बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 601–610
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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[ अध्याय२ ध्वस्य सत्यस्य सत्ये तेजोमयो-त्यस्तेजोमयो-मृत मि भूत इस सत्यके मधु-और जो यह अध्यात्म जो कि ' यह आत्मा है, यह ब्रह्म है, यह र वही धर्म दृष्ट-नी आचाररूपसे होता है । वह भी विशेषरूपसे दो है । सामान्य रूप सम्बन्ध रखनेवाला - देहेन्द्रियसंघात से हाँ पृथिवी आदि क्रियारूप सत्यमें नी देहेन्द्रियसंघात -जो होनेवाला है, हते हैं; यह बात लता है " इस अन्य ती ॥ १२ ॥
यसंघातविशेष धर्म रित है, यह जिस युक्त होता है, वह ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ ९ ३ जातिविशेषा मानुषादिः । तत्र । जातिविशेष मनुष्य आदि है । तहाँ मानुषादिजातिविशिष्टा एव सर्वे सम्पूर्ण जीवसमुदाय मनुष्यादि प्राणिनिकायाः परस्परोपकार्योप- जातिविशिष्ट होकर ही परस्पर उप-कारकभावेन वर्तमाना दृश्यन्ते । कार्यउपकारकभावसे विद्यमान अतः- दिखायी देते हैं । अतः -इदं मानुषः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयो-ऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद ँ सर्वम् ॥ १३ ॥
यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत ‘ इस मनुष्य-जातिके मधु हैं । यह जो इस मनुष्यजाति में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' [ इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १३ ॥
मानुषादिजातिरपि सर्वेषां मनुष्यादि जाति भी समस्त भूतानां मधु । तत्र मानुषादि भूतोंका मधु है । वह मनुष्यजाति जातिरपि बाह्या आध्यात्मिकी भी बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे
चेत्युभयथा निर्देशभाग्भवति । १३ । दो तरह के निर्देशवाली है ॥ १३ ॥
यस्तु कार्यकरणसङ्घातो मानु- । जो भी मनुष्यादि जातिविशिष्ट षादिजातिविशिष्टः सः — देहेन्द्रियसंघात है वह— अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः वृ ० उ ० ३८–
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५ ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदमस्मृतमिदं ब्रह्मेद ँ १ सर्वम् ॥ १४ ॥
यह आत्मा ( देह ) समस्त भूतोंका मघु है तथा समस्त भूत इस आत्मा-के मनु हैं । यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि ' यह आत्मा है ' [ इस. वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है श्रयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु । नन्वयं शारीरशब्देन निर्दिष्टः पृथिवीपर्याय एव । न; पार्थिवांशस्यैव तत्र ग्रह-णात् । इह तु सर्वात्मा प्रत्यस्त-मिताभ्यात्माधिभूताधिदैवादिसव-विशेषः सर्वभूत देवतागणविशिष्टः कार्यकरणसङ्घातः सः ‘ अयमात्मा ' इत्युच्यते । तस्मिन्नस्मिनात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽमृर्त -रसः सर्वात्मको निर्दिश्यते । एकदेशेन तु पृथिव्यादिषु निर्दिष्टः, अत्राध्यात्मविशेषा-भावात् स न निर्दिश्यते । १. अतः इसका पुनः उल्लेख करने से , यह ब्रह्म है, यह सर्वं है ॥ १४ ॥
