बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 451–460

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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[ अध्याय २ — ऊँची देवत्वादि और स्वादि, इस प्रकार ऊँची-[ गतियों ] को प्राप्त कंतु इसके ये महाराज-मिथ्या ही हैं; क्योंकि ' इव ' शब्दका प्रयोग है और [ स्वप्नेतर ] इनका व्यभिचार देखा जाता है । इसलिये में बन्धुवियोगादिजनित से सम्बन्ध होता ही नहीं है । तु जिस प्रकार स्थाके कर्मफल जाग्रत्-चरित होनेवाले नहीं कार वे स्वप्नकालमें कर्मफल स्वप्नकालमें और आत्मस्वरूप ही विद्यासे आरोपित नहीं - परंतु जाग्रत्कालका मत्व और देवतात्मत्व पित ही है, परमार्थतः बात विज्ञानमय बादिव्यतिरिक्त प्रदर्शित दी गयी है । ऐसी ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४५ तत्कथं दृष्टान्तत्वेन स्वप्नलोकस्य । मृत इवोज्जीविष्यन्प्रादुर्भविष्यति? सत्यम्, विज्ञानमये व्यतिरिक्त कार्यकरणदेवतात्मत्व प्रदर्शनम् अ-विद्याध्यारोपितम् - शुक्तिकायामिव रजतत्वदर्शनम् - इत्येतत्सिद्ध्यति व्यतिरिक्तात्मास्तित्वप्रदर्शनन्या-येनैव न तु तद्विशुद्धिपरतयैव न्याय उक्तः; इत्यन्नपि दृष्टान्तो जाग्रत्कार्यकरणदेवतात्मत्वदर्शन-लक्षणः पुनरुद्भाव्यते । सर्वो हि न्यायः किञ्चिद्विशेषमपेक्षमाणो-ऽपुनरुक्ती भवति । न तावत्स्वप्नेऽनुभृतमहाराज-त्वादयो लोका आत्मभूताः; आत्म-स्थितिमें वह ( जाग्रत्कर्मफल ) पुन-रुज्जीवित होनेवाले मृतकके समान स्वप्नगत कर्मफलका दृष्टान्त बननेके लिये किस प्रकार प्रादुर्भूत हो सकता है? पूर्व ० - ठीक है, आत्मा प्राणादि, व्यतिरिक्त है - यह प्रदर्शन करनेके लिये प्रयोग किये हुए न्यायसे ही विज्ञानमयके अतिरिक्त सिद्ध होनेपर कार्य - करण - देवतात्मप्रदर्शन शुक्तिमें रजतदर्शन के समान अविद्याध्या-रोपित है- यह सिद्ध हो जाता है; किंतु वह न्याय आत्माकी विशुद्धि सिद्ध करनेके लिये [ अर्थात् आत्मासे भिन्न अन्य सारा प्रपञ्च मिथ्या है-यह सिद्ध करनेके लिये ] ही नहीं कहा गया; इसलिये असत् होनेपर भी इस जाग्रत् कार्यं - करण - देवतात्म-रूप दृष्टान्तकी पुनः उद्भावना की जाती है । सभी न्याय कुछ विशे-षताकी अपेक्षा रखनेपर अपुनरुक्तः माने जाते है | सिद्धान्ती - किंतु स्वप्न में अनुभव होनेवाले महाराजत्वादि कर्मफल अपने स्वरूपसे हैं भी तो नहीं, १. अर्थात् यदि जाग्रत्कालिक कर्मफल स्वयं ही अविद्याध्यारोपित है तो उसके दृष्टान्तद्वारा स्वाप्न प्रपञ्चका सत्यत्व कैसे सिद्ध किया जा सकता है?

