बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 631–640

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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[ अध्याय ३ प्रकार अनूचानतमविषयक उत्पन्न होने पर उसे उपाय करनेके लिये नयी अवस्थावाली गौएँ रोक लीं अर्थात् एक में रोकवा दीं । वे किस बाली गौएं रोकी गयी थीं, लाया जाता है - पलका पाद होता है; ऐसे सुवर्ण-दश पाद एक - एक गौके बांधे हुए थे, अर्थात् एक-गमें पाँच - पाँच पाद 1 शिष्यको प्राज्ञा देना, का प्रश्न तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स णा न दधृषुरथ ह ताः सोम्योदज साम-णारचुकुधुः कथं नो देहस्य होताश्वलो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठो-ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो तत एव प्रष्टुं दध आदेश याज्ञवल्कयका ब्रह्मचारियोंको आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो वह का साहस न हुआ । तब

पृष्ठ 632

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पृष्ठ 633

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२३ याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, ' हे सोम्य सामश्रवा! तू इन्हें ले जा । ' तब वह उन्हें ले चला । इससे वे ब्राह्मण ' यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मिष्ठ कैसे कहता है ' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये । विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने इससे पूछा, ' याज्ञवल्क्य! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मिष्ठ हो? ' उसने कहा, ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं । ' इसी से होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥

गा एवमवरुध्य ब्राह्मणां-स्तान् होवाच हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्यामन्त्र्य । यो वो युष्माकं त्रह्मिष्ठः, सर्वे यूयं ब्रह्माणोऽति-शयेन युष्माकं ब्रह्मा यः स एता गा उदजतामुत्कालयतु स्वगृहं प्रति । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः । ह किलैवमुक्ता ब्राह्मणा ब्रह्मिष्ठ-तामात्मनः प्रतिज्ञातुं न दधृषुर्न प्रगल्भाः संवृत्ताः । अप्रगल्भ-भूतेषु ब्राह्मणेष्वथ ह याज्ञ-वल्क्यः स्वमात्मीयमेव ब्रह्म-चारिणमन्तेवासिनमुवाच-एतागा हे सोम्योदजोद्गमया-स्मद्गृहान् प्रति, हे सामश्रवः-सामविधिं हि शृणोत्यतो-ऽर्थाच्चतुर्वेदो याज्ञवल्क्यः । इस प्रकार गौओंको रोककर उसने उन ब्राह्मणोंसे ' हे पूज्य ब्राह्मणो! ' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा, ' आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो-ब्रह्मा ( ब्रह्मवेत्ता ) तो आप सभी हैं, किंतु जो आपमें अतिशयरूपसे ब्रह्मा हो — वह इन गौओंको अपने घरके प्रति हाँक ले जाय । ' उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ । इस प्रकार कहे जानेपर उन ब्राह्म-णोंका अपनी ब्रह्मिष्ठताके विषयमें प्रतिज्ञा करनेका साहस न हुआ— वे ऐसा प्रकट करनेकी धृष्टता न कर सके । ब्राह्मणोंके साहसहीन हो जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारी अनुगत शिष्यसे कहा, ' हे सोम्य! हे सामश्रवा! इन गौओंको हमारे घर ले जा; साम-विधिको श्रवण करनेके कारण उसे सामश्रवा कहा है, इससे स्वतः ही याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका

