बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 431–440
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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[ अध्याय २ है । किंतु गार्ग्यके व्यस्थानीय ब्रह्म और अभिमत स्वामि-के पार्थक्यनिश्चयका जो संकीर्ण ( मिला हुआ ) उनके भेदका निश्चय भोक्तामें द्रष्टृत्व ही है; दृश्यत्व नहीं है, - विवेक - निश्चयका जो वा अभोक्तामें दृश्यत्व नहीं है - ऐसे विवेकके कारण है, वे दोनों ही - अवस्थामें मिले होनेके - अलग करके नहीं सकते; इसीसे उन हुए पुरुषके पास ऋतु सुषुप्त पुरुषमें भी से पुकारे जानेपर ता ही समझेगा, भोक्ता नहीं । इसलिये नहीं होगा । - ऐसी बात नहीं है; के अभिमत ब्रह्मका निश्चित कर दिया जो सत्यसे आच्छा आत्मा अर्थात् अमृत न्त हो जानेपर भी होता, जिसका जल ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२५ शरीरं पाण्डरवासाः, यश्चासपत्न-त्वाद् बृहन्, यश्च सोमो राजा षोडशकलः, स स्वव्यापारारूढो यथानिर्ज्ञात एवानस्तमितस्त्र-भाव आास्ते । न चान्यस्य कस्य -चिद्व्यापारस्त स्मिन्काले गार्ग्यणा | भिप्रेयते तद्विरोधिनः । तस्मात्स्व-नामभिरामन्त्रितेन प्रतिबोद्धव्यम्, न च प्रत्यबुध्यत । तस्मात्पा-रिशेष्याद्भाभिप्रेतस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मणः । भोक्तृस्वभावश्चेद् भुञ्जीतैव स्वं विषयं प्राप्तम् । न हि दग्धृस्त्र-भावःप्रकाशयितृस्वभावः सन्वह्नि -स्तृणोलपादि दाह्यं स्वविषयं प्राप्तं न दहति, प्रकाश्यं वा न प्रकाश-यति । न चेद्दहति प्रकाशयति वा प्राप्तं स्वं विषयम्, नासौ वह्निर्दग्धा प्रकाशयिता वेति निश्चीयते । | शरीर है, इसलिये जो पाण्डरवासा है तथा जो शत्रुहीन होने के कारण बृहन् है और जो सोलह कलाओंवाला सोम राजा है, वह अपने व्यापारमें तत्पर हुआ पहले जैसा जाना गया है, उसीके अनुसार अनस्तमितस्वभाव रहता है । इसके सिवा इसके विरोधी किसी अन्य-का व्यापार गाग्यंको उस कालमें अभिमत नहीं है । इसलिये अपने नामोंसे पुकारे जानेपर उसे जागना चाहिये, किंतु वह जागा नहीं । अतः परिशेषरूपसे गाण्यंके अभिमत ब्रह्म-का अभोक्तृत्व ही सिद्ध होता है । यदि वह भोक्तृस्वभाव होता तो अपनेको प्राप्त हुए विषयका भोग करता ही । अग्नि जलाने और प्रकाश करनेके स्वभाववाला होकर भी अपनी पहुँचके भीतर आये हुए तृण और उलप ( बालवृण ) आदि दाह्य पदार्थों-को न जलावे तथा प्रकाश्य वस्तुओं-को प्रकाशित न करे - यह नहीं हो सकता । यदि वह अपनी पहुँचके भीतर आये हुए पदार्थों को भी दग्ध और प्रकाशित नहीं करता तो वह अग्नि जलाने या प्रकाशित करने-वाला है - ऐसा निश्चय नहीं किया १. जो स्वभावतः कभी अस्त नहीं होता ।