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४४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ नोऽन्यस्य जाग्रत्प्रतिविम्बभूतस्य । लोकस्य दर्शनात् । महाराज एव तावद्व्यस्त सुप्तासु प्रकृतिषु पर्यङ्के ` शयानःस्वप्नान्पश्यन्नुपसंहृत करणः पुनरुपगतप्रकृतिं महाराजमिवा-त्मानं जागरित इव पश्यति यात्रा -गतं भुञ्जानमिव च भोगान् । न च तस्य महाराजस्य पर्यङ्के शय-नाद् द्वितीयोऽन्यः प्रकृत्युपेतो विषये पर्यटन्नहनि लोके प्रसिद्धो ऽस्ति, यमसौ सुप्तः पश्यति । न चोपसंहतकरणस्य रूपादिमतो दर्शनमुपपद्यते । न च देहे देहा--न्तरस्य तत्तुल्यस्य सम्भवोऽस्ति, देहस्थस्यैव हि स्वप्नदर्शनम् । ननु पर्यङ्के शयानः पथि प्रवृत्त-मात्मानं पश्यति - न बहिः स्वप्ना-न्पश्यतीत्येतदाह - स महाराजो जानपदाञ्जनपदे भवान्राजोपकर -क्योंकि उस अवस्था में आत्मासे भिन्न जाग्रत्कालका प्रतिविम्बभूत कर्मफल देखा जाता है । उस समय जिसकी इन्द्रियाँ आत्मामें लीन रहती हैं, वह पलंगपर सोया हुआ महाराज ही, अन्य सब सेवकोंके जहाँ - तहाँ सोते रहनेपर स्वप्न देखता हुआ अपनेको जागरितअवस्था के समान पुनः सेवकादिसे युक्त महाराजके समान यात्रामें जाते हुए तथा भोग भोगते हुए देखता है । उस महाराजके पलंगपर शयन करनेवाले देह अतिरिक्त सेवकादिके सहित देशमें भ्रमण करनेवाला कोई अन्य देह दिन में नहीं देखा जाता, जिसे वह स्वप्नावस्था में देखता हो । तथा जिसकी इन्द्रियाँ लीन हो गयी हैं । ऐसे उस सुप्त शरीरको रूपादिमान् पदार्थों का दर्शन होना भी सम्भव नहीं है । देहके भीतर भी उसके समान किसी अन्य देहका होना सम्भव नहीं है और स्वप्नदर्शन देहस्थ जीवको ही होता है । मगर पलंगपर सोनेवाला देह ही तो अपनेको [ देहसे बाहर ] मार्गांमें चलता हुआ देखता है? ऐसी आशङ्का करके कहते हैं, नहीं; वह शरीरसे बाहर स्वप्न नहीं देखता-इसी विषय में श्रुतिका यह कथन है - वह महाराज जानपदों— जन-पद ( देश ) में रहनेवाले राजाके

