बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 271–280
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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अध्याय १ को विषय TI र जाना? मैं दृष्टिका सा जाना । त् अपरोक्ष विकारोंसे प्रतिपादित, द प्रकारके मैं हूँ; जैसा अन्य यानी इस प्रकार-सर्वरूप अब्रह्मरूप कार्यंभूत जसे वह तः मनुष्य ब्रह्मविद्या के जायेंगे, वह जो पूछ क्या जाना ना ' उसका था; उसने मैं ब्रह्म हूँ, इस वाक्य-TI ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६५ तत्तत्र या यो दवानां मध्ये ब्रह्मविद्यया देवा- प्रत्यबुध्यत प्रतिबु दीनां सार्वात्म्य- द्धवानात्मानं यथो-प्रदिपादनम् क्तेन विधिना, स एव प्रतिबुद्ध आत्मा तद्ब्रह्माभवत् । तथर्षीणां तथा मनुष्याणां च मध्ये । देवानामित्यादि लोक-दृष्टयपेक्षयान ब्रह्मत्वबुद्धधोच्यते । ' पुरः पुरुष आविशत् ' इति सर्वत्र ब्रह्मैवानुप्रविष्टमित्यवोचाम । अतः शरीराद्युपाधिजनित लोक दृष्टयपेक्ष -या देवानामित्याद्युच्यते । पर-नार्थतस्तु तत्र तत्र ब्रह्मैवाग्र आसीत्प्राक्प्रतिबोधाद् देवादि -शरीरेष्वन्यथैव विभाव्यमानम् । तदात्मानमेवात्तथैव च सर्व-मभवत् । अस्या ब्रह्मविद्यायाः सर्वभावा-पत्तिः फलमित्येतस्यार्थस्य द्रढि-म्ने मन्त्रानुदाहरति श्रुतिः ॥ कथम् १ तद् ब्रह्म एतदात्मानमेव ' अहमस्मि ' इति पश्यन्नेतस्मादेव ब्रह्मणो दर्शनादृषिर्वामदेवाख्यः अत: देवताओंमेंसे जिस - जिसने आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जाना वही बोघवान् आत्मा वह अर्थात् ब्रह्म हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमें भी हुआ । यहाँ ' देवानाम् ' इत्यादि जो कथन है वह लोकदृष्टिको लेकर है, ब्रह्मत्व-बुद्धिसे ऐसा नहीं कहा जाता, क्योंकि ' पुरुषने शरीररूप पुरमें प्रवेश किया ' इस वाक्यसे हम बतला चुके हैं कि सर्वत्र ब्रह्म ही अनुप्रविष्ट हुआ । अत: शरीरादि-उपाधिजनित लोकदृष्टिकी अपेक्षासे ' देवानाम् ' इत्यादि कहा गया है । परमार्थतः तो पहले उन - उन देवादि शरीरोंमें बोध होनेसे पूर्व अन्यरूपसे भावना किया जाता हुआ ब्रह्म ही था । उसने आत्माको जाना और उसी प्रकार सर्वरूप हो गया । इस ब्रह्मविद्याका फलं सर्वभावकी प्राप्ति है; इसी बातको दृढ़ करनेके लिये श्रुति मन्त्रउद्धृत करती है । किस प्रकार उद्धृत करती है? उस ब्रह्मको इस प्रकार देखनेवाले अर्थात् अपनेको ही ' मैं ब्रह्म हूँ ' - ऐसा समझने-वाले वामदेवनामक ऋषिको इस
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२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ प्रतिपेदे ह प्रतिपन्नवान्किल ॥ स एतस्मिन्ब्रह्मात्मदर्शनेऽवस्थित एतान्मन्त्रान्ददर्श - ' अहं मनुरभवं सूर्यश्व ' इत्यादीन् । ' तदेतद्ब्रह्म पश्यन् ' इति ब्रह्म विद्या परामृश्यते । ' अहं मनुरभवं सूर्यश्व ' इत्यादिना सर्वभावापत्तिं ब्रह्म विद्याफलं परामृशति । पश्य न्सर्वात्मभावं फलं प्रतिपेद इत्य-स्मात्प्रयोगाद् ब्रह्मविद्यासहाय-साधनसाध्यं मोक्षं दर्शयति | भुञ्जानस्तृप्यतीति यद्वत् । सेयं ब्रह्मविद्यया सर्वभावा-पत्तिरासीन्महतां देवादीनां वीर्या -तिशयात् । नेदानीमैदंयुगीनानां ब्रह्मके दर्शन से ही यह प्रतिपत्ति हुई— यह ज्ञान हुआ । इस ब्रह्मात्मदर्शनमें स्थित होकर उसने इन ' अहं मनुरभवं सूर्यंश्च ' इत्यादि मन्त्रोंका साक्षात्कार किया । ' तदेतद्ब्रह्म पश्नन् ” इस वाक्यसे श्रुति ब्रह्मविद्याका परामर्शं करती है तथा ' अहं