बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 481–490

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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[ अध्याय २ ती - ऐसी बात नहीं है; ति तो केवल ज्ञान ही है । शास्त्रकी प्रवृत्ति अन्यथा करनेके लिये फिर किस लिये है? ज्ञात पदार्थोंको ज्ञात नये । इससे क्या होता है? ती इससे जो होता है, लोकमें वास्तविक ही नमूर्तादिरूप पदार्थ - धर्मं उन्हें दृष्टान्तरूपसे ग्रहण उनसे अविरोधी एक बतलानेके लिये प्रवृत्त लौकिक वस्तुओंका त करनेके लिये लौकिक ही ग्रहण करता हो-हीं है । ऐसा दृष्टान्त कसे असंगत होनेके किये जानेपर भी गा । अग्नि शीतल यवा सूर्य नहीं तपता-किड़ों दृष्टान्तोंसे भी हीं हो सकती; क्योंकि से तो वह वस्तु दूसरे नी जाती है । एक सरे प्रमाणसे विरोध । जो वस्तु एक ' जानी जाती उसीको ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७५ न्तरं ज्ञापयति । न च लौकिक - । पदपदार्थाश्रयणव्यतिरेकेणागमेन शक्यमज्ञातं वस्त्वन्तरमवग-मयितुम् । तस्मात्प्रसिद्धन्यायमनु-सरता न शक्या परमात्मनः सावयवांशांशित्वकल्पना परमा-र्थतः प्रतिपादयितुम् । " क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा: " ( बृ ० उ ० २ । १ । २० ) “ ममैवांशः ” ( गीता १५/७ ) इति च श्रूयते स्मर्यते चेति चेन्न, एकत्वप्रत्य-यार्थपरत्वात् । अग्नेहिं विस्फु-लिङ्गोऽग्निरेव इत्येकत्वप्रत्ययाह-दृष्टो लोके; तथा चांशोंऽशिनै-कत्वप्रत्ययाईः; तत्रैवं सति विज्ञानात्मनः परमात्मविकारांश -त्ववाचकाः शब्दाः परमात्मैकत्व-प्रत्ययाधित्सवः । उपक्रमोपसंहाराभ्यां च-दूसरा प्रमाण बतलाता है । तथा लौकिक पद और पदार्थोंका आश्रय लिये बिना शास्त्र के द्वारा किसी अज्ञात वस्त्वन्तरको नहीं जाना जा सकता । अत: इस प्रसिद्ध न्यायका अनुसरण करनेवाले पुरुषके द्वारा परमात्माके सावयवत्व और [ जीव-के साथ उसके ] अंशांशित्वकी कल्पनाका परमार्थतः प्रतिपादन नहीं किया जा सकता । यदि कहो कि " क्षुद्र विस्फु-लिङ्ग " और " मेरा ही अंश है ' इस प्रकार श्रुति और स्मृति भी कहती हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे तो [ जीवात्मा और परमात्माके ] एकत्वकी प्रती-तिके लिये हैं । अग्निकी चिनगारी अग्निं ही होती है, इसलिये लोकमें वह अग्नि के साथ एकत्व - प्रतीतिके योग्य देखा गया है । इसी प्रकार अंशीके साथ अंश भी एकत्व - प्रती-तिके योग्य है । ' अतः ऐसी स्थिति-में विज्ञानात्माको परमात्माका विकार या अंश बतलानेवाले शब्द परमात्मा के साथ उसके एकत्वकी प्रतीति कराना चाहते हैं । उपक्रम और उपसंहारसे भी यही बात सिद्ध होती है । सभी उप-

