बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 381–390

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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[ अध्याय १ का प्रकार र आविष्ट होते हैं, म् ' इत्यादिश्रुति प्रकार श्रुतिने स्वयं र अपरा विद्याको लोक एवं देवलोक -न रूप से दिखलाया । लोग श्रुतिप्रति-वर्थको न समझकर मोक्षार्थता बत-तिने — ' मेरे स्त्री हो ' काम्यकर्म है - इस त्रादिका [ मनुष्य-विशेषमें विनियोग हारसे उनका मुख इसलिये यह सिद्ध का प्रतिपादन कर-अधिकारी अज्ञानी नहीं । आगे श्रुति हम, जिनका यह - है, प्रजासे क्या I का मत है कि चलोकको जीतना देवलोक से निवृत्त अतः समुच्चयपूर्वक न्य ] अनुष्ठान किये र अपराविद्याद्वारा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७५ भ्यो लोकेभ्यो व्यावृत्तः परमा- । त्मविज्ञानेन मोक्षमधिगच्छतीति परम्परया मोक्षार्थान्येव पुत्रादि-साधनानीच्छन्ति । तेषामपि मुखा -पिधानायेयमेव श्रुतिरुत्तरा कृत-सम्प्रत्तिकस्य पुत्रिणः कर्मिणः पन्नात्मविद्याविदः फलप्रदर्श-नाय प्रवृत्ता । न चेदमेव फलं मोक्षफलमिति-शक्यं वक्तुम्, त्र्यन्नसम्बन्धात्, मेधातपःकार्यत्वाच्चान्नानाम्, ' पुनः पुनर्जनयते ' इति दर्शनात्; ' यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह ' इति च क्षयश्रवणात् । शरीरं ज्योती-रूपमिति च कार्यकरणत्वोपपत्तेः । ' त्रयं वा इदम् ' इति च नामरूप -कर्मात्मकत्वेनोपसंहारात् । न चेदमेव साधनत्रयं संहतं सत्कस्यचिन्मोक्षार्थं कस्य चित् / इन तीनों लोकोंसे निवृत्त हुआ पुरुष परमात्मज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है; इस प्रकार उनका मत है कि पुत्रादि साधन भी परम्परासे मोक्षके ही लिये हैं । उनका भी मुख बंद करनेके लिये यह आगेकी श्रुति, जिसने सम्प्रत्ति - कर्म किया है, उस पुत्रवान्, कर्मठ एवं त्र्यन्नात्म-विद्याके ज्ञाताको मिलनेवाला फल बतलानेके लिये प्रवृत्त होती है । और यह कहा नहीं जा सकता कि यह फल ही मोक्षफल है; क्योंकि इसका अन्नत्रयसे सम्बन्ध है और अन्न मेघा एवं तपके कार्य हैं, कारण ' वह इन्हें पुनः - पुनः उत्पन्न करता है ' ऐसा श्रुतिका वचन देखा जाता है तथा ' यदि वह इन्हें उत्पन्न न करे तो ये क्षीण हो जायँ ' इस प्रकार इनका क्षय भी सुना गया है । एवं शरीर और ज्योतीरूप बतलाकर इनके कार्यत्व और करणत्वकी भी उपपत्ति दिखायी गयी है और ' त्रयं वा इदम् ' ऐसा कहकर नाम - रूप-कर्मात्मक रूपसे इनका उपसंहार किया है । इस एक ही वाक्यसे ऐसा भी नहीं जाना जा सकता कि ये तीनों साधन मिलकर किसीके मोक्ष के लिये

पृष्ठ 382

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३७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय१ त्र्यन्नात्मफलमित्यस्मादेव वाक्या होते हैं और किसीके लिये त्र्यन्नात्म-दवगन्तुं शक्यम्, पुत्रादिसाध- | रूप फलवाले होते हैं, क्योंकि पुत्रादि नानां त्र्यन्नात्मफलदर्शनेनैवोप- साधनों का त्र्यन्नात्मफल दिखाते हुए क्षीणत्वाद् वाक्यस्य । ही यह वाक्य समाप्त होता है । पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै देवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ १८ ॥ ि

