बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 51–60
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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[ अध्याय १ अन्न है । सिन्धु 1 ) में समानता गुदा - नाडियाँ सिन्धवः ' और - बहुवचनान्त ऊँचे उठे हुए यकृत् और और ' क्लोमा ' -सीधे और बायें क्लोमान: ' यह - बहुवचनान्त — क्षुद्र स्थावर ान्स्थावर ये केश हैं । लपर्यन्त उदित जाता है वह नाभिसे ऊपर-म्लोचन् अर्थात् अस्तकी ओर जघनार्थ-भाग ) है, और अपरत्वमें अस्त होते हुए है । तथा वह नर्थात् अङ्गको हें विशेषरूपसे - बिजलीका कि विद्योतन के विदारणमें हीं हो सकता । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५ गात्राणि कम्पयति तत्स्तनयति । गर्जनशब्दसामान्यात् । यन्मेहति मूत्रं करोत्यश्वस्तद्वर्षति वर्षणं तत् सेचनसामान्यात् । वागेव शब्द एवास्याश्वस्य वागिति नात्र कल्पनेत्यर्थः ॥ १ ॥
समानता है । तथा वह जो हिलाता अर्थात् शरीरको कम्पित करता है वह मेघका गर्जन है; क्योंकि इन दोनोंही में गर्जन- शब्द रहनेमें समानता है । और वह अश्व जो मूत्रत्याग करता है वही वर्षा होना है, क्योंकि भिगोनेमें इन दोनोंकी समानता है । वाक् अर्थात् शब्द ही इस अश्वकी वाणी है; तात्पर्य यह है कि यहाँ कोई कल्पना नहीं है ॥ १ ॥
अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि व इति । सौवर्णराजतौ ' अहर्वा ' इत्यादि । अश्वके आगे और पीछे महिमा नामके सोने और महिमाख्यौ ग्रहावश्वस्याग्रतः चाँदीके दो ग्रह ( यज्ञीय पात्रविशेष ) पृष्ठतच स्थाप्येते तद्विषयमिदं रक्खे जाते हैं; उन्हींसे सम्बन्ध दर्शनम् - रखनेवाली यह दृष्टि है-अहर्वा अश्व ' पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्र े योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत तस्यापरे समुद्र े योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः ॥ हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वासुरानश्वो मनु-समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
ष्यान् अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ; उसकी पूर्वं समुद्र योनि है । रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; उसकी अपर ( पश्चिम ) समुद्र योनि है । ये ही दोनों इस अश्वके आगे - पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह
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४६ वृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय १ ] ब्राह्म हुए । इसने हय होकर देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोको, अर्वा होकर विभ्र असुरोंको और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है । समुद्र ही इसका बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥ ग्रहाव
अहः सौवर्णो ग्रहो दीप्ति- । दीप्तिमें समानता होनेके कारण महि दिन ही सुवर्णमय ग्रह है । दिन ही मभि सामान्याद्वै । अहरश्वं पुरस्तान्महि- इस अश्वके सामने महिमारूपसे प्रकट मान्वजायतेति कथम्? अश्वस्य प्रजापतित्वात् । प्रजापतिर्ह्रादि-त्यादिलक्षणोऽह्वा लक्ष्यते । अश्वं लक्षयित्वा जायत सौवर्णो महिमा ग्रहो वृत्तमनु विद्योतते विद्युदिति यद्वत् । तस्य ग्रहस्य पूर्वे पूर्वः समुद्रे समुद्रो योनिविंभक्तिव्यत्य-येन ॥ योनिरित्यासादनस्थानम् । तथा रात्री राजतो ग्रहो वर्ण-सामान्याज्जघन्यत्वसामान्याद्वा । सम्भ हुआ, सो किस प्रकार? क्योंकि यह युक्त अश्व प्रजापतिरूप है; आदित्यादि-रूप प्रजापति ही दिनसे लक्षित होता है । जिस प्रकार वृक्षको लक्ष्य बनाकर बिजली चमकती है उसी स्तुत्य प्रकार इस अश्वको लक्षित कराकर कर्म दिनरूप सुवर्णमय महिमासंज्ञक ग्रह प्रकट हुआ है । उस ग्रहका ' पूर्वे जाति समुद्रे ' अर्थात् पूर्वसमुद्र योनि है । देवत्व योनि अर्थात् प्राप्तिस्थान है । यहाँ [ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार ] प्रथमा देवान विभक्तिका सप्तमीके रूपमें व्यत्यय न हुआ है, अतः ' पूर्वे समुद्रे ' का ' पूर्वः समुद्र: ' अर्थं किया गया है । इसी प्रकार वर्ण में और निकृष्टतामें नैष समानता होनेके कारण रात्रि- मश्वस्य ' राजत ( चाँदीका ) ग्रह है । यह एनमश्वं पश्चात्पृष्ठतो महिमान्व- इस अश्वके पीछेकी ओर यानी प्राप्तिद जायत, तस्यापरे समुद्रे योनिः । उसका पृष्ठभागमें महिमारूपसे प्रकट हुई । स्तुति पश्चिमसमुद्र उद्गमस्थान है । महिमा महत्त्वात् महत्ताके कारण ये ‘ महिमा ' कहलाते जाति । अश्वस्य हि । हैं । यह अश्वकी विभूति ही है कि
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अध्याय १ ] - अर्वा होकर द्र ही इसका होनेके कारण है | मारूपसे प्रकट क्योंकि यह आदित्यादि-दन से लक्षित वृक्षको लक्ष्य कती है उसी क्षित कराकर हमासंज्ञक ग्रह ग्रहका ' पूर्वे योनि है । न है । यहाँ सार ] प्रथमा रूपमें व्यत्यय मुद्रे ' का ' पूर्वः है । रात्रि-ह है । यह ओर यानी प्रकट हुई । गमस्थान है । इमा ' कहलाते ही है कि ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७ विभूतिरेषा यत्सौवर्णो राजतश्च ग्रहावुभयतः स्थाप्येते । तावेतौ वै महिमानी महिमाख्यौ ग्रहावश्व-मभितः सम्बभूवतुरुक्तलक्षणावेव सम्भूतौ । इत्थमसावश्वो महत्व युक्त इति पुनर्वचनं स्तुत्यर्थम् । तथा च हयो भूत्वेत्यादि स्तुत्यर्थमेव । हयो ह्रिनोतेगति-कर्मणों विशिष्टगतिरित्यर्थः । जातिविशेषो वा । देवानवहद् देवत्वमगमयत्प्रजापतित्वात् । देवानां वा वोढाभवत् । ननु निन्दैव वाहनत्वम् । नैष दोषः, वाहनत्वं स्वाभाविक-मश्वस्य । स्वाभाविकत्वादुच्छ्राय-प्राप्तिर्देवादिसम्बन्धोऽश्वस्येति स्तुतिरेवैषा । तथा वाज्यादयो जातिविशेषाः । वाजी भूत्वा । | इसके आगे - पीछे सुवर्ण और चाँदोके ग्रह ( पात्रविशेष ) रखे जाते हैं । वे ये महिमा अर्थात् ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाले महिमासंज्ञक ग्रह ही अश्वके आगे - पीछे प्रकट हुए हैं । इस प्रकार यह अश्व महत्त्वयुक्त है - यह पुनरुक्ति अश्यकी स्तुतिके लिये है । तथा ' हह्यो भूत्वा ' इत्यादि वाक्य भी अश्वकी स्तुति के ही