बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 261–270
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
पृष्ठ 261
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ ' ब्रह्म ' और सामानाधि-इनका एक ही ज्ञात होती है । दूसरे भन्न तद्रूपताका ] ना है, एक होने-- " यह जो कुछ यह श्रुति इस माका एकत्व : आत्मा के लिये करना उपपन्न झोपदेशका कोई जाना नहीं को जाननेवाला ' " हे जनक! प्राप्त हो गया को इस प्रकार निर्भय ब्रह्म हो द वाक्योंसे ब्रह्म-गयी । + पत्ति विवक्षित स्वकी प्राप्ति नहीं कि एक वस्तुका T सम्भव नहीं है । वचन होनेके सभी ब्रह्म र उपासना करता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ पत्तिः स्यादिति चेत् १. न, सम्पत्तेः प्रत्ययमात्रत्वात् । विज्ञानस्य च मिथ्याज्ञाननिवर्त-कत्वव्यतिरेकेणाकारकत्व मित्य-चोचाम । न च वचनं वस्तुन: सामर्थ्यजनकम् । ज्ञापकं हि शास्त्रं न कारकमिति स्थितिः । " स एष इह प्रविष्टः " ( वृ ० ड ० १ । ४ । ७ ) इत्यादिवाक्येषु च परस्यैव प्रवेश इति स्थितम् । तस्माद्ब्रह्मेति न ब्रह्मभाविपुरुष कल्पना साध्वी । इष्टार्थबाधनाच्च । सैन्धवधन-चदनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं सर्वस्याम्नुपनिषदि प्रति-पिपादयिषितोऽर्थः । काण्डद्वयेऽप्य-न्तेऽवधारणादवगम्यते " इत्यनु-" शासनम् " " एतावदरे खल्बमृत-त्वम् " इति । २५५ प्राप्ति हो सकती है - ऐसा मानें तो? सिद्धान्ती - ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पत्ति तो केवल प्रत्यय ( प्रतीति ) मात्र होती है । विज्ञान तो मिथ्या ज्ञानका निवर्त्तक होने के सिवा और कुछ करनेवाला है नहीं - ऐसा हम पहले कह चुके हैं । शास्त्र - वचन किसी वस्तुमें कोई सामर्थ्यं पैदा करनेवाला नहीं होता, क्योंकि शास्त्र केवल ज्ञापक है कारकं नहीं - यही वास्तविक स्थिति है । " वह यह ब्रह्म इसमें प्रविष्ट हुआ " इत्यादि वाक्योंमें परमात्माका ही [ शरीरमें ] प्रवेश निश्चय किया गया है । अत: ' ब्रह्म ' यह ब्रह्मभावी पुरुषका वाचक है - ऐसी कल्पना करना ठीक नहीं है । इसके सिवा इष्ट अर्थका बाध होनेके कारण भी [ इससे ब्रह्मभावी पुरुष अभिप्रेत नहीं है ] । नमकके डलेके समान ब्रह्म अविच्छिन्न, अबाह्य और एकरस है - यह विज्ञान ही समस्त उपनिषदों में प्रतिपादन के लिये अभीष्ट विषय है । “ इत्यनुशासनम् ” और “ एतावदरे खल्वमृतत्वम् ” इन वाक्योंसे इस उपनिषिद्के दो कोण्डोंके अन्तमें निर्णय करनेसे भी यही ज्ञात होता है । १. मधुकाण्ड ( अ ० २ ब्रा ० ५ ) और मुनिकाण्ड ( अ ० ४ ब्रा ० ५ ) ।
पृष्ठ 262
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २५६ ब्राह च इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंके तथा सर्वशाखोपनिषत्सु उपनिषदों में भी ब्रह्मकत्व - विज्ञान वेदि निश्चितोऽर्थः । ब्रह्मैकत्वविज्ञानं तत्र यदि संसारी ब्रह्मणोऽन्य श्रात्मानमेवावेदिति कल्प्येत, इष्ट-स्यार्थस्य बाधनं स्यात् । तथा च शास्त्रमुपक्रमोपसंहारयोर्विरोधा-दसमञ्जसं कल्पितं स्यात् । व्यपदेशानुपपत्तेश्च । यदि च ' आत्मानमेवावेत् ' इति संसारी कल्पयेत, ब्रह्मविद्या इति व्यपदेशो न