बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 441–450
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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[ अध्याय २ अरे और नेमि संहत हैं देह और प्राण मिले नाभिस्थानीय प्राणमें समर्पित हैं [ - ऐसा चुका है ] | अत: वह त ] गृहादिके समान -समुदायकी जातिवाले न [ आत्मा ] के लिये है - ऐसा हमें जान म्भ, भित्ति, तृण एवं वजन्म, वृद्धि, क्षय, , आकृति और कार्य-निरपेक्ष रहकर जिसने कृति आदि प्राप्त की है, षयोंका द्रष्टा, श्रोता, ज्ञाता है तथा उसीके तम्भ आदिकी और की स्थिति है - यह ऐसा मानते हैं कि व और उनका संघात ये होने चाहिये जिसने वृद्धि, क्षय, विनाश, - और कार्यरूप धर्मसे र सत्ता आदि प्राप्त इन प्राणादि विषयों-T, मन्ता और विज्ञाता देिवता चेतनावान् होने-काके तुल्य ही है, इसलिये ( अप्रधानत्व ) नहीं [ तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३५ प्राणस्य विशिष्टैर्नामभिरामन्त्रण । दर्शनाच्चेतनावत्त्वमभ्युपगतम् । चेतनावत्वे च पारार्थ्योपगमः समत्वादनुपपन्न इति चेत् १ नः निरुपाधिकस्य केवलस्य चिजिज्ञापयिषितस्त्रांत । क्रिया-कारकफलात्मकता ह्यात्मनो नाम-रूपोपाधिजनिता विद्याध्यारो-पिता । तन्निमित्तो लोकस्य क्रिया-कारकफलाभिमान लक्षणः संसारः । स निरुपाधिकात्मस्वरूपविद्यया निवर्तयितव्य इति तत्स्वरूपविजि -ज्ञापयिषयोपनिषदारम्भः ‘ “ ब्रह्म ते ब्रवाणि ” ( बृ ० उ ० २ । १ । १ ) " नैतावता विदितं भवति " ( २ । १ । १४ ) इति चोपक्रम्य " एता-चदरे खल्वमृतत्वम् ” ( ४।५।१५ ) इति चोपसंहारात् । न चातो-ऽन्यदन्तराले विवक्षितमुक्तं प्राणका विशिष्ट नामोंद्वारा आम-न्त्रण देखे जानेसे उसका चेतनावान् होना माना गया है । अत: चेतना-वान् होनेपर भोक्ताके तुल्य ही होने-के कारण उसको परार्थं मानना उचित नहीं है - ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि यहाँ केवल निरुपाधिक आत्माका ही ज्ञान कराना अभीष्ट है । आत्माकी क्रिया, कारक एवं फल-रूपता तो नाम और रूपकी उपाधि-के कारण अविद्यासे आरोपित है । उसीके कारण पुरुषको क्रिया, कारक एवं फलाभिमानरूप संसारकी प्राप्ति हुई है । उसे निरुपाधिक आत्म-स्वरूपके ज्ञानसे निवृत्त करना है, इसलिये उसके स्वरूपका विज्ञान करानेकी इच्छासे ही इस उपनिषद्-का आरम्भ हुआ है; क्योंकि " मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ ", “ इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता " इस प्रकार आरम्भ करके “ अरे, निश्चय इतना ही अमृतत्व है ” इस प्रकार उपसंहार किया गया है । बीचमें भी इससे भिन्न कोई और विवक्षित पदार्थ नहीं बतलाया गया ।
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४३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ वास्ति । तस्मादनवसरः समत्वाद् गुणभावानुपगम इति चोद्यस्य । विशेषवतो हि सोपाधिकस्य संव्यवहारार्थो गुणगुणिभावः, न विपरीतस्य । निरूपाख्यो हि विजिज्ञापयिषितः सर्वस्याम्म्रुप-निषदि । “ स एष नेति नेति " ( ३ । ९ । २६ ) इत्युपसंहारात् । तस्मादादित्यादिब्रह्मस्य एते-भ्योऽविज्ञानमयेभ्यो विलक्षणो-ऽन्योऽस्ति विज्ञानमय इत्येत -त्सिद्धम् ॥ १५ ॥
