बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 571–580
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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[ अध्याय २ समुद्र एक अयन चा एक अयन है, इसी है, इसी प्रकार समस्त नका चक्षु एक अयन इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक यन है, इसी प्रकार र समस्त विसर्गों का - एक अयन है और ॥ - जिस प्रकार सम्पूर्ण और तड़ागादिके एकायन - एक गम-प्रलयस्थान अर्थात् स्थल है, जैसा कि • उसी प्रकार वायुके कर्कश, कठोर और समस्त स्पर्शोका यस्थान है । त्वचासे स्पर्शसामान्यमात्र ये, उसी में समुद्रमें स्पर्शविशेष प्रविष्ट वे सत्ताशून्य हो वे उसीके संस्थान-कारमात्र ) थे । - वह त्वक्शब्दवाच्य चचा के विषय में स्पर्श-न मनके विषय-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३ विषयसामान्यमात्रे, त्वग्विषय इव 9 स्पर्शविशेषाः; प्रचिष्टं तद्व्यतिरे-केणाभावभूतं भवति, एवं मनो-विषयोऽपि बुद्धिविषयसामान्य-मात्रे प्रविष्टस्तद्वयतिरेकेणाभाव-भूतो भवति विज्ञानमात्रमेव भूत्वा प्रज्ञानघने परे ब्रह्मण्याप इव समुद्रे प्रलीयते । एवं परम्पराक्रमेण शब्दादौ सह ग्राहकेण करणेन प्रलीने प्रज्ञानघने उपाध्यभावात्सैन्धव-' घनवत् प्रज्ञानघनमेकरसमनन्त-मपारं निरन्तरं ब्रह्म व्यवतिष्ठते । तस्मादात्मैव एकमद्वयमिति प्रतिपत्तव्यम् । तथा सर्वेषां गन्धानां पृथिवी-विशेषाणां नासिके घ्राणविषयसा -मान्यम्, तथा सर्वेषां रसानाम-विशेषाणां जिह्वेन्द्रिय विषय सा-मान्यम्, तथा सर्वेषां रूपाणां तेजोविशेषाणां चक्षुश्चक्षुर्विषयसा-मान्यम्, तथा शब्दानां श्रोत्र-विषयसामान्यं पूर्ववत् । तथा श्रोत्रादिविषयसामान्यानां मनो-विषय सामान्ये संकल्पे, मनो-सामान्यमात्ररूप मनःसंकल्प में प्रविष्ट होकर उससे पृथक् सत्ताशून्य हो जाता है इसी तरह मनका विषय भी बुद्धिके सामान्य विषय-मात्रमें प्रवेश करके उससे पृथक् नहीं रहता तथा विज्ञानमात्र हो होकर समुद्रमें जलके समान प्रज्ञान-घन परब्रह्ममें लीन हो जाता है । इस प्रकार परम्पराक्रमसे अपने ग्राहक इन्द्रियके सहित शब्दादिके प्रज्ञानघनमें लीन हो जानेपर कोई उपाधि न रहनेके कारण लवणखण्ड-के समान एकरस, अनन्त, अपार, अखण्ड, प्रज्ञानघन ब्रह्म ही रह जाता 1. अतः एकमात्र अद्वितीय आत्मा ही है - ऐसा जानना चाहिये । इसी प्रकार पृथिवीके विशेष-रूप समस्त गन्धोंका नासिकाएँ— घ्राणसम्बन्धी विषयसामान्य, जल-के विशेषरूप समस्त रसोंका रस-नेन्द्रियसम्बन्धी विषयसामान्य, | तेजके विशेषरूप समस्त रूपोंका चक्षु - चक्षुसम्बन्धी विषयसामान्य और पहलेहीकी तरह शब्दोंका श्रोत्रसम्बन्धी विषयसामान्य आश्रय है । इसी प्रकार श्रोत्रादि विषयसामान्योंका मनके विषय-सामान्यरूप संकल्पमें, मनके विषय-
