बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 391–400

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400

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[ अध्याय १ [ लगी हुई उन किया; अर्थात् श्रम से अपनेको दिख-हें व्याप्त करके मृत्युने किया- अपने - अपने र दिया । इसलिये अपने व्यापार-हुई वाक् श्रमित होती मृत्युसे संयुक्त होनेके कर्मसे च्युत हो ' प्रकार नेत्रेन्द्रिय भी तथा श्रोत्रेन्द्रिय भी EL मुख्य प्राणको - जो है, उसको ही श्रम-नाप्त नहीं किया, वह नहीं पहुँचा । इसलिये वह श्रमरहित होकर में प्रवृत्त रहता है । न्द्रियोंने उसे जाननेके नश्चय किया । हम सबमें यही श्रेष्ठ अधिक प्रशंसनीय है, करते हुए और ते हुए भी व्यथित नहीं हिंसित ही होता है । हम सब भी इस प्राण-जायँ अर्थात् प्राणको प्राप्त हो जायँ ' - ऐसा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८५ विनिश्चित्य ते एतस्यैव सर्वे रूप मभवन्; प्राणरूपमेवात्मत्वेन प्रतिपन्नाः, प्राणव्रतमेव दधिरे -श्रस्मद्व्रतानि न मृत्योर्वारणाय पर्याप्तानीति । यस्मात्प्राणेन रूपेण रूपवन्ती-तराणि करणानि चलनात्मना स्वेन च प्रकाशात्मनः न हि प्राणादन्यत्र चलनात्मकत्वोप-पत्तिः चलन व्यापारपूर्वकाण्येव हि सर्वदा स्वव्यापारेषु लक्ष्यन्ते; तस्मादेते चागादय एतेन प्राणा-भिधानेन आख्यायन्तेऽभिधी-यन्ते प्राणा इत्येवम् । य एवं प्राणात्मतां सर्वकरणा-नां वेत्ति प्राणशब्दाभिधेयत्वं च, तेन ह वाव तेनैव विदुषा तत्कुल-माचक्षते लौकिकाः । यस्मिन्कुले स विद्वाञ्जातो भवति तत्कुलं विद्व- । न्नाम्नैव प्रथितं भवत्यमुष्येदं कुलमिति, यथा तापत्य इति । १. तपती सूर्यदेवको कन्या थी; वह | निश्चय कर वे सब इस प्राणका ही स्वरूप हो गयीं - आत्मभावसे प्राण-रूपको ही प्राप्त हो गयीं अर्थात् यह सोचकर कि हमारे व्रत मृत्युको हटाने में समर्थ नहीं हैं, उन्होंने प्राण-का ही व्रत धारण कर लिया । क्योंकि अन्य इन्द्रियाँ प्राणके चलनात्मक रूपसे और अपने प्रकाशात्मक रूपसे ही रूपवती हैं; | कारण प्राणके सिवा किसी अन्य इन्द्रियमें चलनात्मकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती और ये सर्वदा चलनव्यापारपूर्वक ही अपने व्यापा-रोंमें प्रवृत्त होती दिखायी देती हैं; इसलिये ये वागादि इन्द्रियाँ इस | प्राणके नामसे ही ' प्राण ' इस प्रकार कहकर पुकारी जाती हैं । जो इस प्रकार समस्त इन्द्रियों-की प्राणरूपता और ' प्राण ' शब्द-द्वारा पुकारा जाना जानता है, उसीसे अर्थात् उस विद्वान्‌के द्वारा हो लौकिक पुरुष उसके कुलको पुकारते हैं । अर्थात् वह विद्वान् जिस कुल-में उत्पन्न होता है वह कुल उस विद्वानके नामसे ही प्रसिद्ध होता है कि यह कुल अमुकका है, जैसे तापत्य । जो इस प्रकार चन्द्रवंशी राजा संवरणको विवाही गयी थी । उसका वंश उसके नामानुसार ' तापत्य ' कहलाया । बृ ० उ ० २५-

