बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 281–290
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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- अध्याय १ बात है तो अभाव होने के वृत्ति और जानेसे यह न्तिम आत्मा-की निवृत्ति ती है, पहली मत कहो, की तरह व्यभिचारी आत्मविषयक की निवृत्ति तरह अन्तिम रेगा, क्योंकि ही है । आत्मप्रत्यय क हो सकता बात नहीं है, रहते हुए न्तति ( अवि-है । जीव-के रहते हुए नता सम्भव विरोध है । की हेतुभूता रके ही मरण-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५ न्ताद्विद्यासन्ततिरिति चेन्न, प्रत्य-! येयत्तासन्तानानवधारणाच्छास्त्रा-र्थानवधारणदोषात् । इयतां प्रत्य-यानां सन्ततिरविद्याया निवर्ति-केल्यनवधारणाच्छास्त्रार्थो नाव-प्रियेत, तच्चानिष्टम् । सन्ततिमात्रत्वेऽवधारित एवेति चेत्? न, आद्यन्तयोरविशेषात् । प्रथमा विद्याप्रत्ययसन्ततिर्मरण-कालान्ता वेति विशेषाभावात् श्राद्यन्तयोः प्रत्ययोः पूर्वोक्तौ दोषौ प्रसज्येयाताम् । एवं तह्य निवर्तक एवेि चैत १ न, “ तस्मात्तत्सर्वमभवत् " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) इति श्रुतेः । “ भिद्यते हृदयग्रन्थिः ” पर्यन्त बोधवृत्तिका प्रवाह रहेगा तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि बोधवृत्तियों की इयत्ताके प्रवाहका निश्चय न होनेके कारण शास्त्राभि-प्रायके अनिश्चयका दोष आवेगा । अर्थात् इतनी वृत्तियोंका प्रवाह अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है— ऐसा निश्चय न होनेके कारण शास्त्रका तात्पर्य निश्चित नहीं होगा और यह इष्ट नहीं है । पूर्व ० - यदि ऐसा मानें कि वोध-वृत्तिकी संततिमात्र होने में तो शास्त्र-का तात्पर्य निश्चित ही है, तो? सिद्धान्ती - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी अवस्थामें भी आद्य प्रवाह और अन्तिम प्रवाहमें कोई अन्तर नहीं है । बोधवृत्तिका प्रथम प्रवाह हो अथवा मरणकालमें समाप्त होनेवाला हो- - इन आद्य और अन्तिम प्रत्ययोंमें कोई अन्तर न होनेके कारण पूर्वोक्त दोनों दोषोंका प्रसंग होगा । पूर्व ० - तब तो आत्माकारवृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाली है ही नहीं! — ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि " अतः वह सर्व हो गया " इस श्रुतिसे तथा " हृदयकी ग्रन्थि
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२७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ( मु ० उ ० २ । २ । ८ ) । “ तत्र | को मोहः " ( ईशा ० ७ ) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च । अर्थवाद इति चेत्? न, सर्वशाखोपनिषदामर्थवाद-त्वप्रसङ्गात् । एतावन्मात्रार्थत्वो-पक्षीणा हि सर्वशाखोपनिषदः । प्रत्यक्षप्रमितात्मविषयत्वाद-स्त्येवेति