बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 511–520

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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[ अध्याय २ शुका आधान क्या है? यह कार्यरूप भौतिक धान है - जिसमें कुछ उसे आधान कहते हैं, = अर्थात् प्राणका यह न है; क्योंकि इसमें कर अपने स्वरूपको ली इन्द्रियाँ विषयोंकी द्वार होती हैं; वे केवल हो निबद्ध नहीं होतीं । जातशत्रुने दिखलाया दयोंका उपसंहार हो ज्ञानमयकी उपलब्धि शरीरस्थानमें एकत्रित तो उपलब्धिकर्ताके ज्ञानमयकी उपलब्धि बात हाथ दबाकर दिखायी गयी है । - प्रत्याधान है । इसका के प्रति प्रत्याधान किया लिये यह प्रत्याधान है । अर्थात् अन्नपानजनित ण और बल ये पर्याय-शरीरमें बलका आधार जैसा कि " जिस - जीव शरीरको निर्बंल सम्मोहको प्राप्त होता नमें देखा जाता है । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०५ यथा वत्सः स्थूणावष्टम्भ एवं शरीरपक्षपाती वायुः प्राणः स्थूणेति केचित् । नंदा - अन्नं हि भुक्तं त्रेधा परिणमते; यः स्थूलः परिणामः, स एतद्द्वयं भूत्वा इमामप्येति-सूत्रं च पुरीषं च । यो मध्यमो रसः स रसो लोहितादिक्रमेण स्वकार्यं शरीरं साप्तधातुकमुपचि · नोति; स्वयोन्यन्नागमे हि शरीर-ग्रुपचीयतेऽन्नमयत्वात्; विपर्ययेऽप क्षीयते पतति; यस्त्वणिष्ठोरसः अमृ तम् [ उ ऊ ' प्रभावः - इति च कथ्यते, स नामे हृदय देशमागत्य, हृदयाद्विप्रसृतेषु द्वासप्ततिनाडी-सहस्रेष्वनुप्रविश्य यत्तत्करणसङ्घा -तरूपं लिङ्गं शिशुसंज्ञकम्, तस्य । जिस प्रकार बछड़ा स्थूणा ( खूटे ) के आश्रित होता है, उसी प्रकार शरीरपक्षपाती वायु - प्राण स्थूणा है - ऐसा किन्हींको मत है । अन्न दाम ( बन्धन - रज्जु ) है, क्योंकि भोजन किये जानेपर अन्न तीन प्रकारसे परिणामको प्राप्त हो जाता है । उसका जो स्थूल परि-णाम होता है, वह मल और मूत्र दो रूपमें होकर इस भूमिको प्राप्त होता है । जो मध्यम परिणाम होता है वह रस है । वह रस लोहि-तादिक्रमसे अपने कार्यभूत सात धातुओंवाले शरीरको पुष्ट करता है । शरीर अन्नमय है, इसलिये अपने कारणभूत अन्नके आनेपर उसकी पुष्टि होती है, तथा उसके विप-रीत होनेपर क्षीण होकर गिर जाता है । तथा जो सूक्ष्मतम रस होता है वह अमृत — ऊक्ळे अथवा प्रभाव ऐसा कहा जाता है; वह नाभिसे ऊपर हृदयदेशमें आकर हृदयसे फैली हुई बहत्तर सहस्र नाडियोंमें प्रवेश कर स्थूणासंज्ञक बलको उत्पन्न करके जो शिशुसंज्ञक इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गशरीर है, उसकी १. शरीरपक्षपाती वायुसे श्वासोच्छ्वास करनेवाला शरीरान्तर्वर्ती प्राण समझना चाहिये । उसके अधीन ही इन्द्रियाभिमानी प्राण ग्रहण किया जाता है, इसलिये यह उसके खूँटे ( बन्धनस्थान ) के समान है । २. भर्तृप्रपञ्च आदिका ।

पृष्ठ 512

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५०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ शरीरे स्थितिकारणं भवति बल - | शरीर में स्थिति रखनेका कारण होता है । इसी से, जिसके दोनों मुपजनयत्स्थूणाख्यम् तेनान- ओर पाश हैं, ऐसी बछड़ा बाँधने-मुभयतः पाशवत्सदाभवत् प्राण- की रस्सीके समान अन्न प्राण और

