बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 501–510
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
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[ अध्याय २ उपलब्ध करनेवाले का अनुष्ठान करनेवाले भी प्रत्येक शरीरमें. - ऐसा अनुमान होता तिमें ब्रह्मकी एकता वाक्योंका अनुमान विरोध है । इसी तरह माणसे भी विरोध [ क्योंकि ] " ग्रामकी T यज्ञ करे ", " पशुकी T यज्ञ करे ", “ स्वर्गकी T यज्ञ करे ", इत्यादि ग्राम, पशु और स्वर्गकी तथा उनके साधनोंका करनेवाले पुरुष भिन्न-पड़ते हैं । सके उत्तर में कहा जाता के कारण जिनके अन्तः-हैं तथा जिनकी बुद्धि क सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे गादि वर्णाधम दयाके ही सो कैसे? — श्रोत्रादि त्यक्ष उपलब्ध होनेवाले ब्रह्मकी एकताका विरोध कार कहनेवाले उन पुरुषों-कहना चाहिये कि क्या - भेदसे आकाशकी एकता-विरोध है? यदि उसका ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४ ९ ५ इति; अथ न विरुद्धयते, न तर्हि | विरोध नहीं है तो प्रत्यक्ष प्रमाणसे प्रत्यक्ष विरोधः । यथोक्तं प्रतिशरीरं शब्दाद्युप-लन्धारो धर्माधर्मयोश्च कर्तारो मित्रा अनुमीयन्ते तथा च ब्रह्मै-19 कत्वेऽनुमानविरोध इति; भिन्नाः कैरनुमीयन्त इति प्रष्टव्याः; अथ यदि श्रूयुः – सर्वैरस्माभिरनुमानकुश-लैरिति — के यूयमनु मानकुशला इत्येवं पृष्टानां किमुत्तरम् । शरीरेन्द्रियमनयात्मसु च प्रत्येकमनुमानकौशलप्रत्याख्याने, शरीरेन्द्रियमनः साधना आत्मानो वयमनुमानकुशलाः, अनेक कारक-साध्यत्वात्क्रियाणामिति चेत्? एवं तर्ह्यनुमान कौशले भवतामने-[ ब्रह्मकत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंका ] विरोध नहीं हो सकता । और ऐसा जो कहा कि प्रत्येक शरीरमें शब्दादिको उपलब्ध करने-वाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले भी भिन्न - भिन्न ही अनु-मान किये जाते हैं, इसलिये ब्रह्मकी एकता माननेपर अनुमानप्रमाणसे विरोध होगा, सो यह पूछना चाहिये कि वे भिन्न - भिन्न हैं — इसका अनु-मान कौन करता है? इसपर यदि वे कहें कि अनुमान करनेमें कुशल हम सब लोग ही इसका अनुमान करते हैं, तो ' अनुमान करनेमें कुशल तुम कौन हो? " इस प्रकार पूछे जानेपर तुम्हारा क्या उत्तर होगा? पूर्व ० - शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मामें से क्रमशः एक - एकमें अनु-मान कौशलका निषेध किये जानेपर जो शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनोंवाले हम आत्मा हैं, वे ही अनुमान करनेमें कुशल हैं, क्योंकि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - यदि ऐसी बात है, ' तब तो अनुमान की कुशलता में तो तब आपकी अनेकताका प्रसङ्ग उपस्थित कत्वप्रसङ्गः; अनेककारकसाध्या होता है । क्रिया अनेक कारकों-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ४ ९ ६ हि क्रियेति भवद्भिरेवाभ्युपगतम् ॥ तत्रानुमानं च क्रिया; सा शरी-रेन्द्रियमनञ्चात्मसाधनैः कारकै रात्मकर्तृका निर्वत्येतं इत्येत-त्प्रतिज्ञातम् । तत्र वयमनुमान-फ़ुशला इत्येवं वदद्भिः — शरीरे- | न्द्रियमनः साधना आत्मानः । प्रत्येकं वयमनेक इत्यभ्युपगतं स्यात् । श्रहो अनुमानकौशलं दर्शितमपुच्छशृङ्गैस्ता किंकवली-बर्दैः । यो ह्यात्मानमेव न जानाति स कथं मूढस्तद्गतं मेदमभेदं वा जानीयात्? तत्र किमनुमिनोति १ केन वा द्वारा साध्य ' होती है - ऐस आपने ही स्वीकार किया है । तथा अनुमान भी क्रिया ही है । उसके विषयमें आपकी यह प्रतिज्ञा है कि आत्मा जिसका कर्ता है, ऐसी वह क्रिया शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मारूप कारकोंद्वारा निष्पन्न होती है । ऐसी स्थिति में ' हम अनु-मानकुशल हैं ' ऐसा कहकर आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम प्रत्येक शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनवाले आत्मा अनेक हैं । अहो! जिनके सींग और पूँछ नहीं हैं, ऐसे आप तार्किक - वृषभोंने यह अच्छा अनुमानकौशल दिखलाया । जो आत्माको ही नहीं जानता वह मूढ़ पुरुष किस प्रकार उसके भेद या अभेदको जान सकता है? ऐसी स्थिति में वह क्या अनुमान करता है और किस लिङ्गके द्वारा लिङ्गेन? न ह्यात्मनः स्वतो भेद- करता है? आत्माका अपनेसे भेद प्रतिपादकं किञ्चिल्लिङ्गमस्ति, येन प्रतिपादन करनेवाला कोई लिङ्ग तो है नहीं, जिस लिङ्गके द्वारा कि लिङ्गेनात्मभेदं साधयेत्ः यानि वह आत्माओंका भेद सिद्ध कर सके । जिन नाम - रूपवान् लिङ्गोका । लिङ्गान्यात्ममेदसाधनाय नाम- | आत्मभेद सिद्ध करनेके लिये उल्लेख
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[ अध्याय २ न होती है - ऐसा तो स्वीकार किया है । तथा क्रिया ही है । उसके पकी यह प्रतिज्ञा है कि नका कर्ता है, ऐसी वह र, इन्द्रिय, मन और कारकोंद्वारा निष्पन्न ऐसी स्थिति में ' हम अनु-हैं ' ऐसा कहकर आप र कर लेते हैं कि हम र, इन्द्रिय और मनरूप आत्मा अनेक हैं । अहो! ग और पूँछ नहीं हैं, ऐसे कक वृषभोंने यह अच्छा ौशल दिखलाया । जो ही नहीं जानता वह मूढ़ प्रकार उसके भेद या जान सकता है? स्थितिमें वह क्या अनुमान और किस लिङ्गके द्वारा ? आत्माका अपनेसे भेद न करनेवाला कोई लिङ्ग तो जिस लिङ्गके द्वारा कि = माओंका भेद सिद्ध कर जन नाम - रूपवान् लिङ्गोंका द सिद्ध करनेके लिये उल्लेख ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४ ९ ७ रूपवन्त्युपन्यस्यन्ति तानि नाम रूपगतान्युपाधय एवात्मनो घटकरकापवरकभूच्छिद्राणीवा-काशस्य । यदाकाशस्य भेदलिङ्गं पश्यति, तदात्मनोऽपि भेद-लिङ्गं लभेत सः; न ह्यात्मनः पश्तोऽपि विशेषमभ्युपगच्छद्भि-स्तार्किकशतैरपि मेदलिङ्गमात्म-नो दर्शयितुं शक्यते; स्वतस्तु दूरादपनीतमेव, अविषयत्वादा-त्मनः । यद्यत्पर आत्मधर्मत्वे-नाभ्युपगच्छति, तस्य तस्य नाम-रूपात्मकत्वाभ्युपगमात्, नाम-रूपाभ्यां चात्मनोऽन्यत्वाभ्युप-गमात्, " आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० उ ० ८ । १४ १ ) इति श्रुतेः " नामरूपे व्याकरवाणि " ( छा ० उ ० ६ । ३ । २ ) इति च । उत्पत्ति-प्रलयात्मके हि नामरूपे, तद्विल-क्षणं च ब्रह्म — - श्रतोऽनुमानस्यै -किया जाता है, वे तो आकाश की उपाधि घट, कमण्डलु, अपवरक ( झरोखा ) और भूछिद्र के समान आत्माकी नाम - रूपगत उपाधियाँ ही हैं । यदि वह आकाशके भेदका अनुमापक लिङ्ग देखता है तो आत्मा-के भेदका लिङ्ग भी पा सकता है । किंतु अन्य ( उपाधियों ) से भी आत्माका भेद माननेवाले सैकड़ों तार्किकोंद्वारा भी आत्माके भेदका वास्तविक लिङ्ग नहीं दिखलाया जा सकता है, स्वतः तो आत्मामें भेद होना दूरकी ही बात है; क्योंकि वह किसीका विषय नहीं है, ' पूर्व-पक्षी जिस - जिसको आत्माके धर्मरूप-से स्वीकार करता है, उसी - उसीको नाम - रूपात्मक माना गया है और " आकाश ( ब्रह्म ) ही नाम एवं रूपका निर्वाह करनेवाला है, ये जिसके अन्तर्गत हैं, वह ब्रह्म है ” इस श्रुतिसे तथा " मैं नाम - रूपोंको व्यक्त । करूँ " इस वाक्यसे भी नाम और रूपोंसे आत्माका अन्यत्व स्वीकार किया गया है । नाम और रूप ही उत्पत्ति एवं प्रलयरूप हैं तथा ब्रह्म | उनसे भिन्न है, अत: अनुमानका १. तात्पर्य यह है कि आत्मामें औपाधिक और स्वाभाविक दोनों ही प्रकार-का भेद नहीं हो सकता । बृ ० उ ० ३२-
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४ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय वाविषयत्वात्कुतोऽनुमान विरोधः १ एतेनागम विरोधः प्रत्युक्तः । यदुक्तं ब्रह्मैकत्वे यस्मा उप-देशः, यस्य चोपदेशग्रहणफ-लम्, तदभावादेकत्वोपदेशानर्थ-क्यमिति, तदपि न, अनेककार-कसाध्यत्वात्क्रियाणां कथोद्यो भवति । एकस्मिन्ब्रह्मणि निरु पाधिके नोपदेशः, नोपदेष्टा, न चोपदेशग्रहणफलम्; तस्मादुप-निषदां चानर्थक्यमित्येतदम्युप- । गतमेव । अथानेककारकविषया-नर्थक्यं चोद्यते — न, स्वतोऽभ्यु-२ | विषय ही न होनेके कारण अनुमान-| से उसका विरोध कैसे हो सकता है? इससे शास्त्रविरोधका भी परि-हार कर दिया गया । ऐसा जो कहा कि ब्रह्मकी एकता स्वीकार करनेपर तो जिसको उपदेश किया जायगा और जिसे उपदेशग्रहणका फल होगा, उन दोनोंका अभाव होनेके कारण उसकी एकताके उपदेशकी व्यर्थता ही सिद्ध होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली होती ही हैं, अत: इस विषय में किससे प्रश्न किया जा सकता है । एक निरुपाधिक ब्रह्ममें तो न उपदेश है, न उपदेष्टा है और न उपदेशग्रहण-का ज्ञान फल ही है । अतः [ ब्रह्मका हो जानेपर एकत्वोपदेशके साथ ही ] सम्पूर्ण उपनिषदोंकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है; और यह हमें भी मान्य ही है । यदि [ ब्रह्म-ज्ञानके पहले भी ] अनेक कारकों-के विषयभूत उपदेशको व्यर्थं बतावें तो ठीक नहीं है; क्योंकि इसका पगमविरोधादात्मवादिनाम् तो स्वयं आत्मज्ञानियोंके मतसे । विरोध है । अतः यह अल्पबुद्धि १. क्योंकि औपाधिक भेदसे व्यवहार होना २. यहाँ जो एकत्वके उपदेशको व्यर्थ तो सम्भव है ही । हो सकते हैं - एक तो यह कि क्रियाएँ बताया गया है, इसके दो अभिप्राय अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, अतः
