बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 581–590

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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[ अध्याय २ धान ध कराये जाने-समुहन्न प्रेत्य हं ब्रवीम्यलं नहीं रहती-नाज्ञवल्क्यने कहा, ! यह तो उस कहा, यही - इस विरुद्ध धर्मवत्ता-श्रीमान्ने तो कर दिया है । ति कहती है - इस में ही मुझे आप न् अर्थात् पूज्य - मोह उत्पन्न कर ब्रह्मकी विरुद्धधर्म-कार वर्णन किया जाता है— पहले ही है ' ऐसी फिर ' देहपातके नहीं रहती ' ऐसा किस प्रकार वह है और किस अनन्त र उसकी रहती? एक ब्राह्मण ४ ] स्तीति? न ह्युष्णः शीतश्चाग्नि- । रेवैको भवति । अतो मूढास्म्पत्र । स होवाच याज्ञवल्क्यः - न वा अरे मैत्रेय्यहं मोहं ब्रवीमि - मोहनं वाक्यं न ब्रवीमीत्यर्थः । ननु कथं विरुद्धधर्मत्वमवोचः - विज्ञान -घनं संज्ञाभावं च १ न मयेद-मेकस्मिन्धर्मिण्यभिहितम्, स्वयै-वेदं विरुद्धधर्मत्वेनैकं वस्तु परि-गृहीतं भ्रान्त्या, न तु मयोक्तम् । मया त्विदमुक्तम् - यस्त्वविद्या-प्रत्युपस्थापितः कार्यकरणसम्बन्धी आत्मनः खिल्यभावः, तस्मिन्वि या नाशिते, तन्निमित्ता या विशेषसंज्ञा शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनलक्षणा, सा कार्य-" करणसङ्घातोपाधौ प्रविलापिते नश्यति हेत्वभावाद् उदकाद्या-धारनाशादिव चन्द्रादिप्रतिविम्ब - । ५७३ ही अग्नि उष्ण और शीतल दोनों प्रकारका नहीं हो सकता; अतः इस विषयमें मुझे मोह ( भ्रम ) हो गया है । उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे मैत्रेयि! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ अर्थात् मोह उत्पन्न करने-वाली बात नहीं कह रहा हूँ । ' [ मैत्रेयी बोली ] तो फिर ' वह विज्ञानघन है और उसकी कोई संज्ञा नहीं है, ये आपने उसके दो विरुद्ध धर्मं क्यों बतलाये? [ याज्ञ-वल्क्यने कहा- ] मैंने ये धर्म एक ही धर्मी में नहीं बतलाये हैं; भ्रान्ति-से तूने ही एक वस्तुको विरुद्ध धर्म-वाली समझ लिया है, मैंने ऐसा नहीं कहा । मैंने तो ऐसा कहा था कि आत्माका जो अविद्याद्वारा प्रस्तुत किया हुआ देहेन्द्रियसम्बन्धी खिल्य-भाव है, उसका विद्याद्वारा नाश कर दिये जानेपर उस खिल्यभाव-के कारण पड़ी हुई जो शरीरादि-सम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनरूपा विशेष संज्ञा होती है, वह कार्यकरणसंघात-रूप उपाधिके लीन कर देनेपर कोई हेतु न रहनेके कारण इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार जलादि आधारका नाश हो जानेपर चन्द्रादिका प्रतिविम्ब और

