बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 471–480
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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[ अध्याय २ मोंवाला रहता है । यदि धर्मो का त्याग कर दे तो प्रमाण - व्यवहारका लोप I इसी प्रकार सांख्यवादी नांसकादि न्यायवेत्ता भी क्तियोंसे असंसारी ईश्वरके प्रतिपादन करते हैं! कहो कि जगत्की उत्पत्ति, और लयरूप क्रियाके कर्तृ-न होने के कारण संसारी जगत्का कर्ता मानना हीं है, अर्थात् तुमने जो बड़े यहाँ यह सिद्ध किया है कि T भोक्ता अवस्थान्तरविशिष्ट वही जगत्का कर्ता है, हीं है; क्योंकि संसारी जीव-उत्पत्ति, स्थिति एवं लय-के कर्तृत्वविज्ञान की शक्ति-का अभाव सभी लोकों को । वह हम - जैसा संसारी पृथिवी आदिके यथास्थान क विभिन्न प्रकारकी रचना-एवं मनसे भी अचिन्तनीय किस प्रकार रचना कर ? इसलिये ऐसा मानना नहीं; ऐसी यदि कोई शङ्का चेक नहीं, क्योंकि शास्त्रसे ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ संसारिणः “ एवमेवास्मादात्मनः " । ( २ । १ । २० ) इति जगदुत्पत्त्यादि दर्शयति । तस्मात्सर्व श्रद्धेयमिति स्यादयमेकः पक्षः । " यः सर्वज्ञः सर्ववित् ” असंसारिणो ( मु ० उ ० १ । १ । जगत्कारणत्वो- ९ ) " योऽशनाया-पपादनम् पिपासे • " अत्ये-ति ” ( बृ ० उ ० ३ । ५ । १ ) " अहो न हि सज्यते " ( ३ । ९ । २६ ) " एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने " ( ३ । ८ । ९ ) " यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ' अन्त-र्याम्यमृतः ” ( ३ । ७ । १५ ) " स यस्तान्पुरुषान्निरुह्य " अत्यका-मत् ” ( ३ । ९ । २६ ) “ स वा एष महानज आत्मा " ( ४ । ४। २२ ) “ एष सेतुर्विधरणः " ( ४ । ४ । २२ ) " सर्व -स्य वशी सर्वस्येशानः ” ( ४।४ । २२ ) " य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः " ( छा ० उ ० ८ । ७ । १ ) " तत्तेजोऽसृजत " ( छा ० उ ० ६ । २ । ३ ) " आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् " ( ऐ ० उ ० १ | १ | १ ) " न लिप्यते लोक-४६५ यही सिद्ध होता है । " इसी प्रकार इस आत्मासे " इत्यादि शास्त्र संसारीसे ही जगत् की उत्पत्ति आदि प्रदर्शित करता है; इसलिये इस सबमें विश्वास रखना चाहिये-ऐसा यह एक पक्ष हो सकता है । ' " जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है ", " जो क्षुधा पिपासासे अतीत है ", “ जो असङ्ग है इसलिये किसीसे संयुक्त नहीं होता ", “ इस अक्षरके ही शासनमें ", " जो सम समस्त भूतोंमें रहनेवाला, अन्तर्यामी और अमृत है ", " जो उन पुरुषोंका निरोघ करके उनसे आगे बढ़ा हुआ है ", " वही यह महान् अजन्मा आत्मा है ", " यह विशेषरूपसे धारण करने-वाला सेतु है ", " यह सबको वशमें रखनेवाला और सबका शासक है ", " जो निष्पाप और अजर - अमर आत्मा है, " " उसने तेजको रचा ”, “ आरम्भमें यह एक आत्मा ही था ", " वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता १. यहाँतक सिद्धान्तीने संसारी जीवको ही जगत्का कारण माननेवाले पूर्व-पक्षको प्रदर्शित किया है । इससे आगे असंसारीका जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया जाता है | वृ ० उ ० ३०-
