बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 421–430
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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[ अध्याय २ अजातशत्रुद्वारा पुरुष एतमेवाह मैतस्मिन्संव-बास इति स य छति नाप्रतिरूप-सीकी में ब्रह्मरूपसे नहीं, इसके विषय में ता हूँ । ' जो कोई इसकी आता है, अप्रति-होता है ॥ ८ ॥
और हृदयमें एक ही का विशेषण है - प्रति-यत् श्रुति और स्मृतिके की उपासनाका फल-तिरूप अर्थात् श्रुति-के अनुरूप पदार्थ ही ता है, उससे विपरीत सिवा, उससे वैसा ही होता है ॥ ८ ॥
र श्रजातशत्रु द्वारा पुरुष एतमेवाहं तस्मिसिंवदिष्ठा ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५ रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेव मुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वा स्तानतिरोचते॥ ६ ॥
वह गार्ग्य बोला, ' यह जो दर्पण में पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषय में बात मत करो । इसकी तो मैं रोचिष्णु ( देदीप्यमान ) रूपसे उपासना करता हूँ । ' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय रोचिष्णु होता है, उसकी प्रजा भी रोचिष्णु है, उन सबसे बढ़कर वह दीप्तिमान् श्रादर्श प्रसादस्वभावे चान्यत्र खड्गादौ हार्दे च सच्चशुद्धिस्वा-भाव्ये चैका देवता; तस्या विशे-पणम् - रोचिष्णुर्दीप्तिस्वभावः फलं च तदेव । रोचनाधारबाहुल्या -त्फलबाहुल्यम् ॥ ९ ॥
होती है और उसका जिनसे सङ्गम होता होता है ॥ ६ ॥
स्वभावत: स्वच्छ दर्पण और ऐसे ही खड्गादि अन्य पदार्थोंमें तथा स्वभावतः शुद्ध सत्त्वयुक्त हृदय-में एक ही देवता II है I । उसका विशे-षण रोचिष्णु अर्थात् दीप्तिशाली है तथा वही फल भी है । दीप्तिके आधारोंकी बहुलता होनेके कारण फलकी भी बहुलता है ॥ ९ ॥
गार्ग्यद्वारा प्रारणब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनू-देत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्व- हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥ १० ॥
वह गार्ग्य बोला, ' जानेवाले के पीछे जो यह शब्द उत्पन्न होता है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं,
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४१६ मत करो । इसकी तो मैं प्राणरूपसे उपासना नहीं, इसके विषयमें बात प्रकार उपासना करता है वह इस लोक में करता हूँ । ' जो कोई इसकी इस नहीं छोड़ता ॥ १० ॥
पूर्ण आयु प्राप्त करता है, इसे प्राण समयसे पहले यन्तं गच्छन्तं य एवायं शब्दः पश्चात्पृष्ठतोऽनुदेत्यध्यात्मं च जीवनहेतुः प्राणः, तमेकी-कृत्याह श्रसुः प्राणो जीवनहेतु-रिति गुणस्तस्य फलम् - सर्व -मायुरस्मिँल्लोक एतीति - — यथो-पातं कर्मणा श्रायुः कर्मफल-परिच्छिन्नकालात्पुरा पूर्व रोगा-दिभिः पीडथमानमप्येनं प्राणो न जहाति ॥ १० ॥
‘ यन्तम् ’ – जाते हुए [ वायु ] के पीछे जो यह शब्द उदित होता है और जो अध्यात्मपक्षमें जीवन-का हेतुभूत प्राण है, उनको यहाँ एक करके कहा है । ' -अर्थात् जीवनका हेतु ’ – यह उसका गुण है । उसका फल यह है कि वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है— उसे कर्मवश जितनी आयु प्राप्त होती है [ उसका वह भोग करता है ] । उसके कर्म-फलसे मर्यादित समयसे पूर्व, रोगादि-से पीड़ित होनेपर भी, प्राण उसे नहीं छोड़ता ॥ १० ॥
