बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 461–470
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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[ अध्याय २ ती - तो फिर क्या बात है? -मैं दूसरे प्रश्नका कोई सुनना चाहता हूँ, इसी व्यर्थता की शङ्का करता - अच्छा, तो फिर ' कुतः ’ की [ ' कहाँसे ' - इस प्रकार ] र्थता ग्रहण नहीं की जाती; पादानार्थता ग्रहण करने-पुनरुक्तिका दोष होता है, अर्थ लेनेपर नहीं । अच्छा प्रश्नको निमित्तार्थक माना र्थात् ' कुत एतत् आगात्'-मित्तसे इसका यहाँ आना दान्ती - इसकी निमित्तार्थता हो सकती, क्योंकि ऐसा इसका उत्तरसे विरोध उत्तर में अग्नि से विस्फुलि-समान आत्मासे ही जगत् की सुनी जाती है । विस्फुलिङ्गों गारियों ) के फैलने में अग्नि नहीं है, वह तो अपादान इसी प्रकार ' इस आत्मासे ' क्यमें परमात्मा विज्ञानमय के अपादानरूपसे सुना जाता तः उत्तरसे विरोध आनेके ' कुतः ' इस प्रश्नकी निमि-ना वर्णन नहीं की जा सकती । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५५ नन्वपादानपक्षेऽपि पुनरुक्तता- पूर्व ० - किंतु अपादान - पक्षको स्वीकार करनेपर भी पुनरुक्तताका दोषः स्थित एव । दोष तो खड़ा ही रहता है । नैष दोषः, प्रश्नाभ्याम् आत्मनि सिद्धान्ती - यह कोई दोष नहीं क्रियाकार कफलात्मतापोहस्य विव- है; क्योंकि इन प्रश्नोंसे आत्मामें चितत्वात् । इह हि विद्याविद्या-विषयावुपन्यस्तौ ॥ “ आत्मेत्येवो -पासीत " ( १ । ४ । ७ ) “ IIII-त्मानमेवावेत् ” ( १ । ४ । १० ) " आत्मानमेव लोकमुपासीत " ( १ । ४ । १५ ) इति विद्या-विषयः । तथा अविद्याविषयश्च पाङ्क्त कर्म तत्फलं चान्नत्रयं नामरूपकर्मात्मकमिति । तत्रा -विद्याविषये वक्तव्यं सर्वमुक्तम् । विद्याविषयस्त्वात्मा केवल उपन्य-स्तो न निर्णीतः । तन्निर्णयाय ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' ( २ । १ । १ ) इति प्रक्रान्तं ' ज्ञपयिष्यामि ' । ( २ । १ । १५ ) इति च । अत -स्तद्ब्रह्म विद्याविषयभूतं ज्ञापयि-तव्यं याथात्म्यतः । तस्य च याथात्म्यं क्रियाकारकफलभेद-शून्य मत्यन्त विशुद्धमद्वैतमित्येत-क्रिया- कारक- फलात्मताकी निवृत्ति प्रतिपादन करनी अभीष्ट है ॥ यहाँ विद्या और अविद्या दोनोंहोके विषयोंका वर्णन किया गया है । “ आत्मा है - इस प्रकार उपासना करे " " आत्माहीको जाना ” “ आत्म-लोककी ही उपासना करे ” यह विद्याका विषय है । तथा पाङ्क्ङ्ककर्म और उसका फल नामरूप - कर्मात्मक अन्नत्रय — यह अविद्याका विषय है । इनमें अविद्याके विष में तो जो कुछ कहना था वह सब कह दिया, विद्याके विषय आत्माका तो केवल उल्लेख किया है, उसका निर्णय नहीं किया । उसका निर्णय करनेके लिये ही ' मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँगा ' इस प्रकार तथा ' ज्ञान कराऊँगा ' इस प्रकार प्रक-रण उठाया है । अतः विद्याके विषयभूत उस ब्रह्मका यथार्थं रीतिसे ज्ञान कराना है । उसका यथार्थ स्वरूप क्रिया कारक- फलरूप भेदसे रहित, अत्यन्त विशुद्ध और अद्वैत है - यह बतलाना अभीष्ट है ।