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४६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ दुःखेन बाह्यः " ( क ०३० २ ॥ २ । ११ ) इत्यादिश्रुतिशतेम्यः, स्मृतेश्व " अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते " ( गीता १० | ८ ) इति - परोऽस्त्यसंसारी श्रुतिस्मृतिन्या-येभ्यश्चः स च कारणं जगतः । नतु " एवमेवास्मादात्मनः " ( २ । १ । २० ) इति संसारिण एवोत्पत्तिं दर्शयतीत्युक्तम् । न; " य एषोऽन्तर्हृदय -काशः ” ( २ । १ । १७ ) इति परस्य प्रकृतत्वात्‘अस्मादात्मनः " इति युक्तः परस्यैव परामर्शः । " क्वैष तदाभूत् " ( २१ । १६ ) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनत्वेन आकाशशब्दवाच्यः पर आत्मोतो " य एषोऽन्तर्हृदय श्राकाशस्तस्मि -ञ्छेते " ( २ । १ । १७ ) इति । " सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति " ( छा ० उ ० ६ । ८ । १ ) " अह-रहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति " ( छा ० उ ० ८।३ । २ ) “ प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । २१ ) “ पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ” ( प्र ० उ ० BALA क्योंकि उससे बाहर है- " इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे तथा “ मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और मुझसे ही सव उत्पन्न होता है " इत्यादि स्मृतियोंसे जीवसे भिन्न असंसारी परमात्मा सिद्ध होता है और श्रुति - स्मृति एवं युक्तिसे वही जगत्का कारण है । पूर्व ० - किंतु " इसी प्रकार इस आत्मासे " इत्यादि श्रुति तो संसारी जीवसे ही जगत् की उत्पत्ति दिखलाती है - ऐसा ऊपर कहा चुका है । सिद्धान्ती - नहीं; “ जो यह हृदया-न्तर्गत आकाश है " इस प्रकार यहाँ परब्रह्मका ही प्रकरण होनेके कारण " इस आत्मासे " इत्यादि श्रुतिद्वारा परब्रह्मका ही परामर्श मानना उचित है । " उस समय यह कहाँ था? ' इस प्रकार इस प्रश्न के उत्तर-रूपसे " यह जो हृदयके अन्तर्गत आकाश है, उसमें यह शयन करता है " इस वाक्यद्वारा आकाश-शब्दवाच्य आत्मा ही कहा गया है । " हे सोम्य! उस समय यह सत्से सम्पन्न रहता है ” “ प्रतिदिन वहाँ जाती हुई इस ब्रह्मलोकको नहीं प्राप्त करती है ", प्राज्ञात्मा-से आलिङ्गित ”, “ पर आत्मामें सम्यक् प्रकारसे " स्थित होती है "
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[ अध्याय २ उससे बाहर है - " इत्यादि तियोंसे तथा “ मैं सबका नहूँ और मुझसे ही सव ना है " इत्यादि स्मृतियोंसे न असंसारी परमात्मा है और श्रुति स्मृति एवं हो जगत्का कारण है । - किंतु " इसी प्रकार इस इत्यादि श्रुति तो संसारी ही जगत् की उत्पत्ति है — ऐसा ऊपर कहा है । श्री- नहीं; " जो यह हृदया-काश है " इस प्रकार यहां ही प्रकरण होनेके कारण नासे " इत्यादि श्रुतिद्वारा ही परामर्श मानना " उस समय यह कहाँ प्रकार इस प्रश्न के उत्तर-ह जो हृदयके अन्तर्गत है, उसमें यह शयन इस वाक्यद्वारा आकाश-आत्मा ही कहा गया सोम्य! उस समय यह न रहता है " " प्रतिदिन हुई इस ब्रह्मलोकको करती है ", प्राज्ञात्मा-ङ्गित ", " पर आत्मामें कारसे स्थित होती है " ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७ ४। ७ ) इत्यादिश्रुतिभ्य आकाश । शब्दः पर आत्मेति निश्चीयते; " दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ” ( छा ० उ ० ८ ।