| अत: ' तुल्य होनेके कारण इसका गुण भाव ( पदार्थत्व या अप्रधानत्व ) नहीं माना जा सकता ' – ऐसी शङ्का-के लिये यहाँ अवकाश नहीं है । विशेषतः सोपाधिकका ही सम्यक् व्यवहारके लिये गुणगुणिभाव ( शेष-शेषिभाव ) होता है, इससे विपरीत ( निरुपाधिक ) का नहीं । और समस्त उपनिषद् में निरुपाधिकका ही विज्ञान कराना अभीष्ट है, क्योंकि " वह यह कार्य नहीं है, कारण नहीं है " इस प्रकार उपसंहार किया गया है । अतः यह सिद्ध होता है कि इन अवि-ज्ञानमय आदित्यादि ब्रह्मोंसे विज्ञान-मय ब्रह्म भिन्न है ॥ १५ ॥
सुषुप्ति में विज्ञानमयकी स्थिति के विषय में अजातशत्रुका प्रश्न स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुतोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः कष तदाभूत्कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
उस अजातशत्रुने कहा, ' यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और यह कहाँसे आया? ' किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥ १६ ॥
स एवमजातशत्रुर्व्यतिरिक्ता- उस अजातशत्रुने इस प्रकार देह-त्मास्तित्वं प्रतिपाद्य गार्ग्यमुवाच - से व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व यत्र यस्मिन्काले एष विज्ञानमयः प्रतिपादन करके गार्ग्यसे कहा - ' जिस | समय यह विज्ञानमय पुरुष हाथसे
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[ अध्याय २ के कारण इसका गुण व या अप्रधानत्व ) सकता ' - ऐसी शङ्का-वकाश नहीं है । पाधिकका ही सम्यक् गुणगुणिभाव ( शेष-ता है, इससे विपरीत का नहीं । और समस्त पाधिकका ही विज्ञान है, क्योंकि " वह यह कारण नहीं है " इस
र किया गया है ।
ता है कि इन अवि-नादब्रह्मोंसे विज्ञान-है ॥ १५ ॥
ातशत्रुका प्रश्न तोऽभूद्य एष एतदागादिति रुष है, जब सोया किंतु गार्ग्य यह न त्रुने इस प्रकार देह-आत्माका अस्तित्व से कहा- ' जिस नमय पुरुष हाथसे ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३७ पुरुष एतत्स्वपनं सुप्तोऽभूत्प्रा- । क्पाणिपेषप्रतिबोधात्; विज्ञानं विज्ञायतेऽनेनेत्यन्तःकरणं बुद्धि-रुच्यते, तन्मयस्तत्प्रायो विज्ञान-मयः किं पुनस्तत्प्रायत्वम् १ तस्मि -न्नुपलभ्यत्वं तेन चोपलभ्यत्वमु-पलब्धृत्वं च; कथं पुनर्मयटोऽने-कार्थत्वे प्रायार्थतैवावगम्यते " स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मयोमयः ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । ५ ) इत्येवमादौ प्रायार्थ एव प्रयो-गदर्शनात्, परविज्ञानविकारत्व-स्याप्रसिद्धत्वात्, " य एष विज्ञान-मयः ” ( २ । १ । १६ ) इति १. यहाँ विज्ञानमय शब्दमें जो मयट् दवानेपर जागनेसे पूर्वं सोया हुआ था [ उस समय वह कहाँ था? ] ' जिससे विशेषरूपसे जाना जाता है उस अन्तःकरण यानी बुद्धिको ' विज्ञान ' कहते हैं; जो तन्मय अर्थात् तत्प्राय हो वह विज्ञानमय है । किंतु आत्माकी तत्त्रायता ( विज्ञानमयता ) क्या है? ' जो उस ( विज्ञान ) में प्राप्त होने योग्य है, अथवा जिसे उस ( विज्ञान ) के ही द्वारा प्राप्त किया जा सकता है तथा जो उपलब्धा ( साक्षी ) है, उसको ' तत्प्राय ' ( विज्ञानप्राय ) कहते हैं, उसका भाव तत्प्रायत्व है । किंतु ' मयट् ' प्रत्ययके अनेक अर्थ होनेपर भी यहाँ उसकी प्रायार्थता ही कैसे जानी जाती है? " वह यह आत्मा — ब्रह्म विज्ञानमय और मनोमय है " इत्यादि श्रुतियोंमें इसका प्राय: अर्थमें ही प्रयोग देखा जानेसे, परमात्मरूप विज्ञानका विकारत्व प्रसिद्ध न होनेसे | " जो यह विज्ञानमय है " इत्यादि प्रत्यय है, उसको विकारार्थंक मानकर विज्ञानमय शब्दका अर्थ कोई यह न समझ ले कि ' विज्ञान - परमात्मा के विकारभूत जीव ही विज्ञानमय हैं । ' इसके लिये भाष्यकार विज्ञानमयकी व्युत्पत्ति करते हैं । २. यहाँ यह शङ्का होती है आत्मा तो असङ्ग है, उसका बुद्धिसे सम्पर्क नहीं हो सकता; अतः आत्माको विज्ञानमय — अन्तःकरणमय बताना उचित नहीं है, - इस शङ्काको मिटानेके लिये तत्प्रायत्वका निरूपण करते हैं ।
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४३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ च प्रसिद्धवदनुवादाद् अवय-वोपमार्थयोश्वात्रासम्भवात् पारि-शेष्यात्प्रायार्थतैव । तस्मात्संक-न्पविकल्पाद्यात्मकमन्तःकरणं तन्मय इत्येतत् । पुरुषः पुरि शयनात् । कैष तदाभूदिति प्रश्नः स्वभा-व विजिज्ञापयिषया - प्राक्प्रतिबो-धात्क्रियाकारक फलविपरीतस्व-भाव आत्मेति कार्याभावेन दिद-र्शयिषितम्; न हि प्राक्प्रतिबोधा त्कर्मादिकार्य सुखादि किश्चन गृह्यते; तस्मादकर्मप्रयुक्तत्वात्त-था स्वाभाव्यमेत्मनोऽवगम्य-ते – यस्मिन्स्वाभाव्येऽभूत्, यतश्च स्वाभाव्यात्प्रच्युतः संसारी स्वभा-वविलक्षण इति - एतद्विवक्षया ene | श्रुतियोंमें ' यह ' इस प्रकार विज्ञान-मयका प्रसिद्धवत् अनुवाद करनेसे तथा [ जीव विज्ञानका अवयव या विज्ञानसदृश है— इस प्रकार ] अव-यव और उपमारूप अर्थ सम्भव न होनेसे परिशेषतः इसकी प्रायार्थता ही सिद्ध होती है । अतः संकल्प - विक-ल्पादिरूप अन्तःकरण विज्ञान है, तन्मय आत्मा है - ऐसा इसका भावार्थ है । पुरमें ( शरीररूप नगरमें ) शयन करनेके कारण वह ' पुरुष ' है । उस समय यह कहाँ था? -यह प्रश्न आत्माके स्वभाव ( स्वरूप ) का विशेषरूप से बोध करानेकी इच्छा-से हे — जागनेसे पहले आत्मा क्रिया-कारक- फलरूपतासे विपरीत स्वभाव-वाला है — यह उसके कार्याभावसे दिखाना अभीष्ट है; क्योंकि जागनेसे पहले कर्मादिका कार्य सुख आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता । अतः अकर्मप्रयुक्त होनेके कारण आत्माकी अकर्मस्वभावता ज्ञात होती है - जिस स्वभाववालेमें यह था और जिस स्वभाववालेसे च्युत होकर यह संसारी और भिन्नस्वभाव होता है-यह बताने की इच्छासे, जिसमें प्रतिभा-
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[ अध्याय २ ene ' इस प्रकार विज्ञान-वत् अनुवाद करने से विज्ञानका अवयव या - इस प्रकार ] अव-नारूप अर्थ सम्भव न तः इसकी प्रायार्थता है । अतः संकल्प - विक-= तःकरण विज्ञान है, है - ऐसा इसका पुरमें ( शरीररूप न करनेके कारण वह यह कहाँ था? -के स्वभाव ( स्वरूप ) बोध करानेकी इच्छा-. पहले आत्मा क्रिया-नासे विपरीत स्वभाव-उसके कार्याभावसे है; क्योंकि जागनेसे कार्य सुख आ नहीं