बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 361–370

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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[ अध्याय १ -णके आधाररूपसे क है । तथा उतना रूप - करण यानी है । आदित्य अर्थात् और मन माता-नों मिथुन अर्थात् संसर्गको प्राप्त नीय आदित्यरूप नौर मातृस्थानीय से प्रकाशित कर्म प्रायसे पृथ्वी और उन दोनों का समा-उन्हींके समागमसे * ) रूप कर्मके लिये हुआ । " हुआ वह इन्द्र-वह केवल इन्द्र ही अर्थात् जिसका व्हो - ऐसा भी था । कहते हैं? द्वितीय पक्षभावको प्राप्त हो ही सपत्न कहलाता और प्राण प्रजा है ' और प्राण प्रजा है ' लाया है । इसी प्रकार सब कहा गया है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ • इत्युच्यते । तेन द्वितीयत्वेऽपि सति वाङ्मनसे न सपत्नत्वं भजेते, प्राणं प्रति गुणभाबोपगते एव हि ते अध्यात्ममित्र । तत्र प्रासङ्गिकासपत्नविज्ञान-फलमिदम् — नास्य विदुषः सपत्नः

प्रतिपक्षो भवति य एवं यथोक्तं ।

प्राणमसपत्नं वेद ॥ १२ ॥

३५५ | है | अतः वाक् और मन उससे अन्य होनेपर भी उसके सपत्नत्वको प्राप्त नहीं हैं । वे तो अध्यात्म मन और वाक्के समान प्राणके प्रति गौण-भावको प्राप्त हैं । तहाँ प्रसङ्गप्राप्त असपत्नविज्ञान-का फल यह है - जो इस प्रकार उपर्युक्त प्राणको असपत्न जानता है, उस विद्वान्का कोई सपत्न यानी प्रतिपक्षी नहीं होता ॥ १२ ॥

आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूपसे उपासना करनेका फल अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्र-स्तावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तः स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानु-पास्तेऽनन्तः स लोकं जयति ॥ १३ ॥

तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है । तहाँ जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है । वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं । जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

अथैतस्य प्रकृतस्त्र प्राजापत्या- तथा इस प्रसङ्गप्राप्त प्रजापतिके न्नस्य प्राणस्य, न प्रजोक्तस्यान- अन्तरूप प्राणका, अभी प्रजारूपसे न्तरनिर्दिष्टस्य, आपः शरीरं कार्यं । बतलाये हुए प्राणका नहीं, जल

पृष्ठ 362

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३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ करणाधारः, पूर्ववज्ज्योतीरूपमसौ । चन्द्रः । तत्र यावानेव प्राणो याव । त्परिमाणोऽध्यात्मादिभेदेषु, तावद्व्याप्तिमत्य आपः तावत्परि-माणाः, तावानसौ चन्द्रोऽवाधेय-स्तास्वप्स्वनुप्रविष्टः करणभूतो-ऽध्यात्ममधिभूतं च तावद्वयाप्ति-मानेव । तान्येतानि पित्रा पा-इक्तेन कर्मणा सृष्टानि त्रीण्य-न्नानि वाङ्मनः प्राणाख्यानि । अध्यात्ममधिभूतं च जगत्समस्त-मेतैर्व्याप्तम्, नैतेभ्योऽन्यदतिरिक्तं किञ्चिदस्ति कार्यात्मकं करणा-त्मकं वा । समस्तानि त्वेतानि प्रजापतिः । त एते वाङ्मनःप्राणाः वाङ्मनः प्राणाः सर्वे एव समर्तुन्या व्याप्तिमन्तो यावत्प्राणिगोचरं साध्यात्माधिभूतं व्याप्य व्यवस्थिताः । अत एवा-नन्ता यावत्संसारभाविनो हि ते । न हि कार्यकरणप्रत्याख्यानेन संसारोऽवगम्यते । कार्य करणा-त्मका हि त इत्युक्तम् । शरीर – कार्य अर्थात् करणका आधार है तथा पूर्ववत् वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है । वहाँ जितना प्राण है अर्थात् अध्यात्मादि भेदोंमें जितने परिमाणवाला प्राण है, व्याप्तिवाला अर्थात् उतने ही परि-माणवाला जल है और उतना हो वह जलके आधेय उस जलमें अनु-प्रविष्ट उसका करणभूत अध्यात्म और अधिभूत चन्द्रमा है, वह भी उतनी ही व्याप्तिवाला है । ये ही वे पिताके द्वारा पाङ्क्तकर्मसे रचे हुए वाक्, मन और प्राणसंज्ञक तीन नन्न हैं । सारा अध्यात्म और अधिभूत जगत् इनसे व्याप्त है । इनसे भिन्न कार्य और करणरूप कोई भी पदार्थ नहीं है । ये सब [ मिलकर ] ही प्रजापति हैं । वे ये वाक्, मन और प्राण सब समान अर्थात् तुल्य व्याप्तिवाले ही हैं । अध्यात्म और अधिभूतके सहित वि जितना भी प्राणियों का विषय है, ये क उस सबको व्याप्त करके स्थित हैं । त अतः ये अनन्त हैं अर्थात् संसारकी स्थितिपर्यंन्त रहनेवाले हैं; क्योंकि फ कार्यं और करणको छोड़कर संसार अन्य कुछ नहीं जाना जाता और यह कहा ही जा चुका है कि ये कार्य - करणरूप हैं । स