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४७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ सर्वासु ह्युपनिषत्सु पूर्वमेकत्वं प्रतिज्ञाय, दृष्टान्तैर्हेतुभिश्च परमा-त्मनी विकारांशादित्वं जगतः प्रतिपाद्य, पुनरेकत्वमुपसंहरति; तद्यथेदैव तावत् " इदं सर्व यदय-मात्मा ” ( २ । ४ । ६ ) इति प्रतिज्ञाय, उत्पत्तिस्थितिलयहेतु-दृष्टान्तैर्विकारविकारित्वाद्येकत्व-प्रत्यय हेतून्प्रतिपाद्य " अनन्तरम -चाह्यम् ” ( २।५।१ ९ ) " अय-मात्मा ब्रह्म ” ( २ | ५ | १ ९ ) | निषदोंमें पहले उनके एकत्वकी प्रतिज्ञा कर हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा जगत्को परमात्माका विकार या अंशादि बतलाकर फिर उनके एकत्वका उपसंहार किया है, जैसे कि यहाँ भी पहले " यह जो कुछ है, सब आत्मा है ” ऐसी प्रतिज्ञाकर उत्पत्ति, स्थिति, लय, हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा उनके एकत्वज्ञानके हेतुभूत विकार और विकारित्वादिका प्रतिपादन कर " अन्तरबाह्यशून्य है ”, “ यह आत्मा ब्रह्म है " इस प्रकार उपसंहार किया इत्युपसंहरिष्यति । तस्मादुपक्रमो - जायगा । अतः उपक्रम और उपसंहार-पसंहाराभ्यामयमर्थो निश्चीयते परमात्मैकत्वप्रत्ययद्रढिम्न उत्पत्तिस्थितिलयप्रतिपादकानि वाक्यानीति । अन्यथा वाक्यमेदप्रसङ्गाच-सर्वोपनिषत्सु हि विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वप्रत्ययो विधीयत इत्य विप्रतिपत्तिः सर्वेषामुपनिषद्वा-दिनाम् । तद्विभ्येकवाक्ययोगे च सम्भवत्युत्पत्त्यादिवाक्यानां वा-के द्वारा यह तात्पर्यं निश्चित होता है कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य परमात्माके साथ उसके एकत्वज्ञान-की दृढ़ता करानेके लिये हैं । यदि ऐसा न माना जायगा तो वाक्यभेदका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । सभी उपनिषदोंमें परमात्माके साथ विज्ञानात्माके एकत्वज्ञानका विधान किया गया है, इस विषयमें सभी उपनिषद्वेत्ताओंकी एक राय है— किसीका मतभेद नहीं है । उत्पस्यादि वाक्यों की भी उस विधिके साथ एक-वाक्यता सम्भव होनेपर उन्हें भिन्न