स्यात् । श्रात्मानमेवावेदिति संसारिण एव वेद्यत्वोपपत्तेः । ही निश्चित अर्थ है, वहाँ यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ब्रह्मसे भिन्न स्मै संसारी जीवने अपनेको ही जाना तो इष्ट अर्थका बाध होगा । इससे सत ' उपक्रम और उपसंहारमें विरोध होनेके कारण शास्त्र असंगत है ' ऐसी ना कल्पना हो जायगी । व्यपदेश ( नाम ) की अनुपपत्ति स्थ होनेसे भी [ संसारी जीव ' ब्रह्म ' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता ] । ह्ये यदि ' आत्मानमेवावेत् ' इस वाक्यमें प्रत्र ' जानना ' इस क्रियाका कर्ता संसारी जीव माना जाय तो इस विद्याका वि ' ब्रह्मविद्या ' यह नाम नहीं हो सकता; क्योंकि ' अपनेको ही जाना ' यु इस वाक्यके अनुसार [ संसारी वि जीवका ] स्वयं संसारी जीव ही आत्मेति वेदितुरन्यदुच्यत इति वेद्य होना सम्भव है । यदि कहो कि SE ' आत्मा ' इस शब्दसे कहा हुआ वेद्य त चेन्न, अहं ब्रह्मास्मीति विशेषणात् । वेत्तासे भिन्न बतलाया गया है तो सं ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसे अन्यथेद्वेद्यः स्यादयमसाविति वा ' मैं ' ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार [ अहंरूपसे ] ज्ञ विशेषित किया गया है । यदि वेद्य विशेष्येत न त्वहमस्मीति । श्रह- वेत्तासे भिन्न होता तो उसे ‘ यह ’ कहदेन अथवा ' वह ' कहकर विशेषित किया जाता ' मैं हूँ ' ऐसा कहकर मस्मीति विशेषणादात्मानमेवा- । नहीं । ' में हू ' इस प्रकार विशेषित
पृष्ठ 263
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ र्णं शाखाओंके कत्व - विज्ञान वहाँ यदि ऐसी ब्रह्मसे भिन्न कोही जाना होगा । इससे हार में विरोध असंगत है ' ऐसी ) की अनुपपत्ति री जीव ' ब्रह्म ' हो सकता ] । वत् ' इस वाक्य में काकर्ता संसारी तो इस विद्याका नाम नहीं हो पनेको ही जाना ' नुसार [ संसारी संसारी जीव ही है | यदि कहो कि हुआ वेद्य लाया गया है तो नहीं, क्योंकि उसे कार [ अहंरूपसे ] है । यदि ता तो उसे ' यह ' कहकर विशेषित हूँ ' ऐसा कहकर प्रकार विशेषित ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५७ वेदिति चावधारणान्निश्चितमा- । त्मैव ब्रह्मेत्यवगम्यते । तथा च सत्युपपन्नो ब्रह्मविद्याव्यपदेशो नान्यथा । संसारिविद्या ह्यन्यथा स्यात् । न च ब्रह्मत्वाब्रह्मत्वे ह्येकस्योपपने परमार्थतः, तम: -प्रकाशाविव भानोविरुद्धत्वात् । न चोभयनिमित्तत्वे ब्रह्म-विद्येति निश्चितो व्यपदेशो युक्तः । तदा ब्रह्मविद्या संसार-विद्या च स्यात् । न च वस्तुनो-ऽधंजरतीयत्वं कल्पयितुं युक्तं तत्र ज्ञानविवक्षायाम्, श्रोतुः संशयो हि तथा स्यात् । निश्चितंच करनेसे और ' अपनेको ही जाना ' ऐसा निश्चय करनेसे यह निश्चित-। रूपसे ज्ञात होता है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्म है । ऐसा होनेपर ही इस विद्याका ' ब्रह्मविद्या ' यह नाम उप-पन्न हो सकता है और किसी प्रकार नहीं । अन्यथा माननेपर तो इसका नाम ' संसारिविद्या ' होगा । जिस प्रकार विरुद्ध होनेके कारण अन्ध-कार और प्रकाश ये दोनों ही सूर्यके धर्म नहीं हो सकते उसी प्रकार एक ही आत्माके ब्रह्मत्वं और अब्रह्मत्व ये दोनों धर्म परमार्थतः उपपन्न नहीं