गार्ग्यद्वारा दिग्ब्रह्मा प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रु र्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एत. मेवमुपास्ते द्वितीयवान्ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ।११ । वह गार्ग्य बोला, ' यह जो दिशाओं में पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषयों बात मत करो; मैं इसकी द्वितीय और अनपगरूपसे उपासना करता है । "
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[ श्रध्याय २ प्राणरूपसे उपासना ता है वह इस लोकमें छोड़ता ॥ १० ॥
-जाते हुए [ वायु ] ह शब्द उदित होता अध्यात्मपक्षमें जीवन-प्राण है, उनको यहाँ कहा है । ' असु - प्राण का हेतु ' - – यह उसका फल यह है कि कमें पूर्ण आयु प्राप्त उसे कर्मवश जितनी होती है [ उसका वह है ] । उसके कर्म-बत समय से पूर्व, रोगादि-होनेपर भी, प्राण उसे ॥। १० ॥ अजातशत्रुद्वारा क्षु पुरुष एतमेवाहं मैतस्मिन्संवदिष्ठा न इति स य एत नागणश्छिद्यते । ११ । है, इसीकी मैं ब्रह्मप नहीं, नहीं, इसके विषय में करता हूँ । से उपासना ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१७
जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह द्वितीयवान् होता है ।
और उससे गणका विच्छेद नहीं होता ॥ ११ ॥
दिक्षु कर्णयोर्हृदि चैका देवता अश्विनौ देवाववियुक्तस्वभावौ । गुणस्तस्य द्वितीयवचमनपगत्व-मवियुक्तता चान्योन्यं दिशा-मश्विनोश्चैवंधर्मित्वात् । तदेव च फलमुपासकस्य – गणा विच्छेदो द्वितीयवत्वं च ॥ ११ ॥
| दिशा, कर्ण और हृदय में एक ही देवता अश्विनीकुमार हैं जो कभी वियुक्त होनेवाले नहीं हैं । अतः उस देवताका गुण द्वितीयवत्त्व और अनपगत्व - अवियुक्तता है; क्योंकि दिशा और अश्विनीकुमार ये परस्पर ऐसे ही धर्मवाले हैं । तथा इस उपास-कको मिलनेवाला फल भी वही है -| गणसे विच्छेद न होना और द्वितीयवान् ( दूसरेसे युक्त ) होना ॥ ११ ॥
गार्ग्यद्वारा छायाब्रह्मका प्रतिपादन और प्रजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैत-स्मिन्संवदिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्व ५ हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥
वह गार्ग्य बोला, ‘ यह जो छायामय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषय में बात मत करो । इसकी तो मैं मृत्युरूपसे उपासना करता हूँ । ' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह इस लोकमें सारी आयु प्राप्त करता है और इसके पास समय से पहले मृत्यु नहीं आता ॥ १२ ॥
छायायां वाह्ये तमस्यध्यात्मं छाया में – बाह्य अन्धकारमें और शरीरान्तर्गत आवरणरूप अज्ञानमें च आवरणात्मकेऽज्ञाने हृदि चैका । तथा हृदयमें भी एक ही देवता है । बृ ० उ ० २७-
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४१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ । तस्या विशेषणं मृत्युः ॥ उसका विशेषण मृत्यु है । फल साप देवता पहलेही ' के समान है, मृत्युके न आने-फलं सर्वं पूर्ववत्, मृत्योरनागमनेन से रोगादि पीडाका अभाव रहना-रोगादिपीडाभावो विशेषः ॥ १२ ॥ | इतना विशेष है ॥ १२ ॥
6 गार्ग्यद्वारा देहान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यांन स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एत-मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि-संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥
वह गार्ग्य बोला ' यह जो आत्मामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ । ' उस अजातशत्रुने कहा, ' नहीं, नहीं, इसके विषय में बात मत करो; इसकी तो मैं आत्मन्वीरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है उसकी प्रजा भी आत्मन्विनी होती है श्रात्मनि प्रजापतौ बुद्धौ च हृदि चैका देवता । तस्या आत्म-न्वी — श्रात्मवानिति विशेषणम् । फलम् - आत्मन्वी ह भवत्यात्म-बान्भवति, आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति । बुद्धिबहुलत्वात्प्रजायां १. दशम मन्त्रोक्त फलके समान । , वह निश्चय आत्मन्वी होता है और । ' तब वह गार्ग्य चुप हो गया ॥१२ ॥
आत्मामें अर्थात् प्रजापति, बुद्धि और हृदयमें भी एक ही देवता है । उसका ' आत्मन्वी ' अर्थात् ' आत्मवान् ' यह विशेषण है । फल - आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होता है ' तथा उसकी प्रजा भी आत्म-न्विनी होती है । बुद्धियोंकी बहुलता
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[ अध्याय२ मृत्यु है | फलसारा नान है, मृत्युके न आने-डाका अभाव रहना-है ॥ १२ ॥
र अजातशत्रुद्वारा अनि पुरुष एत-शर्मा मैतस्मि स इति सय मन्विनी हास्य ॥ १३ ॥
, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे - नहीं, इसके विषयमें ना करता हूँ । जो कोई त्मन्वी होता है और चुप हो गया ॥ १२ ॥
अर्थात् प्रजापति, यमें भी एक ही देवता ' आत्मन्वी ' अर्थात् यह विशेषण है वी अर्थात् आत्मवान् उसकी प्रजा भी आत्म-है । बुद्धियोंकी बहुलता ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ सम्पादनमिति विशेषः । स्वयं । परिज्ञातत्वेनैवं क्रमेण प्रत्याख्या-तेषु ब्रह्मसु स गार्ग्यः क्षीणब्रह्म-विज्ञानोऽप्रतिभासमानोचरस्तूष्णी-मवाविचरा आस ॥ १३ ॥
४१ ९ होनेके कारण प्रजामें भी उस फल-का सम्पादन होता है — यह विशेष बात है । अपनेको ज्ञात होनेके कारण अजातशत्रुद्वारा गार्ग्यके बतलाये हुए ब्रह्मोंका इस प्रकार क्रमश: प्रत्या-ख्यान होनेपर जिसका ब्रह्मज्ञान क्षीण हो गया है, वह गार्ग्य कोई उत्तर न सूझनेके कारण चुप और नतमस्तक हो गया ॥ १३ ॥
गार्ग्यका पराभव और प्रजातशत्रुके प्रति उसकी उपसत्ति तं तथाभूतमालक्ष्य गार्ग्यम् — | उस गार्ग्यको ऐसी स्थिति में देखकर— स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू ३ इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥
वह अजातशत्रु बोला, ' बस, क्या इतना ही है? ' [ गार्ग्य- ] ' हाँ, इतना ही है । ' [ अजातशत्रु - ] ' इतनेसे तो ब्रह्म विदित नहीं होता । ' वह गार्ग्य बोला, ‘ मैं तुम्हारे प्रति उपसन्न होऊँ ' ॥ १४ ॥
स होवाचाजातशत्रुः – एता-चन्नू ३ इति । किमेतावद्द्ब्रह्म निर्ज्ञातम्, आहोस्विदधिकमप्य-स्तीति? इतर आहैतावद्धीति । नैतावता विदितेन ब्रह्म विदितं भवतीत्याहाजातशत्रुः, किमर्थं वह अजातशत्रु बोला, ' क्या इतना ही है? ' अर्थात् ' क्या तुम्हें इतना ही ब्रह्म विदित है या इससे कुछ अधिक भी जानते हो? ' गायंने कहा, ' बस इतना ही जानता हूँ । ' अजातशत्रुने कहा, ' इतना जाननेसे । तो ब्रह्म नहीं जाना जाता । फिर तुम ऐसा गर्व क्यों करते थे कि मैं गर्वितोऽसि ब्रह्म ते ब्रवाणीति ॥ तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूंगा । '
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४२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ किमेतावद्विदितं विदितमेव न भवति १ इत्युच्यते - न, फलवद्वि-ज्ञानश्रवणात् । न चार्थवादत्वमेव वाक्यानामवगन्तुं शक्यम्; अपू-र्व विधानपराणि हि वाक्यानि प्रत्युपासनोपदेशं लक्ष्यन्ते -' अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम् ' इत्या-दीनि । तदनुरूपाणि च फलानि सर्वत्र श्रूयन्ते विभक्तानि । अर्थ-चादत्वे एतदसमञ्जसम् । कथं तर्हि नैतावता विदितं भवतीति? नैष