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[ अध्याय २ पहले उनके एकत्वकी र हेतु और दृष्टान्तोंके को परमात्माका विकार - बतलाकर फिर उनके उपसंहार किया है, जैसे भी पहले " यह जो नब आत्मा है " ऐसी उत्पत्ति, स्थिति, लय, दृष्टान्तोंके द्वारा उनके हेतुभूत विकार और दिका प्रतिपादन कर शून्य है ", " यह आत्मा प्रकार उपसंहार किया -: उपक्रम और उपसंहार-तात्पर्य निश्चित होता उत्पत्ति, स्थिति और नादन करनेवाले वाक्य -साथ उसके एकत्वज्ञान-रानेके लिये हैं । न माना जायगा तो प्रसङ्ग उपस्थित होगा । दोंमें परमात्मा के साथ एकत्वज्ञानका विधान इस विषयमें सभी नोंकी एक राय है-द नहीं है । उत्पत्त्यादि उस विधिके साथ एक-व होनेपर उन्हें भिन्न ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७७ क्यान्तरत्वकल्पनायां न प्रमाण- । मस्ति; फलान्तरं च कल्पयितव्यं स्यात्; तस्मादुत्पच्यादिश्रुतय श्रात्मैकत्वप्रतिपादनपराः । अत्र च सम्प्रदायविद आ-ख्यायिकां सम्प्रचक्षते - कश्चि-त्किल राजपुत्रो जातमात्र एव मातापितृभ्यामपविद्धो व्याधगृहे संवर्धितः, सोऽमुष्य वंश्यताम-जानन्व्याधजातिप्रत्ययो व्याध-जातिकर्माण्येवानुवर्तते; न राजा-स्मीति राजजातिकर्माण्यनुवर्तते । यदा पुनः कश्चित्परमकारुणिको राजपुत्रस्य राजश्री प्राप्तियोग्यतां जानन्नमुष्य पुत्रतां बोधयति - ' न त्वं व्याधोऽमुष्य राज्ञः पुत्रः - कथ-श्चिद्व्याघगृहमनुप्रविष्टः ' इति स एवं बोधितस्त्यक्त्वा व्याधजाति-अर्थका प्रतिपादन करनेवाला मानने में कोई प्रमाण नहीं है । इसके सिवा [ उन्हें अन्यार्थपरक माननेपर ] उनके फलान्तरकी भी कल्पना करनी पड़ेगी । अतः उत्पत्त्यादि आमाका एकत्व प्रतिपादन करनेवाली ही हैं । इस विषय में सम्प्रदायवेत्ता ( श्रीद्रविडाचार्य ) यह आख्यायिका कहते हैं - कोई राजपुत्र जन्म होते ही माता - पिताद्वारा त्याग दिया जानेके कारण व्याधके घरमें पाला-. पोसा गया । वह अपनी कुलीनता--को न जाननेके कारण अपनेको व्याधजातिका ही मानकर व्याध -जातिके कर्मोंका ही अनुवर्तन करता था, ' मैं राजा हूँ ' ऐसा मानकर राजोचित कर्म नहीं करता था । जब कोई अत्यन्त कृपालु पुरुष, जो राजपुत्रकी राजश्री प्राप्त करनेकी योग्यता जानता है, उसे उसकी राज-पुत्रताका बोध करा देता है और यह बतला देता है कि ' तू व्याध नहीं है, अमुक राजाका पुत्र है, किसी प्रकार इस व्याधके घरमें आ गया है ' तो इस प्रकार बोघ कराये जानेपर वह व्याघजातिके प्रत्ययसे होनेवाले कर्मोंको छोड़कर ' मैं राजा हूँ ' ऐसा

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४७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ प्रत्ययकर्माणि पितृपैतामहीमा - । त्मनः पदवीमनुवर्तते राजाहम-स्मीति । तथा किलायं परस्माद शिविस्फु-लिङ्गादिवत्तज्जातिरेव विभक्त इह देहेन्द्रियादिगहने प्रविष्टोऽसंसारी सन् देहेन्द्रियादिसंसारधर्ममनुवर्तते ' देहेन्द्रियसङ्घातोऽस्मि कृशः स्थूलः सुखी दुःखी ' इति परमा-स्मतामजानन्नात्मनः । न त्वमेत--दात्मकः परमेव ब्रह्मास्य संसारीति प्रतिबोधित श्राचार्येण हित्वैषणा-त्रयानुवृत्तिं ब्रह्मैवास्मीति प्रति-पद्यते । अत्र राजपुत्रस्य राजप्रत्य-यवब्रह्मप्रत्ययो दृढीभवति-विस्फुलिङ्गवदेव त्वं परस्माद् ब्रह्मणो भ्रष्ट इत्युक्ते विस्फुलिङ्ग-स्य प्रागग्ने भ्रंशाद्रदग्न्येकत्व-दर्शनात् । तस्मादेकत्वप्रत्ययदार्थ्याय सुव-र्णमणिलोहाग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्ताः, मानकर अपने बाप - दादोंके मार्गका अनुसरण करने लगता है । इसी प्रकार अग्निकी चिन-गारियोंके समान परमात्मासे विभक्त यह उसी ( परमात्मा ) की जाति-वाला विज्ञानात्मा यहाँ देह एवं इन्द्रियादि ग्रहनवनमें प्रविष्ट होने पर असंसारी होकर भी अपनी पर-मात्मस्वरूपताको न जानने के कारण ' में देहेन्द्रियादिका संघात तथा कृश, स्थूल एवं सुखी या दुखी हूँ ' ऐसा मानकर देह एवं इन्द्रियादि सांसारिक धर्मोंका अनुवर्तन करता है । किंतु ' तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं है, अपि तु असंसारी ब्रह्म ही है ' इस प्रकार आचार्यद्वारा बोध कराये जानेपर यह एषणात्रयकी अनुवृत्ति-को छोड़कर ' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा जान लेता है । तथा यहाँ ऐसा कहने पर कि ' तू अग्निसे विस्फुलिङ्ग-के समान परब्रह्मसे ही च्युत हुआ है ' राजपुत्रके राजप्रत्ययके समान उसका ब्रह्मप्रत्यय दृढ़ हो जाता है, क्योंकि अग्निसे च्युत होनेसे पूर्व विस्फुलिङ्गकी अग्निके साथ एकता देखी गयी है । अतः सुवर्ण, मणि, लोह एवं अग्नि - विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त एकत्वज्ञानकी दृढ़ताके लिये हैं,

