बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 401–410
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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[ अध्याय १ ना कहा गया है कि है वह वाक् ही है " - स शब्दका जो अर्थ ान्यमात्र इन नाम-कारण अर्थात् उपा-प्रकार सैन्धवगिरि का । श्रुति कहती है-नामसामान्यसे हो के कणों के समान – यज्ञदत्त, देवदत्त नाग उत्पन्न अर्थात् और कार्य कारण - तथा विशेष भी त रहते हैं । और वाक्का T व किस प्रकार है? - ] यह शब्दसामान्य षोंका साम है । यह रण साम अर्थात् कि यही अपने विशेष-सम है । तथा हैं, उन्हें नामसा-पकी प्राप्ति होती है, शेष ( अभिन्न ) होने का नामसामान्य में है ] । जिससे ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ दात्मलाभो भवति स तेनाप्रवि-भक्तो दृष्टः, यथा घटादीनां मृदा । कथं नामविशेषाणामात्मलाभो चाच इत्युच्यते – यत एतदेषां वाक्छब्दवाच्यं वस्तु ब्रह्म आत्मा, ततो ह्यात्मलाभो नाम्नाम्, शब्द -व्यतिरिक्तस्वरूपानुपपत्तेः । तत्प्र-तिपादयति - यतश्छन्दसामान्यं हि यस्माच्छन्दविशेषान्सर्वाणि नामानि विभर्ति धारयति स्वरूप-प्रदानेन । एवं कार्यकारणत्वोप-पत्तेः सामान्यविशेषोपपत्तेरात्म-प्रदानोपपत्तेश्च नामविशेषाणां शब्दमात्रता सिद्धा । एवमुत्तर-योरपि सर्वं योज्यं यथोक्तम् ॥१ ॥ ।
३ ९ ५ जिसको अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है उससे वह अभिन्न ही देखा गया है, जैसे मृत्तिकासे घटादिका | अभेद है । नामविशेषोंको वाक् अर्थात् नामसामान्यसे अपने स्वरूपकी | प्राप्ति किस प्रकार होती है? सो बतलाया जाता है— क्योंकि वह ' वाक् ' शब्दवाच्य वस्तु इन । नाम-विशेषों ) का ब्रह्म — आत्मा है; कारण कि उसीसे नामोंको अपना स्वरूप प्राप्त होता है, क्योंकि शब्द-से भिन्न उनका कोई स्त्ररूप होना सम्भव हो नहीं है । इसका प्रतिपादन करती है — क्योंकि यह शब्दसामान्य ही शब्द विशेष रूप सम्पूर्ण नामोंको, उनका स्वरूप प्रदान करके, धारण करती है । इस प्रकार कार्य - कारणत्व सामान्य-विशेषत्व और आत्मप्रदानत्वकी उपपत्ति होनेसे नामविशेषोंकी शब्द-मात्रता सिद्ध होती है । इसी प्रकार आगे कहे जानेवाले दो पर्यायोंमें भी उपर्युक्त सारी योजना लगा देनी चाहिये ॥ १ ॥
रूपसामान्य चक्षुका वर्णन अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा ँ सामैतद्धि सर्वैरूपैः सममेत-देषां ब्रह्मेतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥
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३ ९ ६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ अब रूपोंका चक्षु सामान्य है; यह इसका उक्थ है । इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं । यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपम है । यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही अथेदानीं रूपाणां सितासित-प्रभृतीनां चक्षुरिति चक्षुर्विषय-सामान्यं चक्षुःशब्दाभिधेयं रूप-सामान्यं प्रकाश्यमात्रमभिधीयते । श्रतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्ति, एतदेषां साम, एतद्धि सबै रूपैः समम्, एतदेषां ब्रह्म, एतद्धि सर्वाणि रूपाणि विभर्ति ॥ २ ॥
समस्त रूपोंको धारण करता है ॥ २ ॥
