बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 291–300
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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[ अध्याय १ - " हे कौन्तेय! पुरुषोंसे भरा को यह इष्ट नहीं ऊपर ( ब्रह्म-यह सोचकर कि के कारण मनुष्य पावें, पशुओं को खने के समान नसे दूर रखने के करते हैं 1 । वे चाहते हैं उसे सम्पन्न कर देते नहीं करना दियुक्त कर देते पुरुषको देवा-भक्तिपरायण, ना ज्ञानप्राप्ति के वा उनके फल-मायुक्त होना देवताओंका बाले वाक्यसे दर्शित होता प्रकारका कम्प ह प्रिय नहीं है ' नाप्ति साधनों में सावधान रहना ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ सूत्रितः शास्त्रार्थः ' आत्मेत्ये-वोपासीत ' इति । तस्य च व्या-चिख्यासितस्य सार्थवादेन " तदा-हुर्यद्ब्रह्मविद्यया " इत्यादिना सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते । अविद्यायाश्च संसाराधिकार कारण -त्वमुक्तम् " अथ योऽन्यां देवता-मुपास्ते " इत्यादिना । तत्रावि-द्वानृणी पशुवद्देवादिकर्मकर्तव्य- | तया परतन्त्र इत्युक्तम् । किं पुनर्देवादिकर्मकर्तव्यत्वे निमित्तम् १ वर्णा आश्रमाश्च । तत्र के वर्णाः १ इत्यत इदमारभ्यते । यन्निमित्तसम्बद्धेषु कर्मस्वयं पर-तन्त्र एवाधिकृतः संसारीति । एतस्यैवार्थस्य प्रदर्शनायाग्निसर्गा-नन्तरमिन्द्रादिसर्गो नोक्तः । अग्ने -स्तु सर्गः प्रजापतेः सृष्टिपरि-पूरणाय प्रदर्शितः । अयं च इन्द्रा-दिसर्गस्तत्रैव द्रष्टव्यस्तच्छेष- | २८५ ' आत्मेत्येवोपासीत ' इस वाक्य-से शास्त्रके तात्पर्यका सूत्ररूपमें संक्षेप-से वर्णन किया गया । फिर " तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्धधत " इत्यादि अर्थंवादके सहित “ तदाहुर्यद्ब्रह्म-विद्यया " इत्यादि मन्त्रवाक्यद्वारा व्याख्या करनेके लिये अभीष्ट उस ' शास्त्रार्थके सम्बन्ध और प्रयोजन बतलाये गये, तथा “ अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते " इत्यादि वाक्यसे अविद्याको संसारोत्पत्तिमें कारण बताया । वहाँ यह कहा गया है कि अज्ञानी ऋणी होता है; अर्थात् पशु-के समान देवकर्मादिकी कर्तव्यतासे युक्त होनेके कारण परतन्त्र होता है । किंतु देवादि कर्मोंकी कर्तव्यतामें कारण क्या है? वर्ण और आश्रम । उनमें, जिस वर्णरूप निमित्तसे सम्बद्ध कर्मोंमें इस परतन्त्र संसारी जीवकाः ही अधिकार है, वे वर्णं कौन - से हैं? -ऐसा प्रश्न होनेपर यहाँसे आरम्भ किया जाता है । इस अर्थको प्रदर्शित करनेके प्रयोजनसे ही अग्निसगँके पश्चात् इन्द्रादि सर्गका वर्णन नहीं किया | अग्निसर्गको तो प्रजापतिकी सृष्टिकी सब प्रकार पूर्ति करनेके लिये प्रदर्शित किया था । प्रजापति सर्गका शेषभूत होने के कारण इस इन्द्रसर्गको वहीं ( उसीके अन्तर्गत ) समझना
