बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 71–80

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

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[ अध्याय १ कहा जायगा, हीं । और यदि भिन्न पदार्थ का उत्तर ऊपर भी है, उत्पत्तिसे = अभावरूप घट-सत्तासे सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि रहा करता है । सिद्ध पदार्थों में ' तो यह ठीक और अभावका म्भव नहीं है । होते हैं उन्हीं की नयु सिद्धता हो र अभाव अथवा का शरीर ये एक जाता है, उसी तो ऐसा कथन भी व्यपदेश हो सकता होती है, इसलिये चटका स्वरूप स्व नहीं यन्ताभाव भी घट ग प्रतीति होती है । नलग - अलग प्रतीति वीति नहीं होती वे घट और मृत्तिका ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ तस्मात्सदेव कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति सिद्धम् । किँम्लक्षणेन मृत्युनाघृतमित्यत आह - शनायया अशितुमिच्छा शनाया सैव? मृत्योर्लक्षणं तया लक्षितेन मृत्युनाशनायया । कथ-मशनाया मृत्यु: । इत्युच्यते-अशनाया हि मृत्युः । हिशब्देन प्रसिद्धं हेतुमवद्योतयति । यो ह्य शितुमिच्छति सोऽशनायान-न्तरमेव हन्ति जन्तून्, तेनासा-वशनायया लक्ष्यते मृत्युरित्यश-नाया हीत्याह । बुद्ध्यात्मनोऽशनाया धर्म इति स एष बुद्धयवस्थो हिरण्यगर्भो मृत्युरित्युच्यते । तेन मृत्युनेदं कार्यमावृतमासीत् । यथा पिण्डा-वस्थया मृदा घटादय श्रावृताः स्युरिति तद्वत् ॥ तन्मनोऽकुरुत । । ६५ : । दो अभावोंकी नहीं । अतः यह सिद्ध हुआ कि उत्पत्तिसे पूर्व कार्य सत् ही है । यह सब किस लक्षणवाले मृत्युसे आवृत था? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है - अशनायासे । अशन ( भोजन ) की इच्छाका नाम ' अशनाया ' है, वही उस मृत्युका लक्षण है; उससे लक्षित जो मृत्यु है उस अशनायासे [ यह सब आवृत था ] | अशनाया मृत्यु किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है - अश-नाया ही मृत्यु है । यहाँ ' हि ' शब्दसे श्रुति प्रसिद्ध हेतु प्रकट करती है, क्योंकि जो कोई भोजन करना चाहता है वह भोजनकी इच्छा होने के पीछे ही जीवोंको मारता है । अतः ' अशनाया ' शब्दसे यह मृत्यु लक्षित होती है, इसी से ' अशनाया हि ' ऐसा कहा गया है । अशनाया विज्ञानात्माका धर्म है, अतः बुद्धिमें स्थित हिरण्यगर्भ ही मृत्यु कहा गया है । उस मृत्युसे यह कार्यवर्ग आवृत था । जिस प्रकार पिण्डावस्था में वर्तमान मृत्तिकासे घटादि आवृत रहते हैं उसी प्रकार [ हिरण्यगर्भरूप मृत्युसे यह व्याकृत जगत् व्याप्त था ] | ‘ तन्मनोऽकुरुत ’ वृ ० उ ० ५-

