बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 371–380

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ आदि । नि - सर्वस्वाप-होन हो जाता-जाता है, तथापि भिस्थानीय अपने है तो लोग यही यानी बाह्य या अर्थात् क्षीण र कि अरे और तात्पर्य यह है वित रहता है तो से फिर भी वृद्धि-- है ॥ १५ ॥

ताका वर्णन वित्त और विद्या-कद्वारा प्रजापति - इसकी व्याख्या के पीछे परिवार-वित्तका वर्णन हाँ पुत्र, कर्म और मान्यरूपसे लोक-डोनामात्र विदित का लोकप्राप्तिरूप न्य सम्बन्ध होनेका नड़ता । वह पुत्रादि विशेषोंके साथ ना है— इसीलिये रची जाती है-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५ अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको .वै लोकाना श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशसन्ति ॥ १६ ॥

अथ मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक – ये हो तीन लोक हैं । वह " यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं । तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्यासे जीते जा सकते हैं लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है; इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥

अथेति वाक्योपन्यासार्थः ॥ ' अथ ' यह शब्द वाक्यारम्भके त्रयः, वावेत्यवधारणार्थः । त्रय लिये है । ' त्रयो वाव ' इसमें ' वाव ' एव शास्त्रोकसाधनाह लोकाः, न न्यूना नायिका वा । के ते १ इत्युच्यते-- मनुष्यलोकः पितृ-लोको देवलोक इति । तेषां सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रे-णैव साधनेन जय्यो जेतव्यः साध्यः – यथा च पुत्रेण जेन-व्यस्तथोत्तरत्र वक्ष्यामः, -ना-न्येन कर्मणा, विद्याया बेति वाक्यशेषः । कर्मणा श्रग्निहोत्रादिलक्षणेन केवलेन पितृलोको जेतव्यो न पुत्रेण नापि विद्यया 1 । विद्यया निश्वयार्थक है । शास्त्रोक्त साधनसे प्राप्त होने योग्य तीन ही लोक हैं; । न इससे कम हैं, न अधिक | वे कौन-से हैं? सोबतलाये जाते हैं -मनुष्य-लोक, पितृलोक और देवलोक । उनमें वह यह मनुष्यलोक पुत्र-रूप साधनके द्वारा ही जीता जा सकने योग्य, जीतनेके लायक अर्थात् साध्य ( प्राप्त करने योग्य ) है । वह पुत्रद्वारा किस प्रकार प्राप्तव्य है, सो आगे बतलावेंगे । किसी अन्य कर्म अथवा विद्यासे नहीं । यहाँ ' विद्यया वा ' ( अथवा विद्यासे ) यह वाक्य-शेष है । अग्निहोत्रादिरूप केवल कर्मसे पितृलोक जीतने योग्य है- पुत्रसे । अथवा विद्यासे नहीं । तथा विद्यासे

पृष्ठ 372

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ देवलोको न पुत्रेण नापि कर्मणा । । देवलोक प्राप्त होनेयोग्य है - – पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं । देवलोको वै लोकानां त्रयाणां तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है 1 श्रेष्ठः प्रशस्यतमः । तस्मात्तत्सा- अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी

धनत्वाद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥ । प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥

सम्प्रत्तिकर्म और एवं साध्यलोकत्रयफलभेदेन विनियुक्तानि पुत्र कर्मविद्याख्यानि त्रीणि साधनानि । जाया तु पुत्र-कर्मार्थत्वान्न पृथक्साधनमिति पृथङ्नाभिहिता । वित्तं च कर्म-साधनत्वान्न पृथक्साधनम् । विद्याकर्मणोर्लोक जय हेतुत्वं स्वात्मप्रतिलाभेनैव भवतीति प्रसिद्धम् । पुत्रस्य त्वक्रियात्मक-त्वात्केन प्रकारेण लोकजय हेतु-त्वमिति न ज्ञायते । अतस्तद्वक्त-व्यमित्यथानन्तरमारभ्यते-उसका परिणाम इस प्रकार पुत्रकर्म और विद्या-संज्ञक तीन साधनों का उनके साध्य लोकत्रयरूप फलके भेदसे विनियोग किया गया । स्त्री तो पुत्र और कर्मके लिये ही होनेके कारण कोई पृथक् साधन नहीं है; इसलिये उसका अलग वर्णन नहीं किया गया । वित्त भी कर्मका साधन होनेके कारण अलग साधन नहीं है । विद्या और कर्म अपने स्वरूपकी निष्पत्ति होनेसे ही लोकजयके हेतु होते हैं - यह प्रसिद्ध है । किन्तु पुत्र अक्रियात्मक है । वह किस प्रकार लोकजयका हेतु होता है-यह नहीं जाना जाता । अतः वह बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है-अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यते ऽथ पुत्रमाह त्वं ff ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं