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ २८६ ब्राह । चाहिये । यहाँ अविद्वान्के कर्मा-त्वात् । इह तु स एवाभिधीयते धिकारमें हेतु दिखानेके लिये उसीका ऽविदुषः कर्माधिकारहेतुप्रदर्शनाय - वर्णन किया जाता है— सृध क्षत्रियसर्ग तथा ब्राह्मणजातिके साथ उसके सम्बन्धका वर्णन ब्राह ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकः सन्न ब्रह्म व्यभवत् । तच्छ्रेयोरूपमत्यस्सृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्यन्यो यमो त्क्षत्र परि मृत्युरीशान इति । तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्रा-भवत ह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यदब्रह्म । तस्माद्यद्यपि नाल राजा परमतां गच्छति ब्रह्मवान्तत उपनिश्रयति स्वां त्थं व योनिं य उ एनँ हिनस्ति स्वास योनिमृच्छति स मित्त पापीयान्भवति यथा श्रेयास हि सित्वा ॥ ११ ॥
कर्तु आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था । अकेले होनेके कारण वह विभूति- रूपम युक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ । उसने अतिशयतासे क्षत्र इस प्रशस्त रूपकी रचना की । अर्थात् देवताओंमें क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सोम, - सृष्ट रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशानादि हैं, उन्हें उत्पन्न किया । अतः क्षत्रियसे ान उत्कृष्ट कोई नहीं है । इसीसे राजसूययज्ञमें ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रियकी दर्शय उपासना करता है, वह क्षत्रियमें ही अपने यशको स्थापित करता है । यह लोक जो ब्रह्म है, क्षत्रियकी योनि है । इसलिये यद्यपि राजा उत्कृष्टताको प्राप्त होता है तो भी [ राजसूयके ] अन्तमें वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है । अतः जो क्षत्रिय इस ( ब्राह्मण ) की हिंसा करता है, वह अपनी योनिका और ही नाश करता है । जिस प्रकार श्रेष्ठकी हिंसा करनेसे पुरुष पापी होता अभिम है, उसी प्रकार वह पापी होता है ॥ ११ ॥
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[ अध्याय १ विद्वानके कर्मा-के लिये उसीका न्धका वर्णन कि सन्न यान्येतानि र्यन्यो यमो तस्माद्वा-एव तद्यशो तस्माद्यद्यपि यति स्वां मृच्छति स ा ॥ ११ ॥
ण वह विभूति-क्षत्र इस प्रशस्त द, वरुण, सोम, । अतः क्षत्रिय से बैठकर क्षत्रियकी - करता है । यह त्कृष्टताको प्राप्त आश्रय लेता है । अपनी योनिका रुष पापी होता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्म वा इदमग्र आसीद्यदग्नि सृष्ट्वा अग्निरूपापन्नं ब्रह्म । ब्राह्मणजात्यभिमानाद् ब्रह्मेत्य -भिधीयते । वै इदं क्षत्रादिजातं ब्रह्मैवाभिन्नमासीदेकमेव 1 । नासी-स्क्षत्रादिभेदः 1 । तद्द्भक्षैकं चत्रादि-परिपालयित्रादिशून्यं सद् न व्य-भवत् — न विभूतवत् कर्मणे , नालमासीदित्यर्थः । ततस्तद्ब्रह्म ' ब्राह्मणोऽस्मि समे-त्थं कर्तव्यम् ' इति ब्राह्मणजातिनि-मित्तं कर्म चिकीर्षु श्रात्मनः कर्म-कर्तृत्वविभूत्यै श्रेयोरूपं प्रशस्त रूपम् अत्य सृजत - प्रतिशयेनासृजत -सृष्टवत् । किं पुनस्तद्यत्सृष्टम्? क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तद्वयक्ति मेदेन प्र-दर्शयति - यान्येतानि प्रसिद्धानि लोके देवत्रा देवेषु क्षत्राणीति । १८७ आरम्भमें यह ब्रह्म ही था अर्थात् अग्निको रचकर जो अग्नि-रूपको प्राप्त हुआ, वह ब्रह्म ही था । ब्राह्मणजातिका अभिमान होनेके कारण वह ब्रह्म कहा जाता है । उस समय यह क्षत्रियादि समुदाय भी ब्रह्मसे अभिन्न अर्थात् एकरूप ही था । अर्थात् पहले क्षत्रियादि भेद नहीं था । वह ब्रह्म एक ( अकेला ) - क्षत्रियादि पालन-कर्तासि कर्तासे शून्य होनेके कारण विभूति-युक्त