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[ अध्याय २ -अवस्था में आत्मासे भिन्न प्रतिविम्बभूत कर्मफल है । उस समय जिसकी हमामें लीन रहती हैं, वह या हुआ महाराज ही, वकों के जहाँ - तहाँ सोते न देखता हुआ अपनेको वस्था के समान पुनः युक्त महाराजके समान चहुए तथा भोग भोगते • है । उस महाराजके न करनेवाले देहके सेवकादिके सहित देशमें नेवाला कोई अन्य देह = देखा जाता, जिसे वह में देखता हो । तथा न्द्रियाँ लीन हो गयी हैं । प्र शरीरको रूपादिमान् दर्शन होना भी सम्भव देहके भीतर भी उसके कसी अन्य देहका होना हृीं है और स्वप्नदर्शन को ही होता है । पलंगपर सोनेवाला देह अपनेको [ देहसे बाहर ] नता हुआ देखता है? ऐसी करके कहते हैं, नहीं; वह हर स्वप्न नहीं देखता -में श्रुतिका यह कथन महाराज जानपदों - जन-) में रहनेवाले राजाके ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ णभूतान्भृत्यानन्यांश्च गृहीत्वो-पादाय स्व आत्मीय एव जयादि-नोपार्जिते जनपदे यथाकामं यो यः कामोऽस्य यथाकाममिच्छातो यथा परिवर्तेतेत्यर्थः एवमेवैष विज्ञानमयः, एतदिति क्रिया-विशेषणम्, प्राणान्गृहीत्वा जागरि तस्थानेभ्य उपसंहृत्य स्वे शरीरे स्व एव देहे न बहिः यथाकामं परिवर्तते; कामकर्मम्यामुङ्गा-सिताः पूर्वानुभूतवस्तुसदृशीर्वा -सना अनुभवतीत्यर्थः । तस्मात्स्वप्ने मृषाध्यारोपिता एवात्मभूतत्वेन लोका विद्यमाना एव सन्तः, तथा जागरितेऽपि, इति प्रत्ये-तव्यम् । तस्माद्विशुद्धोऽक्रिया-कारक फलात्मको विज्ञानमय इत्ये-तत्सिद्धम् । यस्माद् दृश्यन्ते द्रष्टु-विषयभूताः क्रियाकारकफला-रमकाः कार्यकरणलक्षणा लोकाः, तथा स्वप्नेऽपि, तस्मादन्योऽसौ । ४४७ | परिकररूप सेवक तथा अन्य सबको लेकर अपने जयादिद्वारा प्राप्त किये देशमें जिस प्रकार यथाकाम — इस की जैसी जैसी इच्छा होती है उसके | अनुसार यथेच्छ विचरता है — ऐसा इसका तात्पर्य है; इसी प्रकार यह | विज्ञानमय प्राणोंको ग्रहणकर— जागरित विषयोंसे हटाकर स्वशरीर-में – अपने हो देहमें, बाहर नहीं, यथेच्छ विचरता है; अर्थात् काम और कर्मोंसे उद्भासित पूर्वानुभूत वस्तुओंके समान रूपवाली वास-नाओंका अनुभव करता है ॥ मूलमें ' एतत् ' शब्द क्रियाविशेषण है । अत: आत्मस्वरूपसे अविद्यमान ही होने-के कारण स्वप्नावस्थामें जो कर्म-फल होते हैं, वे मिथ्या ही हैं, इसी प्रकार जागरित - अवस्थामें भी वे मिथ्या हैं - ऐसा जानना चाहिये । इसलिये यह सिद्ध होता है कि जो क्रिया, कारक और फलस्वरूप नहीं है, वह विज्ञानमय विशुद्ध ही है । क्योंकि क्रिया, कारक एव फलरूप कार्यकरणात्मक लोक ( देहेन्द्रियसंघा-तरूप कर्मफल ) द्रष्टाके विषयभूत हो देखे जाते हैं और वैसे ही वे स्वप्नमें भी होते हैं । अतः इन स्वप्न और

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४४८ दृश्येभ्यः स्वप्नजागरितलोत्रेभ्यो | जागरितके दृश्यभूत कर्मफलोंसे विज्ञानमय द्रष्टा भिन्न और विशुद्ध द्रष्टा विज्ञानमयो विशुद्धः ॥ १८ ॥ । है ॥ १८ ॥

सुषुप्तिका दर्शनवृत्तौ स्वप्ने वासनाराशे - । ईश्यत्वादतद्धर्मतेति विशुद्धताव -गता आत्मनः । तत्र यथाकामं परिवर्तत इति कामवशात्परिवर्तन-मुक्तम् । द्रष्टुर्द्दश्यसम्बन्धश्चास्य स्वाभाविक इत्यशुद्धता शङ्क्यते; श्रतस्तद्विशुद्धयर्थमाह-स्वरूप स्वप्नदर्शनवृत्तिमें वासनाराशि · दृश्यरूप होनेके कारण अनात्मधर्म है, इससे आत्माकी विशुद्धता ज्ञात होती है । उस अवस्थामें वह यथेच्छ विचरता है - इस प्रकार उसका इच्छानुसार विचरना बतलाया गया । किंतु द्रष्टाका यह दृश्यसे सम्बन्ध स्वाभाविक है, इसलिये उसकी अशुद्धताको शङ्का की जाती है; अत: उसकी विशुद्धता सिद्ध करनेके लिये श्रुति कहती है-अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद. हिता नाम नाडयो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरी-ततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवस्तृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाति-घ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥ १६ ॥