मनुरभवं सूर्यंश्च ' इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मविद्याके फल सर्वंभावकी प्राप्तिका परामर्श करती है । ब्रह्मको देखनेवाले वामदेव ऋषि सर्वात्म-भावरूप फलको प्राप्त हुए — इस प्रयोगसे वह मोक्षको ब्रह्मविद्याके सहायभूत साध्य दिखलाती है, जैसे कि भोजन करनेवाला तृप्त होता है । ब्रह्मविद्याके द्वारा वह यह सर्वं-भावकी प्राप्ति देवादि महापुरुषों-को उनमें विशेष सामर्थ्य होने के कारण हो गयी थी । अब वर्तमान युगके प्राणियोंको और उनमें भी विशेषतो मनुष्याणाम्, अन्पवीर्य - अल्पवीर्य होनेके कारण मनुष्योंको त्वादिति स्यात्कस्यचिद्बुद्धिः उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती-, ऐसा यदि किसीका विचार होतो उसे निवृत्त करनेके लिये श्रुति वदुत्थापनायाह- कहती है-. १. मैं मनु हुआ और सूर्य भी । २. उस इस ब्रह्मको देखते हुए । मुक्तिका ३. साधन इस वाक्यमें ब्रह्मविद्या जैसे है भोजन । - क्रिया तृप्तिका साधन साधन! प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्राह भूत एत क नम अप ध्य ना मा कृ स वी वि ब्र म इ T
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अध्याय १ तिपत्ति हुई-ह्यात्मदर्शनमें इन ' अहं दि मन्त्रों का इस वाक्यसे मर्श करती है श्च ' इत्यादि सर्वभावकी है । ब्रह्मको षि सर्वात्म-हुए इस ब्रह्मविद्याके साध्य कि भोजन वह यह सर्व-महापुरुषों-मर्थ्य होनेके अब वर्तमान उनमें भी मनुष्यों सकती-चार होतो । है, उसी प्रकार ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७ तदिदं प्रकृतं ब्रह्म यत्सर्व-भूतानुप्रविष्टं दृष्टिक्रियादिलिङ्गम्, एत तस्मिन्नपि वर्तमानकाले यः कश्चिद्व्यावृत्तबाह्यौत्सुक्य आत्मा नमेवैवं वेद ' अहं ब्रह्मास्मि ' इति -अपोह्योपाधिजनितभ्रान्तिविज्ञाना-ध्यारोपितान्विशेषान् संसारधर्मा-नागन्धितमनन्तरमबाह्यं ब्रह्मैवाह -मस्मि केवलमिति - सोऽविद्या-कृतासर्वत्व निवृत्तेत्र ह्म विज्ञानादिदं सर्व भवति । न हि महा-वीर्येषु वामदेवादिषु हीनवीर्येषु वा वार्तमानिकेषु मनुष्येषु ब्रह्मणो विशेषस्तद्विज्ञानस्य वास्ति । वार्तमानिकेषु पुरुषेषु तु ब्रह्म-ब्रह्मविद्या - विद्याफले अनैका -माहात्म्यम् न्तिकता शङ्कयत इत्यत आह - तस्य ह ब्रह्मविज्ञा-तुर्यथोक्तेन विधिना देवा महा-वीर्याश्च नापि अभूत्य - अभवनाय ब्रह्म सवभावस्य नेशते न पर्याप्ताः, किमुतान्ये । उस इस प्रकृत ब्रह्मको, जो समस्त भूतोंमें अनुप्रविष्ट है तथा दृष्टि - क्रियादि जिसके लिङ्ग हैं, इस समय अर्थात् इस वर्तमानकालमें भी जो कोई बाह्य विषयोंकी अभि-लाषासे मुक्त होकर आत्माको ही ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार जानता है अर्थात् उपाधिजनित मिथ्या ज्ञानसे आरोपित विशेषोंका बाध कर जो ऐसा अनुभव करता है कि में जिसमें संसारधर्मोकी गंध भी नहीं है ऐसा अन्तर - बाह्यशून्य शुद्ध ब्रह्म ही हूँ, वह अविद्याकृत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्मज्ञानके द्वारा यह सर्वं हो जाता है । महान् प्रभावशाली वामदेवादि अथवा मन्दवीर्यं आघु-निक पुरुषोंमें ब्रह्म अथवा उसके विज्ञानका कोई अन्तर नहीं है । आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्मविद्याके फलकी अनिश्चितताकी शङ्का की जाती है, अत: श्रुति कहती है-महाप्रभावशाली देवगण भी उपर्युक्त विधिसे उस ब्रह्मको जाननेवाले की अभूतिका अर्थात् ब्रह्मरूप सर्वभाव-को न होने देनेका सामर्थ्य नहीं रखते, फिर ओरोंकी तो बात ही क्या है?