कर्म करनेको समर्थ नहीं हुआ । TRIES तब उस ब्रह्मने ‘ मैं ब्राह्मण हूँ, मेरा यह कर्तव्य है ' इस विचारसे ब्राह्मणजातिनिमित्तिक कर्म करनेकी इच्छा करके कर्मकर्तृ त्वरूप विभूतिके लिये ' श्रेयो रूपमत्यसृजत ' अर्थात् प्रशस्त रूपकी रचना की । जिसकी रचना की गयी थी वह रूप कौन-सा था? क्षत्र अर्थात् क्षत्रियजाति । उन्हींको ' यान्येतानि ' इत्यादि वाक्यसे श्रुति व्यक्तिभेदसे दिखाती है । अर्थात् लोकमें देवताओं में जो क्षत्रियरूपसे प्रसिद्ध हैं । जातिवाचक ' शब्दोंमें १. इस अध्यायके आरम्भमें अग्निरूप प्रजापतिकी उत्पत्ति दिखलायी है । और अग्नि ब्राह्मणजातिका उपकारक देव है । इसलिये उसे ब्राह्मणजातिका अभिमान होना स्वाभाविक है । २. ‘ जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम् ' ( पा ० सू ० १ । २ । ५८ )
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२८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय- १ जात्याख्यायां पक्षे बहुवचनस्म-रणाद् व्यक्ति बहुत्वाद्वा मेदो-पचारेण बहुवचनम् । कानि पुनस्तानि इत्याह- तत्रा-भिषिक्ता एव विशेषतो निर्दि-श्यन्ते – इन्द्रो देवानां राजा, वरुणो यादसाम्, सोमो ब्राह्म-णानाम्, रुद्रः पशूनाम्, पर्ज-न्यो विद्युदादीनाम्, यमः पितॄ-णाम्, मृत्यूरोगादीनाम्, ईशानो भासाम् — इत्येवमादीनि देवेषु-चत्राणि । तदनु, इन्द्रादिक्षत्रदेव ताधिष्ठितानि मनुष्यक्षत्राणि सो-मसूर्यवंश्यानि पुरूरवः प्रभृतीनि सृष्टान्येव द्रष्टव्यानि । तदर्थ एव हि देवक्षत्रसर्गः प्रस्तुतः । यस्माद्ब्रह्मणातिशयेन सृष्टं क्षत्रं तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति ब्रा-लणजातेरपि नियन्तृ । तस्माद्ब्रा-ह्मणः कारणभृतोऽपि क्षत्रियस्य I विकल्पसे बहुवचन होता है - ऐस स्मृति होनेसे अथवा भेदोपचारसे क्षत्र इन्द्रादि व्यक्तियों ने रूप कारण यहाँ ' क्षत्राणि ' इस पदमें बहुवचन है । राज वे कौन हैं? सो श्रुति बतलाती राज वि है । यहाँ विशेषरूपसे उनमेंसे [ भिन्न-भिन्न वर्गोंके अधिपतिरूपसे ] अभि-षिक्त देवताओंका ही उल्लेख किया यत जाता है - देवताओंका राजा इन्द्र, इति जलचरोंका अधिपति वरुण, ब्राह्मणोंका राजा सोम, पशुपति रुद्र, यव विद्युदादिका नायक मेघ, पितरोंका मत राजा यम, रोग आदिका स्वामी त्य मृत्यु और प्रकाशोंका स्वामी ईशान इत्यादि जो देवताओं में क्षत्रिय हैं अ [ उन्हें उत्पन्न किया ] । उनके पीछे नि इन्द्रादि क्षत्रिय देवताओं से अधिष्ठित पुर पुरूरवा आदि चन्द्र और सूर्यवंशी मानवक्षत्रिय रचे गये - ऐसा समझना चाहिये | उन्हींके लिये देवक्षत्रसृष्टि- यो का आरम्भ किया गया है । ए क्योंकि ब्रह्मने क्षत्रियोंको अतिशय-रूपसे रचा है, इसलिये क्षत्रियसे नि उत्कृष्ट ब्राह्मणजातिका भी नियमन वि करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । इसी- पी से क्षत्रियजातिका कारणभूत होकर क्ष क्षत्रियमधस्ताद्वयवस्थितः सन्नुपरि भी ब्राह्मण नीचे बैठकर ऊँचे बैठे स्थितमुपास्ते । क्व १ राजसूये । हुए कहाँ क्षत्रियकी उपासना करता है । ? राजसूययज्ञमें । उस समय वह