पृष्ठ 363

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• [ अध्याय १ ALICA अर्थात् करणका पूर्ववत् वह चन्द्रमा वहाँ जितना प्राण नादिभेदोंमें जितने प्राण है, उतनी उतने ही परि-और उतना ही उस जलमें अनु-करणभूत अध्यात्म चन्द्रमा है, वह भी शिवाला है । ये ही • पातकर्मसे रचे र प्राणसंज्ञक तीन यात्म और अधिभूत है । इनसे भिन्न रूप कोई भी पदार्थं [ मिलकर ] ही मन और प्राण सब ल्य व्याप्तिवाले ही अधिभूतसहित का विषय है, ये करके स्थित हैं । हैं अर्थात् संसारकी इनेवाले हैं; क्योंकि को छोड़कर संसार जाना जाता और जा चुका है कि ये ॥ ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ स यः कश्चिद् हैतान्प्रजापते-रात्मभूतानन्तवतःपरिच्छिन्नान-ध्यात्मरूपेण वा अधिभूतरूपेण वोपास्ते, स च तदुपासनानुरूपमेव फलमन्तवन्तं लोकं जयति, परि-च्छिन्न एव जायते नैतेषामात्म-भूतो भवतीत्यर्थः । अथ पुनर्यो हैताननन्तान्सर्वात्मकान्सर्वप्रा-ण्यात्मभूतान् अपरिच्छिन्नानुपास्ते सोऽनन्तमेव लोकं जयति ॥ १३ ॥

३५७ जो कोई प्रजापतिके स्वरूपभूत इन सबको अन्तवान् — परिच्छिन्न समझकर अध्यात्म या अधिभूतरूपसे उपासना करता है, वह तो उस उपासनाके अनुरूप फल अन्तवान् लोकको ही जीतता है | अर्थात् वह परिच्छिन्नरूपसे ही उत्पन्न होता है, इनका आत्मभूत नहीं होता । और जो इन्हें अनन्त – सर्वात्मक— समस्त प्राणियोंके आत्मभूत अर्थात् अपरिच्छिन्नरूपसे उपासना करता है, वह अनन्त लोकपर ही विजय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूप से निर्देश पिता पाङ्क्तेन कर्मणा सप्तान्नानि । सृष्ट्वा त्रीण्यन्नान्यात्मार्थमकरो-दित्युक्तम् । तान्येतानि । पाङ्क्त-कर्मफलभूतानि व्याख्यातानि ॥ तत्र कथं पुनः पाङ्क्तस्य कर्मणः फलमेतानि १ इति उच्यते--यस्मात्तेष्वपि त्रिष्वन्नेषु पाङ्क्त-तावगम्यते, वित्तकर्मणोरपि तत्र सम्भवात् । तत्र पृथिव्यग्नी माता, पिताने पाङ्क्तकर्मसे सात अन्नोंको उत्पन्न कर उनमें से तीन अपने लिये निश्चित किये - यह ऊपर कहा गया । पाङ्क्तकर्मके फलभूत उन अन्नोंकी व्याख्या कर दी गयी । किंतु वे पातकर्मके फल किस प्रकार हैं? सो बतलाया जाता है- क्योंकि उन तीन अन्नोंमें. भी पाङ्क्ङ्कता देखी जाती है [ इसलिये वे पाङ्क हैं ]; कारण, वित्त और कर्मकी भी उनमें सम्भावना है । उनमें पृथिवी और अग्नि माता हैं,

