बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 411–420
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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[ अध्याय २ न है । इसीसे आख्या-और अजातशत्रुकी तादेखी जाती है । रूष ज्ञान - लाभ करता भी है । प्राये हुए गार्ग्यको रना आस ति स होवाचा-जनको जनक ( गर्वीला ) बालाकि के पास जाकर कहा-कहा, इस वचन के लिये जनक ' ऐसा कहकर जनक बड़ा दानी है, ने वचनसे मेरे लिये देता हूँ ] ॥ १ ॥
कचित् - किसी काल-विद्याके विषयको ही वाला गोत्रतः ' गार्ग्य ' बालाकि, जो ब्रह्म-पसे न जाननेके कारण बोला था और बलाकाका बालाकि कहलाता था र जो दृप्त और बालाकि बालाकि नामसे प्रसिद्ध ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५ ऐतिह्यार्थ आख्यायिकायाम्, । अनूचानः अनुवचनसमर्थो वक्ता वाग्ग्मी, गाग्र्यो गोत्रतः, आस बभूव क्वचित्कालविशेषे । स होवाचाजातशत्रु मजात-शत्रुनामानं काश्यं काशिराजमभि -गम्य - ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्म ते तुभ्यं ब्रवाणि कथयानि । स एव - । मुक्तोऽजातशत्रुरुवाच - सहस्रं गवां दद्म एतस्यां वाचि - यां मां प्रत्य-वोचो ब्रह्म ते ब्रवाणीति, ताव- । न्मात्रमेव गोसहस्रप्रदाने निमित्त-मित्यभिप्रायः । साताद्ब्रह्मकथनमेव निमित्तं कस्मान्नापेक्ष्यते सहस्रदाने ९ ब्रह्म ते ब्रवाणीतीयमेव तु वाग् निमित्तमपेक्ष्यते १ इत्युच्यते; यतः श्रुतिरेव राज्ञोऽभिप्रायमाह— जनको दांता जनकः श्रोति चैतस्मिन्वाक्यद्वये पदद्वयमभ्य-स्यते जनको जनक इति । वैशब्दः । था, वह अनूचान - अनुवचनमें समर्थं - बोलनेवाला अर्थात् बड़ा वाचाल था । ' ह ' शब्द आख्यायिका-में ऐतिह्य ( इतिहासप्राप्त अर्थं ) की सूचना देनेके लिये है । उसने अजातशत्रुसे - अजात-शत्रुनामक काश्य — काशिराजसे, उसके पास जाकर कहा — ' ब्रह्म ते वाणि – मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ । ' इस प्रकार कहे जानेपर अजातशत्रुने कहा, आपने जो कहा है कि ' मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ ' सो आपके इस कथनके लिये " मैं देता हूँ । ' अभिप्राय यह है कि अजातशत्रुके सहस्र गौएँ देनेमें केवल इतना ही निमित्त था । सहस्र गौएँ देनेमें साक्षात् ब्रह्म-निरूपणकी ही अपेक्षा क्यों नहीं थी? केवल ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इस वाक्यकी ही अपेक्षा क्यों थी? सो बतलाया जाता है; क्योंकि राजाके अभिप्रायको श्रुति बतला रही है - ' जनकः, जनक: ' इन दो पदोंकी आवृत्ति ' जनक दाता है, जनक श्रोता है ' इन दो वाक्योंके अर्थंमें
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४०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ प्रसिद्धावद्योतनार्थः; जनको दि-त्सुर्जनकः शुश्रूषुरिति ब्रह्म शुश्रू-वो विवक्षयः प्रतिजिघृक्षवश्च
जना धावन्त्यभिगच्छन्ति । तस्मा-तत्सर्व मय्यपि सम्भावितवान-सीति ॥ १ ॥
हुई है । ' वै ' शब्द प्रसिद्धिको सूचित करनेके लिये है । ' जनक देनेकी इच्छावाला है, जनक श्रवणकी इच्छावाला ' है है ' ' यह समझकर ' ब्रह्म ' तत्त्वको सुनने और कहनेकी इच्छा-वाले तथा प्रतिग्रहकी इच्छावाले लोग दौड़ते - उसी के पास जाते हैं । अतः [ इस वाक्यसे ] आपने वह सब मेरे लिये भी सम्भव कर दिया है, इससे [ इस वचनके लिये मैं सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥
गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा प्रजात-शत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान एवं राजानं शुश्रूषुमभि- इस प्रकार श्रवणके इच्छुक और मुखीभूतम्— अपने प्रति अभिमुख हुए राजासे— स होवाच गायों य एवासावादित्ये पुरुष एत-मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्सं-वदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अह-मेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥
उस गाग्र्यंने कहा, ‘ यह जो आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्र ने कहा- नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह सबका अतिक्रमण करके स्थित है, समस्त भूतोंका मस्तक है और राजा ( दीप्तिमान् ) है - इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ । जो पुरुष इसका इस प्रकार उपासना करता है वह सबका अतिक्रमण करके स्थित, समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता , है ॥ २ ॥
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[ अध्याय २ प्रसिद्धिको सूचित है । ' जनक देनेकी जनक श्रवणकी यह समझकर ' ब्रह्म ' नौर कहनेकी इच्छा-ग्रहकी इच्छावाले सीके पास जाते हैं । वयसे ] आपने वह सम्भव कर दिया वचन के लिये मैं हूँ ] ॥ १ ॥
तथा अजात-चणके इच्छुक और मुख हुए राजासे-ये पुरुष एत-न मैतस्मिन्सं-जेति वा अह--तिष्ठाः सर्वेषां इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे नहीं, इसके विषय में है, समस्त भूतोंका - इसकी उपासना दता है, वह सबका जा होता है ॥२ ॥
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०७ स होवाच गार्ग्य: - य एव असौ उस गार्ग्यने कहा – ' यह जो श्रादित्ये चक्षुषि चैकोऽभिमानी आदित्यमें और नेत्रमें उनका एक ही अभिमानी चक्षुके द्वारा यहां हृदयमें चक्षुर्द्वारेणेह हृदि प्रविष्टः ' अहंभोक्ता प्रविष्ट होकर ' मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता कर्ता च ' इत्यवस्थितः, एतमेवाहं ब्रह्म पश्यामि, अस्मिन्कार्यकरण-सङ्घाते उपासे । तस्मात्तमहं पुरुषं ब्रह्म तुभ्यं ब्रवीम्युपास्स्वेति । स एवमुक्तः प्रत्युवाच अजात-शत्रुः ' मामा ' इति हस्तेन विनि-वारयन् — एतस्मिन्ब्रह्मणि विज्ञेये मा संवदिष्ठाः; मा मेत्याबाधनार्थं द्विर्वचनम् । एवं समाने विज्ञान-विषये श्रावयोरस्मानविज्ञानवत इव दर्शयता वाधिताः स्थाम, अतो मा संवदिष्ठाः - मा संवादं कार्षीरस्मिन्ब्रह्मणि । अन्यच्चज्जा -नासि, तद्ब्रह्म वक्तुमर्हसि, न तु यन्मया ज्ञायत एव । अथ चेन्मन्यसे - जानीषे त्वं ब्रह्ममात्रं न तु तद्विशेषणोपासन फलानीति- - - तन मन्तव्यम्, यतः हूँ ' इस प्रकार स्थित है, उसीको मैं ब्रह्म समझता हूँ, इस देहेन्द्रिय-संघात में मैं उसीकी उपासना करता हूँ । अतः उस पुरुषको हो मैं तुम्हें ब्रह्मरूपसे बतलाता हूँ; तुम उसीकी उपासना करो । ' इस प्रकार कहे जानेपर उस अजातशत्रुने ' नहीं, नहीं ' इस प्रकार हाथसे मना करते हुए कहा – ' इस विज्ञेय ब्रह्मके विषयमें चर्चा मत करो । ' मामा ' यह द्विरुक्ति सब प्रकार रोकने के लिये है; क्योंकि इस प्रकार हम दोनोंके विज्ञानका विषय समान होनेपर भी हमें अविज्ञान-वान् - सा देखनेवाले तुमसे हम बाधित हो जायेंगे, इसलिये इस ब्रह्मके विषयमें संवाद मत करो । यदि तुम कोई अन्य ब्रह्म जानते हो तो उसी-का निरूपण करो, जिसे मैं जानता ही हूँ, उसका नहीं । यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि तुम तो केवल ब्रह्ममात्रको जानते हो, उसके विशेषणोंकी उपासनाके फलको तो नहीं जानते, सो तुम्हें ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि
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४०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ सर्वमेतदहं जाने यद्ब्रवीषि । कथम् अतिष्ठाः – श्रतीत्य भूतानि तिष्ठतीत्यविष्ठाः । सर्वेषां च भूतानां मूर्धा शिरो राजेति वै — राजा दीप्तिगुणोपेतत्वात्, एतैर्वि -शेषणैर्विशिष्टमेतद्ब्रह्म अस्मिन्का -र्यकरणसङ्घाते कर्तृ भोक्त चेत्यह-मेतमुपास इति । फलमप्येवं विशिष्टोपासकस्य - स य एतमेव-सुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति । यथागुणो-पासनमेव हि फलम्; " तं यथा यथोपासते तदेव भवति ” ( मण्डल-ब्राह्मण ) इति श्रुतेः ॥ २ ॥
TEFIE तुम जो कुछ कह रहे हो यह सभ मैं जानता हूँ । किस प्रकार? – यह अतिष्ठा है, अर्थात् समस्त भूतों-का अतिक्रमण करके स्थित है, इस लिये ' अतिष्ठा ' कहा गया है । समस्त भूतोंका मस्तक है और दीप्ति - गुण-युक्त होनेके कारण राजा है— इन विशेषणोंसे विशिष्ट इस ब्रह्मकी, जो देहेन्द्रियसंघातमें कर्ता और भोक्ता है, में उपासना करता हूँ । इस प्रकार के विशेषणोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवालेको फल भी ऐसा ही मिलता है — जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है । जैसे गुणवालेकी उपासना की जाती है, वैसा ही फल होता है; जैसा कि, " उसको जो जिस प्रकार उपासना करता है, तद्रूप ही हो जाता है " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ २ ॥
गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजात-शत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान संवादेनादित्यब्रह्मणि प्रत्या- संवादके द्वारा जब अजातशत्रुने ख्यातेऽजातशत्रुणा चन्द्रमसि आदित्यब्रह्मका निषेध कर दिया तो ब्रह्मान्तरं प्रतिपेदे गार्ग्यः । गार्ग्यने चन्द्रान्तर्गत दूसरे ब्रह्मका प्रतिपादन किया ।
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[ अध्याय २ कह रहे हो यह सभी | किस प्रकार? --, अर्थात् समस्त भूतों-करके स्थित है, इस - कहा गया है । समस्त कहै और दीप्ति - गुण-कारण राजा है - इन शिष्ट इस ब्रह्मकी, जो में कर्ता और भोक्ता ना करता हूँ । इस षणोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी निवालेको फल भी ऐसा है - जो इसकी इस करता है, वह सबका करके स्थित समस्त और राजा होता है । की उपासना की जाती ल होता है; जैसा कि, जिस प्रकार उपासना रूप ही हो जाता है " द्ध होता है ॥ २ ॥
तथा प्रजात-द्वारा जब अजातशत्रुने निषेध कर दिया तो न्तर्गत दूसरे ब्रह्मका ना । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४० ९ स होवाच गार्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एत-मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैत-स्मिन्संवदिष्ठा बृहन्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स यए तमेवमुपास्तेऽहरहर्ह सुतः प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥
वह गायं बोला, ' यह जो चन्द्रमामें पुरुष है, इसीकी में ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह महान्, शुक्लवस्त्रधारी, सोम राजा है— इस प्रकार में इसकी उपासना करता हूँ । जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सोम सुत और क्षीण नहीं होता ' ॥ ३ ॥
य एवासौ चन्द्रे मनसि चैकः पुरुषो भोक्ता कर्ता चेति पूर्ववद्वि-शेषणम् । बृहन् महान् महान् पाण्डर शुक्लं वासो यस्य सोऽयं सोऽय पाण्डर-वासाः, अप्शरीरत्वाच्चन्द्राभिमा-निनः प्राणस्थ, सोमो राजा चन्द्रः, यश्चान्नभूतोऽभिषूयते ] लतात्मको प्रस्तुत होता है तथा उसका अन्न यह जो चन्द्रमा और मनमें एक ही पुरुष कर्ता और भोक्ता है— इस प्रकार इसके पूर्ववत् विशेषण सम-झने चाहिये । [ सूर्यमण्डलसे द्विगुण होनेके कारण ] जो बृहन् अर्थात् महान् है तथा जिसके पाण्डर शुक्ल वास- वस्त्र हैं, वह यह ' पाण्डरवासाः ' है, क्योंकि चन्द्राभिमानी प्राण जलमय शरीरवाला है [ और जलका शुक्ल वर्ण प्रसिद्ध ही है ], सोम राजा चन्द्रमाको कहते हैं तथा जो यज्ञमें पेय अन्नके रूपमें चुवाया जाता है, वह लतामय सोम अर्थात् सोमलता भी सोम है । उस चन्द्रमा एवं लतामय पुरुषको एक करके [ अर्थात् अहंग्रह-
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४१० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यज्ञे, तमेकीकृत्यैतमेवाहं ब्रह्मोपा से ॥ यथोक्तगुणंय उषास्ते तस्याहरहः सुतः सोमोऽभिषुतो भवति यज्ञे ", प्रसुतः प्रकृष्टं सुतरां सुतो भवति विकारे, उभयविधयज्ञानुष्ठानसा मध्यं भवतीत्यर्थः । अन्नं चास्य न चीयतेऽनात्मकोपासकस्य ॥ ३ ॥
गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका उपासना के द्वारा अपना स्वरूप मानकर ] इस विशेषणविशिष्ट ब्रह्मकी ही मैं उपासना करता हूँ । जो पुरुष उपर्युक्त गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सुत होता है अर्थात् प्रकृतियज्ञमें सोमरस प्रस्तुत रहता है तथा प्रसुत होता है अर्थात् विकृ-तियज्ञमें अधिकतासे निरन्तर सोम-रस प्रस्तुत रहता है यानी उसे प्रकृति - विकृतिरूप दोनों प्रकारके यज्ञानुष्ठान में सामर्थ्यं प्राप्त हो जाता है । तथा इस अन्नात्मक ब्रह्मोपासक-का अन्न भी क्षीण नहीं होता ॥ ३ ॥
ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजात-शत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एत-मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि -न्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥ उ
वह गार्ग्यं बोला, ' यह जो विद्युतमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसकी चर्चा मत करो; इसकी तो मैं तेजस्वीरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है तथा उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है ' ॥ ४ ॥
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[ अध्याय २ रा अपना स्वरूप न विशेषणविशिष्ट उपासना करता हूँ । गुणोंवाले ब्रह्मकी T है, उसके लिये होता है अर्थात् मरस प्रस्तुत रहता ता है अर्थात् विकृ-से निरन्तर सोम-ता है यानी उसे दोनों प्रकारके मर्थ्य प्राप्त हो जाता वात्मक ब्रह्मोपासक-नहीं होता ॥ ३ ॥
देश तथा प्रजात-ति पुरुष एत-त्रुर्मा मैतस्मि स इति सय नस्विनी हास्य सीकी में ब्रह्मरूपसे नहीं, इसकी चर्चा हूँ । जो कोई इसकी था उसकी प्रजा भी ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ तथा विद्युति त्वचि हृदये चैका देवता । तेजस्वीति विशे-पणम्, तस्यास्तत्फलम् - तेजस्वी
ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा ।
भवति । विद्युतां बहुत्वस्याङ्गी-करणादात्मनि प्रजायां च फल-बाहुल्यम् ॥ ४ ॥
४११ इसी प्रकार विद्युत्, त्वचा 2 और हृदय में भी एक ही देवता है । ' तेजस्वी ' यह उसका विशेषण है । उसका यह फल है - वह तेजस्वी होता है और उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है । विद्युतोंका बाहुल्य अङ्गीकार किया गया है, इसलिये अपने और प्रजाके लिये फलकी ' बहुलता भी सम्भव है ॥ ४ ॥
गार्ग्यद्वारा आकाश - ब्रह्मका उपदेश और अजातशत्रुद्वारा · उसका प्रत्याख्यान स होवाच गाग्र्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमे-वाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संव-दिष्टाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एत-मेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्र-जोद्वर्तते ॥ ५ ॥
वह गार्ग्य बोला, ' यह जो आकाशमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषय में बात मत करो । मैं उसकी पूर्ण और अप्रवर्तिरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमें उसकी प्रजाका उच्छेद नहीं होता ' ॥ ५ ॥
तथा आकाशे हृद्याकाशे हृदये इसी प्रकार आकाश, हृदयाकाश. और हृदयमें भी एक ही देवता है । चैका देवता । पूर्णमप्रवर्ति चेति । उसके ' पूर्ण ' और ' अप्रवर्ति ' ये दो
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४१२ विशेषणद्वयम् । पूर्णत्वविशेषण- । फलमिदम् — पूर्यते प्रजया पशुभिः; अप्रवर्तिविशेषणफलम् -नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तत इति, प्रजासन्तानाविच्छित्तिः ॥ ५ ॥ ।
विशेषण हैं । पूर्णत्व - विशेषणका यह फल है कि वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है तथा ' अप्रवर्ति ' विशे-षणका यह फल है कि इस लोक में उसकी प्रजाका उद्वर्तन नहीं होता " प्रजासंतानका विच्छेद नहीं होता ॥ ५ ॥
गार्ग्यद्वारा, वायु - ब्रह्मका प्रतिपादन तथा श्रजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्य-जायी ॥ ६ ॥
वह गार्ग्य बोला, ' यह जो वायुमें पुरुष है इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजिता सेना - इस रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है ' ॥ ६ ॥
तथा वायौ प्राणे हृदि इसी प्रकार वायु, प्राण और चैका देवता हृदयमें भी एक ही देवता है । उसके । तस्या विशेष- विशेषण हे इन्द्र- परमेश्वर, बैकुष्ठ णम् – इन्द्रः परमेश्वरः वैकुण्ठो- जो विशेषरूपसे सहन न किया जा सके और अपराजिता सेना - जो ऽप्रसाः, न परैर्जितपूर्वा परा- सेना पहले दूसरोंके द्वारा पराजित THE न हुई हो । मरुत्नामक देवताओं. जिता सेना - मरुतां गणत्व - | का गणत्व ( एक समूहरूप होना )
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[ अध्याय २ वर्णत्व - विशेषणकायह प्रजा और पशुओंसे तथा ' अप्रवर्ति ' विशे-ल है कि इस लोकमें उद्वर्तन नहीं होता-विच्छेद नहीं अजातशत्रुद्वारा पुरुष एतमेवाहं तस्मिन्संवदिष्ठा हमेतमुपास इति गुर्भवत्यन्यतस्त्य-- मैं ब्रह्मरूपसे उपासना इसके विषय में बात मत ता सेना - इस रूपसे उपासना करता है, वह है ' ॥ ६ ॥