इसके पश्चात् जब वह सुषुप्त होता है, जिस समय कि वह किसीके विषयमें - कुछ भी नहीं जानता, उस समय हिता नामकी जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदयसे सम्पूर्णं शरीर में व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ जाकर वह शरीरमें व्याप्त होकर शयन करता है । वह जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्दकी दुःखनाशिनी अवस्था-को प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ॥ १६ ॥

पृष्ठ 455

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[ अध्याय २ दृश्यभूत कर्मफलोंसे दष्ट भिन्न और विशुद्ध निवृत्तिमें वासनाराशि नेके कारण अनात्मधर्म है, की विशुद्धता ज्ञात होती अवस्थामें वह यथेच्छ है - इस प्रकार उसका विचरना बतलाया गया । का यह दृश्यसे सम्बन्ध है, इसलिये उसकी शङ्का की जाती है; अतः शुद्धता सिद्ध करनेके लिये ी है— न कस्यचन वेद. त्राणि हृदयापुरी-पुरीतति शेते स ब्राह्मणो वाति-तच्छेते ॥ १६ ॥

समय कि वह किसीके -नामकी जो बहत्तर हजार हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ | वह जिस प्रकार कोई बकी दुःखनाशिनी अवस्था-न करता है ॥ १६ ॥

ब्राह्मण ] शाङ्करभाष्यार्थ अथ यदा सुषुप्तो भवति - यदा स्वप्न्यया चरति, तदाप्ययं विशुद्ध एव । अथ पुनर्यदा हित्वा दर्शन-वृति स्वप्नं यदा यस्मिन्काले सुषुप्तः सुष्ठु सुप्तः सम्प्रसादं स्वा-भाव्यं गतो भवति - सलिलमिवा-न्यसम्बन्धकालुष्यं हित्वा स्वा -भाव्येन प्रसीदति । कदा सुषुप्तो भवति १ यदा यस्मिन्काले कस्यचन न किञ्चनेत्यर्थः, वेद विजानाति कस्यचन वा शब्दादेः सम्बन्धि वस्त्वन्तरं किश्चन न वेदेत्यध्याहार्यम्; पूर्वं तु न्याय्यम्, सुप्ते तु विशेषविज्ञानाभावस्य विवक्षितत्वात् । एवं तावद्विशेषविज्ञानाभावे सुषुप्तो भवतीत्युक्तम् । केन पुनः क्रमेण सुषुप्तो भवति इत्युच्यते-हिता नाम हिता इत्येवं नाग्न्यो वृ ० उ ० २६-४४ ९ ' अथ यदा सुप्तो भवति ' – जिस समय स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय भी यह विशुद्ध ही होता है । इसके पश्चात् जब दर्शन-वृत्तिरूप स्वप्नको त्याग कर जिस समय सुषुप्त – सम्यक् प्रकार से | सुप्त अर्थात् सम्प्रसाद – स्वाभाविक अवस्थाको प्राप्त हुआ होता है - जलके समान अन्य वस्तुके सम्बन्धसे प्राप्त हुई मलिनताको त्यागकर स्वभावतः प्रसन्न होता है । वह सुषुप्त कब होता है? – जिस समय वह किसीके विषयमें नहीं अर्थात् कुछ भी नहीं जानता, अथवा कस्य-चन - किसी शब्दादिके सम्बन्ध- ' वाली किसी अन्य वस्तुको नहीं जानता - ऐसा अध्याहार करना चाहिये । इनमें पहला अर्थं हो उचित है; क्योंकि यहाँ सोये हुए पुरुषके विशेष विज्ञानका अभाव बतलाना ही अभीष्ट है । इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि विशेष विज्ञानके अभावमें पुरुष सुषुप्त होता है । वह किस क्रमसे सुषुप्त होता है, सो अब बतलाया जाता है-हिता नाम - - " ' हिता ' इस नाम-वाली जो नाडियाँ अर्थात् अन्नके