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४५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ द्विवक्षितम् । अतस्तदनुरूपौ । प्रश्नावुत्थाप्येते श्रुत्या ' क्वैष तदा-भूत् ' ' कुत एतदागात् ' इति । तत्र यत्र भवति तदधिकरणं यद्भवति तदधिकर्तव्यम्, तयोश्चा-धिकरणाधिकर्तव्ययोर्भेदो दृष्टो लोके । तथा यत आगच्छति तदपादानं य आगच्छति स कर्ता तस्मादन्यो दृष्टः । तथा आत्मा क्वाप्यभूदन्यस्मिन्नन्यः कुतश्चिदा गादन्यस्मादन्यः केनचिद्भिन्नेन साधनान्तरेणेत्येवं लोकवत्प्राप्ता बुद्धिः । सा प्रतिवचमेन निवर्त-यितव्येति । नायमात्मा अन्यो-ऽन्यत्राभूदन्यो वा अन्यस्मादागतः साधनान्तरं वा श्रात्मन्यस्ति । किं तर्हि? स्वात्मन्येवाभूत् " स्त्रम् इसलिये उसके अनुरूप ही श्रुति ' उस समय यह कहाँ था? ' और ' यह कहाँसे आया? ' – इन दो प्रश्नों को उठाती है । उनमें, जहाँ रहता है वह अधि-करण होता है और जो रहता है वह अधिकर्तव्य होता है । लोकमें उन अधिकरण और अधिकर्तव्योंका भेद देखा गया है । इसी प्रकार जहाँ से आता है वह अपादान होता है और जो आता है वह कर्ता उससे भिन्न देखा जाता है । इस प्रकार आत्मा किसी अन्यमें उससे भिन्न-रूपमें था और किसी अन्यस्थान से उससे भिन्न रूपसे ही किसी भिन्न साधनान्तरके द्वारा आया है— इस प्रकार लोकवत् ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है । इसका उत्तर देकर निराकरण करना है । [ अर्थात् यह बतलाना है कि ] यह आत्ना न तो अन्यरूपसे किसी अन्यस्थान-में अथवा न यह अन्यरूपसे अन्यके पाससे आया है और न आत्मामें कोई अन्य साधन ही है । तो फिर ( आत्मानम् ) अपीतो भवति ' ( छा ० क्या बात है? - यह अपने स्वरूपमें उ ० ६।८।१ ) " सता सोम्य तदा ही था; जैसा कि " स्वात्माको प्राप्त हो जाता है ", " हे सोम्य! उस समय सम्पन्नो भवति " ( छा ० उ ० ६ | यह सत्से सम्पन्न ( संयुक्त ) हो जाता
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[ अध्याय २ उसके अनुरूप ही श्रुति - यह कहाँ था? ' और से आया? ' – इन दो ठाती है । - जहाँ रहता है वह अधि-ता है और जो रहता है कर्तव्य होता है । लोकमें करण और अधिकर्तव्योंका गया है । इसी प्रकार ता है वह अपादान होता आता है वह कर्ता उससे I जाता है । इस प्रकार सी अन्यमें उससे भिन्न-और किसी अन्यस्थानसे न रूपसे ही किसी भिन्न रके द्वारा आया है-र लोकवत् ऐसी बुद्धि प्राप्त । इसका उत्तर देकर करना है । [ अर्थात् है कि ] यह आत्मा यरूपसे किसी अन्यस्थान-न यह अन्यरूपसे अन्यके आया है और न आत्मामें साधन ही है । तो फिर है? — यह अपने स्वरूपमें जैसा कि " स्वात्माको प्राप्त हे ", " हे सोम्य! उस समय सम्पन्न ( संयुक्त ) हो जाता ब्राह्मण १ ] शाङ्करभा ४५७ ( ८ । १ ) " प्राज्ञेनात्मना सम्प रिष्वक्तः ' ( बृ ० उ ० ४ । ३ । २१ ) " पर श्रात्मनि सम्प्रतिष्ठते " ( प्र ० उ ० ४ । ७ ) इत्यादि श्रुतिभ्यः । अत एव नान्यो-ऽन्यस्मादागच्छति । तच्छ्रुत्यैव प्रदर्श्यते ' अस्मादात्मनः ' इति । श्रात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरा-भावात् । नन्वस्ति प्राणाद्यात्मव्यति-रिक्तं वस्त्वन्तरम् । न, प्राणादेस्तत एव निष्पत्तेः । तत्कथम् १ इत्युच्यते, तत्र दृष्टान्तः- -| है ", " प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे | आलिङ्गित रहता है ", " परमात्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हो जाता है " इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । अतः अन्य आत्मा किसी अन्यके पाससे नहीं आता । यह बात ' इस आत्मासे ' इत्यादि रूपसे श्रुति ही प्रदर्शित करती है; क्योंकि आत्मासे भिन्न वस्तुकी तो सत्ता ही नहीं है । पूर्व ० - आत्मासे भिन्न प्राणादि वस्तुएँ हैं तो? सिद्धान्ती - नहीं, क्योंकि प्राणादि-की निष्पत्ति तो उसीसे होती है । पूर्व ० -सो किस प्रकार? सिद्धान्ती - बतलाते हैं, उसमें यह दृष्टान्त है— आत्मासे जगत् की उत्पत्ति में ऊर्णनाभि और अग्नि-विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फु-लिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्यो-पनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥
जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि ( मकड़ा ) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं । ' सत्यका सत्य ' यह उस आत्माकी उपनिषद्
है । प्राण ही सत्य है । उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥
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४५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ स यथा लोक ऊर्णनाभिः । ऊर्णनाभिताकीट एक एव प्रसिद्धः सन्स्वात्माप्रविभक्तेन तन्तुनोच्चरेदुद्गच्छेत् । न चास्ति तस्योद्गमने स्वतोऽतिरिक्त कार-कान्तरम् । यथा चैकरूपादेकस्मा दन: क्षुद्रा अल्पा विस्फुलिङ्गाखुट -योऽग्न्यवयवा व्युच्चरन्ति विविध नाना वोचरन्ति । यथेमौ दृष्टान्तों । कारक वेदाभावेऽपि प्रवृत्ति दर्श-यतः प्राक्प्रवृत्तेश्च स्वभावत एकत्वम्, एवमेवास्मादात्मनो विज्ञानमयस्य प्राक्प्रतिबोधाद्य -त्स्वरूपं तस्मादित्यर्थः । सर्वे प्राणा वागादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वाणि कर्मफलानि, सर्वे देवाः । प्राणलोकाधिष्ठातारोऽग्न्यादयः, सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बप -र्यन्तानि प्राणिजातानि, सर्व सर्वत एव आत्मान इत्यस्मिन्पाठ उपाधि-सम्पर्कजनितप्रबुध्यमानविशेषा-त्मान इत्यर्थः, व्युच्चरन्ति । लोकमें जिस प्रकार वह ऊर्ण-नाभि - जो लूताकीट ( जाल बनाने-वाला कीड़ा ) प्रसिद्ध है वह अकेला ही अपनेसे सर्वथा भेद न रखनेवाले तन्तुओंद्वारा ऊपर की ओर जाता है; उसके ऊपर जानेमें अपनेसे भिन्न कोई अन्य साधन नहीं है । तथा जिस प्रकार एकरूप अर्थात् एक ही अग्निसे क्षुद्र - अल्प विस्फुलिङ्ग - चिन-गारियाँ यानी अग्निकण विविध— नानाउड़ते हैं । जिस प्रकार ये दोनों दृष्टान्त कारकभेद न होनेपर भी प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं और प्रवृत्ति-से पूर्व स्वरूपतः एकत्व