चेत् १ न, उक्तपरिहारत्वात् । अवि-द्याशोकमोहभयादिदोषनिवत्तेः प्रत्यक्षत्वादिति चोक्तः परिहारः । तस्मादाद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्तत -श्वेत्यचोद्यमेतत् । श्रविद्यादिदोष-निवृत्तिफलावसानत्वाद्विद्यायाः । य एवाविद्यादिदोषनिवृत्तिफल-कृत्प्रत्यय आद्योऽन्त्यः सन्ततो-' सन्ततो वा स एव विद्येत्यभ्युप-टूट जाती है, " " उस अवस्थामें क्या ब्रा मोह है ” इत्यादि श्रुतियोंसे [ ज्ञान-द्वारा अज्ञानकी निवृत्ति ] सिद्ध ग होती है । S पूर्व ० - वे श्रुतियाँ अर्थवाद हों तो? सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि इस प्रकार तो समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंके अर्थवाद होने का प्रसंग यो • उपस्थित होगा; क्योंकि समस्त सि शाखाओंकी उपनिषदोंका पर्यवसान केवल इतने ही अर्थ में है । श पूर्व ० - यदि कहें, प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात होनेवाले आत्मासे सम्बद्ध होनेके कारण उनका अर्थवादत्व है नि ही, तो? सिद्धान्ती नहीं, इसका परिहार वि पहले किया जा चुका है । इसके सिवा आत्मज्ञानसे अविद्या, शोक, दा मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृ- पा त्तिका प्रत्यक्ष अनुभव होनेसे भी इस शङ्काका परिहार किया जा चुका है । अत: आद्य हो, अन्त्य हो, अविच्छिन्न हो, विच्छिन्न हो, ता उसके विषयमें शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ज्ञान तो अविद्यादि त्प्र दोषोंकी निवृत्तिरूप फलमें ही पर्य-वसित होनेवाला है । जो भी प्रत्यय तेन अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फल प्रदान करनेवाला हो वह आद्य, श्रा अन्त्य, अविच्छिन्न, विच्छिन्न कैसा ही हो, वही ज्ञान माना जाता है; देव
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[ अध्याय १ अवस्थामें क्या योंसे [ ज्ञान-वृत्ति ] सिद्ध वाद हों तो? कहो, क्योंकि शाखाओंकी होने का प्रसंग योंकि समस्त का पर्यवसान है । त्यक्ष प्रमाणसे मासे सम्बद्ध अर्थवादत्व है इसका परिहार है । इसके विद्या, शोक, दोषों की निवृ-व होनेसे भी र किया जा हो, अन्त्य हो, चच्छिन्न हो, नहीं की जा तो अविद्यादि फल में ही पर्य-जो भी प्रत्यय निवृत्तिरूप फल वह आद्य, विच्छिन्न कैसा ना जाता है; ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७७ गमान्न चोद्यस्यावतारगन्धो-, इसलिये इसमें शङ्का उठनेका तो ऽप्यस्ति । अवकाश ही नहीं है । यत्तूक्तं विपरीत प्रत्यय तत्कार्य-योश्च दर्शनादिति, न; तच्छेप -स्थितिहेतुत्वात् ॥ येन कर्मणा शरीरमारब्धं तद्विपरीत प्रत्ययदोष-निमित्तत्वात्तस्य तथाभूतस्यैव विपरीत प्रत्ययदोषसंयुक्तस्य फल-दाने सामर्थ्यमिति, यावच्छरीर-पातः तावत्फलोपभोगाङ्गतया विपरीतप्रत्ययं रागादिदोषं च तावन्मात्रमाक्षिपत्येव, मुक्तेषुव -त्प्रवृत्तफलत्वात्तद्धेतुकस्य कर्मणः । तेन न तस्य निवर्तिका विद्या, अविरोधात् । किं तर्हि स्वाश्रया-देव स्वात्म विरोध्य विद्याकार्य यदु- । और यह जो कहा कि [ ' मैं ब्रह्म नहीं हूँ ' ऐसा ] विपरीत प्रत्यय और उसका कार्य देखे जानेसे आत्मज्ञान अविद्याका निवर्तक नहीं है, सो ठीक नहीं; क्योंकि वह तो प्रारब्धशेषकी स्थिति के कारण है । जिस कर्मसे विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है, वह विपरीत प्रत्यय और रागादि दोषजनित होनेके कारण उसका तद्रूपसे यानी विप-रीत कारण प्रत्यय उस और रागादि दोषोंसे संयुक्त रहकर ही फलप्रदान में सामर्थ्य है, अतः जबतक शरीरपात नहीं III II II II II I होता तबतक वह फलोपभोगके अङ्ग-रूपसे उतना - सा विपरीत प्रत्यय और रागादि दोष उपस्थित कर ही देता है, क्योंकि वह शरीरारम्भक कर्म छोड़े हुए बाणके समान फल-प्रदानमें प्रवृत्त हो चुका है । अतः ज्ञान उसको निवृत्ति करनेवाला नहीं है, क्योंकि उससे उसका विरोध नहीं है । तो फिर वह किसकी निवृत्ति करता है? —स्वाश्रित होनेके कारण जो अपना विरोधी अविद्याका कार्यं
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २७८ त्पित्सु तन्निरुणद्धि, अनागत- । त्वात् । अतीतं हीतरत् । किञ्च, न च विपरीतप्रत्ययो विद्यावत उत्पद्यते, निर्विषय-स्वात् । अनवधुत विषय विशेषस्व-रूपं हि सामान्य मात्रमाश्रित्य विपरीतप्रत्यय उत्पद्यमान उत्प-द्यते, यथा शुक्तिकायां रजत-मिति । स च विषयविशेषाव-धारणवतोऽशेषविपरीतप्रत्यया-श्रयस्योपमर्दितत्वान्न पूर्ववत्स-स्भवति, शुक्तिकादौ सम्यक्प्रत्य-योत्पत्तौ पुनरदर्शनात् ।... कचित्तु विद्यायाः पूर्वोत्पन्न-विपरीतप्रत्यय जनितसंस्कारेभ्यो विपरीत प्रत्ययावभासाः स्मृतयो जायमाना विपरीतप्रत्ययभ्रान्ति-मकस्मात्कुर्वन्ति; यथा विज्ञात-ब्राह उत्पन्न होनेवाला होता है, उसे ही वह रोकता है; क्योंकि वह अनागत सम है और प्रारब्ध तो अतीत है । विज्ञ इसके सिवा, विद्वान्को विपरीत रूप प्रत्यय उत्पन्न हो भी नहीं सकता, क्योंकि उसके लिये कोई विषय घेत नहीं रहता । विषयके विशेष स्वरूप- पप का निश्चय न होनेपर उसके सामान्य ए स्वरूपको आश्रित करके उत्पन्न शरी होनेवाला ही विपरीत प्रत्यय उत्पन्न परि होता है; जैसे शुक्तिमें रजत । किंतु तत्व जिसे विषय के विशेष रूपका निश्चय कम हो गया है, उसकी दृष्टिमें सब सिद्ध प्रकार के विपरीत प्रत्ययके आश्रयका निष बाध हो जानेके कारण उसका कम पूर्ववत् उत्पन्न होना सम्भव नहीं है; " त जैसे कि शुक्तिकादिमें, उनका सम्य- उ ० ज्ञान हो जानेपर फिर रजतादिका पा भ्रम होता नहीं देखा 1. ५ । परंतु कभी - कभी ज्ञानोदयसे लिए | पूर्वपन्न पूर्व उत्पन्न हुए विपरीत प्रत्यय-उ ० ! जनित संस्कारोंसे विपरीत प्रत्ययके तरत समान भासनेवाली स्मृतियाँ उत्पन्न कृत होकर अकस्मात् विपरीत प्रत्ययकी " ए भ्रान्ति पैदा कर देती हैं, जिस प्रकार उ ० दिग्विभागस्याप्यकस्माद्दिग्विपर्य- दिशाओंके विभागको अच्छी तरह कुत यविभ्रमः । सम्यग्ज्ञानवतोऽपि जाननेवाले पुरुषको भी अकस्मात श्रुति चेत्पूर्ववद्विपरीतप्रत्यय दिग्भ्रम पैदा हो जाता है । यदि कम उत्पद्यते, सम्यग्ज्ञानवान्को भी पूर्ववत् विपरीत
