बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 351–360
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360
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[ अध्याय १ ने - अपने विषय-रूप एवं शब्दा-ता और जिसके ता है, वह उन मस्त इन्द्रियोंके रखनेवाला मन है - ऐसा ज्ञात - लोग मनसे ही ही सुनते हैं; होनेपर दर्शनादि नका अस्तित्व उसके स्वरूप के ता है— काम-नाषादि, संकल्प-* शुक्ल - नीलादि ना करना, ज्ञान, श्रद्धा-है, उन कर्मों -तकताका भाव ससे विपरीत - धारण अर्थात् होनेपर उन्हें - इसके विप-बा, घी - बुद्धि नादि प्रकार के हैं; ये सब मन रूप हैं ।. ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ मनोऽस्तित्वं प्रत्यन्यच्च कारण-मनसोऽस्तित्वे मुच्यते— तस्मा -लिङ्गान्तरनिर्देशः न्मनो नामास्त्यन्त: करणम्, यस्माच्चक्षुषो ह्यगोचरे पृष्ठतोऽप्युपस्पृष्टः केनचिद् हस्त-स्यायं स्पर्शो जानोरयमिति विवे- । केन प्रतिपद्यते । यदि विवेक -कृन्मनो नाम नास्ति तर्हि त्व । ङ्मात्रेण कुतो विवेकप्रतिपत्तिः स्यात् १ यत्तद्विवेकप्रतिपत्तिकार-णम्, तन्मनः । अस्ति तावन्मनः, स्वरूपं च तस्याधिगतम् । त्रीण्यन्नानीह । फलभूतानि कर्मणां मनोवाक्प्रा-णाख्यानि अध्यात्ममधिभूतमधि-दैवं च व्याचिख्यासितानि । तत्र आध्यात्मिकानां वाङ्मनः प्राणानां मनो व्याख्यातम् । अथेदानीं वाग्वक्तव्येत्यारम्भः-यः - कश्च लोके शब्दो ध्वनि-स्ताल्वादिव्यङ्ग्यः । चाङ निरूपणम् प्राणिभिर्वर्णादिल- । क्षण इतरो वा वादिनमेघादि-निमित्तः सर्वो ध्वनिर्वागेव सा । । ३४५ मनके अस्तित्व के विषयमें एक दूसरा भी कारण बतलाया जाता है – इससे भीः मननामक अन्त: -करणकी सत्ता है, क्योंकि नेत्रके सामने न आकर किसीके द्वारा पीठपर स्पर्श किये जानेपर मनुष्य विवेकद्वारा यह जान लेता है कि ' यह स्पर्श हाथका है या जानुका है । ' यदि विवेक करनेवाला मन नहीं है, तो त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है? जो उस विवेकज्ञानका कारण है, वही मन है । अतः सारांश यह है कि मन है और उसका स्वरूप भी ज्ञात हो गया । यहाँ कर्मों के फलभूत मन, वाक् और प्राणसंज्ञक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव तीन अन्नों-की व्याख्या करनी है । उनमेंसे आध्यात्मिक वाक्, मन और प्राणों-मेंसे मनकी व्याख्या तो कर दी गयी । अब वाक्का वर्णन करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है-लोकमें प्राणियोंद्वारा तालु आदिसे व्यक्त होनेवाला जितना भी वर्णादि-रूप शब्द यानी ध्वनि है तथा बाजे या मेघादिके कारण होनेवाला और भी जो कोई शब्द है सब वाक्
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३४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ इदं तावद्वाचः स्वरूपमुक्तम् ॥ अथ तस्याः कार्यमुच्यते – एषा वाग्वि यस्मादन्तमभिधेयावसान-मभिधेय निर्णयमायत्तानुगता । एषा पुनः स्वयं नाभिधेयवत्प्र-काश्या अभिधेयप्रका शिकैव, 9 प्र-काशात्मकत्वात् प्रदीपादिवत् । न हि प्रदीपादिप्रकाशः प्रकाशान्त-रेण प्रकाश्यते, तद्वद्वाक्प्रकाशि कैव स्वयं न प्रकाश्येत्यनवस्थां श्रुतिः परिहरति- एषा हि न प्रकाश्या । प्रकाशकत्वमेव वाचः कार्यमित्यर्थः । अथ प्राण उच्यते- प्राणो मुखनासिकासश्चार्या प्राणनिरूपणम् हृदयवृत्ति: प्रणयना । त्प्राणः