शरीरयोर्निबन्धनं भवति ॥ १ ॥ । शरीरका बन्धन है ॥ १ ॥

मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात प्रक्षितियाँ इदानीं तस्यैव शिशोः प्रत्या- अब प्रत्याधान में आरुढ़ उसी धान ऊढस्य चक्षुषि काथनोप- शिशुके नेत्रमें कुछ उपनिषदें निषद उच्यन्ते- बतलायी जाती हैं-तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्ष-न्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेन ५ रुद्रो ऽन्वायत्तो ऽथ या अक्ष-न्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनका तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्य -न्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२ ॥

उसका ये सात अक्षितियाँ उपस्थान ( स्तवन ) करती हैं — उनमेंसे जो ये आँखमें लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है और नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो कनीनका ( दर्शनशक्ति ) है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है । नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एवं ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥

तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते- उसमें ये सात अक्षितियाँ उपस्थान तं करणात्मकं प्राणं करती हैं- शरीरमें अन्नके कारण शरीरेऽन- । रहनेवाले नेत्रस्थानमें आरूढ़उस

पृष्ठ 513

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[ श्रध्याय २ रखनेका कारण से, जिसके दोनों सी बछड़ा बाँधने-न अन्न प्राण और है ॥ १ ॥

क्षितियाँ नमें आरुढ़ उसी कुछ उपनिषदें हैं-या इमा अक्ष-तोऽथ या अक्ष-दित्यो यत्कृष्णं न्या पृथिव्य-एवं वेद ॥२ ॥

करती हैं— उनमें से ध्यप्राणके अनुगत है ( दर्शनशक्ति ) है न और जो शुक्लता थिवी इसके अनुगत नता है, उसका अन्न अक्षितियाँ उपस्थान रमें अन्नके कारण स्थानमें आरूढ़ उस ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७ बन्धनं चक्षुष्यूढमेता वक्ष्यमाणाः । सप्त सप्तसङ्ख्याका अक्षितयो-ऽतितिहेतुत्वादुपतिष्ठन्ते । यद्यपि मन्त्रकरणे तिष्ठतिरुपपूर्व आत्म-नेपदी भवति, इहापि सप्त देवता-भिधानानि मन्त्रस्थानीयानि कर-णानि तिष्ठतेरतोऽत्राप्यात्मनेपदं न विरुद्धम् । कास्ता अतितयः १ इत्युच्यन्ते-तत्तत्र या इमाः प्रसिद्धाः, अक्षन्न-क्षणि लोहिन्यो लोहिता राजयो रेखाः, ताभिर्द्वारभूताभिरेनं मध्यमं प्राणं रुद्रोऽन्वायत्तोऽनुगतः; अथ या अक्षन्नक्षण्यापो धूमादिसंयोगे नाभिव्यज्यमानाः, ताभिरद्भिर्द्वार-भूताभिः पर्जन्यो देवतात्मान्वा । यतोऽनुगतः उपतिष्ठत इत्यर्थः । । स चान्नभूतोऽक्षितिः प्राणस्य; " पर्जन्ये वर्षत्यानन्दिनः प्राणा भवन्ति " इति श्रुत्यन्तरात् । या कनीनका हक्छक्तिस्तया इन्द्रियरूप प्राणमें ये आगे कही जानेवाली सात - सात संख्यावाली अक्षितियाँ जो अक्षिति ( अक्षयता ) का कारण होनेके कारण अक्षिति कहलाती हैं, रहती हैं । यद्यपि [ उपान्मन्त्रकरणे ( पा ० सू ० १ । ३ । २५ ) इस पाणिनिसूत्रके अनु-सार ] ' उप ' पूर्वक ' स्था ' धातु मन्त्रकरण अर्थमें आत्मनेपदी होता है, तथापि यहाँ भी रुद्रादि सप्त-देवतासंज्ञक IIII II करण मन्त्रस्थानीय ही हैं, इसलिये यहाँ भी उपपूर्वंक ‘ स्था ’ धातुमें आत्मनेपद रहना विरुद्ध नहीं है । d अक्षितियाँ कौन - सी हैं? सो बतलायी जाती हैं - उनमें ये जो नेत्रके भीतर लोहित वर्णकी प्रसिद्ध राजियाँ - रेखाएँ हैं, उन द्वारभूता रेखाओंके द्वारा रुद्र इस मध्यम प्राणके अनुगत है । तथा नेत्रमें जो धूमादिके संयोगसे अभिव्यक्त होने-बाला जल है, उस द्वारभूत जल द्वारा देवस्वरूप मेघ इसके अनुगत है । वह प्राणका अन्नभूत अक्षिति है जैसा कि “ मेघके बरसनेपर प्राण आनन्दित हो जाते हैं " इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । जो कनीनका अर्थात् दर्शन - शक्ति

