बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 611–620
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
पृष्ठ 611
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ की अपेक्षासे रहित विद्याके द्वारा ही प्राप्त कि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप में कहनेके लिये प्राप्त से विरुद्ध होनेके प्रकरणसे निकाल -धनके लिये संन्यास-न किया है । अतः कोई और पुरुषार्थंका चा ब्रह्मविद्याकी इस तुति की गयी है-- द्वन्दोंमें रमण करने कि " वह विराट् होनेके कारण ] रम-आ, इसीसे अकेला हीं करता " इस श्रुति-ता है । याज्ञवल्क्य कके समान होते हुए के बलसे स्त्री, पुत्र संसारकी आसक्तिको प्त हो आत्मामें प्रेम गये थे । वा ब्रह्मविद्याकी इस ति की गयी है- क्योंकि निवृत्त होते हुएं भी अपनी प्रेयसी भार्या-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३ प्रीत्यर्थमेवाभिहिता, “ प्रियं । । भाषस एह्यास्स्व ” ( २।४।४ ) इति लिङ्गात् । तत्रेयं स्तुत्यर्थाख्यायिकेत्य-बोचाम । का पुनः सा श्राख्या- । यिका १ इत्युच्यते-को इसका प्रेमके कारण हो उपदेश किया था, जैसा कि “ तू प्रिय भाषण करती है, अत: आ, बैठ जा " इस विशेष कथनरूप प्रमाणसे ज्ञात होता है । यहाँतक हमने यह बतलाया कि यह आख्यायिका [ ब्रह्मविद्याकी ] स्तुतिके लिये है । किंतु वह आख्यायिका है क्या? सो अब बतलाया जाता है— इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । तद्वां नरा सनये दस उग्र-माविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् । दध्यङ् ह यन्मध्वा-थर्वणो वामश्वस्य शीर्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥
उस इस मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि ( मन्त्र ) ने कहा - ' मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनीकुमारो! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनों का वह उग्र दंस कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङा-थर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके शिरसे वर्णन किया था ॥ १६ ॥
इदमित्यनन्तरनिर्दिष्टं व्यप-दिशति, बुद्धौ सन्निहितत्वात् । वैशब्दः स्मरणार्थः । तदित्या -ख्यायिकानिर्वृत्तं प्रकरणान्तराभि हितं परोक्षं वैशब्देन स्मारयन्निह ‘ इदम् ' यह पद पीछे बतलाये हुए विषयका समीपस्थ वस्तुकी भाँति निर्देश करता है; क्योंकि वह बुद्धिमें सन्निहित है । ' वै ' शब्द स्मरणके लिये है । ' तत् ' पदसे आख्यायिकामें | आनेवाले एवं दूसरे प्रकरणमें कहे हुए परोक्ष मधुका ' वै ' शब्दसे स्मरण कराकर यहां निर्देश करते हैं । व्यपदिशति । यत्तत् प्रवर्ग्यप्रकरणे जिस मधुको प्रवर्ग्यप्रकरणमें सूचित
पृष्ठ 612