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४२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ 22 तथासौ प्राप्तशब्दादिविषयोपल- । स्वभावश्चेद् गार्ग्याभिप्रेतः प्राणो बृहन् पाण्डरवास इत्येव -मादिशब्दं स्वं विषयमुपलमेत यथा प्राप्तं तृणोलपादि वह्निर्दहे-त्प्रकाशयेच्च श्रव्यभिचारेण तद्वत् । । तस्मात्प्राप्तानां शब्दादीनामप्रति-बोधादभोक्तृस्वभाव इति निश्श्री-यते । न हि यस्य यः स्वभावो निश्चित:, स तं व्यभिचरति कदा-चिदपि । अतः सिद्धं प्राणस्याभो-क्तृत्वम् । सम्बोधनार्थनामविशेषेण स-म्वन्धाग्रहणादप्रतिबोध इति चेत् १ स्यादेतत् — यथा बहुष्वासीनेषु स्वनामविशेषेण सम्बन्धाग्रहणा -न्माम यं सम्बोधयतीति, शृण्वन्नपि सम्बोध्यमानो विशेषतो न प्रति- । 22 जा सकता । इसी प्रकार यदि गार्ग्य-का अभिमत प्राण अपनेको प्राप्त हुए शब्दोंको ग्रहण करनेके स्वभाववाला है तो अपने विषयभूत बृहन्, पाण्डर-वास आदि शब्दको ग्रहण कर लेता, जिस प्रकार कि अपनेको प्राप्त हुए तृण- उलप आदिको अग्नि बना अपवादके दग्ध और प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार [ यहाँ भी समझना चाहिये ] । अत: अपनेको प्राप्त हुए शब्दादिका ज्ञान न होनेसे यह निश्चय होता है कि प्राण भोक्तृ-स्वभाव नहीं है; क्योंकि जिसका जो निश्चित स्वभाव होता है वह उसको कभी नहीं त्यागता । इससे प्राणका अभोक्तृत्व ही सिद्ध होता है । पूर्व ० - सम्बोधन के लिये प्रयोग किये हुए नामविशेषसे अपना सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राणका अत्र-तिबोध रहा हो तो? अर्थात् यदि ऐसी बात हो कि जिस प्रकार बहुत-से बैठे हुए पुरुषोंमें अपने नाम-विशेषसे सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण अर्थात् यह मुझे ही पुकारता है, ऐसा न समझ सकनेके कारण कोई पुरुष पुकारे जानेपर सुनते हुए भी विशेषरूपसे नहीं समझता,
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[ अध्याय २ प्रकार यदि गार्ग्य-अपनेको प्राप्त हुए करनेके स्वभाववाला यभूत बृहन्, पाण्डर-को ग्रहण कर लेता, अपनेको प्राप्त हुए दिको अग्नि बिना और प्रकाशित कर प्रकार [ यहाँ भी ] । अतः अपनेको दिका ज्ञान न होनेसे है कि प्राण भोक्तृ-क्योंकि जिसका जो होता है वह उसको ता । इससे प्राणका सिद्ध होता है । धनके लिये प्रयोग शेषसे अपना सम्बन्ध कारण प्राणका अत्र-तो? अर्थात् यदि - जिस प्रकार बहुत-षोंमें अपने नाम-ग्रहण न करनेके मुझे ही पुकारता झ सकने के कारण जानेपर सुनते से नहीं समझता, ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७ 2 पद्यते, तथेमानि बृहन्नित्येवमा-दीनि मम नामानीत्यगृहीत-सम्बन्धत्वात्प्राणो न गृह्णाति सम्बोधनार्थं शब्दस्, न त्वविज्ञा-दत्वादेवेति चेत्? न; देवताभ्युपगमेऽग्रहणानुप-| उसी प्रकार ' ये बृहन् इत्यादि मेरे ही नाम हैं ' - ऐसा सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राण अपनेको सम्बो-धन करनेके लिये प्रयोग किये हुए शब्दों को ग्रहण नहीं करता, अवि-ज्ञाता होनेके कारण ही नहीं; तो? “ सिद्धान्त - यह बात नहीं है, क्योंकि ’ देवता माना जानेके कारण उसका पत्तेः । यस्य हि चन्द्राद्यभिमानिनी देवता अध्यात्मं प्राणो भोक्ता अभ्युपगम्यते, तस्य तथा संव्य-वहाराय विशेषनाम्ना सम्बन्धो-sa श्यं ग्रहीतव्यः, अन्यथा श्राह्नानादिविषये संव्यवहारो-ऽनुपपन्नः स्यात् । व्यतिरिक्त पक्षेऽप्यप्रतिपत्तेर-युक्तमिति चेत् १ यस्य च प्राण-व्यतिरिक्तो भोक्ता, तस्यापि बृह-न्नित्यादिनामभिः सम्बोधने बृह-च्वादिनाम्नां तदा तद्विषयत्वा-१. क्योंकि देवता