पृष्ठ 514

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५०८ कनीनकया द्वारेणादित्यो मध्यमं । प्राणमुपतिष्ठते; यत्कृष्णं चक्षुषि तेनैनमग्निरुपतिष्ठते; यच्छुक्लं चक्षुषि तेनेन्द्रः; अधरया वर्तन्या पक्ष्मणैनं पृथिव्यन्वायत्ता, अधरत्व -सामान्यात् द्यौरुत्तरया, ऊर्ध्वस्व-सामान्यात्; एताः सप्तान्नभूताः प्राणस्य सन्ततमुपतिष्ठन्ते - इत्येवं यो वेद, तस्यैतत्फलम् - नास्यान्नं क्षीयते, य एवं वेद ॥ २ ॥

है, उस कनीनकाके द्वारा मध्यम प्राणमें प्रवेश करता है; नेत्र-में जो कृष्णवर्णं है उसके द्वारा अग्नि इसमें उपस्थित होता है; नेत्रमें जो शुक्लवर्ण है, उससे इन्द्र और नीचेके पलकद्वारा इसमें पृथिवी अनुगत है; क्योंकि इन दोनोंकी अधरत्वमें समानता है तथा ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक अनुगत है; क्योंकि ऊर्ध्वत्वमें उन -दोनोंकी समानता है; ये सातों निरन्तर प्राणके अन्न होकर उप-स्थित होते हैं, इस प्रकार जो जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है - जो इस तरह उपासना करता है, उसके अन्नका क कभी क्षय नहीं होता ॥ २ ॥

श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमसदृष्टिका विधान तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबु-घ्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति । अर्वाग्बि-लश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्व बुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेतदाह तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते ॥३ ॥

पृष्ठ 515

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[ अध्याय २ के द्वारा आदित्य श करता है; नेत्र-है उसके द्वारा स्थित होता है; है, उससे इन्द्र पलकद्वारा इसमें है; क्योंकि इन में समानता है । लकद्वारा द्युलोक के ऊर्ध्वत्वमें उन ता है; ये सातों अन्न होकर उप-इस प्रकार जो यह फल प्राप्त होता उपासना करता T कभी क्षय नहीं का विधान श्रमस ऊर्ध्वबु-यासत ऋषयः । अर्वाग्बि-र्वाग्बिलश्चमस मिति प्राणा वै ऋषयः सप्त दाह वागष्टमी संवित्ते ॥३ ॥

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५० ९ इस विषय में यह श्लोक है । चमस नोचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण और वेदके द्वारा संवाद करनेवाली आठवीं वाक् रहती है । जो नोचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपर की ओर उठा हुआ चमस है, वह शिर है; क्योंकि यही नीचे की ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है । उसमें विश्वरूप यश निहित है - प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है । उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है 1 । वेदके द्वारा संवाद करनेवाली संवाद करती है ॥ ३ ॥

तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति - अर्वाग्बिलश्चमस इत्यादिः । तत्र मन्त्रार्थमाचष्टे । श्रुतिः - श्रर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्व -बुधन इति । कः पुनरसावर्धा -ग्लिश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः इदं तत् शिरः, चमसाकारं तत् । कथम् एष ह्यर्वाग्विलो मुखस्य बिलरूपत्वात्, शिरसो बुधना-कारत्वादूर्ध्वनः । तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूप-मिति यथा सोमश्रमसे, एवं तस्मि-ञ्चिरसि विश्वरूपं नानारूपं निहितं स्थितं भवति । किं पुनस्तद् यशः । वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा तहाँ इस अर्थ में यह श्लोक - मन्त्र है- ' अर्वाग्बिलश्चमस: ' इत्यादि । अब श्रुति इस मन्त्रका अर्थं बतलाती है-' अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः ' इत्यादि । किंतु यह नोचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओरसे उठा हुआ चमस कौन है? वह यह शिर है; क्योंकि वह चमसके समान आकार-वाला है । किस प्रकार? क्योंकि यह नीचेकी ओर छिद्रवाला है, कारण, मुख छिद्ररूप है और शिर बुधनाकार होनेके कारण यह ऊर्ध्वबुधन है । इसमें विश्वरूप यश निहित है । जिस प्रकार चमसमें सोम रहता है, इसी प्रकार उस शिरमें विश्वरूप- नाना रूप अर्थात् अनेक रूपोंवाला यश निहित- स्थित है । वह यश क्या है?

