बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 591–600

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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[ अध्याय २. रनेके लिये है और रा निदिध्यासन की जाती है । भी अर्थ किया कार जैसा शास्त्राने वैसा ही तर्कद्वारा हिये और जैसा गया है उस तर्क किये हुए अर्थ -निदिध्यासन किया ये निदिध्यासन के करना निरर्थक रा यह अभिप्राय न और निदिध्या-पृथक् विभाग सभी तरहसे इस दोनों अध्यायों के किया जाता है । पुरुषके साथ स्यै पृथिव्यै तेजोमयो-रस्तेजोमयो-दममृतमिदं ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८३ यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस पृथिवीके मधु हैं | इस पृथिवी में जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-शारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष है,

[ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] ।

सर्व है ॥ १ ॥

इयं पृथिवी प्रसिद्धा सर्वेषां भूतानां मधु, सर्वेषां ब्रह्मादिस्त-पर्यन्तानां भूतानां प्राणिनाम्, मधु कार्यम्, म मधु । यथैको मध्यपूपोऽनेकै मधुकरे-निर्वर्तित एवमियं पृथिवी सर्व भूतनिर्वर्तिता । तथा सर्वाणि भूतानि पृथिव्यै पृथिव्या अस्या मधु कार्यम् ॥ किं च यश्चायं पुरुषोऽस्यां पृथिव्यां तेजोमय श्चिन्मात्र प्रकाश-मयोऽमृतमयोऽमरणधर्मा पुरुषः, यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' | यह अमृत है, यह ब्रह्म है है,, यह यह प्रसिद्ध पृथिवी समस्त भूतों-काम है: अर्था ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यंन्त समस्त भूतों - प्राणियों-का मधु – कार्य है । यह मधुके समान मधु है; जिस प्रकार एक मधुका छत्ता अनेकों मधुकरोंद्वारा तैयार किया हुआ होता है, उसी प्रकार यह पृथिवी समस्त भूतोंद्वारा तैयार की गयी है तथा समस्त भूत इस पृथिवी मधु - कार्य हैं । इसके सिवा इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय – चिन्मात्र प्रकाशमय और अमृतमय - अमरणधर्मा पुरुष है और जो यह अध्यात्म शारीर-यश्चायमध्यात्मं शारीरः शरीरे भवः शरीर * में रहनेवाला पहलेहीके समान तेजोमय और अमृतमय पूर्वव तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः, पुरुष है तथा लिङ्ग - देहका अभि-स च लिङ्गाभिमानी, स च सर्वेषां मानी है वह भी समस्त भूतोंका उप है और भूतानामुपकारकत्वेन मधु, समस्त भूत उसके मधु हैं - यह बात सर्वाणि च भूतान्यस्य मधु - [ ' यश्चायमस्याम् ' इस वाक्यके ] च । एवमेत- शब्दके सामर्थ्यसे जानी जाती है । चशब्दसामर्थ्यात् प्रकार ये चारों ही एक चतुष्टयं तावदेकं सर्वभूतकार्यम्, म मधु अर्थात् समस्त भूतोंके कार्य १. पृथिवी, समस्त भूत, पार्थिव पुरुष और शारीर पुरुष ।

पृष्ठ 592

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१८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ सर्वाणि च भूतान्यस्य कार्यम्; | हैं और समस्त भूत इन चारोंके श्रतोऽस्य एककारणपूर्वकता । कार्य हैं; अत: इस जगत् की एक कारणपूर्वकता है । जिस एक यस्मादेकस्मात्कारणादेतज्जातं तदे- कारणसे यह उत्पन्न हुआ वही एक बैकं परमार्थतो ब्रह्म, इतरत्कार्यं वाचारम्भणं विकारो नामधेय-मात्रमित्येष मधुपर्यायाणां सर्वेषा-मर्थः सङ्क्षेपतः । श्रयमेव स योऽयं प्रतिज्ञातः " इदं सर्वं यदयमात्मा " ( २ । ४ । ६ ) इति इदममृतम्; यन्मै-त्रेय्या अमृतत्वसाधनमुक्तम्, श्रात्मविज्ञानमिदं तदमृतम् । इदं ब्रह्म, यत् ' ब्रह्म ते ब्रवाणि, ज्ञप-यिष्यामि ' इत्यध्यायादौ प्रकृतं यद्विषया च विद्या ब्रह्मविद्येत्यु-च्यते । इदं सर्व यस्माद्ब्रह्मणो विज्ञानात्सर्वं भवति ॥ १ ॥