पृथिवी और अग्निसे इसमें दैवी वाक्का आवेश होता है । दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो - जो भी बोलता है, वही वही हो जाता है ॥ १८ ॥

पृथिव्यै पृथिव्याःच एनम् अग्न अ दैवी अधिदैवात्मिका वागेनं कृत-सम्प्रत्तिकमाविशति । सर्वेषां हि वाच उपादानभूता दैवी वाक्पृथि-व्यग्निलक्षणा, साह्याध्यात्मिका सङ्गादिदोषैर्निरुद्धा । विदुषस्त-द्दोषापगमे श्रावरणभङ्ग इवोदक-प्रदीपप्रकाशवच्च व्याप्नोति । तदे-तदुच्यते - पृथिव्या अग्नेश्चैनं । दैवी वागाविशतीति । सा च दैवी वागनृतादिदोष-रहिता शुद्धा, यया वाचा दैव्या यद्यदेव आत्मने परस्मै वा वदति पृथिवी और से इस सम्प्रत्तिः कर्म करनेवालेमें दैवी - आधि-दैविक वाक्का आवेश होता है ॥ पृथिवी और अग्निरूपा दैवी वाक् सभीकी वाणीको उपादानभूता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक ( दैहिक ) आसक्ति आदि दोषोंसे आवृत्त है, किंतु आवरण " व्यवधान ) के निवृत्त होनेपर जैसे जल और प्रकाश फैल जाते हैं उसी प्रकार • विद्वान्के उस ( आध्यात्मिक आसक्तिरूप ) दोष के निवृत्त हो जानेपर वह उसमें आविष्ट हो जाती है । इसीसे यह कहा है कि उसमें पृथिवीं और अग्निसे दैवी वाक्का आवेश होता है । .. .वह दैवी वाक् अनृतादि दोषसे रहित और शुद्ध होती है, जिस देवी वाणीसे वह अपने या दूसरेके लिये जो-

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[ अध्याय १ सीके लिये त्र्यन्नात्म-ते हैं, क्योंकि पुत्रादि नात्मफल दिखाते हुए समाप्त होता है । ति सा वै देवी २८ ॥ होता है । दैवी वाक् हो जाता है ॥ १८ ॥

अग्नि से इस सम्प्रति-में दैवी - आधि-आवेश होता है । ग्निरूपा देवी वाक् उपादानभूता है, आध्यात्मिक ( दैहिक ) दोषोंसे आवृत्त है, व्यवधान ) के निवृत्त और प्रकाश फैल कार • विद्वान्के उस नासक्तिरूप ) दोष के र वह उसमें आविष्ट सीसे यह कहा है और अग्निसे दैवी होता है । क् अनृतादि दोषसे होती है, जिस देवी दूसरेके लिये जो-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ WWW. ३७७ तत्तद् भवति, अमोघा अप्रतिबद्धा । जो कहता है वही वही हो जाता है । अर्थात् इसकी वाणी अमोघ-अस्य वाग्भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ | प्रतिबन्धरहित हो जाती है ॥ १८ ॥

तथा- तथा-दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद् दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ १६ ॥

द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है । दैव मन वही है, जिससे आद है, कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥ "

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति — तच्च दैवं मनः; स्वभावनिर्मलत्वात्; येन मनसा असौ आनन्द्येव भवति मुख्येव भवति; अथो अपि न शोचति, शोकादिनिमित्तासंयोगात् ॥ १ ९ ॥ । द्युलोक और आदित्यसे इसमें देव ' मन आविष्ट हो जाता है । स्व-भावसे ही निर्मल होनेके कारण दैव मन वही है, जिस मनसे यह आनन्दी – सुखी ही होता है और

शोकादिके कारणोंका संयोग न होने-। से कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥

तथा— तथा-अद्भयश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै देवः प्राणो यः सञ्चर श्वासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति । स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति । यथैषा देवतैव स यथैतां देवता सर्वाणि भूतान्यवन्त्येव हैवंविद ँ सर्वाणि भूतान्यवन्ति ॥ यदु किञ्चेमाः प्रजाः

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३७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति ॥ २० ॥

जल और चन्द्रमासे इसमें देव प्राणका आवेश हो जाता है । प्राण वही है जो सचार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है । वह इस प्रकार जानने-वाला समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है जैसा यह देवता ( हिरण्यगर्भ ) है, वैसा ही वह हो जाता है । जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त -भूत पालन करते हैं । जो कुछ ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह ( शोकादिजनित दु: ख ) उन्हींके साथ रहता है । इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओं के पास पाप श्रद्धयथैनं चन्द्रममश्च दैवः प्राण आविशति । स वै दैवः ' प्राणः किंल्लक्षणः १ इत्युच्यते - यः सञ्चरन् प्राणिमेदेष्व सञ्चरन्स पष्टिव्यष्टि-रूपेण – अथवा सञ्चरन् जङ्गमेषु असञ्चरन्स्थावरेषु, न व्यथते न दुःखनिमित्तेन भयेन युज्यते । अथो अपि न रिष्यति न विनश्यति न हिंसामापद्यते । सः - यो यथोक्तमेवं वेत्ति त्र्यन्नात्मदर्शनं सः - सर्वेषां भूता-नामात्मा भवति, सर्वेषां भूतानां प्राणो भवति, सर्वेषां भूतानां मनो नहीं जाता ॥ २० ॥

जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राण आविष्ट हो जाता है । वह दैव प्राण किन लक्षणोंवाला है? सो बतलाया जाता है— जो समष्टि और व्यष्टिरूपंसे प्राणियोंमें सवार करता हुआ और सञ्चार न करता हुआ अथवा जङ्गमोंमें सचार करता हुआ और स्थावरोंमें सवार न करता हुआ, व्यथित यानी दुःख-निमित्तक भयसे युक्त नहीं होता और न रेष - विनाश अर्थात् हिंसाको ही प्राप्त होता है । जो इस उपर्युक्त त्र्यन्नात्मदर्शनको जानता है, वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है, समस्त भूतोंका प्राण हो जाता है, समस्त भूतोंका मन हो

