बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 621–630
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
पृष्ठ 621
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ ALALAL श्विभ्यामुवाच । प्रतिरूपोबभूव याभिःपुरुरूप शेति । अयं वै चानन्तानि च मात्मा ब्रह्म को उपदेश किया 1 हो गया । इसका माया अनेकरूप [ इन्द्रियरूप ] घोड़े रूप अश्व ) है; यही ( कारणरहित ), यसे रहित ) और ला ब्रह्म है । यही नधु ' इत्यादि वाक्य-च है । रूप - रूपके - अर्थात् रूप - रूपके न अन्य रूपवाला - अर्थात् अनुरूप, नता जैसे स्वरूप-हो स्वरूपवाला ननुरूप पुत्र उत्पन्न योंकि चतुष्पदसे पदसे चतुष्पदकी व्हो सकती । सो ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१३ 2 N7 स एव हि परमेश्वरो नामरूपे व्याकुर्वाणो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । किमर्थ पुनः प्रतिरूपमागमनं तस्य १ इत्युच्यते — तदस्यात्मनो रूपं प्रतिचक्षणाय प्रतिख्यापनाय । यदि हि नामरूपे न व्याक्रियेते, तदा अस्यात्मनो निरूपाधिकं रूपं प्रज्ञानघनाख्यं न प्रति-ख्यायेत । यदा पुनः कार्यकरणा-. त्मना नामरूपे व्याकृते भवतः, तदास्य रूपं प्रतिख्यायेत । इन्द्रः परमेश्वरो मायाभिः प्रज्ञाभिः नामरूपभूतकृतमिथ्या -भिमानैर्वा, न तु परमार्थतः पुरुरूपो बहुरूप ईयते गम्यते, एकरूप एव प्रज्ञानघनः सन्न-विद्याप्रज्ञाभिः । कस्मात् पुनः कार-• णात् १ युक्ता रथ इव वाजिनः स्वविषयप्रकाशनाय, हि यस्मादस्य हरयो हरणादिन्द्रियाणि, शता । | नाम और रूपको व्यक्त करनेवाला | वह परमेश्वर ही रूप - रूपके प्रतिरूप हो गया । किंतु उसका प्रतिरूपको प्राप्त होना किसलिये हुआ! सो अब बतलाया जाता है - वह इस आत्माके रूपके प्रतिचक्षण - प्रति-ख्यापनके लिये है, क्योंकि यदि नाम - रूपोंकी अभिव्यक्ति न होती तो इस आत्माका प्रज्ञानघनसंज्ञक निरुपाधिक रूप प्रकट नहीं हो सकता था । किंतु जिस समय कार्य - करणभावसे नाम - रूपोंकी अभिव्यक्ति होती है, तभी इसका रूप प्रकट होता है । इन्द्र- परमेश्वर मायाओंसे अर्थात् प्रज्ञासे अथवा नाम - रूप उपाधिजनित मिथ्या अभिमानसे पुरुरूप — अनेकरूप हुआ जाना जाता है, परमार्थतः अनेकरूप नहीं होता । अर्थात् वह प्रज्ञानघन एकरूप ही होते हुए अविद्याजनित प्रज्ञाओंसे अनेकरूप भासता है । किंतु ऐसा किस कारणसे होता है । क्योंकि अपने विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये, रथमें जुते हुए घोड़ोंके समान, इसके शत और दश हरि ( इन्द्रियाँ ) हैं । विषयोंको हरण करनेके कारण इन्द्रियोंका
पृष्ठ 622
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ६१४ शतानि दश च प्राणिमेदवाह । न्याच्छतानि दश च भवन्ति । तस्मादिन्द्रियविषयबाहुल्यात्तत्प्र-काशनायैव च युक्तानि तानि न आत्मप्रकाशनाय । “ पराश्चि । खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः ” ( २ । १ । १ ) इति हि काठके । तस्मात्तैरेव विषयस्वरूपैरीयते न प्रज्ञानघनैकरसेन स्वरूपेण । एवं तर्हि श्रयमन्यः परमेश्वरो-ऽन्ये हरय इत्येवं प्राप्ते उच्यते— श्रयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । प्राणिभेदस्यानन्त्यात् । किं बहुना, तदेतद्ब्रह्म य आत्मा । श्रपूर्व नास्य कारणं पूर्व विद्यत इत्य-पूर्वम् । नास्यापरं कार्यं विद्यत इत्यनपरम् । नास्य