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[ अध्याय १ ना है, उसे ही वह अनागत तीत है । नको विपरीत नहीं सकता, कोई विषय विशेष स्वरूप-उसके सामान्य करके उत्पन्न - प्रत्यय उत्पन्न रजत । किंतु रूपका निश्चय दृष्ट सब यके आश्रयका कारण उसका सम्भव नहीं है; - उनका सम्य-रजतादिका जाता ।.. ज्ञानोदयसे परीत प्रत्यय--परीत प्रत्यय स्मृतियाँ उत्पन्न रीत प्रत्ययकी हैं, जिस प्रकार अच्छी तरह भी अकस्मात ता है । यदि पूर्ववत् विपरीत ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ ९ सम्यग्ज्ञानेऽप्य विस्रम्भाच्छास्त्रार्थ -विज्ञानादौ प्रवृत्तिरसमञ्जसा स्यात्सर्वं च प्रमाणमप्रमाणं सम्प-द्येत प्रमाणाप्रमाणयोर्विशेषानु-पपत्तेः । एतेन ' सम्यग्ज्ञानानन्तरमेव शरीरपाताभावः कस्मात्? ' इत्येतत् परिहृतम् । ज्ञानोत्पत्तेः प्रागूध्व तत्कालजन्मान्तरसञ्चितानां च कर्मणामप्रवृत्तफलानां विनाशः सिद्धो भवति फलप्राप्तिविघ्न निषेधश्रुतेरेव । " क्षीयन्ते चास्य कर्माणि " ( मु ० उ ० २ ।२।८ ) । " तस्य तावदेव चिरम् " ( छा ० उ ० ६ । १४ । २ ) " सर्वे | पाप्मानः प्रदूयन्ते " ( छा ० उ ० ५ । २४ । ३ ) । “ तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन " ( बृ ० ० ४।४।२३ ) । " एतमु हैवैते न उ तरतः ” ( ( ४। 818133 ४। ) 1 " नैनं कृताकृते तपतः " ( ४।४ / २२ ) । " एतं ह वाव न तपति " ( तै ० उ ० २ । ९ । १ ) । “ न विभेति कुतश्चन " ( तै ० उ०२।९ ।१ ) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च । “ ज्ञानाग्निः सब कर्माणि भस्मसात्कुरुते " ( गीता । | प्रत्यय उत्पन्न हो जाय तो सम्य-ज्ञानमें भी अविश्वास हो जानेसे ! शास्त्रके तात्पर्यं और विज्ञानादिमें प्रवृत्ति होनी कठिन हो जाय और फिर सारा प्रमाण अप्रमाण हो जाय, क्योंकि उस अवस्थामें प्रमाण और अप्रमाणमें कोई अन्तर ही न रहेगा । इस ( छोड़े हुए बाणके ) न्याय-से इस शङ्काका परिहार किया गया कि सम्यग्ज्ञानके पश्चात् तुरंत ही देहपात क्यों नहीं होता? ज्ञानो-त्पत्तिसे पूर्वं, उसके पीछे और उसकी उत्पत्तिके समय होनेवाले तथा जन्मान्तरके सञ्चित फल कर्मोंका विनाश तो “ तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते ” इस ज्ञानफलकी प्राप्तिके विघ्नका निषेध करनेवाली श्रुतिसे ही सिद्ध होता है । तथा " इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ", " उसके मोक्षमें तभी-तक दे भस्म हो जाते हैं ”, “ उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता ", " ये पाप - पुण्य इस ( आत्मज्ञानी ) का अतिक्रमण नहीं कर सकते ”, “ इसे पाप - पुण्य संतप्त नहीं करते ", " उसीको ताप नहीं देता ”, “ किसी-से नहीं डरता " इत्यादि श्रुतियों और " ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म कर
