बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 641–650

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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[ अध्याय३ लसे पृथक् जो अतिमुक्ति - जो उस कालसे मुक्त धन है ] उसका वर्णन इसलिये यह आरम्भ ना है, क्योंकि क्रियाके बिना भी क्रिया के पूर्व त् उसके साधनोंके के हेतुरूपसे कालका जाता है । अतः कालसे मुक्तिका वर्णन करना इसलिये श्रुति कहती है-कुछ है सब दिन और प्त है, वह काल दो - दिन रात्रिरूप और उनमें से पहले रूप कालसे अतिमुक्ति ती है - दिन - रात से ही होता, बढ़ता और होता है । इसी प्रकार नी उन्हींसे उत्पन्न होते, होते हैं । यजमानके नेत्र और अक्षरोंको पूर्ववत् ये । अर्थात् यजमान के वर्यु ये दोनों साधन और अधिभूत परि-कर जब अधिदैवरूप-तो वही इनकी मुक्ति ब्राह्मण १ ] मुक्तिः सोऽध्वर्युरादित्यभावेन । दृष्टो मुक्तिः । सैव मुक्तिरेवाति-मुक्तिरिति ॥ पूर्ववत् आदित्यात्म-भावमापन्नस्य हि नाहोरात्रे सम्भवतः ॥ ४ ॥

तिथ्यादिरूप कालसे इदानीं तिथ्यादिलक्षणादति मुक्तिरुच्यते-६३१. है | आदित्यभावसे देखा हुआ वह अध्वर्यु मुक्ति ही है । पूर्ववत् वह मुक्ति ही अतिमुक्ति है, क्योंकि आदित्यभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये दिन - रात होने सम्भव नहीं

हैं ॥। ४ ॥

प्रतिमुक्तिका साधन | अब तिथ्यादिरूप कालसे अति-मुक्ति बतलायी जाती है-याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद । सर्व पूर्वपक्षापर-पक्षाभ्यामाप्त ँ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यु-द्वात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ५ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है; सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षद्वारा वशमें किया हुआ है }, किस उपाय यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है? ' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- ] ' उद्गाता ऋत्विक्से और वायुरूप प्राणसे; क्योंकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है । तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ५ ॥

यदिदं सर्वम् — अहोरात्रयोर- यदिदं सर्वम् - ये जो अविशिष्ट विशिष्टयोरादित्यः कर्ता, न प्रति-- ( वृद्धिक्षयशून्य वृद्धि ) दिन दिन - रात है इन सबका कर्ता आदित्य किंतु वह प्रतिपदादि तिथियोंका पदादीनां तिथीनाम्; तासां तु कर्ता नहीं है; उन प्रतिपदादिके तो वृद्धि और क्षय देखे जाते वृद्धिक्षयोपगमनेन प्रतिपत्प्रभृतीनां हैं, अतः उनका कर्ता तो

