बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 61–70
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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अध्याय १ अनवस्था प्राप्त द्धिको स्वतः ऐसी दशा में ] यह बुद्धि केही अन्तर्गत. नेके कारण रहेगा । तथा ' वही ' - इन कर्ता न होने के होना सम्भव शता के कारण सकता है --तो क्योंकि ' तत् ' इतरेतर- विष-विषयों को ग्रहण होता । जबतक मात्र वस्तुज्ञानको नहीं होती, उसकी नते हैं । बौद्धों के अनुसार क्षणिकत्व और फिर उस अतः उन्हें क्षणिक-बुद्धि भी प्रत्य गा । ती हैं, एक बुद्धि न हो जाय इसके सम्बन्ध मानना ला कोई एक द्रष्टा ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ यत्वे सादृश्यग्रहणानुपपत्तिः । । असत्येव सादृश्ये तद्बुद्धिरिति चेन्न, तदिदम्बुद्धयोरपि सादृश्य- । बुद्धिवदसद्विपयत्वप्रसङ्गात् । अ-सद्विषयत्वमेव सर्वबुद्धीनामस्त्विति चेन्न, बुद्धिबुद्धेरप्यसद्विषयत्व-प्रसङ्गात् । तदप्यस्त्विति चेन्न, सर्वबुद्धीनां मृषात्वेऽसत्यबुद्ध्य -नुपपत्तेः । तस्मादसदेतत्सादृश्या-की इन बुद्धियोंके विषय भिन्न - भिन्न न हों तबतक इनकी सदृशताका भी ग्रहण नहीं हो सकता । यदि ऐसा मानें कि विषयकी सदृशता न होनेपर भी ' यह वही है ' ऐसी बुद्धि होती है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्थामें सादृश्य-बुद्धिके समान तद् और इदं - बुद्धियाँ भी असद्विषयक [ अर्थात् क्षणिक या भ्रान्त ] सिद्ध होंगी । यदि कहो कि सभी बुद्धियोंकी असद्वि-षयता ( मिथ्यात्व ) ही होने दो, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो बुद्धि - बुद्धिके भी मिथ्या होनेका प्रसंग उपस्थित होगा । यदि कहो, अच्छा ऐसा ही हो, यह भी 2 उचित नहीं; क्योंकि इस प्रकार जब सभी बुद्धियाँ मिथ्या होंगी तो असत्यबुद्धिका होना सम्भव नहीं होगा । ' अतः सादृश्यसे ' यह वही चबुद्धिरिति । अतः सिद्धः । है ' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है — यह प्राक्कार्योत्पत्तेः ः कारणसद्भावः । कार्यस्य चाभिव्यक्तिलिङ्ग-कार्यं सद्भाव - त्वात् । कार्यस्य च साधनम् सद्भावः प्रागुत्पत्तेः १. क्योंकि यह सब असत् यानी कहना ठीक नहीं है । इसलिये | कार्यकी उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी सत्ता सिद्ध ही है । कार्यकी भी सत्ता है, क्योंकि वह अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला है । | उत्पत्तिसे पूर्व कार्यकी भी सत्ता शून्यरूप है - ऐसा ज्ञान तो सत्य बुद्धि ही हो सकता है । सत्ताशून्य बुद्धि असत्का भी ग्रहण कैसे करेगी?