हो सकते । इसके सिवा यदि प्रस्तुत विज्ञान के ये दोनों ही निमित्त हों तो भी उसका ' ब्रह्मविद्या ' यह निश्चित व्यपदेश उपपन्न नहीं है । उस अवस्था में वह ब्रह्मविद्या और संसारिविद्या भी कहलायेगी और तत्त्वज्ञानका निरूपण करना अभीष्ट होनेपर वस्तुके विषय में अर्धंजरतीय-कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा करनेपर सुननेवालेको संदेह होगा । पुरुषार्थका साधन तो निश्चित ज्ञानं पुरुषार्थसाधनमिष्यते " यस्य ज्ञान ही माना जाता है; जैसा कि - १. एक ही वस्तुके विषयमें दो विरुद्ध कल्पना करना अर्धजरतीय न्याय कहलाता है; जैसे कोई कहे कि आधी गाय तो बूढ़ी हो गयी है और आधी बच्चा देने में समर्थ है | वृ ० उ ० १७-
पृष्ठ 264
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्वादद्धा न विचिकित्सास्ति ” । ( छा ० उ ० ३ । १४ । ४ ) सश यात्मा विनश्यति ' ( गीता ४ । ४० ) इति श्रुतिस्मृतिभ्याम् । अतो न संशयितो वाक्यार्थो वाच्यः परहितार्थिना । ब्रह्मणि साधकत्वकल्पना अस्मदादिष्विव पेशला ' तदा-त्मानमेवावेत्तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' । इति - इति चेत् १ न, शास्त्रोपालम्भात् । न हास्मत्कल्पनेयम्, शास्त्रकृता तुः तस्माच्छास्त्रस्यायमुपालम्भः 1 न च ब्रह्मण इष्टं चिकीर्षुणा शास्त्रार्थविपरीतकल्पनया स्वार्थ-परित्यागः कार्यः 1 । न चैतावत्ये-वाक्षमा युक्ता भवतः । सर्वं हि नानात्वं ब्रह्मणि कल्पितमेव “ एकचैवानुद्रष्टव्यम् ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २० ) " नेह नानास्ति किश्चन ' ( ४ । ४ । १ ९ ) “ यत्र हि द्वैतमिव भवति ” ( २ । ४ । १४ ) ' एकमेवाद्वितीयम् ” ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) इत्यादिवा-“ जिसका ऐसा निश्चय है और जिसे इस विषय में कोई संदेह भी क्य नहीं है [ उसे ही ब्रह्म - साक्षात्कार होता है ] " इस श्रुतिसे और " संश-यात्मा नष्ट हो जाता है " इस माथ स्मृतिसे सिद्ध होता है । अत: दूसरों-' इय का हित चाहनेवाले पुरुषको वाक्य-का संशययुक्त अर्थ नहीं करना चाहिये । तद पूर्व ० - किंतु ' उसने अपनेको ही जाना [ कि मैं ब्रह्म हूँ ] अत: वह इदं सर्व हो गया ' इस वाक्यके अनुसार अग्र हमलोगोंकी तरह ब्रह्ममें साधकत्वकी सर्व कल्पना करनी तो अच्छी नहीं है? सिद्धान्ती - ऐसा न कहो, क्योंकि अब्र यह उपालम्भ शास्त्रके लिये है । यह रोप हमारी कल्पना नहीं है, अपितु भो शांखकी की हुई है, अतः यह शास्त्रके चा ही लिये उपालम्भ है । और ब्रह्मका इष्ट करनेकी इच्छावाले पुरुषको ब्र शास्त्रके अर्थसे विपरीत कल्पना तत्य करके उसके अर्थका परित्याग नहीं करना चाहिये । आपके लिये इतना प्रति अक्षमा उचित नहीं है । सारा नानात्व ही है । इत्य “ उसे एकरूप ही देखना चाहिये ", श्र " यहाँ नाना कुछ भी नहीं है ", मि " जहाँ द्वेत - सा होता है ", " एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ” इत्यादि सैकड़ों
पृष्ठ 265