दोषः, अधिक-तापेक्षत्वात् । ब्रह्मोपदेशार्थं हि शुश्रूषवेऽजातशत्रवेऽमुख्यब्रह्म-विद्भार्ग्यः प्रवृत्तः, स युक्त एव मुख्यब्रह्मविदाजातशत्रुणामुख्य-ब्रह्मविद्द्भार्ग्य वक्तम् — यन्मुख्यं । ब्रह्म वक्तुं प्रवृत्तस्त्वं तन्न जानीष इति । यद्यमुख्यब्रह्मविज्ञानमपि प्रत्याख्यायेत, तदैतावतेति न तो क्या इतना जानना जानना ही नहीं होता? इसपर कहते हैं— ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो फलयुक्त विज्ञान ( उपासना ) का श्रबण है । इन वाक्योंको अर्थंवाद भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि ये ' अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम् ' इत्यादि वाक्य प्रत्येक उपासनाके उपदेशमें अपूर्व विधि करनेवाले दिखायी देते हैं । और उनके अनुसार ही सर्वत्र अलग - अलग फल सुने जाते हैं । अर्थवाद होनेपर इन सबका सामञ्जस्य नहीं हो सकता । तो फिर ऐसा क्यों कहा कि इतनेसे ही ब्रह्म ज्ञात नहीं होता? यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह कथन अधिकारी पुरुषोंकी अपेक्षासे है । अमुख्य ब्रह्मको [ परब्रह्मरूपसे ] जाननेवाला गार्ग्य ब्रह्मोपदेश सुनने के इच्छुक अजातशत्रुको ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये प्रवृत्त हुआ था । अतः मुख्य ब्रह्मवेत्ता अजातशत्रुद्वारा अमुख्य ब्रह्मज्ञ गार्ग्यके प्रति ऐसा कहा जाना उचित ही है कि जिस मुख्य ब्रह्मका उपदेश करनेके लिये तुम प्रवृत्त हुए थे, उसे तुम नहीं जानते हो । यदि यहाँ अमुख्य ब्रह्मके विज्ञानका भी निषेध किया गया होता तो ' इतनेही-
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[ श्रध्याय २ इतना जानना जानना ? इसपर कहते हैं-है, यहाँ तो फलयुक्त वासना ) का श्रवण क्योंको अर्थवाद भी सकता; क्योंकि ये चां भूतानाम् ' इत्यादि उपासना के उपदेशमें -रनेवाले दिखायी देते के अनुसार ही सर्वत्र कल सुने जाते हैं । नेपर इन सबका हो सकता । ऐसा क्यों कहा कि ज्ञात नहीं होता? नहीं है, क्योंकि यह पुरुषों की अपेक्षासे को [ परब्रह्मरूपसे ] ब्रह्मोपदेश सुननेके यात्रुको ब्रह्मका उपदेश वृत्त हुआ था । अतः अजातशत्रुद्वारा अमुख्य प्रति ऐसा कहा जाना जिस मुख्य ब्रह्मका लिये तुम प्रवृत्त हुए हीं जानते हो । यदि ह्म विज्ञानका भी या होता तो ' इतनेही-ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४२१ ब्रूयात्, नळांकञ्चिज्ज्ञातं स्वयेत्येवं ब्रूयात् । तस्माद्भवन्त्येतावन्त्यवि-द्याविषये ब्रह्माणि । एतद्विज्ञान-द्वारत्वाच्च परब्रह्मविज्ञानस्य, युक्त-मेव वक्तुम् - नैतावता विदितं भव-तीति । श्रविद्याविषये विज्ञेयत्वं | नामरूपकर्मात्मकत्वं चैषां तृती-येऽध्याये प्रदर्शितम् । तस्मात् । ' नैतावता विदितं भवति ' इति । ब्रुवता अधिकं ब्रह्म ज्ञातव्य-मस्तीति दर्शितं भवति । तच्चानुपसन्नाय न वक्तव्यम् इत्याचारविधिज्ञो गार्ग्यः स्वय-मेवाह – उप त्वा यानीति-उपगच्छानीति त्वाम्, यथान्यः | शिष्यो गुरुम् ॥ १४ ॥
| से [ ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता ] ' ऐसा नहीं कहा जाता, अपितु यही कहा जाता कि ' तुम कुछ भी नहीं जानते । ' अतः इतने ब्रह्म अविद्याके अन्तर्गत हैं । इतना विज्ञान परब्रह्म-विज्ञानका द्वार है, इसलिये यह कहना उचित ही है कि ' इतने से ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता । ' ये ब्रह्म अविद्या के क्षेत्रमें विज्ञेय ( उपास्य ) और नामरूप कर्मात्मक हैं, यह बात तृतीय ' अध्यायमें दिखायी गयी है । अत: ' इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता ' ऐसा कहकर यह दिखाया गया है कि अभी इससे अधिक ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना है । उस ब्रह्मका उपदेश अनुपसन्न-को ( जो शिष्यभावसे शरणमें न आया हो उसको ) नहीं करना चाहिये । अतः आचारविधिको जाननेवाला गार्ग्य स्वयं ही कहता है; ' मैं तुम्हारे प्रति उपसन्न होऊँ, जैसे कि कोई दूसरा शिष्य अपने गुरु प्रति होता है ' ॥ १४ ॥