अपनयनान्मूत्रपुरीषादे-रपानोऽघोवृत्तिरानाभिस्थानः; व्यानो व्यायमनकर्मा व्यान: ही है । यह तो वाक्का स्वरूप बतलाया गया । अब उसका कार्य बतलाया जाता है — क्योंकि यह वाक् अन्त - अभिधेयावसान अर्थात् अभिधेय - निर्णयके आयत्त यानी वि अनुगत है; किंतु यह अभिधेयके समान स्वयं प्रकाश्य नहीं है, यह तो अभिधेयको प्रकाशित करनेवाली न ही है; क्योंकि दीपकादिके समान यह प्रकाशस्वरूपा ही है । दीपकादि-का प्रकाश किसी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित नहीं होता । अतः उसके ही समान वाक् भी प्रकाशिका ही है, वह स्वयं किसीके द्वारा प्रकाश्या नहीं है - इस प्रकार श्रुति अनवस्था व दोषकी निवृत्ति करती है, क्योंकि ज यह वाक् प्रकाश्या नहीं है । तात्पर्य यह है प्रकाशकत्व ही हा वाक्कि कार्य है । क अब प्राण का वर्णन किया जाता है - प्राण - मुख और नासिकामें भ संचार करनेवाली जो [ वायुकी ] व्य हृदयपर्यन्त वृत्ति है, वह प्रणयन वा | ( बहिर्गमन ) के कारण प्राण कहलाती है, अपान- मल - मूत्रादिको नीचेकी ए ओर ले जानेके कारण वायुकी जो प्रा नाभिस्थानतक रहनेवाली अधोवृत्ति है, वह अपान है, व्यान — व्यायमन कर
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[ अध्याय १ क्का स्वरूप उसका कार्य —क्योंकि यह -यावसान अर्थात् आयत्त यानी यह अभिधेयके नहीं है, यह शित करनेवाली कादिके समान 7 है । दीपकादि-अन्य प्रकाशसे । अतः उसके प्रकाशिका ही द्वारा प्रकाश्या ती है, क्योंकि है । तात्पर्य = व ही वाक्का न किया जाता र नासिकामें जो [ वायुकी ] वह प्रणयन दिको नीचे की वायुकी जो वाली अधोवृत्ति ान - व्यायमन ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७ प्राणापानयोः सन्धिवीर्यवत्कर्म हेतुश्च उदान उत्कर्षोर्ध्वगमना -दिहेतुरापादतलमस्तकस्थान ऊर्ध्ववृत्तिः समानः स नयनाद् युक्तस्य पीतस्य च कोष्ठ-स्थानोऽन्नपक्ता, अन इत्येषां वृत्तिविशेषाणां सामान्य भूता सामान्यदेह चेष्टाभिसम्बन्धिनी वृत्तिः एवं यथोक्तं प्राणादिवृत्ति-जातमेतत्सर्वं प्राण एव । प्राण इति वृत्तिमानाध्यात्मि-कोऽन उक्तः । कर्म चास्य वृत्ति -मेदप्रदर्शनेनैव व्याख्यातम् । व्याख्यातान्याध्यात्मिकानि मनो-वाक्प्राणाख्यान्यन्नानि । एतन्मय एतद्विकारःप्राजापत्यैरेतैर्वाङ्मनः-प्राणैरारब्धः । कोऽसौ १ श्रयं कार्य -करणसङ्घातश्रात्मा पिण्ड आत्म | | कर्मा व्यान है, यह प्राण और अपानकी सन्धि है तथा बलकी अपेक्षा रखनेवाले कर्मोंका कारण है, उदान — जो उत्कर्ष ( पुष्टि ) और ऊर्ध्वगमन ( प्राणोत्क्रमण ) आदिका हेतु है तथा जिसका पाद--मस्तकपर्यन्त स्थान एवं ऊपरकी ओर गति है वह उदान है, समान – खाये - पीये पदार्थोंका समीकरण करनेके कारण अन्नको पचानेवाला उदरस्य वायु समान है, अन – यह इन विशेषवृत्तियोंकी सामान्यभूत तथा देहकी सामान्य चेष्टासे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्ति है; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्राणादि समस्त वृत्तिसमुदाय प्राण ही है । ' प्राण ' इस शब्दसे वृत्तिमान् आध्यात्मिक अन ( वायु ) कहा गया है । इसके कर्मकी व्याख्या तो इसके वृत्तिभेदके प्रदर्शनसे ही कर दी गयी । इस प्रकार मन, वाक् और प्राणसंज्ञक आध्यात्मिक अन्नोंकी व्याख्या की गयी । यह एतन्मय— इनका विकार अर्थात् इन प्राजापत्य वाक्, मन और प्राणोंसे आरब्ध है । यह कौन? यह जो भूत और इन्द्रियों-का संघात आत्मा यानी पिण्ड है,