१ । १ ) इति प्रस्तुत्य तस्मिन्नेवात्मशब्दप्रयोगाच्च।प्रकृत एव पर आत्मा । तस्माद्युक्तम् ' एवमेवास्मादात्मनः ' इति पर-मात्मन एव सृष्टिरिति । संसारिणः सृष्टिस्थितिसंहारज्ञानसामर्थ्याभावं चावोचाम | अत्र च " आत्मेत्येवोपासीत " द्वैतवादिपक्षोभा- ( १ । ४ । ७ ) वनम् " आत्मानमेवावेदहं । ब्रह्मास्मि ” ( १ । ४ । १० ) इति ब्रह्मविद्या प्रस्तुता । ब्रह्मविषयं च ब्रह्मविज्ञानमिति ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इति ' ब्रह्म ज्ञपयिष्यामि इति प्रारब्धम् । तत्रेदानीमसंसारि ब्रह्म जगतः कारणमशनायाद्यतीतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्, तद्वि-परीतश्च संसारी, तस्मादहं ब्रह्मा-A इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशशब्दसे कहा जानेवाला पर आत्मा ही है— ऐसा निश्चय होता है, तथा " इसमें अन्तराकाश दहर है " इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर उसी अर्थमें ‘ आत्मा ’ शब्दका प्रयोग भी किया गया है । इसलिये भी यहाँपर आत्माका ही प्रसङ्ग है । अत: ' इसी प्रकार इस आत्मासे ' इस वाक्यद्वारा परमात्मा-से ही सृष्टि होती है - ऐसा मानना ही उचित है । इसके सिवा हम संसारी जीवमें तो जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और संहारके ज्ञानकी शक्ति-का अभाव भी बतला चुके हैं । पूर्व ० - यहाँ भी " आत्मा है - इस प्रकार ही उपासना करे ", " आत्मा-को ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ " इस प्रकार ब्रह्मविद्याका ही प्रसङ्ग है । तथा ब्रह्मविज्ञान ब्रह्मविषयक ही होता है, जो कि ' मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँ ', ' तुझे ब्रह्मका बोध कराऊँगा ' इत्यादि श्रुतियोंसे आरम्भ किया है । यहाँ क्षुधादिसे रहित, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण बतलाया गया है । संसारी जीव उससे विपरीत स्वभाववाला है । इसलिये वह अपनेको ' मैं ब्रह्म हूँ '
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४६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ स्मीति न गृह्णीयात् परं हि देव - । मीशानं निकृष्टः संसार्यात्मत्वेन स्मरन्कथं न दोषभाक् स्यात्? तस्मा न्नाहं ब्रह्मास्मीति युक्तम् । तस्मात् पुष्पोदकाञ्जलिस्तुतिनमस्कारबल्यु-पहार स्वाध्यायाध्ययनयोगादि-भिरारिराधयिषेत । श्राराधनेन विदित्वा सर्वेशित ब्रह्म भवति । । न पुनरसंसारि ब्रह्म संसार्यात्म-स्वेन चिन्तयेदग्निमिव शीतत्वेन आकाशमिव मूर्तिमत्वेन | ब्रह्मा-स्मत्वप्रतिपादकमपि शास्त्रमर्थवादो भविष्यति । सर्व तर्कशास्त्रलोक-न्यायैश्चैवमविरोधः स्यात् । न; मन्त्रब्राह्मणवादेभ्यस्तस्यैव उक्तपक्षनिरासः प्रवेशश्रवणात् । " पुरचक्रे " इति प्रकृत्य " पुरः पुरुष चाविशत् ( बृ ० उ ० २ । ५ । १८ ) इति " रूपं रूपं प्रति-रूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्ष-इस