पृष्ठ 582

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[ अध्याय २ बृहदारण्यकोपनिषद् १७४ प्रकाशादिः; न पुनः । स्तन्निमित्तच परमार्थचन्द्रादित्यस्वरूपानाशव-विज्ञान-दसंसारिब्रह्मस्वरूपस्य घनस्य नाशः तद्विज्ञानघन इत्युक्तम्; स श्रात्मा सर्वस्य । जगतः „ परमार्थतो भूतनाशान्न विनाशी । विनाशी त्वविद्याकृतः खिल्यभावः, " वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् ” ( छा ० उ ० ६ । १ । ४ ) इति श्रुत्यन्तरात् । अयं तु पारमार्थिकः - अविनाशी चाचरेऽयमात्मा, अतोऽलं पर्याप्तं चै अरे इदं महद्भूतमनन्तमपारं यथाव्याख्यातं विज्ञानाय विज्ञा-तुम् । “ न हि विज्ञातुर्विज्ञातेविं-परिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् " ( ४ । ३ । ३० ) इति हि ३. ९ वक्ष्यति ॥ १३ ॥

उससे होनेवाले प्रकाशादिका नाश हो जाता है । किंतु जिस प्रकार वास्तविक चन्द्रमा और सूर्यादिके स्वरूपका नाश नहीं होता, उसी प्रकार असंसारी ब्रह्मके स्वरूप विज्ञानघनका भी नाश नहीं होता; उसीको विज्ञानघन --- इस नामसे कहा गया है; वह सम्पूर्णं जगत्का आत्मा है और भूतोंका नाश होने-पर भी परमार्थतः उसका नाश नहीं होता । विनाशी तो अविद्या-जनित खिल्यभाव ही है, जैसा कि " विकार वाणीसे आरम्भ होने-वाला नाममात्र है " इस अन्य श्रुति-से सिद्ध होता है । किंतु यह तो पारमार्थिक पारमार्थिक है है और और हे मैत्रेयि! यह आत्मा तो अविनाशी है; अतः जिस | प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है, उसी प्रकार यह अनन्त और अपार महद्भूत जाना जा सकता है । " विज्ञाताके विज्ञानका विशेषरूपसे लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है " ऐसा श्रुति आगे कहेगी भी ॥ १३ ॥

व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थं व्यवहारातीत है कथं तर्हि प्रेत्य संज्ञा नास्ति? शरीरपातके अनन्तर उसकी इत्युच्यते संज्ञा किस प्रकार नहीं रहती? सो , शृणु - बतलाया जाता है, सुनो--

पृष्ठ 583

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[ अध्याय २ काशादिका नाश ऋतु जिस प्रकार T और सूर्यादिके नहीं होता, उसी ब्रह्मके स्वरूप नाश नहीं होता; न - इस नामसे इ सम्पूर्ण जगत्का तोंका नाश होने-तः उसका नाश नाशी तो अविद्या-वही है, जैसा कि से आरम्भ होने-है " इस अन्य श्रुति-। किंतु यह तो नौर हे मैत्रेयि! यह शी है; अतः जिस व्याख्या की गयी है, अनन्त और अपार जा सकता है । ज्ञानका विशेषरूपसे ता; क्योंकि वह ऐस आगे ॥ तीत है अनन्तर उसकी नहीं रहती? सो है, सुनो ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५ यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतर शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कशृणुयात्तत्केनकम-भिवदेत्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेद सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे न विजानीयादिति ॥ १४ ॥

जहाँ ( अविद्यावस्था में ) द्वैत - सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभि-वादन करता है, अन्य अन्यका मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है । किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किसके द्वारा किसे सूघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने? हे मैत्रेयि! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने? ॥ १४ ॥

यत्र यस्मिन्नविद्याकल्पिते कार्यकरणसङ्घातोपाधिजनिते वि-शेषात्मनि खिल्यभावे हि यस्मात्, द्वैतमिव - परमार्थतो-ऽद्वैते ब्रह्मणि द्वैतमिव भिन्नमिव वस्त्वन्तरमात्मनः — उपलक्ष्यते । ननु द्वतेनोपमीयमानत्वाद् द्वैतस्य पारमार्थिकत्वमिति, न, " वाचा-हि - क्योंकि जहां जिस अविद्या-कल्पित देहेन्द्रियसंघातरूप उपाधि-से उत्पन्न हुए विशेषात्मरूप खिल्य-भावमें द्वैत - सा अर्थात् परमार्थतः अद्वैत ब्रह्ममें द्वेत - सा भिन्न - सा अर्थात् आत्मासे भिन्न पदार्थ सा प्रतीत होता है- [ शङ्का- ] किंतु द्वैतसे उपमा दिये जानेके कारण तो द्वैतकी पार-मार्थिकता सिद्ध होती है । [ समा-धान- ] नहीं, क्योंकि " विकार