जात्यन्तरमन्त-राले विद्यत इत्यनन्तरम् । तथा । बहिरस्य न विद्यत इत्यबाह्यम् । किं पुनस्तन्निरन्तरं ब्रह्म १ अयमात्मा । कोऽसौ? यः प्रत्य-नाम हरि है, प्राणिभेदकी बहुलता-के कारण वे शत और दश हैं । अतः इन्द्रियोंके विषयोंकी बहुलता होनेके कारण वे उन्हींको प्रकाशित करनेमें नियुक्त हैं, आत्माको प्रका-शित करनेमें नहीं । कठोपनिषद्में कहा भी है कि " स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है । " अतः वह उन विषयरूपोंसे ही अनेकरूप भासता है, प्रज्ञानघन एकरसस्वरूपसे नहीं । इस प्रकार तब तो यह परमेश्वर अन्य है और इन्द्रियाँ अन्य हैं— ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं-यह परमेश्वर ही इन्द्रियाँ हैं तथा यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त हैं, क्योंकि प्राणियों के भेदका कोई अन्त नहीं है । अधिक क्या कहा जाय, यह जो आत्मा है वही ब्रह्म है । यह अपूर्वं है इसका कोई पूर्व यानी कारण नहीं है, इसलिये यहू अपूर्व है । इसका अपर — कार्य नहीं है, इसलिये यह अनपर है । इसके मध्यमें कोई जात्यन्तर नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है । तथा इसके बाहर कुछ नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है । तो फिर वह निरन्तर ब्रह्म कौन है? यह आत्मा । आत्मा कौन
पृष्ठ 623
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ प्राणिभेदको N बहुलता-शत और दश हैं । विषयों की बहुलता उन्हींको प्रकाशित हैं, आत्माको प्रका-ह्रीं । कठोपनिषद् में - स्वयम्भू परमात्माने हर्मुख करके हिंसित । " अतः वह उन - अनेकरूप भासता करसस्वरूपसे नहीं । तब तो यह परमेश्वर इन्द्रियाँ अन्य हैं-होनेपर कहते हैं— इन्द्रियाँ हैं तथा - अनेक और अनन्त यों के भेदका कोई अधिक क्या कहा आत्मा है वही ब्रह्म है इसका कोई पूर्व हीं है, इसलिये यह नका अपर — कार्य ये यह अनपर है । ई जात्यन्तर नहीं अनन्तर है । तथा नहीं है, इसलिये वह निरन्तर ब्रह्म मा । आत्मा कौन ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१५ गात्मा द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा । विज्ञाता सर्वानुभूः, सर्वात्मना सर्वमनुभवतीति सर्वानुभूः । इत्येतदनुशासनं सर्ववेदान्तोप-देशः । एष सर्ववेदान्तानामुप-संहृतोऽर्थः । एतदमृतमभयम् । परिसमाप्तश्च शास्त्रार्थः ॥ १ ९ ॥ NABALIC है? जो प्रत्यगात्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, वोद्धा अर्थात् जाननेवाला और सर्वानुभू है; सबको सब प्रकार अनुभव करता है, इसलिये वह सर्वानुभू है । इस प्रकार मह अनुशासन अर्थात् समस्त वेदान्तों का उपदेश है । यह सम्पूर्णं वेदान्तों-का उपसंहारभूत अर्थ है । यह अमृत और अभय है । इस प्रकार शास्त्रका अर्थं समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये पञ्चमं मधुब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
षष्ठ ब्राह्मण मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा अथ वशः । पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः पौतिमाप्यात्पौतिमाच्यो गौपवनाद्रौपवनः कौशिका-त्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डि-ल्यः कौशिकाञ्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १ ॥ आग्नि-वेश्यादाग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्चान-भिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लात आनभिम्ला-तादानभिम्लातो गौतमागौतमः सैतवप्राचीनयोग्या-भ्या सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भार-