यह आत्मा ( देह ) समस्त भूतका मधु है । शङ्का - कितु यह तो ' शारीर ’ शब्दसे बतलाया हुआ पृथिवीका पर्यायही है । ' समाधान - — नहीं, क्योंकि वहाँ तो केवल पार्थिव अंशका ही ग्रहण किया गया है; किंतु यहाँ जो सर्वात्मा है, जिसमें अध्यात्म, अधि-भूत और अघिदेवादि सब प्रकारके विशेषका अभाव है, जो समस्त भूत और देवगणसे विशिष्ट है तथा भूत और इन्द्रियोंका संघात है, वही यहाँ ' यह आत्मा ' ऐसा कहा गया है । उस इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष सर्वात्मक अमूर्तरस ही बताया गया है । पृथिवी आदि-में तो अध्यात्मपुरुषका एकदेश-रूपसे निर्देश किया है, किंतु यहाँ कोई अध्यात्मविशेष नो कारण उसका निर्देश नहीं पुनरुक्ति दोष आता है ।
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[ अध्याय २ -: पुरुषोऽयमेव र्वम् ॥ १४ ॥
स्त भूत इस आत्मा-पुरुष है और जो यह ' यह आत्मा है ' [ इस. सर्वं है ॥ १४ ॥
T ( देह ) समस्त न्तु यह तो ' शारीर ' ना हुआ पृथिवीका - नहीं, क्योंकि वहाँ व अंशका ही ग्रहण किंतु यहाँ जो समें अध्यात्म, अधि-देवादि सब प्रकार के वहैं, जो समस्त विशिष्ट है तथा का संघात है, वही ' ऐसा कहा गया आत्मामें तेजोमय सर्वात्मक अमूर्तरस है । पृथिवी आदि-पुरुषा एकदेश-या है, किंतु यहाँ नविशेष न होनेके निर्देश नहीं है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ ९ ५
यस्तु परिशिष्टो विज्ञानमयः - ।
यदर्थोऽयं देहलिङ्गसङ्गत आत्मा --सः ' यश्चायमात्मा ' इत्युच्यते । १४ ॥
2 किया गया । इससे भिन्न जो विज्ञानमय पुरुष रह जाता है, जिसके लिये कि यह देहेन्द्रियसंघात-रूप आत्मा है, वही ' जो यह आत्मा है ' ऐसा कहकर बतलाया गया है ॥ १४ ॥
श्रात्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपरण स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूताना राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः । १५ । वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एवं समस्त भूतोंका राजा है । इस विषय में दृष्टान्त - जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस आत्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त प्राण और ये सभी आत्मा समर्पित हैं ॥ १५ ॥
यस्मिन्नात्मनि परिशिष्टो विज्ञा- जिसका पहले के पर्यायोंमें उप-देश नहीं हुआ, उस अवशिष्ट विज्ञान-नमयोऽन्त्ये पर्याये प्रवेशितः, मयका अन्तिम पर्यायमें जिस आत्मामें प्रवेश कराया गया है, सोऽयमात्मा । तस्मिन्न विद्याकृत- वह यहाँ ' यह आत्मा ' इस प्रकार कहा गया है । अविद्याकृत देहेन्द्रिय-कार्यकरणसङ्घातोपाधिविशिष्टे ब्रह्म- संघातरूप उपाधिसे युक्त जीवका ब्रह्मविद्याके द्वारा उस परमार्थ विद्यया परमार्थात्मनि प्रवेशिते, आत्मा में प्रवेश कराये जानेपर वह इस प्रकार कहा हुआ आत्मा अर्थात् स एवमुक्तोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्रः आत्मभावको प्राप्त हुआ विद्वान् अन्तर - बाह्यशून्य, पूर्ण और प्रज्ञान-प्रज्ञानघनभूतः सर्वेषां भूतानाम- | घनभूत है; यह समस्त भूतोंका आत्मा