सर्वज्ञ होता है । नामसे सम्बन्ध ग्रहण न करना सम्भव नहीं है । ' जिसके मतमें चन्द्र आदिका अभिमानी देवता अध्यात्म प्राण भोक्ता माना जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार उस प्रकारके सम्यग् व्यवहारके लिये उसे अपने विशेष नामसे अवश्य सम्बन्ध ग्रहण करना चाहिये; नहीं तो आवाहन आदिके विषयमें ठीक - ठीक व्यवहार होना असम्भव होगा । पूर्व ० - [ भोक्ताको प्राणादिसे ] व्यतिरिक्त माना जाय तब भी तो वह [ पुकारनेपर ] नहीं समझता, इसलिये तुम्हारा कथन ठीक नहीं है । अर्थात् जिसके मतमें भोक्ता प्राणसे भिन्न है, उसके सिद्धान्तानुसार भी जब उसे बृहन् इत्यादि नामोंसे पुकारा जाय तो २. तात्पर्य यह है कि यदि चन्द्राभिमानी देवताको अपने अभिधायक नामके साथ अपने सम्बन्धका ज्ञान न होगा तो उसके उद्देश्यसे किये हुए आवाहन, स्तुति, याग एवं प्रणामादिकी सफलता नहीं होगी ।
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४२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ त्प्रतिपत्तिर्युक्ता । न च कदा-चिदपि बृहत्त्वादिशब्दैः सम्बो-धितः प्रतिपद्यमानो दृश्यते । • तस्मादकारणमभोक्तृत्वे सम्बो-धनाप्रतिपत्तिरिति चेत्? न; तद्वतस्तावन्मात्राभिमाना-| उसे उसका ज्ञान होना चाहिये; क्योंकि उस समय बृहत्त्वादि नाम उसीको विषय करनेवाले होते हैं । किंतु उसे भी बृहत्त्वादि शब्दोंसे पुकारे जानेपर कभी उनका ज्ञान होता दिखायी नहीं देता । अत: सम्बोधनको न समझना यह अभोक्तृत्वमें कारण नहीं सकता - ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्राणादिमान्को केवल नुपपत्तेः । यस्य प्राणव्यतिरिक्तो प्राणादिमात्रका अभिमान होना भोक्ता स प्राणादिकरणवान्प्राणी । तस्य न प्राणदेवतामात्रेऽभिमानो यथा हस्ते । तस्मात्प्राणनाम-सम्बोधने कृत्स्नाभिमानिनो सम्भव नहीं है । जिसके मतमें भोक्ता प्राणादिसे भिन्न है [ उसके सिद्धान्ता-नुसार ] वह प्राणादि इन्द्रियोंवाला प्राणी होना चाहिये । उसे प्राण-देवतामात्रमें [ आत्मत्वका ] अभिमान नहीं हो सकता, जैसे हाथमें [ हाथ-वालेका अभिमान नहीं होता ] । अतः सम्पूर्ण शरीरके अभिमानीको, केवल युक्त- प्राणका नाम लेकर पुकारे जानेपर उसमें अप्रतिपत्ति होना उचित ही चाप्रतिपत्तिः; न तु प्राणस्या- है; किंतु प्राणका, उसके किसी साधारणनामसंयोगे, देवतात्म- असाधारण नामसे संयोग होनेपर न समझना युक्त नहीं है । ' आत्माको १. अभिप्राय यह है कि यदि कोई कहे ' वृहन् ' ' पाण्डरवास ' आदि नाम साधारण प्राणके वाचक नहीं हैं; अपितु प्राणाभिमानी देवताके वाचक हैं, इसलिये यदि उनके द्वारा किये हुए सम्बोधनको प्राणने ग्रहण नहीं किया तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती- तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जातिवाचक गौ