पृष्ठ 373

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ योग्य है – पुत्रसे । देवलोक ही श्रेष्ठ - प्रशंसनीय है । होनेसे विद्याको १६ ॥ कर्म और विद्या-का उनके साध्य भेदसे विनियोग पुत्र और कर्मके रण कोई पृथक् इसलिये उसका किया गया । वित्त होनेके कारण है । अपने स्वरूपकी लोकजयके हेतु सद्ध है । किन्तु है । वह किस हेतु होता है-नाता । अतः वह लिये आगेका ग्रन्थ ता है-थ पुत्रमाह त्वं हाहं ब्रह्माहं ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७ यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्ततस्य सर्वस्य ब्रह्मत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषाँ सर्वेषांयज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषा ँ सर्वेषां लोक इत्येक-तैतावद्वा इद ँ सर्वमेतन्मा सर्व ँ सन्नयमितोऽभुनज-दिति तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मादेनमनुशा-सति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेन सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥

अब सम्प्रत्ति [ कही जात्ती है - ] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तो वह पुत्रसे कहता है - ' तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है । ' वह पुत्र बदलेमें कहता है- ' मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ । ' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी ' ब्रह्म ' यह एकता है । जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी ' यज्ञ ' यह एकता है । और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी ' लोक ' यह एकता है । यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्त्तव्य है । [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा । अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको ' लोक्य ' ( लोकप्राप्ति में हितकर ) कहते हैं । इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है । इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है तो अपने उन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है । यदि किसी कोणच्छिद्र ( प्रमाद ) से उस ( पिता ) के द्वारा कोई कर्त्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है । इसीसे उसका नाम ' पुत्र ' है । वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है । फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृतप्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥

पृष्ठ 374

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ सम्प्रत्तिः सम्प्रदानम्; सम्प्र-तिरिति वक्ष्यमाणस्य कर्मणो नामधेयम् । पुत्रे हि स्वात्मव्या-पारसम्प्रदानं करोत्यनेन प्रकारेण पिता, तेन सम्प्रतिसंज्ञकमिदं कर्म । तत्कस्मिन्काले कर्तव्यम्? इत्याह - स पिता यदा यस्मिन् । काले प्रैष्यन् मरिष्यन् मरिष्यामी- । त्यरिष्टादिदर्शनेन मन्यते, अथ तद । पुत्रमाहूयाह — त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञ-स्त्वं लोक इति । स एवमुक्तः पुत्रः प्रत्याह स तु पूर्वमेवानु-शिष्टो जानाति मयैतत्कर्तव्यमिति, तेनाह— अहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति । एतद्वाक्यत्रयम् । एतस्यार्थस्तिरोहित इति म-न्वाना श्रुतिर्व्याख्यानाय प्रव-र्तते – यद्वै किश्च यत्किञ्चावशि-ष्टमनूक्तमधीतमनधीतं च तस्य सर्वस्यैव ब्रह्मेत्येतस्मिन्पदे एकता एकत्वम् योऽध्ययनव्यापारो मम कर्तव्य आसीदेतावन्तं कालं ' सम्प्रत्ति ' सम्प्रदानको कहते हैं । ' सम्प्रत्ति ' यह आगे कहे जाने-वाले कर्मका नाम है । पिता पुत्रमें अपने व्यापारका इस प्रकारसे सम्प्र-दान करता है, इसलिये यह कर्म ' सम्प्रत्ति ' नामवाला है । उसे किस समय करना चाहिये? इसपर श्रुति कहती है - वह पिता जिस समय करनेको होता है अर्थात् अरिष्ट ( मरण के पूर्वचिह्न ) आदि देखकर यह समझता है कि ' अब मैं मरूँगा ', उस समय पुत्रको बुलाकर इस प्रकार कहता है - ' तू ब्रह्म है, तू यज्ञ । है, तू लोक है । ' इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र उत्तरमें कहता है । वह शिक्षित होनेके कारण पहले से ही जानता है कि मुझे यह करना चाहिये, इसलिये कहता है - ' मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ । ' ये तीन पृथक् - पृथक् वाक्य हैं । इन वाक्योंका अर्थं गूढ है— ऐसा समझकर श्रुति इसकी व्याख्या करने के लिये प्रवृत्त होती है - जो कुछ भी अवशिष्ट — अनूक्त अर्थात् अध्ययन किया हुआ और अध्ययन नहीं किया हुआ है, उस सभोकी ' ब्रह्म ' इस पदमें एकता है । तात्पर्य यह है कि जो वेदविषयक स्वाध्याय - कार्य इतने समयतक मेरे लिये कर्तब्ध