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५ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ यमात्मा सर्वैरुपास्यः सर्वेषां । भूतानामधिपतिः सर्वभूतानां स्वतन्त्रो न कुमारामात्यवत्, किं तर्हि १ सर्वेषां भूतानां राजा । राजस्व विशेषणमधिपतिरिति; भवति कश्चिद्राजोचितवृत्ति-माश्रित्य राजा, न त्वधिपतिः, अतो विशिनष्टथधिपतिरिति । एवं सर्वभूतात्मा विद्वान् ब्रह्म -विन्मुक्तो भवति । यदुक्तम् ' ब्रह्मविद्यया सर्व भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत् ' ( १ । ४।९ ) इतीदं तद् व्याख्यातम् । एवमात्मानमेव सर्वात्मत्वेन श्रा चार्यागमाभ्यां श्रुत्वा, मत्वा तर्कती विज्ञाय साक्षादेवं यथा मधुब्राह्मणे दर्शितं तथा, तस्मा-दुब्रह्मविज्ञानादेवंलक्षणात्, पूर्वमपि ब्रह्मैव सदविद्यया अब्रह्मासीत्, सर्वमेव च सदसर्वमासीत्, वां स्वविद्यामस्माद्विज्ञानात्तिरस्कृत्य | है, सबके द्वारा उप भूतोंका अधिपति है और समस्त भूतोंमें स्वतन्त्र है, सो भी कुमार या मन्त्री के समान नहीं, तो किस प्रकार? समस्त भूतोंका राजा है । ' अधिपति ' यह राजत्वका विशेषण है; कोई पुरुष राजोचितवृत्तिका आश्रय लेकर राजा तो हो जाता है, किंतु अधिपति नहीं होता ' इस -लिये उसका ' अधिपति ' यह विशे-षण देते हैं । ऐसा सर्वभूतात्मा ब्रह्म-वेत्ता विद्वान् मुक्त हो जाता है । 1 [ श्रुतिमें ] पहले जो यह कहा है कि ' ब्रह्मविद्यासे हम सर्वरूप हो जायँगे - ऐसा मनुष्य मानते हैं, सो उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्वरूप हो गया ' उसीकी यह व्याख्या की गयी है । इस प्रकार गुरु और शास्त्रसे आत्माको ही सर्वात्मभावसे सुनकर, तर्कद्वारा मनन कर तथा जिस प्रकार मधुब्राह्मण में दिखाया गया है, उस प्रकार उक्त लक्षणवाले उस ब्रह्मविज्ञानसे ही साक्षात् जान-कर, जो पहले भी ब्रह्म होते हुए ही अविद्यावश अब्रह्म बना हुआ था, एवं सर्वरूप होते हुए ही असर्व था, अब इस ज्ञानके द्वारा उस अविद्या-
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[ अध्याय २ उपास्य है, सब पति है और समस्त है, सो भी कुमार मान नहीं, तो किस भूतोंका राजा है । राजत्वका विशेषण त्र राजोचितवृत्तिका राजा तो हो जाता ति नहीं होता ' इस-. अधिपति ' यह विशे-ना सर्वभूतात्मा ब्रह्म-युक्त हो जाता है । | पहले जो यह कहा से हम सर्वरूप हो नुष्य मानते हैं, सो - जाना जिससे वह - उसीकी यह व्याख्या इस प्रकार गुरु और को ही सर्वात्मभावसे रा मनन कर तथा ब्राह्मणमें दिखाया कार उक्त लक्षणवाले स ही साक्षात् जान-ब्रह्म होते हुए ही ह्म बना हुआ था, ते हुए ही अस था, द्वारा उस अविद्या-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्य ५ ९ ७ ब्रह्मविद्ब्रह्मैव सन् ब्रह्मा भवत्, सर्वः स सर्वमभवत् । परिसमाप्तः शास्त्रार्थों यदर्थः प्रस्तुतः । तस्मिन्नेतस्मिन् सर्वा-त्मभूते ब्रह्मविदि सर्वात्मनि सर्व जगत् समर्पितमित्येतस्मिन्नथ दृष्टान्त उपादीयते - तद्यथा । रथनाभौ च रथेनेमौ चाराः सर्वे । समर्पिता इति प्रसिद्धोऽर्थः, एवमेवास्मिन्नात्मनि परमात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादि -स्तम्ब पर्यन्तानि, सर्वे देवा अग्न्यादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वे प्राणा वागादयः, सर्व श्रात्मानो जलचन्द्रवत् प्रति-शरीरानुप्रवेशिनोऽविद्याकल्पिताः, सर्वं जगदस्मिन् समर्पितम् । यदुक्तं ब्रह्मविद्वामदेवः प्रति-ब्रह्मविदः सार्वा - पेदे - ' अहं मनुरभवं । त्म्योपपादनम् सूर्यश्च ' ( १ । ४ । १० ) इति, स एष सर्वात्मभावो व्याख्यातः । स एष विद्वान् ब्रह्म-वित् सर्वोपाधिः सर्वात्मा सर्वो । | को नष्ट कर वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म