लिये है । गतिकर्मक ' हि ' धातुका रूप ' हय ’ है, अत: ' हय ' का अर्थं विशिष्ट-गतिमान् है । अथवा ' हय ' अश्वको जातिविशेष है । हय होकर उसने देवताओंको वहन किया अर्थात् प्रजापति होनेके कारण उन्हें देवत्वको प्राप्त कराया; अथवा वह देवताओंका वाहन हुआ । शङ्का - किंतु वाहन होना तो निन्दा ही है । [ स्तुतिके लिये कैसे कहा? ] समाधान- यह कोई दोष की बात नहीं है, अश्वका वाहन होना तो स्वाभाविक ही है । स्वाभाविक होनेके कारण देवादिसे सम्बन्ध होना तो उच्च पदकी प्राप्ति ही है, अत: यह उसकी स्तुति ही है । इसी प्रकार वाजी आदि भी जाति विशेष हैं ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ४८ गन्धर्वानवहदित्यनुषङ्गः । तथा- । र्वा भूत्वासुरान् । अश्वो भूत्वा मनुष्यान् । समुद्र एवेति परमात्मा बन्धुर्बन्धनं बध्यतेऽस्मिन्निति । समुद्रो योनिः कारणमुत्पत्तिं प्रति । एवमसौ शुद्धयोनिः शुद्धस्थिति -रिति स्तूयते । " अप्सु योनिर्वा अश्व: " इति श्रुतेः प्रसिद्ध एव वा समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
अतः इसका सम्बन्ध इस प्रकार है- ब्राह्म वाजी होकर उसने गन्धर्वोका वहन किया तथा अर्वा होकर असुरोंका कम और अश्व होकर मनुष्योंका वहन य किया । समुद्र अर्थात् परमात्मा ही इसका बन्धु - बन्धन है, क्योंकि इसी- यह में यह बाँधा जाता है तथा समुद्र. ' मैं ही योनि यानी इसकी उत्पत्तिमें ( पूर अर्च कारण है । इस प्रकार यह शुद्ध अर्क योनि और शुद्ध स्थितिवाला है- क ऐसा कहकर इसकी स्तुति की जाती है । अथवा " अश्व जलमें योनिवाला इह है " इस श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध दपि समुद्र ही इसकी योनि है ॥२ ॥ नैवा
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये त्तेर्म प्रथममश्वमेधब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण सत्का साध अश्वमेधसम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति अथाग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्यो- अब आगे अश्वमेधमें उपयोगी वास अग्निकी उत्पत्तिका वर्णन किया घट त्पत्तिरुच्यते । तद्विषयदर्शन- जाता है । तद्विषयक दृष्टि कहनेकी ना इच्छासे ही जो उसकी उत्पत्ति कही क विवक्षयैवोत्पत्तिः स्तुत्यर्था । जाती है वह स्तुति के लिये है । नैवेह किञ्चनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत् । मृत अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्या-हो मिति । सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे
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[ अध्याय १ इस प्रकार है-न्धर्वोका वहन कर असुरोंका -नुष्यों का वहन परमात्मा ही है, क्योंकि इसी-है तथा समुद्र. चकी उत्पत्तिमें कार यह शुद्ध यतिवाला है-स्तुति की जाती लमें योनिवाला अनुसार प्रसिद्ध नि है ॥ २ ॥
वमेधमें उपयोगी का वर्णन किया क दृष्टि कहनेकी की उत्पत्ति कही के लिये है । वृतमासीत् । त्मन्वी स्या-तार्च ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४ ९ कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥
पहले यहाँ कुछ भी नहीं था । यह सब मृत्युसे ही आवृत था । यह अशनाया ( क्षुधा ) से आवृत था । अशनाया ही मृत्यु है । उसने ' मैं आत्मा ( मन ) से युक्त होऊँ ' ऐसा मन किया । उसने अर्चन ( पूजन ) करते हुए आचरण किया । उसके अर्चन करनेसे आप हुआ । अर्चन करते हुए मेरे लिये क ( जल ) प्राप्त हुआ है, अतः यही अर्कका ' अर्कत्व है । जो इस प्रकार अर्कके इस अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क ( सुख ) होता है ॥ १ ॥
नैवेह किञ्चना आसीत् । इह संसारमण्डले किश्चन किञ्चि- । दपि नामरूपप्रविभक्त विशेषं नैवासीद् न बभूव ने प्रागुत्प तेर्मनादेः । किं शून्यमेव स्यात् " नैवेह सत्कारणवाद- किञ्चन’इति श्रुतेः । साधनम् न कार्य कारणं वासीत् । उत्पत्तेश्च, उत्पद्यते हि घटः, अतः प्रागुत्पत्तेर्घटस्य नास्तित्वम् । ननु कारणस्य न नास्तित्वं मृत्पिण्डादिदर्शनात् । यन्नोप-पहले यहाँ कुछ भी नहीं था । अर्थात् मन आदिकी उत्पत्तिसे पूर्व यहाँ इस संसारमण्डलमें किञ्चनमात्र | कुछ भी - नाम - रूप में विभक्त हुआ कोई भी पदार्थविशेष नहीं था । शून्यवादी – तो क्या उस समय शून्य ही था, क्योंकि “ यहाँ कुछ भी नहीं था " ऐसी श्रुति है | अतः कार्य या कारण कुछ भी नहीं था । इसके सिवा उत्पत्ति होनेसे भी यहीं सिद्ध होता है । घट उत्पन्न होता है, इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व घटकी सत्ता नहीं होती । सिद्धान्ती — किंतु कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि [ घटो-| त्पत्तिसे पूर्व भी ] मृत्पिण्डादि देखे १. ‘ अर्चते कम् अर्कम् ' अर्थात् जिसके अर्चन करनेवालेको क ( जल या सुख ) हो उसका नाम अर्क है । इस व्युत्पत्तिसे ' अर्क ' अग्निको कहते हैं । वृ ० उ०४-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ५० लभ्यते तस्यैव नास्तिता । अस्तु । कार्यस्य न तु कारणस्य, उपलभ्य -मानत्वात् न; प्रागुत्पत्तेः सर्वानुपल-म्भात् ॥ अनुपलब्धिश्चेदभावहेतुः सर्वस्य जगतः प्रागुत्पत्तेर्न कारणं कार्य ' वोपलभ्यते । तस्मात्सर्व-स्यैवाभावोऽस्तु । न; " मृत्युनैवेदमावृतमासीत् " इति श्रुतेः । यदि हि किञ्चिदपि नासीद् येनात्रियते यच्चावियते तदा नावक्ष्यत् ' मृत्युनैवेदमावृतम् ' इति । न हि भवति गगनकुसु-मच्छन्नो वन्ध्यापुत्र इति । ब्रवीति च ' मृत्युनैवेदमावृतमासीत् ' इति, तस्माद्येनावृतं कारणेन, यच्चावृतं कार्य प्रागुत्पत्तेस्तदुभयमासीत्, श्रुतेः प्रामाण्यादनुमेयत्वाच्च । ब्रा जाते हैं । जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती उसीका अभाव होता है । अतः कार्यका अभाव भले ही रहे कारण- का का तो अभाव नहीं होता, क्योंकि हि वह तो उपलब्ध होता ही है । शून्यबादी- नहीं, क्योंकि उत्पत्ति- रुप से पूर्व तो सभीकी उपलब्धि नहीं I होती । यदि अनुपलब्धि ही अभाव -का कारण है तो उत्पत्तिसे पूर्वं तो सि सारे जगत्का कारण या कार्य उपलब्ध नहीं होता । अतः सभीका अभाव होना चाहिये । सिद्धान्ती — ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ " यह मृत्युसे ही आवृत न था " ऐसी श्रुति है । यदि उस समय कुछ भी न होता तो जिससे आवृत होता है और जो आवृत होता है उसके विषय में श्रुति यह न कहती कि ' यह मृत्युसे ही आवृत था । ' वन्ध्यापुत्र आकाश - कुसुमसे f आच्छादित होता हो — ऐसा कभी नहीं होता । किंतु श्रुति ऐसा कह रही है कि ' यह मृत्युसे ही आवृत घ था ', अतः जिस कारणसे आवृत था और जो कार्य आवृत था, उत्पत्तिसे पूर्व वे क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है और ऐसा अनुमान भी किया जा सकता है ।
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[ अध्याय १ उपलब्ध नहीं होता है । मतः ही रहे कारण-व्होता, क्योंकि ही है । योंकि उत्पत्ति-उपलब्धि नहीं ही अभाव-पत्ति से पूर्व तो रण या कार्य अतः सभीका ॥ बात नहीं है, न्युसे ही आवृत है । यदि उस ता तो जिससे नौर जो आवृत श्रुति ह त्युसे ही आवृत आकाश - कुसुमसे – ऐसा कभी श्रुति ऐसा कह व्युसे ही आवृत कारणसे आवृत र्य आवृत था, दोनों ही थे थ, प्रमाण है और किया जा ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ अनुमीयते च प्रागुत्पत्तेः प्रागुत्पत्तेः । उत्पत्तिसे पूर्व कार्यं और कारण-कार्यकारणयोरस्तित्वम्; कार्यस्य हिसतो जायमानस्य कारणे सत्यु-त्पचिदर्शनात्, असति चादर्शनात् । जगतोऽपि प्रागुत्पत्तेः कारणा -स्तित्वमनुमीयते घटादिकारणा-स्तित्ववत् । घटादिकारणस्याप्य सत्त्वमेव, 15 अनुपमृद्य मुत्पिण्डादिकं घटाद्य-नुत्पत्तेरिति चेत्? न; मृदादेः कारणत्वात् । मृत्सुवर्णादि हि तत्र कारणं चटरुचकादेः, न पिण्डाकार-विशेषः, तदभावे भावात् । अस-त्यपि पिण्डाकारविशेषे मृत्यु-वर्णादिकारणद्रव्यमात्रादेव घट -के अस्तित्वका अनुमान भी किया जा सकता है; क्योंकि उत्पन्न होने-वाले सत्य कार्यकी ही सत्य कारण-में उत्पत्ति देखी जाती है; असत्यमें नहीं देखी जाती । घटादिके कारण-की सत्ताके समान उत्पत्तिसे पूर्वं जगत्के कारणकी सत्ताका भी अनुमान किया जा सकता है । ' शून्यवादी — - किंतु घटादि कारणकी भी तो सत्ता नहीं है, क्योंकि मृत्पिण्डादिको नष्ट किये बिना घटादिकी उत्पत्ति ही नहीं होती - यदि ऐसा कहें तो? २ सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि कारण तो मृत्तिकादि हैं । घट और रुचक ( कण्ठभूषण ) आदिके कारण तो मृत्तिका और सुवर्णादि हैं, उनका पिण्डाकार-विशेष कारण नहीं है, क्योंकि उसका अभाव होनेपर भी उन ( मृत्तिकादि ) की सत्ता तो रहती ही है । पिण्डाकार-विशेषके न रहनेपर भी मृत्तिका | और सुवर्णादि कारण - द्रव्यमात्रसे हो १. इससे कारणकी सत्ताका अनुमान किया जाता है । अनुमानका प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये - - ' विमतं सत्पूर्वं कार्यत्वाद घटवत् ' विवादका विषय-भूत जगत् सत् ( कारण ) पूर्वक है, क्योंकि वह कार्य है, जैसे घट | २. अत: यह ( घटरूप ). दृष्टान्त साव्यविश् VISHWARADHYA प्रामाणिक ' नहीं है । SRI JAGADGURU JNANAMANDIR JNANA SIMHASAN LIBRARY Janganwadi Math, Varanasi Ans. No.1.8.3.