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ श्रध्याय १ निश्चय है और कोई संदेह मी ब्रह्म - साक्षात्कार नसे और " संश-जाता है " इस है । अतः दूसरों-पुरुषको वाक्य-नहीं करना सने अपने को ही हूँ ] अत: वह क्य के अनुसार झमें साधकत्वकी अच्छी नहीं है? न कहो, क्योंकि के लिये है । यह नहीं है, अपितु अतः यह शास्त्र है । और ब्रह्मका वाले पुरुषको वपरीत कल्पना परित्याग नहीं आपके लिये इतनी हीं है । सारा कल्पित ही है । दिखना चाहिये ", - भी नहीं है ", है ", " एक ही इत्यादि सैकड़ों ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ ९ क्यशतेभ्यः । सर्वो हि लोकव्यव । हारो ब्रह्मण्येव कल्पितो न पर-मार्थः सन्, इत्यत्यल्पमिदमुच्यते ' इयमेव कल्पना अपेशला ' इति । तस्माद् यत्प्रविष्टं स्रष्टृ ब्रह्म तद्ब्रह्म । वैशब्दोऽवधारणार्थः 1 । इदं शरीरस्थं यद् गृह्यते, अग्रे प्राक्प्रतिबोधादपि ब्रह्मैवासीत्, सर्वं चेदम् । किन्त्वप्रतिबोधात अब्रह्मास्म्यसर्वं च ' इत्यात्मन्यध्या -रोपात् ' कर्ताहं क्रियावान्फलानां च भोक्ता सुखी दुःखी संसारी ' इति चाध्यारोपयति । परमार्थतस्तु ब्रह्मैव तद्विलक्षणं सर्वं च । तत्कथञ्चिदाचार्येण दयालुना प्रतिबोधितम् ' नासि संसारी ' इत्यात्मानमेवावेत्स्वाभाविकम् । विद्याध्यारोपित विशेषवर्जित-मिति एवशब्दस्यार्थः । ब्रूहि कोऽसावात्मा स्वाभा वाक्योंसे यही बात कही गयी है । ब्रह्ममें तो सारा ही लोकव्यवहार कल्पित ही है; यह परमार्थतः सत् नहीं है; अतः ' यही कल्पना अच्छी नहीं है ' यह तो तुम बहुत छोटी बात कहते हो । अतः जो सृष्टिकर्ता ब्रह्म प्रविष्ट हुआ था, वही यह ब्रह्म है | ' ब्रह्म वै ' इसमें ' वै ' शब्द निश्वयार्थक है । ' इदम् ' अर्थात् यह जो शरीरमें स्थित दिखायी देता है ' अग्र ’ ' — बोध होनेसे पूर्व भी ब्रह्म ही या तथा यह सर्वं भी था । किंतु अज्ञानवश आत्मा में ' में अब्रह्म हूँ, असर्व हूँ ' ऐसा आरोप कर लेनेसे ‘ मैं कर्ता हूँ, क्रियावान् हूँ, फलोंका भोक्ता है, सुखी हूँ, दुःखी हूँ और संसारी हूँ ' ऐसा अध्यारोप कर लेता है । वस्तुतः तो वह उससे बिलक्षण ब्रह्म और सर्वरूप ही है । उसने दयालु आचार्यद्वारा किसी प्रकार ' तू संसारी नहीं है ' ऐसा बोध कराये जानेपर स्वाभाविक आत्माको ही जाना । ' आत्मानमेव ' इसमें ‘ एव ’ शब्दका यह अभिप्राय है कि ' उसने अविद्याद्वारा आरोपित विशेषसे रहित - निर्विशेष आत्माको जाना । ' पूर्व ० - अच्छा, बताओ वह स्वा-
पृष्ठ 266
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २६० विकः, यमात्मानं विदितवद्ब्रह्म । । ननु न स्मरस्यात्मानम्, दर्शितो आत्मस्वरूप- ह्यसौ, य इह प्रवि-विवेचनम् श्थ प्राणित्यपानिति व्यानित्युदानिति समानितीति । ननु ' असौ गौः, असावश्वः ' इत्येवमसौ व्यपदिश्यते भवता नात्मानं प्रत्यक्षं दर्शयसि । एवं तर्हि द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, स आत्मेति । नन्वत्रापि दर्शनादिक्रियाकर्तुः स्वरूपं न प्रत्यक्षं दर्शयसि । न हि गमिरेव गन्तुः स्वरूपं छिदिर्वा छेत्तुः । एवं तर्हि दृष्टेष्टा श्रुतेः श्रोता मतेर्मन्ता विज्ञातेविंज्ञाता, स आत्मेति । नन्वत्र को विशेषो द्रष्टरि १ यदि दृष्टेर्द्रष्टा, यदि वा घटस्य ब्राह्म भाविक आत्मा कौन है? जिसे ब्रह्मने जाना । द्रष्टा सिद्धान्ती - क्या तुम्हें आत्माका एव स्मरण नहीं रहा; उसे ' जो यह ष्टेति शरीर में