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[ अध्याय १ छति न ह वै जाता है । व हुए भी व्यथित प्रकार जानने-जैसा यह देवता कार समस्त प्राणी ना करनेवालेका क करती हैं, वह - तो पुण्य ही प्राप्त ॥ न्द्रमासे इसमें दैव जाता है । वह देव णोंवाला है? सो है - जो समष्टि प्राणियों सञ्चार सचार न करता मोंमें सवार करता वरोंमें सवार न थित यानी दुःख-युक्त नहीं होता - विनाश अर्थात् होता है । कव्यन्नात्मदर्शनको नस्त भूतों का आत्मा नस्त भूतोंका प्राण स्त भूतोंका मन हो ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ भवति, सर्वेषां भूतानां वाग्भवति -इत्येवं सर्वाभूतात्मतया सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः सर्वकुञ्च । यथैषा पूर्वसिद्धा हिरण्यगर्भदेवता एव-मेव नास्य सर्वज्ञवे सर्वकृत्वे वा क्वचित्प्रतिघातः । स इति दाष्ट -न्तिकनिर्देशः । किञ्च यथैतां हिरण्यगर्भदेवतामिज्यादिभिः सर्वाणि भूतान्यवन्ति पालयन्ति पूजयन्ति एवं ह एवं विदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति - इज्यादिलक्षणां पूजां सततं प्रयुञ्जत इत्यर्थः । अथेदमाशङ्कयते— सर्वप्राणि-नामात्मा भवतीत्युक्तम्, तस्य च सर्वप्राणिकार्यकरणात्मत्वे सर्व-प्राणिसुखदुःखैः सम्बध्येतेति । तन्न, अपरिच्छिन्नबुद्धित्वात् परिच्छिन्नात्मबुद्धीनां ह्याक्रोशादौ दुःखसम्बन्धो दृष्टः - अनेनाहमा -३७ ९ जाता है और समस्त भूतोंकी वाक् हो जाता है । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार सर्वभूतात्मरूपसे वह सर्वंज्ञ हो जाता है तथा सर्वकर्ता भी हो । जाता है । जैसा कि यह पूर्वंसिद्ध हिरण्यगर्भ देवता है, उसी प्रकार इसके सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृ त्वमें भी कभी प्रतिघात नहीं होता । ‘ स: ' इस शब्दसे दान्तिकका निर्देश किया गया है । तथा जिस प्रकार इस हिरण्यगर्भ - देवताका समस्त प्राणी यज्ञादिसे पालन - - पूजन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करने वालेका समस्त प्राणी पालन करते हैं अर्थात् उसके लिये निरन्तर यज्ञादि पूजाका प्रयोग करते हैं । यहाँ यह शङ्का की जाती है— ऊपर यह बतलाया गया है कि वह समस्त प्राणियोंका आत्मा हो जाता है । इस प्रकार समस्त प्राणियों के देह और इन्द्रियरूप हो जानेसे तो उसका सब प्राणियोंके सुख - दुःखसे भी सम्बन्ध होगा ही । किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्यों-कि वह अपरिच्छिन्न बुद्धिवाला हो जाता है । जिनकी परिच्छि न्नात्मबुद्धि होती है, उन्हींको गाली आदि देनेपर यह सोचकर कि इसने मुझे गाली दी है, दुःखका सम्बन्ध होता देखा गया है ।

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३८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ क्रुष्ट इति । अस्य तु सर्वात्मनो य । श्राक्रुश्यते यथाक्रोशति तयो-रात्मत्वबुद्धिविशेषाभावान्न तन्नि-मित्तं दुःखमुपपद्यते । मरणदुःख -वच्च निमित्ताभावात् यथा हि कस्मिश्चिन्मृते कस्यचिद् दुःख-मुत्पद्यते - ममासौ पुत्रो भ्राता चेति, पुत्रादिनिमित्तम्; तन्निमित्ताभावे तन्मरणदर्शिनोऽपि नैव दुःख-सुपजायते, तथेश्वरस्याप्यपरि-च्छिन्नात्मनो ममतवतादिदुःख-निमित्तमिथ्याज्ञानादिदोषाभावा-न्नैव दुःखमुपजायते । १. तदेतदुच्यते - यदु किश्च यत् किश्च इमाःप्रजाःशोचन्त्यमैव सहैव प्रजाभिस्तच्छोकादिनिमित्तं दुःखं संयुक्तं भवत्यासां प्रजानां परिच्छिन्नबुद्धिजनितत्वात् । सर्वा-त्मनस्तु केन सह किं संयुक्त भवेद्वियुक्तं वा? अमुं तु प्राजापत्ये पदे वर्तमानं पुण्यमेव शुभमेव — । इस सर्वात्माको तो, जिसे गाली दी जाती है और जो गाली देता है, उन दोनोंके प्रति आत्मत्वबुद्धिमें कोई भेद न होनेके कारण उसे तज्जनित दुःख होना सम्भव ही नहीं है । जिस प्रकार कि कोई निमित्त न होनेसे मरण - दुःख भी नहीं होता । जैसे [ लोकमें ] विसीके मर जानेसे किसी-को ' यह मेरा पुत्र है, यह मेरा भाई है ' ऐसा सोचकर पुत्रादिके कारण दुःख उत्पन्न होता है तथा वैसा निमित्त न होनेपर उसकी मृत्युको देखनेवालेको भी दुःख नहीं होता उसी प्रकार मेरे- तेरेपन आदि दुःखके निमित्त और मिथ्या ज्ञानादि दोषका अभाव होनेके कारण अपरिच्छिन्न-रूप ईश्वरको भी दुःख नहीं होता । इसीसे यह कहा जाता है— जो a कुछ भी ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह शोकादिजनित दुःख उन प्रजा-ओंके साथ ही संयुक्त रहता है, क्यों-कि वह इन प्रजाओंको परिच्छिन्न बुद्धिसे पैदा होता है । किंतु जो सर्वात्मा है, उसके लिये ' वह किसके साथ संयुक्त या वियुक्त होगा? इस प्राजापत्यपदपर वर्तमान विद्वान्को तो पुण्य ही प्राप्त होता है । यहाँ शुभ