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दू [ अध्याय२ न होनेके कारण अनुमान-विरोध कैसे हो सकता शास्त्रविरोधका भी परि-दिया गया । " जो कहा कि ब्रह्मको चीकार करनेपर तो जिसको किया जायगा और जिसे इणका फल होगा, उन अभाव होनेके कारण कता के उपदेशकी व्यर्थता होगी, सो ऐसी बात भी क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक रा निष्पन्न होनेवाली हैं, अत: इस विषय में न किया जा सकता है । एक ब्रह्ममें तो न उपदेश है, है और न उपदेशग्रहण-ही है । अतः [ ब्रह्मका जानेपर एकत्वोपदेशके सम्पूर्णं उपनिषदोंकी भी सिद्ध होती है; और यह यही है | यदि [ ब्रह्म-ले भी ] अनेक कारकों-उपदेशको व्यर्थ बतावें नहीं है; क्योंकि इसका आत्मज्ञानियोंके मतसे अतः यह अल्पबुद्धि -भव है ही । - है, इसके दो अभिप्राय रा साध्य होती हैं, अतः ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४ ९९ तस्मात्तार्किकचाट भटराजा प्रवेश्यम् । अभयं दुर्गमिदमम्पबुद्धधगम्यं शास्त्रगुरुप्रसादरहितैश्थ, “ कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति " १ । २ । २१ ) ( “ क देवैरत्रापि ० उ ० विचिकित्सितं पुरारा " ( क ० उ ० १ । १ । २१ ) “ नैषा तर्केण मतिरापनेया ' ( क ० उ ० पुरुषोंके लिये अगम्य और शास्त्र एवं गुरुकी कृपासे रहित पुरुषोंद्वारा दुर्भेद्य अभय दुर्गं तार्किक चाटभट-राजोंके लिये प्रवेशयोग्य नहीं है । " उस सहर्ष और हर्षरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है? " " इस विषय में पूर्वकालमें देवताओंने भी संदेह किया था, ' ' ' यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं उपदेशरूप क्रिया भी अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेके कारण एकत्वका उपदेश उत्पन्न नहीं हो सकता । दूसरा अभिप्राय यह हो सकता है कि जब ब्रह्म एक और नित्य मुक्तस्वरूप है तो उसमें कभी भी द्वैतरूप बन्धन न होनेके कारण मुक्तिके लिये एकत्वका उपदेश निरर्थक है । इनमेंसे पहले अभिप्रायके अनुसार एकत्वके उपदेशको निरर्थक बताया गया है — ऐसा यदि कोई कहे तो उसके विरोधमें सिद्धान्ती कहता है— ' तदपि न ' इत्यादि । अर्थात् उक्त अभिप्रायसे एकत्वोपदेशको निरर्थक नहीं बताया जा सकता; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली हैं ही, इसके लिये किससे प्रश्न किया जाय — कौन उत्तरदायी होगा? इस अनेकता को ही दूर करनेके लिये तो एकत्वका उपदेश होता है, अत: वह असं-गत नहीं हो सकता । यदि दूसरे अभिप्रायके अनुसार अर्थात् ब्रह्मके नित्यमुक्त होने-के कारण उक्त उपदेशकी व्यर्थता बतायी गयी हो तो यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मका ज्ञान हो जानेके बाद उक्त उपदेशकी व्यर्थता सिद्ध होती है या पहले? यदि कहें बाद ही उसकी व्यर्थता है, तो इसको स्वयं भी स्वीकार करते हुए सिद्धान्ती कहता है - ' एकस्मिन् ब्रह्मणि ' इत्यादि । अर्थात् सब प्रकारको उपाधियों-से रहित एकमात्र ब्रह्ममें उपदेश, उपदेशक और उपदेशग्रहणका फल - यह कुछ भी नहीं है, इसलिये केवल एकत्वका उपदेश ही नहीं समस्त उपनिषदें ही उस अवस्था-में निरर्थक हैं और इसे हम भी स्वीकार करते ही हैं । यदि कहें ' ब्रह्मज्ञानके पहले भी एकत्वका उपदेश व्यर्थ है; क्योंकि यह अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेवाला है ' तो ठीक नहीं, कारण कि अपनी मान्यता के विरुद्ध है । ज्ञानके पहले अविद्याकी निवृत्तिके लिये सभी आत्मज्ञानी एकत्वोपदेशकी सार्थकता स्वीकार करते हैं । १. चाट = आर्यंमर्यादाको तोड़नेवाले; भट = मिथ्यावादी ।