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[ अध्याय- १ I होता है - ऐसी वा भेदोपचारसे अनेक होने -ण ' इस पदमें श्रुति बतलाती उनमें [ भिन्न-तिरूपसे ] अभि-ही उल्लेख किया का राजा इन्द्र, पति वरुण, नोम, पशुपति रुद्र, मेघ, पितरोंका आदिका स्वामी का स्वामी ईशान ओंमें क्षत्रिय हैं न ] । उनके पीछे ताओं से अधिष्ठित द्र और सूर्यवंशी - ऐसा समझना लिये देवक्षत्रसृष्टि-गया है । त्रियोंको अतिशय-इसलिये क्षत्रियसे तिका भी नियमन कोई नहीं है । इसी कारणभूत होकर बैठकर ऊँचे बैठे नासना करता है । में । उस समय वह ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ क्षत्र एव तदात्माय यशः ख्याति - । रूपं ब्रह्मेति दधाति स्थापयति । राजसूयाभिषिक्तेनासन्द्यां स्थितेन राज्ञा आमन्त्रितो ब्रह्मन्निति ऋ-त्विक्पुनस्तं प्रत्याह-- ' त्वं राज-ब्रह्मासि ' इति । तदेतदभिधी -यते - ' क्षत्र एव तद्यशो दधाति ' इति । सैषा प्रकृता क्षत्रस्य योनिरेब यद्ब्रह्म । तस्माद्यद्यपि राजा पर-मतां राजसूयाभिषेकगुणं गच्छ-त्याप्नोति ब्रह्मैव ब्राह्मणजातिमेव, 1 अन्ततोऽन्ते कर्मपरिसमाप्तावुप-निश्रयत्याश्रयति स्वां योनिम्, पुरोहितं पुरो निधत्त इत्यर्थः । यस्तु पुनर्वलाभिमानात्स्वां योनिं ब्राह्मणजातिं ब्राह्मणं य उ एनं हिनस्ति हिंसति न्यग्भावेन पश्यति, स्वामात्मीयामेव स यो-निमृच्छति - एवं प्रमवं विच्छिनत्ति । विनाशयति । स एतत्कृत्वा पा पीयान्पापतरो भवति । पूर्वमपि क्षत्रियः पाप एव क्रूरत्वादात्मप्र - । बृ ० उ०१६-२८ ९ क्षत्रियमें ही अपने ' ब्रह्म ' इस नाम-रूप यशको स्थापित करता है । राजसूययज्ञमें अभिषिक्त मञ्चस्थ राजाके द्वारा ' ब्रह्मन्! ' इस प्रकार पुकारे जानेपर ऋत्विक् उत्तरमें उससे कहता है, ' राजन्! तुम ब्रह्म हो ' | इसीसे यह कहा जाता है कि वह क्षत्रियमें ही अपना [ ' ब्राह्मण ' नाम-रूपी ] यश स्थापित करता है । यह जो ब्रह्म ( ब्राह्मण ) है, वह क्षत्रियकी प्रकृत योनि ही है । इस-लिये यद्यपि राजा परमताको-राजसूयाभिषेकरूप गुणको प्राप्त हो जाता है तो भी अन्तमें कर्मकी समाप्ति होनेपर अपनी योनि ब्राह्मण-जातिका ही आश्रय लेता है अर्थात् उसे पुरोहित करता यानी आगे स्थापित करता है । और जो बलके अभिमान से अपनी योनि ब्राह्मण जातिकी हिंसा करता है अर्थात् उसे नीची दृष्टिसे देखता है, वह अपनी हो योनिका नाश करता है अर्थात् अपने ही प्रसवका विच्छेद यानी विनाश करता है । ऐसा करके वह पापी-यान् — बड़ा पापी होता है । क्रूर होनेके कारण क्षत्रिय पापी तो पहले भी था, अब अपने प्रसवकी
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२ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
सवहिंसया सुतराम् । यथा लोके ।
श्रेयांसं प्रशस्ततरं हिंसिस्था परि-भूय पापतरो भवति तद्वत् ॥ ११ ॥
हिंसा करनेसे और भी अधिक पा होता है । जिस प्रकार लोकमें श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशंसनीयकी हिंसा पराभव करके पुरुष बड़ा पापी | होता है उसी प्रकार उसे भी बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ११ ॥
वैश्यजाति की उत्पत्ति क्षत्र सृष्टेऽपि— | क्षत्रियोंकी रचना हो जानेपर भी-स नैव व्यभवत्स विशमस्सृजत यान्येतानि देव-जातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ १२ ॥