प्रवेश करके प्राण, अपान, चा व्यान, उदान और समानकी क्रियाएँ करता है वह आत्मा है ' इस प्रकार प्रदर्शित किया था । विश पूर्व ० - किंतु ' वह गौ है, वह भवा घोड़ा है ' इत्यादिरूपसे तुम उसका नामनिर्देश तो करते हो, परंतु नव आत्माको प्रत्यक्ष नहीं दिखाते । द्रष्ट्रा सिद्धान्ती - तो फिर ऐसा समझो भवि कि जो द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और ही विज्ञाता है, वह आत्मा है । कद पूर्व ० - किंतु यहाँ भी तुम दर्शनादि क्रिया करनेवाले का स्वरूप त्यय प्रत्यक्ष नहीं दिखाते । जाना ही च | जानेवालेका और छेदन ही छेदन न करनेवालेका स्वरूप नहीं है । f सिद्धान्ती - तो फिर जो दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता, मतिका मन्ता और विज्ञातिका विज्ञाता है, वही र आत्मा है - ऐसा समझो पूर्व ० - किंतु इससे द्रष्टामें क्या विशेषता हुई? चाहे दृष्टिका द्रष्टा नि | हो चाहे घटका द्रष्टा, वह तो सब
पृष्ठ 267
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ कौन है? जिसे तुम्हें आत्माका उसे ' जो यह प्राण, अपान, और समानकी वह आत्मा है ' किया था । गौ है, वह रूपसे तुम उसका करते हो, परंतु हृीं दिखाते । फिर ऐसा समझो ता, मन्ता और ना है । यहाँ भी तुम रनेवाले का स्वरूप । जाना ही - छेदन ही छेदन प नहीं है । फिर जो दृष्टिका ता, मतिका मन्ता विज्ञाता है, वही समझो । इससे द्रष्टा में क्या चाहे दृष्टिका द्रष्टा दष्टा, वह तो सब ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६१ द्रष्टा, सर्वथापि द्रष्टैव । द्रष्टव्य । एव तु भवान्विशेषमा हटेहष्ठेर्द्र- । ष्टेति द्रष्टा तु यदि दृष्टेः, यदि चा घटस्य, द्रष्टा द्रष्टैव । न, विशेषोपपत्तेः । अस्त्यन विशेष: - दृष्टेद्रष्टा स दृष्टिश्चेद् भवति नित्यमेव पश्यति दृष्टिम्, न कदाचिदपि दृष्टिर्न दृश्यते द्रष्ट्रा; तत्र द्रष्टुष्टया नित्यया भवितव्यम्, अनित्या चेद् द्रष्टु-दृष्टिः, तत्र दृश्या या दृष्टिः सा कदाचिन्न दृश्येतापि, यथानि-त्यया दृष्टया घटादि वस्तु | न च तद्वद् दृष्टेर्द्रष्टा कदाचिदपि न पश्यति दृष्टिम् । किं द्वे दृष्टी द्रष्टुः- नित्या अह श्या, अन्या अनित्या दृश्येति? बाढम् प्रसिद्धा तावदनित्या दृष्टिः, अन्धानन्धत्वदर्शनात् । नित्यैव चेत्सर्वोऽनन्ध एव तरहसे द्रष्टा ही रहा । दृष्टिका द्रष्टा कहकर तो आप केवल द्रष्टव्य-में ही विशेषता बतलाते हैं । द्रष्टा तो चाहे दृष्टिका हो चाहे घटका, द्रष्टा द्रष्टा ही है । सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि घटद्रष्टा और दृष्टिद्रष्टाका भेद सम्भव है । यहाँ एक भेद है— जो दृष्टिका द्रष्टा है वह, यदि दृष्टि होती है तो, उसे नित्य हो देखता है । ऐसा नहीं होता कभी द्रष्टाको दृष्टि न भी दिखायी पड़े । उस अवस्थामें द्रष्टाकी दृष्टि नित्य होनी चाहिये । यदि द्रष्टाकी दृष्टि अनित्य होगी तो उसकी दृश्यभूता जो दृष्टि है वह कभी नहीं भी देखी जायगी, जैसे कि अनित्य दृष्टिसे घटादि वस्तु । किंतु उसके समान दृष्टिका द्रष्टा कभी दृष्टिको न देखता हो - ऐसी बात नहीं है । पूर्व ० - तो क्या द्रष्टाकी दो दृष्टियाँ हैं - एक नित्य और अदृश्य तथा दूसरी अनित्य और दृश्य? सिद्धान्ती - हाँ, लोकमें अन्धत्व और अनन्धत्व दोनों देखे जानेसे अनित्य दृष्टि तो प्रसिद्ध ही है । यदि यह दृष्टि नित्य ही होती तो । सब अनन्ध ( नेत्रवान् ) ही होते ।