पृष्ठ 634

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६२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ता गा होदा चकारोत्कालित -वानाचार्य गृहं प्रति । याज्ञवल्क्येन त्रह्मिष्ठपणस्त्री-करणेन श्रात्मनो ब्रह्मिष्ठता प्रति-ज्ञाता, इति ते ह चुक्रुधुः क्रुद्ध-वन्तो ब्राह्मणाः । तेषां क्रोधा -भिप्रायमाचष्टे - कथं नोऽस्माकं एकैकप्रधानानां ब्रह्मिष्ठोऽस्मीति मीति ब्रुवति | अथ हैवं क्रुद्धेषु ब्राह्मणेषु जनकस्य यजमानस्य होता ऋत्विगश्वलो नाम बभ्रुव आसीत् । स एनं याज्ञवल्क्यम्, ब्रह्मिष्ठाभिमानी राजाश्रयत्वाच्च-धृष्टः, याज्ञवल्क्यं पप्रच्छ पृष्ट-वान् । कथम् १ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी ३ इति । प्लुतिर्भर्त्सनार्था । स होवाच याज्ञवल्क्यः-नमस्कुर्मो वयं त्रह्मिष्ठाय, इदानीं गोकामाः स्मो वयमिति । तं १. याज्ञवल्क्य यजुर्वेदी है, उससे करता है । साम ऋग्वेदमें आरूढ़ होकर । ज्ञाता सिद्ध होता है । ' तब वह उ गौओंको आचार्यं याज्ञवल्क्यके घर-की ओर ले चला । याज्ञवल्क्यने ब्रह्मिष्ठसम्बन्धी पण स्वीकार करके अपनी ब्रह्मिष्ठता-की प्रतिज्ञा की है - इससे वे ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये । श्रुति उनके क्रोधका अभिप्राय बतलाती है — हममेंसे एक - एक प्रधान ब्राह्मणके सामने वह ' में ब्रह्मिष्ठ हूँ ' ऐसा कैसे कहता है-इससे वे क्रुद्ध हो गये । तब इस प्रकार क्रुद्ध हुए ब्राह्मणोंमें यजमान जनकका होता जो अश्वल था, वह इस याज्ञवल्क्यसे बोला - राजाश्रयके कारण अभि-मानी और धृष्ट होनेसे उसने याज्ञ-वल्क्यसे पूछा । किस प्रकार पूछा-' याज्ञवल्क्य! क्या निश्चय हम सबमें तुम्हीं ब्रह्मिष्ठ हो? ' यहाँ ' असि ' पदमें प्लुत ईकारका प्रयोग भर्त्सना ( धिक्कारने ) के लिये है । उस याज्ञवल्क्यने कहा-' ब्रह्मिष्ठको हम नमस्कार करते हैं, । इस समय तो हम गौओंकी इच्छा-ब्रह्मचारी सामवेदका श्रवण ( अध्ययन ) ही गान किया जाता है, तथा अथर्ववेद इन तीन वेदोंके ही अन्तर्भुत है; इसलिये इस कथनसे याज्ञवल्क्य चारों ज्ञाता सिद्ध होता है । वेदोंका

पृष्ठ 635

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a [ अध्याय३ होता है । तब वह उन आचार्य याज्ञवल्क्यकेघर-ने चला । नेब्रह्मष्टसम्बन्धी -र करके अपनी ब्रह्मिष्ठता-- की है - इससे वे ब्राह्मण ये । श्रुति उनके क्रोधका बतलाती है— हममेंसे यान ब्राह्मणके सामने वह हूँ ' ऐसा कैसे कहता है-द्ध हो गये । इस प्रकार क्रुद्ध हुए यजमान जनकका होता या, वह इस याज्ञवल्क्यसे जाश्रय के कारण अभि-धृष्ट होनेसे उसने याज्ञ-छा । किस प्रकार पूछा-! क्या निश्चय हम सबमें वष्ठ हो? ' यहाँ ' असि ' ईकारका प्रयोग भर्त्सना ) के लिये है । याज्ञवल्क्यने कहा-हम नमस्कार करते हैं, तो हम गौओंकी इच्छा-वेदका श्रवण ( अध्ययन ) जाता है, तथा अथर्ववेद याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्य ६२५ ब्रह्मिष्ठप्रतिज्ञं सन्तं तत एव । वाले हैं । ' इस प्रकार ब्रह्मिष्ठकी प्रतिज्ञावाला होनेपर और इसी ब्रह्मिष्ठपणस्वीकरणात् प्रष्टुं दधे कारण ब्रह्मिष्ठपण स्वीकार करनेसे होता अश्वलने मनमें उससे प्रश्न