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६६ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय १ तदिति मनसो निर्देशः । स । प्रकृतो मृत्युर्वच्यमाणकार्यसि -सुक्षया तत्कार्यालोचनक्षमं मनः-शब्दवाच्यं संकल्पादिलक्षणमन्तः-करणमक्कुरुत कृतवान् । केनाभिप्रायेण मनोऽकरोत् १ इत्युच्यते - आत्मन्वी आत्मवान् स्यां भवेयम् । अहमनेनात्मना मनसा मनस्वी स्यामित्यभिप्रायः । स प्रजापतिरभिव्यक्तेन मनसा समनस्कः सन्नर्चन्नर्चयन्पूजयन् आत्मानमेव कृतार्थोऽस्मीत्यचर-चरणमकरोत् । तस्य प्रजापतेर चतः पूजयत आपो रसात्मिकाः पूजाङ्गभूता अजायन्तोत्पन्नाः । अाकाशप्रभृतीनां त्रयाणा-मुत्पश्यनन्तरमिति वक्तव्यम्, श्रुत्यन्तरसामर्थ्याद्विकल्पासम्भ-वाच्च सृष्टिक्रमस्य ॥ अर्चते पूजां कुर्वते वै मे मह्यं कमुदकमभूदि त्येवममन्यत यस्मान्मृत्युः, तदेव तस्मादेव हेतोरर्कस्य अग्नेरश्व-इसमें ' तत् ' यह शब्द, मनका निर्देश करनेवाला है । अर्थात् उस प्रकृत म मृत्युने आगे कहे जानेवाले कार्यको रचनेकी इच्छासे उस कार्य अ आलोचना करने में समर्थं मनःशब्द-वाच्य वाच्य संकल्पादि संक लक्षणोंवाला ना अन्तःकरण किया । किस अभिप्रायसे मन किया? ख सोबतलाया जाता है - मैं आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होऊँ । तात्पर्य यह अ है कि मैं इस आत्मा यानी मनसे मनस्वी होऊँ । उस प्रजापतिने अभिव्यक्त हुए मनसे मनोयुक्त हो वेद अर्चन - पूजन करते हुएं अपने प्रति ही ' मैं कृतार्थ हूँ ' इस प्रकार आचरण ना किया । उस प्रजापतिके अर्चन-पूजन करते समय पूजाके अङ्गभूत धार रसात्मक आप ( जल ) उत्पन्न हुए एवं यहाँ जलकी उत्पत्ति आकाशादि ( आकाश, वायु और अग्नि ) तीन भूतोंकी उत्पत्तिके पीछे हुई ऐसा क कहना चाहिये था, क्योंकि अन्य श्रुतिके सामर्थ्यंसे यही सिद्ध होता हैं और सृष्टिक्रमका विकल्प होना मह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि मृत्युने तत ऐसा माना था कि अर्चन यानी पूजा करते हुए मेरे लिये क — जल वह हुआ है, इसीसे अर्थात् इसी

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[ अध्याय १ दमनका निर्देश र्थात् उस प्रकृत नेवाले कार्यको उस कार्यकी समर्थं मनःशब्द-- लक्षणोंवाला मन किया? है - मैं आत्मन्वी ऊँ । तात्पर्य यह यानी मनसे उस प्रजापतिने से मनोयुक्त हो हुए अपने प्रति प्रकार आचरण पतिके अर्चन-पूजाके अङ्गभूत 7 ) उत्पन्न हुए । नत्ति आकाशादि र अग्नि ) तीन पीछे हुई. ऐसा , क्योंकि अन्य यही सिद्ध होता विकल्प होना क्योंकि मृत्युने क अर्चन यानी -लिये क- - जल अर्थात् इसी ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ मेधक्रत्वौपयोगिकस्यात्वम् अर्कत्वे हेतुरित्यर्थः । अग्नेरर्क-नामनिर्वचनमेतत् । अर्चनात्सु-खहेतुपूजाकरणाद् अप्सम्बन्धाच्च अग्नेरेतद्गौणं नामार्क इति । य एवं यथोक्तमर्कस्यार्कत्वं-वेद जानाति ॥ कमुदकं सुखं वा नामसामान्यात् । ह वा इत्यव -धारणार्थौ । भवत्येवेति । श्रस्मै एवंविदे एवंविदथं भवति ॥ १ ॥

15 जलसे विराट्रूप कः पुनरसावर्कः १ इत्युच्यते -लिए ६७ | कारणसे अर्क यानी अश्वमेधयज्ञमें उपयोगी अग्निका अर्कत्व है, अर्थात् यही उसके अर्कत्वमें हेतु है । यह अग्नि के अर्क नामकी व्युत्पत्ति है । तात्पर्य यह है कि अर्चनसे यानी सुखकी हेतुभूता पूजा करनेसे तथा जलका सम्बन्ध होनेसे अग्निका ( अर्क ) यह गोण ( गुणकृत ) नाम है । जो कोई इस प्रकार उपर्युक्त अर्कका अर्कत्व जानता है उसे क— जल या सुख होता है, क्योंकि ‘ क ' यह जल और सुखका समान नाम है | ' ह ' और ' वै ' ये निश्चयार्थंक निपात हैं । अर्थात् उसके लिये जल या सुख होता ही है । इसे इस प्रकार जाननेवालेको अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेके लिये । [ जल या सुख ] होता है ॥ १ ॥