पृष्ठ 268
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २६२ स्यात् । द्रष्टुस्तु नित्या दृष्टिः । " न हि द्रष्टुर्दृष्टेविंपरिलोपो विद्यते ” – - इति श्रुतेः । अनुमानाच्च — अन्धस्यापि घटा-द्याभासविषया स्वप्ने दृष्टिरूप-लभ्यते, सा तर्हीतर दृष्टिनाशे न नश्यति, सा द्रष्टुष्टिः । तयाविपरिलुमया नित्यया दृष्टथा स्त्ररूपभूतया स्वयञ्ज्योतिःसमा-ख्ययेतरामनित्यां दृष्टिं स्वप्नबु-द्धान्तयोर्वासनाप्रत्ययरूपां नित्य-मेव पश्यन्दृष्टेष्टा भवति । एवञ्च सति दृष्टिरेव स्वरूपम-स्याग्न्यौष्ण्यवत्. न काणादाना-मिव दृष्टिव्यतिरिक्तोऽन्यश्चेतनो द्रष्टा । तद्द्ब्रह्म श्रात्मानमेव नित्य-पमध्यारोपितानित्यदृष्ट्यादिव-र्जितमेवावेद्विदितवत् । ननु विप्रतिषिद्धं “ न विज्ञाते-ब्राह किंतु " द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता " इस श्रुति अनुसार विज्ञ द्रष्टाकी दृष्टि तो निस्य है । यह उ ० बात अनुमानसे भी सिद्ध होती है । अन्धे पुरुषकी भी स्वप्न में वि घटाभासादिविषयिणी दृष्टि देखी जाती है । वह दृष्टि अन्य ( नेत्र-सम्बन्धिनी ) दृष्टिका नाश हो षेध जानेपर भी नष्ट नहीं होती । वह एक द्रष्टाकी दृष्टि है । उस कभी लुप्त न होनेवाली स्वयंज्योतिःसंज्ञिका स्वरूपभूता नित्यदृष्टिसे स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में रहनेवाली वि वासना - प्रत्ययरूपा दृष्टिको नित्य मा ही देखते रहने के कारण बह दृष्टिका द्रष्टा होता है । ऐसा होनेके कारण विष अग्निकी उष्णता के समान दृष्टि ही आत्माका स्वरूप है । कणाद- न मतावलम्बियों की मान्यताके समान दृष्टिसे भिन्न कोई अन्य चेतन द्रष्टा नहीं है । उस ब्रह्मने जो अन्य आरोपित अनित्य दृष्टि आदिसे रहित है, उस नित्यदृग्रूप आत्माको ही अवेत्– य जाना । ३ पूर्व ० - किंतु " विज्ञानशक्तिके
पृष्ठ 269
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ का कभी लो श्रुति के अनुसार नित्य है । यह नी सिद्ध होती भी स्वप्न में णी दृष्टि देखी ष्ट अन्य ( नेत्र-टका नाश हो हीं होती । वह उस कभी लुप्त यंज्योतिः संज्ञिका ष्टिसे स्वप्न और में रहनेवाली दृष्टिको नित्य रण वह दृष्टिका होने के कारण समान दृष्टिही है । कणाद-मान्यता के समान कोई अन्य चेतन अन्य आरोपित दिसे रहित है, उस को ही अवेत्-" विज्ञानशक्तिके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३ विज्ञातारं विजानीयाः " ( बृ ० । उ ० ३ । ४ । २ ) इति श्रुतेः, । विज्ञातुर्विज्ञानम् । न, एवं विज्ञानान्न विप्रति-षेधः । एवं दृष्टेर्द्रष्टेति विज्ञायत एव । श्रन्यज्ञानानपेक्षत्वाच्च-न च द्रष्टुर्नित्यैव दृष्टिरित्येवं विज्ञाते द्रष्टृविषयां दृष्टिमन्या-माकाङ्क्षते I । निवर्तते हि द्रष्टृ विषयदृष्टयाकाङ्क्षात दसम्भवादेव । न ह्यविद्यमाने विषय आकाङ्क्षा कस्यचिदुपजायते । न च दृश्या दृष्टिर्द्रष्टारं विषयी कर्तुमुत्सहते, यत-स्तामाकाङ्क्षत । न च स्वरूपविष-विज्ञाताको तुम