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[ अध्याय २ ज्ञान होना चाहिये; समय बृहत्त्वादि नाम करनेवाले होते हैं । बृहत्त्वादि शब्दोंसे कभी उनका ज्ञान नहीं देता । अत: न समझना यह कारण नहीं हो कहें तो? ऐसा कहना ठीक आणादिमानुको केवल - अभिमान होना जिसके मतमें भोक्ता - है [ उसके सिद्धान्ता-गणादि इन्द्रियोंवाला हिये । उसे प्राण-वात्मत्वका ] अभिमान → जैसे हाथमें [ हाथ-न नहीं होता ] । अतः अभिमानीको, केवल कर पुकारे जानेपर होना उचित ही का, उसके किसी संयोग होनेपर न नहीं है । ' आत्माको डरवास ' आदि नाम के वाचक हैं, इसलिये किया तो कोई आपत्ति प्रकार जातिवाचक गौ ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ त्वानभिमानाच्चात्मनः । स्वनामप्रयोगेऽप्यप्रतिपत्तिदर्श-नादयुक्तमिति चेत्? सुषुप्तस्य यल्लौकिकं देवदत्तादि नाम तेनापि सम्बोध्यमानः कदाचिन्न प्रति पद्यते सुषुप्तः । तथा भोक्तापि सन्प्राणो न प्रतिपद्यत इति चेत्? न, श्रात्मप्राणयोः सुप्तासुप्तत्व-विशेषोपपत्तेः । सुषुप्तत्वात्प्राण-ग्रस्ततयोपरतकरण आत्मा स्वं | नाम प्रयुज्यमानमपि न प्रति-पद्यते । न तु तदसुप्तस्य प्राणस्य शब्द प्रत्येक व्यक्तिका भी बोधन करता है, ४२ ९ तो देवतात्मत्वका अभिमान न होनेके कारण [ इस प्रकारकी अप्रतिपत्ति हो सकती है ] । पूर्व ० - अपने नामका प्रयोग करनेपर भी अप्रतिपत्ति होती देखी जाती है, इसलिये ऐसा कहना उचित नहीं । अर्थात् सोये हुए पुरुषका जो देवदत्तादि लौकिक नाम होता है उसके द्वारा पुकारे जानेपर भी कभी-कभी सुषुप्त पुरुषको उसका ज्ञान नहीं होता, इसी प्रकार भोक्ता होते हुए भी प्राणको उसका ज्ञान नहीं होता - यदि ऐसी बात हो तो? सिद्धान्ती नहीं, क्योंकि शरीर और प्राणमें सुप्त और असुप्त रहने-का भेद उपपन्न है । शरीर सोया रहता है, उसकी इन्द्रियाँ प्राणग्रस्त रहनेके कारण निवृत्त हो जाती हैं; इसलिये उसे अपने नामका प्रयोग किये जानेपर भी उसका ज्ञान नहीं होता । किंतु प्राण [ उस समय भी ] नहीं सोता, इसलिये उसका भोक्तृत्व उसी प्रकार व्यापक प्राणको भी प्राणा-भिमानी वायु, चन्द्र इत्यादि देवताओंसे अभिन्न होनेका अभिमान होना हो चाहिये और उनके नामद्वारा पुकारे जानेपर उसकी प्रतिपत्ति भी होनी ही चाहिये । इस-पर यदि कोई कहे कि प्राणव्यतिरिक्त आत्मा भी तो व्यापक है, फिर प्राणाभिमानी देवताओंके नामोंसे उसे ही बोध क्यों नहीं होता? तो इसके उत्तर में आगेकी बात कही गयी है ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४३० भोक्तृत्व उपरतकरणत्वं सम्बो- । धनाग्रहणं वा युक्तम् । अप्रसिद्धनामभिः सम्बोधन-मयुक्तमिति चेत् — - सन्ति हि प्राणविषयाणि प्रसिद्धानि प्राणा-दिनामानि तान्यपोह्य अप्रसिद्धै-बृहन्त्वादिनामभिः सम्बोधनम-युक्तम्, लौकिकन्यायापोहात् । तस्माद्भोक्तुरेव सतः प्राणस्या-प्रतिपचिरिति चेत १ न देवताप्रत्याख्यानार्थत्वात् । केवलसम्बोधनमात्राप्रतिपत्स्यैव असुप्तस्याध्यात्मिकस्य प्राणस्या-माननेपर उनमें उपरतकरणत्व और सम्बोधनके अग्रहणकी उपपत्ति नहीं हो सकती । पूर्व ० - किंतु अप्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधन करना तो उचित नहीं है । प्राणसम्बन्धी प्राण आदि प्रसिद्ध नाम भी हैं ही; उन्हें छोड़कर बृहत्त्वादि अप्रसिद्ध नामोंसे पुकारना तो उचित नहीं है, क्योंकि इससे लौकिक न्याय भी भंग होता है । इसीसे भोक्ता होनेपर भी प्राणको उसकी अप्रति-पत्ति हुई - ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह सम्बोधन देवताका प्रत्याख्यान ( निषेध ) करनेके लिये था । केवल सम्बोधनमात्रकी अप्रति-पत्तिसे ही असुप्त आध्यात्मिक प्राणका भोक्तृत्वे सिद्धे यच्चन्द्रदेवताविष- अभोक्तृत्व सिद्ध हो सकनेपर भी जो उसे चन्द्रदेवतासम्बन्धी नामोंसे यैर्नामभिः सम्बोधनम्, तच्चन्द्रदेवता प्राणोऽस्मिञ्चरीरे भोक्तेति गार्ग्यस्य विशेषप्रतिपत्तिनिराकरणार्थम् । न हि लौकिकनाम्ना सम्बोधने शक्यं कर्तुम् । प्राणप्रत्याख्याने-सम्बोधन किया गया है, वह गार्ग्य की इस विशेष प्रतिपत्तिका निराकरण करनेके लिये है कि इस शरीर में चन्द्रदेवता ही भोक्ता प्राण है । यह निराकरण [ प्राणादि ] लौकिक नाम-से सम्बोधन करनेपर नहीं किया । जा सकता था । प्राणके प्रत्याख्यानसे
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[ अध्याय २ में उपरतकरणत्व और ग्रहणकी उपपत्ति नहीं तु अप्रसिद्ध नामोंसे ना तो उचित नहीं है । प्राण आदि प्रसिद्ध नाम हें छोड़कर बृहत्त्वादि ोसे पुकारना तो उचित क इससे लौकिक न्याय ना है । इसीसे भोक्ता को उसकी अप्रति-कहें तो? ऐसा कहना ठीक नहीं, सम्बोधन देवताका निषेध ) करनेके लिये म्बोधनमात्रकी अप्रति-सुप्त आध्यात्मिक प्राणका द्ध हो सकनेपर भी जो वतासम्बन्धी नामोंसे या गया है, वह गार्ग्यकी प्रतिपत्तिका निराकरण ये है कि इस शरीर में हो भोक्ता प्राण है । यह [ प्राणादि ] लौकिक नाम-- करनेपर नहीं किया वा । प्राणके प्रत्याख्यानसे ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१ नैव प्राणग्रस्त त्वात्करणान्तराणां | ही अन्य इन्द्रियोंके भोक्तृत्वकी प्रवृस्यनुपपत्तेर्भोक्तृत्वाशङ्कानुपप-तिः । देवतान्तराभावाच्च । नन्वतिष्ठा इत्याद्यात्मन्वीत्य-न्तेन ग्रन्थेन गुणवद्देवताभेदस्य दर्शितत्वादिति चेत् १ न तस्य प्राण एवैकत्वा-भ्युपगमात्सर्वश्रुतिष्वर नाभिनिद-र्शनेन । “ सत्येनच्छन्नम् प्राणो चा अमृतम् ” ( बृ ० उ ० १ । ६ । ३ ) इति च प्राणबाह्यस्यान्य-स्थानभ्युपगमाद्भोक्तुः; " एष उ ह्येव सर्वे देवा: " " कतम एको देव इति प्राण: " ( ३ । ९ | | ९ ) इति च सर्वदेवानां प्राण एवैकत्वोपपादनाच्च । तथा करण मेदेष्वनाशङ्का, देहभेदेष्विव स्मृतिज्ञानेच्छादि - । आशङ्का भी नहीं हो सकती, क्योंकि सुषुप्ति के समय प्राण में ही लीन रहने-के कारण उनकी प्रवृत्ति होनो सम्भव नहीं है । तथा शरीरमें इनसे भिन्न कोई और देवता नहीं है; [ इसलिये देवतान्तरको भोक्ता मानना भी युक्तिसंगत नहीं है ] । पूर्व ० - किंतु ' अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम् ' से लेकर ' आत्मन्वी ह भवति ' यहाँतकके ग्रन्थसे विशेष-विशेष गुणोंसे युक्त देवताका भेद दिखलाये जानेके कारण [ प्राणसे भिन्न कोई अन्य देवता नहीं है - ऐसा कहना उचित नहीं है ] । सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि सारी श्रुतियों में अर और नाभिके दृष्टान्तद्वारा उनका प्राणमें ही एकत्व माना गया है । " सत्यसे आच्छादित है, प्राण ही अमृत है " इत्यादि वाक्योंसे प्राणसे बाह्य अन्य भोक्ता स्वीकार नहीं किया गया, तथा " यही समस्त देवगण है " " वह एक देव कौन है? प्राण ' इस वाक्यसे भी प्राण में ही समस्त देवताओंके एकत्व-का उपपादन किया गया है । इसी प्रकार नेत्रादि विभिन्न इन्द्रियों-में भी भोक्तृत्वको आशङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि विभिन्न देहोंके समान उनमें स्मृति- ज्ञान एवं इच्छादिका