अग्निकी उत्पत्ति यह अर्क कौन है? सो बतलाया जाता है-आपो वा अर्कस्तद्यदपा शर आसीत्तत्स-महन्यत । सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥

आप ( जल ) ही अर्क हैं । उस जलका जो शर ( स्थूलभाग ) था वह एकत्रित हो गया । वह पृथिवी हो गयी । उसके उत्पन्न होनेपर वह

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६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रा [ मृत्यु ] थक गया । उस थके और तपे हुए प्रजापतिके शरीरसे उसका सारभूत तेज अग्नि प्रकट हुआ ॥ २ ॥

आपो वै या अर्चनाङ्गभूतास्ता एवार्कोऽग्नेरर्कस्य हेतुत्वात् ।

अप्सु चाग्निः प्रतिष्ठित इति ।

न पुनः साक्षादेवार्कस्ताः, तासा-मप्रकरणात्; अग्नेश्च प्रकरणम् ॥

वक्ष्यति च ' अयमग्निरर्क: ' ( बृह ० उ ० १ । २ । ७ ) इति । | तत्तत्र यदपां शर इव शरो दध्न इव मण्डभूतमासीत्तत्समह-न्यत सङ्घातमापद्यत तेजसा बाह्यान्तःपच्यमानम् । लिङ्गव्यत्य -येन वा योऽपां शरः स समहन्य-तेति । सा पृथिव्यभवत्स संघातो येयं पृथिवी साभवत् । ताभ्यो-ऽद्भथो अण्डमभिनिर्वृत्तमित्यर्थः तस्यां पृथिव्यामुत्पादितायां स मृत्युः प्रजापतिरश्राम्यच्छम-युक्तो बभूव । सर्वो हि लोकः का निश्चय ही जल जो अचनका तन अङ्गभूत है वही अर्क है, क्योंकि वह f अर्कसंज्ञक अग्निका हेतु है । कारण, जलमें ही अग्नि प्रतिष्ठित है । किंतु तस वह साक्षात् अर्क नहीं है, क्योंकि तेज यहाँ उसका प्रकरण. नहीं है; रस यह तो अग्निका ही प्रकरण है है । यह शरी ' यह अग्नि अर्क है ' ऐसा श्रुति कहेगी भी । इस वहाँ उस जलका जो शरके सो समान शर अर्थात् दहीके मण्ड प्रथ ( घृतपिण्ड ) के समान स्थूल भाग था वह संहत हो गया । अर्थात् बाहर जा और भीतरसे तेजके द्वारा परिपक्क इति होता हुआ वह इकट्ठा हो गया । अथवा ' यत्'का लिङ्गव्यत्यय कर ' य: अपां शरः ' जो जलका शर ( स्थूलभाग ) था वह एकत्रित हो गया - ऐसा अर्थ करना चाहिये । स वह पृथिवी हो गयी, अर्थात् वह सौ संघात, यह जो पृथिवी है वही हो गयी । तात्पर्य यह है कि उस जलसे REFLE चा । यह ब्रह्माण्ड निष्पन्न हो गया । पृष्ट उस पृथिवीके उत्पन्न होनेपर यत्र वह मृत्यु यानी प्रजापति श्रान्त-श्रमयुक्त हो गया, क्योंकि कार्य करके