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५०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ १ । २ । ९ ) - वरप्रसादलभ्यत्व- । श्रुतिस्मृतिवादेभ्यश्च; “ तदेजति तन्नैजति तद्दरे तद्वन्ति के " ( ईशा ० उ ० ५ ) इत्यादि विरुद्धधर्म समवायित्व प्रकाशक्रम-न्त्रवर्णेभ्यश्च । गीतासु च -" स्थानि ( ९ । ४ ) इत्यादि । तस्मात्पर-ब्रह्मव्यतिरेकेण संसारी नाम नान्यद्वस्त्वन्तरमस्ति । तस्मात्सु ट्रष्यते “ ब्रह्मचा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेद् अहं ब्रह्मास्मि " ( १ । ४ । १० ) “ नान्यदतो-ऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ " ( ३ | ८ | ११ ) इत्यादिश्रुतिश-तेभ्यः । तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः ' सत्य-स्य सत्यम् ' नामोपनिषत्परा | २० || है ” तथा देवतादिके वर और कृपा-द्वारा उसके प्राप्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी वाक्योंसे एवं " वह चलता है और वह नहीं चलता, वह दूर हैं और वह समीप भी है " इत्यादि ब्रह्ममें विरुद्ध धर्मों का समवायित्व प्रकाशन करनेवाले मन्त्रवर्णोंसे भी यही सिद्ध होता है । गीता में भी कहा है-" सब भूत मुझमें स्थित हैं " इत्यादि । अतः परब्रह्मसे भिन्न संसारी नाम-की कोई अन्य वस्तु नहीं है । इस-लिये “ पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना कि मैं ब्रह्म हूँ " " इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है और इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है " इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है । अत: ‘ सत्यका सत्य है ' यह परम उपनिषद् परब्रह्मकी ही है ॥ २० ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथममजात-शत्रुब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण ' ब्रह्म ज्ञपयिष्यामि ' इति प्रस्तुतम्; तत्र यतो ' मैं तुम्हें ब्रह्मका बोध कराऊँगा ' उपक्रमः जगज्जातं इस प्रकार यहाँ प्रसंग आरम्भ हुआ यन्मयं है । सो, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ
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[ अध्याय २ तादिके वर और कृपा-प्राप्यत्वका प्रतिपादन त्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी " वह चलता है और लता, वह दूर है और नी है " इत्यादि ब्रह्ममें का समवायित्व प्रकाशन = त्रवर्णोंसे भी यही सिद्ध तामें भी कहा है-कमें स्थित हैं " इत्यादि । से भिन्न संसारी नाम-न्य वस्तु नहीं है । इस-यह ब्रह्म ही था, उसने कि मैं ब्रह्म हूँ " कोई द्रष्टा नहीं है और कोई श्रोता भी नहीं है " ड़ों