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३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्वरूपत्वेनाभिमतोऽविवेकिभिः | | जो अविवेकियोंद्वारा आत्मस्वरूपसे अविशेषेणैतन्मय इत्युक्तस्य विशे- माना गया है । सामान्यरूपसे ' एतन्मयः ' इस प्रकार कहे हुएको हो श्रेण वाङ्मयो मनोमयः प्राणमय ' वाङ्मय, मनोमय एवं प्राणमय ' ऐसा
इति स्फुटीकरणम् ॥ ३ । कहकर स्पष्ट किया गया है ॥ ३ ॥
आत्मार्थं अन्नोंका श्राधिभौतिक विस्तार तेषामेव प्राजापत्यानामन्नाना- उन्हीं प्राजापत्य अन्नोंका आधि-माधिभौतिको विस्तारोऽभिधीयते - भौतिक विस्तार कहा जाता है— यो लोका एत एव वागेवायं लोको मनो ऽन्तरिक्ष-लोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥
तीनों लोक ये ही हैं । वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ त्रयो लोका भूर्भुवः स्वरित्या-ख्या एत एव वाङ्मनःप्राणाः, तत्र विशेषो वागेवायं लोकः, मनोऽन्तरिक्ष लोकः, प्राणोऽसौ प्लोकः । ४ । तथा— त्रयो वेदा एत एव ४ ॥ ' भूः भुवः और स्वः ' नामक तीनों लोक ये वाक्, मन और प्राण ही हैं । उनका विशेषरूप इस प्रकार है - वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥
। इसी प्रकार -वागेवर्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥ देवाः पितरो मनुष्या एत एव
वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥ पिता
माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥७ ॥
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[ अध्याय १ रा आत्मस्वरूपसे । सामान्यरूपसे कहे हुएको हो - एवं प्राणमय ' ऐसा गया है ॥ ३ ॥
नार अन्नोंका आधि-कहा जाता है-मनोऽन्तरिक्ष-अन्तरिक्षलोक है नौर स्वः ' नामक क्, मन और प्राण शेषरूप इस प्रकार ह लोक है, मन और प्राण वह ॥ ४ ॥
मनो यजुर्वेदः तुष्या एत एव ॥ ६ ॥ पिता
णः प्रजा ॥७ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४ ९ तीनों वेद ये ही हैं । वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है ॥ ५ ॥ देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं । वाक् ही देवता
हैं, मन पितृगण हैं और प्राण मनुष्य हैं ॥ ६ ॥ पिता, माता और प्रजा ये ही
हैं । मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है ॥ ७ ॥
यो वेदा इत्यादीनि वाक्या- ' त्रयो वेदाः ' इत्यादि वाक्योंका नि ऋज्वर्थानि ॥ ५-७ ॥ अर्थं सरल है ॥ ५-७ ॥ विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्वि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥
विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं । जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है, वाक् ही विज्ञाता है, वाक् इस ( अपने ज्ञाता ) की विज्ञात होकर रक्षा करती है ॥ ८ ॥
विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञात-मेत एव । तत्र विशेषः – यत्किञ्च विज्ञातं विस्पष्टं ज्ञातं वाचस्त -द्रूपम् । तत्र स्वयमेव हेतुमाह — वाग्वि विज्ञाता प्रकाशात्मक-स्वात् । कथमविज्ञाता भवेद् यान्यानपि विज्ञापयति " वाचैव सम्राड्बन्धुः प्रज्ञायते ” ( ४ । १ । २ ) इति हि वक्ष्यति । वाग्विशेषविद इदं फलमुच्य-ते - वागेवैनं यथोक्तवाग्विभूति- । विज्ञात, विजिज्ञास्य और अवि-ज्ञात ये ही हैं । उनका विशेष रूप