पृष्ठ 75

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[ अध्याय १ रसे उसका जो अचनका है, क्योंकि वह है । कारण, ष्ठित है । किंतु हीं है, क्योंकि रण. नहीं है: प्रकरण है । ' ऐसा श्रुति का जो शरके - दही मण्ड स्थूल भाग था अर्थात् बाहर द्वारा परिपक्क हो गया । नङ्गव्यत्यय कर जलका शर एकत्रित हो रना चाहिये । , अर्थात् वह वी है वही हो कि उस जलसे हो गया । उत्पन्न होनेपर नापति श्रान्त-कि कार्य करके ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९ कार्यं कृत्वा श्राम्यति । प्रजापतेश्च तन्महत्कार्यं यत्पृथिवीसर्गः । किं तस्य श्रान्तस्य? इत्युच्यते-तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य खिन्नस्य तेजोरसस्तेज एव रसस्तेजोरसो रसः सारो निरवर्तत प्रजापति -शरीरान्निष्क्रान्त इत्यर्थः । को ऽसौ निष्क्रान्तः १ अग्निः । सोऽण्डस्यान्तर्विराट् प्रजापतिः कार्यकरणसंघातवान् जातः । " स वै शरीरी प्रथमः " इति स्मरणात् ॥ २ ॥

| सभी लोग श्रान्त हो जाते हैं और पृथिवीकी रचना करना - यह प्रजा-पतिका बड़ा भारी कार्य था । उस थके हुए प्रजापतिका क्या हुया? सो बतलाया जाता है - -उस उ श्रान्त- तपे हुए अर्थात् खेदको प्राप्त हुए प्रजापतिका जो तेजोरस था, तेज ही जो रस है उसका नाम ' तेजोरस ' है, रस सारको कहते हैं, वह निर्वर्तित हुआ अर्थात् प्रजापति-के शरीरसे बाहर निकल आया । यह कौन निकला? अग्नि । वह इस अण्डेके भीतर प्रथम उत्पन्न हुआ कार्यकरणसंघातवान् विराट् प्रजा-पति हुआ, क्योंकि इस विषय में " वही प्रथम शरीरी है " यह स्मृति प्रमाण है ॥ २ ॥

विराट्रूप अग्निके अवयवों में प्राचीदिगादि- दृष्टि स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं स एष प्राणस्त्रेधा विहितः । तस्य प्राची दिक्शिरोऽ-सौ चासौ चेम । अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ । दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः । स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३ ॥

उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया । उसने आदित्यको

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७० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ बाह तीसरा भाग किया और वायुको तीसरा । इस प्रकार यह प्राण तीन भागोंमें हो गया । उसका पूर्व दिशा शिर है तथा इधर - उधरकी ( ईशानी वेध और आग्नेयी ) विदिशाएँ बाहु हैं । इसी प्रकार पश्चिम दिशा इसका पुच्छ स्व है तथा इधर - उधरकी ( वायव्य और नैऋत्य ) विदिशाएँ जङ्घाएँ हैं । दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं, द्यलोक पृष्ठभाग है, अन्तरिक्ष जस्थ उदर है, यह ( पृथिवी ) हृदय है । यह ( अग्निरूप विराट् प्रजापति ) जलमें स्थित है । इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष जहाँ - कहीं जाता है वहीं विर प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥

स च जातः प्रजापतिखेधा त्रिप्रकारमात्मानं स्वयमेव कार्य-करणसंघातं व्यकुरुत व्यभज-दित्येतत् । कथं त्रेधा? इत्याह- | आदित्यं तृतीयमग्निवाय्वपेक्षया त्रयाणां पूरणम् अकुरुतेत्यनु-वर्तते । तथाग्न्यादित्यापेक्षया वायुं तृतीयम् । तथा वाय्वादि-त्यापेक्षयाग्नि तृतीयमिति द्रष्ट-व्यम् | सामर्थ्यस्य तुल्यत्वात्त्र-याणां संख्यापूरणत्वे । स एष प्राणः सर्वभूताना-मात्मापि अग्निवाय्वादित्यरूपेण उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने भूत और इन्द्रियसंघातरूप अपनेको स्वयं ही त्रिधा - तीन प्रकारसे विकृत यानी विभक्त किया । किस प्रकार त्रिधा इत्थ विभक्त किया? सो बतलाते हैं-उसने अग्नि और वायुकी अपेक्षा आदित्यको तीसरा बनाया; अर्थात् त्व तीन संख्याओंका पूरक बनाया । चैत्र इस वाक्यकी अनुवृत्ति होती है । इसी प्रकार अग्नि और आदित्यकी यत अपेक्षा वायुको तृतीय बनाया तथा वायु और आदित्यकी अपेक्षा अग्नि- प्रत को तृतीय बनाया - ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि तीनकी संख्याको भा पूर्ण करनेमें इन तीनोंहीकी शक्ति समान है । वा सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होनेपर भी यह प्राण विशेषत: अपने मृत्यु- स रूपसे ही, न कि अपने विराट् विशेषतः स्वेनैव: मृत्य्वात्मना | स्वरूपका लय करके, अग्नि, वायु