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६३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ 222 चन्द्रमाः कर्ता । अतस्तदापच्या / चन्द्रमा है । अतः आदित्यभावकी प्राप्ति से जैसे अहोरात्रका अतिक्रमण पूर्वपक्षापरपक्षात्ययः, आदित्या - होता है, उसी प्रकार चन्द्रभावकी प्राप्तिसे पूर्वपक्ष और अपरपक्षका पस्था अहोरात्रात्ययवत् । अतिक्रमण किया जा सकता है । तत्र यजमानस्य प्राणो वायुः, वहाँ ( काण्वशाखाकी श्रुतिमें ) स एवउद्गाता - इत्युद्गीथब्राह्मणे- यजमानका प्राण वायु है । वही ऽवगतम् ' वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत् ' इति च निर्धारि तम् । ' अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः ' इति च । प्राणवायुचन्द्रमसामेकत्वाच्चन्द्रम-सा वायुना चोपसंहारे न कश्चिद् विशेषः । एवं मन्यमाना श्रुति-चयुना अधिदैवतरूपेणोपसंहरति । अपि च वायुनिमित्तौ हि वृद्धित्तयौ चन्द्रमसः । तेन विथ्या दिलक्षणस्य कालस्य कर्तुरपि कारयिता वायुः । अतो वायुरूपा-पन्नस्तिध्यादिकालादतीतो भव-तीत्युपपन्नतरं भवति । तेन । उद्गाता है - यह बात उद्गीथ-ब्राह्मणमें जानी गयी थी और यह निश्चय किया गया था कि उसने वाक्से और प्राणसे उद्गान किया इस प्राणका जल शरीर है और यह चन्द्र ज्योतीरूप है । वायु, प्राण और चन्द्रमाकी एकता होनेके कारण यदि [ उद्गीथब्राह्मणोक्त और उपर्युक्त श्रुतियोंका ] चन्द्रमा और वायुरूपसे [ अलग - अलग ] उपसंहार कोई किया गया है तो उसमें अन्तर नहीं है । ऐसा मानकर ही श्रुति इस मन्त्रका अधिदैव वायु-रूपसे उपसंहार करती है । इसके सिवा चन्द्रमा वृद्धि और क्षय भी वायुके ही कारण हैं । अतः वायु तिथ्यादिरूप कालके कर्ता ( चन्द्रमा ) का भी कराने-वाला है । इसलिये वायुरूपको प्राप्त हुआ पुरुष तिथ्यादिरू पकाल-से पार हो जाता है- यह कथन और भी युक्तियुक्त है । अतः अन्य श्रुति ( माध्यन्दिनीय

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[ अध्याय३ । अतः आदित्यभावको अहोरात्रका अतिक्रमण उसी प्रकार चन्द्रभावकी पक्ष और अपरपक्षका किया जा सकता है । ( काण्वशाखाकी श्रुतिमें ) प्राण वायु है । वही है - यह बात उद्गीथ-नी गयी थी और यह या गया था कि उसने प्राणसे उद्गान किया जल शरीर है और यह रूप है । वायु, प्राण नाकी एकता होनेके [ उद्गीथब्राह्मणोत श्रुतियोंका ] चन्द्रमा पसे [ अलग - अलग ] या गया है तो उसमें नहीं है । ऐसा मानकर मन्त्रका अधिदैव वायु-करती है । वा चन्द्रमा वृद्धि - वायुके ही कारण तिथ्यादिरूप कालके बा ) का भी कराने-इसलिये वायुरूपको तिथ्यादिरूपकाल-जाता है - यह भी युक्तियुक्त है । ति ( माध्यन्दिनीय ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३ श्रुत्यन्तरे चन्द्ररूपेण दृष्टिर्मुक्ति रतिमुक्तिश्व । इह तु काण्वानां साधनद्वयस्य तत्कारणरूपेण चाय्वात्मना दृष्टिर्मुक्तिरतिमुक्ति-श्चेति न श्रुत्योर्विरोधः ॥ ५ ॥

| शाखा ) में जो चन्द्ररूपसे दृष्टि है, वह मुक्ति और अतिमुक्ति है । परंतु यहाँ काण्वशाखावालोंके मतमें अहोरात्र और तिथि आदि दोनों ही साधनोंके कारणभूत वायुभावसे जो दृष्टि है, वह मुक्ति और अति-मुक्ति है - इसलिये इन श्रुतियों में | विरोध नहीं है ॥ ५ ॥

परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको मृत्योः कालादतिमुक्तिर्व्या । ख्याता यजमानस्य । सोऽति -मुच्यमानः केनावष्टम्भेन परिच्छेद-विषयं मृत्युमतीत्य फलं प्राप्नोति — प्रतिमुच्यत इत्युच्यते-पार करनेके श्राश्रयका वर्णन यजमानकी मृत्युरूप कालसे अतिमुक्ति होनेकी व्याख्या की गयी । वह अतिमुक्त होता हुआ किस आश्रय से परिच्छेद के विषय-भूत मृत्युको पार करके फल प्राप्त करता — अतिमुक्त होता है - सो बतलाया जाता है-याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्ब-मित्र केनाक्रमेण यजमानः स्वर्ग लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ सम्पदः ॥ ६ ॥