इस प्रकार है - जो कुछ विज्ञात-विस्पष्टरूपसे ज्ञात है, वह वाक्का रूप है 1 । उसमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है - प्रकाशस्वरूप होनेके कारण वाक् ही विज्ञाता है । जो दूसरोंको विज्ञापित करती है, वह स्वयं किस प्रकार अविज्ञात हो सकती है । " हे सम्राट्! वाणीसे ही बन्धुकी पहचान होती है " ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी । वाक्की विशेषताको जाननेवाले-के लिये यह फल बतलाया जाता हैं- वाक् ही इसका - उपर्युक्त
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३५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विदं तद्विज्ञातं भूत्वा अवति । वाक्की विभूतिको जाननेवालेका उसकी विज्ञात होकर अवन यानी पालयति, विज्ञातरूपेणैवास्यान्नं पालन करती है, अर्थात् वह विज्ञात-रूपसे ही इसका अन्न होती यानी
भोज्यतां प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ । भोज्यताको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥
तथा- ' तथा— यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजि-ज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥ ६ ॥
जो कुछ विजिज्ञास्य है, वह मनका रूप है । मन ही विजिज्ञास्य है ।
मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ६ ॥
यत्किञ्च विजिज्ञास्यम्, विस्पष्टं | जो कुछ विजिज्ञास्य यानी ज्ञातुमिष्टं विजिज्ञास्यम्, तत्सव मनसो रूपम् मनो हि यस्मा -रसन्दिह्यमानाकारत्वाद्विजिज्ञा-स्यम् । पूर्ववन्मनोविभूतिविदः फलम् - मन एनं तद्विजिज्ञास्यं भूत्वा भवति विजिज्ञास्यस्वरूपे खैवान्नत्वमापद्यते ॥ ९ ॥
तथा— विस्पष्ट जाननेके लिये इष्ट है, वह सब मनका रूप है; क्योंकि मन ही सन्देहयोग्य स्वरूपवाला होनेके कारण विजिज्ञास्य है । पहलेही के समान मनकी विभूतिको जाननेवाले-का फल बतलाया जाता है— मन उसका विजिज्ञास्य होकर उसकी रक्षा करता है, अर्थात् वह विजिज्ञास्य-स्वरूपसे ही उसके अन्नत्वको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
श तथा-यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥
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[ अध्याय १ को जाननेवालेका कर अवन यानी नर्थात् वह विज्ञात-अन्न होती यानी होती है ॥ ८ ॥
नो हि विजि-विजिज्ञास्य है । जिज्ञास्य यानी लिये इष्ट है, वह क्योंकि मन ही - पवाला होने के है । पहलेही को जाननेवाले-जाता है— मन कर उसकी रक्षा विजिज्ञास्य-अन्नत्वको प्राप्त ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है । प्राण ही अविज्ञात है ।
प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ६ ॥ ॥ १० ॥
यत्किञ्चाविज्ञातं विज्ञानागोचरं न च सन्दिह्यमानम्, प्राणस्य तद्रूपम् प्राणो ह्यविज्ञातोऽविज्ञा-तरूपो हि यस्मात्प्राणोऽनिरुक्त-श्रुतेः । विज्ञातविजिज्ञास्याविज्ञा-तभेदेन वाङ्मनः प्राणविभागे स्थिते त्रयो लोका इत्यादयों वाचनिका एव । सर्वत्र विज्ञाता-दिरूपदर्शनाद्वचनादेव नियमः स्मर्तव्यः । प्राण एनं तद्भूत्वा अवति - अवि-ज्ञातरूपेणैवास्य प्राणो ऽन्नं भवती-त्यर्थः । शिष्यपुत्रादिभिः सन्दिह्य-मानाविज्ञातोपकारा श्रप्याचार्य-पित्रादयो दृश्यन्ते तथा मन: -प्राणयोरपि सन्दिह्यमाना विज्ञात-योरन्नत्वोपपत्तिः ॥ १० ॥
