बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 491–500
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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[ अध्याय २ जिस प्रकार भेद न होने--ड निरालम्ब ( अधि-) होकर अपनी प्रामा-नहीं कर सकता, उसी निषद् भी स्वयं प्रामा-हो सकती । यदि ऐसी तो जिसकी प्रामा-नेपर स्वार्थका विघात - उस कर्मकाण्डकी ही माननी चाहिये । उप-माण्यकी कल्पना करने-यंका विघात होता है, की प्रामाणिकता भले कर्मकाण्ड प्रामाणिक माणिक नहीं हो सकता, म दीपक अपने प्रकाश्य काशित करता है और नहीं भी करता - ऐसा सिवा अभेद श्रुतियोंका माणसे विरोध भी है । ताका प्रतिपादन करने-निषदें केवल स्वार्थविघात Tush प्रामाण्यका विघात करतीं अपितु निश्चित न करनेवाले प्रत्यक्षादि उनका विरोध भी है । भेदका । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ प्रामाण्यमेवोपनिषदाम्; अन्या-र्थता वास्तु न त्वेत्र ब्रह्मैकत्त्र-प्रतिपच्यर्थता । न; उक्तोत्तरत्वात् । प्रमाणस्य हि प्रमाणत्वमप्रमाणत्वं वा प्रमो-त्पादनानुत्पादन निमित्तम्, श्र अ-न्यथा चेत्स्तम्भादीनां प्रामाण्य-प्रसङ्गाच्छन्दादौ प्रमेये । किश्वातः १ यदि तावदुपनिषदो ब्रह्मैकस्व-प्रतिपत्तिप्रमां कुर्वन्ति, कथमप्र-माणं भवेयुः १ न कुर्वन्त्येवेति चेद्यथाग्निः शीतमिति १ स भवानेवं वदन्वक्तव्यः - उप-निषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थं भवतो वाक्यमुपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधं किं १. स्तम्नादिसे शब्दादिकी प्रमा नहीं ४८५ | अतः उपनिषदें अप्रामाणिक ही हैं, अथवा उनका कोई अन्य प्रयोजन हो सकता है, वे ब्रह्मका एकत्व प्रतिपादन करनेके लिये ही नहीं हो सकतीं । सिद्धान्ती - नहीं, क्योंकि इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है । प्रमाणकी प्रमाणता अथवा अप्रमा-णता प्रमाकी उत्पत्ति करने या न करनेके कारण ही होती है, यदि ऐसा न माना जायगा तो शब्दादि प्रमेयमें स्तम्भादिकी भी प्रमाणता-का प्रसङ्ग उपस्थित होगा ' । पूर्व ० - सो, इससे क्या हुआ? सिद्धान्ती - यदि उपनिषदें ब्रह्म-ज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, तो वे किस प्रकार अप्रामाणिक होंगी? पूर्व ० - किंतु ' अग्नि शीतल होता है, इस वाक्यके समान यदि वे प्रमा उत्पन्न करती ही न हों तो? सिद्धान्ती - इस प्रकार बोलनेवाले आपसे हमें यह कहना है कि उप-निषद् के प्रामाण्यका प्रतिषेध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ आपका वाक्य उपनिषद् प्रामाण्यका निषेध क्या होती; किंतु यदि प्रमाणके लिये प्रमा-को उत्पन्न करना आवश्यक न · मानें तो उन्हें भी प्रमाण क्यों न माना जाय?