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ६०४ सूचितम्, नाविष्कृतं मधु, । तदिदं महानन्तरं निर्दिष्टम् -' इयं पृथिवी ' ( २ । ५ । १ ) इत्यादिना । कथं तत्र प्रकरणान्ते सूचितम्-दध्यड् ह वा आम्यामाथर्वणो मधु नाम ब्राह्मणमुवाच । तदे -नयोः प्रियं धाम तदेवैनयोरेते-नोपगच्छति । स होवाचेन्द्रेण चा उक्तोऽस्म्येतच्छेदन्यस्मा अनुब्रूयास्तत एव ते शिरश्छि-न्द्यामिति । तस्माद्वै बिभेमि, यद्वै मे स शिरो न छिन्द्यात् तद्वामुपनेष्य इति । तौ होचतु-रावां त्वा तस्मात् त्रास्यावहे इति । कथं मा त्रास्येथे? इति । यदा नानुपनेष्यसे; श्रथ ते शिर-शिछत्वा अन्यत्राहृत्योपनिधा-स्यावः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्यावः; तेन नावनु-वक्ष्यसि । यदा नावनुवक्ष्यसि, किया गया है, किंतु प्रकट नहीं किया गया, उसी मधुका यहाँ पास ही ' इयं पृथिवी ' इत्यादि मन्त्रोंसे निर्देश किया गया है । उस प्रकरणान्तरमें इसकी किस प्रकार सूचना दी है? – आथर्वण दध्यङ्ने इन दोनों ( अश्विनीकुमारों ) को मधुब्राह्मण सुनाया । यह इनका प्रिय धाम है; यही आगे बतलाये जानेवाले प्रकारसे उपदेश करनेके लिये ब्राह्मण इन दोनोंके पास आचार्यरूपमें उपस्थित होता है । उस दध्यङ्ङाथर्वणने कहा, ' इन्द्र मुझसे कहा है कि यदि तुम इसे किसी अन्य प्रति कहोगे तो उसी समय मैं तुम्हारा मस्तक काट दूँगा । इसीसे मैं डरता हूँ, यदि वह मेरा मस्तक न काटे तो मैं तुम दोनोंका उपनयन करूंगा । ' उन्होंने कहा, ' हम उनसे आपकी रक्षा करेंगे । ' [ दध्यङ् ]. ' किस प्रकार मेरी रक्षा करोगे? ' [ अश्विनी-कुमार ] ' जिस समय आप हमारा उपनयन करेंगे, उस समय आपका शिर काटकर दूसरी जगह ले जाकर रख देंगे, फिर घोड़ेका शिर लाकर आपके लगा देंगे; उससे आप हमें उपदेश करेंगे । जिस समय वे आप हमें उपदेश करेंगे
पृष्ठ 613
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ , किंतु प्रकट नहीं सीमधुका यहाँ पास 7 ' इत्यादि द मन्त्रोंसे गया है । न्तरमें इसकी किस दी है? - आथर्वण नों ( अश्विनीकुमारों ) सुनाया । यह इनका नही आगे बतलाये रसे उपदेश करनेके इन दोनोंके पास उपस्थित होता है । वणने कहा, ' इन्द्रने कि यदि तुम इसे प्रति कहोगे तो उसी द्वारा मस्तक काट डरता हूँ, यदि वह काटे तो मैं तुम न करूंगा । ' उन्होंने नसे आपकी रक्षा नं ] ' किस प्रकार रोगे? ' [ अश्विनी-समय आप हमारा उस समय आपका दूसरी जगह ले - फिर घोड़ेका शिर लगा देंगे; उससे देश करेंगे । जिस हमें उपदेश करेंगे ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ अथ ते तदिन्द्रः शिरश्छेत्स्यतिः अथ ते स्वं शिर श्राहृत्य तत्ते प्रतिधास्याव इति । तथेति तौ होपनिन्ये । तौ यदोपनिन्ये, अथास्य शिरच्छि-च्वान्यत्रोपनिदधतुः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुः । तेन हाभ्यामनूवाच । स यदा श्राभ्यामनुवाचाथास्य तदिन्द्रः शिरश्चिच्छेद । अथास्य स्वं शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुरिति । । या प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं मधु तावदेव तत्राभिहितम्, न तु कक्ष्यमात्मज्ञानाख्यम् । तत्र या आख्यायिकाभिहिता सेह स्तु-त्यर्था प्रदर्श्यते । इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽनेन प्रपश्च- । नाश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः - — तदेतत् कर्म, ऋषिर्मन्त्रः, पश्यन्तुपलभमानः, ६०५ | उस समय इन्द्र आपके उस मस्तक-को काट देगा, फिर हम आपका निजी मस्तक लाकर उसे जोड़ देंगे । ' तब ' बहुत अच्छा ' ऐसा कह-कर उन्होंने उनका उपनयन किया । जिस समय उनका उपनयन किया उस समय उन्होंने उनका मस्तक