पृष्ठ 364

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३५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ दिवादित्यौ पिता । योऽयमन -योरन्तरा प्राणः, स प्रजेति व्या-ख्यातम् । तत्र वित्तकर्मणी सम्भावयितव्ये इत्यारम्भः-स एष संवत्सरः रात्रय एव पञ्चदश कला रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च | द्युलोक और आदित्य पिता हैं, दोनोंके बीचमें जो यह प्राण है, वह प्रजा है - यह तो ऊपर व्याख्या की जा चुकी है । अब उनमें वित्त और कर्मकी सम्भावना दिखानी है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है-प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य ध्रु वैवास्य षोडशी कला स क्षीयते सोऽमावास्या रात्रि-" मेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेताँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छि-न्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै | १४ | वह यह ( तीन अन्नरूप ) संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओंवाला है । उसकी रात्रियाँ ही पंद्रह कला हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा ( नित्य ) ही है । वह रात्रियोंके द्वारा ही [ शुक्लपक्षमें ] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [ कृष्णपक्षमें ] क्षीण होता है । अमावास्याकी रात्रिमें वह इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [ दूसरे दिन ] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है । अत: इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [ इस रात्रि में ] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥

' स एष संवत्सरः ' – योऽयं । ‘ स एष संवत्सरः ' — यहाँ जिस श्यन्नात्मा प्रजापतिः प्रकृतः, स एष अन्नत्रयरूप प्रजापतिका प्रसङ्ग है, उसीका संवत्सररूपसे विशेषतः संवत्सरात्मना विशेषतो निर्दिश्यते । निर्देश किया जाता है । वह यह