किया जाता । युक्त होनेके कारण स्वभावता ज्ञात होती वाले में यह था और लेसे च्युत होकर यह स्वभाव होता है-छासे, जिसमें प्रतिभा-ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४३ ९ पृच्छति गार्ग्य प्रतिभानरहितं । बुद्धिव्युत्पादनाय । क्वैष तदाभूत्? कुत एतदा-गात् इत्येतदुभयं गार्ग्यणैव प्रष्ट-व्यमासीत्, तथापि गार्ग्यण न | पृष्टमिति नोदास्ते अजातशत्रुः, वोधयितव्य एवेति प्रवर्तते । ज्ञपयिष्याम्येवेति प्रतिज्ञातत्वात् । एवमसौ व्युत्पाद्यमानोऽपि गायों यत्रैष आत्माभूत्प्राक्प्रति-बोधाद् यतश्चैतदागमनमागात् तदुभयं न व्युत्पेदे वक्तुं वा प्रष्टुं वा गाय ह न मेने न ज्ञातवान् ॥ १६ ॥
की कमी जान पड़ती है, उस गार्ग्य-से उसकी बुद्धिको व्युत्पन्न ( सूक्ष्म विचार - शक्तिसे युक्त ) करनेके लिये राजा अजातशत्रु पूछता है । ' उस समय यह कहाँ था? और यह कहाँसे आया है ' ये दोनों प्रश्न गार्ग्यको ही पूछने चाहिये थे; किंतु गार्ग्यने इन्हें नहीं पूछा, इससे अजा-तशत्रुने उदासीन भाव धारण नहीं किया; अपितु यह निश्चय करके कि इसे बोध कराना ही है, वह स्वयं प्रवृत्त हो गया; क्योंकि उसने ' ala कराऊंगा ही ' ऐसी प्रतिज्ञा की थी । इस प्रकार सचेत करनेपर भी ' जहाँ यह आत्मा जागनेसे पहले था और जहाँसे इसने आगमन किया है ' इन दोनों बातोंको गार्ग्यं न समझ सका अर्थात् इन्हें बतलाने या पूछने-का उसे ज्ञान नहीं हुआ ॥ १६ ॥
विज्ञानात्माके शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञान-मादाय य एषोऽन्तहृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुगृ हीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥
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४४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय२ उस अजातशत्रुने कहा, ' यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब ह हुआ था, उस समय यह विज्ञानके द्वारा इन प्राणोंके विज्ञानको ग्रहण कर यह जो हृदयके भीतर आकाश है उसमें शयन करता है । यह उन विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुषका ' स्वपिति ' नाम होता है । उस समय प्राण गृहीत रहता है, वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है और मन भी गृहीत रहता है ' ॥ १७ ॥
स होवाचाजातशत्रुविक्षितार्थ- उस अजातशत्रुने विवक्षित अर्थ-समर्पणाय — यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य को समर्पण करनेके लिये कहा — यह जो विज्ञानमय पुरुष है; जिस समय एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदा- | यह सोया हुआ था उस समय यह भूत्? कुत एतदागात्? इति कहाँ था और कहाँसे यह आया है? -इस प्रकार जो हमने पूछा था उसका यदपृच्छाम, तच्छृणूच्यमानम्-- उत्तर दिया जाता है, सुनो-यत्रैप एतत् सुप्तोऽभूचचदा जिस समय यह सोया हुआ था, तस्मिन्काले एषांचागादीनां प्राणानां उस समय अन्तःकरणरूप उपाधिके विज्ञानेनान्तःकरणगताभिव्यक्ति- स्वभावसे जनित विज्ञानसे यानी विशेषविज्ञानेन उपाधिस्वभाव -जनितेन श्रादाय विज्ञानं वागा -दीनां स्वस्वविषयगत सामर्थ्य गृहीत्वा य एषोऽन्तर्मध्यहृदये हृदयस्याकाशः, य