पृष्ठ 387

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[ अध्याय १ तो, जिसे गाली दी गाली देता है, उन नात्मत्वबुद्धिमें कोई कारण उसे तज्जनित नव ही नहीं है । जिस ई निमित्त न होनेसे नहीं होता । जैसे के मर जानेसे किसी-है, यह मेरा भाई र पुत्रादिके कारण होता है तथा वैसा नेपर उसकी मृत्युको भी दुःख नहीं होता - तेरेपन आदि दुःखके थ्या ज्ञानादि दोषका कारण अपरिच्छिन्न-भी दुःख नहीं होता । कहा जाता है - जो एँ शोक करती हैं, दुःख उन प्रजा-संयुक्त रहता है, क्यों-जाओंकी परिच्छिन्न होता है । किंतु जो के लिये वह किसके वियुक्त होगा? इस वर्तमान विद्वानको स होता है । यहाँ शुभ ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ फलमभिप्रेतं पुण्यमिति निरति शयं हि तेन पुण्यं कृतम् तेन तत्फलमेव गच्छति । न ह वै । देवान्पापं गच्छति, पापफलस्या-वसराभावात् - पापफलं दुःखं न गच्छतीत्यर्थः ॥ २० ॥

३८१ | कर्मका फल ही पुण्यरूपसे अभिप्रेत है । उसने अत्यन्त पुण्य किया होता है, इसलिये उसे उसीका फल प्राप्त होता है । पापफलका अवसर न होनेके कारण देवताओंके पास पाप नहीं जाता अर्थात् उन्हें पापका फल-रूप दुःख प्राप्त नहीं होता ॥ २० ॥

व्रतमीमांसा अध्यात्मप्राणदर्शन ' त एते सर्व एव समाः सर्वे-ऽनन्ताः ' इत्यविशेषेण वाङ्मनः-प्राणानामुपासनमुक्तम्, नान्यतम-गतो विशेष उक्तः । किमेवमेव प्रतिपत्तव्यम्? किं वा विचार्यमाणे कश्चिद्विशेषो व्रतमुपासनं प्रति प्रतिपत्तु ं शक्त्रते? इत्युच्यते — । ' वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं ' इस मन्त्रमें वाक्, मन और प्राणकी उपासना सामान्यरूपसे बतायी गयी है । उनमेंसे एक - एक-की कोई विशेषता नहीं बतलायी गयी । सो क्या ऐसा ही समझना चाहिये? अथवा विचार करनेपर व्रत — उपासनाके विषय में उनमें परस्पर कोई विशेषता जानी जा सकती है? यही अब बतलाया जाता है— अथातो व्रतमीमा सा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध े द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्र-मेवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वो-पयेमे तान्याप्नोत्तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध तस्माग्राम्य-त्येव वाक्लाम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नो-