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २६८ 2 ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ विघ्नकरणे ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ देवादय ईशत इति देवेभ्यः कथं का शङ्का? इत्यु- । विघ्नाशङ्का च्यते - देवादीन्प्रति ऋणवस्त्वान्मर्त्यानाम् । “ ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः " इति हि जायमान-मेवर्णवन्तं पुरुषं दर्शयति श्रुतिः । पशुनिदर्शनाच्च " अथोऽयं वा " चृ ० उ ० १ । ४ । १६ ) इत्या- | दिलोकश्रतेश्चात्मनो वृचिपरि -पिपालयिष्याधमर्णानिव देवाः परतन्त्रान्मनुष्यान्प्रत्यमृतत्वप्राप्तिं प्रति विघ्नं कुयुरिति न्याय्यै-वैषा शङ्का । स्वपशून्स्वशरीराणीव च रक्ष-न्ति देवाः । महत्तरां हि वृत्ति कर्माधीनां दर्शयिष्यति देवादीनां बहुपशुसमतयैकैकस्य पुरुषस्य । " तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनु-किंतु ब्रह्मविद्याके फलकी प्राप्ति-में विघ्न करनेमें देवादि समर्थं होते हैं- ऐसी शङ्का क्यों होती है? इसपर कहते हैं— क्योंकि देवादिके प्रति मनुष्य ऋणवान् हैं, जैसा कि " ब्रह्मचर्य के द्वारा ऋषियोंसे, यज्ञ-द्वारा देवताओंसे और पुत्रोत्पादन-द्वारा पितरोंसे [ उऋण हो ] " यह श्रति जन्ममात्र से ही पुरुषको ऋणी दिखाती है तथा " अथो ' अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः ” इस श्रुति से मनुष्यको पशुरूप बतलाया जानेके कारण जिस प्रकार उत्तमर्णं ( ऋण देनेवाला ) अधमर्णों ( ऋण लेनेवालों ) को कष्ट देता है उसी प्रकार देवगण भी अपनी वृत्तिका निर्वाह करनेके लिये परतन्त्र मनु-ष्योंके प्रति अमृतत्वप्राप्ति में विघ्न करें - यह शङ्का न्याय्य ही है । देवगण अपने इन पशुओं की अपने शरीरोंके समान रक्षा करते हैं । एक एक पुरुषकी अनेकों पशुओं-से समता करके श्रुति उसे देवादि-की बहुत बड़ी कर्माधीन वृत्ति दिखलायगी और यह भी कहेगी कि " अतः उन्हें यह प्रिय नहीं है १. यह प्रसिद्ध आत्मा समस्त भूतोंका भोग्य है । बा स्व मि यो स्य फ देव विघ्न सम्प वि ज्ञ श त •
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अध्याय १ लकी प्राप्ति-समर्थ होती है? क देवादिके हैं, जैसा कि बयोंसे, यज्ञ-पुत्रोत्पादन-हो ] " यह रुषको ऋणी अयं वा लोक: " इस रूप बतलाया कार उत्तमर्ण मर्णों ( ऋण ता है उसी नी वृत्तिका परतन्त्र मनु-प्ति में विघ्न नही है । न पशुओं की रक्षा करते नेकों पशुओं-उसे देवादि-नाधीन वृत्ति द भी कहेगी प्रिय नहीं है ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६ ९ या विद्युः " ( १ । ४ । १० ) | इति हि वक्ष्यति । " यथा ह बैं स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेव हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टि-मिच्छन्ति ” ( १ । ४ । १६ ) इति च । ब्रह्मविश्वे पारार्थ्यनिवृत्तेन स्वलोकत्वं पशुत्वश्चेत्यभिप्रा-योऽप्रियारिष्टिवचनाभ्यामवग-म्यते । तस्माद्ब्रह्मविदा