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४८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ न करोत्येवाग्निर्वा रूपप्रकाशम् १ । अथ करोति । यदि करोति भवतु वंदा प्रतिषेधाथ प्रमाणं भवद्वाक्यम्, अग्निश्च रूपप्रकाशको भवेत्; प्रतिषेधवाक्यप्रामाण्ये भवत्येवोप । निषदां प्रामाण्यम् । अत्र भवन्तो ब्रुवन्तु कः परिहार इति? नन्वत्र प्रत्यक्षा मद्वाक्य उप-निषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थप्रतिपत्ति-रग्नौ च रूपप्रकाशनप्रतिपत्तिः प्रमा । कस्तर्हि भवतः प्रद्वेषो ब्रह्म-कत्वप्रत्यये प्रमां प्रत्यक्षं कुर्वती-षूपनिषत्सूपलभ्यमानासु १ प्रति-षेधानुपपत्तेः । शोकमोहादिनिवृ-त्तिश्व प्रत्यक्षं फलं ब्रह्मैकत्वप्रति-पत्तिपारम्पर्यजनितमित्यवोचाम । तस्मादुक्तोचरत्वादुपनिषदं प्रत्य-१. ' उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा गया है । नहीं करता है तथा अग्निरूपको क्या प्रकाशित नहीं करता है? पूर्व ० - करता तो है । सिद्धान्ती - यदि वह उसका प्रतिषेध करता है तो उसका प्रति-षेध करनेमें आपका वाक्य प्रमाण हो सकता है तथा अग्नि भी रूपका प्रकाशक हो सकता है । अतः यदि आपका प्रतिषेधक वाक्य प्रामाणिक है तो उपनिषदोंकी प्रामाणिकता होनी ही चाहिये | अब आप बतलाइये इसका क्या परिहार हो सकता है? पूर्व ० - यहाँ मेरे वाक्यमें उप-: निषत्प्रामाण्यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप प्रमा तथा अग्निमें रूपप्रकाशनका ज्ञानरूप प्रमा तो प्रत्यक्ष ही है । सिद्धान्त - तो फिर ब्रह्म कत्वज्ञान-में प्रमाको प्रत्यक्ष करती हुई उपलब्ध होनेवाली उपनिषदों में ही आपका क्या द्वेष है? क्योंकि उनके प्रामाण्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । तथा हम यह कह चुके हैं कि शोक-मोहादिकी निवृत्ति - यह ब्रह्मकत्व-ज्ञानकी परम्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष फल है । अत: इसका उत्तर ऊपर दे | दिया जानेके कारण उपनिषदोंमें उत्पन्न करती हैं, यह उत्तर ऊपर दिया
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[ अध्याय २ - है तथा अग्निरूपको नहीं करता है? करता तो है । -यदि वह उसका ता है तो उसका प्रति-आपका वाक्य प्रमाण हो या अग्नि भी रूपका सकता है | अतः यदि षेक वाक्य प्रामाणिक निषदोंकी प्रामाणिकता हिये | अब आप बतलाइये परिहार हो सकता है? हाँ मेरे वाक्यमें उप--यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप अग्नि में रूपप्रकाशनका ना तो प्रत्यक्ष ही है । - तो फिर ब्रह्म कत्वज्ञान-त्यक्ष करती हुई उपलब्ध उपनिषदोंमें ही आपका क्योंकि उनके प्रामाण्यका हीं किया जा सकता । ह कह ह चुके हैं हैं कि कि शोक-निवृत्ति - यह ब्रह्मकत्व-म्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष तः इसका उत्तर ऊपर दे के कारण उपनिषदोंमें हैं, यह उत्तर ऊपर दिया ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ प्रामाण्यशङ्का तावन्नास्ति । यच्चोक्तं स्वार्थविघातकरत्वा-दप्रामाण्यमिति, तदपि न, तदर्थ-प्रतिपत्तेर्बाधकाभावात् । न हि उपनिषद्भयः - — ब्रह्मैकमेवाद्विती-यम्, नैव च – इति प्रतिपत्तिरस्ति यथाग्निरुष्णः शीतश्चेत्यस्माद्वा-क्याद्विरुद्धार्थद्वयप्रतिपत्तिः । -भ्युपगम्य चैतदवोचाम; न तु वाक्यप्रामाण्यसमय एष न्यायः-यदुत्तैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वम् । सति चानेकार्थत्वे, स्वार्थश्च स्यात्, तद्विघातकृच्च विरुद्धोऽन्योऽर्थः । न त्वेतत् — वाक्यप्रमाणकानां विरु-द्धमविरुद्धं च ' एकं वाक्यम्, अने-कमर्थं प्रतिपादयतीत्येष समयः, अर्थैकत्वाद्वयेकवाक्यता । न च कानिचिदुपनिषद्वाक्यानि ब्रह्मैकत्वप्रतिषेधं कुर्वन्ति । यत्तु लौकिकं वाक्यम् – अग्निरुष्णः । ४८७ अप्रामाण्यकी शङ्का तो हो नहीं सकती । और ऐसा जो कहा कि अपने अर्थका विघात करनेवाली होनेसे उनकी अप्रामाणिकता है, सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि उनसे होनेवाले अर्थंज्ञानका कोई बाधक नहीं है । उपनिषदोंसे यह ज्ञान नहीं होता कि ब्रह्म एकमात्र अद्वि-तीय है भी और नहीं भी है, जिस प्रकार कि ' अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, इस एक ही वाक्यसे दो विरुद्ध अर्थों का ज्ञान होता है । तथा यह समझकर ही हम ऐसा कह चुके हैं कि वाक्यकी प्रामा-णिकताके समय एक वाक्यके अनेक अर्थ मानने उचित नहीं हैं । यदि वाक्यके अनेक अर्थं होंगे तो एक उसका अपना अर्थ होगा और दूसरा उसका विघात करनेवाला अर्थ होगा । ' एक ही वाक्य बहुत - से विरुद्ध और अविरुद्ध अर्थोंका भी प्रतिपादन करता है, यह वाक्यको प्रमाण माननेवालोंका सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि अर्थकी एकता होनेसे ही सबकी एकवाक्यता होती है । कोई - कोई उपनिषद्वाक्य ब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हों - ऐसी भी बात नहीं है । ' अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, यह जो लौकिक
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४८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ शीतश्चेति, न तत्रैकवाक्यता, तदेक देशस्य प्रमाणान्तरविषयानुवादि-त्वात् । श्रग्निः शीत इत्येतदेकं वाक्पम् अग्निरुष्ण इति तु प्रमा-णान्तरानुभवस्मारकम्, न तु स्त्र-यमर्थावबोधकम् । अतो नाग्निः शीत इत्यनेनैकवाक्यता, प्रमाणा-न्तरानुभवस्मारणेनैवो पक्षीणत्वात् । यत्तु विरुद्धार्थप्रतिपादकमिदं वाक्यमिति मन्यते तच्छीतोष्ण-वाक्य है, वहाँ एकवाक्यता नहीं होती; क्योंकि उसका एकदेश प्रमा-णान्तरके विषयभूत अर्थका अनुवाद करनेवाला है । ' अग्नि शीतल होता है ' यह एक वाक्य है और ' अग्नि उष्ण होता है ' यह प्रमाणान्तरसे प्राप्त हुए अनुभवका अनुवादक है, स्वयं किसी विशेष अर्थ का द्योतक नहीं है । अतः ' अग्नि शोतल होता है ' इस वाक्यसे उसकी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि वह प्रमाणान्तरसे होनेवाले अनुभवकी स्मृति कराकर ही समाप्त हो जाता है । और ऐसा जो माना जाता है कि यह वाक्य विरुद्ध अर्थोंका प्रतिपादन करने-वाला है, वह शीत और उष्ण पदों-पदाभ्याम् अग्निपदसामानाधिक-- का अग्निपदके समानाधिकरणरूप-रण्यप्रयोगनिमित्ता भ्रान्तिः न से प्रयोग होनेके कारण