तत्त्व परमार्थतः ब्रह्म है, उससे भिन्न उसका कार्य वाणी से आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है - इस प्रकार मधुके पर्यायोंका यह संक्षेपतः अर्थ है । यही वह है जिसके विषयमें यह प्रतिज्ञा की गयी है कि " यह जो कुछ है सब आत्मा है । " यह अमृत है । मैत्रेयीको जो अमृतत्वका साधन बतलाया गया था वह यह आत्म-विज्ञान अमृत है । यह ब्रह्म है, जिसका ' मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूंगा; ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा ' इस प्रकार इस अध्यायके आरम्भ में प्रकरण है तथा जिससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्यां ब्रह्मविद्या. इस नामसे कही जाती है । यह सर्व है, ' ब्रह्मका ज्ञान होनेसे सर्वरूप हो जाता है ॥ १ ॥

इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपा भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु सर्वाणि तेजोमयोऽमृतमयःपुरुषो

पृष्ठ 593

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[ अध्याय २ भूत इन चारोंके इस जगत् की एक है । जिस एक पन्न हुआ वही एक ब्रह्म है, उसमे वाणी से आरम्भ नाममात्र है - इस योंका यह संक्षेपतः जिसके विषय में यह - है कि " यह जो है । " यह अमृत अमृतत्वका साधन ' वह यह आत्म-| यह ब्रह्म है, ब्रह्मका उपदेश ज्ञान कराऊंगा ' न्यायके आरम्भ में जिससे सम्बन्ध ब्रह्मविद्या इस है । यह सर्व है, होनेसे सर्वरूप 1 ब्राह्मण ५ ] ५८५ यश्चायमध्यात्म ँ रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मे 7 सर्वम् ॥ २ ॥

ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं । इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' [ इस

वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ २ ॥

तथा आपः । अध्यात्मं इसी प्रकार जल मधु है । अध्यात्म ( शरीरके अन्तर्गत ) रेतस्में

रेतस्यपां विशेषतोऽवस्थानम् ॥ २ ॥। जलकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥२ ॥

अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्ननौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो -ऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ ३ ॥

यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं । इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय ' तेजोमय अमृतमय पुरुष है, [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] सर्वं है ॥ ३ ॥

तथा अग्निः । वाचि श्रग्ने अग् -ि शेषतोऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह इसी प्रकार अग्नि मधु है । वाणी में अग्निको विशेषरूप से स्थिति है ॥ ३ ॥

ना सर्वाणि अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो मयः पुरुषो

पृष्ठ 594

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५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ ४ ॥

यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं । इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-प्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' [ इस

वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्वं है ॥ ४ ॥

तथा वायुः । अध्यात्मं प्राणः । भूतानां शरीरारम्भकत्वे-नोपकारान्मधुत्वम् । तदन्तर्गतानां

तेजोमयादीनां करणत्वेनोपकारा-न्मधुत्वम् । तथा चोक्तम् “ तस्यै ।

वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूप-मयमग्निः ” ( १।५।११ ) इति ॥ ४ ॥ ।

अयमादित्यः सर्वेषां इसी प्रकार वायु मधु है । अध्यात्ममधु प्राण है । प्राणियोंके उनका उपकारक होनेके कारण यह . मधु तेजोमयादि हैं, उनका मधुत्व उसके करणरूपसे उपकारक होनेके कारण है । ऐसा ही कहा भी है – “ उस वाणीका पृथिवी शरीर है और यह अग्नि तेजोरूप है ” ॥ ४ ॥

भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नादित्येतेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ ५ ॥

यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मधु हैं । यह जो इस आदित्यमें तेजोमय आदित्यके अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय अमृतमय पुरुष है और जो यह पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह

पृष्ठ 595

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[ अध्याय २ = पुरुषोऽयमेव म् ॥ ४ ॥