पृष्ठ 485

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[ अध्याय २ SANN पने बाप - दादोंके मार्गका करने लगता है । प्रकार अग्निकी चिन-समान परमात्मासे विभक्त परमात्मा ) की जाति-ज्ञानात्मा यहाँ देह एवं गहनवनमें प्रविष्ट होनेपर व्होकर भी अपनी पर-पताको न देहेन्द्रियादिका संघात स्थूल एवं सुखी या दुखी कर देह एवं इन्द्रियादि धर्मोंका अनुवर्तन करता तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं असंसारी ब्रह्म ही है ' आचार्यद्वारा बोध कराये ह एषणात्र की अनुवृत्ति-' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा है । तथा यहाँ ऐसा ' तू अग्नि से विस्फुलिङ्ग-परब्रह्मसे ही च्युत हुआ के राजप्रत्ययके समान प्रत्यय दृढ़ हो जाता है, ग्निसे च्युत होनेसे पूर्व -की अग्नि के साथ एकता है । सुवर्ण, मणि, लोह - विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त की दृढ़ताके लिये हैं, ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७ ९ नोत्पत्यादि मेदप्रतिपादनपराः । सैन्धवधनवत्प्रज्ञप्त्येकरसनैरन्तर्या-चधारणात् " एकधैवानुद्रष्टव्यम् " । ( ४ । ४ । २० ) इति च । यदि च ब्रह्मणश्चित्रपटवट्टतसमुद्रादि-बच्चोत्पस्याद्यनेकधर्मविचित्रता वि -जिग्राहयिषिता, एकरसं सैन्धव-घनवदनन्तरमबाह्यमिति नोप-समहरिष्यत्, ‘ एकधैवानुद्रष्टव्यम् ’ | इति च न प्रायोक्ष्यत - " य इह । नानेव पश्यति ' ( ४ । ४ । १ ९ ) इति निन्दावचनं च । तस्मादेक-रूपैकत्वप्रत्ययदाढर्यायैव सर्ववेदा-न्तेषूत्पत्तिस्थितिलयादिकल्पना, न तत्प्रत्ययकरणाय । न च निरवयवस्य परमात्मनो-ऽसंसारिणः संसार्येकदेशकल्पना । न्याय्या, स्वतोऽदेशस्वात्परमात्म-नः । अदेशस्य परस्य एकदेश- । उत्पत्ति आदिका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं । तथा " उसे एकरूप ही देखना चाहिये ” इस श्रुतिसे नमकके उलेके समान उसे ज्ञानरूप एकरससे निरन्तर परिपूर्ण भी निश्चय किया गया है । यदि चित्रपट अथवा वृक्ष या समुद्रादिके समान उत्पत्ति आदि अनेक धर्मोके कारण ब्रह्मकी विचित्रताका हो ग्रहण करना अभीष्ट होता तो ' वह नमकके डलेके समान एकरस एवं अन्तरबाह्यशून्य है ' इस प्रकार उपसंहार न किया जाता तथा उसे “ एकरूप ही देखना चाहिये ” ऐसे आदेशका और " जो इसे नानावत् देखता है [ वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ] ” ऐसे निन्दासूचक वचन-का भी प्रयोग न होता । अत: समस्त वेदान्तों में जो उत्पत्ति, स्थिति एवं लय आदिकी कल्पना है, वह ब्रह्म-की एकरूपताके ज्ञानकी दृढ़ता लिये ही है, उन ( उत्पत्त्यादि ) की प्रतीति करानेके लिये नहीं है । इसके सिवा निरवयव और असंसारी परमात्मा के संसारीरूप एक देशकी कल्पना करना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि स्वयं परमात्मामें तो देश है नहीं । देशहीन परमात्माके