पृष्ठ 516

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५१० प्राणा वै यशो विश्वरूपम् - प्राणाः । श्रोत्रादयो वायवश्च मरुतः सप्तधा तेषु प्रसुता यशः- इत्येतदाह मन्त्रः शब्दादज्ञानहेतुत्वात् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति – प्राणाः परिस्पन्दात्मकाः, तएव च ऋषयः प्राणानेतदाह मन्त्रः । वागष्टमी ब्रह्मणा संवि-दानेति — ब्रह्मणा संवादं कुर्वती अष्टमी भवति तद्धेतुमाह — वाध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्त इति ॥ ३ ॥

प्राण ही अनेक रूपोंवाला यश है । प्राण अर्थात् सात श्रोत्रादि और उनमें सात भागों में विभक्त होकर फै हुए मरुत् यानी वायु यश हैं-ऐसा मन्त्र कहता है, क्योंकि ( श्रोत्रादि ) शब्दादि विषयोंके ज्ञानके हेतु हैं । उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं- यहाँ स्फुरणात्मक प्राण ही समझने चाहिये, वे ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है । आठवीं वाक् वेदके द्वारा संवाद करती है । वह वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है । इसीसे कहा है- ' वाक् ही आठवीं है, वह वेदके द्वारा संवाद करती है ' इति ॥ ३ ॥

श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि - दृष्टि • के पुनस्तस्य चमसस्य तीर किंतु उस चमसके तीरपर कौन आसत ऋषय इति । ऋषि रहते हैं, सो बतलाते हैं— इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रो ऽयं जम-दग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्व-स्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥

१. दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना —ये सात श्रोत्रादि हैं ।

पृष्ठ 517

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[ अध्याय २ रूपोंवाला यश है । त श्रोत्रादि और में विभक्त होकर नी वायु यश हैं-ना है, क्योंकि वे ब्दादि विषयोंके रसात ऋषि रहते T त्मक प्राण ही , वे ही ऋषि हैं, ही मन्त्र ऐसा चीं वाक् वेदके द्वारा । वह वेदके द्वारा नीवाक् आठवीं है । - ' वाक् ही आठवीं संवाद करता ष्टि चमसके तीरपर कौन सो बतलाते हैं—-तमोऽयं भरद्वाज वामित्रो ऽयं जम-. ठोऽयं कश्यपो यदत्रिरिति सर्व-वं वेद ॥ ४ ॥

- ये सात श्रोत्रादि हैं । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५११ ये दोनों [ कान ] ही गोतम और भरद्वाज हैं; यह ही गोतम है और यह [ दूसरा ] भरद्वाज है । ये दोनों [ नेत्र ] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है । ये दोनों [ नासारन्ध्र ] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं; यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है । तथा वाक् ही अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है । जिसे अत्रि कहते हैं, वह निश्चय ' अत्ति ' नामवाला ही है । जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता ( भक्षण करनेवाला) होता है, सब इसका अन्न हो जाता है ॥ ४ ॥

इमावेव गोतमभरद्वाजौ कर्णौ-अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजो । दक्षिणश्चोत्तरश्च, विपर्ययेण वा । त चक्षुषी उपदिशनुवाच — इमावेव विश्वामित्र जमदग्नी दक्षिणं विश्वा -मित्र उत्तरं जमदग्निर्विपर्ययेण वा । इमावेव वसिष्ठकश्यपौ – नासिके उपदिशन्तुवाच; दक्षिणः पुटो भवति वसिष्ठः, उत्तरः कश्यपः पूर्ववत् । वागेवात्रिः अदनक्रिया-योगात्सप्तमः; वाचा ह्यन्नमद्यते । तस्मादत्तिर्ह वै प्रसिद्धं नामैतत् -- । ये दोनों कर्णं ही गोतम और भरद्वाज हैं । ये दक्षिण और उत्तर कर्ण हो क्रमशः अथवा विपरीत क्रमसे गोतम और भरद्वाज हैं । इसी प्रकार नेत्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं । इनमें दक्षिण नेत्र विश्वामित्र है और वाम नेत्र जमदग्नि है, अथवा इससे विपरीत क्रमसे समझना चाहिये । फिर नासारन्त्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्र कहा है कि ये ही दोनों वसिष्ठ और कश्यप हैं; पूर्व-वत् दायाँ छिद्र वसिष्ठ है और बायाँ कश्यप है । अदन ( भक्षण ) क्रियाका सम्बन्ध होनेके कारण वाक् ही सप्तम ऋषि अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियके द्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है; अतः यह प्रसिद्ध अत्ति नामवाला है अर्थात्