होते हुए ही ब्रह्म और सर्वरूप हुए ही सर्व हो गया है । • जिसके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया गया था वह शाखका तात्पर्य समाप्त हो गया । उस इस सबके आत्मभूत सर्वात्म ब्रह्मवेत्ता में सारा जगत् समर्पित है, इस अर्थमें यह दृष्टान्त दिया जाता है - जिस प्रकार यह बात प्रसिद्ध है कि रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे सम-पित हैं, उसी प्रकार इस परमात्म-भूत ब्रह्मवेत्ता आत्मामें ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यंन्त समस्त भूत, अग्नि आदि समस्त देव, भूर्लोक आदि समस्त लोक, वाक् आदि समस्त प्राण तथा जलमें प्रतिविम्बित चन्द्रके समान प्रत्येक शरीरमें प्रवेश करनेवाले ये अविद्याकल्पित समस्त आत्मा समर्पित हैं । अभिप्राय यह है कि सारा जगत् इसीमें समर्पित है । पहले जो श्रुति ने कहा था कि ब्रह्मवेत्ता वामदेवने जाना ' मैं मनु हुआ और सूर्य भी ' वहाँ कहे हुए इस सर्वात्मभावको यह व्याख्या हुई है । वह यह विद्वान् ब्रह्मवेत्ता सर्वोपाधि, सर्वात्मा और सर्वरूप हो जाता है ।
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५ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ भवति । निरुपाधिर्निरुपाख्यः । अनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञान-घनोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयोऽचलो नेति नेत्यस्थूलोऽनणुरित्येवं-विशेषणो भवति । तमेत मथमजानन्तस्ताकिंकाः केचित् पण्डितम्मन्याश्चागमविदः शास्त्रार्थं विरुद्धं मन्यमाना विक-ल्पयन्तो मोहमगाधमुपयान्ति । तमेतमर्थमेतौ मन्त्रावनुवदतः -" अनेजदेकं मनसो जवीय: " ( ई ० उ ० ४ ) “ तदेजति तन्नै-जति " ( ई ० उ ० ५ ) इति । तथा च तैत्तिरीयके – “ यस्मात्परं नापरमस्ति किश्चित् " ( तै ० आर ० १० । १० । २० ) " एतत्साम गायन्नास्ते " ( तै ० उ ० ३ । १० । ५ ) “ अहमन्न महमन्नमहमन्नम् " ( तै ० उ ० ३ । १० । ६ ) इत्यादि । तथा च च्छान्दोग्ये " जक्षत् क्रीडन्नम-माणः " ( ८ । १२ । ३ ) " स
यदि पितृलोककामः " ( ८ । २ ।
१ ) " सर्वगन्धः सर्वरसः ” ( ३ ॥
१. वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूपसे भी अधिक वेगवान् है । तथा उपाधिशून्य, संज्ञाशून्य, अन्तर-बाह्यशून्य, पूण, प्रज्ञानघन,, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, अचल, नेति-नेति तथा अस्थूल और असूक्ष्म इत्यादि विशेषणोंवाला हो जाता है । किंतु इस अर्थको न जाननेवाले कुछ तार्किक और अपनेको पण्ि माननेवाले लोग शास्त्रके तात्पर्यको इससे विपरीत मानकर विविध प्रकार की कल्पना करते हुए अगाध मोहको प्राप्त होते हैं । उस इस अर्थंका " अनेजदेकं मनसो जवीर्यः ” तथा " तदेजति तन्नैजंति " ये दो मन्त्र अनुवाद करते हैं । तथा तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी कहा है- " जिससे पर और अपर कुछ भी नहीं है ", तथा " ब्रह्मवेत्ता यह सामगान करता रहता है- " " मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, में अन्न हूँ " इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् में कहा है- " हँसता, खेलता और रमण करता हुआ [ अपने शरीरकी सुधि न रखते हुए विचरता है ] ", " वह यदि पितृलोक-की कामना करनेवाला होता है [ तो उसके संकल्पसे ही पितर वहाँ उपस्थित हो जाते हैं ] ", " सर्व-गन्ध, सर्वरस " इत्यादि । आथर्वण विचलित न होनेवाला एक और मनसे २. वह चलता है और नहीं भी चलता ।