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५६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ विषयसामान्यस्यापि बुद्धिविषय-सामान्ये विज्ञानमात्रे; विज्ञान-मात्रे भूत्वा परस्मिन्प्रज्ञानघने प्रलीयते । तथा कर्मेन्द्रियाणां विषया व-दनादानगमनविसर्गानन्दविशेषाः तत्तत्क्रियासामान्येष्वेव प्रविष्टा न विभागयोग्या भवन्ति, समुद्र इवाग्विशेषाः; तानि च सामा-न्यानि प्राणमात्रम्, प्राणश्च प्रज्ञान-मात्रमेव । “ यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः " ( कौषी ० उ ० ३ । ३ ) इति कौषीतकिनोऽधीयते । ननु सर्वत्र विषयस्यैव प्रलयो-ऽभिहितः, न तु करणस्य; तत्र कोऽभिप्राय इति १ बाढम्; किन्तु विषयसमान-जातीयं करणं मन्यते श्रुतिः, न तु जात्यन्तरम्; विषयस्यैव स्वात्म-ग्राहकत्वेन संस्थानान्तरं करणं नाम - यथा रूपविशेषस्यैव संस्थानं प्रदीपः करणं सर्वरूपप्रकाशने , एवं सर्वविषयविशेषाणामेव स्वा- | | सामान्यका भी बुद्धिके विषय. सामान्यरूप विज्ञानमात्रमें और ह फिर विज्ञानमात्र होकर प्रज्ञानघन t परमात्मामें लय हो जाता है । इसी प्रकार कर्मेन्द्रियोंके भाषण, ग्रहण, गमन, त्याग और आनन्द- च | रूप विशेष विषय उन - उन क्रियाओं-के सामान्यों में प्रविष्ट होकर विभागके योग्य नहीं रहते, जिस प्रकार कि समुद्र में गये हुए जल-विशेष | वे सारे सामान्य प्राणमात्र हैं और प्राण प्रज्ञानमात्र ही हैं । कौषीतकी शाखावाले कहते हैं-" जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वही प्राण है । ” शङ्का - किंतु यहाँ सर्वत्र विषयका ही लय बतलाया गया है, इन्द्रियका नहीं - सो इसमें क्या कारण है? समाधान - ठीक है, किंतु श्रुति इन्द्रियको विषयकी सजातीय मानती है, अन्य जातिवाली नहीं । विषयका ही अपने ग्राहकरूपसे जो अन्य स्वरूप है, उसीका नाम इन्द्रिय है । जिस प्रकार रूपविशेषका ही संस्थान-मात्र दीपक सब प्रकारके रूपोंको प्रकाशित करनेमें साधन है, इसी प्रकार दीपकहीकी तरह समस्त
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[ अध्याय२ भी बुद्धिके विषय-विज्ञानमात्रमें और नमात्र होकर प्रज्ञानघन लय हो जाता है । कर्मेन्द्रियों के भाषण, , त्याग और आनन्द-विषय उन उन क्रियाओं-क्योंमें प्रविष्ट होकर ग्य नहीं रहते, जिस समुद्र में गये हुए जल-सारे सामान्य प्राणमात्र प्रज्ञानमात्र ही हैं । खावाले कहते हैं-वही प्रज्ञा है और जो प्राण है । " तु यहाँ सर्वत्र विषयका या गया है, इन्द्रियका समें क्या कारण है? ठीक है, किंतु श्रुति वयकी सजातीय मानती वाली नहीं । विषयका हकरूपसे जो अन्य सीका नाम इन्द्रिय है । - पविशेषका ही संस्थान-सब प्रकारके रूपोंको रने में साधन है, इसी हीकी तरह समस्त ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं ५६५ त्म विशेषप्रकाशकत्वेन संस्थाना- । न्तराणि करणानि प्रदीपवत् । तस्मान्न करणानां पृथक्प्रलये यत्तः कार्य:, विषय सामान्यात्मकत्वा-द्विषय प्रलयेनैव प्रलयः सिद्धो भवति करणानामिति ॥ ११ ॥