पृष्ठ 375

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ सम्प्रदानको कहते आगे कहे जाने-है । पिता पुत्रमें इस प्रकारसे सम्प्र-इसलिये यह कर्म ला है । उसे किस हिये? इसपर श्रुति पिता जिस समय है अर्थात् अरिष्ट हृ ) आदि देखकर कि ' अब मैं मरूँगा ', को बुलाकर इस – ' तू ब्रह्म है, तू यज्ञ इस प्रकार कहे उत्तरमें कहता है । निके कारण पहलेसे कि मुझे यह करना ये कहता है- ' मैं हूँ, मैं लोक हूँ । ' ये वाक्य हैं । का अर्थ गूढ है-श्रुति इसकी व्याख्या वृत्त होती है- जो ष्ट— अनूक्त अर्थात् हुआ और अध्ययन T है, उस सभी की एकता है । तात्पर्य यह वयक स्वाध्याय - कार्य मेरे लिये कर्तव्ध ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ वेदविषयः, स इत ऊर्ध्वं त्वं ब्रह्म । त्वत्कर्तुः कोऽस्त्वित्यर्थः । तथा ये वै च यज्ञा अनु-ष्ठेयाः सन्तो मया अनुष्ठिताश्चा-ननुष्ठिताश्च तेषां सर्वेषां यज्ञ | इत्येतस्मिन्पदे एकतैकत्त्रम्, मस्क-र्तृका यज्ञा य आसन्, ते इत ऊर्ध्वं त्वं यज्ञः— त्वत्कर्तृका भवन्त्वि-त्यर्थः । ये वै के च लोका मया जेतव्याः सन्तो जिता अजिताश्च, तेषां सर्वेषां लोक इत्येतस्मिन्पदे एकता । इत ऊर्ध्वं त्वं लोक-स्त्वया जेतव्यास्ते । इत ऊर्ध्वं मयाध्ययनयज्ञलोकजय कर्तव्य-क्रतुस्त्वयि समर्पितः, अहं तु मुक्तोऽस्मि कर्तव्यताबन्धनविष-यात्क्रतोः । स च सर्वं तथैव प्रतिपन्नवान्पुत्रोऽनुशिष्टत्वात् । तत्रेमं पितुरभिप्रायं मन्वाना याचष्टे श्रुतिः - एतावदेतत्परिमाणं बृ ० उ ० २४– ३६ ९ N था, वह आजके बादसे ' त्वं ब्रह्म'— त्वत्कर्तृक हो अर्थात् अब तू उसका करनेवाला हो । तथा मेरेद्वारा अनुष्ठेय ( करने-योग्य ) जो कुछ भी अनुष्ठित ( कृत ) और अननुष्ठित ( अकृत ) यज्ञ थे, उन सब यज्ञोंकी [ ‘ त्वं यज्ञः ’ ( तू यज्ञ है ) इस वाक्यके ] ' यज्ञः ' पदमें एकता है । अर्थात् जो यज्ञ अबतक मेरेद्वारा किये जानेवाले थे वे अब तेरेद्वारा किये जानेवाले हों । तथा जो कोई भी लोक मेरेद्वारा जीते जानेयोग्य होकर जीते गये अथवा नहीं जीते गये उन सब लोकोंकी [ ' त्वं लोक: ' इस वाक्यके ] ' लोक ’ पदमें एकता है । अबसे आगे ‘ त्वं लोक: ' ( तू लोक है ) अर्थात् वे लोक तेरेद्वारा जीते जानेयोग्य हों । आजसे आगेके लिये अध्ययन, यज्ञ और लोकजयसम्बन्धी कर्तव्यका संकल्प तुझे सौंप दिया, अब मैं इनकी कर्तव्यताके बन्धनविषयक संकल्पसे मुक्त हो गया । शिक्षित होनेके कारण उस पुत्रने भी सब उसी प्रकार समझ लिया । यहाँ श्रुति ने यह बात पिताका ऐसा अभिप्राय मानकर कही है कि गृहस्थ पुरुषके लिये जो कर्तव्य है,