काटकर अन्यत्र रख दिया तथा घोड़ेका शिर लाकर उसे इनके जोड़ दिया । उससे दध्यङ्ने उन्हें उपदेश किया । जिस समय वे उन्हें उपदेश करने लगे तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक काट दिया । फिर उनके अपने मस्तकको लाकर उसे उनके जोड़ दिया । किंतु वहाँ जितना प्रवर्ग्यका अङ्गभूत मधु है उतना ही कहा गया है, आत्मज्ञानसंज्ञक कक्ष्य मधु-का वर्णन नहीं किया गया । वहाँ जो आख्यायिका कही गयी है, उसे यहाँ स्तुतिके लिये प्रदर्शित किया जाता है । उस इस मधुका इन दध्पङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंके प्रति इस प्रकार प्रपञ्चके साथ वर्णन किया है | उस इस ऋषिने — ऋषि यहाँ मन्त्रका वाचक है— इस कर्मंको
पृष्ठ 614
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ६०६ अवोचत् उक्तवान् । कथम् १ । तद्दस इति व्यवहितेन सम्बन्धः । दंस इति कर्मणो नामधेयम् । तच्च दंसः किंविशिष्टम्? उग्रं क्रूरम् । वां युवयोः । हे नरा नराकारावश्विनौ । तच्च कर्म किन्निमित्तम् १ सनये लाभाय! लाभलुब्धो हि लोकेऽपि क्रूरं कर्माचरति, तथैवैतावुपलभ्येते यथा लोके । तदाविः प्रकाशं कृणोमि करोमि यद्रहसि भवद्भयां कृतम्, किमिव १ इत्युच्यते - तन्यतुः पर्जन्यः, न इव । नकारस्तूपरिष्टादुपचार उपमार्थीयो वेदे, न प्रतिषेधार्थः; यथाश्वं न । अश्वमिवेति यद्वत् । तन्यतुरिव वृष्टि यथा पर्जन्यो वृष्टिं प्रकाशयति स्तनयित्न्वादि-शब्दैः, तद्वदहं युवयोः क्रूरं कर्म आविष्कृणोमीति सम्बन्धः । दे कहा? ' तद्द'स ' इस प्रकार यहाँ ' तत् ' और ' दंस ' इन दूरवर्ती पदोंका अन्वय है । ' दंस ' यह उस कर्मका नाम है । वह दंस कर्म किस विशेषणसे युक्त है? उग्र-क्रूर । वास् - तुम दोनोंका । हे नरा-नराकार अश्विनीकुमारो! वह कर्म किसलिये था? सनये – लाभके लिये । क्योंकि लाभका लोभी पुरुष लोकमें भी क्रूर कर्म कर बैठता है । जिस प्रकार लोकमें होते हैं, वैसे ही ये दोनों भी देखे जाते हैं । [ मन्त्र कहता है- ] तुमने जो एकान्त में किया है, उसे मैं प्रकट किये देता हूँ । किसके समान? सो बतलाता है— ' तन्यतुः ' ' न ' अर्थात् मेघके समान । वेदमें जो नकार किसी पदके पीछे रहता है वह उपचारमात्रमें उपमाके अर्थमें होता है, निषेघ अर्थमें नहीं होता । जैसे- ' अश्वं न ' यह वाक्य अश्वके समान - इस अर्थ में है, उसी प्रकार । जैसे मेघ गर्जनादि शब्दों के सहित वृष्टिको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मैं तुम दोनोंके क्रूर कर्मको प्रकट करता हूँ- ऐसा इसका सम्बन्ध है ।
पृष्ठ 615
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ हा । किस प्रकार स ' इस प्रकार यहाँ दंस ' इन दूरवर्ती - है । ' दंस ' यह उस है । वह दंस कर्म से युक्त है? उग्र-म दोनोंका । हेनरा-नीकुमारो! वह कर्म ? सनये - लाभके क लाभका लोभी भी क्रूर कर्म कर जिस प्रकार लोकमें ही ये दोनों भी देखे कहता है- ] तुमने जो या है, उसे मैं प्रकट । किसके समान? जाता है - ' तन्यतुः ' के समान । वेदमें सी पदके पीछे रहता चारमात्रमें उपमाके , निषेध अर्थ में नहीं - ' अश्वं न ' यह वाक्य - इस अर्थ में है, उसी मेघ गर्जनादि शब्दों के प्रकाशित करता है, मैं तुम दोनोंके