दिखलाते हैं, इसी प्रकार इस आत्मासे अर्थात् बोध होनेसे पूर्व इस विज्ञानमय आत्माका जो स्वरूप है, उससे वागादि समस्त प्राण, भूर्लोकादि समस्त लोक यानी सम्पूर्ण कर्मफल, प्राण और लोकोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि समस्त देवगण और समस्त भूत अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणिसमुदाय [ इस आत्मासे ] विविधरूपसे उत्पन्न होते हैं । जहाँ ' सर्वे एते आत्मानः ' ऐसा पाठ है, वहाँ ' उपाधिसंसर्गके कारण जिनका विशेष रूप जाना जाता है, वे अनेक आत्मा ( जीव ) उत्पन्न होते हैं ' - ऐसा अर्थ करना चाहिये । १. माध्यन्दिन - शाखाकी श्रुति में ऐसा पाठ है ।
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[ श्रध्याय २ BALAL जिस प्रकार वह ऊर्णं-- लूताकीट ( जाल बनाने-ब ) प्रसिद्ध है वह अकेला सर्वथा भेद न रखनेवाले - ऊपरकी ओर जाता पर जानेमें अपने से भिन्न साधन नहीं है । तथा - एकरूप अर्थात् एक ही -- अल्प विस्फुलिङ्ग - चिन-नी अग्निकण विविध-हैं । जिस प्रकार ये दोनों रकभेद न होनेपर भी शित करते हैं और प्रवृत्ति-रूपतः एकत्व दिखलाते र इस आत्मासे अर्थात् न पूर्व इस विज्ञानमय जो स्वरूप है, उससे मस्त प्राण, भूर्लोकादि - यानी सम्पूर्ण कर्मफल, लोकोंके अधिष्ठाता द समस्त देवगण और अर्थात् ब्रह्मासे लेकर समस्त प्राणिसमुदाय से ] विविधरूपसे उत्पन्न हाँ ' सर्वे ते आत्मानः ' , वहाँ ‘ उपाधिसंसर्गके का विशेष रूप जाना जाता आत्मा ( जीव ) उत्पन्न अर्थ करना चाहिये । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४ ९ यस्मादात्मनः स्थावरजङ्गमं जगदिदमग्नि विस्फलिङ्गवव्युच्च-रत्यनिशम्, यस्मिन्नेव च प्रलीयते जलबुद्बुदवत्, यदात्मकं च वर्तते स्थितिकाले, तस्यास्यात्मनो ब्रह्मणः, उपनिषद् उपसमीपं निग मयतीत्यभिधायकः शब्द उपनि-षदित्युच्यते, शास्त्रप्रामाण्यादेत -च्छन्दगतो विशेषोऽवसीयत उप-निगमयितृत्वं नाम । कासावुपनिषदित्याह - सत्य-स्य सत्यमिति । सा हि सर्वत्र चोपनिषद लौकिकार्थत्वाद् दुर्वि-ज्ञेयार्था, इति तदर्थमाचष्टे - प्राणा । वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति । एतस्यैव वाक्यस्य व्याख्यानायो-त्तरं ब्राह्मणद्वयं भविष्यति । भवतु तावदुपनिषद्वयाख्याना इयमुपनिषत् योत्तरं ब्राह्मणद्वयम्, किविषयेति यस्योपनिषदित्युक्तम, मीमांस्यते तत्र न जानीमः किं अग्निसे विस्फुलिङ्गोंके समान जिस आत्मासे यह चराचर जगत् अहर्निश उत्पन्न होता रहता है और जलमें बुलबुलेके समान जिसमें यह लीन हो जाता है तथा स्थितिकालमें जिस स्वरूपसे यह विद्यमान रहता है, उपनिषत् है; उप अर्थात् समीप-से निगमन करता है; इसलिये अभि-धायक ( वाचक ) शब्द ही ' उपनिषद् ' कहा जाता है, ' उपनिषद् ' शब्दमें रहनेवाली यह उपनिगमनकर्तृत्व-रूप विशेषता शास्त्रप्रामाण्यसे जानी जाती है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है - ' सत्यका सत्य ' यह वह विशेषता है । अलौकिक अर्थंवाली होनेके कारण उस उपनिषद्का अर्थ सर्वत्र दुर्विज्ञेय है, इसलिये श्रुति उसका अर्थं बतलाती है - प्राण ही सत्य हैं, यह ( आत्मा ) उनका भी सत्य है । आगे के दो ब्राह्मण इसी वाक्यकी व्याख्या करनेके लिये होंगे । | पूर्व ० - आगेके दो ब्राह्मण भले ही इस उपनिषद्की व्याख्या करनेके लिये हों, परंतु ऊपर जो यह कहा गया है कि ' यह उसकी उपनिषद् है ' इसमें हम यह नहीं जानते कि यह प्रकृतस्यात्मनोविज्ञानमयस्यपाणि- उपनिषद् हाथ दबानेसे उठे हुए