अथ — अब शुक्ल - कृष्ण ( गौर-श्याम ) आदि रूपोंका चक्षु [ सामान्य ] है; अर्थात् चक्षुके विषयभूत रूपोंका सामान्य ' चक्षु ' शब्दसे कहा जाने-वाला, रूपसामान्य अथवा प्रकाश्य-सामान्य कहा जाता है । इसीसे सब रूप उत्पन्न होते हैं । यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंसे सम है । यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता | है ॥ २ ॥
कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा ँ सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सम-मेतदेषां ब्रह्म तद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदे-तत्त्रय ँ सदेकमयमात्मात्मो एकः सन्नेतत्त्रयं तदे-तदमृत ँ सत्येनच्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥
अब कर्मोंका सामान्य आत्मा ( शरीर ) है । यह इनका उक्थ है इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं । यह इनका साम हैं, क्योंकि यह समस्त कर्मोंसे सम है । यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण
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[ अध्याय १ थ है । इसीसे सारे - समस्त रूपोंसे सम रण करता है ॥२ ॥
-शुक्ल- कृष्ण ( गौर--पों का चक्षु [ सामान्य ] के विषयभूत रूपोंका शब्दसे कहा जाने-बान्य अथवा प्रकाश्य-जाता है । इसीसे होते हैं । यह इनका यह समस्त रूपोंसे नका ब्रह्म है, क्योंकि नको धारण करता दिखाना तो हि सर्वाणि कर्मभिः सम-बिभर्ति तदे-नेतत्त्रयं तदे-मृतं नामरूपे इनका उक्थ है । क्योंकि यह समस्त नस्त कर्मोंको धारण ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ९ ७ करता है । वह यह तीन होते हुए भी एक आत्मा है और आत्मा भी एक होते यह तीन है । वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है । प्राण ही अमृत है और नाम रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है ॥ ३ ॥
श्रथेदानीं सर्वकर्मविशेषाणां मननदर्शनात्मकानां चलनात्म-कानां च क्रियासामान्य मात्रेऽन्त-र्भाव उच्यते । ' कथम्? सर्वेषां कर्मविशेषाणामात्मा शरीरं सामा-न्यमात्मा, आत्मनः कर्म आत्म-त्युच्यते । ' आत्मना हि शरीरेण कर्म करोति ' इत्युक्तम् । । शरीरे च सर्व कर्माभिव्यज्यते । अतः अतः तात्स्थ्यात्तच्छन्दं कर्म - कर्मसामा-न्यमात्रं सर्वेषामुक्थमित्यादि पूर्ववत् । तदेतद्यथोक्तं नाम रूपं कर्म त्रयमितरेतराश्रयम्, इतरेतराभि व्यक्तिकारणम्, इतरेतरप्रलयं संहतं त्रिदण्डविष्टम्भवत् सदेकम् । केनात्मनैकत्वम् १ इत्युच्यते— अब इस समय मनन- दर्शनात्मक एवं चलनरूप समस्त कर्मविशेषों का क्रिया सामान्यमात्रमें अन्तर्भाव बत-लाया जाता है ॥ किस प्रकार? समस्त कर्मविशेषों का आत्मा - शरीर सामान्य आत्मा है, आत्माका कार्य होनेसे यहाँ कर्मको ' आत्मा ' कहा है । ऊपर यह कहा जा चुका है ' आत्मा यानो शरीरसे [ जीव ] कर्म करता है । ' शरीर में ही समस्त कर्मों-की अभिव्यक्ति होती है । अतः आत्मस्थ होनेके कारण कर्मको उसी शब्दसे कहा जाता है, वह कर्म-सामान्यमात्र ( आत्मा ) समस्त कर्मोंका उक्थ है — इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये । वे ये उपर्युक्त नाम, रूप और कर्म – तीनों एक दूसरेके आश्रित, एक - दूसरेकी अभिव्यक्तिके कारण, एक - दूसरेमें लीन होनेवाले और परस्पर मिले हुए तीन दण्डोंके समूह-के समान एक हैं । उनकी किस रूपसे एकता है, सो बतलायी जाती