पृष्ठ 365

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[ श्रध्याय १ दित्य पिता हैं, इन जो यह प्राण है, वह तो ऊपर व्याख्या । अब उनमें वित्त - भावना दिखानी है, का ग्रन्थ आरम्भ डशकलस्तस्य डशी कला स वावास्या रात्रि-प्रविश्य ततः प्राणं न विच्छि ' अपचित्यै | १४ | सोलह कलाओंवाला कला ध्रुवा ( नित्य ) प्राप्त होता है तथा वह इस सोलहवीं दिन ] प्रातःकालमें का विच्छेद न करे, नमें ] गिरगिटके भी वत्सरः ' - यहाँ जिस जापतिका प्रसङ्ग है, इस ररूपसे विशेषतः जाता है । वह यह ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ षोडशकलः पोडश कला अवयवा अस्य सोऽयं षोडशकलः संवत्सरः संवत्सरात्मा कालरूपः । तस्य च कालात्मनः प्रजापतेः रात्रय एवाहोरात्राणि, तिथय इत्य-र्थः, पञ्चदश कलाः । ध्रुबैव नित्यैव व्यवस्थिता अस्य प्रजापतेः षोडशी षोडशानां पूरणी कला । स रात्रिभिरेव तिथिभिः कलोक्ता -भिरापूर्यते चापक्षीयते च । प्रति-पदाद्याभिर्हि चन्द्रमाः प्रजापतिः शुक्लपक्ष आपूर्यते कलाभिरुपचीय-मानाभिर्वर्धते यावत्सम्पूर्ण मण्डलः पौर्णमास्याम् । ताभिरेवापचीय-मानाभिः कलाभिरपक्षीयते कृष्ण-पक्षे यावद् धुवैका कला व्यवस्थिता अमावास्यायाम् । • स प्रजापतिः कालात्मा श्रमा-वास्याममावास्यायां रात्रिं रात्रौ या व्यवस्थिता ध्रुवा कलोक्ता एतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राण-३५ ९ | संवत्सर - संवत्सरात्मा अर्थात् काल-रूप प्रजापति षोडशकल है; जिसकी षोडश ( सोलह कलाएँ अर्थात् अव-यव हों, उसे षोडशकल कहते हैं । उस कालस्वरूप प्रजापतिकी रात्रियाँ - अहोरात्र अर्थात् तिथियाँ ही पंद्रह कलाएँ हैं तथा इस प्रजापतिकी सोलहवीं अर्थात् सोलह संख्याकी पूर्ति करनेवाली कला ध्रुवा - नित्य व्यवस्थिता ही है । | वह रात्रियों अर्थात् कलारूपसे कही हुई तिथियोंसे ही पूर्णं और अप-क्षीण होता है । वह चन्द्रमा प्रजा-पति शुक्लपक्षमें प्रतिपद् आदि तिथियोंसे बढ़ता है, वह बढ़ती हुई कलाओंसे तबतक बढ़ता रहता है, जबतक कि पूर्णमासीको पूर्णमण्डला-कार न हो जाय; तथा क्षीण होतो हुई उन्हीं कलाओंके द्वारा कृष्णपक्ष-में तबतक क्रमशः क्षीण होता जाता है, जबतक कि अमावास्यामें एक ध्रुवा कला ही शेष न रह जाय । वह कालस्वरूप प्रजापति, ' अमावास्यां रात्रिम् ' - अमावास्या -में रातके समय जो एक ऊपर बतलायी हुई ध्रुवा नामकी कला रहती है, उस सोलहवीं कला-के द्वारा इन समस्त प्राणधारियों

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३६० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ 2 भृत्प्राणिजातमनुप्रविश्य यदपः । पिबति यच्चौषधीरश्नाति तत्सर्वमेव ओषध्यात्मना सर्वं व्याप्यामावा-स्यां रात्रिमवस्थाय ततोऽपरेद्युः प्रातर्जायते द्वितीयया कलया संयुक्तः । एवं पाकात्मकोऽसौ प्रजा-पतिः । दिवादित्यौ मनः पिता । पृथिव्यग्नी वाग्जाया माता; तयोश्च प्राणः प्रजा । चान्द्रमस्यस्तिथयः कला वित्तम्, उपचयापचयधर्मित्वा द्वित्तवत् । तासां च कलानां काला-वयवानां जगत्परिणामहेतुत्वं कर्म । एवमेष कृत्तः प्रजापतिः “ जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १७ ) इत्येषणानुरूप एव पाक्तस्य कर्मणः कर्मणः फलभूतः संवृत्तः । कारणानुविधायिहि कार्यमिति लोकेऽपि स्थितिः । यस्मादेष चन्द्र एतां रात्रिं सर्वप्राणिजातमनुप्रविष्टो वया कलया वर्तते, तस्माद्धेतोरेताम AVALA अर्थात् प्राणिसमुदाय में अनुप्रवेश कर जो जल पीता है और जो ओषधि खाता है, उन सभी में ओषधिरूपसे व्याप्त हो अमावास्याकी रात्रि में स्थित रह दूसरे दिन प्रातःकाल द्वितीय कलासे संयुक्त होकर उत्पन्न होता है । इस प्रकार यह प्रजापति पाङ्क्त-रूप है । द्युलोक, आदित्य और मन पिता हैं; पृथिवी, अग्नि और वाक् जाया -- माता हैं; उन दोनों माता-पिताओंकी प्रजा प्राण है । चन्द्रमा-की तिथियाँ यानी कलाएँ वित्त हैं, क्योंकि वे वित्तके समान वृद्धि और ह्रासरूप धर्मवाली हैं । तथा उन कालावयवरूप कलाओंका जगत्के परिणाममें हेतु होना कर्म है । इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजापति " मेरे जाया हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ; मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ " इस प्रकारकी एषणाके अनुरूप ही पातकर्मका फलभूत हो जाता है । लोकमें भी ऐसी ही स्थिति है कि कार्य कारणका अनुवर्ती होता है । क्योंकि इस रात्रिमें यह चन्द्रमा अपनी ध्रुवा कलाके सहित समस्त f " प्राणिसमुदाय में अनुप्रविष्ट होकर ग विद्यमान रहता है, इसलिये इस