पृष्ठ 456

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४५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ शिरा देहस्यान्नरसविपरि - | रसकी विपरिणामभूता देहकी शिराएं नाडयः सह- हैं । वे ' द्वासप्ततिः सहस्राणि ' – - दो णामभूताः, ताश्च द्वासप्ततिः स्त्राणि, द्वे सहस्रे अधिके सप्ततिश्च सहस्राणि ता द्वासप्ततिःसहस्राणि ", हृदयात् - हृदयं नाम मांसपिण्डः--तस्मान्मांसपिण्डात्पुण्डरीकाकारात् पुरीठतं हृदयपरिवेष्टनमाचक्षते,, तदुपलक्षितं शरीरमिह पुरीतच्छ-ब्देनाभिप्रेतम् - पुरीततमभिप्रति-ष्ठन्त इति शरीरं कृत्स्नं व्याप्नुव-त्योऽश्वत्थपर्णराजय इव बहिर्मुख्यः प्रवृत्ता इत्यर्थः । तत्र बुद्धेरन्तःकरणस्य हृदयं स्थानम्, तत्रस्थबुद्धितन्त्राणि चेत-राणि बाह्यानि करणानि । तेन सहस्र अधिक सत्तर सहस्र अर्थात् बहत्तर सहस्र हैं, वे हृदयसे हृदय नामका जो कमलके - से आकारवाला मांसपिण्ड है, उससे ' पुरीततम् ' -पुरोतत् हृदयपरिवेष्टनको कहते हैं, यहाँ उससे उपलक्षित शरीर पुरीतत् शब्दसे अभिप्रेत है । अतः पुरीततम-भिप्रतिष्ठन्ते ' अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करती हुई बहिर्मुख होकर प्रवृत्त हैं, जैसे पीपल के पत्तेकी नसें बाहरकी ओर फैली रहती हैं । शरीरमें बुद्धि - अन्तःकरणका हृदय स्थान है, उसमें स्थित बुद्धिके अधीन अन्य बाह्य इन्द्रियाँ हैं । इसीसे बुद्धि कर्मवश श्रोत्रादि इन्द्रियों-बुद्धिः कर्मवशाच्छ्रोत्रादीनि ताभि- को मत्स्यजालके समान उन नाडियों-र्नाडीभिर्मत्स्य जालवत्कर्णशष्कुन्या- द्वारा कर्णरन्ध्रादि स्थानोंसे बाहर फैलाती है, तथा उन्हें फैलाकर दिस्थानेभ्यः प्रसारयति, प्रसार्य जागरित अवस्था में उनकी अध्यक्ष चाधितिष्ठति जागरितकाले । तां होकर स्थित रहती है । उस बुद्धिको विज्ञानमयोऽभिव्यक्तस्वात्म चैत- विज्ञानमय आत्मा अभिव्यक्तस्वात्म-न्यावभासतया व्याप्नोति चैतन्यप्रक।शरूपसे व्याप्त कर लेता सङ्कोचनकाले च तस्या अनुसङ्कु है, तथा संकुचित होनेके समय उसी-चति सोऽस्य विज्ञानमयस्य के साथ संकुचित हो जाता है; वही स्वापः इस विज्ञानमयका सोना है और जाग्रद्विकासानुभवो भोगः; जाग्रत्कालिक विकासका अनुभव