प्रकार ग्रहण नहीं कर सकता । भला, निम्नकोटिका संसारी जीव परम देव ईश्वरको आत्मभावसे स्मरण करके किस प्रकार दोषका भागी न होगा? इसलिये ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा मानना उचित नहीं हो सकता । अतः पुष्पाञ्जलि, स्तुति, नमस्कार, बलि, उपहार, जप, अध्ययन और योगादिके द्वारा उसकी आराधना करनेकी इच्छा करे । उसे आराधना के द्वारा जानकर जीव सबका शासन करनेवाला ब्रह्म हो जाता है । जिस प्रकार अग्निको शीतरूपसे तथा आकाशको मूर्तरूप-से चिन्तन करना उचित नहीं है, उसी प्रकार संसारी जीव असंसारी ब्रह्मका आत्मभावसे चिन्तन नहीं कर सकता । आत्माकी ब्रह्मस्वरूपताका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र भी अर्थ-वाद ही होगा । तथा ऐसा माननेपर समस्त युक्ति, शास्त्र और लौकिक न्यायोंसे विरोध नहीं रह सकता । सिद्धान्ती — ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मणवाक्योंद्वारा उस ( परब्रह्म ) का ही प्रवेश सुना गया है । “ [ शरीररूप ] पुरोंकी रचना की " इस प्रकार प्रकरण उठाकर " पुरुषने पुरोंमें प्रवेश किया ” " वह रूप - रूपके अनुरूप हो गया इसका वह रूप प्रत्यक्ष करनेके लिये
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[ अध्याय २ ग्रहण नहीं कर सकता । नकोटिका संसारी जीव - ईश्वरको आत्मभावसे र के किस प्रकार दोषका होगा? इसलिये ' मैं ब्रह्म मानना उचित नहीं हो अतः पुष्पाञ्जलि, स्तुति, बलि, उपहार, जप, और योगादिके द्वारा उसकी करने की इच्छा करे । उसे के द्वारा जानकर जीव सन करनेवाला ब्रह्म हो जिस प्रकार अग्निको तथा आकाशको मूर्तरूप-करना उचित नहीं है, र संसारी जीव असंसारी = मभावसे चिन्तन नहीं कर वात्माकी ब्रह्मस्वरूपताका करनेवाला शास्त्र भी अर्थ -गा । तथा ऐसा माननेपर कि, शास्त्र और लौकिक वरोध नहीं रह सकता । - ऐसी बात नहीं है; और ब्राह्मणवाक्योंद्वारा ब्रह्म ) का ही प्रवेश सुना " [ शरीररूप ] पुरोंकी " इस प्रकार प्रकरण पुरुषने पुरोंमें प्रवेश किया ” रूपके अनुरूप हो गया रूप प्रत्यक्ष करनेके लिये ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६ ९ णाय " ( २ । ५ । १ ९ ) " सर्वाणि रूपाणि चिचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते ” इति सर्व-शाखासु महस्रशो मन्त्रवादाः सृष्टिकर्तुरेवासंसारिणः शरीर-प्रवेशं दर्शयन्ति । तथा ब्राह्मण-वादा: - " तत्सृष्ट्वा तदेवानु-| है ", " वह धीर सम्पूर्ण रूपोंकी | रचनाकर उनके नाम रखकर उन्हीं-. | के द्वारा बोलता रहता है " इस | प्रकार सभी शाखाओंमें सहस्रों मन्त्रवाद सृष्टिकर्ता असंसारी ब्रह्मका ही शरीरमें प्रवेश होना दिखलाते हैं । इसी प्रकार " उसे रचकर वह प्राविशत् " ( तै ० उ ० २ । ६ । १ ) उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया ", " वह " स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत " ( ऐ ० उ ० १।३ । १२ ) " सेयं देवता " इमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानु-प्रविश्य " ( छा ० उ ० ६ । ३ । २ ) " एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते " ( क ० उ ० १ । ३ । १२ ) इत्याद्याः । सर्वश्रुतिषु च ब्रह्मण्यात्मशब्द-प्रयोगाद् आत्मशब्दस्य च प्रत्य-गात्माभिधायकत्वात् “ एष सर्व भूतान्तरात्मा " ( मु ० उ ० २ । १ ॥ ४ ) इति च श्रुतेः परमात्म-व्यतिरेकेण संसारिणोऽमाबाद — " एकमेवाद्वितीयम् " ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) “ ब्रह्मैवेदम् " ( सु ० उ ०२।२।११ ) " आत्म-वेदम् ” ( छा ० उ ० ७ । २५ । | २ ) इत्यादिश्रुतिभ्यो युक्तमेव अहं ब्रह्मास्मीत्यवधारयितुम् । इस मूर्धंसीमाको ही विदीर्ण कर इसके द्वारा प्रविष्ट हो गया ", " उस इस देवताने इन [ अप्, तेज और अन्नरूप ] तीन देवताओं-में इस जीवरूपसे अनुप्रवेश कर ", " यह सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ आत्मा प्रकट नहीं होता " इत्यादि ब्राह्मणवाद भी हैं । इसके सिवा समस्त श्रुतियोंमें ब्रह्ममें ही ' आत्मा ' शब्दका प्रयोग होने तथा ' आत्मा ' शब्द प्रत्य-गात्माका वाचक होने एवं ' यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है " इस श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न संसारी जीवका अभाव होनेके कारण " एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ", यह ब्रह्म ही है " " यह आत्मा ही है " इत्यादि श्रुतियोंसे ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा निश्चय करना उचित ही है ।
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४७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यदैवं स्थितः शास्त्रार्थः, तदा जीवपरयोरभेदे परमात्मनः संसारि-दोषोद्भावनम् त्वम्; तथा सति शास्त्रानर्थक्यम्, असंसारित्वे चोपदेशानर्थक्यं स्पष्टो दोषः प्राप्तः । यदि तावत्परमात्मा सर्व- । भूतान्तरात्मा सर्वशरीरसम्पर्क-जनितदुःखान्यनुभवतीति स्पष्टं परस्य संसारित्वं प्राप्तम् । तथा च परस्यासंसारित्वप्रतिपादिकाः श्रु-तयः कुप्येरन्, स्मृतयश्च, सर्वे च न्यायाः । अथ कथश्चित्प्राणि-शरीरसम्बन्धजैर्दुःखैर्न सम्बध्यत इति शक्यं प्रतिपादयितुं परमा-त्मनः साध्यपरिहार्याभावादुपदे-शानर्थक्यदोषो न शक्यते निवार-यितुम् । अत्र केचित्परिहारमाचक्षते -जीवस्य परमा- परमात्मा न साक्षाद त्मविकारत्वं भूतेष्वनुप्रविष्टः स्वे-प्रस्तूयते न रूपेण; किं तहिं? जब इस प्रकार शास्त्रका अभि. प्राय निश्चित होता है तो परमात्मा-का संसारी होना सिद्ध होता है; ऐसी स्थितिमें शास्त्र व्यर्थ हो जाता है और यदि जीवको असंसारी माना जाय तो उसे उपदेश करना व्यर्थ है - ऐसा यह स्पष्ट दोष प्राप्त होता है । यदि परमात्मा ही समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है और वही समस्त शरीरोंके सम्पर्कंसे होनेवाले दुःखोंको अनुभव करता है तो स्पष्ट ही परमात्माको संसारित्वको प्राप्ति हो जाती है । ऐसी स्थिति में पर-मात्माके असंसारित्वका प्रतिपादन करनेवाली समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ और युक्तियाँ बाधित हो जाती हैं, और यदि किसी प्रकार यह प्रति-पादन भी किया जाय कि प्राणियों-के शरीरोंके सम्बन्धसे होनेवाले दुःखोसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो परमात्माके लिये कोई ग्राह्म या त्याज्य न होनेके कारण उपदेशकी व्यर्थतारूप दोषका निवारण नहीं किया जा सकता । यहाँ कोई लोग इस दोषका इस प्रकार परिहार बतलाते हैं - परमात्मा साक्षात् अपने रूपसे भूतोंमें अनु प्रविष्ट नहीं है; तो फिर क्या बात