श्रुतियोंद्वारा ठीक ही । अत: ' सत्यका सत्य उपनिषद् परब्रह्मकी प्रथममजात-ब्रह्मका बोध कराऊंगा ' हाँ प्रसंग आरम्भ हुआ ' जगत् उत्पन्न हुआ ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१ यस्मिंश्च लीयते तदेकं ब्रह्मेति । ज्ञापितम् । किमात्मकं पुनस्त अ-गञ्जायते, लीयते च? पश्चभूता त्मकम्; भूतानि च नामरूपात्म-कानि नामरूपे सत्यमिति ह्युक्तम्; तस्य सत्यस्य पञ्चभूता-त्मकस्य सत्यं ब्रह्म । कथं पुनर्भूतानि सत्यमिति मूर्तीमूर्त ब्राह्मणम् । मूर्तामूर्तभूता-स्मकत्वात्कार्यकरणात्मकानि भू-तानि प्राणा अपि सत्यम् । तेषां कार्यकरणात्मकानां भूतानां सत्य-त्वनिर्दिधारिषया ब्राह्मणद्वयमा-रम्यते सैवोपनिषद्वयाख्या! कार्यकरणसत्यत्वावधारणद्वारेण हि सत्यस्य सत्यं ब्रह्मावधार्यते अत्रोक्तम् ' प्राणा वै सत्यं तेषामेष ' सत्यम् ' इति । तत्र के प्राणाः १ कियत्यो वा प्राणविषया उपनिषदः १ का: १ इति च ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन करणानां प्राणानां स्वरूपमवधार-है, जो इसका स्वरूप है और जिसमें यह लीन हो जाता है, वह एक ही ब्रह्म है - ऐसा यहाँ बतलाया गया है । तो भला, यह जगत् किस रूप-सेस्थित हुआ उत्पन्न और लीन होता है? पञ्चभूतरूपसे । वे भूत नाम - रूपात्मक हैं और नाम - रूप ' सत्य ' हैं - ऐसा बतलाया जा चुका है । उस पञ्चभूतस्वरूप ' सत्य ' का ब्रह्म सत्य है । किंतु भूत सत्य किस प्रकार हैं, यह बतलानेके लिये ही यह मूर्ता -मूर्तं ब्राह्मण है । मूर्तमूर्तं भूतस्वरूप होनेके कारण देह - इन्द्रियरूप भूत और प्राण भी सत्य हैं । उन देहेन्द्रिय-स्वरूप भूतोंकी सत्यताका निश्चय करने की इच्छा से ये दो ब्राह्मण आरम्भ किये जाते हैं, यही इस उपनिषद्की व्याख्या है; क्योंकि देह और इन्द्रियों-के सत्यत्वका निश्चय करनेके द्वारा, ही सत्यके सत्य ब्रह्मका निश्चय होता है । यहाँ यह बतलाया गया है कि प्राण ही सत्य हैं और यह..AKAUHYA , VARANASI उनका भी सत्य है; ' सो प्राण कौन-से हैं? तथा प्राणविषयक उपनिषदें कितनी और कौन - कौन - सी हैं? इस प्रकार ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे, मार्गमें पड़नेवाले कुएं और बगीचों आदिके JNANAMANDIR 01 , / LIBRARY Math SIMHASAN No.2 . Ace ( JNANA Jangamwadi
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५०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यति - पथिगतकूपारामाद्यत्रधारण- निश्चयके समान, श्रुति इन्द्रियों और वत् ॥ प्राणोंके स्वरूपका निश्चय करती है । शिशुसंज्ञक मध्यम प्रारणका उसके उपकरणोंसहित वर्णन यो ह वै शिशु साधान सप्रत्याधान संस्थूण सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि । अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधान-मिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम ॥ १ ॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम ( बन्धन रज्जु ) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्यों का अवरोध करता है । यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह ( शरीर ) ही आधान है, यह ( शिर ) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा है और अन्न दाम है ॥ १ ॥