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३८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ य एवं यथोक्तं वेद वागादीनां प्राणरूपतां प्राणाख्यत्वं च तस्यै-तत्फलम् । किञ्च यः कश्चिदु हैवंविदा प्राणात्मदर्शिना स्पर्धते तत्प्रति-पक्षी सन्, सोऽस्मिन्नेव शरीरे-ऽनुशुष्यति शोषमुपगच्छति । अनुशुष्य हैव शोषं गत्वैव अन्त-तोऽन्ते म्रियते न सहसानुपद्रुतो म्रियते इत्येवमुक्तमध्यात्मं प्राणा-स्मदर्शनमित्युक्तोपसंहारोऽधि-दैवतप्रदर्शनार्थः । | उपर्युक्त वागादिकी प्राणरूपता और | प्राणसंज्ञकताको जानता है, उसे 0 यह फल प्राप्त होता है । तथा जो कोई भी इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मदर्शीसे उसका प्रतिपक्षी होकर स्पर्धा करता है वह इसी शरीरमें ‘ अनुशुष्यति ’ — सूख जाता है । और सूखकर — शोषको प्राप्त होकर ही अन्तमें मर जाता है । वह बिना किसी उपद्रवके सहसा नहीं मरता । इस प्रकार यह अध्या-त्मप्राणात्मदर्शन कहा- यह श्रुत्युक्त उपसंहार आगे आधिदैविक दर्शनको प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ २१ ॥

अधिदैवदर्शन अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्द्वध तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति चन्द्रमा एवमन्या देवता यथा दैवत ँ स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुम्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥

अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है — अग्निने व्रत किया कि ' मैं जलता ही रहूँगा ', सूर्यने नियम किया, ' मैं तपता ही रहूँगा ' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, ' मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा । ' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत ( जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार ) व्रत किया । जिस प्रकार इन वागादि प्राणों में मध्यम प्राण है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण तो अस्त हो जाते हैं; किंतु वायु अस्त नहीं होता । यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥२२ ॥

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[ अध्याय १ दिकी प्राणरूपता और जानता है, उसे होता है । कोई भी इस प्रकार णात्मदर्शीसे उसका स्पर्धा करता है वह ' अनुशुष्यति ' – सूख सूखकर — शोषको अन्तमें मर जाता है । सी उपद्रवके सहसा -स प्रकार यह अध्या-न कहा - यह श्रुत्युक्त - आधिदैविक दर्शनको के लिये है ॥ २१ ॥

हमित्यभिध प्रेति चन्द्रमा प्राणानां मध्यमः तान्या देवता ॥ २२ ॥

व्रत किया कि ' मैं ना ही रहूँगा ' तथा गा । ' इसी प्रकार अन्य - था, उसी के अनुसार ) त्राण है, उसी प्रकार स्त हो जाते हैं; किंतु बाला देवता है ॥२२ ॥

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ अथानन्तरं अधिदैवतं देवता-विषयं दर्शन मुच्यते । कस्य देवता-विशेषस्य व्रतधारणं श्रेयः १ इति मीमांस्यते I । अध्यात्मवत्सर्वम् । ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दधे । तप्स्याम्यहमित्यादित्यः; भास्या-म्यहमिति चन्द्रमाः एवमन्या देवता यथादैवतम् । सोऽध्यात्मं वागादीनामेषां प्राणानां मध्ये मध्यमः प्राणो मृत्युना अनाप्तः स्वकर्मणो न प्रच्यावितः स्वेन प्राणव्रतेनाभ-यथा; एवमेतासामग्न्या-दीनां देवतानां वायुरपि । ग्लो-चन्त्यस्तं यन्ति स्वकर्मभ्य उपर-मन्ते - यथाध्यात्मं वागादयोऽन्या देवता अग्न्याद्याः, न वायुरस्तं याति - यथा मध्यमः प्राणः, अतः सैषा अनस्तमिता देवता यद्वायु-र्योऽयं वायुः ॥ एवमध्यात्ममधि-दैवं च मीमांसित्या निर्धारितम् | ३८७ अब आगे अधिदेवत - देवता-विषयक दर्शन कहा जाता है । अर्थात् इस बातका विचार किया | जाता है कि किस देवताविशेषका व्रत धारण करना श्रेष्ठ है । अध्यात्म-दर्शनके समान यहाँ भी सब प्रसङ्ग समझना चाहिये । ' मैं जलता ही रहूंगा ' ऐसा अग्निने व्रत धारण किया । ' मैं तपता ही रहूँगा ' ऐसा आदित्यने और ' मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा ' ऐसा चन्द्रमाने नियम । कर लिया । इसी प्रकार यथादैवत अन्य देवताओंने भी व्रत धारण किया । उन वागादि अध्यात्म प्राणोंमें जैसे मध्यम प्राण मृत्युसे ग्रस्त नहीं हुआ, अपने कर्म च्युत नहीं किया गया, अपने प्राणव्रत [ के पालन ] से उसका व्रत भंग नहीं हुआ; उसी प्रकार इन अग्नि आदि देवताओं में वायु रहा, क्योंकि वागादि अध्यात्म प्राणोंके समान अग्नि आदि अन्य देवगण अस्त होते अर्थात् अपने कर्मोंसे निवृत्त होते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता, जैसे मध्यम प्राण; अतः यह जो वायु है वह अनस्तमित ( कभी अस्त न होने-वाला ) देवता है । इस प्रकार अध्या-रम और अधिदैवसम्बन्धी विचार करके यह निश्चय किया गया है कि