पृष्ठ 376

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ वै इदं सर्वं यद्गृहिणा कर्तव्यम् । यदुत वेदा अध्येतव्याः, यज्ञा यष्टव्याः, लोकाश्च जेतव्याः, । ए-तन्मा सर्वं सन्नयम् -- सर्वं हीमं भारं मदधीनं मत्तो s पछि आत्मनि निधाय, इतोऽस्माल्लोकान्मा माम् अश्चनजत्पालयिष्यतीति । लृडर्थे । लङ, छन्दसि कालनियमाभावात् । वह इतना ही है कि वेदोंका अध्ययन करना चाहिये, यज्ञोंका यजन करना चाहिये और लोकोंपर जय प्राप्त करनी चाहिये । ' एतन्मा सर्व सन्नयम् ' – इत्यादिका अभिप्राय यों है कि यह ( पुत्र ) स्वयं ये सब कुछ होकर अर्थात् मेरे अधीन रहनेवाले इस सारे भारको मुझसे लेकर अपने ऊपर रखकर इस लोकसे जानेपर ' माम् अभुनजत् ’ - मेरा पालन करेगा । यहाँ लुट्के अर्थ में लङ् लकारका प्रयोग हुआ है; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं है । ' १. ' अभुनजत ' – यह ' भुज ' घातुकी लङ, लकारकी क्रिया है । लङ, लकार अनद्यतन भूतकालमें प्रयुक्त होता है; इसका पर्याय ' अपालयत् ' और अर्थ ' पालन किया ' ऐसा होना चाहिये । किंतु भाष्यकार उक्त क्रियाका पर्याय ' पालयिष्यति ' लिखते हैं; ' पालयिष्यति ' सामान्य भविष्य - वाची ' लृट् लकारकी क्रिया है, इसके अनुसार ' अभुनजत् ' का अर्थ ' पालन करेगा ' – ऐसा होता है । प्रकरणके अनुसार ऐसा ही अर्थ होना सुसंगत भी है । परंतु भूतकालिक क्रियाका भविष्यकालिक अर्थ हो कैसे सकता है? — यह प्रश्न सामने आता है । इसका ही उत्तर देते हुए भाष्यकार कहते हैं — ‘ यहाँ ' लूट ' के अर्थ में ' लङ ' का प्रयोग समझना चाहिये; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं होता । परंतु इसका भाव यह नहीं समझना चाहिये कि ' वास्तवमें वेदमें कालका कोई निश्चित नियम ही नहीं है, सभी जगह विपरीत ही रूप मिलते हैं । ' भाष्य-कारके उस कथनका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि वेदमें भूत, वर्तमान और भविष्यका निश्चित स्वरूप होते हुए भी कहीं - कहीं इसमें व्यत्यय ( वैपरीत्य ) भी देखा जाता है; इसलिये यहाँ कालका व्यत्यय समझना चाहिये अर्थात् भविष्यकालके ही अर्थमें भूतकालकी क्रियाका यहां प्रयोग हुआ है - ऐसा मानना चाहिये । सूत्रकार महर्षि पाणिनिने ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३ । १ । ८५ ) इस सूत्र के द्वारा ऐसे स्थलोंका निर्देश किया है । व्यत्यय केवल कालका