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४८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय संसारित्वकल्पनायां पर एव संसा-रीति कल्पितं भवेत् । अथ परो-पाधिकृत एकदेशः परस्य, घटकर-काद्याकाशवत्; न तदा तत्र विवेकिनां परमात्मैकदेशः पृथ-क्संव्यवहार भागिति बुद्धि- । रुत्पद्यते । विवेकिनां विवेकिनां चोप-चरिता बुद्धिर्डष्टेति चेत् १ न अविवेकिनां मिथ्याबुद्धि-स्वात् विवेकिनां च संव्यवहार-मात्रालम्बनार्थत्वात् - यथा कृष्णो रक्तश्चाकाश इति विवेकिनामपि कदाचित्कुष्णता रक्तता च आकाशस्य संव्यवहारमात्रालम्ब-नार्थत्वं प्रतिपद्यत इति, न परमा-र्थतः कृष्णो रक्तो वा आकाशो भवितुमर्हति । अतो न पण्डितै- । २ । एकदेशमें संसारित्व की कल्पना करते-में ' परमात्मा ही संसारी है ' ऐसी कल्पना हो जायगी और यदि ऐसा माना जाय कि घटाकाश और कर-काकाशादिके समान किसी अन्य उपाधिके कारण विज्ञानात्मा परमा-त्माका एकदेश है तो उसमें विवेकी पुरुषोंको ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती कि परमात्माका एकदेश पृथक् व्यवहार करनेमें समर्थ है । पूर्व ० - किंतु [ मैं कर्ता हूँ ] ऐसी गौणी ' बुद्धि तो अविवेकियों और विवेकियोंको भी होती देखी गयी है? सिद्धान्ती- नहीं, क्योंकि अवि-वेकियोंकी तो वह बुद्धि मिथ्या होती है और विवेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे व्यवहारको आलम्बन करनेके लिये; जिस प्रकार कि [ अविवेकियोंके समान ] विवेकियोंकी दृष्टिमें भी कभी - कभी ' आकाश काला अथवा लाल है ' इस प्रकार आकाशकी कृष्णता अथवा लाली व्यवहारमात्रके आलम्बनार्थत्वको प्राप्त हो जाती है, किंतु वस्तुतः आकाश काला या लाल नहीं हो सकता । अतः विद्वानों-गौणी १. वस्तुतः जीव अपरिच्छिन्न ब्रह्ममात्र है, इसलिये इस परिच्छिन्न बुद्धिको बतलाया गया है ।