क्रू करता हूँ - ऐसा है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ नन्वश्विनोः स्तुत्यर्थौ कथमिमौ मन्त्रौ स्यातां निन्दावचनौ हीमौ । नैष दोषः; स्तुतिरेवैषा, न निन्दावचनौ । यस्मादीदृश -मप्यतिक्रूरं कर्म कुर्वतोर्युवयोर्न -लोम च मीयत इति । न चान्य-" त्किञ्चिद्धीयत एवेति । स्तुतावेतौ भवतः । निन्दां प्रशंसां हि लौकिकाः स्मरन्ति ६०७ शङ्का - किंतु ये दोनों मन्त्र अश्विनीकुमारोंकी स्तुतिके लिये कैसे हो सकते हैं, ये तो उनकी निन्दाको ही बतलानेवाले हैं? समाधान- यह दोष नहीं है; | यह उनकी स्तुति ही है, ये मन्त्र निन्दावाचक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा क्रूर कर्म करनेपर भी तुम दोनोंका | बाल भी बाँका नहीं होता और न तुम्हारी दूसरी ही कोई हानि हो रही है । अतः ये उनकी स्तुतिमें ही हैं! लौकिक पुरुष कहीं प्रशंसाको निन्दा मानते हैं, इसी प्रकार । तथा प्रशंसा - लोकमें प्रशंसारूपा निन्दा भी रूपा च निन्दा लोके प्रसिद्धा ॥ । दध्यङनाम श्राथर्वणः । हेत्य-नर्थको निपातः । यन्मधु कक्ष्य-मात्मज्ञानलक्षणमाथर्वणो वां युवास्यामश्वस्य शीर्ष्णा शिरसा प्र
' यत् ईम् उवाच यत् प्रोवाच मधु ।
ई मित्यनर्थको निपातः ॥ १६ ॥
प्रसिद्ध है । दध्यङ् नामके आथर्वणने — यहाँ ' ह ' निरर्थक निपात है - जिस आत्मज्ञानरूप कक्ष्य — मधुका तुम्हें घोड़ेके शिरसे ' प्र यत् ईम् उवाच ' प्रवचन किया था अर्थात् जिस मधु-का उपदेश किया था । यहाँ ‘ ईम् ’ । यह निरर्थक निपात है ॥ १६ ॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । आथर्वणायाश्विनौ दधीचे-S व्य शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्रवोचहताय-त्वाष्ट्र यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥
पृष्ठ 616
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषि ( मन्त्रद्रष्टा ) ने कहा है – हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों आथर्वण दध्यङके लिये घोड़ेका शिर लाये । उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र ( सूर्यसम्बन्धी ) मधुका उपदेश किया तथा हे द ( शत्रु हिंसक ) जो [ आत्मज्ञानसम्बन्धी ] कक्ष्य ( गोप्य ) मधु था [ वह भी तुमसे कहा ] ॥ १७ ॥
इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्व-वन्मन्त्रान्तरप्रदर्शनार्थम् । तथा-न्यो मन्त्रस्तामेव आख्यायिका-मनुसरति स्म । आथर्वणो दध्यङ् नाम, आथर्वणोऽन्यो विद्यत इत्यतो विशिनष्टि दध्यङ्नामा-थर्वणः । कार तस्मै दधीच आथर्वणाय हेऽश्विनाविति मन्त्रशो वचनम्, अश्व्यमश्वस्य स्वभूतं शिरः, ब्राह्म-णस्य शिरसिच्छिन्नेऽश्वस्य शिर-शिछच्चा ईदृशमतिक्रूरं कर्म कृत्वा अश्व्यं शिरो ब्राह्मणं प्रति ऐरयतं गमितवन्तौ युवाम् । स चाथ-र्वणो वां युवाभ्यां तन्मधु प्रबोचद् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं वक्ष्यामीति स किमर्थमेवं । जीवितसन्देह-मारुह्य प्रवोचत् १ इत्युच्यते । ऋता- । । ' इदं वै तन्मधु ' इत्यादि कथन पूर्ववत अन्य मन्त्र प्रदर्शित करनेके लिये है । अर्थात् इसी प्रकार दूसरे मन्त्रने भी उसी आख्यायिकाका अनुसरण किया । दध्यङ् नामवाला आथर्वण । आथर्वण तो दूसरा भी है इसलिये ' दध्यङ्नामक