उत्पन्न हुई त्वेवैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वं भ्रान्ति ' है । वास्तवमें तो लौकिक हो अथवा वैदिक, एक वाक्यके लौकिकस्य वैदिकस्य वा । अनेक अर्थ हो ही नहीं सकते । यच्चोक्तं कर्मकाण्डप्रामाण्य- और ऐसा जो कहा कि उपनिष-कर्मकाण्डप्रामा- विघातकृदुपनिषद्वा- द्वाक्य कर्मकाण्डकी प्रामाणिकता-ष्योपपादनम् क्यमिति, तन्न; को नष्ट करनेवाले हैं, सो यह बात अन्यार्थत्वात् नहीं है; क्योंकि उनका तात्पर्य तो । ब्रह्मैकत्वप्रतिपाद- । दूसरा है । ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन नपग ह्युपनिषदो नेष्टार्थप्राप्तौ | करनेवाली उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी १. तात्पर्य यह है कि वस्तुतः यह किसी प्रमाका उत्पादक नहीं है ।
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[ अध्याय २ हाँ एकवाक्यता नहीं = उसका एकदेश प्रमा-जयभूत अर्थका अनुवाद | ' अग्नि शीतल होता वाक्य है और ' अग्नि है ' यह प्रमाणान्तरसे भवका अनुवादक है, विशेष अर्थका द्योतक तः ' अग्नि शीतल होता नसे उसकी एकवाक्यता कि वह प्रमाणान्तरसे भवकी स्मृति कराकर जाता है 1 । और ऐसा जाता है कि यह वाक्य का प्रतिपादन करने-इ शोत और उष्ण पदों-के समानाधिकरणरूप-नेके कारण उत्पन्न हुई वास्तवमें तो लौकिक वैदिक, एक वाक्यके हो ही नहीं सकते । T जो कहा कि उपनिष-काण्डकी प्रामाणिकता-नेवाले हैं, सो यह बात ोकि उनका तात्पर्यं तो झकी एकताका प्रतिपादन उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी उत्पादक नहीं है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८ ९ साधनोपदेशं तस्मिन्वा पुरुष- प्राप्तिके लिये साघन के उपदेश तथा नियोगं वारयन्ति, अनेकार्थत्वा- उसमें पुरुषके नियोगका निवारण नहीं करती; क्योंकि उनके अनेक नुपपत्तेरेव । अर्थ होने सम्भव ही नहीं हैं । न च कर्मकाण्डवाक्यानां स्वार्थे तथा कर्मकाण्डसम्बन्धी बाक्योंकी प्रमा नोत्पद्यते । असाधारणे चेत्स्वार्थे प्रमामुत्पादयति वाक्यम् कुतोऽन्येन विरोधः स्यात् १ ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वात्प्रमा नोत्पद्यत एवेति चेत्? न, प्रत्यक्षत्वात्प्रमायाः । “ दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ” “ ब्राह्मणो न हन्तव्यः " इत्येवमादिवाक्येभ्यः प्रत्यक्षा प्रमा जायमाना; ' सा नैव भविष्यति, यद्युपनिषदो ब्रह्मैकत्वं बोधयिष्य-न्ति ' इत्यनुमानम्; न चानुमानं प्रत्यक्षविरोधे प्रामाण्यं लभतेः तस्मादसदेवैतद्गीयते — प्रमैव नोत्व-खत इति । अपि च यथाप्राप्तस्यैव । स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न न होती हो - ऐसी बात भी नहीं है! यदि कोई वाक्य अपने असाधारण अर्थमें प्रमा उत्पन्न , करता है तो उसका दूसरे वाक्यसे विरोध क्यों होगा? पूर्व ० - यदि कहें ब्रह्मकी एकता माननेपर तो कर्मकाण्डपरक वाक्यों-का कोई विषय ही नहीं रहता, इस-लिये प्रमा उत्पन्न हो ही नहीं सकती; तो? सिद्धान्ती - – ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनसे प्रमाका होना तो प्रत्यक्ष है । " स्वर्गकी इच्छावाला दर्श और पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे " “ ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये ” इत्यादि ऐसे ही वाक्योंसे प्रमा प्रत्यक्ष उत्पन्न होती देखी जाती है; ' यदि उपनिषदें ब्रह्मकी एकताका ज्ञान करायँगी तो वह नहीं होगी ' यह तो अनुमान है । और प्रत्यक्षसे विरोध-होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं रह सकती । इसलिये यह कहना कि उनसे प्रमा ही उत्पन्न नहीं होती -असत् ही है । अपितु जो पुरुष
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४ ९ ० अविद्याप्रत्युपस्थापितस्य क्रिया- । कारकफलस्याश्रयणेन इष्टा-निष्टप्राप्तिपरिहारोपायसामान्ये प्र-वृत्तस्य तद्विशेषमजानतः तदा-चक्षाणा श्रुतिः क्रियाकारकफल-भेदस्य लोकप्रसिद्धस्य सत्यताम-सत्यतां वा नाचष्टे न च वार-यति, इष्टानिष्टफलप्राप्तिपरिहारो-पायविधिपरत्वात् । यथा काम्येषु प्रवृत्ता श्रुतिः कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वे सत्यपि यथाप्राप्तानेव कामानु-पादाय तत्साधनान्येव विधत्ते न अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए यथा-प्राप्त क्रिया, कारक और फलका आश्रय करके इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-निवृत्तिके सामान्य उपायमें प्रवृत्त है तथा उसका विशेष उपाय नहीं जानता, उसे वह ( विशेष उपाय ) बतलानेवाली श्रुति लोकप्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलभेदकी सत्यता एवं असत्यताका न तो प्रतिपादन ही करती है और न निषेध ही; क्योंकि वह तो इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायका विधान करनेमें ही तत्पर है । जिस प्रकार काम्यकर्मोंमें प्रवृत्त हुई श्रुति कामनाओंके मिथ्याज्ञान-जनित होनेपर भी यथाप्राप्त काम-नाओंको ही लेकर उनके साधनों-का ही विधान करती है, किंतु ' कामनाएँ मिथ्या ज्ञानजनित होने के तु कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वा- कारण अनर्थरूप नहीं हैं ' ऐसा दनर्थरूपत्वं चेति न विदधाति । विधान नहीं करती । इसी प्रकार अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका निरूपण तथा नित्याग्निहोत्रादिशास्त्रमपि करनेवाला शास्त्र भी मिथ्याज्ञान-मिथ्याज्ञानप्रभवं क्रियाकारकमेदं जनित यथाप्राप्त क्रिया, कारक यथाप्राप्तमेवादाय इष्टविशेषप्राप्ति- और फलरूप भेदको ही लेकर इष्ट-विशेषकी प्राप्ति और अनिष्ट-मनिष्टविशेषपरिहा वा किमपि विशेषके परिहाररूप किसी प्रयोजनं पश्यदग्निहोत्रादीनि प्रयोजनको देखकर अग्निहोत्रादि कर्मों का विधान करता है । कर्माणि विधत्ते । नाविद्यागोच- । इस प्रयोजनका अविद्याविषयक