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३८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ प्राणवाय्वात्मनोव्रतमभग्नमिति २२ | प्राणरूप और वायुरूप हुए उपासकों-का व्रत अभग्न रहता है ॥ २२ ॥

प्राणव्रतकी स्तुतिमें मन्त्र अथैष श्लोको भवति यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति तं देवाश्चक्रिरे धर्म स एवाद्य स उ श्व इति यद्वा एतेऽमुर्ह्यप्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति । तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युरा प्नुवदिति यद्य चरेत्समापिपयिषेत्त े नो एतस्यै देवतायै सायुज्य ँ सलोकतां जयति ॥ २३ ॥

इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है - ' जिस ( वायुदेवता ) से सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है ' इत्यादि । यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राण में ही अस्त हो जाता है । उस धर्मको देवताओंने किया है । वही आज है और वही कल भी रहेगा । देवताओंने जो व्रत उस समय धारण किया था वही आज भी करते हैं । अतः एक ही व्रतका आचरण करे ॥ प्राण और अपानव्यापार करे । मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले — इस भयसे [ इस व्रतका आचरण करे ] । और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करनेकी भी इच्छा रखे 1 । इससे वह इस देवतासे सायुज्य और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥

अथैतस्यैवार्थस्य प्रकाशक एष इसी अर्थका प्रकाशक यह श्लोक

श्लोको मन्त्रो भवति । यतश्च यानी मन्त्र है— जहाँसे अर्थात् जिस

यस्माद्वायोरुदेत्युद्गच्छति सूर्यः, वायुसे सूर्य उदित होता है तथा अध्यात्मं च चक्षुरात्मना प्राणाद् अध्यात्मपक्ष में जिस प्राणसे वह चक्षु-अस्तं च यत्र वायौ प्राणे च गच्छ- रूपसे उदित होता है और जहाँ-त्यपरसंध्यासमये स्वापसमये वायु और प्राण में सायंकाल एवं पुरुष-च की सुषुप्तिके समय वह अस्त हो

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[ अध्याय १ युरूप हुए उपासकों-रहता है ॥ २२ ॥