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३ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ अयमात्मायं पिण्डः कार्यकरणा- । त्मसङ्घातः तथान्नन्त्रये व्याख्यातः ' एतन्मयो वा अयमात्मा ' इत्यादिना; एतावद्धीदं सर्वं । व्याकृतमव्याकृतं च यदुत नाम रूपं कर्मेति, आत्मा उ एकोऽयं कार्यकरणसङ्घातः सन्नध्यात्माधि-भूताधिदैवभावेन व्यवस्थितमेत-देव त्रयं नाम रूपं कर्मेति T । तदे-तद्वक्ष्यमाणम् । अमृतं सत्येनच्छन्नमित्येतस्य चाक्यस्यार्थमाह – प्राणो वा श्रमृतं करणात्मकोऽन्तरुपष्टम्भक आत्म-भूतोऽमृतोऽविनाशी नामरूपे सत्यं कार्यात्मके शरीरावस्थे; क्रियात्मकस्तु प्राणस्तयोरुपष्ट-म्मको बाह्याभ्यां शरीरात्मकाभ्या-मुपजनापायधर्मिम्यां मर्त्याभ्यां छन्नोऽप्रकाशीकृतः । एतदेव है - यह आत्मा - यह कार्य करणात्मक संघातरूप पिण्ड तथा अन्नत्रयके प्रकरणमें " यह आत्मा एतद्रूप है ” इस श्रुतिसे जिसकी व्याख्या की गयी है वह, बस - ——यह जो नाम, रूप और कर्म है, इतना ही यह सारा व्याकृत और अव्याकृत [ जगत् ] है; और आत्मा भी एक यह कार्यंकरणसंघातमात्र होते हुए यही एक अध्यात्म, अधिभूत और अधि-दैव भावसे स्थित नाम, रूप, कर्म यह त्रय है । उसीका यह आगे वर्णन किया जाता है । अब श्रुति ' अमृतं सत्येनच्छन्नम् ' इस वाक्यका अर्थं करती है - प्राणो ' वा अमृतम् ' - जो इन्द्रियरूप, शरीर-का आन्तर आधारभूत और आत्म-स्वरूप है वह प्राण ही अमृत — अवि-नाशी है तथा शरीरावस्थित कार्या-त्मक नाम - रूप सत्य हैं । उनका आधारभूत क्रियात्मक प्राण वृद्धि-क्षयशील, बाह्य, शरीरस्वरूप, मरण-धर्मा नाम और रूपोंसे आच्छादित ना अप्रकाशित किया हुआ है । यह
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[ अध्याय १ यह कार्य - करणात्मक तथा अन्नत्रय आत्मा एतद्रूप है ” जिसकी व्याख्या की बस - यह जो नाम, है, इतना ही यह -त और अव्याकृत और आत्मा भी एक यह तमात्र होते हुए यही अभूत और अधि-व्यत नाम, रूप, कर्म उसीका यह आगे नाता है । ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ९९ संसार सतत्त्वमविद्याविषयं प्रद- अविद्याका विषयभूत संसारका शितम् । श्रत ऊर्ध्वं विद्याविषय स्वरूप दिखलाया गया है । इसके आत्माधिगन्तव्य आगे विद्याका विषयभूत आत्मा इति चतुर्थ आरभ्यते ज्ञातव्य है, इसलिये चतुर्थं ' अध्याय ॥ ३ ॥ आरम्भ किया जाता है ॥ ३ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये षष्ठमुक्थब्राह्मरणम् ॥ ६ ॥
wwww wwww इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंस परिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
' अमृतं सत्येनच्छन्नम् ' नर्थ करती है - प्राणो ' नो इन्द्रियरूप, शरीर-धारभूत और आत्म-T ण ही अमृत - अवि-शरीरावस्थित कार्या-सत्य हैं । उनका व्यात्मक प्राण वृद्धि-प, शरीरस्वरूप, मरण-र रूपोंसे आच्छादित किया हुआ है । यह १. चतुर्थ अध्यायसे उपनिषद्का द्वितीय: अध्याय समझना चाहिये । यही ब्राह्मणका चतुर्थ अध्याय है ।