पृष्ठ 487

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[ अध्याय२ संसारित्व की कल्पना करने-माही संसारी है ' ऐसी हो जायगी और यदि ऐसा य कि घटाकाश और कर-दिके समान किसी अन्य कारण विज्ञानात्मा परमा-कदेश है तो उसमें विवेकी ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो के परमात्माका एकदेश वहार करनेमें समर्थ है । - किंतु [ मैं कर्ता हूँ ] ऐसी द्धि तो अविवेकियों और को भी होती देखी गयी है? ती - नहीं, क्योंकि अवि-तो वह बुद्धि मिथ्या होती -वेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे आलम्बन करने के लिये; कार कि [ अविवेकियोंके विवेकियों की दृष्टिमें भी ' आकाश काला अथवा इस प्रकार आकाशकी थवा लाली व्यवहारमात्रके त्वको प्राप्त हो जाती है, सुतः आकाश काला या हो सकता । अतः विद्वानों-ये इस परिच्छिन्न बुद्धिको ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्मस्वरूपप्रतिपत्तिविषये ब्रह्मणों S शांश्येकदेशैकदेशिविकारविका-रिस्वकल्पना कार्या, सर्वकल्प-नापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनि-षदाम् । तो हित्वा सर्वकल्पनामाका-शस्येव निर्विशेषता प्रतिपत्तव्या -" श्राकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः " " न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः " ( क ० उ ० २ । २ । ११ ) इत्या-दिश्रुतिशतेभ्यः; नात्मानं ब्रह्म-विलक्षणं कल्पयेत् -- उष्णात्मक इवाग्नौ शीतैकदेशम्, प्रकाशात्म के वा सवितरि तमएकदेशम् - सर्व-कल्पनापनयनार्थसार परत्वात्सर्वो पनिषदाम् । तस्मान्नामरूपोपाधि-निमित्ता एवं आत्मन्यसंसार-धर्मिणि सर्वे व्यवहाराः; " रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव " ( क ० उ ० २।२ । ९ -१० ) “ सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा - । वृ ० उ ० ३१-४८१ को ब्रह्मस्वरूपके ज्ञानके विषयमें ब्रह्मके अंशांशी, एकदेश- एकदेशी अथवा विकार - विकारित्वादिकी कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सारी उपनिषदोंका तात्पर्यं समस्त कल्पनाओं की निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है । इसलिये सारी कल्पनाओंको छोड़कर “ ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है " " वह लोक-दुःखसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उससे बाह्य है " इत्यादि सेकड़ों श्रुतियोंके अनुसार आकाशके समान उसकी निर्दिशेषताका ही अनुभव करना चाहिये, उष्णस्वरूप अग्निमें एक शीतल देशके समान तथा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें एक अन्धकार-मय देशके समान ब्रह्मसे भिन्न आत्माकी कल्पना न करे; क्योंकि सब उपनिषदोंका तात्पर्यं समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है । अतः असंसार-धर्मी आत्मामें सारे व्यवहार नाम एवं रूपकृत उपाधिके कारण ही हैं, जैसा कि " वह रूप - रूपके अनुरूप हो गया है " " धीर पुरुष समस्त रूपोंकी रचना कर उनके नाम रखकर उनके द्वारा बोलता