यो ह वै शिशु साधानं सप्रत्याधानं सम्पूर्ण सदामं वेद, तस्येदं फलम् किं तत् १ सप्त सप्तसंख्याकान् ह द्विषतो द्वेष कर्तृ न् भ्रातृव्यान् । भ्रातृव्या हि द्वि-विधा भवन्ति, द्विषन्तोऽद्विषन्तश्च तत्र द्विषन्तो ये भ्रातृव्यास्तान् द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धिः सप्त ये शीर्षण्याः प्राणा विषयोपलब्धि-द्वाराणि तत्प्रभवा विषय रागाः । सहजत्वाद् भ्रातृव्याः । ते ह्यस्य । स्वात्मस्थां दृष्टिं विषयविषयां । जो भी आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दामके सहित शिशुको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है । वह फल क्या है? वह द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्यों-का अवरोध करता है । भ्रातृव्य दो प्रकारके होते हैं - द्वेष करनेवाले और द्वेष न करनेवाले, उनमें जो द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य होते हैं, उन द्वेषी भ्रातृव्योंका वह अवरोध करता है । शिरमें स्थित जो सात प्राण विषयो-पलब्धिके द्वार हैं, उनसे होने-वाले विषयसम्बन्धी राग साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले होनेके वे कारण ही उसकी भ्रातृव्य हैं; क्योंकि आत्मस्थ दृष्टिको
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[ अध्याय २ श्रुति इन्द्रियों और रूपका निश्चय करती है । दरों सहित वर्णन बधान संस्थूण
व्यानवरुणद्धि ।
स्तस्येदमेवाधान-न ॥ १ ॥
( बन्धनरज्जु ) के वाले सात भ्रातृव्यों का - शिशु है, उसका यह है, प्राण स्थूणा है और आधान, प्रत्याधान, दाम सहित शिशुको उसे यह फल प्राप्त ह फल क्या है? वह सात भ्रातृव्यों-करता है । भ्रातृव्य दो हैं - द्वेष करनेवाले और वाले, उनमें जो द्वेष होते हैं, उन द्वेषी वह अवरोध करता है । जो सात प्राण विषयो-द्वार हैं, उनसे होने-सम्बन्धी राग साथ-न होनेवाले होने के हैं; क्योंकि की आत्मस्थ दृष्टिको ब्राह्मण २ ] कुर्वन्ति, तेन ते द्वेष्टारो भ्रातृव्याः । प्रत्यगात्मेक्षणप्रतिषेध करत्वात् । काठके चोक्तम् – “ पराश्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराड-पश्यति नान्तरात्मन् " इत्यादि । ( २ | १ | १ ) तत्र यः शिश्वादीन्वेद, तेषां याथात्म्यमवधारयति, स एतान् भ्रातृव्यानवरुणद्वयपा-वृणोति विनाशयति । तस्मै फलश्रवणेनाभिमुखी-भूतायाह - श्रयं वाव शिशुः । कोऽसौ १ योऽयं मध्यमः प्राणः, शरीरमध्ये यः प्राणो लिङ्गात्मा, यः पञ्चधा शरीरमाविष्टः – बृहन्पा -ण्डरवासः सोम राजन्नित्युक्तः, यस्मिन्वाङ्मनःप्रभृतीनि करणानि विषक्तानि - पड्वीशशङ्कुनिदर्श-नात् स एष शिशुरिव, विषये-ष्वितरकरणबदपटुत्वात्; शिशुं साधानमित्युक्तम् । किं पुनस्तस्य शिशोर्वत्सस्थानीयस्य - ५०३ 22 विषयोन्मुख करते हैं, अतः वे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य