पृष्ठ 624
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ द्वाजाद्भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद्भारद्वाजः पाराशर्यात्पाराशर्यो बैजवापायना-दुबैजवापायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृत-कौशिकाद्घृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणः
पाराशर्यात्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायणस्त्रैवणेस्त्रैव णिरौपजन्धनेरौपजन्ध-निरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो माण्टे-मण्टिगत मागौतमो गौतमागौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डि-न्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्वत्सनपाद्बा-भ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसाद-यास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्व -रूपात्त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङ्काथर्वणो ऽथर्वणो दैवादथर्वा देवो मृत्योः-प्राध्व सनान्मृत्युः प्राध्व ँ सनः प्रध्व ँ सनात्प्रध्व सन एकर्षे रेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
गौपवनने अब [ मधुकाण्डका ] वंश बतलाया जाता है - पौतिमाष्यने गौपवनसे, पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवन से, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे गौतमने ॥१ ॥ आग्निवेश्यसे, अग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और अनभिम्लातसे,
,
पृष्ठ 625
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ माच्च गौतमो बैजवापायना-व्यनिः ॥२ ॥ घृत-पाराशर्यायणः
आसुरायणाच्च -धनेरौपजन्ध-नादात्रेयो माण्टे-वात्स्याद्वात्स्यः कैशोर्यः काप्यः वो विदर्भीकौण्डि-वाद्वत्सनपाबा-स्यादाङ्गिरसाद-स्त्वाष्ट्रो विश्व-वनौ दधीच थर्वा दैवो मृत्योः-५ सनात्प्रध्व ँ वर्व्यष्टिः सनारोः वगः परमेष्ठिनः नः ॥ ३ ॥
तिमाष्यने गौपवनसे, न कौशिकसे, कौशिकने शकसे और गौतमसे, और अनभिम्लातसे, ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१७ आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आन-भिम्लातने गौतमसे, गौतमने सेतव और प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीन-योग्यने पाराशर्यं से, पाराशर्यंने भारद्वाजसे, भारद्वाजने भारद्वाजसे और गौतमसे, गौतमने भारद्वाजसे, भारद्वाजने पाराशयंसे पाराशर्यने बैजवा-पायनसे, बैजवापायन ने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने ॥ २ ॥ घृतकौशिक-से, घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने
जातूकर्ण्यसे, जातूकर्ण्य ने आसुरायणसे और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतम-से, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे । कैशोर्यं काप्यने कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विद-र्भीकौण्डिन्यसे विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपात् बाभ्रवसे, वत्सनपात् बाभ्रवने पन्थासौभरसे, पन्थासौभरने अयास्य आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्ने विश्वरूप त्वाष्ट्रसे विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्वि-नीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा देवसे, अथर्वा देवने मृत्यु - प्राध्वंसनसे, मृत्यु- प्राध्वंसन ने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसन-नेकप, एक विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने
ब्रह्मासे [ इसे प्राप्त किया ] । ब्रह्मा स्वयम्भु है, ब्रह्माको नमस्कार है ॥३ ॥
थेदानीं ब्रह्मविद्यार्थस्य मधु-काण्डस्य वंशः स्तुत्यर्थो ब्रह्म-विद्यायाः । मन्त्रश्चायं स्वाध्या-यार्थी जपार्थश्च । तत्र वंश इव वंश: - यथा वेणुवंशः पर्वणः पर्वणो हि भिद्यते तद्वदग्रात्प्रभृति -मूलप्राप्तेरयं वंशः । श्रध्यायचतुष्ट अब ब्रह्मविद्याकी स्तुति के लिये ब्रह्मविद्या जिसका प्रयोजन है, उस मधुकाण्डका वंश बतलाया जाता है । यह मन्त्र स्वाध्याय और जपके लिये है । यह वंश वंश ( बाँस ) के समान है । जिस प्रकार पर्वों ( पोरियों ) का वंशभूत वेणु ( बाँस ) पर्वोंसे भिन्न है, उसी प्रकार अग्रभागसे लेकर मूलपर्यंन्त यह वंश भी भिन्न
पृष्ठ 626
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ यस्य श्राचार्य परम्पराक्रमो वंश । इत्युच्यते । तत्र प्रथमान्तः शिष्यः पञ्चम्यन्तः आचार्यः । परमेष्ठी विराट् ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात् । ततः परम् अचार्यपरम्परा नास्ति । यत्पुनर्ब्रह्म तन्नित्यं स्वयम्भु, तस्मै ब्रह्मणे स्वयम्भुवे नमः ॥ १-३ ॥ है | यहां [ ब्राह्मणभागके आरम्भिक] चार अध्यायोंकी आचार्य परम्परा ' वंश ' नामसे कही गयी है । इनमें प्रथमाविभक्यन्त शिष्य है और पञ्चम्यन्त आचार्यं है । परमेष्ठी यानी विराट्ने ब्रह्मा - हिरण्यगर्भ-से प्राप्त की । उससे आगे आचार्य-परम्परा नहीं है; क्योंकि जो ब्रह्मा है वह तो नित्य और स्वयम्भू है, उस स्वयम्भू ब्रह्माको नमस्कार हे ॥ १-३ ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये षष्ठं वंशब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिवाजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
पृष्ठ 627
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय २ - भागके आरम्भिक] आचार्य परम्परा ही गयी है । इनमें शिष्य है और है । परमेष्ठी ब्रह्मा - हिरण्यगर्भ-तसे आगे आचार्य -; क्योंकि जो ब्रह्मा और स्वयम्भू है, ह्याको नमस्कार ये राजकाचार्यस्य भाष्ये तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण याज्ञवल्कीय काण्ड ' जनको ह वैदेहः ' इत्यादि याज्ञवल्कीयं काण्डमारभ्यते । उपपत्तिप्रधानत्वादतिक्रान्तेन म-धुकाण्डेन समानार्थत्वेऽपि सति न पुनरुक्तता । मधुकाण्डं ह्यागम-प्रधानस् । आगमोपपत्ती ह्यात्मै-कत्वप्रकाशनाय प्रवृत्ते शन्नुतः करतलगत बिम्बमिव दुर्शयितुम् । ' श्रोतव्यो मन्यव्यः ' इति ह्युक्तम् । तस्मादागमार्थस्यैव । परीक्षापूर्वकं निर्धारणाय याज्ञ-वल्कीयं काण्डमुपपत्तिप्रधानमा-रम्यते । श्राख्यायिका तु विज्ञान-स्तुत्यर्था उपायविधिपरा चा । प्रसिद्धो ह्युपायो विद्वद्भिः शाखेषु च दृष्ट: - दानम् । दानेन ह्युप-अब ' जनको ह वैदेहः ' इत्यादि याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है । गत मधुकाण्डसे समा-नार्थता होनेपर भी यह काण्ड युक्तिप्रधान