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[ अध्याय २ इस प्रकार शास्त्रका अभि. बत होता है तो परमात्मा-टी होना सिद्ध होता है; तिमें शास्त्र व्यर्थ हो जाता यदि जीवको असंसारी य तो उसे उपदेश करना - ऐसा यह स्पष्ट दोष प्राप्त यदि परमात्मा ही समस्त अन्तरात्मा है और वही -रीरोंके सम्पर्क से होनेवाले अनुभव करता है तो स्पष्ट हमाको संसारित्वकी प्राप्ति है । ऐसी स्थिति में पर-असंसारित्वका प्रतिपादन समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ नयाँ बाधित हो जाती हैं, किसी प्रकार यह प्रति-किया जाय कि प्राणियों-के सम्बन्धसे होनेवाले इसका सम्बन्ध नहीं होता माके लिये कोई ग्राह्य या होनेके कारण उपदेशकी प दोषका निवारण नहीं सकता । कोई लोग इस दोषका इस रहार बतलाते हैं - परमात्मा अपने रूपसे भूतोंमें अनु-हीं है; तो फिर क्या बात ब्राह्मण १ ] शाङ्करभायार्थ ४७१ विकारभावमापन्नो विज्ञानात्मत्वं है? वह विकारभावको प्राप्त होकर विज्ञानात्मत्वको प्राप्त हुआ है और प्रतिपेदे । स च विज्ञानात्मा पर - वह विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न स्मादन्योऽनन्यश्च । येनान्यः, तेन एवं अभिन्न भी है । चूँकि वह भिन्न संसारित्वसम्बन्धी, येनानन्यः, तेन अहं ब्रह्मेत्यवधारणार्हः । एवं सर्वमविरुद्धं भविष्यतीति । तत्र विज्ञानात्मनो विकारपक्षे एता गतयः - पृथिवींद्रव्यवदने-कद्रव्यसमाहारस्य सावयवस्य पर-मात्मन एकदेशविपरिणामो विज्ञानात्मा घटादिवत् ॥ पूर्व-संस्थानावस्थस्य वा परस्यैकदेशो विक्रियते केशोषरादिवत्, सर्व एव वा परः परिणमेत्क्षीरादिवत् । तत्र समानजातीयानेकद्रव्य-उक्त पक्षप्रतिषेधः समूहस्य कश्चिद् द्रव्यविशेषो विज्ञानात्मत्वं प्रति-पद्यते यदा, तदा समानजातीय-है, इसलिये संसारित्वसे सम्बन्ध रखनेवाला है और अभिन्न होनेके कारण ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकारके निश्चयकी योग्यता रखता है । इस प्रकार माननेसे [ श्रुति, स्मृति एवं न्यायादि ] सब अनुकूल रहेंगे । तहाँ ( इस सिद्धान्त के अनुसार ) विज्ञानात्माको परमात्माका विकार माननेके पक्षमें तीन गतियाँ हो सकती हैं - ( १ ) पृथिवी द्रव्यके समान अनेक द्रव्योंके संघातरूप सावयव परमात्माका विज्ञानात्मा घटादिकी तरह एकदेशी परिणाम है ' ( २ ) अथवा अपने पूर्वरूपमें स्थित परमात्माका एक ही देश केश या ऊषरभूमिके समान [ विज्ञानात्म-रूपसे ] विकारको प्राप्त होता है, ( ३ ) अथवा दुग्धादिके समान सारा ही परमात्मा विकारको प्राप्त हो जाता है । इन पक्षोंमेंसे यदि [ यह माना जाय कि ] समान जातिवाले अनेक द्रव्योंके समुदायका कोई द्रव्यविशेष ही विज्ञानात्मत्वको प्राप्त होता है तो समानजातीय होनेके कारण उन