पृष्ठ 584

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५७६ रम्भणं विकारो नामधेयम् ” । ( छा ० उ ० ६ । १ । ४ ) इति " एकमेवाद्वितीयम् " श्रुत्यन्तरात्, ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) " श्रात्मैवेदं सर्वम् " ( छा ० उ ० ७ । २५ । २ ) इति च । तत्तत्र यस्माद् द्वैतमिव तस्मा-देवेतरोऽसौ परमात्मनः खिल्यं-भूत श्रात्मापरमार्थः, चन्द्रादेरि-वोदकचन्द्रादिप्रतिविम्बः ", इतरो घातेतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं जिप्रति; इतर इतरमिति कारकप्रदर्श-नार्थम्, जिघ्रतीति क्रियाफलयो-रभिधानम्, यथा छिनत्तीति - यथो द्यम्योद्यम्य निपातनम् छेद्यस्य च द्वैधीभावः, उभयं छिनत्तीत्ये-केनैव शब्देन श्रभिधीयते— वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है ” ऐसी एक अन्य श्रुति है, तथा " एक ही अद्वितीय ब्रह्म " " सब आम है " है । अत: वहाँ चूँकि द्वैत - सा रहता है, इसलिये ही परमात्माका खिल्य-रूप वह अपारमार्थिक आत्मा उससे अन्य अर्थात् चन्द्रादिके जलमें पड़े हुए चन्द्रादि प्रतिविम्बके समान भिन्न है अर्थात् परमात्मासे इतर सूँघनेवाला अन्य घ्राणेन्द्रियसे इतर सूँघनेयोग्य पदार्थोंको सूँघता है । यहाँ जो ' इतरः इतरम् ' ऐसा कहा गया है वह [ कर्ता और कर्म ] कारकों को प्रदर्शित करनेके लिये है और ' जिघ्रति ' यह क्रिया और फल-को बतलानेके लिये है, जिस प्रकार ' छिनत्ति ' -- - छेदन करता है । जैसे कुल्हाड़ी उठा - उठाकर मारना और छेद्य वस्तुके दो खण्ड हो जाना - ये दोनों ही ' छिनत्ति ' इस एक ही शब्द-से कहे जाते हैं, क्योंकि उसीमें क्रिया-क्रियावसानत्वात्क्रियाव्यतिरेकेण की समाप्ति होती है और क्रियाके बिना उस फलकी उपलब्धि भी नहीं च तत्फलस्यानुपलम्भात्; इतरो होती । अतः [ परमात्मासे ] भिन्न सूँघनेवाला अपनेसे भिन्न घ्राणेन्द्रियके घ्राता इतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं द्वारा उससे भिन्न घ्रातव्य पदार्थको