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५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ सिद्धः । कथमभिव्यक्तिलिङ्ग त्वादभिव्यक्ति लिंङ्गमस्येति । अ-भिव्यक्तिः साक्षाद्विज्ञानालम्बन-त्वप्राप्तिः । यद्धि लोके प्रावृतं तम आदिना घटादिवस्तु तदा लोकादिना प्रावरणतिरस्कारेण विज्ञानविषयत्वं प्राप्नुवत्प्राक्स-द्भावं न व्यभिचरति । तथेदमपि जगत्प्रागुत्पत्तेरित्यवगच्छामः । न ह्यविद्यमानो घट उदितेऽप्या-" दित्ये उपलभ्यते । न, तेऽविद्यमानत्वाभावादुप-लभ्येतैवेति चेत् । न हि तब घटादिकार्यं कदाचिदप्यविद्य-मानमित्युदिते श्यादित्ये उपलभ्ये-तैव मृत्पिण्डेऽसन्निहिते तमचा-द्यावरणे चासति विद्यमानत्वा-दिति चेत् १ ब्रा सिद्ध होती है । किस प्रकार? --अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला होनेसे, क्योंकि अभिव्यक्ति ही कार्यंका लिङ्ग घट है । साक्षात् विज्ञानालम्बनत्वको प्राप्त होनेका नाम ' अभिव्यक्ति ' मृद है । लोकमें जो घट आदि पदार्थ भा अन्धकारादिसे आच्छादित होता है पिप वही उस आवरणका प्रकाशादिसे नम तिरस्कार होनेपर विज्ञानकी विष-स्यै यताको प्राप्त होकर अपनी पूर्व-कालिक सत्ताका त्याग नहीं करता । नुप इससे हमें मालूम होता है कि इसी शब् प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् भी था; क्योंकि जो घट विद्यमान नहीं तिरो होता, उसकी उपलब्धि सूर्यके उदित होनेपर भी नहीं होती । पूर्व ० – ऐसी बात नहीं है । ण्या यदि तुम्हारे मतमें कार्यं अविद्यमान हि नहीं है तो उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये । तुम्हारे मतानुसार देश घटादि कार्यं कभी अविद्यमान तो है नहीं, इसलिये जब मृत्पिण्डकी देश सन्निधि न हो, और अन्धकारादि-का आवरण भी न हो, उस समय पिण सूर्योदय होनेपर उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये, क्योंकि वह स्यैव विद्यमान ही है ।
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[ अध्याय १ प्रकार? --वाला होनेसे, - कार्यका लिङ्ग बलम्बनत्वको ' अभिव्यक्ति ' आदि पदार्थ वादित होता है । - प्रकाशादिसे ज्ञानकी विष-अपनी पूर्व-नहीं करता । ता है कि इसी यह जगत् भी विद्यमान नहीं लब्धि सूर्य के हीं होती । त नहीं है । अविद्यमान उपलब्धि होनी रे मतानुसार अविद्यमान तो मृत्पिण्डक अन्धकारादि-हो, उस समय की उपलब्धि क्योंकि वह ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ न, द्विविधत्वादावरणस्य । घटादिकार्यस्य द्विविधं ह्यावरणं मृदादेरभिव्यक्तस्य तमः कुड्यादि प्राङ्मदोऽभिव्यक्तेर्मृदाद्यवयवानां पिण्डादिकार्यान्तररूपेण संस्था -नम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेर्विद्यमान-स्यैव घटादिकार्यस्य आवृतत्वाद-नुपलब्धिः । नष्टोत्पन्नभावाभाव-शब्दप्रत्यय भेदस्तु अभिव्यक्ति तिरोभावयोर्द्विविधत्वापेक्षः । पिण्डकपालादेरावरणवैलक्ष-ण्यादयुक्तमिति चेत्? तमःकुड्यादि हि घटाद्यावरणं घटादिभिन्न-देशं दृष्टं न तथा घटादिभिन्न-देशे दृष्टे पिण्डकपाले । तस्मात् पिण्डकपालसंस्थानयोर्विद्यमान स्यैव घटस्यावृतत्वाद् अनुपलब्धि -५७ सिद्धान्ती -- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आवरण दो प्रकारका है । मृत्तिकादिसे अभिव्यक्त होनेवाले घटादि कार्यका आवरण दो प्रकार-का है- ( १ ) अन्धकार और भित्ति आदि तथा ( २ ) मृत्तिकासे घटकी अभिव्यक्ति होनेसे पूर्व उस मृत्ति-कादिके अवयवों का पिण्डादि कार्या-न्तरके रूपमें स्थित रहना । अतः उत्पत्तिसे पूर्वं घटादि विद्यमान कार्यकी ही, आवृत होनेके कारण, उपलब्धि नहीं होती । नष्ट होना, उत्पन्न होना, रहना, न रहना इत्यादि शब्द और प्रत्ययोंका भेद तो अभिव्यक्ति और तिरोभाव इनकी द्विविधताकी अपेक्षासे है । पूर्व ० -- - किंतु पिण्ड और कपा-लादि तो आवरणसे भिन्न प्रकारके होते हैं, इसलिये उन्हें आवरण कहना उचित नहीं है । अन्धकार और भित्ति आदि जो घटादिके आवरण हैं, वे तो घटादिसे भिन्न देशमें देखे जाते हैं, किंतु इस प्रकार पिण्ड और कपाल घटादिसे भिन्न देशमें नहीं देखे जाते । अतः यह कहना ठीक नहीं है कि पिण्ड और कपालके संस्थान ( स्वरूप ) में विद्यमान ही घटादिकी आवृत
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ५८ रित्ययुक्तम् आवरणधर्मवैलक्षण्या-दिति चेत् १ न, क्षीरोदकादेः क्षीराद्यावरणे-नैकदेशत्वदर्शनात् । घटादिकार्ये । कपालचूर्णाद्यवयवानामन्तर्भावा-दनावरणत्वमिति चेन्न, विभ क्तानां कार्यान्तरत्वादावरणत्वो-पपत्तेः । आवरणाभाव एव यत्नः कर्तव्य इति चेत् १ पिण्डकपा-लावस्थयोर्विद्यमानमेव घटादि-कार्यमावृतत्वान्नोपलभ्यत इति चेद् घटादिकार्यार्थिना तदावर -णविनाश एव यत्नः कर्तव्यो न घटाद्युत्पत्तौ न चैतदस्ति, तस्मादयुक्तं विद्यमानस्यैवावृ-तत्वादनुपलब्धिरिति चेत् १ ब्राह होनेके कारण उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि आवरणके धर्मोसे उनमें न विलक्षणता है - यदि ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, मात्र क्योंकि दूधमें मिले हुए जलादिकी अपने आवरण दुग्धादिके साथ एक- निय देशता देखी जाती है । यदि कहो कि घटादि कार्यमें उसके कपाल प्रर्द एवं चूर्णादि अवयवोंका अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिये उनका आव-रण है ही नहीं तो यह ठीक नहीं, दीप क्योंकि विभक्त होनेपर कार्यान्तर जी होनेके कारण उन्हें आवरण मानना ठीक ही है पूर्व ० - तब तो आवरणकी निवृत्ति न करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये । चेत यदि तुम्हारे कथनानुसार पिण्ड और कपालकी अवस्थाओंमें वर्तमान घटादि कार्य ही आवृत होनेके मा कारण उपलब्ध नहीं होता तब तो जिसे घटादि कार्यकी आवश्यकता हो घट उसे उसके आवरणका नाश करनेका ही यत्न करना चाहिये, प्रा उत्पत्तिका नहीं; किंतु ऐसा किया तम नहीं हीं जाता, इसलिये यह कहना उचित नहीं है कि आवृत होनेके कि कारण विद्यमान घटादिकी ही उपलब्धि नहीं होती - ऐसा कहें तो? वर
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अध्याय १ नहीं होती, चर्मोसे उनमें सा कहें तो? बात नहीं है, ए जलादिकी के साथ एक-। यदि कहो उसके कपाल अन्तर्भाव उनका आव-नह ठीक नहीं, र कार्यान्तर वरण मानना रणकी निवृत्ति रना चाहिये । नुसार पिण्ड ओंमें वर्तमान आवृत होनेके होता तब तो आवश्यकता हो नाश करनेका इये इये,, घट घटादिकी किं तु ऐसा किया यह कहना आवृत होनेके घटादिकी ही - ऐसा कहें तो? ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ ९ न, नियमात् । न हि विनाश-मात्रप्रयत्नादेव घटाद्यभिव्यक्ति-नियता । तमश्राद्यावृते घटादौ प्रदीपाद्युत्पत्तौ प्रयत्नदर्शनात् । सोऽपि तमोनाशायैवेति चेत्? दीपाद्युत्पत्तावपि यः प्रयत्नः सो-ऽपि तमस्तिरस्करणाय तस्मि नष्टे घटः स्वयमेवोपलभ्यते । न हि घटे किञ्चिदाधीयते इति चेत्? न, प्रकाशवतो घटस्योपलभ्य-मानत्वात् । यथा प्रकाशविशिष्टो घट उपलभ्यते प्रदीपकरणे न तथा प्राक्प्रदीपकरणात् । तस्मान तमस्तिरस्कारायैव प्रदीपकरणं किं तर्हि? प्रकाशववाय । प्रकाश-वच्वेनैवोपलभ्यमानत्वात् । क्वचि -सिद्धान्ती – ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह नियम नहीं है । आवरणके विनाशमात्रका प्रयत्न करनेसे ही घटादिकी उत्पत्ति हो जायगी – ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अन्धकारादिसे आवृत घटादिके प्रकाशके लिये प्रदीप आदि--की उत्पत्तिमें प्रयत्न देखा जाता है । पूर्व ० - - किंतु वह प्रयत्न भी तो अन्धकारनाशके लिये ही होता है । दीपकादिकी उत्पत्तिके लिये जो प्रयत्न किया जाता है, वह भी अन्धकारकी निवृत्तिके ही लिये होता है; उसकी निवृत्ति होनेपर घट स्वयं ही दिखायी देने लगता है । इससे घटमें कोई बात बढ़ायी नहीं जाती - ऐसा मानें तो? • सिद्धान्ती -- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रकाशयुक्त घटकी ही उपलब्धि होती है । जिस प्रकार दीपक तैयार करनेपर प्रकाशयुक्तः घटकी उपलब्धि होती है, उस प्रकार दीपक तैयार होनेसे पूर्व उसकी उपलब्धि नहीं होती । अतः अन्धकारकी निवृत्तिके लिये ही दीपक नहीं जलाया जाता, तो और किसलिये जलाया जाता है? प्रकाशके लिये, क्योंकि प्रकाशयुक्त होनेपर ही वस्तुकी उपलब्धि होती है । कहीं-
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६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ दावरणविनाशेऽपि यत्नः स्यात्, । यथा कुड्यादिविनाशे । तस्मान्न नियमोऽस्त्यभिव्यक्त्यर्थिनावरण-विनाश एव यत्नः कार्यइति । नियमार्थवत्वाच्च । कारणे वर्तमानं कार्य कार्यान्तराणामाव-रणमित्यवोचाम । तत्र यदि पूर्वा -भिव्यक्तस्य कार्यस्य पिण्डस्य व्यव-हितस्य वा कपालस्य विनाश एव यत्नः क्रियेत, तदा विदलचूर्णा-द्यपि कार्यं जायेत । तेनाप्यावृतो घटो नोपलभ्यत इति पुनः प्रय नान्तरापेचैव । तस्माद् घटाद्य-भिव्यक्त्यर्थिनो नियत एव कारकव्यापारोऽर्थवान् । तस्मा-स्प्रागुत्पत्तेरपि सदेव कार्यम् । अतीतानागतप्रत्यय भेदाच्च । अतीतो घटोऽनागतो वट इत्येत-ब्राह्म कहीं आवरणका नाश करने भी यत्न किया जाता है; जैसे भी योश्च आदिका नाश करनेके लिये । अत: वन्न पदार्थकी अभिव्यक्तिके इच्छुकको तार्थि आवरणके नाशका ही प्रयत्न करना चाहिये- ऐसा कोई नियम नहीं है । प्रवृत्त इसके सिवा नियत व्यापारकी ताना सफलता के लिये भी प्रयत्न करना असं आवश्यक है । पहले बता चुके हैं टवि कि कारणमें विद्यमान कार्यं ग्रन्य कार्यका आवरण होता है । ऐसी स्यात अवस्थामें यदि पहले अभिव्यक्त हुए घ कार्य पिण्डके अथवा व्यवधानयुक्त विप्रति कपालके नाशका ही प्रयत्न किया जायगा तो उनसे कपालिका ( ठीकरी ) ष्यती या चूर्णादि कार्यकी ही उत्पत्ति माणेष होगी । उससे आवृत होनेपर भी येन च घटकी उपलब्धि नहीं होगी, इसलिये भविष्य पुनः प्रयत्नान्तरकी अपेक्षा रहेगी घटो sa ही । अतः घटादिकी अभिव्यक्तिके इच्छुकका नियतकारकव्यापार धीयते ( कर्ता - कारण इत्यादि रूपसे किया न भवि हुआ प्रयत्न ) ही सफल होता है । इसलिये उत्पत्तिसे पूर्वं भी कार्य वर्तत विद्यमान ही है । अश भूत और भविष्यत् प्रतीतियोंके भेदसे भी कार्यकी सत्ता सिद्ध होती च्येत, है । भूत घट, भविष्यद् घट इन