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२८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ४ । ३७ ) इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ॥ यत्तु ऋणैः प्रतिबध्यत इति, कर्मणामविद्या- तन्न, श्रविद्यावद्वि-वद्विषयत्वम् षयत्वात् । अविद्या-बान्दि ऋणी, तस्य कर्तृत्वाद्युप-पत्तेः । " यत्र वा अन्यदिव स्या-चत्रान्योऽन्यत्पश्येत् ” ( ४ । ३ । ३१ ) इति हि वक्ष्यति । अनन्य-त्सद्वस्त्वात्माख्यं यत्राविद्यायां सत्यामन्यदिव स्यात्तिमिरकृतद्वि-तीयचन्द्रवत्, तत्राविद्या कृतानेक-कारकापेक्षं दर्शनादिकर्म तत्कृतं फलं च दर्शयति, “ तत्रान्योऽन्यत्प-श्येत् ” इत्यादिना । यत्र पुनर्विद्यायां सत्याम-विद्याकृतानेकत्वभ्रमप्रहाणम्, “ त-त्केन कं पश्येत् ” ( ४ । ५ । १५ ) इतिकर्मासम्भवं दर्शयति । तस्मा-दविद्यावद्विषय एव ऋणित्वम्, कर्मसम्भवात्; नेतरत्र । एतच्चोत्तरत्र ब्रा देती है " इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है । व्य और यह जो कहा गया कि यह ऋणोंसे बँधा हुआ है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ऋणोंका सम्बन्ध तो का अविद्वान्से ही है । अज्ञानी पुरुष ही ऋणी है; क्योंकि उसी में कर्तृत्वादि ति रहने सम्भव हैं । " जहाँ अन्यके समान होता है वहीं अन्य अन्यको स्त देख सकता है " ऐसा श्रुति कहेगी णि भी । तात्पर्य यह है कि आत्मा-संज्ञक सद्वस्तु अनन्य है, वह जहाँ त अविद्यावस्थामें तिमिर रोगकृत झ द्वितीय चन्द्रके समान अन्यके समान होती है, वहींपर श्रुति " वहाँ अन्य अन्यको देखेगा " इस वाक्यसे अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला अविद्याकृत दर्शनादि कर्म और उससे होनेवाला फल भी दिखाती है । किंतु जहाँ ज्ञानका उदय होने- त पर अज्ञानजनित अनेकत्वभ्रमका नाश हो जाता है, वहाँ " तब किसके द्वारा किसे देखे " यह श्रुति कर्मकी असम्भवता दिखलाती है । अतः ऋणित्वका अविद्वान्से ही सम्बन्ध T है, क्योंकि उसीके द्वारा कर्म होना सम्भव है, अन्य ( ज्ञानवान् ) से नहीं । यहीं बात आगे, जिन वाक्यों-
