिः, " गन्त-व्यदेशानुपपत्तिश्चेति । भिन्नस्य तु परस्मादात्मनः सर्वमेत-दुपपन्नम् । कर्मज्ञानसाधनोपदेशाच्च-भिन्नश्चेद्ब्रह्मणः संसारी स्यात्, युक्तस्तं प्रत्यभ्युदयनिःश्रेयससाध -नयोः कर्मज्ञानयोरुपदेशो नेश्वर-स्याप्तकामत्वात् । तस्माद्युक्तं ब्रह्मेति ब्रह्मभावी पुरुष उच्यत इति चेत्? न; ब्रह्मोपदेशानर्थक्यप्रस-भेदवाद- ङ्गात् । संसारी चेदू-निरसनम् ब्रह्मभाव्यब्रह्म सन् ब्राह तथा मुमुक्षुके लिये [ देव-यानादि ] गति और [ अचरादि ] वि मार्गविशेषका उपदेश होनेके कारण सर्व भी [ ऐसा ही जान पड़ता है ] । देव यदि भेद न हो तो किसका कहाँसे त्वा गमन होगा? और गतिका अभाव क्य माना जाय तो दक्षिणायन - उत्तरा-यणसंज्ञक मार्गविशेषोंकी तथा गन्तव्य देशकी उपपत्ति नहीं हो सकती । परमात्मासे भिन्न आत्माके साथ लिये तो यह सभी उपपन्न हो सकता है । हं कर्म और ज्ञानरूप साधनोंका उप उपदेश होनेके कारण भी [ उनका भेद है ] । यदि संसारी जीव ब्रह्मसे ब्रह भिन्न होगा तभी उसके लिये भोग और मोक्षके साधनभूत कर्म और ब्रह ज्ञानका उपदेश हो सकेगा, ईश्वर-को इनका उपदेश नहीं किया जा ब्रह सकता, क्योंकि वह तो आप्तकाम है । अतः यही ठीक है कि ' ब्रह्म ' शब्दसे भविष्यमें ब्रह्मभावको प्राप्त उव पर होनेवाला पुरुष ही कहा गया है- 44 ऐसा मानें तो? १ सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, उ क्योंकि तब तो ब्रह्मोपदेशकी ही al , व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित हो १ जायगा । यदि भविष्यमें ब्रह्मभावको स्मme प्राप्त होनेवाला संसारी ही अब्रह्म
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[ अध्याय १ के लिये [ देव-[ अचरादि ] देश होनेके कारण पड़ता है ] । किसका कहाँसे - गतिका अभाव क्षिणायन - उत्तरा-शेषोंकी तथा उपपत्ति नहीं हो से भिन्न आत्मा के भी उपपन्न हो नरूप साधनोंका रण भी [ उनका सारी जीव ब्रह्मसे उसके लिये भोग नभूत कर्म और सकेगा, ईश्वर-नहीं किया जा वह तो आप्तकाम कहै कि ' ब्रह्म ' ब्रह्मभावको प्राप्त कहा गया है-बात नहीं है, ब्रह्मोपदेशकी ही - उपस्थित हो ष्य में ब्रह्मभावको सारी ही अब्रह्म ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५३ विदित्वात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति । सर्वमभवत्तस्य संसार्यात्मविज्ञाना-देव सर्वात्मभावस्य फलस्य सिद्ध-त्वात्परब्रह्मोपदेशस्य ध्रुवमानर्थ-क्यं प्राप्तम् । तद्विज्ञानस्य कचित्पुरुषार्थ-साधनेऽविनियोगात्संसारिण एवा-हं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मत्वसम्पादनार्थ उपदेश इति चेत् । श्रनिर्ज्ञाते हि ब्रह्मस्वरूपे किं सम्पादयेदहं ब्रह्मास्मीति । निर्ज्ञातलक्षणे हि ब्रह्मणि शक्या सम्पत्कर्तुम् । न; " प्रयमात्मा ब्रह्म " ( वृ ० उ ० २ । ५ । १ ९ ) “ यत्साक्षाद-परोक्षाद्ब्रह्म " ( ३ । ४ । १ ) " य आत्मा " ( छा ० उ ० ८।