पृष्ठ 377

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय१ कि वेदोंका अध्ययन यज्ञोंका यजन करना लोकोंपर जय प्राप्त ये । ' एतन्मा सर्व दिका अभिप्राय यों ब ) स्वयं ये सब कुछ अधीन रहनेवाले मुझसे लेकर अपने . इस लोकसे जानेपर - मेरा पालन करेगा । र्थमें लङ् लकारका क्योंकि वेदमें कालका २ क्या है । लङ, लकार त् ' और अर्थ ' पालन पर्याय ' पालयिष्यति ' की क्रिया है, इसके । प्रकरण के अनुसार चाका भविष्यकालिक का ही उत्तर देते हुए ग समझना चाहिये; स्तव में वेदमें कालका मिलते हैं । ' भाष्य-भूत, वर्तमान और व्यत्यय ( वैपरीत्य ) ना चाहिये अर्थात् योग हुआ है - ऐसा ( पा ० सू ० ३ । १ । प्रत्यय केवल कालका ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ यस्मादेवं सम्पन्नः पुत्रः पित-रम् अस्माल्लोकात्कर्तव्यताबन्ध नतो मोचयिष्यति, तस्मात्पुत्र-मनुशिष्टं लोक्यं लोकहितं पितु-राहुर्ब्राह्मणाः । अत एव ह्येनं पुत्रमनुशासति, लोक्योऽयं नः स्यादिति, पितरः । स पिता यदा यस्मिन्काले एवंवित्पुत्रसमर्पितकर्तव्यताक्रतुः, श्रस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते, अथ तदैभिरेव प्रकृतैर्वाङ्मनः प्राणैः पुत्रमाविशति पुत्रं व्याप्नोति । अ-ध्यात्मपरिच्छेदहेत्वपगमात्पितु -र्वाङ्मनःप्राणाःस्वेन आधिदैविकेन रूपेण पृथिव्यग्न्याद्यात्मना भिन्न घटप्रदीपप्रकाशवत्सर्वमाविशन्ति । ही नहीं होता, विकरण, सुप्, तिङ्, पद, ३७१ क्योंकि इस प्रकार सम्पन्न ( कर्तव्यभारसे युक्त ) हुआ पुत्र पिता-को इस लोकसे कर्तव्यताके बन्धनसे मुक्त करा देगा, इसलिये ब्राह्मणगण इस प्रकार अनुशिष्ट — - सुशिक्षित किये गये पुत्रको लोक्य -- पिताके लिये लोकमें हितकर बतलाते हैं । इसी-लिये इस आशयसे कि ' यह हमारे लिये लोक्य हो ' पितृगण इस पुत्र-का अनुशासन करते हैं । इस प्रकार जाननेवाले पुत्रको जिसने अपनी कर्तव्यताका संकल्प सौंप दिया है वह पिता जिस समय इस लोकसे जाता है यानी मरता है तब वह इन प्रकृत वाकू, मन और प्राणोंसे ही पुत्रमें आविष्ट अर्थात् ब्याप्त हो जाता है । अध्यात्म-परिच्छेदरूप हेतुकी निवृत्ति हो जाने कारण का पता पिताके, मन और प्राण अपने पृथिवी एवं अग्नि आदि आधिदैविक रूपसे फूटे हुए घड़ेके अन्तर्वर्ती दीपक-के प्रकाशके समान सबमें व्याप्त लिङ्ग और पुरुष आदिका भी होता है, जैसा कि निम्नाङ्कित कारिकासे सिद्ध होता है - ' सुप्तिङपग्रहलिङ्गनराणां कालहल-च्स्वरकर्तृयङां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन । ' उपर्युक्त ' अभुनजत् ' क्रिया में विकरणका भी व्यत्यय हुआ है, अन्यथा ' अभुनक् रूप ही होना उचित है । यहाँ ' श्रम् ' और ' श ' दो विकरणोंके होनेसे ' अभुनजत् ' रूप वना है ।