ब्रह्मविद्या-फलप्राप्तिं प्रति कुर्युरेव विघ्नं देवाः, प्रभाववन्तश्च हि ते । नन्वेवं सत्यन्यास्वपि कर्म-विघ्नभयाच्छास्त्रार्थं फलप्राप्तिषु देवानां -सम्पादनाविस्रम्भ विघ्नकरणं पेयपान -इत्याशङ्कयते समम् । हन्त तर्ह्य -विस्रम्भोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधना-नुष्ठानेषु । तथेश्वरस्याचिन्त्य -शक्तित्वाद्विघ्नकरणे प्रभुत्वम् । तथा कालकर्ममन्त्रौषधि तपसाम् । कि मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानें ” । तथा आगे चलकर यह भी कहेगी कि " जिस प्रकार पुरुष अपने शरीर-का अविनाश चाहते हैं उसी प्रकार जो ऐसा ( देवताओंसे उऋण होने-के लिये अपना कर्त्तव्य ) जानता है उसका देवादि समस्त भूत अविनाश चाहते हैं " । किंतु ब्रह्मज्ञान हो जानेपर पारार्थ्यं ( अन्यका उपभोग होना ) निवृत्त हो जानेसे उसके देहात्मत्व और देवपशुत्व नहीं रहते - - यह अभि-प्राय उपर्युक्त अप्रिय और अरिष्टि-वाक्योंसे विदित होता है । अत: ब्रह्मवेत्ताको ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त होने में देवगण विघ्न करेंगे ही और वे हैं भी प्रभावशाली । शङ्का- ऐसी बात है तो अन्य कर्मफलोंकी प्राप्तिमें विघ्न करना भी देवताओंके लिये जल पीनेके समान [ सुलभ ] है । तब तो अभ्युदय ( भोग ) और निःश्रेयस ( मोक्ष ) के साधनों के अनुष्ठानमें विश्वास नहीं हो सकता । इसी प्रकार अचिन्त्य -शक्तिसम्पन्न होनेके कारण ईश्वर भी विघ्न करनेमें समर्थ हैं ही । तथा काल, कर्म, मन्त्र, ओषधि और तपका भी बहुत बड़ा प्रभाव है । शास्त्र एवं
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २७० एषां हि फलसम्पत्तिविपत्तिहेतुत्वं शास्त्रे लोके च प्रसिद्धम् । अतो-ऽप्यनाश्वासः शास्त्रार्थानुष्ठाने । न; सर्वपदार्थानां नियतनि-मित्तोपादानात्, तन्निराक्रियते जगद्वैचित्र्यदर्शना- । च्च । स्वभावपक्षे च तदुभयानुप-पत्तेः । ' सुखदुःखादि फल निमित्तं ' कर्म ' इत्येतस्मिन्पक्षे स्थिते वेद-स्मृतिन्यायलोकपरिगृहीते, देवे श्वरकालास्तावन्न कर्मफलविपर्या-सकर्तारः, कर्मणां काङ्क्षितकार -कत्वात् । कर्म हि शुभाशुभं पुरु- | पाणां देवकालेश्वरादिकारकमन-पेक्ष्य नात्मानं प्रति लभते, लब्धात्मकमपि फलदानेऽसम-र्थम्, क्रियाया हि कारकाद्यने-कनिमित्तोपादानस्वाभाव्यात् । तस्मात्क्रियानुगुणा हि देवेश्वरा-लोकमें फलकी प्राप्ति या अप्राप्ति में इनकी हेतुता प्रसिद्ध ही है । इसलिये भी शास्त्राज्ञाके अनुष्ठानमें अविश्वास ही रहेगा । समाधान - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि सभी पदार्थोंके निश्चित कारण ग्रहण किये जाते हैं तथा जगत् में सुख - दुःखादिवैचित्र्य भी देखा जाता है । यदि इन्हें स्वाभा-विक माना जाय तो ये दोनों बातें होनी सम्भव नहीं हैं । ' सुख - दुःखादि फलका निमित्त कर्म है ' इस वेद, स्मृति, न्याय और लोकद्वारा गृहीत पक्षके निश्चित होनेपर यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि देवता, ईश्वर और काल तो कर्मफलका विपर्यय करनेवाले हैं नहीं, क्योंकि वे तो कर्मानुष्ठान के अपेक्षित कारक हैं— देव, काल और ईश्वरादि कारकोंकी अपेक्षा न करके तो मनुष्योंका शुभाशुभ स्वतः सम्पन्न ही नहीं हो सकता । यदि सम्पन्न हो भी जाय तो वह फल देनेमें समर्थं नहीं होगा, क्योंकि कारकादि अनेकों निमित्तोंको ग्रहण करना क्रियाका स्वभाव ही है । अतः देवता और ईश्वरादि कर्मके गुणका | अनुसरण करनेवाले ही हैं, इसलिये ब्राह दय प्रत्य ६ त्या भा दुि लो फ मेव द्रव् सर्व कम स्मृ कर्म ( ब दय ली नही
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अध्याय १ अप्राप्तिमें है । इसलिये में अविश्वास हो सकता, के निश्चित हैं तथा वैचित्र्य भी इन्हें स्वाभा-दोनों बातें सुख - दुःखादि है ' इस वेद, द्वारा गृहीत निर्विवाद देवता, ईश्वर का विपर्यय कारक हैं— दि कारकोंकी मनुष्यों का सम्पन्न ही दिसम्पन्न फल देने में क कारकादि. करना अ कर्मके गुणका हैं, इस ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१ दय इति कर्मसु तावन्न फलप्राप्ति । प्रत्यविस्रम्भः । कर्मणामप्येषां वशानुगत्वं क्वचित्, स्वसामर्थ्यस्याप्रणोद्य-स्वात् । कर्मकालदैवद्रव्यादिस्व भावानां गुणप्रधानभाव स्त्वनियतो दुर्विज्ञेयश्चेति तत्कृतो मोहो लोकस्य - — कर्मैव कारकं नान्य त्फलप्राप्ताविति केचित्; देव-मेवेत्यपरे; का इत्येके; द्रव्यादिस्वभाव इति केचित् सर्व एते संहता एवेत्यपरे । तत्र कर्मणः प्राधान्यमङ्गीकृत्य वेद- । स्मृतिवादाः– “ पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन " ( बु ० उ ० ३। २। १३ ) इत्या -दयः । यद्यप्येषां स्वविषये कस्य-चित्प्राधान्योद्भव इतरेषां तत्का लीन प्राधान्यशक्तिस्तम्भः, तथापि उनके कारण कर्मोंमें फलप्राप्तिके प्रति अविश्वास नहीं हो सकता । इसके सिवा इन ( देवादि ) का विघ्न करना कर्मोंके भी अधीन है, क्योंकि कमोंके अपने सामर्थ्य-का कहीं बाध नहीं हो सकता । ' कर्म, काल, देव और द्रव्यादि स्वभावोंका गौण और मुख्य भाव अनिश्चित एवं दुर्विज्ञेय है । इसीसे उनके कारण लोगोंको मोह हो जाता है । किन्हींका मत है कि फलप्राप्ति में कर्म ही कारक है, और कोई कोई नहीं; कोई कहते हैं - दैव उसका हेतु है; किन्हीं का कथन है कि काल इसका कारण है; कोई द्रव्यादिके स्वभावको इसका हेतु बतलाते हैं और किन्हींका मत है कि वे सब मिलकर कर्मफल-प्राप्तिके हेतु हैं । इनमें कर्मकी प्रधानताको लेकर ही " पुण्यकर्मंसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पाप-कर्मसे पापी होता है " इत्यादि वेद और स्मृतिवाद प्रवृत्त होते हैं । यद्यपि अपने - अपने विषयमें इनमेंसे किसी - किसीकी प्रधानताका उदय होता है और उस समय अन्य कारकों की प्राधान्यशक्तिका निरोध १. अतः जबतक कोई पापमय अदृष्ट नहीं होगा, तबतक दुःखादिकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २७२ ब्राह