पृष्ठ 518

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५१२ 222, अत्तिरेव सन् | अतृत्वादत्तिरिति परोक्षेण । यदत्रिरित्युच्यते सर्वस्यैतस्यान्नजातस्य प्राणस्या-त्रिनिर्वचन विज्ञानादत्ता भवति । श्रचैव भवति नामुष्मिन्नन्नेन पुनः प्रतिपद्यत इत्येतदुक्तं भवति -- सर्व-मस्यान्नं भवतीति । य एवमेत-अत्ता होने के कारण यह ' अत्ति ' है; जो कि ' अत्ति ' होते हुए ही परोक्ष-रूपसे ' अत्रि ' कहा जाता है । इस ' अत्रि ' शब्दकी निरुक्तिका ज्ञान होनेसे पुरुष प्राणके इस सम्पूर्ण अन्नसमुदायका अत्ता ( भक्षण करने-वाला ) होता है । यह अन्न भक्षण करनेवाला ही होता है, परलोकमें पुन: अन्नसे युक्त नहीं होता; ' सर्व-मस्यान्नं भवति ' इस वाक्यसे यही द्यथोक्तं प्राणयाथात्म्यं वेद, स एवं बात कही गयी है । जो इस प्रकार इस उपर्युक्त प्राणके यथार्थं स्वरूपको मध्यमः प्राणो भूत्वा श्रधान- जानता है, वह इस तरह मध्यम प्रत्याधानगतो भोक्तैव भवति, प्राण होकर आधान - प्रत्याधानगत भोक्ता ही होता है, भोज्य नहीं न भोज्यम्, भोज्याद् व्यावर्तत - होता अर्थात् भोज्यवर्गसे निवृत्त हो इत्यर्थः ॥ ४ ॥ जाता है ॥ ॥ ४ ॥ ·

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वितीयं शिशुब्राह्मणम् ॥। २ ॥ तृतीय . तत्र प्राणा वै सत्यमित्युंक्तम् । याः प्राणानामुपनिषदः, ता ब्रह्मो-पनिषत्प्रसङ्गेन व्याख्याताः -- एते ते प्राणा इति च । ते किमात्मकाः? ब्राह्मण SHIT DIFF ऊपर यह कहा गया है कि प्राण ही सत्य हैं । जो प्राणोंकी उपनिषदें हैं, उनकी ' वे ये प्राण हैं ' ऐसा कहकर ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे व्याख्या कर दी गयी है । अब यह | बतलाना है कि उनका स्वरूप क्या

पृष्ठ 519

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[ अध्याय २ कारण यह ' अत्ति ' है; होते हुए ही परोक्ष-कहा जाता है । - शब्दकी निरुक्तिका रूष प्राणके इस सम्पूर्ण - अत्ता ( भक्षण करने-है । यह अन्न भक्षण होता है, परलोकमें त नहीं होता; ' सर्व-ति ' इस वाक्यसे यही है । जो इस प्रकार के यथार्थ स्वरूपको वह इस तरह मध्यम आधान - प्रत्याधानगत ता है, भोज्य नहीं भोज्यवगंसे निवृत्त हो ४ ॥ याध्याये PFIFF EPIPS LE SHIT DIFF ह कहा गया है कि प्राण I जो प्राणोंकी उपनिषदें ' वे ये प्राण हैं ' ऐसा ब्रह्मोपनिषद् के प्रसङ्गसे र दी गयी है । अब यह कि उनका स्वरूप क्या ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१३ कथं वा तेषां सत्यत्वम् १ इति च वक्तव्यमिति पश्चभूतानां सत्यानां कार्यकरणात्मकानां स्वरूपावधारणार्थमिदं ब्राह्मण-मारभ्यते - यदुपाधिविशेषाप-नयद्वारेण ' नेति नेति ' इति ब्रह्मणः सतत्त्वं निर्दिधारयिषितम् ॥ ब्रह्मके | है और उनकी सत्यता किस प्रकार है? अतः शरीर एवं इन्द्रियरूप ' सत्य ' संज्ञक पञ्चभूतोंके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है, जिस उपा-धिविशेषके निषेधद्वारा ' नेति नेति ' इत्यादि रूपसे श्रुतिको ब्रह्मके स्वरूप-का निश्चय कराना अभीष्ट है । दो रूपे वा द ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्य चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च ॥ १ ॥