पृष्ठ 457

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[ अध्याय २ रिणामभूता देहकी शिराएं सप्ततिः सहस्राणि ' - दो कि सत्तर सहस्र अर्थात् हस्र हैं, वे हृदयसे - हृदय कमलके - से आकारवाला है, उससे ' पुरीततम् ' -दयपरिवेष्टनको कहते हैं, उपलक्षित शरीर पुरीतत् भिप्रेत है । अतः पुरीततम-ति ' अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको रती हुई बहिर्मुख होकर जैसे पीपल के पत्तेकी नसें ओर फैली रहती हैं । रमें बुद्धि - अन्तःकरणका न है, उसमें स्थित बुद्धिके अन्य बाह्य इन्द्रियां हैं । द्ध कर्मवश श्रोत्रादि इन्द्रियों-जालके समान उन नाडियों-गरन्ध्रादि स्थानोंसे बाहर है, तथा उन्हें फैलाकर -अवस्था में उनकी अध्यक्ष स्थत रहती हैं । उस बुद्धिको नय आत्मा अभिव्यक्तस्वात्म-काशरूपसे व्याप्त कर लेता संकुचित होने के समय उसी-' संकुचित हो जाता है; वही ज्ञानमयका सोना है और लिक विकासका अनुभव ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१ बुद्धयुपाधिस्वभावानुविधायी हि | इसका भोग है; जिस प्रकार चन्द्रादिका प्रतिविम्ब [ अपने आधार-सः, चन्द्रादिप्रतिविम्ब इव जलाद्य- भूत ] जलादिका अनुवर्तन करने-नुविधायी । तस्मात्तस्या बुद्धेर्जाग्र-द्विषयायास्ताभिर्नाडीभिः प्रत्यव -सर्पणमनु प्रत्यवसृप्य पुरीतति | शरीरे शेते तिष्ठति, तप्तमिव लोह - । पिण्डमविशेषेण संव्याप्याग्निव-च्छरीरं संव्याप्य वर्तत इत्यर्थः । स्वाभाविक एव स्वात्मनि वर्तमानोऽपि कर्मानुगतबुद्धधनु-वृत्तित्वात्पुरीत ति शेत इत्युच्यते । न हि सुषुप्तिकाले शरीरसम्ब । न्धोऽस्ति । " तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छो कान्हृदयस्य " ( ४ । । ३ । २२ ) इति हि वक्ष्यति । । सर्वसंसारदुःखवियुक्ता इय-मवस्थेत्यत्र दृष्टान्तः- स यथा । १. अर्थात् उसकी किसी स्थान विशेषमें संकोचके साथ उसका भी संकोच हो जाता शुद्धस्वरूपमें स्थित रहता है । वाला होता है, उसी प्रकार वह बुद्धिरूप अपनी उपाधिके स्वभावका ही अनुवर्ती है । अत: उस जाग्रद्विष-यिणी बुद्धिके व्यावर्तन ( लौटने ) के साथ - साथ वह उन नाड़ियोंद्वारा व्यावृत्त होकर पुरीतत्में - शरीरमें शयन करता - स्थित होता है, तात्पर्य यह है कि तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निके समान वह सामान्यरूपसे शरीरमें व्याप्त होकर स्थित होता है । वह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें ही विद्यमान रहते हुए भी कर्मानु-सारिणी बुद्धिका अनुवर्ती होनेके कारण ' शरीरमें शयन करता है ' इस प्रकार कहा जाता है । सुषुप्ति-कालमें उसका शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता । " उस समय वह् हृदय-के सारे शोकोंको पार कर लेता है " ऐसा श्रुति कहेगी भी । यह अवस्था संसारके सारे दुःखों-से रहित है - इस विषय में यह दृष्टान्त दिया जाता है — वह जिस विशेष अभिव्यक्ति नहीं रहती, बुद्धि है; केवल सामान्य सत्तामात्रसे अपने