वह ( ब्रह्म ) विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ । उसने वेश्य-जातिकी रचना की । जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं [ स नैव व्यभवत् कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत्, वित्तोपार्जयितुर-भावात् । स विशमसृजत कर्म-4 साधनवित्तोपार्जनाय । कः पुन-रसौ विट १ यान्येतानि देव-जातानि - स्वार्थे निष्ठा, य एते देव-जातिमेदा इत्यर्थः; गणशो गणं गणम्, आख्यायन्ते कथ्यन्ते । गणप्राया हि विशः, प्रायेण उन्हें उत्पन्न किया ] ॥ १२ ॥
वह ( ब्रह्म ) धनोपार्जन करने-वालेका अभाव होनेके कारण कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ । उसने कर्म साधनभूत धनका उपार्जन करनेके लिये वैश्यजातिको रचा । वे वैश्यलोग कौन थे? ये जो देव-जात हैं । ' देवजातानि ' इस पदके ' जात ' शब्दमें जो ' त ' यह निष्ठा-प्रत्यय है वह स्वार्थमें है । तात्पर्य यह है कि ये जो देवजातिके भेद हैं, जो गणशः अर्थात् एक - एक गण करके कहे जाते हैं; क्योंकि वैश्य-लोग गणप्राय होते हैं, वे प्रायः अनेक संह न गप दि वि मस A शूद्र यह नैव सृज स्वा सृष्ट कः स्त स्वय
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[ अध्याय १ अधिक पापी कार लोक में श्रेष्ठ नीयकी हिंसा-बड़ा पापी उसे भी बड़ा ≡ ॥ ११ ॥
हो जानेपर भी-तानि देव-आदित्या । उसने वैश्य-व और मरुत् ॥ १२ ॥
पार्जन करने-के कारण कर्म हुआ । उसने नका उपार्जन पतिको रचा । ? ये जो देव-नि ' इस पद ' यह निष्ठा-में है । तात्पर्य जातिके भेद हैं, एक - एक गण क्योंकि वैश्य-वे प्रायः अनेक ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २ ९ १ संहता हि वित्तोपार्जने समर्थाः न एकैकशः । वसवः अष्टसङ्ख्यो गणः, तथैकादश रुद्राः, द्वादशा-दित्याः, विश्वेदेवास्त्रयोदश । विश्वाया अपत्यानि सर्वे वा देवाः, मरुतः सप्त सप्त गणाः ॥ १२ ॥ ।
| मिलकर ही धनोपार्जनमें समर्थं होते हैं, एक - एक करके नहीं । वसु आठ संख्याका गण है, रुद्र ग्यारह तथा आदित्य बारह हैं । विश्वेदेव तेरह हैं - ये सभी विश्वाके पुत्र हैं । अथवा ' विश्वे देवा: ' का अर्थ है— सम्पूर्ण देवगण । इसी प्रकार उन्चास मरुद्गण हैं ॥ १२ ॥
शूद्रवर्णकी उत्पत्ति स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेय हीद ँ सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥
[ फिर भी ] वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ । उसने शूद्रवर्णकी रचना की । पूषा शूद्रवर्ण है । यह पृथिवी ही पूषा है; क्योंकि यह जो कुछ है, यही इसका पोषण करती है ॥ १३ ॥
स परिचारकाभावात्पुनरपि सेवकका अभाव होनेके कारण नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णम-सृजत — शूद्र एव शौद्रः, स्वार्थेऽणि वृद्धिः । कः पुनरसौ शौद्रो वर्णों यः सृष्टः १ पूषणम् – पुष्यतीति पूषा कः पुनरसौ पूषा? इति विशेषत-स्तन्निर्दिशति — - इयं पृथिवी पूषा । स्वयमेव निर्वचनमाह - इयं हीदं फिर भी वह विभूतियुक्त कर्म करते-में समर्थ नहीं हुआ । उसने शौद्र-वर्णकी सृष्टि की । शूद्र ही ' शौद्र ' है । यहाँ स्वार्थमें ‘ अण् ’ प्रत्यय होने-पर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है । किंतु यह जो उत्पन्न किया गया था वह शूद्रवर्ण कौन था? पूषण — जो पोषण करता है, इस-लिये पूषा कहलाता है । किंतु यह पूषा कौन है? उसे श्रुति विशेष-रूपसे निर्देश करती है — यह पृथ्वी पूषा है । फिर उसका स्वयं ही निर्वचन करके कहती है- क्योंकि