आथर्वण ' ऐसा कहकर इसे विशेषणयुक्त करते हैं हे अश्विनीकुमारो! उस दध्यङ् आथर्वण के लिये – यह मन्त्रद्रष्टा ऋषिका वचन है- तुम अश्व्य-' अश्वका स्वभूत शिर अर्थात् ब्राह्मण-का शिर काट देनेपर तुम अश्वका शिर काटकर, ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म कर उस अश्वके शिरको तुमने ब्राह्मणके पास ' ऐरयतम् ' - पहुँचाया और उस आथर्वणने तुम्हें उस मधुका उपदेश किया जिसके लिये उसने पहले यह प्रतिज्ञा की थी ' में कहूँगा । ' उसने इस प्रकार जीवनके संदेह-. में पड़कर भी उसका उपदेश क्यों किया, सो बतलाया जाताहै—
पृष्ठ 617
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय२ रोको उपदेश किया । अश्विनीकुमारो! तुम उसने सत्यपालन करते किया तथा हे द गोप्य ) मधु था [ वह तन्मधु ' इत्यादि कथन मन्त्र प्रदर्शित करनेके र्थात् इसी प्रकार दूसरे उसी आख्यायिकाका । दध्यङ् नामवाला नाथर्वण तो दूसरा भी _ध्यङ्नामक आथर्वण ' - इसे विशेषणयुक्त कुमारो! उस दध्यङ् लिये - यह मन्त्रद्रष्टा न है - तुम अश्व्य-शिर अर्थात् ब्राह्मण-देने पर तुम अश्वका - ऐसा अत्यन्त क्रूर अश्व के शिरको तुमने ' ऐरयतम् ' - पहुँचाया थर्वणने तुम्हें उस किया जिसके लिये प्रतिज्ञा की थी कार जीवन के संदेह -. उसका उपदेश क्यों तलाया जाता है-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६० ९ यन् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं सत्यं तत् परिपालयितुमिच्छन् । जीवि -तादपि हि सत्यधर्मपरिपालना गुरुतरेत्येतस्य लिङ्गमेतत् । किं तन्मधु प्रवोचत् १ इत्यु-च्यते - त्वाष्ट्रम्, त्वष्टा आदित्य-स्तस्य सम्बन्धि, यज्ञस्य शिर-छिन्नं त्वष्टाभवत् तत्प्रतिस -न्धानार्थं कर्म । तत्र प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं यद् विज्ञानं तत्त्वाष्ट्रं मधु - यज्ञस्य शिरश्छेद-नप्रतिसन्धानादिविपयं दर्शनं तत्वाष्ट्रं यन्मधु हे दस्रौ, दस्रा -विति परबलानामुपक्षपयितारौ शत्रूणां वा हिंसितारौ, अपि च न केवलं त्वाष्ट्रमेव मधु कर्म-सम्बन्धि युवाभ्यामवोचत्, अपि च कक्ष्यं गोप्यं रहस्यं परमात्म-सम्बन्धि यद् विज्ञानं मधु मधु-ब्राह्मणेनात मध्यायद्वय प्रकाशि तम्, तच्च वां युवाभ्यां प्रवोचदि-त्यनुत्रर्तते ॥ १७ ॥
' ऋतायन् ' - जो पहले प्रतिज्ञा किया हुआ सत्य था, उसका पालन करने के लिये । यह इस बातका सूचक है कि सत्यधर्मका पालन जीवन से भी बढ़कर है । उसने किस मधुका उपदेश किया? सो कहा जाता है - त्वाष्ट्र मधुका । त्वष्टा सूर्यको कहते हैं, उससे सम्बन्ध रखनेवाले मधुका । | यज्ञका शिर काटे जानेपर वह त्वष्टा हो गया, उसके प्रतिसन्धान ( जोड़ने ) के लिये प्रवर्ग्य कर्म है । वहाँ प्रवर्ग्यंकर्मका अङ्गभूत जो विज्ञान है, वही त्वाष्ट्र मधु है । यज्ञके शिरश्छेदन के प्रतिसन्धानादि-से सम्बद्ध जो दर्शन है, वही स्वाष्ट्र मधु है । हे दस्रौ! दस्र अर्थात् परपक्षकी सेनाका क्षय करनेवाले अथवा शत्रुओंके हिसको! इसके सिवा उन्होंने तुम्हें केवल कर्म-सम्बन्धी त्वाष्ट्र मधुका ही उपदेश नहीं किया, अपितु कक्ष्य – गोप्य अर्थात् जो परमात्मसम्बन्धी रहस्य-भूत मधु विज्ञान था, जिसका मधु-ब्राह्मणद्वारा वर्णन किया गया है । और जो [ तृतीय और चतुर्थ ] दो अध्यायोंमें प्रकाशित किया गया, उसका भी तुम्हें उपदेश किया । यहाँ प्रवोचत् ( उपदेश किया ) इस क्रियापदकी अनुवृत्ति होती है ॥१७ ॥