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४३२ प्रतिसन्धानानुपपत्तेः; न ह्यन्य- । दृष्टमन्यः स्मरति जानातीच्छति प्रतिसन्दधाति वा । तस्मान्न करण-भेदविषया भोक्तृत्वाशङ्काविज्ञा-नमात्रविषया वा कदाचिदप्युप- | पद्यते । ननु सङ्घात एवास्तु भोक्ता, किं व्यतिरिक्तकल्पनयेति? न; आपेषणे विशेषदर्शनात् । यदि हि प्राणशरीरसङ्घातमात्रो भोक्ता स्यात्सङ्घातमात्राविशेषा-त्सदा श्रपिष्टस्यानापिष्टस्य च प्रतिबोधे विशेषो न स्यात् । सङ्घातव्यतिरिक्ते तु पुनर्भोक्तरि सङ्घातसम्बन्धविशेषानेकत्वात् पेषणापेषणकृतवेदनायाः सुख-प्रतिसन्धान होना सम्भव नहीं है । अन्य पुरुषके देखे हुए पदार्थके विषय-में कोई दूसरा पुरुष स्मरण, जान-कारी, इच्छा अथवा प्रतिसन्धान नहीं करता इस लिये विभिन्न इन्द्रियों-के विषयमें अथवा विज्ञानमात्रके विषय में भोक्तृत्वकी आशङ्का होनी कभी उचित नहीं है । पूर्व ० - अच्छा तो संघातको ही भोक्ता मान लिया जाय, उससे भिन्न भोक्ताकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है? सिद्धान्ती - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उसे हाथसे दबाने पर विशेष अनुभव होता देखा जाता है । यदि प्राण और शरीरका संघातही भोक्ता होता तो [ जागने और न जागनेके समय ] संघातमात्रमें सदा ही कोई अन्तर न होनेके कारण उसे दबाया जाय अथवा न दबाया जाय उसके जागे रहनेमें कोई विशेषता नहीं होनी चाहिये । किंतु यदि भोक्ता संघात-से भिन्न होगा तो संघात के साथ उसके सम्बन्धविशेषोंकी अनेकता होनेके कारण दबाने या न दबानेसे होनेवाले ज्ञान तथा उत्तम, मध्यम और
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[ अध्याय २ ना सम्भव नहीं है । खे हुए पदार्थके विषय-पुरुष स्मरण, जान-अथवा प्रतिसन्धान न लिये विभिन्न इन्द्रियों-अथवा विज्ञानमात्रके त्वकी आशङ्का होनी नहीं है । च्छा तो संघातको ही नया जाय, उससे भिन्न रूपना करनेकी क्या है? - ऐसा नहीं हो सकता, हाथ से दबाने पर विशेष - देखा जाता है । यदि रीरका संघातही भोक्ता जागने और न जागने के मात्र सदा ही कोई निके कारण उसे दबाया न दबाया जाय उसके कोई विशेषता नहीं होनी ऋतु यदि भोक्ता संघात-गा तो संघात के साथ अन्धविशेषोंकी अनेकता ण दबाने या न दबाने से न तथा उत्तम, मध्यम और ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३ दुःखमोहमध्यमाधमोत्तमकर्मफल-मेदोपपत्तेश्च विशेषो युक्तः । न तु सङ्घातमात्रे सम्बन्धकर्मफल-भेदानुपपत्तेर्विशेषो युक्तः । तथा शब्दादिपटुमान्द्यादि-कृतश्च । अस्ति चायं विशेष: -यस्मात्स्पर्शमात्रेणाप्रतिबुध्यमानं पुरुषं सुतं पाणिना आपेषमापि-ष्यापिष्य बोधयाञ्चकाराजातशत्रुः । तस्माद्य आपेषणेन प्रतिबुबुधे । ज्वलन्निव स्फुरनिव कुतश्चिदागत इव पिण्डं च पूर्वविपरीतं बोध-चेष्टाकार विशेषादिमवेनापाद-यन्, सोऽन्योऽस्ति