पृष्ठ 585

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[ अध्याय २ होनेवाला नाममात्र अन्य श्रुति है, तथा नीय ब्रह्म है " " यह है " ऐसी भी श्रुति चूँकि द्वैत - सा रहता नरमात्माका खिल्य-मार्थिक आत्मा ति चन्द्रादिके जलमें दि प्रतिविम्बके - अर्थात् परमात्मासे अन्य घ्राणेन्द्रिय योग्य पदार्थोंको इतरः इतरम् ' ऐसा [ कर्ता और कर्म ] शित करनेके लिये है यह क्रिया और फल-लिये है, जिस प्रकार दन करता है । जैसे उठाकर मारना और 7 खण्ड हो जाना - ये त्ति ' इस एक ही शब्द-- क्योंकि उसीमें क्रिया-होती है और क्रियाके की उपलब्धि भी नहीं [ परमात्मासे ] भिन्न नेसे भिन्न घ्राणेन्द्रियके भन्न प्रातव्य पदार्थको ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७ जिप्रति - तथा सर्वं पूर्ववद्विजा । नाति इयमविद्यावदवस्था । यत्र तु ब्रह्मविद्ययाविद्या नाश-मुपगमिता तत्र आत्मव्यतिरेके-णान्यस्याभावः यत्र वै अस्य ब्रह्मविदः सर्वं नामरूपाद्यात्मन्येव प्रविलापितमात्मैव संवृत्तम्, यत्र एवमात्मैवाभूत्चचत्र केन करणेन कं घ्रातव्यं को जिघेत् १ तथा पश्येद्विजानीयात् १ सर्वत्र हि कारकसाध्या क्रिया, अतः कारकाभावेऽनुपपत्तिः क्रियायाः; सुधता है । इसी प्रकार आगेके पर्यायोंमें समझना चाहिये । पहलेही-के समान वह सबको विशेषरूपसे जानता है; यह उसकी अविद्यावान् ( अज्ञानी ) की अवस्था है । किंतु जहाँ ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्या नाशको प्राप्त हो गयी है, वहाँ आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका अभाव हो जाता है । और जहाँ इस ब्रह्मवेत्ताके सम्पूर्ण नाम - रूपादि आत्माही में लीन किये जाकर आत्मा ही हो गये हैं, इस प्रकार जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वहाँ किस इन्द्रियके द्वारा किस सूघने-योग्य पदार्थको कौन सूघे? तथा कौन देखे, कौन जाने? क्योंकि सभी जगह क्रिया तो कारकसाध्य | ही होती है, अतः कारकका अभाव हो जानेपर क्रिया सम्भव नहीं रहती तथा क्रिया न रहनेपर फल नहीं क्रियाभावे च फलाभावः । तस्माद् रहता । अतः अविद्याके रहते सत्यां क्रियाकारक | हुए ही क्रिया, कारक और फलका श्रविद्यायामेव व्यवहार रहता है, ब्रह्मवेत्ता का ऐसा फलव्यवहारः, न ब्रह्मविदः - कोई व्यवहार नहीं रहता; क्योंकि वह तो सबका आत्मा ही है; उसकी आत्मत्वादेव सर्वस्य, नात्म- दृष्टिमें आत्मा से भिन्न कारक, क्रिया व्यतिरेकेण कारकं क्रियाफलं | अथवा फल है ही नहीं; और न वृ ० उ ० ३७-