देति सूर्योऽस्तं प्राणेऽस्तमेति व इति यद्वा । तस्मादेकमेव वामा मृत्युरा एतस्यै देवतायै वायुदेवता ) से सूर्य दि । यह प्राणसे ही धर्मको देवताओंने ताओंने जो व्रत उस अतः एक ही व्रतका कहीं पापी मृत्यु व्याप्त | और यदि इसका खे । इससे वह इस प्रकाशक यह श्लोक –जहाँसे अर्थात् जिस उदित होता है तथा जिस प्राणसे वह चक्षु-होता है और जहाँ-सायंकाल एवं पुरुष-समय वह अस्त हो ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ पुरुषस्य, तं देवास्तं धर्मं देवाश्च-क्रिरे धृतवन्तो वागादयोऽन्या-दयश्च प्राणव्रतं वायुव्रतं च पुरा विचार्य । स एवाद्येदानीं श्वोऽपि भविष्यत्यपि कालेऽनुवर्त्यतेऽनु-वर्तिष्यते च देवैरित्यभिप्रायः । तत्रेमं मन्त्रं संक्षेपतो व्याचष्ट ब्राह्मणम् – प्राणाद्वा एष सूर्य उदेति प्राणेऽस्तमेति । तं देवाश्च-क्रिरे धर्म स एवाद्य स श्व इत्यस्य कोऽर्थः १ इत्युच्यते यद्वै ते तर्हि मिन्काले वागादयोऽन्यादयश्च प्राणवतं वायुव्रतं चाधियन्त, तदेवाद्यापि कुर्वन्त्यनुवर्तन्ते कुर्वन्त्यनुवर्तन्तेऽनुवर्तिष्यन्ते ऽनुवर्तिष्यन्ते च ॥ व्रतं तैरभग्नमेव । यत्तु वागादि - । व्रतमग्न्यादिव्रतं च तद्भनमेव, तेषामस्तमनकाले स्वापकाले च् वायौ प्राणे च निम्लुक्तिदर्शनात् ॥ ३८ ९ | जाता है, उस धर्मंको देवताओंने किया - धारण किया; अर्थात् वागादि इन्द्रियोंने और अग्न्यादि देवताओंने पूर्वकालमें विचार कर | क्रमशः प्राणव्रत और वायुव्रत धारण किया । वही आज इस समय अनु-.वर्तित होता है और कल - भविष्य-| कालमें भी देवताओंद्वारा उसीका अनुवर्तन किया जायगा – ऐसा । इसका अभिप्राय है । यहाँ ब्राह्मण संक्षेपसे इस मन्त्र-की व्याख्या करता है - प्राणसे ही यह सूर्य उदित होता है - और प्राणमें ही अस्त हो जाता है । ' तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्वः ' इस उत्तरार्धका क्या अर्थ है? सो बतलाया जाता है - इन वागादि और अग्न्यादिने उस समय क्रमशः जिन प्राणव्रत और वायुव्रतको धारण किया था उन्हींको वे आज भी करते हैं, उसीका अनुवर्तन वे करते हैं और उसीका अनुवर्तन करेंगे । उनके द्वारा यह व्रत अखण्डित ही है । किंतु जो वागादि और अग्न्यादिका व्रत है वह तो खण्डित ही है, क्योंकि सायंकाल और सुषुप्ति के समय उनका क्रमशः वायु और प्राणमें अस्त होना देखा जाता है ।

पृष्ठ 396

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३ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ अथैतदन्यत्रोक्तम्- " यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तहिं बाग-प्येति प्राणं मनः प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्त इत्यध्यात्ममथाधिदैवतं यदा वा श्रग्निरनुगच्छति वायुं तर्ह्यनुद्वाति तस्मादेनमुदवासीदि-त्याहुर्वायुं ह्यनुद्वाति यदादित्यो- । ऽस्तमेति वायुं तहिं प्रविशति वायुं चन्द्रमा वायौ दिशः प्रतिष्ठिता वायोरेवाधि पुनर्जायन्ते " इति । यस्माद् एतदेव व्रतं वागादि-ध्यग्न्यादिषु चानुगतं यदेतद्वा-योश्च प्राणस्य च परिस्पन्दात्म-कत्थं सर्वैर्देवैरनुवर्त्यमानं व्रतम्-तस्मादन्योऽप्येकमेव व्रतं चरेत् । किं तत्? प्राण्यात्प्राणनव्यापारं कुर्यादपान्यादपाननव्यापारंच;! यही बात एक अन्य स्थानपर भी कही है— “ जिस समय पुरुष सोता है, उस समय वाक् प्राणमें लीन हो जाती है तथा प्राण में ही मन, प्राण में ही चक्षु और प्राणमें ही श्रोत्र लीन हो जाते हैं जिस समय वह उठता है उस समय प्राणसे ही ये पुन: उत्पन्न हो जाते हैं । यह अध्यात्मदृष्टि है, अब अधिदैवदृष्टि बतलायी जाती है- - जब अग्नि अनुगमन करने ( शान्त होने ) लगता है, उस समय वह वायुके अधीन ही शान्स होता है, इसी से ' यह इसमें अनुगत ( अस्त ) हो गया ' ऐसा कहते हैं । जिस समयं सूर्य अस्त होता है तो वह वायुमें ही अनुगमन – प्रवेश कर जाता है; तथा वायुमें ही चन्द्रमा और वायुमें ही दिशाएं प्रतिष्ठित होती हैं एवं वायुसे ही • वे पुन: उत्पन्न होती हैं ” इत्यादि । क्योंकि वागादि और अग्न्यादिमें यही व्रत अनुगत है, अर्थात् वायु और प्राणका जो परिस्पन्दरूप धर्म है, वही समस्त देवताओंद्वारा अनुवर्तित होनेवाला व्रत है, इसलिये अन्य त किसी को भी एक ही व्रतका आचरण करना चाहिये । वह एक व्रत क्या है? ' प्राण्यात्'– प्राणनव्यापार करे E और ' अपान्यात् ' - अपानन व्यापार