' हे. याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब - सा है । अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढ़ता है । ' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा - ] ' ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे

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६३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ब्रह्मा यज्ञका मन ही है 1 । और यह जो मन है, वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है । ' इस प्रकार अतिमोक्षों का वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥

यदिदं प्रसिद्धमन्तरिक्षमाकाशः अनारम्बणम् अनालम्बनम् इव-शब्दादस्त्येव तत्रालम्बनम्, तत्तु न ज्ञायत इत्यभिप्राय: । यत्तु तदज्ञायमानमालम्बनम्, तत् सर्वनाम्ना केनेति पृच्छयतेः अन्यथा फलप्राप्तेरसम्भवात् । येनावष्टम्भेनाक्रमेण यजमानः कर्मफलं प्रतिपद्यमानः अति-मुच्यते, किं तदिति प्रश्न-विषयः । केनाक्रमेण यजमानः स्वर्ग लोकमाक्रमत इति, स्वर्गं लोकं फलं प्राप्नोत्यतिमुच्यत इत्यर्थः । ब्रह्मणत्विजा मनसा चन्द्रेणे-त्यक्षरन्यासः पूर्ववत् । तत्राध्यात्मं यज्ञस्य यजमानस्य यदिदं प्रसिद्धं मनः, सोऽसौ चन्द्रोऽधिदैवम् । मनोऽध्यात्मं चन्द्रमा अधिदैवत- । ! यह जो प्रसिद्ध अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश है, वह अनारम्बण - अना-लम्बन - सा है । ‘ इव ' शब्दसे यह अभिप्राय है कि इसमें आलम्बन तो है किंतु वह जाना नहीं जाता । यहाँ जो ज्ञात न होनेवाला आलम्बन है, वही ' केन ' इस सर्व-नामद्वारा पूछा जाता है । नहीं तो [ यदि आलम्बनका अभाव माना जायगा तो ] फलप्राप्ति ही सम्भव न होगी । यहाँ प्रश्नका विषय यह है कि जिस आश्रयके द्वारा यजमान कर्मफलको प्राप्त होता हुआ अति-मुक्त होता है, वह क्या है? तात्पर्य यह है कि यजमान किस आश्रयसे स्वर्गलोकपर आरूढ़ होता है, यानी स्वर्गलोकरूप फलको प्राप्त करता अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है । ब्रह्मारूप ऋत्विक्से और मन-रूप चन्द्रमासे - इन अक्षरों की योजना पूर्ववत् करनी चाहिये । यहां यज्ञ यानी यजमानका जो यह प्रसिद्ध अध्यात्म मन है, वही यह अधिदैव चन्द्रमा है । मन अध्यात्म है औ

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[ अध्याय ३ वही यह चन्द्रमा है, वह इस प्रकार अतिमोक्षोंका है ॥ ६ ॥