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[ अध्याय २ 2 प्रस्तुत किये हुए यथा-कारक और फलका इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-मान्य उपायमें प्रवृत्त है - विशेष उपाय नहीं वह ( विशेष उपाय ) श्रुति लोकप्रसिद्ध रक और फलभेदकी असत्यताका न तो ही करती है और न क्योंकि वह तो इष्टप्राप्ति ष्टनिवृत्ति के उपायका में ही तत्पर है । कार काम्यकर्मों में प्रवृत्त कामनाओंके मिथ्याज्ञान-पर भी यथाप्राप्त काम-7 लेकर उनके साधनों-धान करती है, किंतु मिथ्या ज्ञानजनित होने के नथंरूप नहीं हैं ' ऐसा हीं करती । इसी प्रकार दि नित्यकर्मोंका निरूपण T शास्त्र भी मिथ्याज्ञान-नथाप्राप्त क्रिया, कारक रूप भेदको ही लेकर इष्ट-प्राप्ति और अनिष्ट-परिहाररूप को देखकर अग्निहोत्रादि विधान करता है । योजनका अविद्याविषयक ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ रासद्वस्तु विषयमिति न प्रवर्तते यथा काम्येषु । न च पुरुषा न प्रवर्तेरन्नविद्या-वन्तः, दृष्टत्वाद्यथा कामिनः । विद्यावतामेव कर्माधिकार इति चेद १ न, ब्रह्मैकत्वविद्यायां कर्मा-धिकारविरोधस्योक्तत्वात् । एतेन ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वादुपदेशेन तद्ग्रहणफलाभावदोषपरिहार उक्तो वेदितव्यः । पुरुषेच्छारागादिवैचित्र्याच्च-अनेका हि पुरुषाणामिच्छाः, रागादयश्च दोषा विचित्रा:; ततश्च बाह्यविषय रागाद्यपहृतचेतसो न शाखं निवर्तयितुं शक्तम्; नापि स्वभावतों बाह्यविषयविरक्त-४ ९ १ । असद्वस्तुसे सम्बन्ध है, इसलिये उनका विधान न करता हो - ऐसी बात नहीं है, जैसा कि काम्य - कर्मों के विषयमें भी देखा गया है । अविद्यावान् पुरुषोंकी उन कर्मों-में प्रवृत्ति न होती हो - ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि सकाम पुरुषोंके समान उन्हें भी प्रवृत्त होते देखा ही गया है । पूर्व ० – कर्मका अधिकार तो विद्वानोंको ही है - ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - नहीं, क्योंकि ब्रह्मकी एकताके ज्ञानमें कर्माधिकारका विरोध तो बतलाया जा चुका है । इसीसे यह जान लेना चाहिये कि ब्रह्मको एकता सिद्ध होनेपर कोई विषय न रहनेके कारण कर्मकाण्ड-के उपदेशसे उसका ग्रहणरूप फल नहीं हो सकता - इस दोषका परि-हार बतला दिया गया है । पुरुषोंकी इच्छा एवं रागादिका भेद रहनेके कारण भी [ कर्मकाण्ड-के उपदेशकी सार्थकता सिद्ध होती है ] । पुरुषोंकी अनेकों इच्छाएं हैं और रागादि तरह - तरहके दोष हैं, अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंके राग-से आकर्षित है, उन्हें उससे निवृत्त करनेमें शास्त्र समर्थ नहीं है । इसी तरह जिनका चित्त स्वभावसे ही बाह्य विषयोंसे विरक्त है, उनको
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४ ९ २ चेतसो विषयेषु प्रवर्तयितुं शक्तम्; विषयों में प्रवृत्त करनेमें भी शास्त्र किन्तु शास्त्रादेतावदेव भवति - इद-मिष्टसाधनमिदमनिष्टसाधनमिति साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाभिव्य-क्तिः - प्रदीपादिवत्तमसि रूपादि-ज्ञानम् । न तु शास्त्रं भृत्यानिव बलान्निवर्तयति नियोजयति वा दृश्यन्ते हि पुरुषा रागादिगौरवा -च्छास्त्रमप्यतिक्रामन्तः । तस्मात् पुरुषमतिवैचित्र्यमपेक्ष्य साध्य-साधनसम्बन्धविशेषानने कधोप-दिशति । तत्र पुरुषाः स्वयमेव यथा-रुचि साधनविशेषेषु प्रवर्तन्ते शास्त्रं तु सवितृप्रदीपादिवदुदास्त समर्थ नहीं है । किंतु शास्त्रसे तो इतना हो होता है कि यह इष्टसाधन है और यह अनिष्टसाधन - इस प्रकार केवल साध्यसाधन के सम्बन्धविशेष-की अभिव्यक्ति ही होती