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२ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥ । यह जो कुछ है, उस सबका यहाँ ब्रा
पोषण करती है ॥ १३ ॥
उ धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन तर स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्य सृजत धर्मं तदेतत्क्ष-त्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबली- क्य यान्बलीया, समाश ँसते धर्मेण यथा राज्ञेवं यो वैस च्य धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्म ल वा वदन्त ँ सत्यं वदतीत्येतद्धये वैतदुभयं भवति ॥ १४ ॥ उत्तर
तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ । उसने श्रेयोरूप धम ( कल्याणस्वरूप ) धर्मकी अतिसृष्टि की । यह जो धर्मं है, क्षत्रियका भी सव नियन्ता है । अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है । इसलिये जिस प्रकार राजा-की सहायतासे [ प्रबल शत्रुको भी जीतने की शक्ति आ जाती है ] उसी एक प्रकार धर्मंके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्को जीतनेकी इच्छा करने चल लगता है । वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है । इसीसे सत्य बोलनेवालोंको कहते हैं कि ' यह धर्ममय वचन बोलता है ' तथा धर्ममय वचन बोलनेवाले-लो से कहते हैं कि ' यह सत्य बोलता है ', क्योंकि ये दोनों धर्मं ही हैं ॥ १४ ॥
तत स चतुर: सृष्ट्वापि वर्णान्नैव वह ( ब्रह्म ) चारों वर्णोंको रचकर भी - क्षत्रियजाति उग्र होती है, इसलिये स व्यभवत्, उग्रत्वात्क्षत्रस्यानियता- वह नियन्त्रणमें नहीं रह सकती-भव | इस आशङ्कासे विभूतियुक्त कर्म करने-शङ्कया । तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत, में समर्थ नहीं हुआ । तब उसने अति- स्तु शयतासे श्रेयोरूप उत्पन्न किया । किं तत् १ धर्मम्; तदेतच्छुयोरूपं वह श्रेयोरूप कौन है? धर्म; वह यह शास सृष्टं क्षत्रस्य क्षत्रं क्षत्रस्यापि रचा हुआ श्रेयोरूप धर्मं क्षत्रका भी आच नियन्तु, क्षत्र यानी क्षत्रियका भी नियन्ता है
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[ अध्याय १ IIIII II स सबका यही १३ ॥ का वर्णन तदेतत्क्ष यो अबली-नवं यो वैस दतीति धर्म वति ॥१४ ॥
। उसने श्रेयोरूप क्षत्रियका भी स प्रकार राजा-जाती है ] उसी की इच्छा करने - बोलनेवालोंको चन बोलनेवाले-ही हैं ॥ १४ ॥
वर्णोंको रचकर होती है, इसलिये रह सकती-तियुक्त कर्म करने-तब उसने अति-उत्पन्न किया । ? धर्म; वह यह धर्म क्षत्रका भी भी नियन्ता है ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ उग्रादप्युग्रम्, यद्धर्मो यो धर्मः तस्मात्क्षत्रस्यापि नियन्तृत्वाद्ध-मत्परं नास्ति तेन हि निय-म्यन्ते सर्वे । तत्कथम् १ इत्यु-च्यते - ग्रथो अध्यबलीयान्दुवं-लतरो बलीयांसमात्मनो बलव-त्तरमध्याशंसते कामयते जेतुं धर्मेण बलेन यथा लोके राज्ञा सर्वबलवत्तमेनापि कुटुम्बिकः, एवम्; तस्मात्सिद्धं धर्मस्य सर्व-चलवत्तरत्वात्सर्वनियन्तृत्वम् । यो वै स धर्मो व्यवहारलक्षणो लौकिकैर्ध्य वहियमाणः सत्यं वै तत्; सत्यमिति