विषयविशेषोंके स्वरूपविशेषके प्रकाशकरूपसे इन्द्रियाँ उन्हींके अन्य संस्थानमात्र हैं । इसलिये इन्द्रियोंके प्रलयके लिये पृथक् प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, विषयसामान्य रूप होनेके कारण विषयके प्रलयसे ही इन्द्रियोंका भी प्रलय सिद्ध हो जाता है ॥ ११ ॥
विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जल में डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त तत्र ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( २ । ४ । ६ ) इति प्रतिज्ञातम्, तत्र हेतुरभिहितः - आत्मसामान्य । त्वम्, आत्मजत्वम्, आत्मप्रलयत्वं च । तस्मादुत्पतिस्थितिप्रलय-कालेषु प्रज्ञानव्य तिरेकेणाभावात् " प्रज्ञानं ब्रह्म " ( ऐ ० उ ० ५ । ३ ) “ श्रात्मैवेदं सर्वम् ” ( छा ० उ ० ७ | २५ | २ ) इति प्रतिज्ञातं यत्, तत्तर्कतः साधितम् । स्वाभावि -कोऽयं प्रलय इति पौराणिका वदन्ति । यस्तु बुद्धिपूर्वक: प्रलयो ब्रह्मविदां ब्रह्मविद्यानिमित्त:, अयमात्यन्तिक इत्याचक्षते -अविद्यानिरोधद्वारेण यो भवति; तदर्थोऽयं विशेषारम्भः- — तहाँ यह प्रतिज्ञा की गयी है कि ' यह जो कुछ है सब आत्मा है । ' इसमें आत्मसामान्यत्व, आत्मजनि-तत्व और आत्मप्रलयत्व ये हेतु बतलाये हैं । अतः उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकालोंमें प्रज्ञानसे भिन्न किसीकी सत्ता न होनेके कारण जो ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि " प्रज्ञान ब्रह्म है " " यह सब आत्मा ही है ” उसे तर्क से भी सिद्ध कर दिया । यह प्रलय स्वाभाविक है - ऐसा पौराणिक लोग कहते हैं । ब्रह्म-वेत्ताओंका जो ब्रह्मविद्याजनित बुद्धिपूर्वक प्रलय होता है, वह आत्यन्तिक है - ऐसा कहते हैं, जो कि अविद्या के निरोधद्वारा होता है; उसीके लिये यह विशेष आरम्भ किया जाता है । १. कार्यका कारण के आश्रित रहना - यही इसको स्वाभाविकता है ।
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५६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ था सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानु-विलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात् । यतो यतस्त्वा-ददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव । एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्ये-वानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
इसमें यह दृष्टान्त है — जिस प्रकार जलमें डाला हुआ नमकका डला जलमें ही लीन हो जाता है । उसे जलसे निकालने के लिये कोई समर्थ नहीं होता । जहाँ - जहाँसे भी जल लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता हे, हे मैत्रेयि! उसी प्रकार यह महदुभूत अनन्त, अपार और विज्ञान-घन ही है । यह इन [ सत्यशब्दवाच्य ] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके साथ नाशको प्राप्त हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई. विशेष संज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि! याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥
तत्र दृष्टान्त उपादीयते - स यथेति । सैन्धवखिल्यः- सिन्धोविं-कारः सैन्धवः, सिन्धुशब्देनोद-कमभिधीयते, स्यन्दनात्सिन्धु-रुदकम्, तद्विकारस्तत्र भवो वा सैन्धवः सैन्धवश्वासौ खिल्यश्चंति सैन्धवखिन्यः, खिलं एव खिल्यः स्वार्थे यत्प्रत्ययः; उदके सिन्धौ । स्वयोनौ प्रास्तः प्रचिप्तः उदकमेव , | ऐसा मैं तुझसे कहता हूँ – ऐसा यहाँ यह दृष्टान्त दिया जाता है - ' स यथा ' इत्यादि । सैन्धव-खिल्य - सिन्धुके विकारका नाम सैन्धव है, ' सिन्धु ' शब्दसे जल कहा जाता है । स्यन्दन करने ( बहने ) के कारण जल सिन्धु है, उसका विकार अथवा उससे उत्पन्न होनेवाला सैन्धव कहलाता है । जो सैन्धव हो और खिल्य ( डला ) हो, उसे सैन्धवखिल्य कहते हैं । खिल ही खिल्य है । यहाँ स्वार्थमें यत् प्रत्यय है । वह अपने कारणभूत सिन्धु यानी जलमें डाले जानेपर जलके साथ घुलता हुआ
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[ अध्याय२ वास्त उदकमेवानु-। यतो यतस्त्वा-दुद्भूतमनन्तमपारं समुत्थाय तान्ये-तीत्यरे ब्रवीमीति ना हुआ नमकका डला लनेके लिये कोई समर्थ नमकीन ही जान पड़ता अपार और विज्ञान-प्रकट होकर उन्हींके क्त होनेपर इसकी कोई कसे कहता हूँ - ऐसा दृष्टान्त दिया जाता ' इत्यादि । सैन्धव-धुके विकारका नाम सिन्धु ' शब्दसे जल कहा नन्दन करने ( बहने ) के सिन्धु है, उसका विकार उत्पन्न होनेवाला सैन्धव I जो सैन्धव हो और हो, उसे सैन्धवखिल्य ल ही खिल्य है । यहाँ प्रत्यय है । वह अपने न्धु यानी जलमें डाले साथ घुलता हुआ शाङ्करभाष्यार्थ ५६७ ब्राह्मण ४ ] विलीयमानमनुविलीयेत; यत्त- । गौमतैजस सम्पर्कात्काठिन्यप्राप्तिः । खिल्यस्य स्वयोनिसम्पर्कादप-गच्छति तदुदकस्य चिलयनम्, तदनु सैन्धवखियो विलीयत. इत्युच्यते । तदेतदाह उदकमेवा-नुविलीयेतेति । न ह नैव अस्य खिल्यस्यो-द्ग्रहणायोद्धृत्य पूर्ववद् ग्रहणाय ग्रहीतुं नैव समर्थः कश्चित्स्यात्सु-निपुणोऽपि । इवशब्दोऽनर्थकः । ग्रहणाय नैव समर्थः कस्मात् १ यतो यतो यस्माद्यस्माद्देशाचदुद कमाददीत गृहीत्वा स्त्रादयेत्, लवणास्वादमेव तदुदकं न तु खिन्यभावः । यथायं दृष्टान्तः, एवमेव वा अरे मैत्रेयीदं परमात्माख्यं महदू-भूतम् - यस्मान्महतो भूताद-विद्यया परिच्छिन्ना सती कार्य-करणोपाधिसम्बन्धात्खिन्यभाव-उसीमें लीन हो जाता है । पार्थिव तैजसका सम्पर्क होनेसे जो उस डलेको कठिनताको प्राप्ति हुई थी वह अपने कारणका संयोग होनेपर निवृत्त हो जाती है, यही जलका घुलना है, उसके साथ ही नमकका डला भी घुल गया - ऐसा कहा जाता है । इसीसे यह कहा गया है कि वह जलके साथ ही लीन हो जाता है । इस डलेके उद्ग्रहण अर्थात् पूर्ववत् निकालकर ग्रहण करनेके लिये कोई अत्यन्त निपुण पुरुष भी