श्राकाशशब्देन पर एव स्व आत्मोच्यते, तस्मि न्स्वे आत्मन्याकाशे शेते स्वाभा -विकेऽसांसारिके । न केवल आकाश एव, श्रुत्यन्तरसामर्थ्यात् | अन्तःकरणगत अभिव्यक्ति ( आभास ) -विशेषरूप विज्ञानसे वागादिके विज्ञानको अर्थात् अपने - अपने विषयों-में उनके सामर्थ्यको ग्रहणकर यह जो मैं आकाश हृदयान्तर्गत — हृदयके मध्य-है, जो ' आकाश ' शब्दसे अपना परम आत्मा ही कहा गया है, उस स्वाभाविक असांसारिक स्वात्माकाशमें ही शयन करता है । " हे सौम्य! उस समय यह सत्को ही प्राप्त हो जाता है " इस अन्य श्रुतिकी सामर्थ्यसे
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[ अध्याय २ रुष है, जब यह सोया के विज्ञानको ग्रहण कर करता है । जिस समय इस पुरुषका ' स्वपिति ' वाक् गृहीत रहती है, मन भी गृहीत रहता तशत्रुने विवक्षित अर्थ-करनेके लिये कहा — यह पुरुष है; जिस समय था उस समय यह कहाँसे यह आया है? -- हमने पूछा था उसका आता है, सुनो-यह सोया हुआ था, तःकरणरूप उपाधिके नित विज्ञानसे यानी अभिव्यक्ति ( आभास ) -वज्ञानसे वागादिके त् अपने - अपने विषयों-र्थ्यको ग्रहणकर यह - हृदयके मध्य-जो ' आकाश ' शब्दसे नात्मा हो कहा गया विक असांसारिक ही शयन करता क्य! उस समय प्राप्त हो जाता श्रुतिकी सामथ्र्यसे ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४१ " सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति " ( छा ० उ ० ६ । ८ । १ ) इति । लिङ्गोपाधिसम्बन्धकृतं विशेषात्मस्वरूपमुत्सृज्य विशेषे स्वाभाविके आत्मन्येव केवले वर्तते इत्यभिप्रायः । यदा शरीरेन्द्रियाध्यक्षतामुत्सृ-जति, तदासौ स्वात्मनि वर्तत इति कथमवगम्यते? नामप्रसिद्धया । कासौ नामप्रसिद्धिः १ इत्याह - तानि चागादेर्विज्ञानानि यदा यस्मि न्काले गृह्णात्यादत्ते अथ तदा हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम -- एत -न्नामास्य पुरुषस्य तदा प्रसिद्धं भवति । गौणमेवास्य नाम भवंति स्वमेवात्मानमपीत्यपिगच्छतीति स्वपितीत्युच्यते । सत्यं स्वपितीतिनामप्रसिद्धया आत्मनः संसारधर्म विलक्षणं रूप-मवगम्यते, न त्वत्र युक्तिरस्ती-त्याशङ्क्याह – तत्तत्र स्वापकाले । केवल भूताकाशमें ही शयन नहीं करता । तात्पर्यं यह है कि लिङ्गो-पाधिके सम्बन्धसे होनेवाले अपने विशेष रूपको त्यागकर स्वाभाविक अविशेष शुद्ध आत्मामें ही विद्यमान रहता है । जिस समय यह शरीर और इन्द्रियोंकी अध्यक्षता छोड़ देता है, उस समय स्वात्मामें ही विद्यमान रहता है, यह कैसे जाना जाता है? नामकी प्रसिद्धिसे । वह नामकी प्रसिद्धि क्या है? सो श्रुति बतलाती है - जिस समय यह उन वागादिके विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय यह पुरुष ' स्वपिति ' नामवाला होता है— उस समय इस पुरुषका यही नाम प्रसिद्ध होता है । यह इसका गुणजनित ही नाम है । यह स्व अर्थात् आत्माको ही अपीति-अपिगच्छति अर्थात् प्राप्त हो जाता है, इसलिये ' स्वपिति ' ऐसा कहा जाता है । सचमुच, ' स्वपिति ' इस नामकी प्रसिद्धिसे तो आत्माका रूप सांसारिक धर्मोसे विलक्षण जान पड़ता है— परंतु इसमें कोई युक्ति नहीं है— ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है-उस समय उस सुषुप्ति - कालमें प्राण