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३८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ द्योऽयं प्राणस्तानि ज्ञातुं दधिरे । अयं वै नःश्रेष्ठो मध्यमः यः सञ्चरश्चासञ्चरश्च न व्यथते ऽथो न रिष्यति हन्ता-. स्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवस्त-स्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमा-चक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धते-ऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् | ११ | अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है । प्रजापतिने कर्मों ( कर्मके साधनभूत वागादि करणों ) की रचना की । रचे जानेपर वे एक दुसरेसे स्पर्धा करने लगे । वाक्ने व्रत किया कि ' मैं बोलती ही रहूंगी ' तथा ' मैं देखता ही रहूँगा ' ऐसा नेत्रने और ' मैं सुनता ही रहूँगा ' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया । इसी प्रकार अपने - अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोंने भी व्रत किया तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमें व्याप्त हो गया । उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया, इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है । किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसीमें वह व्याप्त न हो सका । तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया । निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सचार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है । अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ — ऐसा निश्चय कर वे सब इसीके रूप हो गयीं । अतः वे इसीके नामसे ‘ प्राण ' इस प्रकार कही जाती हैं, इसीसे जो ऐसा जानता है, वह ह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है तथा जो क ऐसे विद्वान्से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है । यह अध्यात्मप्राणदर्शन है ॥ २१ ॥

अथातोऽनन्तरं व्रतमीमांसा अब यहाँसे आगे व्रतमीमांसा उपासनकर्मविचारणेत्यर्थः । एषां अर्थात् उपासना कर्मका विचार किया स प्राणानां कस्य कर्म व्रतत्वेन जाता है । यानी इन प्राणोंमें से किस

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[ अध्याय १ अयं वै नःश्रेष्ठो नरिष्यतिहन्ता-रूपमभवस्त-वाव तत्कुलमा-हैवंविदा स्पर्धते--यध्यात्मम् ।११ ॥ प्रजापतिने कर्मों 1 रचे जानेपर वे एक में बोलती ही रहेंगी ' नता ही रहूँगा ' ऐसा के अनुसार अन्य सम्बन्ध किया और नका अवरोध किया, T ही है, श्रोत्र श्रमित नीमें वह व्याप्त न हो - किया । निश्चय यही हुए भी व्यथित नहीं भी इसीके रूप हो गयीं । अतः वे इसीके ऐसा जानता है, वह ला जाता है तथा जो द सुखकर अन्तमें मर से आगे व्रतमीमांसा T- कर्मका विचार किया नी इन प्राणोंमेंसे किस ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८३ धारयितव्यमिति मीमांसा प्रवर्तते । । प्राणके कर्मको व्रतरूपसे धारण तत्रः प्रजापतिर्ह - हशब्दः किलार्थे- करना चाहिये? इस बातका विचार प्रजापतिः किल आरम्भ होता है । तहाँ प्रजापतिने प्रजाः सृष्ट्वा प्रजाकी रचना कर कर्मोंको कर्माणि करणानि वागादीनि --कर्मार्थानि हि तानीति कर्माणी -त्युच्यन्ते — ससृजे सृष्टवान्वागा-दीनि करणानीत्यर्थः । तानि पुनः सृष्टान्यन्योन्येन इतरेतरमस्पर्धन्त स्पर्धा संघर्ष चक्रुः । कथम्? वदिष्याम्येव स्वव्यापाराद्वदनादनुपरतैवाहं स्या-मिति वाग्वतं दधे धृतवती- — यद्यन्योऽपि मत्समोऽस्ति स्वव्या-पारादनुपरन्तुं शक्तः, सोऽपि दर्शयत्वात्मनो वीर्यमिति । तथा द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः, श्रोष्याम्य-इमिति श्रोत्रम् एवमन्यानि कर्माणि करणानि यथाकर्म- यद्य-द्यस्य कर्म यथाकर्म । तानि करणानि मृत्युर्मारकः श्रमः श्रमरूपी भूत्वा उपयेमे सञ्जग्राह । कथम्? तानि कर- । अर्थात् वागादिकरणोंकी रचना की - यह प्रसिद्ध है । यहाँ ‘ ह ' शब्द ‘ किल ’ यानी प्रसिद्धि अर्थ में है । कर्मके साधन होनेके कारण उन्हें ( वागादि-करणोंको ) ' कर्म ' कहा गया है । उन रची हुई इन्द्रियोंने एक दूसरीसे स्पर्धा की — परस्पर संघर्ष किया । किस प्रकार स्पर्धा को? ‘ मैं बोलती ही रहूँगी अर्थात् अपने भाषणरूपं व्यापारसे निवृत्त होऊँगी ही नहीं ' ऐसा व्रत वाक्ने धारण किया; इससे उसका यह अभिप्राय था कि यदि ' मेरे समान कोई और भी अपने व्यापारसे अलग न रहनेमें समर्थं हो तो वह भी अपना पुरुषार्थं दिखलावे । तथा ‘ मैं देखता ही रहूँगा ' ऐसा चक्षुने और ' मैं सुनता ही रहूँगा ' ऐसा श्रोने निश्चय किया । इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंने भी यथाकर्म — जिनका जो कर्म था उसके अनुसार व्रत धारण किया । उन इन्द्रियों को मृत्यु यानी मा-रकने श्रम - श्रमरूपी होकर पकड़ा । किस प्रकार पकड़ा? उसने अपने-