गार्ग्याभिमत-ब्रह्मभ्यो व्यतिरिक्त इति सिद्धम् । संहतत्वाच्च पारार्थ्योपपत्तिः प्राणस्य पारा- प्राणस्य । गृहस्य र्थ्योपपादनम् स्तम्भादिवच्छरीरस्य अन्तरुपष्टम्भकः प्राणः शरीरा-दिभिः संहत इत्यवोचाम । अधम कर्मोंके सुख - दुःख और मोह-रूप फलभेद सम्भव होनेके कारण उसमें विशेषता हो सकती है । केवल संघातमात्रको भोक्ता माननेपर तो उसके सम्बन्ध और कर्मफलका भेद सम्भव न होनेके कारण कोई विशेषता हो नहीं सकती । तथा [ केवल संघातको भोक्ता माननेपर ] शब्दादिके पटुत्व-मन्दत्वादिसे होनेवाला अनुभवका भेद भी नहीं हो सकता । किंतु यह भेद है हो, क्योंकि अजातशत्रुने स्पर्शमात्रसे न उठनेवाले सुप्त पुरुष-को हाथसे दबा - दबाकर जगाया था । अतः जो दबानेसे जगा तथा जिसने ज्वलित और स्फुरित होते हुए समान देहमें मानो कहीं से आकर उसे पहलेसे विपरीत बोध, चेष्टा एवं आकारविशेषादिसे युक्त कर दिया वह गायँके माने हुए ब्रह्मोंसे भिन्न है — ऐसा सिद्ध होता है संहत होनेके कारण भी प्राणकी | परार्थता सिद्ध होती है । घरके स्तम्भा-| दिके समान शरीरका आन्तर आधार-भूत प्राण शरीरादिसे संहत है-ऐसा हम पहले कह चुके हैं । तथा वृ ० उ ० २८-
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४३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ अरनेमिवच्च, नाभिस्थानीय एत स्पिन्सर्वमिति च । तस्माद् गृहादि -वत्स्वावयवसमुदाय जातीयव्यतिरि-क्तार्थं संहन्यत इत्येवमवगच्छाम । | स्तम्भकुडथतृणकाष्ठादिगृहाव-यवानां स्वात्मजन्मोपचयापचय -विनाशनामाकृतिकार्यधर्मनिरपे -तलब्धसत्तादितद्विषयं द्रष्टृश्रोतृ-मन्तृविज्ञात्रर्थत्वं दृष्ट्वा मन्यामहे, तत्सङ्घातस्य च — तथा प्राणाद्यव -यवानां तत्सङ्घातस्य च स्वात्म-जन्मोपचयापचय विनाशनामा-कृतिकार्यधर्मनिरपेक्षलब्ध सत्ता-दितद्विषयद्रष्टृश्रोतृमन्तृविज्ञात्र र्थत्वं भवितुमर्हतीति । देवताचेतनावस्वे समत्वाद् गुणभावानुपगम इति चेत् — | जिस प्रकार अरे और नेमि संहत हैं उसी प्रकार देह और प्राण मिले हुए हैं, एवं नाभिस्थानीय प्राण में सब इन्द्रियाँ समर्पित हैं [ – ऐसा भी कहा जा चुका है ] | अतः वह [ देहादिसंघात ] गृहादिके समान अपने अवयव समुदायको जातिवाले पदार्थोंसे भिन्न [ आत्मा ] के लिये संहत हुआ है - ऐसा हमें जान पड़ता है । गृह स्तम्भ, भित्ति, तृण एवं काष्ठादि अवयवों के जन्म, वृद्धि, क्षय, विनाश, नाम, आकृति और कार्य-रूप धर्मसे निरपेक्ष रहकर जिसने सत्ता और स्फूर्ति आदि प्राप्त की है, वही इन विषयोंका द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है तथा उसीके लिये इन स्तम्भ आदिकी और इनके संघातकी स्थिति है - यह देखकर हम ऐसा मानते हैं कि प्राणादि अवयव और उनका संघात भी उसीके लिये होने चाहिये जिसने इनके जन्म, वृद्धि, क्षय, विनाश, नाम, आकृति और कार्यरूप धर्मसे निरपेक्ष रहकर सत्ता आदि प्राप्त की हो और जो इन प्राणादि विषयों-का द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता भी हो पूर्व ॰ - प्राणदेवता चेतनावान् होने-| के कारण भोक्ता तुल्य ही है, इसलिये उसका गौणत्व ( अप्रधानत्व ) नहीं माना जा सकता । [ तात्पर्य यह है कि