धृतवान् मनो होता अश्वलः ॥ २ ॥ । करनेका निश्चय कर लिया ॥ २ ॥

मृत्युग्रस्त कर्मसाधनोंकी आसक्तिसे पार पानेका उपाय याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद " ५ सर्वं मृत्युनाप्त ँ सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक्सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ३ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है? " [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- ] ' वह यजमान होता ऋत्विक्रूप अग्निसे और वाक्द्वारा उसका अतिक्रमण कर सकता है । वाक् ही यज्ञका होता है यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ' ॥ ३ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच । तत्र मधुकाण्डे पाङ्क्तेन कर्मणा दर्शनसमुच्चितेन यजमानस्य । मृत्योरत्ययो व्याख्यात उद्गीथ प्रकरणे सङ्क्षेपतः । तस्यैव परी-क्षाविषयोऽयमिति तद्गतदर्शन वि-शेषार्थोऽयं विस्तर आरभ्यते । बृ ० उ ० ४०-' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा । तहाँ गत मधुकाण्डमें जो उद्गीथप्रकरण है, उसमें दर्शन-सहित पाङ्क्तकर्मसे यजमानके मृत्यु-से पार होनेका संक्षेपसे वर्णन किया गया है । यह प्रकरण उसीकी परीक्षाका विषय [ अर्थात् उसीका विचार करनेके लिये ] है, अतः उसमें आये हुए दर्शनविशेषके लिये ही यह विस्तार आरम्भ किया जाता है ।

पृष्ठ 636

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६२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ यदिदं साधनजातम् अस्य कर्मण । इस कर्मका जो यह ऋत्विक् और ऋत्विगग्न्यादि मृत्युना कमलन- अग्नि आदि साधनसमूह है, वह स्वाभाविक आसक्तिसहित कर्मरूप णेन स्वाभाविकासङ्गसहितेन प्राप्तं मृत्युसे व्याप्त है । केवल व्याप्त हो व्याप्तम्, न केवलं व्याप्तमभिपन्नं नहीं है, अपितु अभिपन्न अर्थात् च मृत्युना वशीकृतं च । केन मृत्युद्वारा वशमें किया हुआ है । सो दर्शनलक्षणेन साधनेन यजमानो किस दर्शनरूप साधनसे यजमान मृत्योराप्तिमति मृत्युगोचरत्वम् मृत्युकी प्राप्तिको पार कर अर्थात् मृत्युकी विषयताका अतिक्रमण कर श्रतिक्रम्य मुच्यते स्वतन्त्रो मृत्यो- मुक्त यानी स्वतन्त्र हो जाता है

खशो भवतीत्यर्थः ।

नन्द्रीय एवाभिहितं येनाति-मुच्यते मुख्य प्राणात्मदर्शनेनेति ॥

बाढमुक्तम्, योऽनुक्तो विशेष-स्तत्र, तदर्थोऽयमारम्भ इत्यदोषः । होत्रत्विजाग्निना वाचेत्याह याज्ञवल्क्यः । एतस्यार्थं व्याचष्टे कः पुनहता येन मृत्युमति-क्रामति? इत्युच्यते - वाग्वै यज्ञस्य अर्थात् मृत्युके वशीभूत नहीं रहता । आक्षेप - किंतु जिस मुख्य प्राणा-त्मदर्शनसे वह मुक्त होता है, उसका वर्णन तो उद्गीथप्रकरण में ही कर दिया है । समाधान - ठीक है, वहाँ वर्णन तो किया है; किंतु वहाँ जिस विशेषका उल्लेख नहीं किया, उसके लिये यह ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है; इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है । याज्ञवल्क्यने कहा, ' होता ऋत्विक्-रूप अग्नि से और वाक्से उसका अति-क्रमण किया जा सकता है । ' श्रुति इस वाक्यका अर्थ करती है । भला, जिसके द्वारा यजमान मृत्युको पार करता है वह ' होता ' कौन है? यह बताया यजमानस्य “ यज्ञो वै यजमानः जाता है - वाक् ही यज्ञका अर्थात् " " यज्ञ ही यजमान है " इस श्रुतिके