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ३८४ | अपने व्यापारमें लगी हुई णानि स्वव्यापारे प्रवृत्तान्या-प्नोत् श्रमरूपेणात्मानं दर्शितवान् । आप्त्वा च तान्यवारुन्ध अवरोधं कृतवान्मृत्युः -- स्वकर्मभ्यः प्रच्या-वितवानित्यर्थः । तस्मादद्यत्वेऽपि वदने स्वकर्मणि प्रवृत्ता बाकू श्राम्यत्येव श्रमरूपिणा मृत्युना संयुक्ता स्वकर्मतः प्रच्यवते ॥ तथा श्राम्यति चक्षुः " श्राम्यति श्रोत्रम् । ममेव मुख्यं प्राणं नाप्नोन्न प्राप्तवान्मृत्युः श्रमरूपी, योऽयं मध्यमः प्राणस्तम् । तेनाद्यत्वे -ऽप्यश्रान्त एव स्वकर्मणि प्रवर्तते । तानीतराणि करणानि तं ज्ञातुं दधिरे धृतवन्ति मनः । यं वै नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठः प्रशस्यतमोऽभ्यधिकः, यस्माद्यः सञ्चरंश्चासश्चरंश्च न व्यथतेऽथो इन्द्रियों को व्याप्त किया; अर्थात् श्रम ( थकावट ) रूपसे अपनेको दिख-लाया । तथा उन्हें व्याप्त करके मृत्युने उनका अवरोध किया -- अपने - अपने कर्मोंसे च्युत कर दिया । इसलिये आजकल भी अपने व्यापार-भाषण में प्रवृत्त हुई वाक् श्रमित होती ही है - श्रमरूप मृत्युसे संयुक्त होनेके कारण वह अपने कर्मसे च्युत हो जाती है । इसी प्रकार नेत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है तथा श्रोत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है । किंतु इस मुख्य प्राणको — जो यह मध्यम प्राण है, उसको ही श्रम-रूपी मृत्युने व्याप्त नहीं किया, वह उसके पासतक नहीं पहुँचा । इसलिये इस समय भी वह श्रमरहित होकर ही अपने कर्ममें प्रवृत्त रहता है । उन अन्य इन्द्रियोंने उसे जानने के लिये मनमें निश्चय किया । ' निश्चय हम सबमें यही श्रेष्ठ अर्थात् सबसे अधिक प्रशंसनीय है, | क्योंकि यह सञ्चार करते हुए और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं न रिष्यति — - इन्तेदानीमस्यैव होता और न हिंसित ही होता है । प्राणस्य सर्वे वयं रूपमसाम अच्छा, अब हम सब भी इस प्राण-| के ही रूप हो जायँ अर्थात् प्राणको प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्येमहि - एवं आत्मभावसे प्राप्त हो जायँ ' -- ऐसा