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अध्याय १ करनेके लिये है; जैसे भीत लिये । अतः इच्छुकको प्रयत्न करना यम नहीं है । त व्यापारकी प्रयत्न करना बता चुके हैं कार्य ग्रन्थ ता है । ऐसी अभिव्यक्त हुए व्यवधानयुक्त प्रयत्न किया लिका ( ठीकरी ) - ही उत्पत्ति न होनेपर भी होगी, इसलिये अपेक्षा रहेगी अभिव्यक्तिके कारकव्यापार दरूपसे किया कल होता है । र्व भी कार्य तु प्रतीतियोंके ता सिद्ध होती यद् घटन ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ योश्च प्रत्ययोर्वर्तमानघटप्रत्यय-वन्न निर्विषयत्वं युक्तम्; अनाग-तार्थिप्रवृत्तेश्च । न ह्यसत्यर्थितया प्रवृत्तिलों के दृष्टा 1 । योगिनां चाती-तानागतज्ञानस्य सत्यत्वात् । असंवेद्धविष्यद्धट ऐश्वरम्भविष्य इटविषयं प्रत्यक्षज्ञानं मिथ्या स्यात् न च प्रत्यक्षमुपचर्यते । घटसद्भावे ह्यनुमानमवोचाम । विप्रतिषेधाच्च । यदि घटो भवि-ष्यतीति कुलालादिषु व्याप्रिय-माणेषु घटार्थं प्रमाणेन निश्चितं येन च कालेन घटस्य सम्बन्धो भविष्यतीत्युच्यते, तस्मिन्नेव काले घटो s सन्निति विप्रतिषिद्धमभि-धीयते । भविष्यन्घटो s सन्निति, न भविष्यतीत्यर्थः ॥ अयं घटोन वर्तत इति यद्वत् । अथ प्रागुत्पत्तेर्घटो s सन्नित्यु-च्येत, घटार्थं प्रवृत्तेषु कुलालादिषु । ६१५ | प्रत्ययोंका भी वर्तमान घटप्रत्ययके समान विषयशून्य होना उचित नहीं है, क्योंकि भविष्यद् घटकी इच्छा--वाले पुरुषकी प्रवृत्ति देखी जाती है । असत्पदार्थकी इच्छासे लोकमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । इसके सिवा योगियों का भूत और भविष्यत्सम्बन्धी ज्ञान होता है । यदि भावी घट असत् माना जाय तो ईश्वरका भावी घट--सम्बन्धी प्रत्यक्ष ज्ञान भी मिथ्या होगा; किंतु प्रत्यक्ष ज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता । इसके सिवा घटकी सत्तामें हमने अनुमानप्रमाण भी दिया है । तथा उसकी सत्ता न माननेसे विरोध भी आता है । यदि घटके लिये प्रवृत्त हुए कुम्हार आदिको प्रमाणसे यह निश्चय हो गया है कि घट होगा तो जिस कालसे ' घटका सम्बन्ध होगा ' ऐसा कहा जाता है उसी कालमें ' घट नहीं है ' ऐसा कथन तो विपरीत ही है । ' भविष्यद् घट असत् है ' इसका अर्थं तो यही है कि ' घट उत्पन्न नहीं होगा ' जैसे कहा जाय कि ' यह घट विद्य-मान नहीं है । ' और यदि यह कहा जाय कि उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है, और इस ' असत् ' शब्दका यह अर्थं हो