इस वायु मधु जो यह अध्यात्म-यह आत्मा है ' [ इस सर्व है ॥ ४ ॥

वायु मधु है । है । प्राणियों के के कारण यह के अन्तर्गत जो का मधुत्व उसके रक होनेके कारण भी है - " उस शरीर है और यह ' ॥४ ॥

वस्यादित्यस्य ये तेजोमयो-बस्तेजोमयो-दममृतमिदं FI इस आदित्यके है और जो यह है जो यह ब्राह्मण ५ ] १८७ आत्मा है ' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ५ ॥

तथा आदित्यो मधु । इसी

इसी प्र प्रकार आदित्य मधु है ।

षोऽध्यात्मम् ॥ ५ ॥ चाक्षुष पुरुष अध्यात्ममधु है ॥ ५ ॥

BFF इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशाँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयो-S मृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म श्रौत्रः प्रातिश्रुत्क-स्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदम-क मृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥ ६ ॥

I e I: PFIP ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं । यह जो इन दिशाओं में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ‘ यह आत्मा है ’ [ इस वाक्यसे ब्रह्म है, यह सर्वं है ॥ ६ ॥

तथा दिशो मधु । दिशां यद्यपि श्रोत्रमध्यात्मम्, शब्दप्रति-श्रवणवेलायां तु विशेषतः संनि कहा गया है ] । यह अमृत है, यह इसी प्रकार दिशाएँ मधु हैं । यद्यपि श्रोत्र दिशाओंका अध्यात्म परिणाम है तो भी शब्दश्रवणके समय श्रौत्रपुरुष विशेषतः श्रोत्रोंके समीप रहता है, इसलिये वह हितो भवतीत्यध्यात्मं प्रातिश्रुत्कः - अध्यात्म प्रातिश्रुत्क है । जो प्रति--श्रुत्कमें अर्थात् प्रत्येक श्रवणवेलामें प्रतिश्रुत्कायां प्रतिश्रवणवेलायां रहता है, उसे प्रातिश्रुत्क कहते भवः प्रातिकः ॥ ६ ॥ हैं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 596

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ LALALAL अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मि श्चन्द्रे तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृत-मयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ ७ ॥

यह चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमा मधु हैं । यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' [ इस वाक्यसे बतलाया गया गया है है । ] । यह अमृत है है, यह ब्रह्म है, यह सर्व हे ॥ ७ ॥, य

तथा चन्द्रः । श्रध्यात्मं इसी प्रकार चन्द्रमा मधु है ।

मानसः ॥ ७ ॥ यहाँ अध्यात्म मानस पुरुष है ॥ ७ ॥

इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं सर्वम् ॥ ८ ॥ ब्रह्मेदँ

यह विद्युत् समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत मधु हैं । यह जो इस विद्युत्में तेजोमय इस विद्युत्के यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय अमृतमय पुरुष है और जो ' यह आत्मा है ' [ इस वाक्यसे पुरुष है, यही वह है जो कि ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ८ ॥ से बतलाया गया है ] यह अमृत है, यह

तथा विद्युत् । त्वत्क्तेजसि भव-इसी प्रकार विद्युत् मधु है । स्तैजसोऽध्यात्मम् ॥ ८ त्वचाके तेजमें रहनेवाला ते तैजस ॥ पुरुष अध्यात्म है ॥ ८ ॥

पृष्ठ 597

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[ अध्याय २ चन्द्रस्य न्द्रे तेजोमयो-जोमयोऽमृत-मिदं ब्रह्मेदँ भूत इस चन्द्रमा है और जो यह वह है जो कि ' यह मृ • है, यह

चन्द्रमा मधु है ।

नस पुरुष है ॥ ७ ॥

द्युतः सर्वाणि योऽमृतमयः योऽमृतमयः दं ब्रह्मेदँ नत इस विद्युत्के रुष है और जो वह है जो कि अमृत है, यह विद्युत् मधु है । हनेवाला तैजस ८ ॥ ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८ ९ अय स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तन-यित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् स्तनयि-नौ तेजोमयोऽस्मृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म ँ शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेत्र स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ ६ ॥