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[ अध्याय १ स्मृतियोंसे भी हा गया कि यह है, सो ठीक का सम्बन्ध तो ज्ञानी पुरुष ही नीमें कर्तृत्वादि " जहाँ अन्यके अन्य श्रुति कहेगी कि आत्मा-- है, वह जहाँ मिर रोगकृत अन्य समान ति " वहाँ अन्य वाक्यसे अनेक ला अविद्याकृत इससे होनेवाला 1 189 का उदय होने-अनेकत्वभ्रमका हाँ " तब किसके श्रुतिकर्मकी बती है । अतः से ही सम्बन्ध द्वारा कर्म होना ( ज्ञानवान् ) से जिन वाक्यों-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभा २८१ व्याचिख्यासिष्यमाणैरेव वाक्यै - । विस्तरेण प्रदर्शयिष्यामः । तद्यथे व अथ यः कश्चिदब्रह्मविद् अन्यामात्मनो व्य-तिरिक्तां यां का श्चिदेवताम्, उपास्ते स्तुति नमस्कारया गबल्युपहारप्र-णिधानध्यानादिना उप आस्ते तस्या गुणभावमुपगम्य श्रास्ते- -अन्योऽसावनात्मा मत्तः पृथक, अन्योऽहमस्म्यधिकृतः, मयास्मै ऋणिवत्प्रतिकर्तव्यम् - इत्येवम्प्र -त्ययः सन्नुपास्ते; न स इत्थम्प्र-त्ययो वेद विजानाति तत्त्वम् । न स केवलमेवंभूतोऽविद्वा-नविद्यादोषवानेव, किं तर्हि? यथा पशुर्गवादिर्वाहनदोहनाद्युपकारैरु-पभुज्यते, एवं स इज्याद्यनेको-पकारैरुपभोक्तव्यत्वादेकैकेन की व्याख्या करनेकी हमारी इच्छा है, उनसे विस्तारपूर्वक दिखायेंगे 1 वह बात [ ऐसी है ] जैसी कि यहाँ ( इस मन्त्रमें ) भी कही गयी है और जो कोई अब्रह्मज्ञ अन्य— अपनेसे भिन्न जिस किसी भी देवता-की उपासना करता है - स्तुति, नम-स्कार, यज्ञ, बलि, उपहार, प्रणि-धान ( सर्वकर्मार्पण ) और ध्याना-दिद्वारा उसके समीप उपस्थित होता है अर्थात् उसके गुणभाव ( शेषत्व ) को प्राप्त होकर रहता है और [ मनमें यह भाव रखता है कि ] वह देवता अन्य - अनात्मा यानी मुझसे पृथक् है तथा मैं उपासनाका अधिकारी इससे भिन्न हूँ, मुझे ऋणीके समान इसके उपकारका बदला चुकाना चाहिये - ऐसे भावसे युक्त होकर उसकी उपासना करता है, वह इस प्रकारके भाववाला पुरुष तत्त्वको नहीं जानता । वह ऐसा अज्ञानी केवल अविद्या रूप दोष बसे से ही युक्त नहीं है, तो फिर कैसा है? जिस प्रकार गौ - बेल आदि पशु दोहन और वाहनादि उपकारोंसे उपभोगमें लाया जाता है, उसी प्रकार वह यज्ञादि अनेकों उपकारोंके कारण एक - एक देवादिका । उपभोग्य होनेसे [ उनका पशु ही है ] ।
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२८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ देवादीनाम्, अतः पशुरिव । सर्वार्थेषु कर्मस्वधिकृत इत्यर्थः । एतस्य ह्मविदुषो वर्णाश्रमादि-प्रविभागवतोऽधिकृतस्य कर्मणो विद्यासहितस्य केवलस्य च शास्त्रो -तस्य कार्य मनुष्यत्वादिको ब्रह्मा -न्त उत्कर्षः । शाखोक्त विपरीतस्य च स्वाभाविकस्य कार्य मनुष्य-त्वादिक एव स्थावरान्तोऽपकर्षः । यथा चैतत्तथा “ अथ त्रयो वादा लोका: " ( १ । ५ । १६ ) इत्या-दिना वक्ष्यामः कृत्स्नेनैवाध्याय-शेषेण । विद्यायाश्च कार्य सर्वात्मभावा-पत्तिरित्येतत्सङ्क्षेपतो दर्शितम् । सर्वाहीयमुपनिषद् विद्याविद्याविभा-गप्रदर्शनेनैवोपक्षीणा । यथा चै-पोऽर्थः कृत्स्नस्य शास्त्रस्य तथा प्रदर्शयिष्यामः । यस्मादेवम्, तस्मादविद्यावन्तं एक देवानां