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ६२ ब्राह वर्तमाना- । कि कुम्हार आदिके घटके लिये प्रवृत्त तत्र यथा व्यापाररूपेण , तथा घटो न स्तावत्कुलालादयः वर्तत इत्यसच्छन्दस्पार्थश्चेन्न ' विरुध्यते । कस्मात् १ स्वेन हि भविष्यद्रूपेण घटो वर्तते । न हि पिण्डस्य वर्तमानता कपालस्य वा घटस्य भवति । न च तयोर्भवि-' ष्यत्ता घटस्य । तस्मात्कुलाला दिव्यापारवर्तमानतायां प्रागुत्पत्ते -' घंटोऽसन्निति न विरुध्यते । यदि ` घटस्य यत्स्वं भविष्यत्ताकार्यरूपं तत्प्रतिषिध्येत, तत्प्रतिषेघे विरोधः स्यात् । न तु तद्भवान्प्रतिषेधति । होनेपर जिस प्रकार उस अवस्थामें सन व्यापाररूपसे कुम्हार आदि विद्य मान हैं उस प्रकार घट नहीं है तो भाव इसमें कोई विरोध नहीं आता । प्राक क्यों नहीं आता? क्योंकि अपने घट भावीरूपसे तो घट विद्यमान है ही । पिण्ड या कपालको वर्तमानता घट-की नहीं हो सकती और घ चत भविष्यत्ता उन ( पिण्ड और कपाल ) की नहीं हो सकती । अतः कुम्हार नाम आदिके व्यापारकी वर्तमानतामें ' उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है ' ऐसा भाव कहना भी विरुद्ध नहीं है । किंतु पत्त घटका जो भविष्यत्ता ' कार्यरूप स्वरूप है उसका यदि प्रतिषेध किया जाय तो उसके निषेध करने-पर ही विरोध होगा । सो उसका घटस तो आप निषेध करते नहीं हैं । तथा घटस सम्पूर्ण क्रियावान् कारकोंकी एक कल्प न च सर्वेषां क्रियावतां कारकाणा- ही वर्तमानता या भविष्यत्ता होती पुत्रव मेकैव वर्तमानता भविष्यश्वं वा । हो — ऐसी बात है नहीं । अपि च चतुर्विधानामभावानां इसके सिवा चार प्र प्रकार के घटस घटादन्यो ' अभावोंमें घटका जो अन्योन्याभाव भेद ह घटस्येतरेतराभावो है वह घटसे भिन्न ही देखा जाता हैं, घटकी दृष्टो यथा घटाभावः पटादिरेव जैसे घटाभाव पटादि ही है घटका होता दूसरी न घटस्वरूपमेव । न च घटाभावः । स्वरूप नहीं है । तथा घटाभाव बाधि १. भविष्यमें प्रकट होनेका भाव ही भविष्यत्ता है । प्रागभ २. प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव. ये अभावके चार /
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[ अध्याय १ टके लिये प्रवृत्त उस अवस्थामें - आदि विद्य वट नहीं है -- तो नहीं आता । क्योंकि अपने विद्यमान है ही । वर्तमानता घट-और घटकी और कपाल ) । अतः कुम्हार वर्तमानतामें असत् है ' ऐसा नहीं है । किंतु यत्ता ' कार्यरूप यदि प्रतिषेध तके निषेध करने-TT । सो उसका रते नहीं हैं । तथा कारकोंकी एक भविष्यत्ता होती - नहीं । चार प्रकारके जो अन्योन्याभाव ही देखा जाता है, बाद ही है घटका । तथा घटाभाव ये अभावके चार FR ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ सन्पटोऽभावात्मकः, किं तर्हि? । भावरूप एव । एवं घटस्य प्राक्प्रध्वंसात्यन्ताभावानामपि घटादन्यत्वं स्यात् । घटेनं व्यपदि -श्यमानत्वाद् घटस्येतरेतराभाव-चत् । तथैव भावात्मकता भावा-नाम् । एवं च सति घटस्य प्राग-भाव इति न घटस्वरूपमेव प्रागु-पत्तेर्नास्ति । अथ घटस्य प्रागभाव इति घटस्य यत्स्वरूपं तदेवोच्येत घटस्येतिव्यपदेशानुपपत्तिः । अथ कल्पयित्वा व्यपदिश्येत शिला-पुत्रकस्य शरीरमिति यद्वत्, तथापि घटस्य प्रागभाव इति कन्पितस्यै-६३ होनेसे ही पट अभावरूप नहीं हो जाता; तो फिर क्या होता है? वह भावरूप ही रहता है । इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं, क्योंकि घटके अन्योन्याभावके समान घट द्वारा इनका उल्लेख किया जाता है । और उस [ घटके अन्यो-न्याभाव पदकी भावरूपता ] के ही समान इन अभावोंकी भी भाव-रूपता है । ऐसा होनेसे ' घटका प्रागभाव है ' इस