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५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ रुचकादिकार्योत्पत्तिर्दृश्यते ॥ तस्मान्न पिण्डाकारविशेषो घट रुचकादिकारणम् । असति तु मृत्सुवर्णादिद्रव्ये घटरुचकादिर्न जायत इति मृत्सुवर्णादिद्रव्यमेव कारणम्, न तु पिण्डाकारविशेषः । सर्व हि कारणं कार्यमुत्पाद-यत्पूर्वोत्पन्नस्यात्मकार्यस्य तिरो-धानं कुर्वत्कार्यान्तरमुत्पादयति, एकस्मिन्कारणे युगपदनेककार्य विरोधात् । न च पूर्वकार्योपमर्दे कारणस्य स्वात्मोपमर्दो भवति । तस्मात्पिण्डाद्युपमर्दे कार्योत्पत्ति-दर्शनम हेतुः प्रागुत्पत्तेः कारणा-सच्चे । पिण्डादिव्यतिरेकेण मृदादे-रसच्चादयुक्तमिति चेत्- पिण्डा-दिपूर्वकार्योपमर्दे मृदादिकारणं नोपमृद्यते, घटादिकार्यान्तरेऽप्य-नवर्तते इत्येतदयुक्तम्; पिण्ड १ इसलिये ऊपर दिये हुए दृष्टान्तमें नाह घट और रुचकादि कार्यकी उत्पत्ति होती देखी जाती है । अतः घट घटा और रुचकादिका कारण पिण्डाकार- ण विशेष नहीं है । मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्यके अभाव में घट और रुचकादिकी उत्पत्ति नहीं होती । द्युत्प अतः मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्य ही उनका कारण है, उनका चनु पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है । ' सारे ही कारण कार्यकी उत्पत्ति दन्व करते समय अपने पूर्वोत्पन्न कार्यंका रिति लय करके ही दूसरे कार्यको उत्पन्न करते हैं, क्योंकि एक कारण- मृदा में एक साथ अनेक कार्योंकी उत्पत्ति होना विरुद्ध है । किंतु उस पूर्वं चत्व कार्यका लय होनेसे ही कारणके कल्प स्वरूपका लय नहीं होता । अतः पिण्डादिका लय होनेपर कार्यकी उत्पत्ति दिखायी देना उत्पत्तिसे पूर्वं. कारणकी असत्ताका हेतु नहीं है । शून्यवादी - किंतु पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादिकी कोई सत्ता नहीं दनुम है, इसलिये ऐसा कहना अनुचित है । पिण्डादि पूर्व कार्यका लय ङ्गात होनेपर मृदादि कारणका लय नहीं तदेव होता, वह घटादि कार्यान्तरमें भी | अनुवृत्त रहता है - ऐसा कहना प्यन्य साध्यवैकल्य दोष नहीं माना जा सकता ।
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अध्याय १ की उत्पत्ति । अतः घट पिण्डाकार-त्तिका और में घट और नहीं होती । सुवर्णादि द्रव्य है, उनका नहीं है । " की उत्पत्ति त्पन्न कार्यका सरे कार्यको = एक कारण-यकी उत्पत्ति तु उस पूर्व ही कारणके होता । अतः पर कार्यकी उत्पत्तिसे पूर्व. तु नहीं है । पिण्डादिसे ई सत्ता नहीं हना अनुचित कार्यका लय कालय नहीं कार्यान्तर में भी - ऐसा कहना ना जा सकता । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ घटादिव्यतिरेकेण मृदादिकार-णस्यानुपलम्भादिति चेत्? न, मृदादिकारणानां घटा-पिण्डादिनिवृत्ता-चनुवृत्तिदर्शनात् । सादृश्या -दन्वयदर्शनं न कारणानुवृत्ते-रिति चेन्न, पिण्डादिगतानां मृदाद्यवयवानामेव घटादौ प्रत्य-चत्वेऽनुमानामासात्सादृश्यादि-कल्पनानुपपत्तेः । न च प्रत्यक्षानुमानयोर्विरुद्धा-व्यभिचारिता, प्रत्यक्षपूर्वकत्वा दनुमानस्य सर्वत्रैवानाश्वासप्रस-ङ्गात् । यदि च क्षणिकं सर्व तदेवेदमिति गम्यमानं तद्बुद्धेर-प्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वे तस्या ५३ | उचित नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिसे पृथक् मृत्तिकादि कारणकी उपलब्धि नहीं होती । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मृत्तिकादि कारणद्रव्योंकी अनुवृत्ति देखी जाती है । यदि कहो समानताके कारण उनमें मृत्तिकाका अन्वय देखा जाता है, कारणकी अनुवृत्ति होनेसे नहीं - तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि पिण्डादिगत मृत्ति-कादि अवयवोंको ही घटादिमें प्रत्यक्ष देखा जाता है, इसलिये केवल अनुमानाभाससे सादृश्यादिकी कल्पना करना उचित नहीं है । इसके सिवा प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंकी अव्यभिचारिता ( समञ्ज-सता ) में विरोध भी नहीं होता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक होता है, इसलिये [ उनमें विरोध होनेपर ] सभी जगह अविश्वासका प्रसंग हो जायगा । यदि ' तदेवेदम् ' ( यह वही है ) इस प्रकार ज्ञात होनेवाला सब कुछ क्षणिक है तो उस क्षणिक-त्वद्धिको प्रमाणित करनेके लिये भी तद्विषयक अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये दूसरी
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह ५४ - | श्रप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वमित्यनव स्थायां तत्सदृशमिदमित्यस्या अपि बुद्धेर्मृषात्वात्सर्वत्रानाश्वा-संतैव । तदिदम्बुद्धयोरपि कर्त्र -भावे सम्बन्धानुपपत्तिः । सादृश्यात्तत्सम्बन्ध इति चेन्न, तह द्धिकी; इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होनेपर [ क्षणिकत्वबुद्धिको स्वतः-। प्रमाण मानना होगा । ऐसी दशा में ] ' यह उसके समान है ' यह बुद्धि भी [ ' तदिदम् ' बुद्धिके ही अन्तर्गत. होनेसे ] मिथ्या होनेके कारण सर्वत्र अविश्वास ही रहेगा । तथा ' तदिदम् ' ' यह ' और ' वही ' ——- इन बुद्धियोंका भी कोई कर्ता न होने के कारण परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं होगा । यदि कि सदृशता के कारण इनका सम्बन्ध हो सकता है -- तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ' तत् ' अस चेन्न बुद्ध सहि चेन प्रस तदिदम्बुद्धयो रितरेतरविषयत्वा- ' इदम् ' - इन बुद्धियोंका इतरेतर- विष- सव यत्व ( भिन्न - भिन्न विषयोंको ग्रहण नुपपत्तेः । असति चेतरेतरविष- करना ) सिद्ध नहीं होता । जवक नुप १. ' तत् ' ( वह ) और ' इदम् ' ( यह ) शब्दसे होनेवाले यावन्मात्र वस्तुज्ञानको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं, कोई भी बुद्धि अपने विषय में स्वतः प्रमाण नहीं होती, उसकी तद प्रमाणताके लिये अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होती है - ऐसा बोद्ध मानते हैं 1 । बौद्धोंके 1 मतमें प्रत्यभिज्ञामात्र क्षणिक है । अतः उनकी मान्यता के अनुसार क्षणिकत्व प्रा बुद्धिको भी प्रमाणित करनेके लिये बुद्धयन्तरकी अपेक्षा होगी और फिर उस बुद्धिके लिये दूसरी बुद्धिकी, इस प्रकार अनवस्था दोष होगा; अत: उन्हें क्षणिक-त्वादि बुद्धिको स्वतः प्रमाण मानना पड़ेगा । ऐसी दशामें सादृश्य बुद्धि भी प्रत्य-भिज्ञा होनेसे क्षणिक ही हुई, इस प्रकार कहीं भी विश्वास न होगा । का २. ' वत् ' और ' इदम् ' ये दोनों बुद्धियाँ दो क्षणोंमें होती हैं, एक बुद्धि दूसरे क्षणमें रह नहीं सकती, अतः उसके स्त्ररूपका विरोधान न हो जाय इसके सा लिये उन दोनोंका एक कर्ता ( द्रष्टा ) में सामानाधिकरण्येन सम्बन्ध मानना चाहिये । परंतु क्षणिक विज्ञानवादीके मतमें दो क्षणोंमें रहनेवाला कोई एक द्रष्टा ही है नहीं; अतः उन बुद्धियोंका सम्बन्ध असम्भव ही है ।