अद्विषं निग्रहानु- प्रति देवा ग्रहसामर्थ्यम् ईशत एव विघ्नं कर्तुमनुग्रहं - चेत्येतद्दर्शयति -ब्राह अतः तात्पर्य यह है कि वह पशुके | समान सब प्रकारके फल देनेवाले यथ कर्मोंका अधिकारी है । गो इस वर्णाश्रमादि विभागवान् स्वा कर्माधिकारी अविद्वान्के ज्ञानसहित पाल तथा केवल शास्त्रोक्त कर्मोंका को कार्यं मनुष्यत्वसे लेकर ब्रह्मत्वपर्यंन्त ति उत्कर्ष होना है तथा शास्त्रोक्तसे विरुद्ध जो स्वाभाविक कर्म हैं,. पाठ उसका कार्य मनुष्यत्वसे लेकर मत्त स्थावर योनियोंतक अधोगति होना स्तु है । यह जिस जि प्रकार है, उस सबका त्वा हम इस अध्यायके अन्तमें “ अथ फल त्रयो वाव लोकाः " इत्यादि वाक्य-से सम्यक् प्रकारसे वर्णन करेंगे । का तथा ज्ञानका कार्य सर्वात्म- म्रा भावका भावकी प्राप्ति है, यह बात सक्षपतः भन दिखलायी गयी है । यह सारी ही स्मि उपनिषद् ज्ञान और अज्ञानका विभाग प्रदर्शित करनेमें ही समाप्त त्य हुई है । सम्पूर्ण शास्त्रोंका यही देव अभिप्राय जिस प्रकार है, सो हम आगे दिखलायेंगे. 1 प्रि क्योंकि ऐसा है, इसलिये अब त श्रुति यह दिखलाती है कि देवगण जा अविद्वान् पुरुषके प्रति ही विघ्न या भग अनुग्रह करने में समर्थ होते हैं । जिस
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[ अध्याय १ कि वह पशुके फल देनेवाले 1 विभागवान् के ज्ञानसहित क्त कर्मोंका ब्रह्मपर्यन्त शास्त्रोक्त कर्म है, त्व से लेकर धोगति होना है, उस सबका अन्त में " अथ त्यादि वाक्य-गं करेंगे । कार्य सर्वात्म-बात संक्षेपतः यह सारी ही अज्ञानका में ही समाप्त खोंका यही है, सो हम इसलिये अ कि देवगण ही विघ्न या ते हैं । जिस ब्राह्मण ४ ] यथाह वै लोके बहवो | गोअश्वादयः पशवो मनुष्यं स्वामिनमात्मनोऽधिष्ठातारं भुञ्ज्युः पालयेयुरेवं बहुपशुस्थानीय एकै-को s विद्वान्पुरुषो देवान् — देवानि -ति पित्राद्युपलक्षणार्थम् — भुनक्ति पालयतीति । इस इन्द्रादयोऽन्ये मत्तो ममेशितारो भृत्य इवाहमेषां स्तुति नमस्कारेज्यादिनाराधनं कृ- । त्वाभ्युदयं निःश्रेयसं च तत्प्रत्तं -फलं प्राप्स्यामीत्येवमभिसन्धिः । तत्र लोके बहुपशुमतो यथै-कस्मिन्नेव पशावादीयमाने व्या- । ब्रादिना पहियमाणे महदप्रियं भवति, तथा बहुपशुस्थानीय एक-स्मिन्पुरुषे पशुभावाद् व्युत्तिष्ठ-त्यप्रियं भवतीति " किं चित्रं देवानां बहुपश्वपहरण इव कुटु- । म्बिनः । तस्मादेषां देवानां तन्न । प्रियम्, किं तत्? यदेतद्ब्रह्मात्म-तत्त्वं कथञ्चन मनुष्या विद्युर्वि-जानीयुः तथा च स्मरणमनुगीतासु भगवतो व्यासस्य-२८३ प्रकार लोकमें गौ - घोड़े आदि बहुत-पशु अपने स्वामी - अधिष्ठाता मनुष्यका भरण - पालन करते हैं, उसी प्रकार अनेक पशुस्थानीय एक-एक अज्ञानी पुरुष देवताओंका भरण - पालन करता है । ' देवान् ' यह पद पितृगणादिका भी उपलक्षण कराता है । ' मुझसे भिन्न ये