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[ अध्याय १ अनुप्रवेश कर और जो ओषधि भीमें ओषधिरूप से चास्याकी रात्रि में प्रातःकाल द्वितीय होकर उत्पन्न प्रजापति पाङ्क्त-आदित्य और मन अग्नि और वाक् उन दोनों माता-त्राण है । चन्द्रमा-- कलाएँ वित्त हैं, समान वृद्धि और हैं । तथा उन लाओंका जगत्के कर्म है । इस प्रजापति " मेरे मैं प्रजारूपसे उत्पन्न फिर मैं कर्म एषणा के अनुरूप फलभूत हो जाता सी ही स्थिति है कि ननुवर्ती होता है । रात्रिमें यह चन्द्रमा नाके सहित समस्त अनुप्रविष्ट होकर है, इसलिये इस ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ मावास्यां रात्रिं प्राणभृतः प्राणिनः प्राणं न विच्छिन्द्यात्प्राणिनं न प्रमापयेदित्येतत्, अपि कृकला-सस्य । कृकलासो हि पापात्मा स्वभावेनैव हिंस्यते प्राणिभिर्दृष्टो-s प्यमङ्गल इति कृत्वा । ननु प्रतिषिद्धैव प्राणिहिंसा " अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः ' ( छा ० उ ०८।१५।१ ) इति । बाढं प्रतिषिद्धा, तथापि नामा-वास्याया अन्यत्र प्रतिप्रसवार्थं वचनं हिंसायाः कृकलासविषये चा, किं तर्हि? एतस्याः सोमदेव-ताया अपचित्यै पूजार्थम् || १४ || ' ३६१ | अमावास्याकी रात्रिमें प्राणधारी यानी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे; अर्थात् प्राणीको न मारे । यहाँतक कि गिरगिटके भी प्राण न ले 1 गिरगिट पापी प्राणी है, इसलिये यह सोचकर कि यह देखनेसे भी अमङ्गलरूप है, प्राणी स्वभावसे ही इसे मार डालते हैं [ यहाँ उसकी भी हिंसाका निषेध है ] । शङ्का - परंतु " अहिंसन् सर्व-भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः ” इस वचनके अनुसार हिंसा तो सामान्यतः प्रतिषिद्ध ही है । [ फिर यहाँ उसका अलग प्रतिषेध क्यों किया गया? ] समाधान - हाँ, प्रतिषिद्ध है, तथापि यहाँ जो श्रुतिका कथन है वह अमावास्यासे भिन्न समयमें सब प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसाका प्रतिप्रसव ( विशेष विधान ) करनेके लिये नहीं है; तो फिर किस उद्देश्य से है? इस सोम देवताकी अपचिति अर्थात् पूजाके लिये ही [ यह कथन ] है ' ॥ १४ ॥

१ यहाँ यह शङ्का होती है— श्रुतिमें सभी प्राणियोंकी हिंसाका निषेध करनेके लिये ' अहिंसन् सर्वभूतानि ' यह सामान्य वचन है । इसके रहते हुए जो यहाँ ' अमावास्याकी रात में गिरगिटतकका प्राण न ले ' यह विशेष वचन श्रुतिमें कहा गया, इससे यह ध्वनि निकलती है कि अमावास्या के सिवा अन्य तिथियोंमें सभी

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३६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलो ऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदश कला आत्मै-वास्य षोडशी कला स वित्तनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं यदद्यमात्मा प्रधिर्वित्त ं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिना गादित्येवाहुः ॥ १५ ॥