जो कुछ अविज्ञात यानी विज्ञान-का अविषय है— केवल सन्देहयोग्य ही नहीं है - वह प्राणका रूप है; प्राण ही अविज्ञात है, क्योंकि अनिरुक्त श्रुतिसे प्राण अविज्ञातरूप ही है । इस प्रकार विज्ञात, विजि-ज्ञास्य और अविज्ञातभेदसे वाक्, मन और प्राणका विभाग निश्चित हो जानेपर ' त्रयो लोकाः ' इत्यादि निर्देश केवल वाचनिक ( वचनसे प्राप्त ) ही है । सर्वत्र विज्ञातादिका ही रूप देखा जाता है, अतः इनका नियम श्रुतिवचनसे. ही माना जाता है । प्राण तद्रूप होकर इसकी रक्षा करता है; अर्थात् प्राण अविज्ञात-रूपसे ही इसका अन्न होता है । ' जिनके उपकारके विषयमें शिष्य एवं पुत्रादिको सन्देह और अज्ञान रहता है, ऐसे गुरु और पिता आदि [ लोकमें ] देखे जाते हैं । इसी प्रकार सन्दिह्यमान और अविज्ञात मन एवं प्राणका भी अन्न होना सम्भव है ॥ १० ॥
ह्यविज्ञातः १. यदि कहो कि अविज्ञात रहते हुए प्राण किस प्रकार उपकारक हो सकता है? तो इसके लिये आगे लिखी बातपर ध्यान देना चाहिये ।
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३५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार व्याख्यातो वाङ्मनःप्राणानामा- [ इस प्रकार ] वाक्, मन और प्राणके आधिभौतिक विस्तारकी धिभौतिको विस्तारः । अथायमा - व्याख्या तो कर दी गयी, अब यहाँसे आधिदैविक विषय आरम्भ धिदैविकार्थ आरम्भ: - किया जाता है— तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमथमग्निस्त-द्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ ११ ॥
उस वाक्का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है । तहाँ जितनी वाक् है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है ॥ ११ ॥
तस्यै तस्याः वाचः प्रजापते । रन्नत्वेन प्रस्तुतायाः पृथिवी शरीरं बाह्य आधारः, ज्योतीरूपं प्रकाशा-त्मकं करणं पृथिव्या आधेयभूत-मयं पार्थिवोऽग्निः । द्विरूपा हि प्रजापतेर्वाक् - कार्यमाधारोऽप्रकाशः करणं चाधेयं प्रकाशः, तदुभयं पृथिव्यग्नी वागेव प्रजापतेः । तत्तत्र यावत्येव यावत्परिमा-जैव अध्यात्माधिभूतभेदभिन्ना सती वाग्भवति, तत्र सर्वत्र श्राधारत्वेन पृथिवी व्यवस्थिता, तावत्येव भवति कार्यभूता; प्रजापतिके अन्नरूपसे प्रस्तुत हुए उस वाक्का पृथिवी शरीर यानी बाह्य आधार है तथा पृथिवी-का आधेयभूत यह पार्थिव अग्नि उसका ज्योतीरूप यानी प्रकाशा-त्मक करण है । प्रजापतिकी वाक् दो प्रकारकी है– ( १ ) कार्य, आधार और अप्रकाशरूप तथा ( २ ) करण, आधेय और प्रकाशरूप; वे दोनों म पृथिवी और अग्नि प्रजापतिकी वाक् ही हैं । उनमें जितनी अर्थात् जितने य परिमाणवाली अध्यात्म और अधिभूत f भेदोंसे भिन्न होने वाली वाक् है, उसमें सर्वत्र उसके आधाररूपसे व्यवस्थित f कार्यभूता पृथिवी भी उतनी ही है;
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[ अध्याय १ ार [ - ] वाक्, मन और तिक विस्तारकी र दी गयी, अब क विषय आरम्भ समयमग्निस्त-नः ॥ ११ ॥
तीरूप है । तहाँ अग्नि है ॥ ११ ॥
अन्नरूपसे प्रस्तुत का पृथिवी शरीर र है तथा पृथिवी-वह पार्थिव अग्नि यानी प्रकाशा-प्रजापतिकी वाक् - ( १ ) कार्य, आधार - तथा ( २ ) करण, शरूप; वे दोनों अग्नि प्रजापतिकी ती अर्थात् जितने - यात्म और अधिभूत ली वाक् है, उसमें ररूपसे व्यवस्थित भी उतनी ही है; ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३ तावानयमग्निः, आधेयः करण- | तथा उतना ही अग्नि है, अर्थात् रूपो ज्योतीरूपेण पृथिवीमनु- ज्योतीरूपसे पृथिवीमें अनुप्रविष्ट प्रविष्टस्तावानेव भवति । समा- आधेय और करणरूप अग्नि भी उतना ही है । आगे पर्यायोंमें भी नमुत्तरम् ॥ ११ ॥ ऐसा ही समझना चाहिये ॥ ११ ॥