गार्ग्यका हाथ पकड़कर अजातशत्रुका एक सोये हुए पुरुषके पास जाना और प्रारणों के नामसे न उठनेपर उसे हाथ दबाकर जगाना स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञपयिष्या-१. उपनिषद् के प्रथम अध्यायमें ।
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४२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ मीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्म-तुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिनापेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥
उस अजातशत्रुने कहा, ‘ ब्राह्मण क्षत्रियकी शरण में इस आशासे जाय कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, यह तो विपरीत है । तो भी मैं तुम्हें उसका ज्ञान कराऊँगा ही । ' तब वह उसका हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास गये । अजातशत्रुने उसे ' हे ब्रह्म! हे पाण्डरवास! हे सोम राजन्! ' इन नामोंसे पुकारा । परंतु वह न उठा । तब उसे हाथसे दबा - दबाकर जगाया तो वह उठ बैठा ॥ १५ ॥
स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं विपरीतं चैतत् किं तत्? यद्ब्राह्मण उत्तमवणे प्राचार्यत्वेऽधिकृतः सन् क्षत्रियमनाचार्यस्वभावमुपेयात् — उपगच्छेच्छिष्यवृत्त्या ब्रह्म मे वक्ष्यतीति । एतदाचारविधि-शास्त्रेषु निषिद्धम्; तस्मात्तिष्ठ त्वमाचार्य एव सन् । विज्ञपयि ष्याम्येव त्वामहं यस्मिन्विदिते ब्रह्म विदितं भवति यत्तन्मुख्यं ब्रह्म वेद्यम् । उस अजातशत्रुने कहा — ' यह तो प्रतिलोम - विपरीत है । क्या? यह कि उत्तम वर्णं ब्राह्मण आचार्यत्वका अधिकारी होकर भी, इस उद्देश्यसे कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, जिसका आचार्यत्व-का स्वभाव नहीं है, उस क्षत्रियके प्रति उपसन्न यानी शिष्यभावसे प्राप्त हो । यह आचारविधिका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों में निषिद्ध माना गया है; अतः तुम आचार्यरूपसे ही स्थित रहो । फिर भी, जिसका ज्ञान होनेपर ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है और जो मुख्य ब्रह्म वेद्य है, उसका ज्ञान मैं तुम्हें कराऊँगा ही । '
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[ अध्याय २ वर्ष सुप्तमाजग्म-बण्डरवासः सोम बोधयाञ्चकार - में इस आशासे जाय है । तो भी मैं तुम्हें पकड़कर उठा और वे त्रुने उसे ' हे ब्रह्म! चुकारा । परंतु वह न उठ बैठा ॥ १५ ॥
जातशत्रुने कहा- ' यह - विपरीत है । क्या? त्तम वर्णं ब्राह्मण अधिकारी होकर भी, कि यह मुझे ब्रह्मका , जिसका आचार्यत्व -नहीं है, उस क्षत्रियके नी शिष्यभावसे प्राप्त रविधिका प्रतिपादने स्त्रोंमें निषिद्ध माना तुम आचार्यरूपसे ही फर भी, जिसका ज्ञान ज्ञान हो जाता है ब्रह्म वेद्य है, उसका कराऊँगा ही । ' ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२३ तं गार्ग्य सलज्जमालक्ष्य विश्रम्भजननाय पाणौं हस्त आदाय गृहीत्वोत्तस्थावुत्थितवान् । तौह गार्ग्याजातशत्र पुरुषं सुप्तं राजगृहप्रदेशे क्वचिदाजग्मतुरा-गतौ । तं च पुरुषं सुप्तं प्राप्य एतैर्नामभिः ' बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन् ' इत्येतैरामन्त्रयाञ्चक्रे । एवमामन्त्रयमाणोऽपि स सुप्तो नोत्तस्थौ, तमप्रतिबुध्यमानं पा णिना आपेषमापिष्यापिष्य बोध- । याञ्चकार प्रतिबोधितवान् तेन स होत्तस्थौ । तस्माद्यो गार्ग्यरणा-भिप्रेतः, नासावस्मिञ्छरीरे कर्त्ता भोक्ता ब्रह्मेति । कथं पुनरिदमवगम्यते सुप्त-सुप्तपुरुषाभि- पुरुषगमनतत्सम्बो-सरणहेतुः परा- धनानुत्थानैर्गायि-मृश्यते भिमतस्य ब्रह्मणो-ब्रह्मत्वं ज्ञापितमिति १ जागरितकाले यो गार्ग्याभिप्रेतः ) पुरुषः कर्त्ता भोक्ता ब्रह्म संनि-हिंतः करणेषु यथा, तथाजात-शज्वभिप्रतोऽपि तत्स्वामी भृत्ये-फिर उस गार्ग्यको लज्जायुक्त देख उसे विश्वास उत्पन्न करनेके लिये वह उसका हाथ पकड़कर खड़ा हुआ । और वे गार्ग्य तथा अजातशत्रु राजभवन के भीतर कहीं सो ' हुए पुरुषके पास आये । उस सोये हुए पुरुषके पास पहुँचकर अजातशत्रुने उसे ' हे बृहन् । हे पाण्डरवास! हे सोम राजन्! ' इन नामोंसे पुकारा । इस प्रकार पुकारने-पर भी वह सोया हुआ पुरुष न उठा, तब उस न जागनेवाले पुरुषको हाथ-से दबा - दबाकर जगाने लगा, इससे वह उठ बैठा । अतः जिसे गार्ग्य ब्रह्मरूपसे मानता था, वह इस शरीरमें कर्ता - भोक्ता ब्रह्म नहीं है । शङ्का- - किंतु यह कैसे जाना जाता है कि सुषुप्त पुरुषके पास जाने, उसे पुकारने और उसके न उठनेसे गायंके अभिमत ब्रह्मका अन्ब्रह्मत्व सूचित किया गया है? समाधान- गार्ग्यका अभिप्रेत जो पुरुष है, वह जिस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें कर्ता - भोक्ता ब्रह्म है और वह इन्द्रियों में सन्निहित है, उसी प्रकार अजातशत्रुका अभिप्रेत उसका स्वामी भी भृत्योंमें राजाके समान उनमें
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४२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ 2 ष्विव राजा संनिहित एव । किं । तु भृत्यस्वामिनोर्गार्ग्याजात-शत्र्त्रभिप्र तयोर्यद्विवेकावधारण-कारणं तत्सङ्कीर्णत्वादनवधारित विशेषम् । यद्द्रष्टृत्वमेव भोक्तुर्न दृश्यत्वम्, यच्चाभोक्तु ' श्यत्वमेव न तु द्रष्टृत्वम्, तश्च्चोभयमिह सङ्कीर्णत्वाद्विविच्य दर्शयितुम- । शक्यमिति सुप्तपुरुषगमनम् । ननु सुप्तेऽपि पुरुषे विशिष्टै-- प्राणस्य भोक्तृ- र्नामभिरामन्त्रितो त्वाभोक्तृत्व- भोक्चैव प्रतिपत्स्यते विवेचनम् नाभोक्तेति नैः निर्णयः स्यादिति । न, निर्धारित विशेषत्वाद्भार्या-भित्र तस्य यो हि सत्येनच्छन्नः प्राण आत्मामृतो वागादिष्वनस्त-मितो निम्लोचत्सु, यस्यापः । सन्निहित ही है । किंतु गायक माने हुए भृत्यस्थानीय ब्रह्म और अजातशत्रुके अभिमत स्वामि-स्थानीय ब्रह्मके पार्थक्यनिश्चयका जो कारण है, वह संकीर्ण ( मिला हुआ ) है, इसलिये उनके भेदका निश्चय नहीं होता । भोक्तामें द्रष्टव ( साक्षित्व ) ही है; दृश्यत्व नहीं है, इस प्रकारके विवेक - निश्चयका जो कारण है तथा अभोक्तामें दृश्यत्व ही है, द्रष्टृत्व नहीं है - ऐसे विवेकके निश्चयका जो कारण है, वे दोनों ही यहाँ जागरित अवस्थामें मिले होनेके कारण अलग - अलग करके नहीं दिखाये जा सकते; इसीसे उन दोनोंको सोये हुए पुरुषके पास जाना पड़ा । पूर्व ० - किंतु सुषुप्त पुरुषमें भी विशिष्ट नामोंसे पुकारे जानेपर [ चेतन ] भोक्ता ही समझेगा, [ अचेतन ] अभोक्ता नहीं । इसलिये तब भी निर्णय नहीं होगा । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका विशेषरूप निश्चित कर दिया गया है । जो सत्यसे आच्छा दित प्राण आत्मा अर्थात् अमृत वागादिके अस्त हो जानेपर भी अस्त नहीं होता, जिसका जल