पृष्ठ 458

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४५२ कुमारो वा अत्यन्तबालो वा, महा- । राजो वात्यन्तवश्यप्रकृतिर्यथोक्त-कृत्, महाब्राह्मणो वा अत्यन्त-परिपक्वविद्याविनयसम्पन्नः, अति -घ्नीम् - अतिशयेन दुःखं हन्तीत्य-तिघ्नी श्रानन्दस्यावस्था सुखा-वस्था तां प्राप्य गत्वा शयीता- । वतिष्ठेत । एषां च कुमारादीनां स्वभाव-स्थानां सुखं निरतिशयं प्रसिद्ध लोके, विक्रियमाणानां हि तेषां दुःखं न स्वभावतः; तेन तेषां स्था-भाविक्यवस्था दृष्टान्तत्वेनोपादी-यते प्रसिद्धत्वात् । न तेषां स्वाप एवाभिप्रेतः, स्वापस्य दाष्टन्ति-कत्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषाभा-वाच्च । विशेषे हि सति दृष्टान्त-दान्तिक प्रकार कुमार - अत्यन्त छोटा बालक, अथवा जिसकी प्रजा अत्यन्त वशमें की हुई है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त आचरण करनेवाला महाराज, अथवा अत्यन्त परिपक्क विद्या विनय-सम्पन्न महाब्राह्मण ' अतिघ्नीस्’– जो अतिशयरूपसे दुःखका घात कर | देती है ऐसी जो अतिघ्नी आनन्दकी अवस्था यानी सुखावस्था है, उसको प्राप्त होकर शयन करे अर्थात् स्थित हो । अपने स्वभावमें स्थित इन कुमारादिका सुख लोकमें सबसे बढ़-कर प्रसिद्ध है, उन्हें विकृत होनेपर ही दुःख होता है, स्वभावत: नहीं; अतः प्रसिद्ध होने के कारण उनकी स्वाभाविक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया जाता है । यहाँ केवल उनकी सुषुप्तावस्था से ही अभिप्राय नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था दाष्टन्तिकरूपसे ही ग्रहण की गयी है, इसलिये फिर तो दृष्टान्त और दान्तिकमें कोई विशेषता ही नहीं रहेगी | और दृष्टान्त - दाष्टन्तिकका भेद किसी विशेषताके रहनेपर ही मेदः स्यात्; तस्मान्न हो सकता है; इसलिये यहाँ उनकी तेषां स्वापो दृष्टान्तः । सुषुप्ति दृष्टान्त नहीं है ।

पृष्ठ 459

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[ अध्याय २ - अत्यन्त छोटा बालक, सकी प्रजा अत्यन्त वशमें है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त करनेवाला महाराज, व्यन्त परिपक्क विद्या विनय-हाब्राह्मण ' अतिघ्नीम् ' --यरूपसे दुःखका घात कर ती जो अतिघ्नी आनन्दकी नी सुखावस्था है, उसको र शयन करे अर्थात् स्थित स्वभावमें स्थित इन का सुख लोकमें सबसे बढ़-द्ध है, उन्हें विकृत होनेपर होता है, स्वभावत: नहीं; सद्ध होनेके कारण उनकी वक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे या जाता है । यहाँ केवल तुषुप्तावस्थासे ही अभिप्राय क्योंकि सुषुप्तावस्था करूपसे ही. ग्रहण की गयी लये फिर तो दृष्टान्त और कमें कोई विशेषता ही नहीं और दृष्टान्त - दाष्टन्तिकका सी विशेषताके रहनेपर ही ता है; इसलिये यहाँ उनकी दृष्टान्त नहीं है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ एवमेव यथायं दृष्टान्तः, एष विज्ञानमय एतच्छयनं शेते इति, एतच्छन्दः क्रियाविशेषणार्थः । एवमयं स्वाभाविके स्वे आत्मनि सर्वसंसारधर्मातीतो वर्तते स्वाप-काल इति ॥ १ ९ ॥ क्वैष तदाभूदित्यस्य प्रश्नस्य कुत एतदागा - प्रतिवचनमुक्तम् । दिति प्रश्नो अनेन च प्रश्ननिर्ण-मीमांस्यते येन विज्ञानमयस्य । स्वभावतो विशुद्धिरसंसारित्वं । चोक्तम् । कुत एतद्ागात् १ इत्यस्य प्रश्नस्यापाकरणार्थ प्रारम्भः । ननु यस्मिन्ग्रामे नगरे वा यो भवति सोऽन्यत्र गच्छंस्तत एव ग्रामान्नगराद्वा गच्छति नान्यतः तथा सति क्वैष तदाभूदित्येतावा-नेवास्तु प्रश्नः । यत्राभूत्तत एवा-गमनं प्रसिद्धं स्यान्नान्यत इति | कुत एतदागादिति प्रश्नो निरर्थक एव । किं श्रुतिरुपालभ्यते भवता? न । ४५३ इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह विज्ञानमय ' एतत् शेते ' – इस शयनमें सोता है । यहाँ ' एतत् ' शब्द क्रियाविशेषणार्थंक है । अर्थात् इस प्रकार सुषुप्तावस्थामें ं यह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सारे सांसारिक धर्मोसे अतीत होकर विद्यमान रहता है ॥ १६ ॥