हैं; कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शनको रोकनेवाले हैं । कठोपनिषद् में भी कहा है- " स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता ” इत्यादि । सो, जो कोई इन शिशु आदिको जानता है, इनके यथार्थं स्वरूपका निश्चय करता है, वह इन भ्रातृव्यों-का अवरोध- अपावरण अर्थात् विनाश कर देता है । इस प्रकार फलश्रवणसे अभि-मुख हुए उस ( गार्ग्य ) से [ अजात-शत्रु ] कहता है - निश्चय यही शिशु है । यह कौन? जो यह मध्यम प्राण है | शरीरके मध्यमें जो यह लिङ्गात्मा प्राण है, जो पांच प्रकारसे शरीर में प्रविष्ट होकर बृहन्, पाण्डरवास, सोम और राजन् इन नामोंसे कहा जाता है, जिसमें वाणी और मन आदि इन्द्रियाँ विशेषरूपसे निबद्ध हैं, जैसा कि घोड़े के पैर बांधने के मेखोंके दृष्टान्तसे बतलाया गया है; वह यह प्राण शिशुके समान अन्य इन्द्रियों की तरह विषयोंमें पटु न होनेके कारण शिशु है । मूल मन्त्रमें ' शिशु ' साधानम् ' ऐसा कहा गया है । सो उस वत्सस्थानीय
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५०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ करणात्मन प्रधानम्? तस्येदमेव शरीरमाधानं का-र्यात्मकम् - श्रधीयतेऽस्मिन्नित्या-धानम्; तस्य हि शिशोः प्राण- | स्येदं शरीरमधिष्ठानम्, अस्मिन्हि करणान्य धिष्ठितानि लब्धात्मका-न्युपलब्धिद्वाराणि भवन्ति, न तु प्राणमात्रे विषक्तानि । तथा हि दर्शितमजातशत्रुणा - उपसंहृतेषु करणेषु विज्ञानमयो नोपलभ्यते, शरीरदेशव्यूढेषु तु करणेषु विज्ञा-नमय उपलभमान उपलभ्यते- -तच्च दर्शितं पाणिपेषप्रतिबोधनेन । इदं प्रत्याधानं शिरः; प्रदेश-विशेषेषु - – प्रति प्रत्याधीयत इति प्रत्याधानम् । प्राणः स्थूणा अन्न-पानजनिताशक्ति: - प्राणो बलमिति पर्यायः । बलावष्टम्भो हि प्राणो-ऽस्मिञ्छरीरे - " स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमिव ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । १ ) इति दर्शनात् । : इन्द्रियरूप शिशुका आधान क्या है? उसका यह कार्यरूप भौतिक शरीर ही आधान है— जिसमें कुछ रखा जाय उसे आधान कहते हैं, अतः उस शिशु अर्थात् प्राणका यह शरीर अधिष्ठान है; क्योंकि इसमें अधिष्ठित होकर अपने स्वरूपको प्राप्त करनेवाली इन्द्रियाँ विषयोंकी उपलब्धिका द्वार होती हैं; वे केवल प्राणमात्रमें हो निबद्ध नहीं होतीं । ऐसा ही अजातशत्रुने दिखलाया भी है – इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर विज्ञानमयकी उपलब्धि नहीं होती । शरीरस्थानमें एकत्रित हुई इन्द्रियोंमें तो उपलब्धिकर्ताके रूपमें ही विज्ञानमयकी उपलब्धि होती है - यह बात हाथ दबाकर जगानेके द्वारा दिखायी गयी है । यह शिर प्रत्याधान है । इसका प्रदेशविशेषोंके प्रति प्रत्याधान किया जाता है, इसलिये यह प्रत्याधान है । प्राण, स्थूणा अर्थात् अन्नपानजनित शक्ति है । प्राण और बल ये पर्याय-वाची हैं । इस शरीर में बलका आधार ही प्राण है, जैसा कि " जिस अवस्थामें यह जीव शरीरको निर्बल करता हुआ सम्मोहको प्राप्त होता है " इस वाक्यमें देखा जाता है ।