यह मेघ समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं । यह जो इस मेघमैं तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म शब्द एवं स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि " ' यह आत्मा है ' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ॥ तथा स्तनयित्नुः शब्दे भवः इसी प्रकार मेघ मधु है । शब्द-में रहनेवालेको शाब्द कहते हैं; शाब्दोऽध्यात्मं यद्यपि, तथापि वह यद्यपि अध्यात्म है, तथापि स्वरे विशेषतो भवतीति सौवरो- विशेषरूपसे स्वरमें रहता है, इस-लिये सौवर ( स्वरसम्बन्धी ) पुरुष ऽध्यात्मम् ॥ ९ ॥ अध्यात्म है ॥ ९ ॥

118311 अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म ँ हृद्याकाश-स्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मे-दममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥ १० ॥

यह आकाश समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं । यह जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ‘ यह आत्मा है ' [ इस वाक्यसे वतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह स है ॥ १० ॥

पृष्ठ 598

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५ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ तथा आकाशः । अध्यात्मं हृद्याकाशः ॥ १० ॥

श्राकाशान्ताः पृथिव्यादयो भूतगणा देवतागणाश्च कार्यकरण-सङ्घातात्मान उपकुर्वन्तो मधु भवन्ति प्रति शरीरिणमित्युक्तम् । येन ते प्रयुक्ताः शरीरिभिः सम्ब-च्यमाना मधुत्वेनोपकुर्वन्ति तद् चक्तव्यमितीदमारम्यते—

इसी प्रकार आकाश मघु है ।

अध्यात्मपुरुष हृदयाकाश है ॥ १० ॥

पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त भूतगण और न्द्रियसंघातरूप देवगण उपकार करने ण प्रत्येक देहधारीके लिये मध होते हैं ऐसा कहा गया । अब जिसके द्वारा प्रेरित होते हुए वे देहधारियों-से सम्बद्ध होकर मधुरूपसे उनका उपकार करते हैं, उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है-अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मतेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽस्मृतमयः पुरुषो-ऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ११ ॥

यह धर्म समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके हैं । इस घर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-घर्मंसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है ' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] सर्वं है ॥ ११ ॥

श्रयं धर्मः - ' अयम् ' इत्यप्रत्य-क्षोऽपि धर्मः कार्येण तत्प्रयुक्तेन प्रत्यक्षेण व्यपदिश्यते - अयं धर्म है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा । यह अमृत है,, यह ब्रह्म है, यह यह धर्मं मधु है । ‘ अयम् ' ( यह ) इस पदका प्रयोग प्रत्यक्ष वस्तुके लिये होता है, यद्यपि धर्मं प्रत्यक्ष नहीं है, तो भी उससे होनेवाले प्रत्यक्ष कार्यके कारण ' अयं धर्मः ' इस प्रकार प्रत्यक्षवत् व्यव-

पृष्ठ 599

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[ अध्याय २

- आकाश मधु है ।

दयाकाश है ॥ १० ॥

कर आकाशपर्यन्त देहेन्द्रियसंघातरूप F के लिये मधु होते या । अब जिसके हुए वे देहधारियों-- मधुरूपसे उनका हैं, उसका वर्णन लिये यह आरम्भ नर्मस्य सर्वाणि नयोऽमृतमयः तमयः पुरुषो-सर्वम् ॥ ११ ॥