होनेके कारण इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है; क्योंकि मधुकाण्ड शास्त्रप्रधान है । जब शास्त्र और युक्ति दोनों ही आत्मै-कत्व प्रदर्शित करनेके लिये प्रवृत्त त उसका हथेलीपर रखे हुए बिल्वफल के समान साक्षात्कार करा सकते हैं । ' श्रवण करना चाहिये, मनन करना चाहिये ' ऐसा पहले कहा गया है; अतः शास्त्र तात्पर्य को ही परीक्षापूर्वक निश्चय करनेके लिये यह युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है । यहाँ जो आख्यायिका है, वह तो विज्ञान की स्तुति के लिये और उसके उपायका विधान करनेके लिये है । दान - यह इसका प्रसिद्ध उपाय है और शास्त्रोंमें भी विद्वानोंने इसे ही देखा है, क्योंकि दानसे
पृष्ठ 628
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ नमन्ते प्राणिनः । प्रभूतं हिरण्यं गोसहस्रदानं चेहोपलभ्यते; तस्मादन्यपरेणापि शास्त्रेण विद्या-प्राप्त्युपायदान प्रदर्शनार्था -ख्यायिका आरब्धा । अपि च तद्विद्यसंयोगस्तैश्व सह वादकरणं विद्याप्राप्त्युपायो न्यायविद्यायां दृष्टः; तच्चास्मिन्न-ध्याये प्राबल्येन प्रदर्श्यते । प्रत्यक्षा च विद्वत्संयोगे प्रज्ञावृद्धिः ॥ प्राणी अपने प्रति विनीत हो जाते हैं । यहाँ बहुत - से सुवर्णं और सहस्र गोलोंका दान देखा जाता है; अत: यहाँ शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय दूसरा होनेपर भी यह आख्यायिका विद्या-| प्राप्तिके उपायभूत दानको प्रदर्शित करनेके लिये आरम्भ की गयी है । इसके सिवा किसी विद्यामें निष्णात पुरुषोंका संयोग और उन-के साथ वाद करना भी न्यायविद्या-में विद्याप्राप्तिका उपाय देखा गया है; और वह वाद इस अध्यायमें बड़ी प्रौढ़िके साथ दिखाया जाता है । विद्वानोंके संयोगसे प्रज्ञाकी वृद्धि होती है - यह तो प्रत्यक्ष ही तस्माद् विद्याप्राप्त्युपाय प्रदर्शनार्थे- है । अतः यह आख्यायिका विद्या-प्राप्तिका उपाय प्रदर्शित करनेके व आख्यायिका । लिये ही है । राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजेतत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेताबभूवुस्तस्य ह् जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषांब्राह्म-णानामनूचानतम इति स ह गवाँ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने बभूवुः ॥१ ॥
यजन किया 1 । उसमें कुरु और पाञ्चाल एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस
पृष्ठ 629
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय ३ ति विनीत हो जाते --से सुवर्णं और सहस्र देखा जाता है; अत: तिपाद्य विषय दूसरा - आख्यायिका विद्या-भूत दानको प्रदर्शित आरम्भ की गयी है । नवा किसी विद्यामें का संयोग और उन-करना भी न्यायविद्या-उपाय देखा गया स्वाद इस अध्यायमें बाथ दिखाया जाता - संयोगसे प्रज्ञाकी - यह तो प्रत्यक्ष ही आख्यायिका विद्या-प्रदर्शित करनेके एँ दान करनेकी यज्ञेनेजे तत्र ह बभूवुस्तस्य ह स्विदेषां ब्राह्म-सहस्रमवरुरोध बभूवुः ॥ १ ॥
क्षणावाले यज्ञद्वारा एकत्रित हुए । उस ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२१ राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन ( प्रवचन ) करनेमें सबसे बढ़कर गौएँ गोशाला में रोक लीं । उनमेंसे बँधे हुए थे ॥ १ ॥