पृष्ठ 397

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[ अध्याय १ क अन्य स्थानपर भी समय पुरुष सोता वाक् प्राण में लीन हो में ही मन, प्राणमें में ही श्रोत्र लीन समय वह उठता है से ही ये पुन: उत्पन्न ह अध्यात्मदृष्टि है, ष्ट बतलायी जाती न अनुगमन करने ) लगता है, उस के अधीन ही शान्त ' यह इसमें अनुग या ' ऐसा कहते हैं । र्य अस्त होता है । ही अनुगमन - प्रवेश ; तथा वायुमें ही वायुमें ही दिशाएं हैं एवं वायु से ही होती हैं " इत्यादि । और अग्न्यादिमें है, अर्थात् वायु और रिस्पन्दरूप धर्म है, ताओं द्वारा अनुवर्तित - है, इसलिये अन्य क ही व्रतका आचरण । वह एक व्रत क्या - प्राणनव्यापार करे - अपानन व्यापार ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ९ १ न हि प्राणापान व्यापारस्य प्राणना । पाननलक्षणस्योपरमोऽस्ति । त-स्मात्तदेवैकं व्रतं चरेद्धित्वेन्द्रिया-न्तरव्यापारं नेन्मा मां पाप्मा मृत्युः श्रमरूप्याप्नुवदाप्नुयात् । नेच्छन्दः परिभये -- ' यद्यह मरुमाद् व्रतात्प्रच्युतः स्याम्, ग्रस्त एवाहं मृत्युना ' इत्येवं त्रस्तो धारयेत्प्रा-णव्रतमित्यभिप्रायः । यदि कदाचिद् उ चरेत्प्रारभेत प्राणव्रतम्, समापिपयिषेत्समापयि तुमिच्छेत्; यदि ह्यस्माद् व्रतादुपर-मेत्प्राणः परिभूतः स्याद्देवाश्च; तस्मात्समापयेदेव । तेन उ! तेनानेन व्रतेन प्राणात्मप्रतिपत्त्या सर्वभूतेषु — वागादयोऽग्न्यादय-श्व मदात्मका एव, अहं प्राण आत्मा सर्वपरिस्पन्दकृत् — एवं तेनानेन व्रतधारणेन एतस्या एव प्राणदेव तायाः सायुज्यं सयुग्भावमेका त्मत्वं सलोकतां समान लोकतां वा एकस्थानत्वम् — विज्ञान - । करे, क्योंकि प्राण और अपानके व्यापार प्राणन और अपाननकी कभी निवृत्ति नहीं होती । अतः इस भयसे कि मुझे कहीं श्रमरूपी पापात्मा मृत्यु व्याप्त न कर ले, अन्य इन्द्रियोंके व्यापारको छोड़कर एक इसी व्रत-का आचरण करे । यहाँ ' नेत् ' शब्द परिभयके अर्थमें है । अभिप्राय यह है कि ' यदि में इस व्रतसे च्युत हो जाऊँगा तो अवश्य मृत्युसे ग्रस्त हो जाऊंगा ' इस प्रकार डरता हुआ प्राणव्रतको धारण करे । यदि कभी प्राणव्रत का आचरण-आरम्भ करे तो उसे समाप्त करनेकी इच्छा रखे, क्योंकि यदि इस व्रतसे [ बीचमें ही ] हट जायगा तो प्राण और देवताओंका पराभव होगा; इसलिये इसे समाप्त करना ही चाहिये । ' तेन उ ' अर्थात् उस इस प्राणात्मत्व की प्राप्तिरूप व्रतसे समस्त भूतोंमें वागादि और अम्न्यादि मेरे ही स्वरूप हैं, मैं प्राणरूप आत्मा सबका परिस्पन्दन करने-वाला हूँ ' इस प्रकार उस इस व्रत-को धारण करनेसे इस प्राणदेवता-के ही सायुज्य – संयोग अर्थात् एकरूपताको तथा विज्ञानकी मन्द-ताकी अपेक्षासे सलोकता - समान-लोकता अर्थात् समानस्थानत्वको