इन्द्ररूप प्रारणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादि-त्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनः समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स raise पत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप वह आदित्य है; तहाँ जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है । वे ( आदित्य और अग्नि ) मिथुन ( पारस्परिक संसर्ग ) को प्राप्त हुए । तब प्राण उत्पन्न हुआ । वह इन्द्र है और वह असपत्न - शत्रुहीन है; दूसरा [ अर्थात् प्रतिपक्षी ] ही सपत्न होता है । जो ऐसा जानता है, ' उसका सपत्न नहीं होता ॥ १२ ॥
अथैतस्य प्राजापत्यान्नोक्तस्यैव मनसो द्यौर्द्युलोकः शरीरं कार्य-माधारः, ज्योतीरूपं करणमाधे-योऽसावादित्यः । तत्तत्र यावत्प-रिमाणमेव अध्यात्ममधिभूतं वा मनस्तावती तावद्विस्तारा तावत्प-रिमाणा मनसो ज्योतीरूपस्य बृ ० उ ० २३-तथा प्राजापत्य अन्नरूपसे कहे हुए इस मनका द्यौः- द्युलोक शरीर-कार्य अर्थात् आधार है और वह आदित्य ज्योतीरूप – करण यानी आधेय है । उनमें जितना परिमाण-वाला अध्यात्म और अधिभूत मन है उतना उतने विस्तारवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला मनके ज्योती-
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३५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ करणस्य चाधारत्वेन व्यवस्थिता । द्यौः, तावानसावादित्यो ज्योती-रूपं करणमाधेयम् । तावग्न्यादित्यौ वाङ्मनसे श्राधिदैविके मातापितरौ, मिथुनं रूप यानी करणके आधाररूपसे व्यवस्थित द्यु लोक है । तथा उतना ही वह ज्योतीरूप – करण यानी आधेय आदित्य है । वे अग्नि और आदित्य अर्थात् आधिदैविक वाक् और मन माता-पिता हैं, वे दोनों मिथुन अर्थात् मैथुन्य मितरेतरसंसर्गं समैतां सम- एक - दूसरेके साथ संसगँको प्राप्त गच्छेताम् | ' मनसा आदित्येन प्रसूतं पित्रा, वाचाग्निना मात्रा प्रकाशितं कर्म करिष्यामि ' इति, अन्तरा रोदस्योः । ततस्तयोरेव सङ्गमनात्प्राणो वायुरजायत परि-स्पन्दाय कर्मणे । यो जातः स इन्द्रः परमेश्वरः, न केवल मिन्द्र एवासपत्नोऽविद्य-मानः सपत्नो यस्यः कः पुनः सपत्नो नाम १ द्वितीयो वै प्रति-हुए । ' पितृस्थानीय आदित्यरूप मनसे प्रसूत और मातृस्थानीय अग्निरूप वाणीसे प्रकाशित कर्म करूँगा ' ऐसे अभिप्रायसे पृथ्वी और ग्र द्युलोकके बीच उन दोनोंका समा-गम हुआ । तब उन्हींके समागमसे परिस्पन्द ( चेष्टा ) रूप कर्मके लिये प्राण यानी वायु हुआ । ' जो उत्पन्न हुआ वह इन्द्र— परमेश्वर था । वह केवल इन्द्र ही नहीं था, असपत्न अर्थात् जिसका कोई सपत्न न हो — ऐसा भी था । जि किंतु सपत्न किसे कहते हैं? द्वितीय स अर्थात् जो प्रतिपक्षभावको प्राप्त हो उ पक्षत्वेनोपगतः स द्वितीयः सपत्न वह दूसरा व्यक्ति ही सपत्न कहलाता इ क १. ऊपर ' मन यह इसका आत्मा है, वाक् जाया है और प्राण प्रजा है ' इस प्रकार अध्यात्मरूपसे तथा ‘ मन पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है ' न इस प्रकार अधिभूतरूपसे प्राणको मन और वाक्की प्रजा बतलाया है । इसी प्रकार यहाँ अधिदैवरूपसे भी उसे उनकी प्रजा बतलाने के लिये यह सब कहा गया है ।