कथनसे यह सिद्ध नहीं होता कि उत्पत्तिसे पू पूर्वं घट स्वरूप ही नहीं है । और यदि ' घटका प्रागभाव ' इस कथनमें घटका जो स्वरूप है वही कहा जाय तो ' घटका ' यह कथन ही नहीं बन सकता । ' यदि ' शिलाके पुतलेका शरीर ' इस कथन-के अनुसार कल्पना करके ऐसा कहा जाय तो भी ' घटका प्रागभाव ' इस कथन से ' घट ' शब्दद्वारा कल्पित भेद हैं । उत्पत्तिसे पूर्व जो वस्तुका अभाव होता है उसे प्रागभाव कहते हैं; जैसे घटकी उत्पत्तिसे पूर्व उसका अभाव । वस्तुके नाशके पश्चात् उसका प्रध्वंसाभाव होता है; जैसे घट फूट जानेपर उसका अभाव । दो वस्तुओंमेंसे प्रत्येक में एक दूसरीका अभाव अन्योन्याभाव है; जैसे घटमें पटका और पटमें घटका | त्रिकाला-बाधित अभाव अत्यन्ताभाव है; जैसे शशशृङ्गादिका । १. क्योंकि षष्ठीविभक्तिबोध्य सम्बन्ध भिन्न पदार्थोंमें ही होता है और तुम प्रागभावको घटका स्वरूप ही बतलाते हो ।
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६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ वाभावस्य घटेन व्यपदेशो न । घटस्त्ररूपस्यैव । अथार्थान्तरं घटाद् घटस्याभाव इति, उक्तो-त्तरमेतत् । किञ्श्चान्यत्प्रागुत्पत्तेः शशवि-षाणवदभावभूतस्य घटस्य स्त्र-कारणसत्तासम्बन्धानुपपत्तिः, द्वि-निष्ठत्वात्सम्बन्धस्य । अयुत सिद्धा-नामदोष इति चेन्न, भावाभावयो-रयुत सिद्धत्वानुपपत्तेः । भावभूत-योहिं युतसिद्धतायुतसिद्धता वा स्यान्न तु भावाभावयोरभावयोर्वा । ब्रा घटका ही अभाव कहा जायगा, घटके स्वरूपका नहीं । ' और यदि तस घटसे घटाभावको भिन्न पदार्थ सिद्ध माना जाय तो इसका उत्तर ऊपर कि दिया ही जा चुका है । एक बात और भी है, उत्पत्तिसे आ पूर्वं शशशृङ्गके समान अभावरूप घट-का अपने कारणकी सत्तासे सम्बन्ध लचि होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें ही रहा करता है । मश यदि कहो कि अयुतसिद्ध पदार्थों में अश ऐसा दोष नहीं आता ' तो यह ठीक प्रसि नहीं, क्योंकि भाव और अभावका अयुतसिद्ध होना सम्भव नहीं है । शि जो पदार्थ भावरूप होते हैं उन्हीं की न्तर युतसिद्धता या अयुतसिद्धता हो सकती है, भाव और अभाव अथवा चश १. अर्थात् यदि कहो कि जैसे शिलाका पुतला और उसका शरीर ये एक नाय हो हैं तो भी ' राहुके, शिर ' के समान उनमें जाता है, उसी प्रकार घट और प्रागभावका भी कल्पित अभेद हो सकता है - तो ऐसा कथन भी ब ठीक नहीं; क्योंकि भावपदार्थों में तो ऐसे कल्पित सम्बन्धका व्यपदेश हो सकता स ए है; किंतु अभाव सापेक्ष होता है, उसे अपने प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है, इसलिये उसका उसके साथ य अभद नहीं हो सकता ॥ अत: घटप्रागभाव घटका स्वरूप नहीं मृत्य हो सकता । कार्य २. ' इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घट भिन्न ही हैं ' इस वाक्यसे इसका उत्तर दिया गया है । वस्थ ३. परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले जिन दो पदार्थोंकी अलग - अलग प्रतीति होती है स्युि वे युतसिद्ध कहलाते हैं, जैसे घड़ा और रस्सी; तथा जिनकी अलग - अलग प्रतीति नहीं होती अर्थात् जिनमेंसे किसी भी एकको छोड़कर दूसरेकी प्रतीति नहीं होती वे अयुतसिद्ध कहलाते हैं । कार्य और कारण अयुतसिद्ध होते हैं; जैसे घट और मृत्तिका