पृष्ठ 586

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१७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ वास्ति; न चानात्मा सन्सर्व- । मात्मैव भवति कस्यचित्; तस्मादविद्ययैव अनात्मत्वं परि- । कल्पितम् न तु परमार्थत आत्म-व्यतिरेकेणास्ति किञ्चित् । तस्मा-त्परमार्थात्मैकत्वप्रत्यये क्रिया-कारक फल प्रत्ययानुपपत्तिः । अतो विरोधाद्द्ब्रह्मविदः क्रियाणां तत्सा -धनानां चात्यन्तमेव निवृत्तिः । केन कमिति क्षेपार्थं वचनं प्रका-' रान्तरानुपपत्तिदर्शनार्थम्, केन । चिदपि प्रकारेण क्रियाकरणादि- । कारकानुपपत्तेः । केनचित् कश्चित् कश्चित् कथञ्चिन्न जिघ्रेदेवेत्यर्थः । यत्रापि अविद्यावस्थायामन्यो-न्यं पश्यति, तत्रापि येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्येन विजानाति तस्य करणस्य विज्ञेये विनियुक्तत्वात्, ज्ञातुश्च ज्ञेय एव हि जिज्ञासा नात्मनि । न । किसीके लिये अनात्मा रहते हुए सब कुछ आत्मा हो ही सकता है; अतः अनात्मत्व तो अविद्यासे ही कल्पित है, वास्तवमें तो आत्मा भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं । अतः पारमार्थिक आत्मैकत्वका । ज्ञ अतः होनेपर क्रिया, कारक और फलकी प्रतीति होनी सम्भव नहीं है । इस-लिये [ ज्ञानदृष्टिसे ] विरोध होनेके कारण ब्रह्मवेत्ताके लिये क्रिया और उनके साधनोंकी तो सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । ' केन कम् ' ऐसा जो आक्षेपार्थक वचन है, वह प्रकारा-न्तरकी अनुपपत्ति प्रदर्शित करनेके लिये है; क्योंकि किसी भी प्रकारसे [ ब्रह्मवेत्ताके लिये ] क्रिया और करणादि कारकोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती । तात्पर्य यह है कि कोई भी किसीके द्वारा किसी प्रकार कुछ भी नहीं सूंघ सकता! इसके सिवा अविद्यावस्था में भी जहाँ अन्य अन्यको देखता है, वहीं भी जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने, क्योंकि जिसके द्वारा वह जानता है वह इन्द्रिय तो उसके विज्ञेयवर्ग में आ जाती है और ज्ञाता जिज्ञासा भी ज्ञेयमें ही होती है, अपने में नहीं

पृष्ठ 587

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[ अध्याय २ अनात्मा रहते हुए हो ही सकता है; तो अविद्यासे ही तवमें तो आत्मासे ही नहीं । अतः आत्मैकत्वका ज्ञान कारक और फलकी -भव नहीं है । इस-से ] विरोध होनेके के लिये क्रिया और तो सर्वथा निवृत्ति न कस् ' ऐसा जो न है, वह प्रकारा-प्रदर्शित करनेके किसी भी प्रकारसे नये ] क्रिया और की उपपत्ति नहीं यह है कि कोई किसी प्रकार कुछ न्ता! अविद्यावस्था में भी देखता है, वहाँ इस सबको जानता राजाने, क्योंकि जानता है वह विज्ञेयवर्ग में आ की जिज्ञासा भी है, अपने में नहीं ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७ ९ चाग्नेरिव आत्मा श्रात्मनो । विषयः, न चाविषये ज्ञातुर्ज्ञान-सुपपद्यते । तस्माद् येनेदं सर्वं विजानाति तं विज्ञातारं केन करणेन को वान्यो विजानीयात् । यदा तु पुनः परमार्थविवेकिनो ब्रह्मविदो विज्ञातैव केवलोऽद्वयो वर्तते तं विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ । होती [ तथा अग्नि जैसे अपनेहीको नहीं जलाता, ] उसी प्रकार आत्मा अपना ही विषय नहीं हो सकता । और जो विषय नहीं है, उसका ज्ञानाको ज्ञान नहीं हो सकता । अतः जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उस विज्ञाताको कोई अन्य अनात्मा किस करणके द्वारा जान सकता है । किंतु जिस अवस्था-में परमार्थका विवेक रखनेवाले ब्रह्मवेत्ताके लिये केवल अद्वितीय विज्ञाता ही विद्यमान रहता है, उस समयमै उस वह किसके कि द्वारा जानेगा? ॥ १४ ॥

1 इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये F चतुर्थं मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ४ ॥

पञ्चम कहीय यत्केवलं कर्मनिरपेक्ष ममृतत्व-साधनं तद्वक्तव्य-उपक्रमः मिति मैत्रेयीब्राह्मण-मारब्धम्, तच्चात्मज्ञानं सर्व-संन्यासाङ्गविशिष्टम् । आत्मनि च विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति, आत्मा च प्रियः सर्वस्मात्; द्रीकृ ब्राह्मण जो कर्मकी अपेक्षासे रहित अकेला ही अमृतत्वका साधन है, उसका वर्णन करना था, इसीसे मैत्रेयी-ब्राह्मण आरम्भ किया गया था और वह सर्वसंन्यासरूप अङ्गसे युक्त आत्म-ज्ञान ही है । आत्माका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है और आत्मा सबसे अधिक प्रिय है