सिद्ध अन्तरिक्ष अर्थात् वह अनारम्बण - अना-है । ' इव ' शब्दसे यह कि इसमें आलम्बन तो - जाना नहीं जाता । ज्ञात न होनेवाला , वही ' केन ' इस सर्व-जाता है । नहीं तो म्बनका अभाव माना फलप्राप्ति ही सम्भव हाँ प्रश्नका विषय यह श्रयके द्वारा यजमान प्त होता हुआ अति-- वह क्या है? तात्पर्यं नमान किस आश्रयसे आरूढ़ होता है, यानी फलको प्राप्त करता त हो जाता है । ऋत्विक्से और मन--इन अक्षरोंकी न्तु करनी चाहिये । नी यजमानका जो अध्यात्म मन है, चन्द्रमा अध्यात्म है और ब्राह्मण १ ] मिति हि प्रसिद्धम् । स एव । चन्द्रमा ब्रह्मर्त्विक् । तेनाधिभूतं ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपमध्यात्मं च मनस एतद्द्वयमपरिच्छिन्नेन चन्द्रमसो रूपेण पश्यति । तेन चन्द्रमसा मनसावलम्बनेन कर्म-फलं स्वर्ग लोकं प्राप्नोत्यतिमुच्यते इत्यभिप्रायः । इतीत्युपसंहारार्थं वचनम् । इत्येवम्प्रकारा मृत्यो-रतिमोक्षाः । सर्वाणि हि दर्शन -प्रकाराणि यज्ञाङ्गविषयाण्यस्मिन्न-वसर उक्तानीति कृत्वोपसंहारः । इत्यतिमोक्षाः, एवम्प्रकारा श्रति-मोक्षा इत्यर्थः । अथ सम्पदः – अथाधुना सम्पद उच्यन्ते । सम्पन्नाम केन-चित्सामान्येनाग्निहोत्रादीनां कर्म-णां फलवतां तत्फलाय सम्पादनं सम्पत्फलस्यैव वा । सर्वोत्साहेन फलसाधनानुष्ठाने प्रयतमानानां ६३५ चन्द्रमा अधिदैवत है - यह प्रसिद्ध ही है । वही चन्द्रमा ब्रह्मा ऋत्विक् है । इसीसे अधिभूत ब्रह्मा के और अध्यात्म मनके जो परिच्छिन्नरूप हैं- इन दोनोंको चन्द्रमाके अपरि-छिन्नरूपसे देखता है । उस चन्द्रमा-रूप मनको आश्रय मानकर उससे अपने कर्मफलभूत स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है - ऐसा इसका अभिप्राय है । ' इत्यतिमोक्षा: ' इस वाक्यमें ' इति ' पद उपसंहारके लिये कहा गया है । अर्थात् इतने प्रकारके मृत्युसे अतिमोक्ष हैं । इस बीचमें यज्ञाङ्गविषयक सभी दर्शन - प्रकारों-का वर्णन कर दिया गया है— इसलिये यह उपसंहार किया है । ' इत्यतिमोक्षाः ' अर्थात् इतने प्रकार-अतिमोक्ष हैं । ' अथ सम्पदः ' - अब सम्पदोंका वर्णन किया जाता है । ' सम्पद् ' का तात्पर्य यह है कि किसी भी समानता से अग्निहोत्रादि फलयुक्त कर्मों का उस फलके लिये सम्पादन ( आरोप ) किया जाय, अथवा सम्पद्के फल ( देवलोकादि ) का ही [ उज्ज्वलत्वादि सामान्यके कारण आज्यादि आहुतियोंमें सम्पादन किया जाय ] | जो लोग पूर्ण उत्साहसे किसी | फलके साधनका अनुष्ठान करनेके

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६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ केनचिद्वैगुण्येनासम्भवः । तदि । लिये प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी भी दोषके कारण उसकी प्राप्ति दानीमाहिताग्निः सन् यत् किश्चित् । असम्भव हो जाती है । अत: इस कर्माग्निहोत्रादीनां यथासम्भव- समय [ सम्पदके द्वारा ] पुरुष मादाय आलम्बनीकृत्य कर्मफल- | आहिताग्नि होकर अग्निहोत्रादि-मेंसे जिसका करना सम्भव हो विद्वत्तायां सत्यां यत्कर्मफलकामो ऐसे किसी कर्मको लेकर उसीके भवति, तदेव सम्पादयति । अन्यथा राजसूयाश्वमेध पुरुषमेध सर्वमेधलक्षणानाम् श्रधिकृतानां त्रैवर्णिकानामप्यसम्भवः - – तेषां तत्पाठः स्वाध्यायार्थ एव केवलः स्यात्, यदि तत्फलप्राप्त्युपायः -कश्चन न स्यात् । तस्मात्तेषां सम्पदैव तत्फलप्राप्तिः, तस्मात् सम्पदामपि फलवन्त्रम्, अतः सम्पद आरभ्यन्ते ॥ ६ ॥