समर्थं नहीं होता । यहाँ ' इव ' शब्द अर्थहीन है । उसे ग्रहण करनेके लिये समर्थ हो ही नहीं सकता । क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि जिस - जिस जगहसे वह उस जलको ग्रहण करता है अर्थात् ग्रहण करके चखता है, वह जल लवणके ही स्वादवाला होता है, उसमें डलापन नहीं रहता । जैसा कि यह दृष्टान्त है इस प्रकार हे मैत्रेयि! यह परमात्मा नामका महद्भुत है, जिस महद्भूत-सेतू अविद्यासे परिच्छिन्न होकर देहेन्द्रियरूप उपाधिके सम्बन्घसे खिल्यभावको प्राप्त हो गयी है तथा
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५६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ मापन्नासि, मर्त्यो जन्ममरणाश- । नायापिपासादिसंसारधर्मवत्यसि, नामरूपकार्यात्मिका- अमुष्यान्व -याहमिति, स खिन्यभावस्तव । कार्य करणभूतोपाधिसम्पर्कभ्रान्ति -जनितो महति भूते स्वयोनौ महासमुद्रस्थानीये परमात्मनि अजरेऽमरेऽभये शुद्धे सैन्धवधन -वदेकरसे प्रज्ञानघनेऽनन्तेऽपारे निरन्तरेऽविद्याजनितभ्रान्तिभेद वर्जिते प्रवेशितः । तस्मिन्प्रविष्टे स्वयोनिग्रस्ते खिल्यभावेऽविद्याकृते भेदभावे प्रणाशिते - इदमेकमद्वैतं महद्भूतम् महच्च तद् भृतं च महद्भूतं सर्व-महत्तरत्वादाकाशादिकारणत्वाच्च । भूतं त्रिष्वपि कालेषु स्वरूपान्य-मिचारात्सर्वदैव परिनिष्पन्नमिति त्रैकालिको निष्ठाप्रत्ययः । अथवा भूतशब्दः परमार्थ-वाची, महच्च पारमार्थिक मरणधर्मवाली, जन्म, मरण, क्षु और पिपासा आदि सांसारिक धर्मोंवाली एवं मैं नामरूपकार्यात्मि-का और अमुक वंशमें उत्पन्न हुई हूँ - ऐसे भाववाली हो गयी है । देहेन्द्रियजनित उपाधिके सम्पर्क भ्रान्तिके कारण उत्पन्न हुआ तेरा वह खिल्यभाव अपने कारण महा-समुद्रस्थानीय अजर, अमर, अभय, शुद्ध, सैन्धवधन के समान एकरस, प्रज्ञानघन, अनन्त, अपार, अखण्ड एवं अविद्याजनित भ्रान्तिमय भेदसे रहित परमात्मामें प्रविष्ट कर दिया गया है । उसमें प्रविष्ट होनेपर उस खिल्यभावके अपने कारणद्वारा ' लीन कर लिये जानेपर अविद्या-जनित भेदभावका नाश हो जानेसे यह एक अद्वैत महद्भूत ही रहता है । महान् भूत होने से वह महद्भुत कहलाता है; क्योंकि आकाशादिका कारण होनेसे वह सबसे महान् है । तीनों ही कालोंमें उसके स्वरूपका व्यभिचार नहीं होता, वह सर्वदा ही ज्यों का त्यों रहता है, इसलिये भूत है । ' भूत ' शब्दमें ' त ' यह निष्ठाप्रत्यय त्रैकालिक है । अथवा ' भूत ' शब्द परमार्थवाची है । अर्थात् वह महत् है और
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[ अध्याय २ , जन्म, मरण, क्षुधा आदि सांसारिक मैं नामरूपकार्यात्म-क वंशमें उत्पन्न हुई ववाली हो गयी है । उपाधिके सम्पर्कसे रण उत्पन्न हुआ तेरा व अपने कारण महा-- अजर, अमर, अभय, नके समान एकरस, नन्त, अपार, अखण्ड नित भ्रान्तिमय भेदसे मामें प्रविष्ट कर दिया नविष्ट होनेपर उस अपने कारणद्वारा ' ये जानेपर अविद्या-विका