पृष्ठ 588

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५८० तस्मादात्मा द्रष्टव्यः । स च श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि-तव्य इति च दर्शनप्रकारा उक्ताः । तत्र श्रोतव्य प्राचार्यागमा-भ्याम्, मन्तव्यस्तर्कतः । तत्र च तर्क उक्तः ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इति प्रतिज्ञातस्य हेतुवचनमात्मै-कसामान्यत्वम् आत्मैकोद्भवत्वम् । आत्मैकप्रलयत्वं च । तत्रायं हेतुरसिद्ध इत्याशङ्कयत आत्मैक-सामान्योद्भवप्रलयाख्यः । तदा शङ्कानिवृष्यर्थमेतद्ब्राह्मण-मारभ्यते । यस्मात्परस्परोपकार्योपकारक-भूतं जगत्सर्वं पृथिव्यादिः यच्च लोके परस्परोपकार्योपकारकभूतं तदेककारणपूर्वकम्एकसामा- । इसलिये आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये । तथा उसीका श्रवण | मनन और निदिध्यासन करना, चाहिये — ये उसके साक्षात्कारके प्रकार बतलाये गये हैं । इनमें आत्माका श्रवण तो आचार्य और शास्त्र के द्वारा करना चाहिये और मनन तर्कसे करना चाहिये । इसमें तर्क यह बतलाया है कि जहाँ ' यह सब आत्मा ही है ' ऐसी प्रतिज्ञा की है, उसमें एकमात्र आत्माका ही सबमें सामान्यरूपसे विद्यमान रहना, एक आत्मासे ही सबका उत्पन्न होना और एक आत्मामें ही सबका लीन होना — ये उसके हेतु बतलाये गये हैं । यहाँ यह शङ्का की जाती है कि यह जो एक आत्माका ही सबमें समानरूपसे रहना, उसीसे सबका उत्पन्न होना एवं उसीमें लय होनारूप हेतु है, वह असिद्ध है । इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है । क्योंकि यह पृथिवी आदि सारा जगत् परस्पर उपकार्यं और उप-कारकरूप हैं तथा लोकमें जो भी पदार्थं परस्पर उपकार्यं - उपकारक-रूप होते हैं, वे एक कारणपूर्वक ,