पृष्ठ 398

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३ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याग १ मान्द्यापेक्षमेतत् — जयति प्राप्नो- जीतता अर्थात् उसे प्राप्त कर लेता तीति ॥ २३ ॥ है ॥ २३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये पञ्चमं सप्तान्नब्राह्मरणम् ।५ । पत्र ब्राह्मण पूर्वोक्त श्रविद्याकार्यंका उपसंहार - नामसामान्यभूता वाक् यदेतदविद्याविषयत्वेन प्रस्तुतं साध्यसाधनलक्षणं व्याकृतं जगत् प्राणात्मप्राप्त्यन्तोत्कर्षवदपि फलम्, या चैतस्य व्याकरणा-त्प्रागवस्था अव्याकृतशब्दवाच्या वृत्तबीजवत्सर्वमेतत् । यह जो साध्य - साधनरूप व्याकृत जगत् और प्राणात्मप्राप्तिपर्यन्त उत्कर्षवाला उसका फल भी अविद्या-के विषयरूपसे आरम्भ किया गया है तथा वृक्षके बीजके समान जो ' अव्याकृत ' शब्दसे कही जानेवाली इसके व्याकरण ( व्याप्त होने ) से पूर्वकी अवस्था है, यह सब — त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागि-त्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति । एत-देषाँ सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्म तद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥

यह नाम, रूप और कर्म तीनका समुदाय है । उन नामोंकी ‘ वाक् ’ यह उक्थ ( कारण ) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं । यह इनका साम है । यही सब नामोंमें समान है । यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यह समस्त नामोंको धारण करती है ॥ १ ॥

त्रयम्; किं तत्त्रयम् इत्युच्यते । त्रय है । वह त्र्य क्या है? सो नाम रूपं कर्म चेत्यनात्मैव बतलाया जाता है— नाम, रूप और । नात्मा । कर्म -यह अनात्मा ही वह त्रय है ।