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४६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ पेषणोत्थितस्य संसारिणः शब्दा- । दिभुज इयमुपनिषदाहोस्विदसंसा -रिणः कस्यचित् १ किश्चातः १ यदि संसारिणस्तदा संसार्येव विज्ञेयः, तद्विज्ञानादेव सर्वप्राप्तिः । स एव ब्रह्मशब्दवाच्यस्तद्विद्यैव ब्रह्मविद्येति । अथ असंसारिणः, तदा तद्विषया विद्या ब्रह्मविद्या । । तस्माच्च ब्रह्मविज्ञानात्सर्वभावा -पत्तिः । सर्वमेतच्छास्त्रप्रामाण्याद्भवि -ष्यति । किन्त्वस्मिन्पक्षे " आत्मे त्येवोपासीत " ( १ । ४ । ७ ) " आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि " ( १ । ४।१४ ) इति परब्रह्मैकत्वप्रति पादिकाः श्रुतयः कुप्येरन्, संसा-७ रिणश्चान्यस्याभावे उपदेशानर्थ-क्यात् । यत एवं पण्डितानाम । १. आत्मा है - इस प्रकार उपासना 22 शब्दादिका भोग करनेवाले प्रकृत विज्ञानमय संसारी आत्माकी है अथवा किसी असंसारीकी? सिद्धान्ती - इससे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? पूर्व ० - यदि यह उपनिषद् संसारी-की है, तब तो संसारी ही विशेष-रूपसे ज्ञातव्य है, उसके विज्ञान से ही सर्वभावकी प्राप्ति हो सकती है वही ' ब्रह्म ' शब्दका वाच्य है तथा उसकी विद्या ही ब्रह्मविद्या है । और यदि वह असंसारी की है तो असंसारी आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ही ब्रह्मविद्या है, एवं उस ब्रह्मविज्ञान-से ही सर्वभावकी प्राप्ति होती है । सिद्धान्ती - यह सब शास्त्रप्रामाण्य-से ही सिद्ध होगा । किंतु इस पक्ष में “ आत्मेत्येवोपासीत ”, “ आत्मानमेवा-वेदहं ब्रह्मास्मि " इत्यादि परब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी; क्योंकि ब्रह्मसे भिन्न किसी संसारीकी सत्ता न होनेके कारण उसका उपदेश निरर्थक होगा । इस प्रकार जिसका उत्तर नहीं दिया गया है, उस करे । २. आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ।
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[ अध्याय २ भोग करनेवाले प्रकृत संसारी आत्माकी है ती असंसारीकी? - इससे तुम्हारा क्या ? दि यह उपनिषद् संसारी-तो संसारी ही विशेष -यहै, उसके विज्ञानसे की प्राप्ति हो सकती है शब्दका वाच्य है तथा ही ब्रह्मविद्या है । और सारी की है तो असंसारी -बन्ध रखनेवाली विद्या है, एवं उस ब्रह्मविज्ञान-की प्राप्ति होती है । - यह सब शास्त्रप्रामाण्य-होगा । किंतु इस पक्ष में पासीत ",, " ओत्मानमेवा-स्म " इत्यादि परब्रह्मकी प्रतिपादन करनेवाली त हो जायँगी; क्योंकि किसी संसारी की सत्ता कारण उसका उपदेश TT । इस