१. भावनाद्वारा किसी अन्य वस्तुका है । राजसूयादि कर्म बहुत द्रव्यसाध्य त्रैर्वाणकोंको अधिकार भी नहीं है । ऐसी उत्पन्न होनेके कारण उनमेंसे आश्रयसे, कर्म फलका ज्ञान होने-पर, जिस कर्म - फलकी इच्छा होती है उसीका सम्पादन कर लेता है । नहीं तो राजसूय, अश्वमेध, पुरुष-मेध एवं सर्वमेधरूप कर्मों के अधि-कारी त्रैर्वाणकोंको भी उनका फल मिलना असम्भव है । यदि [ धना-भावादिके कारण ] उन राजसूयादि-के फलकी प्राप्तिका कोई उपाय न हो तो उनका वह पाठ केवल स्वाध्यायके लिये ही होगा । अतः उन्हें उनकी सम्पत्तिसे ही उनके फलकी प्राप्ति हो जायगी । इसलिये सम्पदोंकी भी फलवत्ता है; अतः सम्पदोंका आरम्भ किया जाता | है ॥ ६ ॥

अन्यमें आरोप करना ' सम्पद् ' कहलाता हैं तथा उनमेंसे प्रत्येक कर्मका सभी अवस्था में जो धनाभाव या अन्य वर्ण में फल प्राप्त कर सकते हैं । यदि किसी कर्मको नहीं कर सकते, वे सम्पद्द्द्वारा उनका प्रतिपादन करनेवाला सम्पत् - कर्म न होता तो उनके लिये उन यज्ञोंका लिये सम्पदोंका प्रतिपादन शास्त्र केवल स्वाध्यायमें ही उपयोगी हो सकता बहुत उपयोगी है । था; इस-

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[ अध्याय३ न कर रहे हैं, उन्हें किसी कारण उसकी प्राप्ति हो जाती है । अतः इस सम्पदके द्वारा ] पुरुष न होकर अग्निहोत्रादि-का करना सम्भव हो कर्मको लेकर उसीके कर्म फलका ज्ञान होने-कर्म - फल की इच्छा होती सम्पादन कर लेता है । जसूय, अश्वमेध, पुरुष-मेधरूप कर्मों के अधि-कोंको भी उनका फल सम्भव है | यदि [ धना-कारण ] उन राजसूयादि-का कोई उपाय न का वह पाठ केवल लिये ही होगा । अत: सम्पत्तिसे ही उनके हो जायगी । इसलिये फलवत्ता है; अतः नारम्भ किया जाता करना ' सम्पद् ' कहलाता से प्रत्येक कर्मका सभी धनाभाव या अन्य वर्ण में ने, वे सम्पद्द्द्वारा उनका उनके लिये उन यज्ञोंका गी हो सकता था; इस-ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७ शस्त्रसम्बन्धी ऋचाएँ और उनसे प्राप्त होनेवाला फल याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्भिर्होता-स्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं. ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' आज कितनी ऋचाओंके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र - शंसन करेगा? ' [ याज्ञवल्क्यने कहा- ] ' तीनके द्वारा । ' [ अश्वल– ] ' वे तीन कौन - सी हैं? [ याज्ञवल्क्य - ] ' पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या । ' [ अश्वल - ] ' इनसे यजमान किसको जीतता हे? ” [ याज्ञवल्क्य— ] ‘ यह जितना जीत लेता है ] ' ॥ ७ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच अभि-मुखीकरणाय । कतिभिरयमद्यग्भि हतास्मिन् यज्ञे कतिभिः कति -सङ्ख्याभिर्ऋग्भिर्ऋग्जातिभिः अयं होत विंगस्मिन यज्ञे करिष्यति शस्त्रं शंसति । आहेतरः- तिसृभि ऋग्जातिभिः । इत्युक्तवन्तं प्रत्या-हेतरः- कतमास्तास्तिस्र इति । सङ्ख्येयविषयोऽयं प्रश्नः, पूर्वस्तु सङ्ख्याविषयः । भी प्राणिसमुदाय है । [ उस सबको अपने अभिमुख करनेके लिये अश्वलने ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा कहा । ' कतिभिरयमर्द्याग्भर्होतास्मिन् यज्ञे - आज यह होता इस यज्ञमें कितनी ऋचाओं अर्थात् कितनी संख्यावाली ऋग्जातियोंद्वारा शस्त्र-शंसन करेगा? ' इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, ' तीन ' ऋग्जातियोंद्वारा । ' इस प्रकार कहनेवाले याज्ञवल्क्यसे अश्वल कहा, ' वे तीन कौन - कौन हैं? " यह प्रश्न जिनकी [ तीन - यह ] संख्या की गयी है, उन ऋग्जातियोंके विषयमें है तथा इससे पहला प्रश्न उनकी संख्या के विषय में था ।!