पृष्ठ 488

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४८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ भिवदन्यदास्ते ' ' इत्येवमादिमन्त्र- । वर्णेभ्यः । न स्वत आत्मनः संसारित्वम्, अलक्तकाद्युपाधिसंयोगजनितर-क्तस्फटिकादिबुद्धिवद्भ्रान्तमेव, न परमार्थतः । " ध्यायतीव लेलाय-तीव " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ७ ) " न वर्धते कर्मणा नो । कनीयान् " ( ४ । ४ । २३ ) " न लिप्यते कर्मणा पापकेन " ( ४ । ४ । २३ ) “ समं सर्वेषु भूतेषु विष्ठन्तम् " ( गीता १३ । २७ ) " शुनि चैव श्वपाके च " ( गीता ५ । १८ ) इत्यादिश्रुति-स्मृतिन्यायेभ्यः परमात्मनोऽसंसा -रितैव । अत एकदेशो विकार: शक्तिर्वा विज्ञानात्मा अन्यो वेति विकल्पयितुं निरवयवत्वाभ्युपगमे । विशेषतो न शक्यते । अंशादि-श्रुतिस्मृतिवादाश्चैकत्वार्थाः, न तु मेदप्रतिपादकाः, विवक्षितार्थैक वाक्ययोगात् — इत्यवोचाम । सर्वोपनिषदां परमात्मैकत्व-उपनिषत्प्रामा- ज्ञापनपरत्वे अथ ण्यमीमांसा किमर्थं तत्प्रति-कूलोऽर्थो विज्ञानात्ममेदः परि-रहता है " इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध होता है । आत्माका संसारित्व स्वतः नहीं है, अपितु लाक्षा आदि उपाधिके संयोगसे होनेवाली ' स्फटिक लाल है ' इत्यादि बुद्धिके समान भ्रान्ति-जनित ही है, परमार्थतः नहीं । " मानो ध्यान करता है, मानो अधिक चलता है ", " यह कर्मसे न बढ़ता है, न छोटा होता है " " यह पापकर्मसे लिप्त नहीं होता " " समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित ", " कुत्ते और चाण्डालमें " इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे परमात्माका असंसारित्व ही सिद्ध होता है । अतः विशेषतः आत्माका निरव-यवत्व स्वीकार करनेपर ऐसा विकल्प नहीं किया जा सकता कि विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश, विकार, शक्ति अथवा और कुछ है । उसके अंशादि होनेका प्रति-पादन करनेवाले श्रुतिस्मृतिवाद भी आत्माके एकत्वके ही लिये हैं, भेदका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि उपनिषदोंके विवक्षित अर्थकी एकवाक्यता होनी चाहिये-ऐसा हम पहले कह चुके हैं । समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य परमात्माके एकत्वमें है, फिर विज्ञा-नात्माके भेदरूप उससे प्रतिकूल विषयकी कल्पना किस लिये की जाती

पृष्ठ 489

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[ अध्याय २ त्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध संसारित्व स्वतः नहीं लाक्षा आदि उपाधिके नेवाली ' स्फटिक लाल बुद्धिके समान भ्रान्ति-है, परमार्थतः नहीं । न करता है, मानो ता है ", " यह कर्मसे न छोटा होता है " " यह प्त नहीं होता " " समस्त नरूपसे स्थित ", " कुत्ते लमें " इत्यादि श्रुति, युक्तियोंसे परमात्माका ही सिद्ध होता है । नतः आत्माका निरव-कार करनेपर ऐसा किया जा सकता कि परमात्माका एकदेश, क्ति अथवा और कुछ अंशादि होनेका प्रति-वाले श्रुतिस्मृतिवाद भी एकत्वके ही लिये हैं, तपादन करनेवाले नहीं उपनिषदोंके विवक्षित वाक्यता होनी चाहिये-हले कह चुके हैं । उपनिषदों का तात्पर्यं एकत्वमें है, फिर विज्ञा-नेदरूप उससे प्रतिकूल -पना किस लिये की जाती . ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ कल्प्यत इति १ कर्मकाण्डप्रामा-ण्यविरोधपरिहारायेत्येके; कर्म -प्रतिपादकानि हि वाक्यानि अनेकक्रियाकारकफलभोक्तृकर्त्रा-श्रयाणि, विज्ञानात्मभेदाभावे ह्यसं-सारिण एव परमात्मन एकत्वे कथमिष्टफलासु क्रियासु प्रवर्त-येयुः ९अनिष्टफलाभ्यो वा क्रिया-भ्यो निवर्तयेयुः? कस्य वाबद्धस्य मोक्षायोपनिषदारस्येत? अपि च परमात्मैकत्ववादिपक्षे कथं परमात्मैकत्वोपदेशः १ कथं वा तदुपदेशग्रहणफलम् ९ वद्धस्य हि बन्धनाशायोपदेशस्तदभाव उप-निषच्छास्त्रं निर्विषयमेव । एवं तर्हि उपनिषद्वादिपक्षस्य कर्मकाण्डवा दिपक्षेण चोद्य परिहार-४८३ | है? इसपर किन्हीं ( मीमांसकों ) का तो कहना है कि यह कल्पना कर्म-काण्डके प्रामाण्यसे प्रतीत होनेवाले विरोधका परिहार करनेके लिये है, क्योंकि कर्मका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य अनेकों क्रिया, कारक, फल, भोक्ता और कर्ताओंको आश्रय करनेवाले हैं, विज्ञानात्माका भेद न होनेपर असंसारी परमात्माका एकत्व रहते हुए वे किस प्रकार लोगोंको इष्टफलोंवाली क्रियाओंमें प्रवृत्त अथवा अनिष्ट फलोंवाली क्रियाओंसे निवृत्त कर सकेंगे । तथा किस बद्ध जीवकी मुक्तिके लिये उपनिषद्का आरम्भ किया जायगा? इसके सिवा परमात्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवालोंके: मतमें किसीको परमात्माके एकत्वका उपदेश भी क्यों दिया जायगा और किस प्रकार उसके उपदेशग्रहणका फल होगा? क्योंकि बद्ध जीवके बन्धनका नाश करनेके लिये ही इसका उपदेश किया जाता है, बन्धन न होनेपर तो उपनिषच्छास्त्रका कोई विषय ही नहीं रहता । पूर्व ० - ऐसी स्थितिमें तो उप-निषद्वादी पक्षके शङ्का - समाधानका मार्ग कर्मकाण्डवादी पक्षके समान ही