वृ ० उ ० ३६-
पृष्ठ 618
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ६१० इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच 1 । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चके चतुष्पदः । पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषिने कहा— परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये । पहले वह पुरुष पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया । वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) में पुरिशय है । ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पुरुषसे ढका न हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमें पुरुषका प्रवेश न हुआ हो- जो पुरुषसे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥
इदं वै तन्मध्विति पूर्ववत् ॥ उक्तौ द्वौ मन्त्रौ प्रवर्ग्यसम्ब-न्ध्याख्यायिकोपसंहर्तारौ । द्वयोः प्रवर्ग्यकर्मार्थयोरध्याययोरर्थं आा-ख्यायिकाभूताम्यां मन्त्राभ्यां प्रकाशितः । ब्रह्मविद्यार्थयोस्त्व-ध्याययोरर्थ उत्तराभ्यामृग्भ्यां प्रकाशयितव्यः, इत्यतः प्रवर्तते । यत् कक्ष्यं च मधूक्तवानाथर्वणो युवाम्यामित्युक्तम् ॥ किं पुन-स्तन्मधु १ इत्युच्यते-' इदं वै तन्मधु ' इत्यादि वाक्य-का अर्थ पूर्ववत् है । उपर्युक्त दो मन्त्र प्रवर्ग्यसम्बन्धी आख्यायिकाका उपसंहार करनेवाले हैं । प्रवर्ग्यकर्म-सम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ इन उपर्युक्त आख्यायिकाभूत दो मन्त्रों-द्वारा प्रकाशित किया गया है । ब्रह्मविद्यासम्बन्धी दो अध्यायका अर्थं आगेकी दो ऋचाओं द्वारा प्रकाशित करना है इसीसे श्रुति प्रवृत्त होती है । आथर्वणने तुम दोनोंसे जो कक्ष्य मघु कहा था-ऐसा ऊपर कहा गया है । वह मधु क्या था? उसका वर्णन किया जाता है— 0
पृष्ठ 619
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ श्विभ्यामुवाच। द्वेपदः पुरश्चके आविशदिति । पुरियो नैनेन । १८ ॥ को उपदेश किया । शरीर बनाये और होकर शरीरोंमें प्रविष्ट में पुरिशय है । ऐसा कुछ नहीं है, जिसमें ॥ १८ ॥
= मधु ' इत्यादि वाक्य-है । उपर्युक्त दो बन्धी आख्यायिकाका निवाले हैं । प्रवर्ण्यकर्म-अध्यायोंका अर्थ इन यिकाभूत दो मन्त्रों-त किया गया है । दो ऋचाओं द्वारा ना है इसीसे श्रुति है । आथर्वणने तुम क्ष्य मधु कहा था-हा गया है । वह मधु उसका वर्णन किया ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६११ पुरचक्रे, पुरः पुराणि शरीराणि, यत इयमव्याकृतव्याकरणप्रक्रिया-स परमेश्वरो नामरूपे अव्याकृते व्याक्कुर्वाणः प्रथमं भूरादी लोकान् सृष्ट्वा चक्रे कृतवान्, द्विपदो द्विपा -दुपलक्षितानि मनुष्यशरीराणि पक्षिशरीराणि । तथा पुरः शरी -राणि चक्रे चतुष्पदश्चतुष्पादुप-लक्षितानि पशुशरीराणि । पुरः पुरस्तात्, 9 स ईश्वरः पक्षी लिङ्गशरीरं भूत्वा पुरः शरीराणि पुरुष आविशदित्यस्यार्थमाचष्टे श्रुतिः - स वायं पुरुषः सर्वासु पूर्षु सर्वशरीरेषु पुरिशयः, पुरि शेत इति पुरिशयः सन् पुरुष इत्युच्यते । नैनेनानेन किञ्चन किञ्चिदप्यनाघृतम नाच्छादितम् । तथा नैनेन किञ्चनासंवृतमन्तर -ननुप्रवेशितं बाह्यभूते नान्तर्भूतेन च न अनावृतम् । एवं स एव नामरूपात्मना अन्तर्वहिर्भावेन कार्यकरणरूपेण व्यवस्थितः ॥ पुरश्चक्रे इत्यादिमन्त्रः सङ्क्षेपत आत्मैकत्वमाचष्ट इत्यर्थः ॥ १८ ॥