नाश हो जानेसे महदुभूत ही रहता होने से वह महद्भुत क्योंकि आकाशादिका वह सबसे महान् है । नोंमें उसके स्वरूपका नहीं होता, वह सर्वदा नों रहता है, इसलिये त ' शब्दमें ' त ' यह कालिक है । ' शब्द परमार्थवाची वह महत् है और ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६ ९ चेत्यर्थः; लौकिकं तु यद्यपि । महद्भवति, स्वप्नमायाकृतं हिम-वदादिपर्वतोपमं न परमार्थवस्तु अतो विशिनष्टि - इदं तु महच्च । तद्भूतं चेति । अनन्तं नास्यान्तो विद्यत इत्यनन्तम्; कदाचिदा-पेक्षिकं स्यादित्यतो विशिनष्ट -पारमिति विज्ञप्तिर्विज्ञानम्, विज्ञानं च तद्यनश्चेति विज्ञानघनः, घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः -यथा सुवर्णघनोऽयोघन इति एवशब्दोऽवधारणार्थः- नान्यजा-त्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यर्थः । यदीदमेकमद्वैतं परमार्थतः स्वच्छं संसारदुःखासम्पृक्तम्, किन्निमित्तोऽयं खिल्यभाव आ-त्मनो जातो मृतः सुखी दुःख्यहं ममेत्येवमादिलक्षणोऽनेकसंसार-धर्मोपद्रुतः १ इत्युच्यते— पारमार्थिक है; [ इसलिये महदुभूत है ] । यद्यपि हिमालयादि पर्वतों के समान लौकिक वस्तु भी महान् होती है; किंतु वह स्वप्न या मायाके समान है, परमार्थंवस्तु नहीं । इसीसे श्रुति इसे विशेषित करती है कि यह महत् है और भूत भी है । अनन्त अर्थात् इसका अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त है । कदाचित् इसकी अनन्तता आपेक्षिक हो, इस-लिये ' अपारम् ' ऐसा विशेषण देती है । विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, जो विज्ञान हो और घन हो उसे विज्ञानघन कहते हैं । यहाँ घनशब्द [ विज्ञानमें ] अन्य जातिकी वस्तुका निषेध करनेके लिये है; जैसे कि सुवर्णघन, लोहघन आदि । ' एव ' शब्द निश्वयार्थक है । तात्पर्य यह है कि इसके भीतर कोई दूसरी । विजातीय वस्तु नहीं है । यदि यह आत्मतत्त्व एक, अद्वैत, परमार्थतः शुद्ध और सांसारिक दुःखोंसे असंस्पृष्ट है तो आत्माका यह खिल्यभाव क्यों है तथा यह मैं उत्पन्न हुआ, मरा, सुखी, दुःखी, अहं, मम इत्यादि लक्षणोंवाले अनेकों सांसारिक धर्मों से दूषित क्यों है? इसपर कहा जाता है-
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५७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ एतेभ्यो भूतेभ्यो यान्येतानि कार्यकरणविषयाकारपरिणतानि नामरूपात्मकानि सलिलफेनबु-बुदोपमानि स्वच्छस्य परमात्मनः सलिलोपमस्य, येषां विषयपर्य: -न्तानां प्रज्ञानघने ब्रह्मणि परमार्थ-विवेकज्ञानेन प्रविलापनमुक्तं नदीसमुद्रवत् - एतेभ्यो हेतुभूते-भ्यो भूतेभ्यः सत्यशब्दवाच्येभ्यः समुत्थाय सैन्धवखिल्यवत् — यथा अद्भयः सूर्यचन्द्रादिप्रतिविम्बः, यथा वा स्वच्छस्य स्फटिकस्य अलक्तकाद्युपाधिभ्यो रक्तादि-भावः, एवं कार्यकरणभूतभूतो-पाधिभ्यो विशेषात्मखिन्यभावेन समुत्थाय सम्यगुत्था — येभ्यो भूतेभ्य उत्थितः तानि यदा । कार्यकरण विषयाकारपरिणतानि भूतान्यात्मनो विशेषात्मखिन्य-हेतुभूतानि शास्त्राचार्योपदेशेन ब्रह्मविद्याया नदीसमुद्रवत्प्रवि-. लापितानि विनश्यन्ति, सलिल-फेनबुदबुदादिवत्तेषुविनश्यत्सु अन्वेवैष विशेषात्मखिल्यभावो इन भूतोंसे - ये जो देह और इन्द्रियरूप विषय के आकार में परि-णत जलके फेन और बुद्बुदोंके समान जलस्थानीय स्वच्छ पर-मात्मा के नामरूपमय विकार हैं; जिनके सम्पूर्ण विषयोंतकका, समुद्र-में I नदी II के II समान, पारमार्थिक विवेकज्ञानसे प्रज्ञानघन ब्रह्ममें लय होना बतलाया गया है, इन सबके हेतुभूत सत्य शब्दवाच्य भूतोंसे लवणखण्डके समान उत्पन्न होकर— जिस प्रकार जलसे सूर्य - चन्द्रादिका प्रतिविम्ब अथवा जैसे अलक्तक ( महावर ) आदि उपाधियोंके कारण स्वच्छ स्फटिकका रक्तादि भाव हो जाता है, इसी प्रकार देहेन्द्रियरूप भूतोंकी उपाधियोंके कारण विशे-षात्मरूप खिल्यभावसे समुत्थित अर्थात् सम्यक् प्रकारसे उत्पन्न होकर जिन भूतोंसे यह उत्पन्न हुआ है, वे देह और इन्द्रियोंके आकारमें परिणत एवं आत्मा के खिल्यभाव-रूप विशेषत्वके हेतुभूत भूत जिस विद्याके समय शास्त्र और आचार्य के ब्रह्म-उपदेशसे समुद्रमें नदीके समान लीन होते हुए नाशको प्राप्त होते हैं, जलमें फेन और के बुदबुदोंके साथ समान ही उनके नाश होने-यह विशेषात्मरूप खिल्यभाव भी नष्ट हो जाता है ।
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[ अध्याय २ - ये जो देह और यके आकार में परि-न और बुद्बुदोंके नीय स्वच्छ पर-रूपमय विकार हैं; विषयोंतकका, समुद्र-मान, पारमार्थिक ज्ञानघन ब्रह्ममें लय गया है, इन सबके शब्दवाच्य भूतोंसे नान उत्पन्न होकर-से सूर्य - चन्द्रादिका न्वा जैसे अलक्तक - उपाधियोंके कारण का रक्तादि भाव हो प्रकार देहेन्द्रियरूप योंके कारण विशे-नभावसे समुत्थित प्रकारसे उत्पन्न यह उत्पन्न हुआ इन्द्रियोंके आकार में त्मा के खिल्यभाव-हेतुभूत भूत जिस र आचार्य ब्रह्म-से समुद्रमें नदीके होते हुए नाशको जलमें फेन और उनके नाश होने-यह विशेषात्मरूप नष्ट हो जाता है । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१ विनश्यति यथा उदकालक्त-कादिहेत्वपनये सूर्यचन्द्रस्फटिका-दिप्रतिविम्वो विनश्यति, चन्द्रादि-स्वरूपमेव परमार्थतो व्यव -तिष्ठते, तद्वत्मज्ञानघनमनन्त-मपारं स्वच्छं व्यवतिष्ठते । न तत्र प्रेत्य विशेषसंज्ञास्ति कार्यकरणसङ्घातेभ्यो विमुक्तस्य- । इत्येवमरे मैत्रेयि ब्रवीमि नास्ति विशेषसंज्ञेति - – अहमसावमुष्य पुत्रो ममेदं क्षेत्रं धनं सुखी दुखीत्येवमादिलक्षणा, अविद्या -कृतत्वात्तस्याः; अविद्यायाश्च ब्रह्म-विद्यया निरन्त्रयतो नाशितत्वा-कुतो विशेषसंज्ञासम्भवो ब्रह्म-विदश्चैतन्यस्वभावावस्थितस्य १ शरीरावस्थितस्यापि विशेषसंज्ञा नोपपद्यते किमुत कार्यकरणविसु-क्तस्य सर्वतः १ इति होवाचोक्त-वान्किल परमार्थदर्शनं मैत्रेय्यै भार्यायै याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