पृष्ठ 490

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४८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ योः समानः पन्थाः – येन मेदा- । भावे कर्मकाण्डं निरालम्बनमा -त्मानं न लभते प्रामाण्यं प्रति तथोपनिषदपि । एवं तर्हि यस्य प्रामाण्ये स्वार्थविघातो नास्ति, 9 तस्यैव कर्मकाण्डस्यास्तु प्रामा-ण्यम्; उपनिषदां तु प्रामाण्य-कल्पनायां स्वार्थविघातो भवेदिति मा भूत्प्रामाण्यम् । न हि कर्म-काण्डं प्रमाणं सदप्रमाणं भवितु-मर्हति न हि प्रदीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति, न प्रकाशयति चेति । प्रत्यक्षादिप्रमाणविप्रतिषेधाच्च --न केवलमुपनिषदो ब्रह्मैकत्वं प्रति-पादयन्त्यः स्वार्थविघातं कर्म काण्डप्रामाण्यविघातं च कुर्वन्ति प्रत्यक्षादिनिश्चित मेदप्रतिपत्यर्थ-प्रमाणैश्च विरुध्यन्ते । तस्माद-है, क्योंकि जिस प्रकार भेद न होने-पर कर्मकाण्ड निरालम्ब ( अघि-कारि - शून्य ) होकर अपनी प्रामा-णिकता सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार उपनिषद् भी स्वयं प्रामा-. णिक नहीं हो सकती । यदि ऐसी बात है, तब तो जिसकी प्रामा-णिकता माननेपर स्वार्थका ' विघात नहीं होता, उस कर्मकाण्डकी ही प्रामाणिकता माननी चाहिये । उप-निषदों के प्रामाण्यकी कल्पना करने-में तो स्वार्थका विधात होता है, इसलिये उनकी प्रामाणिकता भले ही न हो । कर्मकाण्ड प्रामाणिक होकर अप्रामाणिक नहीं हो सकता, क्योंकि उत्तम दीपक अपने प्रकाश्य पदार्थको प्रकाशित करता है और प्रकाशित नहीं भी करता - ऐसा नहीं होता । इसके सिवा अभेद श्रुतियोंका प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध भी है । ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करने-वाली उपनिषदें केवल स्वार्थंविघात और कर्मकाण्डके प्रामाण्यका विघात ही नहीं करतीं अपितु निश्चित भेदका ज्ञान करनेवाले प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उनका विरोध भी है । १. शब्दकी शक्तिवृत्तिसे प्रतीत होनेवाले सृष्टयादि भेदका ।