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४४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ गृहीत एवं प्राणो भवति । प्राण इति । घ्राणेन्द्रियम्, वागादिप्रकरणात्; वागादिसम्बन्धे हि सति सदुपा- । धित्वादस्य संसारधर्मित्वं लक्ष्यते । चागादयश्चोपसंहृता एव तदा तेन । कथम् १ गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुगृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः । तस्मादुपसंहृतेषु वागादिषु क्रिया-कारकफलात्मताभावात्स्वात्मस्थ एवात्मा भवतीत्यवगम्यते ॥ १७ ॥ ।
गृहीत ही हो जाता है । यहाँ वागादिका प्रकरण होनेसे ' प्राण ' शब्दसे घ्राणेन्द्रिय समझना चाहिये; क्योंकि वागादिका सम्बन्ध होनेपर ही उनकी उपाधिसे युक्त होनेके कारण इसका संसारधर्मयुक्त होना देखा जाता है । उस समय उन वागादिका वह उपसंहार हो कर लेता है । किस प्रकार? उस समय वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है । और मन भी गृहीत रहता है अतः यह ज्ञात होता है कि वागादि इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर क्रिया, कारक और फल-रूपताका अभाव हो जानेसे आत्मा अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है || १७ || स्वप्नवृत्तिका स्वरूप ननु दर्शनलक्षणायां स्वप्नाव-स्थायां कार्यकरणवियोगेऽपि संसा-रधर्मित्वमस्य दृश्यते । यथा च जागरिते सुखी दुःखी बन्धु-वियुक्तः शोचति मुह्यते च तस्माच्छोकमोहधर्मवानेवायम् ॥ पूर्व ० - किंतु दर्शन रूपा स्वप्ना-वस्थामें तो शरीर और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर भी इसकी संसारधर्मंता देखी जाती है । जिस प्रकार यह जागरित - अवस्थामें होता है, उसी प्रकार स्वप्न में भी सुखी, दुःखी और बन्धुओंसे वियुक्त होता है तथा शोक करता और मोहित होता है; इसलिये यह शोक - मोहरूप धर्मोवाला ही है ।
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[ अध्याय २ हो जाता है । यहाँ करण होनेसे ' प्राण ' न्द्रिय समझना चाहिये; दिका सम्बन्ध होनेपर उपाधि युक्त होने के - संसारधर्मयुक्त होना है । उस समय उन उपसंहार ही कर प्रकार? उस समय रहती है, चक्षु गृहीत त्र गृहीत रहता है । भी गृहीत रहता है ज्ञात होता है कि दयोंका उपसंहार हो T, कारक और फल-व हो जानेसे आत्मा ही स्थित हो जाता -तु दर्शनरूपा स्वप्ना -रीर और इन्द्रियोंका भी इसकी संसारधर्मता । जिस प्रकार यह थामें होता है, उसी भी सुखी, दुःखी और त होता है तथा शोक हित होता है; इसलिये रूप धर्मोवाला ही है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४३ नास्य शोकमोहादयः सुखदुःखा- । दयश्च कार्यकरणसंयोगजनित-भ्रान्त्याध्यारोपिता इति । न; मृषात्वात् । इसके शोक - मोहादि तथा सुख-दुःखादि देह और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित नहीं हैं । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि स्वप्न मिथ्या होता है । स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकास्तदु-तेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेत्रोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान्गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्ते तैवमेवैष एतत्प्राणान्गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥
जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय इसके वे लोक ( कर्मफल ) उदित होते हैं । वहाँ भी यह महाराज होता है या महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची - नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है । जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर ( स्वाधीन कर ) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी शरीरमें यथेच्छ विचरता है ॥ १८ ॥
स प्रकृत आत्मा यत्र यस्मि -न्काले दर्शनलक्षणया स्वप्न्यया स्वप्नवृथा चरति वर्तते तदा हास्य लोकाः कर्मफलानि । के ते १ तत्तत्रोतापि महाराज इव भवति । सोऽयं महाराजत्वमिवास्य लोकः, न महाराजत्वमेव जाग-रित इव । तथा महाब्राह्मण इव, प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर वह प्रकृत आत्मा जिस समय दर्शनरूपा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है, उस समय उसके वे लोक — कर्मफल उदित होते हैं वे कौन? तब - उस अवस्थामें भी वह महाराज - सा हो जाता है । उसका वह लोक ( कर्म-फल ) महाराजत्वके समान होता है, जागरित अवस्थाकी तरह महाराजत्व हो नहीं होता । इसी प्रकार महा-। ब्राह्मणके समान होता है, अथवा
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४४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ उताप्युच्चावच मुच्चं च देवश्वाद्यवचं च तिर्यक्त्वादि, उच्चमिवावच -मिव च निगच्छति । मृषैव महा-राजत्वादयोऽस्य लोकाः, इव -शब्दप्रयोगाद् व्यभिचारदर्श-नाच्च । तस्मान्न बन्धुवियोगा-दिजनितशोकमोहादिभिः स्वप्ने सम्बध्यत एव । ननु च यथा जागरिते जाग्र-स्कालाव्यभिचारिणी लोकाः, एवं । स्वप्नेऽपि तेऽस्य महाराजत्वादयो । लोकाः स्वप्नकालभाविनः स्वप्न-कालाव्यभिचारिण आत्मभूता एव, न त्वविद्याध्यारोपिता इति । ननु च जाग्रत्कार्य करणात्मत्वं देवतात्मत्वं चाविद्याध्यारोपितं न . परमार्थत इति व्यतिरिक्तविज्ञान-मयात्मप्रदर्शनेन प्रदर्शितम् ॥ | ऊँची - नीची - ऊँची देवत्वादि और नीची तिर्यक्त्वादि, इस प्रकार ऊँची-नीचीके सदृश [ गतियों ] को प्राप्त होता है । किंतु इसके ये महाराज-त्वादि लोक मिथ्या ही हैं; क्योंकि इनके साथ ' इव ' शब्दका प्रयोग किया गया है और [ स्वप्नेतर अवस्थाओंमें ] इनका व्यभिचार ( त्याग ) भी देखा जाता है । इसलिये स्वप्नावस्था में बन्धुवियोगादिजनित शोक - मोहादिसे सम्बन्ध होता ही हो - ऐसी बात नहीं है । पूर्व ० - किंतु जिस प्रकार जागरित अवस्थाके कर्मफल जाग्रत्-| कालमें व्यभिचरित होनेवाले नहीं होते, उसी प्रकार वे स्वप्नकालमें होनेवाले कर्मफल स्वप्नकालमें अव्यभिचारी और आत्मस्वरूप ही होते हैं; वे अविद्यासे आरोपित नहीं होते । सिद्धान्ती - परंतु जाग्रत्कालका भी देहेन्द्रियात्मत्व और देवतात्मत्व अविद्यांसे आरोपित ही है, परमार्थतः नहीं है यह बात विज्ञानमय आत्माको प्राणादिव्यतिरिक्त प्रदर्शित करके दिखा दी गयी है । ऐसी