पृष्ठ 378

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ तैः प्राणैः सह पिताप्पाविशति । वाङ्मनःप्राणात्मभाबित्वात्पितुः । श्रहमस्म्यनन्ता वाङ्मनः प्राणा । अध्यात्मादिभेदविस्तारा इत्येवं भावितो हि पिता । तस्मात्तत्प्राणा -नुवृत्तित्वं पितुर्भवतीति युक्तमु-क्तम् — एभिरेव प्राणैः सह पुत्र-माविशतीतिः सर्वेषां ह्यसावात्मा भवति पुत्रस्य च । एतदुक्तं भवति -यस्य पितु-रेवमनुशिष्टः पुत्रो भवति सो-ऽस्मिन्नेव लोके वर्तते पुत्ररूपेण, नैव मृतो मन्तव्य इत्यर्थः । तथा च श्रुत्यन्तरे - " सोऽस्याय मितर आत्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रविधी-यते " ( ऐ ० उ ० ४ । ४ ) इति । अथेदानीं पुत्रनिर्वचनमाह— स पुत्रो यदि कदाचिदनेन पित्रा अक्ष्णया कोणच्छिद्रतोऽन्तरा अकृतं भवति कर्तव्यम्, तस्मात्, १. ऐतरेय उपनिषद्में इस मन्त्रका पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयतेऽथास्यायमितर हो जाते हैं । उन प्राणोंके साथ पिता भी सबमें व्याप्त हो जाता है, क्योंकि वह तो वाक्, मन और प्राणका स्वरूपभूत ही है । पिताकी ऐसी भावना रही है कि ' मैं ही अ-ध्यात्मादि भेद - विस्तारवाले अनन्त वाक्, मन और प्राण हूँ । ' अतः पिताकी उन प्राणोंमें अनुवृत्ति होती है, इसलिये यह ठीक ही कहा है कि ' इन प्राणोंके साथ ही वह पुत्रमें व्याप्त होता है, क्योंकि वह सभीका और पुत्रका भी आत्मा हो जाता है । इससे यह प्रतिपादित होता है कि जिस पिताका इस प्रकार अनुशा-सन किया हुआ पुत्र होता है, वह पुत्र-रूपसे इसी लोकमें विद्यमान रहता है, अर्थात् उसे मरा हुआ नहीं मानना चाहिये । ऐसा ही इस अन्य श्रुतिमें भी कहा है- " उसका यह दूसरा आत्मा पुण्य - कर्मोंके लिये प्रति-निधि बना दिया जाता है ” इत्यादि । अब श्रुति पुत्रका निर्वचन ( व्युत्पत्ति ) बतलाती है - वह पुत्र, यदि कभी उसके इस पिताद्वारा ' अक्ष्णा ' ' कोणच्छिद्र ' ( असावधानी ) से बीचमें कोई कर्तव्य बिना किये पाठ इस प्रकार है — सोऽस्यायमात्मा आत्मा ं ं ।

पृष्ठ 379

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ प्राणोंके साथ व्याप्त हो जाता है, वाक्, मन और ही है । पिताक ही है कि ' मैं ही अ-वस्तारवाले अनन्त र प्राण हूँ । ' अतः अनुवृत्ति होती ठीक ही कहा है कि ही वह पुत्र में व्याप्त कि वह सभीका आत्मा हो जाता है । तिपादित होता है । - इस प्रकार अनुशा-होता है, वह पुत्र-में विद्यमान रहता मरा हुआ नहीं ऐसा ही इस अन्य है - " उसका यह - कर्मोंके लिये प्रति-जाता है " इत्यादि । पुत्रका. निर्वचन लाती है - वह पुत्र, के इस पिताद्वारा च्छद्र ' ( असावधानी ) कर्तव्य बिना किये है— सोऽस्यायमात्मा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३ कर्तव्यतारूपात्पित्रा अकृतात् सर्वं - । स्माल्लोकप्राप्तिप्रतिबन्धरूपात्पुत्रो मुञ्चति मोचयति तत्सर्वं स्वयमनु-तिष्ठन्पूरयित्वा । तस्मात्पूरणेन त्रायते स पितरं यस्मात्तस्मात्पुत्रो नाम । इदं तत्पुत्रस्य पुत्रत्वं यत्पितुश्छिद्र ं पूरयित्वा त्रायते । स पितैवंविधेन पुत्रेण मृतोऽ पि सन्नमृतोऽस्मिन्नेव लोके प्रति तिष्ठति, एवमसौ पिता पुत्रेणेमं मनुष्यलोकं जयति । न तथा विद्याकर्मभ्यां देवलोक पितृलोकौ स्वरूपलाभसत्तामात्रेण; न हि वि-द्याकर्मणी स्वरूपलाभव्यतिरेकेण पुत्रवद्वयापारान्तरापेक्षया लोक-जयहेतुत्वं प्रतिपद्येते । अथ कृत-सम्प्रत्तिकं पितरमेनमेते वागा-दयः प्राणा देवा हैरण्यगर्भा अमृता अमरणधर्माण श्रविशन्ति ( अपूर्ण ) ही रह जाता है तो वह पिताद्वारा नहीं किये हुए लोकप्राप्ति-के प्रतिबन्धरूप उस समस्त कर्तव्य-तारूप [ बन्धन ] से उस सबका स्वयं अनुष्ठान करते हुए उसकी पूर्ति करके पिताको मुक्त करा देता है । अत: वह पुत्र, चूँकि पूर्ति के द्वारा पिताका त्राण करता है, इसलिये ' पुत्र ' कहलाता है । पुत्रका पुत्रत्व यही है कि वह पिता के छिद्रकी पूर्ति करके उसका त्राण करता है । इस प्रकारके पुत्रके कारण वह पिता मरकर भी अमृत रहता है; अर्थात् इसी लोकमें विद्यमान रहता है । इस प्रकार पुत्रके द्वारा पिता इस मनुष्यलोकपरं जय प्राप्त करता है । विद्या और कर्मके द्वारा जिस प्रकार वह देवलोक और पितृलोकपर उनके स्वरूपलाभकी सत्तामात्रसे विजय प्राप्त करता है, उस प्रकार इसे नहीं करता । विद्या और कर्म [ देव और पितृलोकके ] स्वरूपलाभके सिवा पुत्रके समान किसी व्यापा-रान्तरकी अपेक्षासे लोकजयके हेतु नहीं होते । फिर, जिसने सम्प्रत्ति -कर्म किया है ऐसे उस पितामें ये वागादि देव – हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत - अमरण - धर्मा प्राण आविष्ट ॥ १७ ॥ होते हैं ॥ १७ ॥