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६३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय पुरोनुवाक्या च - प्राग् याग-कालाद्याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः पुरोनुवाक्ये-त्युच्यते । यागार्थं याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिर्याज्या । शस्त्रार्थ याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः शस्या । सर्वास्तु याः काश्चन ऋचः; ताः स्तोत्रिया वा अन्या वा सर्वा एतास्वेव तिसृषु ऋग्जातिष्वन्तर्भवन्ति किं ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति - श्रतश्च सङ्ख्या-सामान्याद् यत्किञ्चित्प्राण-भृज्जातम्, तत् सर्वं जयति तत् सर्वं फलजातं सम्पादयति सङ्-ख्यादिसामान्येन ॥ ७ ॥

३ ' पुरोनुवाक्या च ' – जो ऋचाएँ यागकालसे पहले प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ' पुरोनुवाक्या ' कही जाती हैं । जो ऋचाएं यागके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति । ' याज्या ' कहलाती हैं । तथा जो ऋचाएँ शस्त्रकर्मके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ' शस्या ' कही जाती हैं । जितनी भी ऋचाएं हैं - वे स्तोत्रिया हों अथवा कोई अन्य – इन तीन ऋग्जातियोंके ही अन्तर्गत हैं ' उनके द्वारा पुरुष किसपर जय प्राप्त करता है ' इसपर कहते हैं-| यह जो कुछ प्राणिसमुदाय है, उसे ता है | अतः [ तीन ऋग्जाति और तीन लोकोंकी ] संख्या में समानता होनेके कारण यह जितना प्राणिसमुदाय है, वह इस सबको जीत लेता है । अर्थात् संख्यादिमें समानता होनेके कारण वह उस समस्त फलसमूहका सम्पादन कर लेता है ॥ ७ ॥

होमसम्बन्धिनी आहुतियाँ और उनसे प्राप्त होनेवाले फल याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन्यज्ञ आहुतीहोंष्यतीति तिस्स्र इति कतमास्तास्तिस्रइति या