जिस प्रकार जल और अलक्तक आदि हेतुओंके हट जानेपर सूर्य, चन्द्र और स्फटिक आदिका प्रति-विम्ब नष्ट हो जाता है, केवल चन्द्रादिका पारमार्थिक स्वरूप रह जाता है उसी प्रकार फिर अनन्त, अपार और स्वच्छ प्रज्ञान-घन ही रह जाता है । फिर प्रेत्य - देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर उसकी विशेष संज्ञा नहीं रहती, इसीसे हे मैत्रेयि! मैं यह कहता हूँ कि उसकी ' में अमुक हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, यह क्षेत्र और धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ ' इत्यादि प्रकारको विशेष संज्ञा नहीं रहती; क्योंकि वह तो अविद्या-जनित ही है, और अविद्याका उसके कारणके सहित ब्रह्मविद्यासे नाश हो चुका है, इसलिये चैतन्यस्वरूप ब्रह्मवेत्ताको विशेषसंज्ञा रहनेकी सम्भावना कहाँ है? उसकी तो शरीरमें रहते हुए भी कोई संज्ञा होनी सम्भव नहीं है, फिर सब प्रकार देह और इन्द्रियोंसे मुक्त होनेपर तो रह ही कैसे सकती है? इस प्रकार याज्ञवल्क्यने अपनी भार्या मैत्रेयी के प्रति परमार्थदृष्टिका निरूपण किया ॥ १२ ॥
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५७२ मैत्रेयी की शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान इस प्रकार बोध कराये जाने-एवं प्रतिबोधिता- पर · -सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, ' शरीरपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती-ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया है । ' याज्ञवल्क्यने कहा, ' ' हे मैत्रेयि! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी! यह तो उस ( महद्भूत ) का विज्ञान करानेके लिये पर्याप्त है ' ॥ १३ ॥
साह किलोवाचोक्तवती मैत्रेयी - – अत्रैव एतस्मिन्नेव एक-स्मिन्वस्तुनि ब्रह्मणि विरुद्धधर्म-वश्वमाचक्षाणेन भगवता मम मोहः कृतः; तदाह – अत्रैव मा भगवान्पूजावान मूमुहन्मोहं कृत-वान् । कथं तेन विरुद्धधर्मवच्त्रम् उक्तांमत्युच्यते – पूर्वं विज्ञानघन एवेति प्रतिज्ञाय पुनर्न प्रेत्य संज्ञास्तीति कथं विज्ञानघन एव १ कथं वा न प्रेत्य संज्ञा-उस मैत्रेयीने कहा, यही – इस एक वस्तु ब्रह्ममें ही विरुद्ध धर्मवत्ता-का वर्णन करनेवाले श्रीमान्ने तो मुझे मोह उत्पन्न कर दिया है । इसी बातको श्रुति कहती है - इस ( ब्रह्मके ) विषयमें ही मुझे आप भगवान् — पूजावान् अर्थात् पूज्य पुरुषने अमूमुहत् — मोह उत्पन्न कर दिया । उन्होंने ब्रह्मकी विरुद्धधर्म-वत्ताका किस प्रकार वर्णन किया है - सो बतलाया जाता है — पहले ' वह विज्ञानघन ही है ' ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर ' देहपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती ' ऐसा कहा है । सो किस प्रकार वह विज्ञानघन ही है और किस प्रकार देहपातके अनन्तर उसकी कोई संज्ञा नहीं रहती? एक