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[ अध्याय २ क्य, संज्ञाशून्य, अन्तर-, प्रज्ञानघन, अजन्मा, अभय, अचल, नेति -अस्थूल और असूक्ष्म वाला हो जाता है । अर्थको न जाननेवाले और अपनेको पण्डित लोग शास्त्र के तात्पर्यको मानकर विविध प्रकार रते हुए अगाध मोहको । उस इस अर्थका नसो जवीर्यः ” तथा नैजेति " ये दो मन्त्र - हैं । तथा तैत्तिरीय-कहा है- " जिससे पर छ भी नहीं है ", तथा ह सामगान करता ' मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ — ” इसी प्रकार में कहा है- " हँसता, रमण करता हुआ की सुधि न रखते हुए , " वह यदि पितृलोक-करनेवाला होता है कल्पसे ही पितर वहां जाते हैं ] ”, “ सर्व-- इत्यादि । आथर्वण निवाला एक और मनसे ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ ९९ १४ । २ ) इत्यादि । श्रथर्वणे । च " सर्वज्ञः सर्ववित् " ( मु ० उ ० १ । १ । ९ ) “ दूरात् सुदुरे तदि हान्तिके च " ( सु ० उ ० ३ । ११७ ) । कठवल्लीष्वपि " अणो-रणीयान् महतो महीयान् ” ( १ । २ । २० ) “ कस्तं मदामदं देवम् ” ( १ । २ । २१ ) “ तद्धा वतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् " ( ई ० उ ० ४ ) इति च । तथा गीतासु “ अहं क्रतुरहं यज्ञः ” ( ९ ।१६ ) " पिताहमस्य जगतः " ( ९ ।१७ ) " नादत्ते कस्यचित् पापम् " ( ५ । १५ ) “ समं सर्वेषु भूतेषु ” ( १३ । २७ ) " अविभक्तं विभ-क्षु " ( १८ । २० ० ) " ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ' ( १३ | १६ ) इत्येवमाद्यागमार्थ ' विरुद्धमिव प्रतिभान्तं मन्यमानाः स्वचित्त-सामर्थ्यादर्थनिर्णयाय विकल्प-यन्तः, अस्त्यात्मा नास्त्यात्मा कर्ताकर्ता मुक्तो बद्धः क्षणिको विज्ञानमात्रं शून्यं चेत्येवं विक-ल्पयन्तो न पारमधिगच्छन्त्य-( मुण्डक ) उपनिषदुमें कहा है- " वह सर्वज्ञ, सर्ववित् है ", " वह दूरसे भी दूर और यहाँ समीपमें भी है । " कठवल्लियोंमें भी कहा है- “ वह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा ”, “ उस हर्षसहित और हर्षरहित देवको । " [ ईशोप-निषद्में कहा है - ] वह स्वयं स्थिर रहकर ही अन्य सब दौड़नेवालोंसे आगे पहुँचा रहता है । " तथा गीता में भी कहा है- " मैं ऋतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ ", " मैं इस जगत्का पिता हूँ ", " वह किसी के पाप [ और पुण्य ] को ग्रहण नहीं करता ” “ जो समस्त भूतोंमें परमेश्वरको समभावसे स्थित ( देखता है ) ”, “ पृथक् - पृथक् भूतोंमें अखण्ड रूपसे स्थित " " " वह सबका संहार करनेवाला तथा सबको उत्पन्न करनेवाला है - ऐसा जानना चाहिये ” इत्यादि प्रकारके शास्त्राभिप्रायको विरुद्ध - सा भासनेवाला मानकर अपने चित्तके सामर्थ्य से अर्थ - निर्णय करने-के लिये तरह - तरहकी कल्पना करते हुए तथा ' आत्मा है, आत्मा नहीं है, वह कर्ता है, वह अकर्ता है, मुक्त ' हे, बद्ध है, क्षणिक विज्ञानमात्र है, शून्य है ' इत्यादि विकल्प करते हुए अविद्याका पार नहीं पाते; क्योंकि