प्रकार जिसका दिया गया है, उस ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६१ प्येतन्महामोहस्थानम् अनुक्तप्रति । प्रश्नविषयम् अतो यथा-शक्ति ब्रह्मविद्याप्रतिपादकवाक्येषु ब्रह्मविजिज्ञासूनां बुद्धिव्युत्पाद-नाय विचारयिष्यामः । न तावदसंसारी परः, पाणिपे-षणप्रतिबोधिताच्छन्दादिभुजोऽव-स्थान्तरविशिष्टादुत्पत्तिश्रुतेः । न प्रशासिताशनायादिवर्जितः परो विद्यते, कस्मात्? यस्मात् ' ब्रह्म ज्ञपयिष्यामि ' ( २ । १ । १५ ) इति प्रतिज्ञाय सुप्तं पुरुषं पाणिपेषं बोधयित्वा तं शब्दादिभोक्तृत्व-विशिष्टं दर्शयित्वा तस्यैव स्वप्न -द्वारेण सुषुप्त्याख्यमवस्थान्तर-मुन्नीय तस्मादेवात्मनः सुषुप्त्य-वस्था विशिष्टाद् अग्निविस्फुलिङ्गो-र्णनाभिदृष्टान्ताभ्यामुत्पत्तिं दर्श-यति श्रुतिः “ एवमेवास्मात् ” ( २ । १।२० ) इत्यादिना । न चान्यो जगदुत्पत्तिकारणमन्तराले श्रुतो - । १. इससे आगे पहले पूर्वपक्षकी बात २. इसी प्रकार इससे । ऐकात्म्यविषयक प्रश्नका विषय पण्डितोंके लिये भी अत्यन्त मोहका स्थान है, इसलिये ब्रह्मजिज्ञासुओंकी बुद्धिको ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करने-वाले वाक्योंमें प्रवृत्त करनेके लिये हम यथाशक्ति विचार करेंगे । इनमेंसे असंसारी ( शुद्ध आत्मा ). तो परमात्मा हो नहीं सकता; क्योंकि हाथ दबानेसे जगे हुए. शब्दादिके भोक्ता एवं सुषुप्तिसंज्ञक अवस्थान्तरसे विशिष्ट जीवसे जगत्--की उत्पत्ति सुनी गयी है । उससे भिन्न क्षुवादि जीवधर्मोसे रहित शुद्ध ब्रह्म जगत्का शासक नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि ' मैं तुझे ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा ' ऐसी प्रतिज्ञा कर हाथ दबानेके द्वारा सुषुप्त पुरुषको जगाकर उसे शब्दादि-भोक्तृत्व - विशिष्ट दिखाकर, उसीकी स्वप्नके द्वारा सुषुप्तिसंज्ञक अवस्था-तर प्रदर्शित कर श्रुति " एवमेवा -स्मात् " इत्यादि वाक्यद्वारा सुषुप्ति-अवस्था विशिष्ट उस आत्मासे ही अग्नि - विस्फुलिङ्ग और ऊर्णनाभिके दृष्टान्तोंद्वारा जगत्की उत्पत्ति दिख-लाती है । यहाँ बीचमें जगत्की उत्पत्तिका कोई दूसरा कारण सुना कहते हैं ।
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४६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ऽस्ति, विज्ञानमयस्यैव हि प्रक- । रणम् । समानप्रकरणे च श्रुत्य-न्तरे कौषीत किनामादित्यादिपुरु-पान्प्रस्तुत्य " स होवाच यो वै चालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य चैतत्कर्म स वै वेदितव्यः " ( कौ ० । उ ० ४ । १ ९ ) इति प्रबुद्धस्यैव विज्ञानमयस्य वेदितव्यतां दर्श-यति, नार्थान्तरस्य । तथा च " आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ” ( २ । ४ । ५ ) । इत्युक्त्वा, य एवात्मा प्रियः प्रसिद्धस्तस्यैव द्रष्टव्यश्रोतव्य-मन्तव्यनिदिध्यासितव्यतां दर्शयति । तथा च विद्योपन्यास- । काले “ आत्मेत्येवोपासीत ” ( १ । ४ । ७ ) " तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात् ” ( १ । ४ । ८ ) “ तदा-त्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि " ( १ । ४ । १० ) इत्येवमादिवाक्या-नामानुलोम्यं स्यात्पराभावे । वक्ष्यति च— “ आत्मानं चेद्वि-जानीयादयमस्मीति पूरुषः ( ४ । ४ । १२ ) इति । ANAN नहीं गया है और यह विज्ञानमयका ही प्रकरण है । इसके समान प्रक-रणमें ही कौषीतकी - शाखावालोंकी एक अन्य श्रुतिमें आदित्यादि - पुरुषों-का प्रकरण उठाकर श्रुति ह बोला, हे बालाके! जो भी इन पुरुषोंका कर्ता है और जिसका यह जगद्रूप कर्म है वही निश्चय ज्ञातव्य है " इस प्रकार जगे हुए विज्ञान-मयकी ही ज्ञातव्यता प्रदर्शित करती है, किसी अन्य वस्तुकी नहीं । इसी प्रकार " आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है " ऐसा कह-कर श्रुति यह दिखाती है कि जो आत्मा प्रियरूपसे प्रसिद्ध है, वही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदि-ध्यासितव्य है । इस तरह यदि कोई विज्ञानमयसे भिन्न ज्ञातव्य न होगा, तभी आत्मज्ञानकी व्याख्या करते समय " आत्मा है - इस प्रकार उपा-सना करे " " वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है और घनसे भी प्रिय है " तथा " उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ " इत्यादि वाक्योंकी अनुकूलता हो सकती है । श्रु मागे “ यदि पुरुष आत्माको मैं “ यह हूँ ' इस प्रकार जान जाय " ऐसा कहेगी भी ।
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[ अध्याय २ है और यह विज्ञानमयका है । इसके समान प्रक-कौषीतकी - शाखावालों की सुतिमें आदित्यादि पुरुषों-उठाकर श्रुति " वह बाला के! जो भी इन र्ता है और जिसका यह है वही निश्चय ज्ञातव्य कार जगे हुए विज्ञान-नातव्यता प्रदर्शित करती न्य वस्तुकी नहीं । कार " आत्माके लिये ही नय होता है " ऐसा कह-यह दिखाती है कि जो रूपसे प्रसिद्ध है, वही तव्य, मन्तव्य और निदि-है । इस तरह यदि कोई भिन्न ज्ञातव्य न होगा, ज्ञानकी व्याख्या करते हमा है - इस प्रकार उपा-" वह यह आत्मा पुत्रसे र धनसे भी प्रिय है " ने आत्माको ही जाना हूँ " इत्यादि वाक्योंकी हो सकती है | श्रुति पुरुष आत्माको ' मैं • प्रकार जान जाय " भी । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३ सर्ववेदान्तेषु च प्रत्यगात्म-वेद्यतैव प्रदर्श्यतेऽहमिति, न बहि-वैद्यता शब्दादिवत्प्रदर्श्यतेऽसौ ब्रह्मेति 1 । तथा कौषीतकिनामेव 46 न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् " ( कौ ० उ ० ३ । ८ ) इत्यादिना बागादिकरणैर्व्यावृत्त-स्य कर्तुरेव वेदितव्यतां दर्शयति । श्रवस्थान्तरविशिष्टोऽसंसारीति चेत् — अथापि स्याद्यो जागरिते शब्दादिभुग्विज्ञानमयः, स एव सुपुप्ताख्यमवस्थान्तरं गतोऽसंसारी परः प्रशासिता श्रन्यः स्यादिति चेन, अष्टत्वात् । न ह्येवंधर्मकः पदार्थो दृष्टोऽन्यत्र वैनाशिकसिद्धा-न्तात् । न हि लोके गौस्तिष्ठन् गच्छन्ना गौर्भवति - शयानस्त्व-श्वादिजात्यन्तरमिति । न्यायाच्च -यद्धर्मको यः पदार्थः प्रमाणेनाव-गतो भवति, स देशकालावस्था -! समस्त वेदान्तोंमें ब्रह्मकी ‘ अहम् ’ इस रूपसे