पृष्ठ 637

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[ अध्याय३ जो यह ऋत्विक् 2 और दि साधनसमूहहै, वह = आसक्तिसहितकर्मरूप है । केवल व्याप्त ही अपितु अभिपन्न अर्थात् में किया हुआ है । सो रूप साधन से यजमान प्तिको पार कर अर्थात् यताका अतिक्रमण कर स्वतन्त्र हो जाता है के वशीभूत नहीं रहता । तु जिस मुख्य प्राणा-मुक्त होता है, उसका दुगीय प्रकरण में ही कर - ठीक है, वहाँ वर्णन किंतु वहाँ जिस ल्लेख नहीं किया, ह ग्रन्थ आरम्भ किया लिये इसमें कोई दोष कहा, ' होता ऋत्विक्-र वाक्से उसका अति-सकता है । ' श्रुति इस करती है । भला, जिसके मृत्युको पार करता है न है? यह बताया ही यज्ञका अर्थात् न है " इस श्रुति ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७ इति श्रुतेः । यज्ञस्य यजमानस्य । या वाक् सैव होताधियज्ञे । कथम् १ तत्तत्र येयं वाग् यज्ञस्य यजमानस्य सोऽयं प्रसिद्धोऽग्निरधिदैवतम् । तदेतत् त्र्यन्नप्रकरणे व्याख्यातम् । स चाग्निर्होता " अग्निर्वै होता " इति श्रुतेः । यदेतद् यज्ञस्य साधनद्वयम्-होता चर्निंग अधियज्ञम्, अध्या- । त्मं च वाक् एतदुभयं साधनद्वयं परिच्छिन्नं मृत्युना आप्तं स्वा-भाविकाशानासङ्गप्रयुक्तेन कर्मणा मृत्युना प्रतिक्षणमन्यथात्वमा-पद्यमानं वशीकृतम् । तद् अनेना-धिदैवतरूपेणाग्निना दृश्यमानं यजमानस्य यज्ञस्य मृत्योरतिमुक्तये भवति । तदेतदाह - स मुक्तिः स होता अग्निर्मुक्तिः, अग्निस्वरूप दर्शनमेव मुक्ति: । यदैव साधनद्वयमग्निरूपेण पश्यति, तदानीमेव हि स्वाभावि- । अनुसार यजमानका होता है । [ तात्पर्य यह है कि ] जो वाणी है, वही अधियज्ञमें यज्ञ यानी यजमान-का होता है । किस प्रकार? इस प्रकार कि यहाँ जो यह यज्ञ यानी यजमानकी वाणी है, वहीं प्रसिद्ध अधिदैव अग्नि है । उस इस अग्नि-की त्र्यन्न प्रकरण में व्याख्या की गयी है । तथा " अग्नि ही होता है " इस श्रुति अनुसार वह अग्नि ही होता है । इस प्रकार यज्ञके जो ये दो साधन अधियज्ञ होता ऋत्विक् और अव्यात्म वाक् हैं; ये दोनों साधन परिच्छिन्न और मृत्युसे व्याप्त हैं तथा स्वाभाविक अज्ञान और आसक्ति-प्रयुक्त कर्मरूप मृत्युसे प्रतिक्षण अन्यथात्वको प्राप्त हो रहे हैं और उसके द्वारा वशमें किये गये हैं । वे इस अधिदेवतरूप अग्निके द्वारा देखे जानेपर यजमानके यज्ञके मृत्युके अतिक्रमणके लिये होते हैं । इसीसे यह कहा है - वह मुक्ति है, वह होतारूप अग्नि मुक्ति है अर्थात् होताको अग्निरूप देखना ही उसकी मुक्ति है । जिस समय भी यजमान इन दोनों साधनों को अग्निरूपसे देखता है, उसी समय वह स्वाभाविक