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६०० • विद्यायाः, विरुद्धधर्मदर्शित्वात् सर्वत्र । तस्माचत्र य एव श्रुत्याचार्य-दर्शितमार्गानुसारिणः, त एवा-विद्यायाः पारमधिगच्छन्ति । त एव चास्मान्मोहसमुद्रादगाधा-२ । उन्हें सर्वत्र विरुद्ध धर्म ही दिखायी देता है । अतः उनमें जो श्रुति और | आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनु-सरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्या-का पार पाते हैं और वे ही इस अंगाघ मोहसमुद्रसे तर जायेंगे, दूसरे लोग, जो अपने बुद्धिकौशल-दुत्तरिष्यन्ति, नेतरे स्वबुद्धिकौश- का अनुसरण करनेवाले हैं, उसे नहीं लानुसारिणः ॥ १५ ॥ तर सकेंगे ॥ १५ ॥
1808 दध्यङ्ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्या के उपदेशकी परिसमाप्ता ब्रह्मविद्यामृतत्व-ब्रह्मविद्यास्तुति - साधनाभूता यां लिङ्गानामुपन्यासः मैत्रेयी पृष्टवती भर्तारम् ' यदेव भगवानमृतत्व-. साधनं वेद तदेव मे ब्रूहि ' इति । एतस्या ब्रह्मविद्याया: स्तुत्यर्थेय-माख्यायिका आनीता । तस्या आख्यायिकायाःसङ्क्षेपतोऽर्थ-प्रकाशनार्थावेतौ मन्त्रौ भवतः । एवं हि मन्त्रब्राह्मणाभ्यां स्तुतत्वात् अमृतत्वसर्वप्राप्तिसाधनत्वं ब्रह्म-विद्यायाः प्रकटीकृतं राजमार्ग-प्रख्यायिका जिसके विषय में मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि ' श्रीमान् जो भी ' अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मेरे प्रति कहिये, वह अमृतत्वकी | साधनभूता ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी । इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह ( आगे कही जानेवाली ) प्रस्तुत की जाती है । उस आख्यायिकाके तात्पर्यको संक्षेप-1. से प्रकाशित करनेके लिये ये दो मन्त्र हैं । इसी प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा स्तुत होनेके कारण | ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्वप्राप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है तथा | उसे राजमार्गको प्राप्त कराया गया
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[ अध्याय२ विरुद्ध धर्म ही दिखायी नमें जो श्रुति और चाये हुए मार्गका अनु-ले हैं, वे ही अविद्या-हैं और वे ही इस समुद्रसे तर जायेंगे, अपने बुद्धिकौशल-करनेवाले हैं, उसे नहीं १५ ॥ मधुविद्या के में मैत्रेयी ने अपने कि ' श्रीमान् जो भी जानते हों, वही ये, ' वह अमृतत्वकी विद्या तो समाप्त हो ब्रह्मविद्याकी स्तुति गे कही जानेवाली ) स्तुत की जाती है । काके तात्पर्यको संक्षेप-रनेके लिये ये दो मन्त्र र मन्त्र और ब्राह्मण स्तुत होनेके कारण तत्व एवं सर्वप्राप्तिका किया गया है तथा प्राप्त कराया गया ब्राह्मण ५ ] मुपनीतं भवति — यथादित्य । उद्यञ्छावरं तमोऽपनयतीति तद्वत् । अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या-या इन्द्ररक्षिता सा दुष्प्राप्या देवैरपि यस्मादश्विभ्यामपि देव-भिषग्स्यामिन्द्ररक्षिता विद्या । महतायासेन प्राप्ता । ब्राह्मणस्य शिरश्छित्वा श्व्यं शिरः प्रति-सन्धाय तस्मिन्निन्द्रेणच्छिन्ने पुनः स्वशिर एवं प्रतिसन्धाय तेन ब्राह्मणस्य स्वशिरसवोक्ता-शेषा ब्रह्मविद्या श्रुता । तस्मा -ततः परतरं किञ्चित् पुरुषार्थ -साधनं न भूतं न भवि वा, कुत नात परास्तुतिरस्ति । अपि चैवं स्तूयते ब्रह्मविद्या-सर्वपुरुषार्थानां कर्म हि साधन-मिति लोके प्रसिद्धम् । तच्च कर्म का क वित्तसाध्यम्, तेनाशापि नास्त्यमृत -६०१ है । जिस प्रकार उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार [ उदय होने-वाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है ] । इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है । कि जो इन्द्रसे सुरक्षिता थी, वह देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य हो रही थी; क्योंकि वह इन्द्ररक्षिता विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनता से प्राप्त हुई थी । उन्होंने ब्राह्मणका शिर काटकर उसपर घोड़ेका शिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उनका अपना शिर जोड़कर फिर ब्राह्मणके उस अपने शिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया । अतः उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थंका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, फिर वर्तमान तो हो ही कैसे सकता है; अतः इससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है । इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है - यह लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरु-षार्थीका साधन कर्म ही है । वह कर्मं धनसाध्य है, अत: उससे तो अमृतत्वकी आशा भी नहीं हैं । यह
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६०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ स्वस्य । तदिदममृतत्वं केवल यात्मविद्यया कर्मनिरपेचया प्रा-प्यते; यस्मात् कर्मप्रकरणे वक्तु प्राप्तापि सती प्रवर्ग्यप्रकरणे, कर्म -प्रकरणादुत्तीर्य कर्मणा विरुद्ध-त्वात् केवलसंन्याससहिता अभि हिता अमृतत्वसाधनाय । तस्मा-न्नातः परं पुरुषार्थसाधनमस्ति । अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या-सर्वो हि लोको द्वन्द्वारामः “ स वै । नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते ' ( वृ ० उ ० १ । ४ । ३ ) इति श्रुतेः । याज्ञवल्क्यो लोकसाधा -रणोऽपि सन्नात्मज्ञानबलाद्भार्या -पुत्रवित्तादिसंसाररतिं परित्यज्य प्रज्ञान तृप्त आत्मरतिर्बभूव । श्रपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या -यस्माद्याज्ञवल्क्येन संसारमार्गाद् व्युत्तिष्ठतापि प्रियाय भार्यायै अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही! प्राप्त होता है; क्योंकि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप कर्मके प्रकरणमें कहनेके लिये प्राप्त होनेपर भी कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उसे कर्मप्रकरणसे निकाल -कर अमृतत्वसाधनके लिये संन्यास-के साथ वर्णन किया है । अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुषार्थका साधन नहीं है । इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है— सारा ही लोक द्वन्दोंमें रमण करने वाला है, जैसा कि " वह बिराट् पुरुष [ अकेला होनेके कारण ] रम-माण नहीं हुआ, इसीसे अकेला पुरुष रमण नहीं करता ” इस श्रुति-से सिद्ध होता है । याज्ञवल्क्य साधारण लोकके समान होते हुए भी आत्मज्ञानके बलसे स्त्री, पुत्र एवं धन आदि संसारकी आसक्तिको छोड़कर ज्ञानतृप्त हो आत्मामें प्रेम करनेवाले हो गये थे । इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है क्योंकि संसार - मार्गसे निवृत्त होते हुएं भी याज्ञवल्क्यजीने अपनी प्रेयसी भार्या-