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[ अध्याग१ उसे प्राप्त कर लेता सप्तान्नब्राह्मणम् ।५ । मान्यभूता वाक् त्र्य - साधनरूप व्याकृत प्राणात्मप्राप्तिपर्यन्त सका फल भी अविद्या-आरम्भ किया गया - बीजके समान जो ब्दसे कही जानेवाली ण ( व्याप्त होने ) से - है, यह सब 1 -- नाम्नां वागि-त्तिष्ठन्ति । एत-देषां ब्रह्मद्धि उन नामोंकी ' वाक् ' उत्पन्न होते हैं । यह का ब्रह्म है, क्योंकि ह य क्या है? सो बहै- नाम, रूप और मा ही वह त्रय है । ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म । तस्मा-दस्माद्विरज्येतेत्येवमर्थस्त्रयं वा इत्याद्यारम्भः न ह्यस्मादनात्म-नोऽव्यावृत्तचित्तस्य चात्मानमेव लोकमहं ब्रह्मास्मीत्युपासितुं बुद्धिः प्रवर्तते । बाह्यप्रत्यगात्मप्रवृत्स्यो -विरोधात् ॥ तथा च काठके " पराश्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू-स्तस्मात्पराड्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ” ( क ० उ ० २ । १ । १ ) इत्यादि । कथं पुनरस्य व्याकृताव्या-कृतस्य क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य नामरूपकर्मात्मकतैव १ न पुनरात्मत्वम् १ इत्येतत्सम्भाव-यितुं शक्यत इति, अत्रोच्यते— तेषां नाम्नां यथोपन्यस्तानां वागिति शब्दसामान्यमुच्यते ॥ ३ ९ ३ | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है वह आत्मा नहीं । अतः [ मुमुक्षु ] इससे विरक्त हो जाय - इसलिये ' त्रयं वा ' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया गया है । क्योंकि इस अनात्मासे जिसका चित्त नहीं हटा है, उसकी बुद्धि ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार आत्मलोककी ही उपासना करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होती । कारण वाह्य प्रवृत्ति और प्रत्यगात्मविषयिणी वृत्ति में परस्पर विरोध है । ऐसा ही कठो-पनिषद् में भी कहा है- " स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये पुरुष बाह्य विषयोंको ही देखता है, अन्तरात्माको नहीं । अमृतत्वकी इच्छा करनेवाले किसी - किसी धीर पुरुषने हो इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर अन्तरात्माको देखा है " इत्यादि । किंतु इस व्याकृत और अव्या-कृत क्रिया- कारक - फलरूप संसारकी नाम - रूप - कर्मात्मकता ही क्यों है? आत्मस्वरूपता क्यों नहीं है? ऐसी सम्भावना की जा सकती है, अतः इस विषय में कहते हैं— ऊपर जिनका उल्लेख किया गया है, उन नामोंका वाक् यह शब्दसामान्य कहा जाता

पृष्ठ 400

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३ ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ " यः कश्च शब्दो वागेव सा " ( १ । ५ । ३ ) इत्युक्तत्वा-द्वागित्येतस्य शब्दस्य योऽर्थः शब्दसामान्यमात्रम् एतदेतेषां नामविशेषाणामुक्थं कारणमुपा-दानम्, सैन्धवलवणकणानामिव सैन्धवाचलः । तदाह — अतो ह्यस्मान्नामसा-मान्यात्सर्वाणि नामानि यज्ञदत्तो देवदत्त इत्येवमादिप्रविभागान्यु-तिष्ठन्त्युत्पद्यन्ते प्रविभज्यन्ते, लवणाचलादिव लवणकणाः कार्य च कारणेनाव्यतिरिक्तम् । तथा विशेषाणां च सामान्येऽन्त-र्भावात । कथं सामान्यविशेषभाव इति-एतच्छन्दसामान्यमेषां नामविशे-षाणां साम । समत्वात्साम, सामा-न्यमित्यर्थः; एतद्धि यस्मात्सर्वै-र्नामभिरात्म विशेषैः समम् । किश्च आत्मलाभाविशेषाच्च नाम-विशेषाणाम् । यस्य च यस्मा- । IIII है । क्योंकि ऐसा कहा गया है कि | " जो कुछ शब्द है वह वाक् ही है " इसलिये वाक् इस शब्दका जो अर्थ है वह शब्दसामान्यमात्र इन नाम-विशेषोंका उक्थ कारण अर्थात् उपा-दान है, जिस प्रकार सैन्धवगिरि सैन्धवलवणके कणोंका । यही बात श्रुति कहती है-क्योंकि इस नामसामान्यसे ही | लवणाचलसे लवणके कणोंके समान समस्त नाम – यज्ञदत्त, देवदत्त इत्यादि नामविभाग उत्पन्न अर्थात् विभक्त होते हैं और कार्य कारणसे अभिन्न होता है तथा विशेष भी सामान्यके अन्तगंत रहते हैं । किंतु नाम - और वाक्का सामान्यविशेषभाव किस प्रकार है? [ सो बतलाते हैं - ] यह शब्दसामान्य ही इन नामविशेषोंका साम है । यह सम होनेके कारण साम अर्थात् सामान्य है; क्योंकि यही अपने विशेष-भूत सम्पूर्ण नामोंसे सम है । तथा जितने नामविशेष हैं, उन्हें नामसा-मान्यसे ही स्वरूपकी प्राप्ति होती है, अतः उनसे अविशेष ( अभिन्न ) होने के कारण [ उनका नामसामान्यमें ही अन्तर्भाव होता है ] । जिससे