यथाशास्त्रार्थता; स एवानुष्ठीयमानो धर्मनामा भवति, शास्त्रार्थत्वेन ज्ञायमान-स्तु सत्यं भवति । यस्मादेवं तस्मात्सत्यं यथा-शास्त्रं वदन्तं व्यवहारकाल आहुः १. अभिप्राय यह है कि ज्ञात आचरण में आनेपर वही धर्म कहलाता है २ ९ ३ ! और उग्रसे भी उग्र है; ' यद्धर्मः ' का अर्थ है जो धर्म; अतः क्षत्रियका भी नियन्ता होनेके कारण धर्मसे उत्कृष्ट कोई नहीं है, क्योंकि उसीके द्वारा सबका नियमन होता है । सो किस प्रकार? यह बतलाया जाता है-जो अवलीयान् यानी बहुत दुर्बल होता है, वह भी वलीयान् — अपनी अपेक्षा अधिक बलवान्को धर्मरूपी वलके द्वारा जीतना चाहता है, जिस प्रकार लोकमें सबसे बलवान् राजाकी सहायतासे साधारण कुटुम्बी पुरुष अपने से अधिक वल-वानुका पराभव करना चाहता है, उस प्रकार [ वह धर्मवलसे जीतना चाहता है । ] अत: सबकी अपेक्षा बलवत्तर होनेके कारण धर्म सवका नियन्ता है -यह सिद्ध होता है । वह जो लौकिक पुरुषोंद्वारा व्यवहार किया जानेवाला व्यवहार-रूप धर्म है, वह निश्चय सत्य ही है । सत्य शास्त्रानुकूल अर्थका नाम है । वह ( शास्त्रानुकूल अर्थ ) ही अनुष्ठान किये जानेपर धर्म नामवाला होता है और शास्त्र तात्पर्यरूपसे ज्ञात होनेपर वही सत्य कहलाता है । १ क्योंकि ऐसा है, इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य यानी शास्त्रानुसार भाषण होनेवाला शास्त्रका तात्पर्य सत्य है और ।
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२ ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ समीपस्था उभयविवेकज्ञाः— । धर्म वदतीति, प्रसिद्धं लौकिकं न्यायं वदतीति । तथा विपर्ययेण धर्म वा लौकिकं व्यवहारं वदन्त - । माहुः - सत्यं वदति, शास्त्रादन-पेतं वदतीति । एतद्यदुक्तमुभयं ज्ञायमानमनु-ष्ठीयमानं चैतद्धर्म एव भवति । तस्मात्स धर्मो ज्ञानानुष्ठानल -! क्षणः शास्त्रज्ञानितरांश्च सर्वानेव नियमयति । तस्मात्स क्षत्रस्यापि । क्षत्रम् ॥ अतस्तदभिमानोऽविद्वां-स्तद्विशेषानुष्ठानाय ब्रह्मक्षत्रविट् -शूद्रनिमित्तविशेषमभिमन्यते । तानि च निसर्गत एव कर्मा-धिकारनिमित्तानि ॥ १४ ॥
ब्रा करनेवालेको उसके समीपवर्ती ध और सत्यका रहस्य जाननेवाले क लोग ' यह धर्ममय वचन बोलता है, अ प्रसिद्ध लौकिकन्याय बोलता है ' ऐसा कहते हैं और इसी तरह इससे विपरीत धर्म यानी लौकिक व्यवहार बतानेवालेको ' यह सत्य बोलता है, क्ष शास्त्र अनुकूल बोलता है ' ऐसा ल कहते हैं । ये जो जानी जानेवाली और की य जानेवाली दो बातें बतायी गयी हैं-ये दोनों धर्म ही हैं । अतः यह ज्ञान कर और अनुष्ठानरूप धर्म शास्त्रज्ञ और व्रा अशास्त्रज्ञ सभीका नियमन करता है | इसलिये वह क्षत्रका भी क्षत्र इच है । अतः उसका अभिमान रखने- इच वाला अज्ञानी पुरुष उसके किसी को यह विशेष रूपका अनुष्ठान करनेके क लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा अन शूद्ररूप किसी निमित्त विशेषमें अभि- जा मान करने लगता है । ये ब्राह्मणादि अन वर्णं स्वभावतः ही कर्माधिकारके कारण हैं ॥ १४ ॥ उप
उस श्रात्मोपासनकी आवश्यकता का तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभव- त द्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्माद्ग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्ये- वि