७ । १ ) " तत्सत्यं स आत्मा " ( छा ० उ ० ६ । ८ । ७ ) “ ब्रह्मविदा-प्नोति परम्? ( तै ० उ ० २ । १ । १ ) इति प्रकृत्य " तस्माद्वा एत-स्मादात्मनः ” ( २ । १ । १ ) होते हुए अपनेको ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जानकर सर्वरूप हो गया तो उसे संसारी जीवके विज्ञानसे ही सर्वात्मभावरूप फल प्राप्त होनेके कारण परब्रह्मोपदेशकी निश्चय ही व्यर्थता प्राप्त हुई । पूर्व ० - ब्रह्मज्ञानका कहीं पुरुषार्थ-के साधन में विनियोग न होनेके कारण संसारी जीवको ही ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार ब्रह्मभाव सम्पा-दन करानेके लिये यह उपदेश हो तो? ब्रह्मका स्वरूप अच्छी तरह जाने बिना ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस उप-देशसे संसारी जीव क्या सम्पादन कर सकता है? क्योंकि ब्रह्मके लक्षणोंका सम्यक् प्रकारसे ज्ञान हो जानेपर ही [ ब्रह्मरूपताका ] सम्पा-दन किया जा सकता है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है । " यह आत्मा ब्रह्म है, " " जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ", ' जो आत्मा अपहतपात्मा, " " वह सत्य है, वह आत्मा है ", तथा “ ब्रह्मवेत्ता परमात्मा-को प्राप्त कर लेता है " इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर “ उस इस आत्मासे | [ आकाश उत्पन्न हुआ ] ” इत्यादि
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २५४ इति सहस्रशो ब्रह्मात्मशब्दयोः । सामानाधिकरण्यादेकार्थत्वमेवे-त्यवगम्यते । अन्यस्य ह्यन्यत्वे सम्पत्क्रियते नैकत्वे । “ इदं सर्वं यद्यमात्मा ” ( बृ ० उ ० २।४ । ६ ) इति च प्रकृतस्यैव द्रष्टव्य-स्यात्मन एकत्वं दर्शयति । तस्मान्नात्मनो ब्रह्मत्वसम्पदुप-पत्तिः । न चाप्यन्यत्प्रयोजनं ब्रह्मोप-देशस्य गम्यते, “ ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ” ( मु ० उ ० ३ । २ ।९ ) " अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि " ( बृ ० उ ० ४ । २ । ४ ) “ अभयं हि वै ब्रह्म भवति ” ( ४ । ४ । २५ ) इति च तदापत्तिश्रवणात् । सम्पत्तिश्चेत्तदापत्तिर्न स्यात् । न ह्यन्यस्यान्यभाव उपपद्यते । बा सहस्रों श्रुतियोंसे ' ब्रह्म ' और ' आत्मा ' शब्दोंका सामानाधि- पि करण्य देखे जानेसे इनका एक ही अर्थ है - यह बात ज्ञात होती है । विज्ञ तथा एक पदार्थसे दूसरे ि होनेपर ही [ उसकी तद्रूपताका ] कल सम्पादन किया जाता है, एक होने-पर नहीं । किंतु " यह जो कुछ चो है सब आत्मा है " यह श्रुति इस प्रकृत द्रष्टव्य आत्माका एकत्व साम दिखलाती है । अतः आत्माके लिये नव ब्रह्मत्व - सम्पादन करना उपपन्न नहीं है । इह इसके सिवा ब्रह्मोपदेशका कोई दूसरा प्रयोजन भी जाना नहीं इत्य जाता; क्योंकि " ब्रह्मको जाननेवाला इति ब्रह्म ही होता है, " " हे जनक! निश्चय तू अभयको प्राप्त हो गया ब्रह्म है, " " जो ब्रह्मको इस प्रकार जानता है ] वह निर्भय ब्रह्म हो चदन जाता है । " इत्यादि वाक्योंसे ब्रह्म-की प्राप्ति सुनी गयी है । यदि विज्ञ आत्माकी ब्रह्मसम्पत्ति विवक्षित पिपा होती तो उसे ब्रह्मत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती थी, क्योंकि एक वस्तुका न्ते अन्यभाव हो जाना सम्भव नहीं है । वचनात् सम्पत्तेरपि तद्भ / वा- पूर्व ० - श्रुतिका ' वचन होनेके ' शास कारण ब्रह्मसम्पत्तिसे भी ब्रह्मभाव त्वम् १. ‘ तं यथा यथोपासते तदेव भवति ' - उसे जिस - जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है — यही श्रुतिका वचन है ।