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द्वितीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण उपक्रम आत्मेत्येवोपासीत, तदन्वेषणे च सर्वमन्विष्टं स्यात् तदेव चात्मतत्वं सर्वस्मात्प्रेयस्त्वादन्वे-ष्टव्यम् । ' आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मा-स्मि ' इत्यात्मतत्त्वमेकं विद्याविषयः यस्तु मेददृष्टिविषयः सः -अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेदेति - अविद्याविषयः । " एकधैवानुद्रष्टव्यम् " ( वृ ० उ ० ४ । ४ । २० ) " मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति " ( ४ । ४ । १ ९ ) इत्ये-' आत्मा है ' इस प्रकार उपासना करे, उसकी खोज कर लेनेपर सभी-की खोज हो जाती है; तथा बह आत्मतत्त्व ही सबसे अधिक प्रिय होनेके कारण खोजनेयोग्य है । ' उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार [ निर्दिष्ट होने के कारण ] एक आत्मतत्त्व ही ज्ञानका विषय है । जो भेददृष्टिका विषय है वह ' यह अन्य है, में अन्य हूँ - इस प्रकार जो जानता है जानता ' ऐसा कहे जानेके कारण अविद्याका विषय है । " आत्मतत्त्वको एक प्रकार ही देखना चाहिये " " जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त
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इस प्रकार उपासना ज कर लेनेपर सभी-जाती है; तथा वह सबसे अधिक प्रिय ण खोजनेयोग्य है । को ही जाना कि मैं कार [ निर्दिष्ट होने के आत्मतत्त्व ही ज्ञानका भेददृष्टिका विषय है । - है, में अन्य हूँ इस जानता है वह नहीं कहे जानेके कारण षय है । त्वको एक प्रकार ही - " " जो यहाँ नानावद मृत्युसे मृत्युको प्राप्त ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ वमादिभिः प्रविभक्तौ विद्या-विद्याविषय सर्वोपनिषत्सु । तत्र चाविद्याविषयः सर्व एव साध्यसाधनादिमेदविशेषविनियो-गेन व्याख्यातः - तृतीयाध्या यपरिसमाप्तेः । स च व्याख्यातोऽविद्याविषयः सर्व एव द्विप्रकारः अन्तः प्राण उपष्टम्भको गृहस्येव स्तम्भादि-लक्षणः प्रकाशकोऽमृतः, बाह्यश्च कार्यलक्षणोऽप्रकाशक उपज-नापायधर्मकस्तृणकुशमृत्तिकासमो गृहस्येव सत्यशब्दवाच्यो मर्त्यः तेनामृतशब्दवाच्यः प्राणश्छन्न इति चोपसंहृतम् । स एव च प्राणो बाह्याधारभेदेष्वनेकधा विस्तृतः; प्राण एको देव इत्युच्यते । तस्यैव बाह्यः पिण्ड एकः साधा-४०१ होता है " इस प्रकारके वाक्योंसे समस्त उपनिषदोंमें ज्ञान और अज्ञान-के विषयोंको पृथक् - पृथक् कर दिया गया है । उनमें साध्य - साधनादि भेदविशेषके विनियोगद्वारा अविद्या-के सभी विषयकी तृतीय अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त व्याख्या कर दी गयी है । वह व्याख्या किया हुआ अविद्या-का सारा ही विषय दो प्रकारका है-पहला इस शरी रके भीतर प्राण है जो गृहको धारण करनेवाले स्तम्भादिके समान शरीरका आधारभूत, प्रका-शक और अमृत है; तथा दूसरा है बाह्य कार्यरूप प्रपञ्च, जो अप्रकाशक, बुद्धि - क्षयशील, गृहके तृण, कुश और मृत्तिकाके समान मरणधर्मा और ' सत्य ' शब्दका वाच्य है । उससे ' अमृत ' शब्दवाच्य प्राण आच्छादित है - ऐसा ऊपर उपसंहार किया गया है । वही प्राण बाह्य आधार-भेदोंमें अनेक प्रकारसे फैला हुआ ड्ढे और प्राण ' एक देव है ' ऐसा कहा जाता है । उसीका एक बाह्य १. ब्राह्मणका तृतीय अध्याय उपनिषद्का प्रथम अध्याय है । बृ ० उ ० २६-D