जो भी यह सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति है, वह यही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है । वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा ( शरीर ) ही उसकी सोलहवीं कला है । वह वित्तसे ही बढ़ता और क्षीण होता है । यह जो आत्मा ( पिण्ड ) है, वह नभ्य ( रथचक्रकी नाभिरूप ) है और वित्त प्रधि ( रथचक्रका बाहरका घेरा - - नेमि ) है । इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते हैं कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥

यो वै परोक्षाभिहितः संवत्सरः जो भी सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति परोक्षरूपसे कहा प्रजापतिः षोडशकलः स नैवात्य- | गया है, उसे अत्यन्त परोक्ष ही नहीं प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसा की जा सकती है । ऐसी दशा में पूर्वोक्त सामान्य वचनसे विरोध होगा । यद्यपि विधिकी अपेक्षा निषेधवचन बलवान् होते हैं, तथापि सामान्य निषेधकी अपेक्षा विशेष विधि ही बलवान होता है, इसलिये पूर्वोक्त सामान्य निषेधको बाधकर इस विशेष वचनको प्रवृत्ति होनेसे अमावास्यासे अन्यत्र हिंसाका प्रतिप्रसव ( विशेष विधान ) सिद्ध हो जायगा । निषेधके बाधक विधिको ‘ प्रतिप्रसव ' कहते हैं । उक्त शङ्काका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते. हैं — यहाँ यह श्रुतिका विशेष वचन सोमदेवताकी पूजा करनेके लिये है अर्थात् ‘ अमावास्याकी रातमें सभी प्राणियोंमें सोमदेवता व्याप्त रहते हैं, इसलिये उस दिन किसी भी प्राणीको दुःख न दे ' यह कहकर यहाँ सोमदेवताका सम्मान किया गया हैं, इससे हिंसाका प्रतिप्रसव ( विशेष विधान ) समझना भूल है ।

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[ अध्याय १ नति है कलो ऽयमेव कला आत्मै-पच क्षीयते यपि सर्वज्यानि बाहुः $ 112411 है, वह यही है पंद्रह कलाएं हैं वित्तसे ही बढ़ता नभ्य ( रथचक्रकी रा - - नेमि ) है । हो जाय, किंतु प्रसेि ही क्षीण नह कलाओंवाला परोक्षरूपसे कहा त परोक्ष ही नहीं ऐसी दशा में पूर्वोक्त चचन बलवान् होते होता है, इसलिये होनेसे अमावास्यासे T । निषेधके बाधक हुए भाष्यकार कहते नेके लिये है अर्थात् हैं, इसलिये उस दिन सम्मान किया गया है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ न्तं परोक्षो मन्तव्यः, यस्मादय-मेव स प्रत्यक्ष उपलभ्यते । को-ऽसावयम्? यो यथोक्तं त्र्यन्नात्मकं प्रजापतिमात्मभूतं वेत्तिस एवं वित्पुरुषः । केन सामान्येन प्रजापतिरिति तदुच्यते — तस्यैवंविदः पुरुषस्य गवादि वित्तमेव पञ्चदश कला । उपचयापचयधर्मित्वात्; तद्विच-साध्यं च कर्म । तस्य कृत्स्नतायै आत्मैव पिण्ड एवास्य विदुषः षोडशी कला ध्रुवस्थानीया । स चन्द्रवद्वित्तेनैवापूर्यते चापक्षीयते च - तदेतल्लोके प्रसिद्धम् । तदेतन्नभ्यम्, नाभ्यै हितं नम्यं नाभि वा अर्हतीति । किं तत् १ यदयं योऽयमात्मा पिण्डः । नधि-र्वित्तं परिवारस्थानीयं बाह्यं चक्र- । ३६३ | मानना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष । यही उपलब्ध होता है । वह यह | कौन है? – जो उपर्युक्त अन्नत्रयरूप | आत्मभूत प्रजापतिको जानता है, वह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष । वह किस समानताके कारण प्रजापति है, सो बतलाया जाता है— उस इस प्रकार जाननेवाले पुरुषकी गौ आदि वित्त ही पंद्रह कलाएँ हैं, क्योंकि वे वित्त वृद्धि-ह्रास धर्मवाले हैं और कर्म भी उस वित्तसे ही साध्य है । उसकी पूर्णताके लिये इस विद्वान्का आत्मा यानी पिण्ड ही ध्रुवस्थानीया सोल-हवीं कला है । वह चन्द्रमाके समान वित्तसे ही बढ़ता और अपक्षीण होता है - यह लोक में प्रसिद्ध है । वह यह नभ्य है, ' नाभ्ये हितम् ' अथवा ' नाभिम् अर्हति ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार जो नाभिके लिये हितरूप अथवा नाभिकी योग्यता रखता हो उसे ' नभ्य ' अर्थात् चक्रका मध्य भाग कहते हैं । वह कौन? यह जो आत्मा अर्थात् पिण्ड है । वित्त यानी बाह्य परिवाररूप है, जैसे * अर्थात् जिस प्रकार जगत्का विपरिणाम चन्द्रमाकी कलाओंसे साध्य है उसी प्रकार जगत्का समस्त कार्य वित्तसे साध्य हैं ।