नहीं जान सकते ” ऐसी श्रुति होनेसे विज्ञाता ( आत्मा ) को जानना तो विरुद्ध कथन जान पड़ता है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है । इस प्रकारके विज्ञानसे इस श्रुतिका विरोध नहीं होता । ' वह दृष्टिका द्रष्टा है ' इस प्रकार तो वह जाना ही जाता है । इसके सिवा अन्य ज्ञानकी अपेक्षा न होनेके कारण भी इस कथनमें विरोध नहीं है ] । द्रष्टाकी दृष्टि नित्या ही है - ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस दृष्टिको विषय करनेवाली किसी अन्य दृष्टि-की अपेक्षा नहीं होती । बल्कि इससे तो द्रष्टाको विषय करनेवाली दृष्टिकी आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाती है, क्योंकि उसका होना असम्भव ही है । जो वस्तु विद्यमान नहीं होती उसके लिये किसीकी आका-ङ्क्षा नहीं हुआ करती । कोई भी दृश्यभूता दृष्टि द्रष्टाको विषय करने-में समर्थ नहीं है, जिससे कि उसकी आकाङ्क्षा की जाय और अपने स्वरूपके विषय में अपने ही आकाङ्क्षा याकाङ्क्षा स्वस्यैव । तस्मादज्ञाना - हुआ नहीं करती । अत: ‘ आत्माको जाना ' इस वाक्यसे अज्ञानके ध्यारोपणनिवृत्तिरेव ' आत्मानमे आरोपकी निवृत्तिका ही निरूपण
पृष्ठ 270
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ वावेत् ' इत्युक्तम्, नात्मनो विषयी -करणम् । तत्कथमवेत् १ इत्याह- अहं दृष्टेर्द्रष्टा श्रात्मा ब्रह्मास्मि भवामीति ब्रह्मेति - यत्साक्षादपरोक्षात्सर्वान्तर आत्मा अशनायाद्यतीतो नेति नेत्यस्थूलमनण्वित्येवमादि-लक्षणम्, तदेवाहमस्मि, नान्यः 5. संसारी, यथा भवानाहेति । तस्मादेवं विज्ञानात्तद्ब्रह्म सर्वम भवत् – अब्रह्माध्यारोपणापगमात् तत्कार्यस्य सर्वस्वस्य निवृच्या सर्वमभवत् । तस्माद्युक्तमेव मनुष्या मन्यन्ते यद्ब्रह्मविद्यया सर्व भविष्याम इति । यत्पृष्टम्, ' किमु तद्ब्रह्मावेद यस्मात्तत्सर्वमभवत् ' इति, तन्नि-र्णीतम् -'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' इति । किया गया है, आत्माको विषय करना नहीं बताया गया । उस ब्रह्मने किस प्रकार जाना? सो श्रुति बतलाती है, मैं दृष्टिका द्रष्टा आत्मा ब्रह्म हूँ - ऐसा जाना । ब्रह्म अर्थात् जो साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर आत्मा, क्षुधादि विकारोंसे रहित, ' नेति नेति ' वाक्यप्रतिपादित, अस्थूल, असूक्ष्म इत्यादि प्रकारके लक्षणोंवाला है, वही मैं हूँ; जैसा कि आप कहते हैं मैं अन्य यानी संसारी नहीं हूँ । अतः इस प्रकार-के विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । अर्थात् अब्रह्मरूप अध्यारोपके बाधसे उसके कार्यंभूत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जाने से वह सर्वरूप हो गया । अतः मनुष्य जो ऐसा मानते हैं कि ब्रह्मविद्याके द्वारा हम सर्वरूप हो जायँगे, वह उचित ही है । [ इस प्रकार ] यह जो पूछा गया था कि ' उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया ' उसका ' पहले यह ब्रह्म ही था; उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ, अतः वह सर्व हो गया ' इस वाक्य-. से निर्णय कर दिया गया । ब्राह ब्रह्म दीन प्र प्रि तथ मध दृष्ट ब्र 55 शरी या मा अ श तद म पा क ब्र