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४७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ त्वादेकत्वमुपचरितमेव न तु पर- । मार्थतः । तथा च सति सिद्धा-न्तविरोधः । अथ नित्यायुत सिद्धावयवानु-गतोऽवयवी पर आत्मा, तस्य तदवस्थस्यैकदेशो विज्ञानात्मा संसारी -- -- तदापि सर्वावयवानुगत । त्वादवयविन एवावयवगतो दोषो गुणो वेति, विज्ञानात्मनः संसारि-त्वदोषेण पर एवात्मा सम्बध्यत । इति, इयमप्यनिष्टा कल्पना । चीरवत्सर्व परिणामपक्षे सर्वश्रुति-स्मृतिकोपः, स चानिष्टः । “ नि-ष्कलं निष्क्रियं शान्तम् ” ( श्वे ० उ ० ६ । १ ९ ) “ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः " ( मु ० उ ० २।१।२ ) " अकाश-वत्सर्वगतश्च नित्यः " " स वा एष महान आत्माजरोऽमरो-ऽमृतः ” ( बृ ० उ ०४ । ४ । २५ ) “ न जायते म्रियते वा कदाचित् " ( गीता २ । २० ) " अव्यक्तो ऽयम् " ( गीता २।२५ ) इत्यादि । 22 ( परमात्मा और विज्ञानात्मा ) का एकत्व उपचारसे ही होगा, परमार्थतः नहीं । ऐसा माननेपर सिद्धान्तसे विरोध आवेगा । और यदि परमात्मा नित्य अयुत. सिद्ध अवयवों में अनुगत अवयवी है और उसी रूपमें स्थित हुए उस परमात्माका एकदेश संसारी विज्ञा-नात्मा है तो उस अवस्थामें भी अव-यवगत गुण या दोष समस्त अवयवों-में अनुगत होने के कारण अवयवीमें ही रहेगा; इस प्रकार विज्ञानात्माके संसारित्वरूप दोषसे परमात्माका ही सम्बन्ध सिद्ध होता है । अतः यह कल्पना भी इष्ट नहीं हो सकती । दुग्धके समान सम्पूर्ण परमात्माका परिणाम माननेके पक्षमें भी समस्त श्रुति - स्मृतियोंसे विरोध होता है और यह इष्ट नहीं है । अतः ये सब पक्ष " निष्कल, निष्क्रिय और शान्त है " ' पुरुष दिव्य, अमूर्त, बाहर - भीतर विद्यमान और अजन्मा है " " वह आकाशके समान सर्वंगत और नित्य है ", " वह यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर एवं अमृत है ", " वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है ", वह " अव्यक्त है "
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[ अध्याय २ और विज्ञानात्मा ) का रसे ही होगा, परमार्थतः मानने पर सिद्धान्तसे गा । बरमात्मा नित्य अयुत-में अनुगत अवयवी है में स्थित हुए उस एकदेश संसारी विज्ञा-उस अवस्था में भी अव-दोष समस्त अवयवों-नेके कारण अवयवीमें प्रकार विज्ञानात्मा के दोषसे परमात्माका ही होता है । अतः यह इष्ट नहीं हो सकती । - सम्पूर्ण परमात्माका नेके पक्ष में भी समस्त से विरोध होता है और है । अतः ये सब पक्ष ष्क्रिय और शान्त है " अमूर्त, बाहर - भीतर र अजन्मा है " " वह नमान सर्वगत और वह यह महान् अजन्मा , अमर एवं अमृत है ", उत्पन्न होता है और ", वह " अव्यक्त है " ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३ श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धा एते सर्वे । पक्षाः । अचलस्य परमात्मन एकदेश-पक्षे विज्ञानात्मनः कर्मफलवद्देश-संसरणानुपपत्तिः, परस्य वा संसारि-त्वम् - इत्युक्तम् | परस्यैकदेशोऽग्नि-विस्फुलिङ्गवस्फुटितो विज्ञानात्मा संसरतीति चेत् — तथापि परस्या -चयवस्फुटनेन क्षतप्राप्तिः, तत्संस-रणे च परमात्मनः प्रदेशान्तराव - | यवव्यूहे छिद्रताप्राप्तिः अत्रणत्व-वाक्यविरोधश्च । आत्मावयव -भूतस्य विज्ञानात्मनः संसरणे परमात्मशून्य प्रदेशाभावादवय-वान्तरनोदनव्यूहनाभ्यां