इस धर्मके मधु जो यह अध्यात्म-कि ' यह आत्मा यह ब्रह्म है, यह है । ' अयम् ' ( यह ) प्रत्यक्ष वस्तुके नद्यपि धर्म प्रत्यक्ष - उससे होनेवाले गरण ' अयं धर्मः ' त्यक्षवत् व्यव-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ ९ १ इति प्रत्यक्षवत् । धर्मश्च व्या- । ख्यातः श्रुतिस्मृतिलक्षणः; क्षत्रा दीनामपि नियन्ता, जगतो वैचि त्र्यकृत् पृथिव्यादीनां परिणाम हेतुत्वात्, प्राणिभिरनुष्ठीयमान रूपश्च । तेन च ' अयं धर्मः ' इति प्रत्यक्षेण व्यपदेशः । सत्यधर्मयोश्चामेदेन निर्देशः कृतः शास्त्राचारलक्षणयोः; इह तु भेदेन व्यपदेश एकत्वे सत्यपि, दृष्टादृष्टभेदरूपेण कार्यारम्भकत्वात् । यस्त्वदृष्टो-पूर्वाख्यो धर्मः स सामान्यविशे-वात्मना अष्टेन रूपेण कार्य-मारभते, सामान्य रूपेण पृथिव्या-दीनां प्रयोक्ता भवति, विशेष-रूपेण चाध्यात्म कार्यकरणसङ्घा-तस्य । तत्र पृथिव्यादीनां प्रयो-करि यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजो -मयः तथाभ्यात्मं कार्यकरण-सङ्घातकर्तरि । धर्मे भवो धार्मः | ११ हार किया जाता है | श्रुति - स्मृतिरूप धर्मकी व्याख्या तो की ही जा चुकी है, वह क्षत्रियादिका नियन्ता है, पृथिवी आदिके परिणामका हेतु होनेसे जगत् की विचित्रता करनेवाला है और प्राणियोंद्वारा पालन किया जाना ही इसका स्वरूप है । इस कारण भी ' यह धर्मं ' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे उसका उल्लेख किया गया है । शास्त्र और आचाररूप सत्य और धर्मका अभेदरूपसे निर्देश किया गया है; किंतु एकत्व होनेपर भी यहाँ उसका भेदरूपसे व्यवहार किया गया है, क्योंकि दृष्ट और अदृष्टरूपसे वह कायँका आरम्भक है । उनमें जो अपूर्वसंज्ञक अदृष्ट धर्म है, वह अपने सामान्य और विशेषात्मक अदृष्ट-रूपसे कार्यका आरम्भ करता है; वह सामान्यरूपसे पृथिवी आदिका प्रेरक होता है और विशेषरूपसे अध्यात्म देहेन्द्रियसंघातका । उनमेंसे पृथिवी आदिके प्रेरकके लिये ‘ यस्माय-मस्मिन् धर्मे तेजोमयः'यह वाक्य है और ' अध्यात्मम् ' ' देहेन्द्रियसंघातके कर्ता के लिये है । जो में रहता है, उसे ' धार्मं ’ | कहते हैं ॥ ११ ॥

पृष्ठ 600

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५ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ इद सत्य सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म ँ सात्यस्तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मद सर्वम् ॥ १२ ॥

यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु-हैं । यह जो इस सत्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा हे ' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह

सर्व है । ॥ १२ ॥

तथा इष्टेनानुष्ठीयमानेन आ-चाररूपेण सत्याख्यो भवति स एव धर्मः 1 । सोऽपि द्विप्रकार एव सामान्य विशेषात्मरूपेण । सामा-न्यरूपः पृथिव्यादिसमवेतः, विशेषरूपः कार्यकरणसङ्घातसम-वेतः । तत्र पृथिव्यादिसमवेते वर्तमानक्रियारूपे सत्ये, तथा घ्यात्मं कार्यकरणसङ्घातसमवेते सत्ये भवः सात्यः - " सत्येन वायुरावाति " ( महाना ० २२।१ ) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १२ ॥ 15

धर्मसत्याभ्यां प्रयुक्तोऽयं का-र्यकरणसङ्घातविशेषः, स येन जातिविशेषेण संयुक्तो भवति, स इसी प्रकार वही धर्म दृष्ट-अनुष्ठीयमान यानी आचाररूपसे सत्य संज्ञावाला होता है । वह भी सामान्य और विशेषरूपसे दो प्रकारका ही है । सामान्यरूप पृथिवी आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला हे और विशेषरूप देहेन्द्रियसंघातसे सम्बद्ध है । तहाँ पृथिवी आदिसे सम्बद्ध वर्तमान क्रियारूप सत्यमें तथा से सम्बद्ध अध्यात्म यानी देहेन्द्रियसंघात-सत्यमें जो होनेवाला है, उसे सात्य कहते हैं; यह बात “ सत्यसे वायु चलता है " इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है ॥ १२ ॥

यह देहेन्द्रियसंघातविशेष धर्म और सत्यद्वारा प्रेरित है, यह जिस | जातिविशेषसे संयुक्त होता है, वह