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[ अध्याय३ नुवाक्या च ' - जो ऋचाएँ से पहले प्रयुक्त होती हैं, ति ' पुरोनुवाक्या ' कही I जो ऋचाएँ यागके लिये ती हैं, वह ऋग्जाति कहलाती हैं । तथा जो शस्त्रकर्मके लिये प्रयुक्त वह ऋग्जाति ' शस्या ' हैं । जितनी भी ऋचाएँ त्रिया हों अथवा कोई न तीन ऋग्जातियोंके हो द्वारा पुरुष किसपर जय है ' इसपर कहते हैं-प्राणिसमुदाय है, उसे है | अतः [ तीन ॠग्जाति लोकों की ] संख्या में होनेके कारण यह जितना यहै, वह इस सबको है । अर्थात् संख्यादिमें होनेके कारण वह उस समूहका सम्पादन कर ७ ॥ T प्त होनेवाले फल वाध्वर्युरस्मिन् यज्ञ नास्ति इति या ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ ९ हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधि-शेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देव-लोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्ज-यत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' आज इस यज्ञमें यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा! ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तीन । ' [ अश्वल- ] ' वे तीन कौन - कौन - सी हैं, [ याज्ञवल्क्य - ] ' जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वोके ऊपर लीन हो जाती हैं । ' [ अश्वल - ] ' इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं; उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है । जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त शब्द करनेवाला है । जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है; क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है ' ॥ ८ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्व-वत् । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होग्यतीति, कत्या-हुतिप्रकाराः १ तिस्र इति, कत-मास्तास्तिस्र इति पर्ववत् । इतर ग्रह - या हुता उज्ज्व-' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अपने अभिमुख करनेके लिये ] कहा, ' आज यह अध्वर्युं इस यज्ञमें कितनी आहुतियाँ हवन करेगा? ' अर्थात् आहुतियोंके कितने प्रकार हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ‘ तीन । ’ फिर पूर्ववत् पूछता है - ' कौन - कौन तीन? " इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) कहता है - ' जो हवन की जानेपर

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६४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ लन्ति समिदाज्याहुतयः या हुता अतिनेदन्तेऽतीव शब्द कुर्वन्ति मांसाद्याहुतयः, या हुता अधिशेरतेऽध्यधो गत्वा भूमेरधि-शेरते पयः सोमाहुतयः । किं ताभिर्जयतीति, ताभिरेवं निर्वर्तिताभिराहुतिभिः किं जय-तीति । या आहुतयो हुता उज्ज्वलन्त्युज्ज्वलन युक्ता आहु तयो निर्वर्तिताः, फलं च देव-लोकाख्यमुज्ज्वलमेव, तेन सामा-न्येन या मयता उज्ज्वलन्त्य श्राहुतयो निर्वर्त्यमानास्ता एताः साक्षाद्देवलोकस्य कर्मफलस्य रूपं देवलोकाख्यं फलमेव मया निर्व-त्यंत इत्येवं सम्पादयति । या हुता अतिनेदन्ते आहुतयः पितृलोकमेव ताभिर्जयति कुत्सित-शब्दकर्तृत्वसामान्येन । पितृ-/ प्रज्वलित होती हैं, वे समधू और घृतकी आहुतियाँ, जो होम को जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, वे आहुतियाँ और जो होम की जानेपर अधिशयन करती अर्थात् नीचे पृथ्वीपर जाकर लीन हो जाती हैं, वे दुग्ध और सोमकी आहुतियाँ । ' ' इनसे यजमान किसको जीतता है? अर्थात् इस प्रकार सम्पन्न की हुई उन आहुतियोंसे यजमान क्या जीत लेता है । ' [ याज्ञवल्क्य - ] जो हवन की हुई आहुतियां उज्ज्वलित होती हैं अर्थात् उज्ज्वलनयुक्त होती हैं, उनका देवलोकसंज्ञक फल भी उज्ज्वल ही है । इन दोनोंमें यह समानता होनेके कारण यजमान इस प्रकार सम्पादन ( भावना ) करता है कि मेरेद्वारा जो ये उज्ज्वलित आहुतियाँ दी जा रही हैं, वे साक्षात् इस कर्मके फलस्व-रूप देवलोकका रूप हैं, अतः इनके द्वारा मैं देवलोकरूप फलको निष्पन्न कर रहा हूँ । जो आहुतियाँ होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे यज-मान पितृलोकको ही जीतता है, क्योंकि कुत्सित शब्द करनेवाले होनेसे इनके साथ उनकी समानता है ।