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४०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ रणः - विराड् वैश्वानर आत्मा पुरुषविधः प्रजापतिः को हिरण्य-गर्भः — इत्यादिभिः पिण्डप्रधानैः शब्दैराख्यायते सूर्यादिप्रविभक्त-करणः । एकं चानेकं च ब्रह्म एतावदेव, नातः परमस्ति, प्रत्येकं च शरीर-भेदेषु परिसमाप्तं चेतनावत्कर्तृ भोक्तृ च — इत्यविद्याविषयमेव आत्मत्वेनोपगतो गार्ग्य ब्राह्मणो वक्ता उपस्थाप्यते; तद्विपरीता -स्मद्दगजातशत्रुः श्रोता; एवं हि यतः पूर्वपक्षसिद्धान्ताख्यायिका-रूपेण समर्प्यमाणोऽर्थः श्रोतुचित्तस्य वशमेति विपर्यये हि तर्कशास्त्रवत् केवलार्थानुगमवाक्यैःसमर्प्यमाणो दुर्विज्ञेयः स्यादत्यन्त सूक्ष्मत्वा-द्वस्तुनः । तथा च काठके-“ श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः ” ( क ० उ ० १ । २ । ७ ) इत्या-दिवाक्यैः सुसंस्कृतदेवबुद्धिगम्य-साधारण ( समष्टि ) पिण्ड, जिसके सूर्यादि विभिन्न करण हैं, विराट् वैश्वानर, आत्मा, पुरुषविध, प्रजा पति, क और हिरण्यगर्भ आदि शरीर-प्रधान शब्दोंसे पुकारा जाता है । एक और अनेक ब्रह्म- बस इतना ही है, इसके सिवा और कुछ नहीं है, वह प्रत्येक शरीरभेदोंमें समाप्त होनेवाला ( परिच्छिन्न ) है, चेतना-वान् है तथा कर्ता और भोक्ता है— इस प्रकार अविद्याके विषयको ही आत्मस्वरूपसे समझनेवाला गायं ब्राह्मण यहाँ वक्ता रूपसे उपस्थित किया जाता है; तथा इससे विपरीत जाननेवाला आत्मदर्शी अजातशत्रु श्रोता है; क्योंकि इस प्रकार पूर्वपक्ष और सिद्धान्तकी आख्यायिकारूपसे समर्पित किया जानेवाला विषय श्रोताके चित्तके अधीन हो जाता है और इसके विपरीत तर्कशास्त्रके समान केवल वस्तुका बोध कराने- द वाले वाक्योंसे समर्पित किया जानेवाला विषय दुर्विज्ञेय होता है; क्योंकि आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है । इसी प्रकार कठोप-निषद् में भी " जो बहुतों को सुननेके लिये भी नहीं मिलता " इत्यादि वाक्यों- स से आत्मतत्त्व सुसंस्कृत देवबुद्धि ( सात्त्विकी बुद्धि ) का विषय और
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[ अध्याय २ ष्टि ) पिण्ड, जिसके रण हैं, विराट, -, पुरुषविध, प्रजा-- ण्यगर्भ आदि शरीर-चुकारा जाता है । निक ब्रह्म- बस इतना वा और कुछ नहीं T रीरभेदोंमें समाप्त च्छिन्न ) है, चेतना-और भोक्ता है— या विषयको ही मनेवाला गार्ग्य कारूपसे उपस्थित था इससे विपरीत मदर्शी अजातशत्रु इस प्रकार पूर्वपक्ष आख्यायिकारूपसे जानेवाला विषय अधीन हो जाता चरीत तर्कशास्त्र के तुका बोध कराने-समर्पित किया दुर्विज्ञेय होता त्मतत्त्व अत्यन्त प्रकार कठोप-बहुतों को सुननेके ज्ञा " इत्यादि वाक्यों-संस्कृत देवबुद्धि ) का विषय और ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३ त्वं सामान्यमात्रबुद्ध्यगम्यत्वं च | सामान्यमात्र बुद्धिका अविषय है— सप्रपञ्चं दर्शितम् । “ आचार्य - यह विस्तारपूर्वक दिखलाया गया है । वान्पुरुषो वेद " ( ६ । १४ । २ ) तथा " आचार्यवान् पुरुष जानता है " " आचार्याद्धैव विद्या ” ( ४।९। “ आचार्य से ही विद्या सफल होती ३ ) इति चच्छान्दोग्ये । है " इत्यादिरूपसे छान्दोग्योपनिषद्में " उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्त- और " तत्त्वदर्शी ज्ञानी लोग तुझे चदर्शिनः ( ४ । ३४ ) इति ज्ञानका उपदेश करेंगे ” इस वाक्यसे च गीतासु । इहापि च गीता में भी ऐसा ही कहा है । यहाँ शाकल्य याज्ञवल्क्यसंवादेन अति- ( इस उपनिषद्में ) भी शाकल्य और गह्वरत्वं महता संभेण ब्रह्मणो वक्ष्यति — तस्माच्छिलष्ट एव श्राख्यायिकारूपेण