इन्द्रादि मेरे शासक हैं, मैं सेवकके समान स्तुति, नमस्कार एवं यज्ञादिसे इनकी आराधना करके इनके दिये हुए भोग और मोक्ष सब फल प्राप्त करूंगा ' इस प्रकार अज्ञानीका संकल्प होता है । ऐसी अवस्थामें, जिस प्रकार लोकमें किसी बहुत - से पशुओंवाले पुरुषके एक पशुके भी चले जानेपर-व्याघ्रादि द्वारा हरण कर लिये जानेपर उसे बहुत बुरा मालूम होता है, उसी प्रकार किसी कुटुम्बी-के बहुत - से पशु चुरा लिये जानेके समान अनेक पशुस्थानीय एक पुरुषके भी पशुभावसे उठ जानेपर यदि देवताओंको अच्छा नहीं लगता तो इसमें आश्चर्यं क्या है? अत: इन देवताओंको यह प्रिय नहीं है; क्या? यही कि ये मनुष् ब्रह्मात्मतत्त्वको किसी प्रकार भी जानें । ऐसी ही अनुगीतामें भगवान्
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! २८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह " क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः समावृतः । न चैतदिष्टं देवानां मत्यैरुपरि वर्तनम् || " श्रतो देवाः पशूनिव व्याघ्रा -दिभ्यो ब्रह्मविज्ञानाद्विघ्नमाचि-कीर्षन्ति श्रस्मदुपभोग्यत्वान्मा व्युत्तिष्ठेयुरिति । यं तु मुमोच यिषन्ति तं श्रद्धादिभिर्योक्ष्यन्ति विपरीतमश्रद्धादिभिः । तस्मान्मु- । मुक्षुर्देवाराधनपरः श्रद्धाभक्तिपरः प्रणेयोऽप्रमादी स्याद्विद्याप्राप्तिं प्रति विद्यां प्रतीति वा काक्वै तत्प्रदर्शितं भवति देवाप्रिय-वाक्येन ॥ १० ॥
| -१. शोक या भय आदिके कारण उत्पन्न होता है उसे ‘ काकु ' कहते हैं । ऐसा तथा कहकर काकूक्तिसे यह बतलाया है उपासनादिके द्वारा द्वार देवताओंकी व्यासकी स्मृति भी है- " हे कौन्तेय! देवलोक कर्मपरायण पुरुषोंसे भरा चोप हुआ है । देवताओंको यह इष्ट नहीं है कि मनुष्य उनसे ऊपर ( ब्रह्म- चि लोकादिमें ) रहें । " हुर्य अतः देवगण, यह सोचकर कि हमारे उपभोग्य होनेके कारण मनुष्य सभ हमसे ऊपर न उठने पावें, पशुओंको अ दूर रखनेके समान मनुष्योंको ब्रह्मविज्ञान से दूर रखने के त्वम लिये विघ्न उपस्थित करते हैं । वे मुप जिसे मुक्त करना चाहते हैं उसे श्रद्धादि साधनोंसे सम्पन्न कर देते द्वा हैं और जिसे मुक्त नहीं करना तय चाहते ' उसे अश्रद्धादियुक्त कर देते f हैं । अतः मोक्षकामी पुरुषको देवा- निि राधनतत्पर, श्रद्धाभक्तिपरायण, देवताओंका प्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके तत्र साधन श्रवणादि अथवा उनके फल- यदि भूत ज्ञानके प्रति अप्रमादयुक्त होना चाहिये – यह भाव देवताओंका तन्त्र अप्रियत्व बतलानेवाले वाक्यसे काकूक्तिद्वारा ' प्रदर्शित होता एतर है ॥ १० ॥ नन्त
पुरुषके स्वरमें जो एक प्रकारका कम्प स्तु श्रुतिमें ' देवताओंको यह प्रिय नहीं है ' पूर कि मोक्षकामीको ज्ञानप्राप्तिके साधनों में दिस चाहिये । प्रसन्नता प्रस् सम्पादन करनेमें सावधान रहना BEDEO