ब्रह्मके दो रूप हैं — मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् ( चर ) तथा संत् और त्यत् ॥ तत्र द्विरूपं ब्रह्म पञ्चभूतज-नितकार्य करणसम्बद्धं मूर्तामृत-ख्यं मर्त्यामृतस्वभावं तज्जनित-वासनारूपं च सर्वज्ञं सर्वशक्ति सोपाख्यं भवति 1 । क्रियाकारक-फलात्मकं च सर्वव्यवहारा-स्पदम् । तदेव ब्रह्म विगत सर्वोपाधिविशेषं सम्यग्दर्शन-विषयम् अजमजरममृतम-१ ॥ पञ्चभूतजनित देह और इन्द्रियों-से सम्बद्ध ब्रह्म दो रूपोंवाला है, मूर्त और अमूर्त संज्ञावाला, मर्त्य और अमृत स्वभाववाला, तज्जनित वासनारूप एवं सर्वज्ञ और सर्वशक्ति ब्रह्म सोपाख्य ( सोपाधिक ) है । वह क्रिया, कारक और फलस्वरूप तथा समस्त व्यवहारका आश्रय है । वही ब्रह्म समस्त उपाधिविशेषों-से रहित, सम्यग्ज्ञानका विषय, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, वाणी भयम्, वाङ्मनसयोरप्यविषयमद्वै - और मनका भी अविषय है तथा १. जो शब्द - प्रतीतिका विषय हो उसे सोपाख्य कहते हैं । वृ ० उ ० ३३–

पृष्ठ 520

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५१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ' नेति नेति ' इति निर्दि- । तत्वात् श्यते । तत्र यदपोहद्वारेण ' नेति नेति ' इति निर्दिश्यते ब्रह्म, ते त एते व वाव - वावशब्दोऽवधार-णार्थः- द्वे एवेत्यर्थः - ब्रह्मणः परमात्मनो रूपे - रूप्यते यास्याम-रूपं परं ब्रह्म अविद्याध्यारोप्य -माणाभ्याम् । के ते द्वे १ मृर्त चैव सूर्तमेव च । तथामूर्तं चामूर्तमेव चेत्यर्थः । अन्तर्णी-रास्वात्मविशेषणे मूर्तीमूर्ते द्वे एवेत्यवधायेंते । कानि पुनस्तानि विशेषणानि मूर्तामूर्तयोः १ इत्युच्यन्ते -- मर्त्यं च मर्त्य मरणधर्म, अमृतं च तद्विपरीतम्, स्थितं च - परि-च्छिन्नं गतिपूर्वकं यरस्थास्नु, यच्च - यातीति यत् -- व्यापि--अपरिच्छिन्नं स्थितविपरीतम्, अद्वेत होने के कारण उसका ' नेति-नेति ' इस प्रकार निर्देश किया जाता है | इस प्रकार जिनके अपवादद्वारा ब्रह्मका ' नेति नेति ' इस प्रकार निर्देश किया जाता है वे उस पर-ब्रह्म परमात्माके ये दो रूप हैं । यहाँ ' वाव ' शब्द निश्चयार्थक है । अर्थात् अविद्याद्वारा आरोप किये जानेवाले जिन रूपोंके द्वारा अरूप परब्रह्मनिरूपित होता है, वे ये दो ही रूप हैं । वे दो रूप कौन - से हैं? ' मूतं चैव ' - मूर्तं ही तथा ' अमूर्त च ' -अमूर्त ही [ वे रूप हैं ] । अर्थात् जिनमें उनके अपने अन्य विशेषणों-का अन्तर्भाव हो जाता है, ऐसे ब्रह्मके ये मूर्त और अमूर्तं दो ही रूप निश्चय किये जाते हैं । किंतु मूर्त और अमूर्त वे अन्य विशेषण कौन - से हैं? सो बतलाये जाते हैं - ' मत्यं च, ' मर्त्य - मरण-धर्मी और अमृत - मर्त्यसे विपरीत स्वभाववाला, स्थित - परिच्छिन्न अर्थात् जो गतिपूर्वक स्थित रहने -वाला है और यत् - जो जाता हो अर्थात् व्यापक, अपरिच्छिन्न यानी स्थितसे विपरीत स्वभाव-सच्च – सदित्यन्येभ्योविशेष्यमाणा - वाला विशेषरूपसे , सत् — दूसरोंकी अपेक्षा निरूपित किये जाने-