' पुर — पुर अर्थात् शरीर क्योंकि यह अव्यक्तके व्यक्त होनेकी प्रक्रिया है । उसपरमेश्वरने अव्यक्त नामरूपको व्यक्त करते हुए पहले भूः आदि लोकोंकी रचना कर द्विपदोंको - दो पैरोंसे उपलक्षित मनुष्य शरीर और पक्षिशरीरोंको ' चक्र ' - रचा । तथा चतुष्पद - चार पैरोंसे उपलक्षित पशुशरीरोंको बनाया । पुरः अर्थात् पहले वह ईश्वर पक्षी - लिङ्गशरीर होकर पुर् - शरीरों-में पुरुषरूपसे प्रविष्ट हो गया — इसी वाक्यका अर्थं श्रुति करती है - वही यह पुरुष समस्त पुरों – सम्पूर्ण शरीरोंमें पुरिशय है, पुर्में शयन करता है, अतः पुरिशय होनेके कारण वह ' पुरुष ' इस प्रकार कहा जाता है । इससे कुछ भी अनावृत – अनाच्छादित नहीं है । तथा इससे कुछ भी असंवृत नहीं है, अर्थात् ऐसा कुछ भी नहीं है, जहाँ पुरुष भीतर और बाहर रह-कर स्वयं प्रविष्ट – व्याप्त न हो । इस प्रकार वही नामरूपात्मक अन्तर्बाह्यभावसे देह और इन्द्रिय-रूपमें स्थित है । तात्पर्य यह है कि यह ' पूरबक ' इत्यादि मन्त्र संक्षेपसे आत्माके एकत्वका निरूपण करता है ॥ १८ ॥
पृष्ठ 620
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच1 तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति । अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १६ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । यह देखते हुए ऋषिने कहा- वह रूप रूपके प्रतिरूप हो गया । इसका वह रूप प्रतिख्यापन ( प्रकट ) करने के लिये है । ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके [ इन्द्रियरूप ] घोड़े शत और दश हैं! यह ( परमेश्वर ) ही हरि ( इन्द्रियरूप अश्व ) है; यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त है । वह यह ब्रह्म अपूर्वं ( कारणरहित ), अनपर ( कार्यरहित ), अनन्तर ( विजातीय द्रव्यसे रहित ) और अबाह्य है । यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है । यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन ( उपदेश ) है ॥ १६ ॥
इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववत् । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । रूपं रूपं प्रति प्रतिरूपो रूपान्तरं बभूवेत्यर्थः । प्रतिरूपोऽनुरूपो वा यादृक्संस्थानौ मातापितरौ तत्संस्थानस्तदनुरूपएव पुत्रो जायते । न हि चतुष्पदो द्विपा-ज्जायते द्विपदो वा चतुष्पात् । ' इदं वै तन्मधु ' इत्यादि वाक्य-का अर्थं पूर्ववत् है । रूप - रूपके प्रतिरूप हो गया अर्थात् रूप - रूपके प्रति उसीके समान अन्य रूपवाला । हो गया । प्रतिरूप अर्थात् अनुरूप, क्योंकि माता - पिता जैसे स्वरूप-वाले होते हैं वैसे ही स्वरूपवाला अर्थात् उन्हींके अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है; क्योंकि चतुष्पदसे द्विपद और द्विपदसे चतुष्पदकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । सो