पृष्ठ 638

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६२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ कादासङ्गान्मृत्योर्विमुच्यते आ- आसक्तिरूप मृत्युसे अर्थात् ध्यात्मिकात् परिच्छिन्नरूपादाधि- | त्मिक और आधिभौतिक परिच्छि भौतिकाच्च । तस्मात् स होता अग्नि- न्नरूपसे मुक्त हो जाता है । अतः रूपेण दृष्टो मुक्तिर्मुक्तिसाधनं यजमानस्य । सा अतिमुक्ति: -यैव च मुक्तिः सातिमुक्तिः, अति-मुक्तिसाधनमित्यर्थः । साधन-द्वयस्य परिच्छिन्नस्य या अधि-देवतारूपेणापरिच्छिनेनाग्निरू-पेण दृष्टिः 9, सा मुक्तिः । यासौ मुक्तिरधिदेवतादृष्टिः सैव ", अध्या-त्माधिभूतपरिच्छेदविषयासङ्गा-स्पदं मृत्युमतिक्रम्य अधिदेव तात्वस्याग्निभावस्य प्राप्तिर्या फलभूता, सा अतिमुक्तिरित्यु-च्यते । तस्या अतिमुक्तेर्मुक्तिरेव साधनमिति कृत्वा सा अति- । मुक्तिरित्याह । यजमानस्य ह्यतिमुक्तिर्वागादी-नामग्न्यादिभाव इत्युद्गीथप्रकरणे अग्निरूपसे देखा गया वह होता मुक्ति यानी यजमानकी मुक्तिका साधन है । वह अतिमुक्ति है— जो ही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति अर्थात् अतिमुक्तिका साधन है । इन दोनों परिच्छिन्न साधनोंकी जो अधिदैवरूप अपरिच्छिन्न अग्नि रूपसे दृष्टि है, वही मुक्ति है । यह जो अधिदेवता दृष्टिरूप मुक्ति है, वही अर्थात् अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदविषयक आसक्तिके स्थान-भूत मृत्युको पार करके जो फल-भूता अधिदैवत्व यानी अग्निभावकी प्राप्ति है, वही अतिमुक्ति कही जाती है । उस अतिमुक्तिका साधन मुक्ति ही है, इसलिये वह अतिमुक्ति है— ऐसा कहा गया है । वागादिका अग्न्यादिभाव यज-मानकी अतिमुक्ति है – इसकी व्याख्यातम् । तत्र सामान्येन व्याख्या उद्गीथप्रकरणमें की जा चुकी है । वहीं मुख्य प्राणदर्शनमात्र-मुख्यप्राणदर्शनमात्रं मुक्ति को ही सामान्यरूपसे मुक्तिका साधन साधनमुक्तम्, न तद्विशेषः । बतलाया है, उसका विशेष वर्णन चागादीनाम् अग्न्यादिदर्शनमिह नहीं किया । यहाँ वागादिमें अग्न्यादि-दृष्टि करना यह विशेष बतलाया

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[ श्रध्याय ३ मृत्युसे अर्थात् आध्या-आधिभौतिक परिच्छि हो जाता है । अतः देखा गया वह होता यजमानकी मुक्तिका वह अतिमुक्ति है— क है, वही अतिमुक्ति -क्तिका साधन है । इन छन्न साधनों की जो परिच्छिन्न अग्नि रूपसे 7 मुक्ति है । यह जो रूप मुक्ति है, वही T त्म और अधिभूत क आसक्तिके स्थान-र करके जो फल-यानी अग्निभावकी नतिमुक्ति कही जाती क्तिका साधन मुक्ति वह आतमुक्ति है— अग्न्यादिभाव यज-मुक्ति है— इसकी प्रकरण में की जा ख्य प्राणदर्शन मात्र-पसे मुक्तिका साधन का विशेष वर्णन वागादिमें अग्न्यादि-विशेष बतलाया ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६२ ९ विशेषो वर्ण्यते । मृत्युप्राप्स्यति । गया है । किंतु उसकी फलभूता मुक्तिस्तु सैव फलभूता योद्गीथ- ' जो मृत्युप्राप्तिसे अतिमुक्ति है, वह तो ब्राह्मणेन व्याख्याता – ' मृत्यु- वही है, जिसकी उद्गीथब्राह्मण-द्वारा ' मृत्युको पार करके दीप्त मतिक्रान्तो दीप्यते ' ( १ । ३ । होता है ' इस प्रकारसे व्याख्या की १२ ) इत्याद्या ॥ ३ ॥ गयी है ॥ ३ ॥