पृष्ठ 589

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[ श्रध्याय २ V माका साक्षात्कार तथा उसीका श्रवण, निदिध्यासन करना सके साक्षात्कारक गये हैं । श्रवण तो आचार्य रा करना चाहिये से करना चाहिये । तलाया है कि जहां ही है ' ऐसी प्रतिज्ञा मात्र आत्माका ही विद्यमान रहना, ही सबका उत्पन्न आत्मामें ही सबका उसके हेतु बतलाये शङ्का की जाती एक आत्माका ही स रहना, उसीसे होना एवं उसीमें तु है, वह असिद्ध ङ्काकी निवृत्तिके आरम्भ किया थिवी आदि सारा पकार्य और उप-लोकमें जो भी उपकार्य - उपकारक-एक कारणपूर्वक, ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८१ न्यात्मकम् एकप्रलयं च दृष्टम् । । तस्मादिदमपि पृथिव्यादिलक्षणं जगत्परस्परोपकार्योपकारकत्वात्त -थाभूतं भवितुमर्हति । एष । ह्यर्थोऽस्मिन्ब्राह्मणे प्रकाश्यते । अथवा ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इति ' प्रतिज्ञातस्य आत्मोत्पत्तिस्थिति -लयत्वं हेतुमुक्त्वा पुनरागमप्रधा-नेन मधुब्राह्मणेन प्रतिज्ञातस्यार्थ-स्य निगमनं क्रियते । तथा हि नैयायिकैरुक्तम् - " हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ” इति । एक सामान्यरूप और एक प्रलय-स्थानवाले देखे गये हैं; इसलिये यह पृथिवी आदिरूप जगत् भी परस्पर उपकार्यं - उपकारकरूप होनेके कारण वैसा ही होना चाहिये । यही विषय इस ब्राह्मणमें प्रकाशित किया जाता है । अथवा ' यह सब आत्मा ही है ' ऐसी जो प्रतिज्ञा की थी, उसमें आत्मासे उत्पत्ति तथा उसी में स्थिति और लय होनारूप हेतु बतलाकर अब इस शास्त्रप्रधान मधुब्राह्मणद्वारा प्रतिज्ञा किये हुए उसी अर्थका पुनः निगमन किया जाता है । ऐसा ही नैयायिकोंने कहा है कि “ हेतुका प्रतिपादन करके प्रतिज्ञाको पुनः कहना निगमन कहलाता है । " अन्यैव्र्याख्यातम् - श्रादुन्दुभि- [ भर्तृ प्रपञ्चादि ] अन्य भाष्य-दृष्टान्ताच्छ्रोतव्यार्थ मागमवचनम् कारोंने ऐसी व्याख्या की है कि ' दुन्दुभिके दृष्टान्त [ से पहले ] तक जो शास्त्रवचन है, वह ' श्रोतव्यः ” , इस विधिवाक्यमें कहे हुए श्रवणका निरूपण करनेके लिये है, फिर मधुब्राह्मणके पहलेतक जो शास्त्र-वचन है, वह युक्ति दिखलाते हुए प्राङ्मधुब्राह्मणान्मन्तव्यार्थमुपपत्ति- ' मन्तव्य: ' इस वाक्य में आये हुए मनन-१. ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादिसे आरम्भ कर । २. आत्माका श्रवण करना चाहिये । ३. दुन्दुभि - दृष्टान्त से लेकर ।

पृष्ठ 590

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५८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २. प्रदर्शनेन, मधुब्राह्मणेन तु निदि-ध्यासन विधिरुच्यत इति । सर्वथापि तु यथा आगमेना-वधारितं तर्कतस्तथैव मन्तव्यम् । यथा तर्कती मतं तस्य तर्कागमा-भ्यां निश्चितस्य तथैव निदिध्या-सनं क्रियत इति पृथङ्निदि ध्यासनविधिरनर्थक एव । तस्मात् पृथक्प्रकरणविभागोऽनर्थक इत्य-स्मदभिप्रायः श्रवणमनननिदि ध्यासनानामिति । सर्वथापि तु श्रध्यायद्वयस्यार्थोऽस्मिन्त्राह्मणे उपसंहियते । पृथिवी प्रादिमें मधुदृष्टि तथा | का निरूपण करनेके लिये है और मधुब्राह्मणके द्वारा निदिध्यासन की विधि बतलायी जाती है । किंतु [ कुछ भी अर्थ किया जाय ] सभी प्रकार जैसा शास्त्रने निश्चय किया हो, वैसा ही तर्कद्वारा मनन करना चाहिये और जैसा तर्कसे मनन किया गया है उस तक और शास्त्र से निश्चित किये हुए अर्थ-का उसी प्रकार निदिध्यासन किया जाता है, इसलिये निदिध्यासन के लिये पृथक् विधि करना निरर्थक ही है । अतः हमारा यह अभिप्राय है कि श्रवण, मनन और निदिध्या-सनके प्रकरणों का पृथक् विभाग करना व्यर्थ है । सभी तरहसे इस ब्राह्मणमें पूर्ववर्ती दोनों अध्यायोंके अर्थका उपसंहार किया जाता है । उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर पुरुषकी अभिन्नता इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यैपृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यांतेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म ँ शारीरस्तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषोऽयमेवस योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ १ ॥