' उस समय यह कहाँ था? ' इस प्रश्नका उत्तर कह दिया गया । इस प्रश्नके निर्णय से ही विज्ञानमय आत्माकी स्वभावतः विशुद्धि और असंसारिता भी बतला दी गयो । अब ' यह कहाँसे आया? ' इस प्रश्न-के निराकरणके लिये आरम्भ किया जाता है | पूर्व ० - जो पुरुष जिस ग्राम या नगरमें रहता है, वह अन्यत्र जाते समय उसी ग्राम या नगरसे जाता है, किसी अन्य स्थानसे नहीं । ऐसी स्थितिमें ' उस समय यह कहाँ था? ' बस, इतना ही प्रश्न हो सकता है । जहाँ वह था, वहींसे उसका आग़-मन प्रसिद्ध होगा, अन्य स्थानसे नहीं । इसलिये ' यह कहाँसे आया? ' यह प्रश्न निरर्थक ही है । सिद्धान्ती - क्या आप श्रुतिको उलाहना देते हैं? पूर्व०- नहीं ।

पृष्ठ 460

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४५४ सिद्धान्ती - तो फिर क्या बात है? किं तर्हि? पूर्व ० - मैं दूसरे प्रश्नका कोई द्वितीयस्य प्रश्नस्यार्थान्तरं और अर्थ सुनना चाहता हूँ, इसी श्रोतुमिच्छाम्यत अनर्थक्यं चोद- लिये इसकी व्यर्थताकी शङ्का करता यामि । हूँ । एवं तहिं कुत इत्यपादानार्थता न गृह्यते; अपादानार्थत्वे हि पुनरुक्तता, नाम्यार्थत्वे ॥ अस्तु तर्हि निमित्तार्थः प्रश्नः – कुत । एतदागात् किन्निमित्तमिहा-गमनम्? इति । न निमित्तार्थतापि, प्रतिवचन-वैरूप्यात् । आत्मनश्च सर्वस्य जग तोऽग्निविस्फुलिङ्गादिवदुत्पत्तिः प्रतिवचने श्रूयते । न हि विस्फु-लिङ्गानां विद्रवणेऽग्निर्निमित्तम-पादानमेव तु सः । तथा परमात्मा विज्ञानमयस्यात्मनोऽपादानत्वेन श्रूयते'अस्मादात्मनः ' इत्येतस्मि-न्वाक्ये । तस्मात्प्रतिवचनवैलो-म्यात्कुत इति प्रश्नस्य निमित्ता-र्थता न शक्यते वर्णयितुम् । एकदेशी - अच्छा, तो फिर ' कुतः ' इस शब्दकी [ ' कहाँसे ' - इस प्रकार ] अपादानार्थंता ग्रहण नहीं की जाती; क्योंकि अपादानार्थता ग्रहण करने-पर ही पुनरुक्तिका दोष होता है, कोई अन्य अर्थं लेनेपर नहीं । अच्छा तो, इस प्रश्नको निमित्तार्थक माना जाय । अर्थात् ' कुत एतत् आगात्'-किस निमित्त से इसका यहाँ आना हुआ? सिद्धान्ती - इसकी निमित्तार्थता भी नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा मानने से इसका उत्तरसे विरोध होगा । उत्तर में अग्निसे विस्फुलि -ङ्गादिके समान आत्मासे ही जगत्की उत्पत्ति सुनी जाती है । विस्फुलिङ्गों ( चिनगारियों ) के फैलनेमें अग्नि निमित्त नहीं है, वह तो अपादान ही है । इसी प्रकार ' इस आत्मासे ’ इस वाक्यमें परमात्मा विज्ञानमय आत्माके अपादानरूपसे सुना जाता है । अत: उत्तरसे विरोध आनेके कारण ' कुतः ' इस प्रश्नकी निमि त्तार्थता वर्णन नहीं की जा सकती ।