कार वायु, प्राण और एक ही देवता है । उसके इन्द्र — परमेश्वर, वैकुण्ठ-से सहन न किया जा अपराजिता सेना- जो इसरोंके द्वारा पराजित देवताओं. मरुत्नामक - एक समूहरूप होना ) ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ प्रसिद्धेः । उपासनफलमपि - । जिष्णुर्ह जयनशीलोऽपराजिष्णुर्न च परैर्जितस्वभावो भवति, । अन्यतस्त्यजायी अन्यतस्त्यानां सपत्नानां जयनशीलो भवति ॥ ६ ॥।
४१३ प्रसिद्ध है [ इसलिये उन्हें ' सेना ' कहा है ] । उपासनाका फल भी इस प्रकार है - जिष्णु - जयनशील, अपराजिष्णु – दूसरोंसे पराजित न होनेके स्वभाववाला और अन्यतस्त्य-जायी - अन्यतस्त्य अर्थात् शत्रुओं को जीतनेवाला होता है ॥ ६ ॥
गार्ग्यद्वारा अग्निब्रह्मका प्रतिपादन तथा प्रजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गायों य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥
वह गाग्र्यं बोला, ' यह जो अग्निमें पुरुष है, इसीकी में ब्रह्मरूपसे उपासना करता । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं विषासहिरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय ही विषासहि होता है और उसकी प्रजा भी विषासहि होती है ' ॥ ७ ॥
अग्नौ वाचि हृदि चैका देवता । तस्या विशेषणम् – - विषासहिर्मर्ष-यिता परेषाम् । अग्निबाहुल्यात् फलबाहुन्यं पूर्ववत् ॥ ७ ॥
अग्नि, वाक् और हृदय एक हीं देवता है । उसका विशेषण है ‘ विषासहि ' अर्थात् दूसरोंको सहन करनेवाला । पूर्ववत् अग्निकी बहुलता होनेके कारण उसके फलकी भी बहुलता है ॥ ७ ॥
१. अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि - सहन करनेवाला है ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४१४ जलान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा G गार्ग्यद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संव-दिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति सय एतमेवमुपास्ते प्रतिरूप हैवैनमुपगच्छति नाप्रति रूप-मथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥
वह गार्ग्य बोला, ' यह जो जलमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना ' करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी मैं ‘ प्रतिरूप ' रूपसे उपासना करता हूँ । ' जो कोई इसकी ` इस प्रकार उपासना करता है उसके रूप नहीं आता और उससे प्रतिरूप अप्सु रेतसि हृदि चैका । देवता । तस्या विशेषणम् — प्रति-रूपोऽनुरूपः श्रुतिस्मृत्य प्रतिकूल इत्यर्थः । फलम् – -प्रतिरूपं श्रुति-स्मृतिशासनानुरूपमेव एनमुप-गच्छति प्राप्नोति, न विपरीतम्, अन्यच्च - अस्मात्तथाविध एवोप-जायते ॥ ८ ॥
गार्ग्यद्वारा आदर्शान्तर्गंत ब्रह्मका पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रति-[ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
जल, वीर्यं और हृदयमें एक ही देवता है । उसका विशेषण है - प्रति-रूप - अनुरूप अर्थात् श्रुति और स्मृतिके अनुकूल । उसकी उपासनाका फल-उसके पास प्रतिरूप अर्थात् श्रुति-स्मृतिकी आज्ञाके अनुरूप पदार्थ ही जाता - प्राप्त होता है, उससे विपरीत नहीं । इसके सिवा, उससे वैसा ही [ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
प्रतिपादन और अजातशत्रु द्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाह ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मित्सिंवदिष्ठा