पूर्वपक्षसिद्धा-न्तरूपमापाद्य वस्तुसमर्पणार्थ आरम्भः । आचारविध्युपदेशार्थच — एव-माचारवतोर्वकृश्रोत्रोराख्यायि-कानुगतोऽर्थोऽवगम्यते । केवल-तर्कबुद्धि निषेधार्था चाख्या - | यिका -- " नैषा तर्केण मतिराप-नेया ” ( क ० उ ० १ । २ । ९ ) " न तर्कशाखदग्धाय " इति श्रुति-स्मृतिभ्याम् । श्रद्धा च ब्रह्म-विज्ञाने परमं साधनमित्याख्या- | याज्ञवल्क्यके संवादद्वारा बड़े समा-| रोहसे ब्रह्मतत्त्वकी अत्यन्त गहनता-का प्रतिपादन किया जायगा; अतः आख्यायिकारूपसे पूर्वपक्ष और सिद्धान्त के स्वरूपका प्रतिपादन करके आत्मतत्त्वको समर्पण करनेके लिये आरम्भ करना उचित ही है । आचारकी विधिका उपदेश करनेके लिये भी [ इस प्रकार आरम्भ करना उचित है ] | इस प्रकारके आचारवाले वक्ता और श्रोता होने-पर ही इस आख्यायिकामें प्रतिपा-दित विषयका ज्ञान होता है । यह आख्यायिका केवल तर्कबुद्धिका निषेध करनेके लिये भी है, जैसा कि " यह बुद्धि तर्कसे प्राप्त होने-योग्य नहीं है " जिसकी बुद्धि तर्क-शा शास्त्रसे दग्ध हो गयी है उसे [ ज्ञान नहीं इत्यादि श्रुति - स्मृतियोंसे होता है । तथा आख्यायिकाका यह भी अभि-प्राय है कि ब्रह्मज्ञानमें श्रद्धा ही
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४०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यिकार्थः । यथा हि गार्ग्य- । जातशत्रवोरतीव श्रद्धालुता । दृश्यते आख्यायिकायाम्; “ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् " ( गीता ४ । ३ ९ ) इति च स्मृतिः । ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये सर्वोत्तम साधन है । इसीसे आख्या-कामें गार्ग्य और अजातशत्रुकी अत्यन्त श्रद्धालुता देखी जाती है । " श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान - लाभ करता है ” ऐसी स्मृति भी है । अपने पास प्राये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना ॐ । दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स होवाचा-सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक जातशत्रुः इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥
ॐ [ किसी समय कोई ] गार्ग्यगोत्रोत्पन्न दृप्त ( गर्वीला ) बालाकि बड़ा बोलनेवाला था । उसने काशिराज अजातशत्रुके पास जाकर कहा— ‘ मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, इस वचन के लिये मैं आपको सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ; लोग ' जनक, जनक ' ऐसा कहकर दौड़ते हैं । [ अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि ' जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है ' । ये दोनों बातें आपने अपने वचनसे मेरे लिये सुलभ कर दी हैं । इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥
तत्र पूर्वपक्षवादी विद्याविषय | तहाँ क्वचित् -- किसी काल-विशेषमें अविद्याके विषयको ही ब्रह्मविद् बालाकिः दृप्तो गर्वि- ब्रह्म जाननेवाला गोत्रतः ' गार्ग्य ' पूर्वपक्षवादी दृप्तबालाकि, जो ब्रह्म-तोऽसम्यग्ब्रह्म विश्वादेव, बलाकाया को सम्यगुरूपसे न जाननेके कारण ही प्त - गरबीला था और बलाकाका अपत्यं बालाकितश्वासौ बाला- । पुत्र होनेसे बालाकि कहलाता था । तथा इस प्रकार जो दृप्त और बालाकि किश्चेति सवालाकिः, हशब्द होनेसे दृप्तबालाकि नामसे प्रसिद्ध