है, जिस प्रकार कि अन्धकारमें दीपकादिसे रूपका ज्ञान होता है । शास्त्र अपने सेवकोंके समान किसीको बलात्कार-से प्रवृत्त या निवृत्त नहीं करता; क्योंकि रागादिकी अधिकता होने-पर लोग शास्त्रका उल्लङ्घन करते भी देखे जाते हैं; अत: पुरुषोंकी | बुद्धिकी विचित्रताको दृष्टिमें रखकर शास्त्र अनेक प्रकारसे साध्य - साधनरूप सम्बन्धविशेषों का उपदेश करता है । तहाँ अपनी - अपनी रुचिके अनु-सार पुरुष स्वयं ही साधनविशेषों में प्रवृत्त होते हैं । शास्त्र तो सूर्यं और दीपकादिके समान उदासीन ही एव । तथा कस्यचित्परोऽपि पुरु- रहता है । इस प्रकार किसीको परम पार्थोऽपुरुषार्थ वदवभासते; यस्य पुरुषार्थं भी अपुरुषार्थंके समान यथावभासः; स तथारूपं पुरुषार्थं भासता है; जिसको जैसा भासता है पश्यति, तदनुरूपाणि साधनान्यु- वह तदनुरूप ही पुरुषार्थं देखता है, पादित्सते । तथा चार्थवादोऽपि - और उसके अनुसार ही साधन ग्रहण " श्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ करना चाहता है । इस विषय में “ प्रजापतिके तीन पुत्रोंने अपने पिता पितरि ब्रह्मचर्यमूषुः ” ( बृ ० उ ० प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यं वास किया '
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[ अध्याय २ त करनेमें भी शास्त्र । किंतु शास्त्रसे तो ता है कि यह इष्टसाधन -निष्टसाधन - इस प्रकार साधन के सम्बन्धविशेष-कही होती है, जिस न्धकारमें दीपकादिसे होता है । शास्त्र अपने न किसीको बलात्कार-निवृत्त नहीं करता; दिकी अधिकता होने-का उल्लङ्घन करते हैं; अत: पुरुषोंकी चत्रताको दृष्टिमें रखकर प्रकारसे साध्य - साधनरूप षों का उपदेश करता है । नी - अपनी रुचि के अनु-स्वयं ही साधनविशेषों में हैं । शास्त्र तो सूर्य और समान उदासीन ही इस प्रकार किसीको परम नी अपुरुषार्थके समान - जिसको जैसा भासता है । -पही पुरुषार्थ देखता है, - अनुसार ही साधन ग्रहण हता है । इस विषयमें के तीन पुत्रोंने अपने पिता = यहाँ ब्रह्मचर्यं वास किया ' ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५। २ । १ ) इत्यादिः । तस्मान्न ब्रह्मैकत्वं ज्ञापयिष्यन्तो वेदान्ता विधिशास्त्रस्य बाधकाः । न च विधिशास्त्रमेतावता निर्विषयं स्यात् । नाप्युक्तकारकादिमेदं विधिशास्त्र-सुपनिषदां ब्रह्मैकत्वं प्रति प्रामा-ण्यं निवर्तयति । स्वविषयशूराणि हि प्रमाणानि, श्रोत्रादिवत् । तत्र पण्डितम्मन्याः केचित्स्व-ब्रह्मकत्वमा - चित्तवशात्सर्व प्रमा-क्षिप्यते णमितरेतरविरुद्धं ४ ९ ३ । इत्यादि अर्थवाद भी है । अत: ब्रह्म-की एकताको सूचित करनेवाले वेदान्तवाक्य विधि - शास्त्रके बाधक नहीं हैं । इतनेहीसे विधिशास्त्र निर्विषय नहीं हो सकता और न उपर्युक्त कारकादि भेदवाला विधि-शास्त्र ब्रह्मकी एकताके प्रति उप-निषदोंके प्रामाण्यको ही निवृत्त कर सकता है; क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियों-के समान सब प्रमाण अपने - अपने विषयमें प्रबल होते हैं । यहाँ अपनेको पण्डित माननेवाले कोई - कोई पुरुष [ शास्त्रगम्य ऐक्यको स्वीकार करनेपर ] अपनी बुद्धिके मन्यन्ते, तथा प्रत्यक्षादिविरोध- अनुसार