पृष्ठ 370

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ३६४ स्येवारनेम्यादि । तस्माद्यद्यपि । सर्वज्यानिं सर्वस्वापहरणं जीयते । हीयते ग्लानिं प्राप्नोति, आत्मना चक्रनाभिस्थानीयेन चेद्यदि जीवति । प्रधिना बाह्येन परिवारेणाय-मगात्क्षीणोऽयं यथा चक्रमरनेमि -विमुक्तमेवमाहुः । जीवंवेद् अर-नेमिस्थानीयेन वित्तेन पुनरुपचीयत इत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥

लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा एवं पातेन दैववित्तविद्या-संयुक्तेन कर्मणा त्र्यन्नात्मकः प्रजा-पतिर्भवतीति व्याख्यातम् । अन--न्तरं च जाया दिवित्तं परिवारस्था-नीयमित्युक्तम् । तत्र पुत्रकर्मापर -विद्यानां लोकप्राप्तिसाधनत्वमात्रं सामान्येनावगतम्, न पुत्रादीनां लोकप्राप्तिफलं कि पहियेके अरे और नेमि आदि । अतः यद्यपि सर्वज्यानि - सर्वस्वाप-हरण होनेसे पुरुष हीन हो जाता-ग्लानिको प्राप्त हो जाता है, तथापि यदि वह चक्रकी नाभिस्थानीय अपने देहपिण्डसे जीवित है तो लोग यही कहते हैं कि यह प्रधि यानी बाह्य परिवारसे चला गया अर्थात् क्षीण हो गया, जिस प्रकार कि अरे और नेमिसे रहित चक्र । तात्पर्य यह है कि यदि वह जीवित रहता है तो रथकी नेमिरूप धनसे फिर भी वृद्धि-को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन इस प्रकार दैववित्त और विद्या-संयुक्त पातकर्मके द्वारा प्रजापति अन्नत्रयरूप है – इसकी व्याख्या कर दी गयी । उसके पीछे परिवार-स्थानीय स्त्री आदि वित्तका वर्णन किया गया । वहाँ पुत्र, कर्म और अपरविद्याका सामान्यरूपसे लोक-प्राप्तिमें साधन होनामात्र विदित होता है; पुत्रादिका लोकप्राप्तिरूप प्रति विशेष सम्बन्ध - फलके प्रति विशेष सम्बन्ध होनेका नियमः । सोऽयं पुत्रादीनां साध- नियम नहीं जान पड़ता । वह पुत्रादि नानां साध्य विशेषसम्बन्धो वक्तव्य साधनोंका साध्यविशेषोंके साथ इत्युत्तरकण्डिका सम्बन्ध बतलाना है— इसीलिये प्रणीयते- आगेकी कण्डिका रची जाती है-