wwwwwwwww

पृष्ठ 380

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि कथमिति वक्ष्यति पृथिव्यै पाङ ्मक्तकर्मणो मोक्षा- चैनमित्यादि । र्थत्वनिरासः एवं पुत्रकर्मापर-विद्यानां मनुष्यलोकपितृलोकदेव -लोकसाध्यार्थता प्रदर्शिता श्रुत्या स्वयमेव । अत्र केचिद्वावदूकाः । श्रुत्युक्त विशेषार्थानभिज्ञाः सन्तः पुत्रादिसाधनानां मोक्षार्थतां वद-न्ति । तेषां मुखापिधानं श्रुत्येदं । कृतम् - जाया मे स्यादित्यादि पाङ्क्तं काम्यं कर्मेत्युपक्रमेण, पुत्रादीनां च साध्यविशेषविनियो-गोपसंहारेण च । तस्माद्दणश्रुति-रविद्वद्विषया न परमात्मविद्विषये ति सिद्धम् । वक्ष्यति च — " किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमा-त्मायं लोकः " ( ४ । ४ । २२ ) इति । केचित्तु पितृलोकदेव लोकज-समुच्चयवाद- योऽपि पितृलोकदेव-निराकरणम् लोकाभ्यां व्यावृत्ति रेव; तस्मात्पुत्रकर्मापरविद्याभिः सम्मुच्चित्यानुष्ठिताभिस्त्रिभ्य एते प्राणोंके प्रवेशका प्रकार किस प्रकार आविष्ट होते हैं, सो ' पृथिव्यै चैनम् ' इत्यादि श्रुति बतलावेगी । इस प्रकार श्रुतिने स्वयं ही पुत्र, कर्म और अपरा विद्याको मनुष्यलोक, पितृलोक एवं देवलोक-की प्राप्तिके साधनरूपसे दिखलाया । यहाँ कुछ वाचाललोग श्रुतिप्रति-पादित विशेष अर्थको न समझकर पुत्रादि साधनोंकी मोक्षार्थंता बत-लाते हैं । परंतु श्रुतिने — = ' मेरे स्त्री हो ’ इत्यादि ' पाङ्क काम्य कर्म है - इस उपक्रमसे तथा पुत्रादिका [ मनुष्य-लोकादि ] साध्यविशेषमें विनियोग करनारूप उपसंहारसे उनका मुख बंद कर दिया है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ऋणत्रयका प्रतिपादन कर-नेवाली श्रुतिका अधिकारी अज्ञानी है, परमात्मवेत्ता नहीं । आगे श्रुति कहेगी भी कि " हम, जिनका यह आत्मा ही लोक है, प्रजासे क्या करेंगे? ” इत्यादि । किन्हीं - किन्होंका मत है कि पितृलोक और देवलोकको जीतना भी पितृलोक और देवलोक से निवृत्त होना ही है । अतः समुच्चयपूर्वक [ अर्थात् एक साथ ] अनुष्ठान किये हुए पुत्र, कर्म और अपरा विद्याद्वारा