हृदय-शूलेनेव परमात्मनो दुःखित्व प्राप्तिः । अग्निविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्त-श्रुतेर्न दोष इति चेत्? इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे विरूद्ध हैं । अचल परमात्माके एक देशमें विज्ञानात्मा है - इस पक्षमें विज्ञानात्मा-का कर्मफलयुक्त देशमें जाना सम्भव नहीं है तथा परमात्माको संसारित्व-की प्राप्ति होती है - ऐसा ऊपर कहा जा चुका है । यदि कहो कि अग्निसे चिनगारीके समान परमात्माका एक देशरूप विज्ञानात्मा उससे अलग होकर आता - जाता है तो भी अवयवके फूटकर अलग हो जानेसे परमात्मामें क्षतकी प्राप्ति होगी तथा उसके जानेपर परमात्माके अन्य देशस्थ अवयवसमुदाय में छेद-की भी प्राप्ति होगी और इस प्रकार परमात्माको निश्छिद्रताका प्रति-पादन करनेवाले वाक्यसे विरोध होगा । परमात्मासे शून्य देशका अभाव होनेके कारण आत्माके अव-यवभूत विज्ञानात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होनेपर अवयवान्तरके ह्रास और वृद्धिके कारण परमात्माको हृदयशूलके क समान समान दुःखकी प्राप्ति होगी । पूर्व ० - किंतु आगकी चिनगारी आदि दृष्टान्तोंका वर्णन करने-वाली श्रुति होनेके कारण ऐसा माननेमें भी कोई दोष नहीं हो सकता — यदि ऐसा कहें तो?
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४७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय न, श्रुतेर्ज्ञापकत्वात्; न शास्त्रं । पदार्थानन्यथा कर्तुं प्रवृत्तम् । किं तहिं १ यथाभूतानामज्ञातानां ज्ञापने । किञ्चातः! शृणु — अतो यद्भवति, यथा -भूता मूर्तामूर्वादिपदार्थधर्मा लोके प्रसिद्धाः । तद्द्दष्टान्तोपादानेन तदविरोध्येव वस्त्वन्तरं ज्ञापयितुं प्रवृत्तं शास्त्रं न लौकिकवस्तु विरोध-ज्ञापनाय लौकिकमेव दृष्टान्तमुपा-दत्ते । उपादीयमानोऽपि दृष्टान्तो-ऽनर्थकः स्वाद्दान्तिकासङ्गतेः । न ह्यग्निः शीत आदित्यो न तपतीति वा दृष्टान्तशतेनापि प्रति-पादयितुं शक्यम्, प्रमाणान्तरे-णान्यथाधिगतत्वाद्वस्तुनः । न च प्रमाणं प्रमाणान्तरेण विरुध्यते, प्रमाणान्तराविषयमेव हि प्रमाणा- । २ सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुति तो केवल ज्ञान ही करानेवाली है । शास्त्रकी प्रवृति पदार्थोंको अन्यथा करनेके लिये नहीं है । तो फिर किस लिये है? यथाभूत अज्ञात पदार्थोंको ज्ञा करानेके लिये । पूर्व ० O - इससे क्या होता है? सिद्धान्ती इससे जो होता है, सो सुनो । लोकमें वास्तविक ही मूर्त और अमूर्तादिरूप पदार्थ - धर्म प्रसिद्ध हैं । उन्हें दृष्टान्तरूपसे ग्रहण कर शास्त्र उनसे अविरोधी एक अन्य वस्तुको बतलानेके लिये प्रवृत्त होता है । वह लौकिक वस्तुओंका विरोध सूचित करनेके लिये लौकिक दृष्टान्तोंको ही ग्रहण करता हो-ऐसी बात नहीं है । ऐसा दृष्टान्त तो दाष्टन्तिकसे असंगत होनेके कारण ग्रहण किये जानेपर भी व्यर्थ ही होगा । अग्नि शीतल होता है, अथवा सूर्य नहीं तपता-यह बात सैकड़ों दृष्टान्तोंसे भी प्रतिपादित नहीं हो सकती; क्योंकि अन्य प्रमाणसे तो वह वस्तु दूसरे प्रकारकी जानी जाती है । एक प्रमाणका दूसरे प्रमाणसे विरोध नहीं प्रमाणसे होता । जो वस्तु एक् नहीं जानी जाती उसीको