प्रत्यगात्मभावसे ही वेद्यता दिखायी गयी है, शब्दादिके समान ' यह ब्रह्म है ' इस प्रकार बहिर्वेद्यता नहीं दिखायी गयी । इसी प्रकार कौषीतकी शाखावालों-की श्रुति भी " वाणीको जाननेकी इच्छा न करे, बोलनेवालेको जाने ” इत्यादि वाक्यसे वागादि इन्द्रियोंसे भिन्न कर्ताकी ही वेद्यता प्रदर्शित करती है । यदि कहां कि अवस्थान्तरविशिष्ट होनेपर वह असंसारी हो जाता है । अर्थात् यदि ऐसा मानो कि जाग-रित - अवस्था में जो विज्ञानमय शब्दादिका भोक्ता है, वही सुषुप्त-संज्ञक अन्य अवस्थामें जानेपर उससे भिन्न जगत्का शासक असं-सारी हो जाता है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया । वैनाशिक- सिद्धान्तके सिवा और कहीं ऐसे धर्मंवाला पदार्थं नहीं देखा गया । लोकमें ऐसा नहीं देखा गया कि बैठते या चलते समय तों गौ गौ रहे और सोनेपर वह अश्वादि कोई अन्य जातिका पशु हो जाय । युक्तिसे भी यही सिद्ध होता है कि जो पदार्थ प्रमाणद्वारा जिन धर्मों-वाला जाना जाता है, वह अन्य देश, काल अथवा अवस्थाओंमें भी
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४६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ न्तरेष्वपि तद्धर्मक एव भवति । । स चेत्तद्धर्मकत्वं व्यभिचरति, सर्व प्रमाणव्यवहारो लुप्येत । तथा च न्यायविदः साङ्ख्यमीमांस-कादयोऽसंसारिणोऽभावं युक्ति - । शतैः प्रतिपादयन्ति । संसारिणोऽपि जगदुत्पत्तिस्थिति-लय क्रियाकर्तृत्व विज्ञानस्याभावाद् अयुक्तमिति चेत् — पन्महता प्रपश्चेन स्थापितं भवता, शब्दा-दिभुक्संसार्येवावस्थान्तरविशिष्टो जगत इह कर्तेति - तदसत् यतो जगदुत्पत्तिस्थितिलय क्रियाकर्तृत्व-विज्ञानशक्तिसाधनाभावः सर्वलोक-प्रत्यक्षः संसारिणः । सकथमस्म-दादिः संसारी मनसापि चिन्त-यितुमशक्यं पृथिव्यादिविन्यास-विशिष्टं जगन्निर्मिनुयात् १ अतो-ऽयुक्तमिति चेन, शास्त्रात्; शास्त्रं । उन्हीं धर्मोवाला रहता है । यद वह उन धर्मोका त्याग कर दे तो सारे ही प्रमाण - व्यवहारका लोप हो जाय । इसी प्रकार सांख्यवादी और मीमांसकादि न्यायवेत्ता भी सैकड़ों युक्तियोंसे असंसारी ईश्वरके अभावका प्रतिपादन करते हैं! यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयरूप क्रिया के कर्तृ-त्वका ज्ञान न होनेके कारण संसारी जीवको भी जगत्का कर्ता मानना उचित नहीं है, अर्थात् तुमने जो बड़े विस्तारसे यहाँ यह सिद्ध किया है कि शब्दादिका भोक्ता अवस्थान्तरविशिष्ट संसारी जीव ही जगत्का कर्ता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि संसारी जीव-में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय-रूप क्रिया कर्तृत्वविज्ञानकी शक्ति-के साधनोंका अभाव सभी लोकोंको प्रत्यक्ष है । वह हम जैसा संसारी जीव इस पृथिवी आदिके यथास्थान स्थापनपूर्वक विभिन्न प्रकारकी रचना-से विशिष्ट एवं मनसे भी अचिन्तनीय जगत्की किस प्रकार रचना कर सकता है? इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं; ऐसी यदि कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं, क्योंकि शाखसे