अहोरात्रादिरूप कालसे प्रतिमुक्तिका साधन याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वमहोरात्राभ्या-माप्त ँ सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहो-रात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रि के अधीन है । तब किस साधन-के द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है? [ इसपर याज्ञवल्क्य बोला - ] ' अध्वर्यु - ऋत्विक और चक्षुरूप आदित्यके द्वारा । अध्वर्युं यज्ञका चक्षु ही है । अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ४ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच । स्वा-भाविकादज्ञानासङ्गप्रयात् कर्म-लक्षणान्मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता । तस्य कर्मणः सासङ्गस्य मृत्यो-राश्रयभूतानां दर्शपूर्णमासादि-कर्मसाधनानां यो विपरिणामहेतुः ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा । स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिसे होनेवाले कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या कर दी गयी जो उस आसक्तियुक्त कर्मरूप मृत्यु आश्रयभूत दर्श और पूर्णमासादि कर्मके साधनोंके विपरिणामका हेतुभूतकाल

पृष्ठ 640

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६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय _कालः, तस्मात् कालात् पृथगति -मुक्तिर्व तथ्येतीदमारभ्यते, क्रिया-नुष्ठानव्यतिरेकेणापि प्रागूर्ध्वं च क्रियायाः साधनविपरिणामहेतु-स्वेन व्यापारदर्शनात् कालस्य । तस्मात् त् पृथक्कालादतिमुक्तिर्वक्तव्ये-त्यत आह-यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तम्, स च कालो द्विरूपः - अहोरात्रादि-लक्षणः, तिथ्यादिलक्षणश्च । तत्रा-होरात्रादिलक्षणात्तावदतिमुक्ति-माह - अहोरात्राभ्यां हि सर्व जायते वर्धते विनश्यति च, तथा यज्ञसाधनं च । यज्ञस्य यजमानस्य चक्षुरध्व-र्युश्च । शिष्टान्यञ्चराणि पूर्ववन्ने-यानि । यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्व साधनद्वयमध्यात्माधिभूतपरिच्छेदं हित्वा अधिदैवतात्मना दृष्टं यत् स ३ / है, उस कालसे पृथक् जो अतिमुक्ति है [ अर्थात् जो उस कालसे मुक्त होनेका साधन है ] उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ · किया जाता है, क्योंकि क्रियाके | अनुष्ठान के बिना भी क्रिया के पूर्वं और पश्चात् उसके साधनों के विपरिणाम के हेतुरूपसे कालका व्यापार देखा जाता है । अत: कालसे पृथक् अतिमुक्तिका वर्णन करना आवश्यक है, इसलिये श्रुति कहती है-यह जो कुछ है सब दिन और रात्रि से व्याप्त है, वह काल दो प्रकारका है - दिन - रात्रिरूप और तिथ्यादिरूप । उनमें से पहले अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है - दिन - रात से ही सब उत्पन्न होता, बढ़ता और नाशको प्राप्त होता है । इसी प्रकार यज्ञके साधन भी उन्हींसे उत्पन्नहोते, बढ़ते और नष्ट होते हैं । यज्ञ यानी यजमानके नेत्र और अध्वर्यु — शेष अक्षरोंको पूर्ववत् लगाना चाहिये । अर्थात् यजमान के नेत्र और अध्वर्यु ये दोनों साधन अपने अध्यात्म और अधिभूत परि-च्छेदको त्यागकर जब अधिदेवरूप-से देखे जाते हैं तो वही इनकी मुक्ति