न कर्मणः फलप्राप्तिं प्रत्यनै- | हो जाता है तथापि फलप्राप्ति विध कान्तिकत्वम्, शास्त्रन्यायनिर्धा-रितत्वात्कर्मप्राधान्यस्य । न अविद्यापगममात्रत्वाद् ब्रह्मप्राप्तिफलस्य - यदुक्तं ब्रह्म-प्राप्तिफलं प्रति देवा विघ्नं कुर्यु-रिति, तत्र न देवानां विघ्नकरणे | सामर्थ्यम्; कस्मात् १ विद्या-कालानन्तरितत्वाद् ब्रह्म प्राप्तिफल-स्य । कथम् १ यथा लोके द्रष्टु-चक्षुष च्यालोकेन संयोगो यत्कालः, तत्काल एव रूपाभिव्यक्तिः । एवमात्मविषयं विज्ञानं यत्कालम्, तत्काल एव तद्विषयाज्ञानतिरो-भावः स्यात् । अतो ब्रह्मविद्यायां सत्यामविद्याकार्यानुपपत्तेः प्रदीप कर्मका अनैकान्तिकत्व ( अप्राधान्य ) देव नहीं है, क्योंकि शास्त्र और न्यायसे कर्मकी प्रधानता निश्चित है । ध्ये तथा ब्रह्मविद्या के फल में विघ्न नहीं पड़ता, क्योंकि ब्रह्मप्राप्तिका फल तो हि केवल अविद्याकी निवृत्ति ही है । ऊपर जो यह कहा गया था कि वि. विद्या ( ज्ञान ) के ब्रह्मप्राप्तिरूप फलमें वा । देवगण विघ्न करेंगे सो उसमें विघ्न करनेकी देवताओं में शक्ति नहीं चि है । क्यों नहीं है? क्योंकि ब्रह्म-प्राप्तिरूप फल तो ज्ञान होनेके शु समय ही प्राप्त हो जाता है । ना किस प्रकार? जिस प्रकार लोकमें देखनेवालेके नेत्रोंका प्रकाशके साथ प्रय जिस समय संयोग होता है उसी ह्यन समय रूपकी अभिव्यक्ति हो जाती है । उसी प्रकार जिस समय आत्म- त्ता विषयक ज्ञान होता है उसी समय सप तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है । अतः जिस प्रकार देव दीपकके रहते हुए अन्धकारका अ कार्य नहीं रहता उसी प्रकार ब्रह्म-विद्याके रहते हुए अविद्याका कार्य रि रहना असम्भव है । जब कि इव तमः कार्यस्य, केन कस्य ब्रह्मवेत्ता देवताओंके आत्मत्वको ही
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- अध्याय १ फलप्राप्ति में ( अप्राधान्य ) और न्यायसे त है । में विघ्न नहीं प्तिका फल तो निवृत्ति ही है । गया था कि प्राप्तिरूपफलमें उसमें विघ्न शक्ति नहीं क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान होनेके हो जाता है । प्रकार लोकमें प्रकाशके साथ होता है उसी क्ति हो जात स समय आत्म-है उसी समय निवृत्ति हो जिस प्रकार - अन्धकारका सी प्रकार ब्रह्म-अविद्याका कार्य है । जब कि के आत्मत्वको ही ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ विघ्नं कुर्युर्देवाः — यत्रात्मत्वमेव । देवानां ब्रह्मविदः । तदेतदाह - आत्मा स्वरूपं ध्येयं यत्तत्सर्वशास्त्रैर्विज्ञेयं ब्रह्म, हि यस्मात् एषां देवानाम् स ब्रह्म-विद्भवति । ब्रह्मविद्यासमकाल मे -वाविद्यामात्रव्यवधानापगमाच्छु-चिकाया इव रजताभासायाः शुक्तिकात्वमित्यवोचाम । अतो नात्मनः प्रतिकूलत्वे देवानां प्रयत्नः सम्भवति । यस्य ह्यनात्मभूतं फलं देशकालनिमि-तान्तरितम्, तत्रानात्मविषये सफलः प्रयत्नो विघ्नाचरणाय देवानाम् । न त्विह विद्यासमकाल आत्मभूते देशकालनिमित्तानन्त-रिते, अवसरानुपपत्तेः । वृ ० उ ० १८-२७३ प्राप्त हो जाता है तो देवगण किसके द्वारा किसे विघ्न करेंगे? यही बात श्रुति कहती है-क्योंकि वह ब्रह्मवेत्ता इन देवताओं-का आत्मा - ध्येयस्वरूप अर्थात् जो सम्पूर्ण शास्त्रोंसे विज्ञेय ब्रह्म है वही हो जाता है, क्योंकि हम कह चुके हैं कि रजतरूपसे भासनेवाली शुक्ति शुक्तिकात्वका ज्ञान होते ही जैसे भ्रान्तिजनित रजतत्वकी निवृत्ति हो जाती है वैसे ही ब्रह्मज्ञान होने के समय ही अविद्यामात्र व्यवधानकी निवृत्ति हो जाती है । अत: आत्माकी प्रति-कुलतामें देवताओंका प्रयत्न होना सम्भव नहीं है । जहाँ देश, काल और निमित्तसे व्यवहित अनात्मभूत फल होता है वहाँ अनात्मविषयमें ही विघ्न करनेके लिये देवताओंका प्रयत्न सफल हो सकता है । यहाँ देश, काल और निमित्तसे अव्यव-हित और ज्ञानोदयकालमें हो देवताओंके आत्मत्वको प्राप्त हो जानेवाले ब्रह्मवेत्ता के प्रति विघ्न करनेमें उनका प्रयत्न सफल नहीं होता, क्योंकि इसके लिये उन्हें अवसर मिलना ही सम्भव नहीं है ।
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वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २७४ एवं तर्हि विद्याप्रत्ययसन्त-अविद्यानिवृत्तौ त्यभावाद् विपरी-विद्यावृत्तेः सामर्थ्य - तप्रत्ययतत्कार्ययोश्व विवेचनम् दर्शनाद् अन्त्य एवात्मप्रत्ययोऽविद्यानिवर्तको न पूर्व इति । न; प्रथमेनानैकान्तिकत्वात् । यदि हि प्रथम आत्मविषयः प्रत्य-योऽविद्यां न निवर्तयति, तथा-न्त्योऽपि " तुल्यविषयत्वात् । एवं तहिं सन्ततोऽविद्यानि-वर्तको न विच्छिन्न इति । न, जीवनादौ सति सन्तत्य-नुपपत्तेः । न हि जीवनादिहेतुके प्रत्यये सति विद्याप्रत्यय सन्तति-रुपपद्यते, विरोधात् । अथ जीवना-दिप्रत्यय तिरस्करणेनैव या मरणा-पूर्व ० - यदि ऐसी बात है तो बोधवृत्तिके प्रवाहका अभाव होनेके कारण तथा विपरीत वृत्ति और उसका कार्य देखा जानेसे यह निश्चय होता है कि अन्तिम आत्मा-कारवृत्ति ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाली हो सकती है, पहली नहीं । सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रथम आत्मप्रत्ययकी तरह अन्तिम प्रत्यय भी व्यभिचारी हो सकता है । यदि आत्मविषयक प्रथम प्रत्यय अविद्याकी निवृत्ति नहीं करता तो उसी तरह अन्तिम प्रत्यय भी नहीं करेगा, क्योंकि विषय ही है । पूर्व ० - यदि ऐसी बात है तो संतत ( अविच्छिन्न ) आत्मप्रत्यय ही अविद्याका निवर्तक हो सकता है, विच्छिन्न नहीं । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जीवनादिके रहते हुए आत्माकारवृत्तिकी सन्तति ( अवि-च्छिन्नता ) सम्भव सम्भव नहीं है ॥ जीव नादिकी हतुभूता वृत्तिकै रहते हुए बोधवृत्तिकी अविच्छिन्नता सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें विरोध है । यदि कहो, जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तियों का तिरस्कार कर के ही मरण-ब्राह न्त येय थ या के I स चेत प्रथ का अ दो च ( श्र