पृष्ठ 77

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अध्याय १ वह प्राण तीन रकी ( ईशानी - इसका पुच्छ जाएँ हैं । - है, अन्तरिक्ष नापति ) जलमें जाता है वहीं जापतिने भूत अपनेको स्वयं विकृत यानी प्रकार त्रिधा बतलाते हैं-युकी अपेक्षा बनाया; अर्थात् रक बनाया । त्ति होती है । र आदित्य की म बनाया तथा अपेक्षा अग्नि-- ऐसा समझना नकी संख्याको नहीकी शक्ति आत्मा होनेपर तः अपने मृत्यु-अपने विराट् के, अग्नि, वायु ब्राह्मण २ ] शङ्करभाष्यार्थ: त्रेधा विहितो विभक्तो न विराट्- । स्वरूपोपमर्दनेन । तस्यास्य प्रथम-जस्याग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्यार्कस्य विराजश्चित्यात्मकस्य अश्वस्येव निमुच्यते । सर्वा हि पूर्वो-क्तोत्पत्तिरस्य स्तुत्यर्थेत्यवोचाम -इत्थमसौ शुद्धजन्मेति । तस्य प्राची दिक्शिरो विशिष्ट-त्वसामान्यात् । असौ चासौ चैशान्याग्नेय्य ईम बाहू । ईर -यतेर्गतिकर्मणः । अथास्याग्नेः प्रतीची दिक्पुच्छं जघन्यो भागः, प्राङ्मुखस्य प्रत्यग्दिक्स-म्बन्धाद् । असौ चासौ च सक्थ्यौ-पृष्ठकोणत्वसामा-: न्यात् । दक्षिणा चोदीची च ७१ और आदित्यरूपमें तीन प्रकारका हो गया; अर्थात् तीन रूपोंमें विभक्त हो गया । उस प्रथम उत्पन्न हुए * इस अग्नि की अश्वमेधकर्म में उपयोगी अर्ककी अर्थात् चितिस्वरूप विराट्-की यह अश्वके समान दृष्टि कही जाती है । हमने पूर्वमें इसकी जो उत्पत्ति बतलायी है, वह सब स्तुतिके ही लिये है. यह बात कह चुके हैं । अर्थात् इस प्रकार यह शुद्धजन्मा है - ऐसा बतलाने IIII I के लिये है । फीक विशिष्टतामें समान होनेके कारण पूर्व दिशा उसका शिर है । यह और यह अर्थात् ईशानी और आग्नेयी विदिशाएँ ईमें भुजाएँ हैं । गत्यर्थंक ' ईर् ' धातुसे ' ईर्म ' शब्द सिद्ध होता है । तथा इस अग्निकी पश्चिम दिशा पुच्छ यानी निम्नभाग है, क्योंकि पूर्वकी ओर मुखवाला होनेसे पश्चिम दिशासे पुच्छका सम्बन्ध है । यह और यह अर्थात् वायव्य और नैऋत्य कोण सक्थियाँ ( जाएँ ) हैं, क्योंकि पृष्ठभागके कोण होनेमें उनके साथ उनकी उनकी समानता सम है । दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्वभाग हैं, क्योंकि इन दोनों दिशाओंसे सम्बन्ध

पृष्ठ 78

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७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ 232 पार्श्वे उभय दिक्सम्बन्धसामा- । न्यात् । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदर-मिति पूर्ववत् ॥ इयमुरः अधो-भागसामान्यात् । स एषोऽन्निः प्रजापतिरूपो लोकाद्यात्मकोऽग्निरपसु प्रति-ष्ठितः " एवमिमे लोका अप्स्वन्तः " इति श्रुतेः । यत्र क्व च यस्मिन्कस्मिंश्रिदेति गच्छति तदेव तत्रैव प्रतितिष्ठति स्थितिं लभते । कोऽसौ १ एवं यथोक्तमप्सु प्रतिष्ठितत्वमग्नेर्वि-द्वान्विजानन् गुणफलमेतत् ॥ ३ ॥