समस्त प्रमाणोंको एक - दूसरे-मपि चोदयन्ति ब्रह्मकत्वे -शब्दादयः किल श्रोत्रादिविषया भिन्नाः प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते, ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतां प्रत्यक्षविरोधः स्यात्; तथा श्रोत्रादिभिः शब्दा - 1 के विरुद्ध समझते हैं तथा ब्रह्मकी एकता माननेमें प्रत्यक्षादि, प्रमाणों-के विरोधकी भी शङ्का करते हैं— श्रोत्रादि इन्द्रियोंके विषयभूत जो शब्दादि हैं, वे तो प्रत्यक्ष ही भिन्न - भिन्न उपलब्ध होते हैं । अतः ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध सिद्ध होता है । इसी प्रकार श्रोत्रादि-१. प्रजापतिके तीन पुत्र देवता, मनुष्य और दानव प्रजापतिसे उपदेश ग्रहण करनेके लिये गये । प्रजापतिने उन तीनोंको ' द ', ' द ', ' द ' ऐसा कहकर एक ही शब्दसे उपदेश किया । उन तीनोंने अपनी - अपनी प्रकृति के अनुसार उसके ' दमन करो ', ' दान करो ' और ' दया करो ' ये तीन अर्थ कर लिये । इस प्रकार यह अर्थवाद इस उपनिषद्के पञ्चम अध्याय द्वितीय ब्राह्मणमें है ।
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बृहदारण्यकोपनिषद्: [ अध्याय २ ४ ९ ४ द्युपलब्धारः कर्तारश्च धर्माधर्मयोः । प्रतिशरीरं भिन्ना अनुमीयन्ते संसारिणः; तत्र ब्रह्मैकत्वं ब्रवता- । मनुमानविरोधश्च । तथा च आगमविरोधं वदन्ति — " ग्राम-कामो यजेत " " पशुकामो यजेत " " स्वर्गकामो यजेत ” इत्येवमादि-वाक्येभ्यो ग्रामपशुस्वर्गादिकामा-स्तत्साधनाद्यनुष्ठातारश्च भिन्ना अवगम्यन्ते । अत्रोच्यते - ते तु कुतर्कदूषि-उक्ताक्षेप-से शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले संसारी जीव भी प्रत्येक शरीरमें भिन्न भिन्न हैं - ऐसा अनुमान होता है । ऐसी स्थिति में ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका अनुमान प्रमाणसे भी विरोध है । इसी तरह वे उनका शास्त्रप्रमाणसे भी विरोध बतलाते हैं, [ क्योंकि ] “ ग्रामकी कामनावाला यज्ञ करे ", " पशुकी कामनावाला यज्ञ करे ", " स्वर्गकी क़ामनावाला यज्ञ करे ", इत्यादि वाक्योंद्वारा ग्राम, पशु और स्वर्गकी | कामनावाले तथा उनके साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुष भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं । अब इसके उत्तरमें कहा जाता है – कुतर्क के कारण जिनके अन्तः-निरासः तान्तःकरणा ब्राह्म- करण दूषित हैं तथा जिनकी बुद्धि वेदार्थंविषयक सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे णादिवर्णापसदा अनुकम्पनीया वे ये ब्राह्मणादि वर्णाधम दयाके ही श्रागमार्थविच्छिन्नसम्प्रदायबुद्धय पात्र हैं । सो कैसे? — श्रोत्रादि इति । कथम्? श्रोत्रादिद्वारैः द्वारोंसे प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाले शब्दादिभिः प्रत्यक्षत उपलभ्य- शब्दादिसे ब्रह्मकी एकताका विरोध मानैर्ब्रह्मण एकत्वं विरुध्यत इति है - इस प्रकार कहनेवाले उन पुरुषों-से यह कहना चाहिये कि क्या वदन्तो वक्तव्या: - – किं शब्दा- शब्दादिके भेदसे आकाशकी एकता-दीनां भेदेनाकाशैकत्वं विरुध्यत | का भी विरोध है? यदि उसका