जनको नाम ह किल सम्रा-ड्राजा बभूव विदेहानाम्; तत्र भवो वैदेहः । स च बहुदक्षिणेन यज्ञेन, शाखान्तरप्रसिद्धो वा बहुदक्षिणो नाम यज्ञः, अश्वमेध वा दक्षिणावाहुन्याद्वहुदक्षिण इहोच्यते, तेनेजेऽयजत् । तत्र तस्मिन्यज्ञे निमन्त्रिता दर्शनकामा वा कुरूणां देशानां पञ्चालानां च ब्राह्मणाः, तेषु हि विदुषां बाहुल्यं प्रसिद्धम् अभि-समेता अभिसङ्गता बभ्रुवुः । तत्र महान्तं विद्वत्समुदायं दृष्ट्वा तस्य ह किल जनकस्य वैदेहस्य । यजमानस्य, को नु खल्वत्र ब्रह्मिष्ठ इति विशेषेण ज्ञातुमिच्छा विजि -ज्ञासा बभूव । कथम्? कः स्वित् को नु खल्वेषां ब्राह्मणानाम् अनूचानतमः १ सर्व इमे ऽनूचाना, कः स्विदेषामतिशयेनानूचान इति । कौन है? इसलिये उसने एक सहस्र प्रत्येक के सींगोंमें दश दश पाद सुवर्णं जनक नामका सम्राट् विदेह देशका राजा था, विदेह देशमें उत्पन्न होने और रहनेके कारण उसे वैदेह कहते हैं । उसने एक बहुत दक्षिणावाले यज्ञसे, अथवा शाखान्तरमें प्रसिद्ध बहुदक्षिणनामक यज्ञसे, या अधिक दक्षिणावाला होनेसे यहाँ अश्वमेघ ही बहुदक्षिण कहा गया है -- उससे, यजन किया । वहाँ उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर अथवा उसे देखनेकी इच्छासे कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए, क्योंकि इन्हीं देशोंमें विद्वानोंकी बहुलता प्रसिद्ध है । वहाँ महान् विद्वत्समुदाय देखकर उस विदेहराज यजमान जनककी विशेषरूपसे यह जाननेकी इच्छा हुई कि इनमें कौन ब्रह्मिष्ठ है । कैसी ' इच्छा हुई? – यह कि इन ब्राह्मणों में अनुवचन करनेमें सबसे अधिक समर्थ कौन है? अनुवचन करनेवाले तो ये सभी हैं, किंतु इनमें अतिशय अनूचान ( प्रवचन करनेवाला ) कौन है? यह उसने जानना चाहा ।
पृष्ठ 630
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ स ह अनूचानतमविषयोत्पन्न-• जिलासः संस्तद्विज्ञानोपायाथ गवां सहस्रं प्रथमवयसामवरुरोध, गो ष्ठेऽवरोधं कारयामास । किविशि-ष्टास्ता गावो ऽवरुद्धाः! इत्युच्यते -पलचतुर्थभागः पादः सुवर्णस्य, दश दश पादा एकैकस्या गोः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः । पञ्च पञ्च पादा एकैकस्मिन् शृङ्गे ॥ १ ॥
इस प्रकार अनूचानतमविषयक जिज्ञासा उत्पन्न होने पर उसे जाननेका उपाय करनेके लिये उसने नयी अवस्थावाली एक सहस्र गौएँ रोक लीं अर्थात् गोशालामें रोकवा दीं । वे किस विशेषणवाली गौएँ रोकी गयी थीं, सो बतलाया जाता है - पलका चतुर्थं भाग पाव होता है; ऐसे सुवर्ण-के दश - दश पाद एक - एक गौके सींगोंमें बाँधे हुए थे, अर्थात् एक-एक सींग में पाँच - पाँच पाद थे ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यका गौएँ ले जानेके लिये अपने शिष्यको प्राज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उद्जतामिति । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यःस्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज साम-श्रवा ३ इतिता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुकुचुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठो-ऽसी ३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति तह तत एव प्रष्टुं दध होताश्वलः ॥ २ ॥
उसने उनसे कहा — ‘ पूज्य ब्राह्मणगण! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो वह इत गौओंको ले जाय । ' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहसन हुआ । तब