संवत्सर और योऽसौ मृत्युः सोऽवादिक्रमे-णात्मनात्मानम् अण्डस्यान्तः कार्यकरणसंघातवन्तं विराज-मग्निमसृजत, त्रेधा चात्मानम-कुरुतेत्युक्तम् । स किंव्यापारः सन्नसृजत? इत्युच्यते- -ब्राह होने में पार्श्वेकी समानता है । M द्युलोक पीठ और अन्तरिक्ष उदर अ है - ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये अ और अधोभागमें समानता होनेके व कारण यह ( पृथिवी ) हृदय है । " इस प्रकार ये लोक जलके भ भीतर हैं " इस श्रुति के अनुसार वह यह लोकादि स्वरूप प्रजापतिरूप्र अश अग्नि जलमें स्थित है । [ इस उपा-सनाका फल - ] वह जहाँ कहीं- संव जिस किसी देशमें जाता है तदेव- ( म वहाँ ही [ अर्थात् उसी स्थानपर ] उस प्रतिष्ठित होता- स्थिति प्राप्त करता है । ऐसा कौन है? इस प्रकार उस उपर्युक्त रीतिसे अग्निका जलमें स स्थित होना जाननेवाला । यह इस । उपासनाका गौण फल है ॥ ३ ॥ कि

श वाक्की उत्पत्ति जाय यह जो मृत्यु था उसने स्वयं ही कार अपनेको ब्रह्माण्डके अंदर जलादिके मन क्रमसे कार्यकरणसंघातवान् विराट् अग्नि के रूपमें रचा और अपनेको लच तीन भागों में विभक्त किया — यह भव पहले कहा जा चुका है । उसने क्या त्रय व्यापार करते हुए यह रचना की? सो बतलाया जाता है— स सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स स्यः मनसा वाचं मिथुनः समभवदशनाया मृत्युस्तद्यद्र ेत ल

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- अध्याय १ नता है । तथा अन्तरिक्ष उदर झना चाहिये मानता होनेके हृदय है | लोक जलके के अनुसार वह प्रजापति । [ इस उपा जहाँ कहीं-ता है तदेव -ती स्थानपर ] प्राप्त करता इस प्रकार ग्निका जलमें ला । यह इस ल है ॥ ३ ॥

उसने स्वयं ही नंदर जलादिके तवान् विराट् और अपनेको किया - यह है । उसने क्या ह रचना की? तिस न्युस्तद्यद्रत ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३ आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभः । यावान्संवत्सरस्तमेता-वतः कालस्य परस्ताद्सृजत । तं जातमभिव्याद्दात्स भाणकरोत्सैव वागभवत् ॥ ४ ॥

उसने कामना की कि मेरा दूसरा शरीर उत्पन्न हो; अत: उस अशनायारूप मृत्युने मनसे वेदरूप मिथुनकी भावना की । उससे जो रेत ( बीज ) हुआ, वह संवत्सर हुआ । इससे पूर्व संवत्सर नहीं था । उस संवत्सरको, जितना संवत्सरका काल होता है, उतने समयतक वह ( मृत्युरूप प्रजापति ) गर्भमें धारण किये रहा । इतने समयके पीछे उसने उसको उत्पन्न किया । उस उत्पन्न हुए कुमारके प्रति मुख फाड़ा । इससे उसने ‘ भाण् ’ ऐसा शब्द किया । वही स मृत्युकामयत कामितवान् । किम्? द्वितीयो मे ममात्मा शरीरं येनाहं शरीरी स्यां स जाये तो त्पद्येत इत्येवमेतद- । कामयत । स एवं कामयित्वा मनसा पूर्वोत्पन्नेन वाचं त्रयी-लक्षणां मिथुनं द्वन्द्वभावं सम-भवत्सम्भवनं कृतवान्मनसा त्रयीमालोचितवान् । त्रयीविहितं सृष्टिक्रमं मनसान्वालोचयदि-त्यर्थः । कोऽसौ? अशनायया

लक्षितो मृत्युः । श्रशनाया मृत्यु-वाक् हुआ ॥ ४ ॥

उस मृत्युने कामना की । क्या कामना की? मेरा दूसरा आत्मा यानी शरीर, जिससे मैं शरीरधारी होऊँ, उत्पन्न हो — इस प्रकार उसने कामना की । इस प्रकार कामना-पर उसने पहले उत्पन्न हुए मनसे वेदत्रयीरूपा वाणीकी मिथुन - द्वन्द्व-भावसे भावना की ॥ अर्थात् मनके द्वारा वेदत्रीकी आलोचना की । वेदत्रयीविहित सृष्टिक्रमका मनसे विचार किया- ऐसा इसका तात्पर्य है । यह कौन था? अशनाया ( क्षुवा ) से लक्षित मृत्यु । ' अशनाया मृत्यु है '

पृष्ठ 80

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७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ रित्युक्तम् । तमेव परामृशत्यन्यत्र । प्रसङ्गो मा भूदिति । तद्यद्रेत आसीत् तत्तत्र मिथुने यद्रेत आसीत्, प्रथमशरीरिणःप्रजा -पतेरुत्पत्तौ कारणं रेतो बीजं ज्ञान-कर्मरूपम्, त्रय्यालोचनायां यद्द्दष्ट-वानासीज्जन्मान्तरकृतम् तद्भाव-भावितोऽपः सृष्ट्वा तेन रेतसा बीजेनापस्वनुप्रविश्य अण्डरूपेण गर्भीभूतः स संवत्सरोऽभवत्, संव-त्सरकालनिर्माता संवत्सरः प्रजा-पतिरभवत् । न ह, पुरा पूर्वम्, तत-स्तस्मात्संवत्सरंकालनिर्मातुः प्रजा-पतेः संवत्सरः कालो नाम नास न बभूव ह । तं संवत्सरकाल निर्मातारमन्त-र्गर्भं प्रजापतिम्, यावांनिह प्रसिद्धः CALAL ब्राह्म ऐसा कहा जा चुका है । उसीका यहाँ परामर्शं ( उल्लेख ) प्रथम करती है, जिससे किसी अन्यका प्रसंग न हो जाय । न्मृत्य उससे जो रेत हुआ - उस मिथुन- कृतव से जो रेत हुआ, प्रथमशरीरी प्रजा- स्वाभ पतिसे उत्पत्तिमें हेतुभूत जो रेत यानी त्येवं बीज हुआ, अर्थात् वेदकी आलोचना भवत करनेपर उसने जो जन्मान्तरकृत ज्ञानकर्मरूप बीज देखा उस बीज-भावसे भावित होकर जलकी रचना कर उस रेतरूप बीजके द्वारा जलमें कर प्रवेश कर अण्डरूपसे गर्भस्थ रह् यदि वह संवत्सर हुआ । अर्थात् वह पश संवत्सररूप कालका निर्माता संवत्सर प्रजापति हुआ । उस संवत्सरकाल- अ निर्माता प्रजापतिसे पूर्व संवत्सर- सर्व नामक काल नहीं था । उस संवत्सरकालनिर्माता गर्भस्थ अन्न प्रजापतिको, जितना कि यह प्रसिद्ध इन काल एतावन्तमेतावत्संवत्सर परि- काल है उतने समयतक अर्थात् एक पशु संवत्सरख्यापी कालतक मृत्युने धारण किय माणं कालमबिभः भृतवान्मृत्युः । किया; जितना इस लोकमें संवत्सर प्रका यावान्संवत्सर इह प्रसिद्धः, ततः पर- प्रसिद्ध है [ उतने समयतक • गर्भमें ( भ स्तात्किं कृतवान्? तमेतावतः रखा ] । इसके पीछे उसने क्या किया? कालस्य संवत्सरमात्रस्य परस्ताद् इतने यानी संवत्सरमात्र कालके कुम ऊर्ध्वमसृजत सृष्टवान् पश्चात् उसने उसकी रचना की अश , अण्डमभि- अर्थात् उस अण्डेको फोड़ दिया । चि नदित्यर्थः तमेवं कुमारं जातमग्नि क्षुधायुक्त होनेके कारण मृत्युंने