बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 651–660

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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[ अध्याय३ होती हैं, वे समिघ् और बाहुतियाँ, जो होम की अत्यन्त शब्द करती हुतियाँ और जो होम की अधिशयन करतीं अर्थात् चीपर जाकर लीन हो वे दुग्ध और सोमकी I यजमान किसको जीतता इस प्रकार सम्पन्न की हुतियोंसे यजमान क्या है! ' [ याज्ञवल्क्य - ] जो हुई आहुतियां उज्ज्वलित र्थात् उज्ज्वलनयुक्त होती देवलोकसंज्ञक फल भी है । इन दोनों में यह होनेके कारण यजमान सम्पादन ( भावना ) कि मेरेद्वारा जो ये आहुतियाँ दी जा रही T त् इस कर्मके फलस्व-कका रूप हैं, अतः इनके देवलोकरूप फलको - रहा हूँ । हुतियाँ होम की जानेपर द करती हैं, उनसे यज-कको ही जीतता है, व्रत शब्द करनेवाले होने से उनकी समानता है । ब्राह्मण १. ] शाङ्करभाष्यार्थ लोकसम्बद्धायां हि संयमन्यां पुर्यां वैवस्वतेन यात्यमानानां ' हा हताः स्म मुञ्च मुञ्च ' इति शब्दो भवति । तथावदानाहुतयः तेन पितृलोकसामान्यात् पितृ-लोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति । या हुता अधिशेरते मनुष्य-लोकमेव ताभिर्जयति भूम्युपरि सम्बन्धसामान्यात् । अथ इव ह्यध एव हि मनुष्यलोकः उपरितनान् साध्याँल्लोकानपेक्ष्य, अथवाधोगमनमपेक्ष्य । अतो मनुष्यलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति पयः सोमाहुति -निर्वर्तनकाले ॥ ८ ॥

६४१ । पितृलोकसे सम्बद्ध संयमनीपुरीमें यमराजके द्वारा यातना भोगते हुए जीवोंका ' हाय मरे! छोड़! छोड़! ' ऐसा शब्द होता रहता है । इसी प्रकार अवदान - आहुतियाँ भी शब्द । करनेवाली हैं । अतः पितृलोकसे समानता होनेके कारण इनसे मेरे-द्वारा पितृलोक ही प्राप्त किया जाता है, इस प्रकार यजमान सम्पादन करता है । जो आहुतियाँ होम की जाने-पर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे यजमान मनुष्यलोकपर ही विजय प्राप्त करता है; क्योंकि पृथ्वी के ऊपरी भागसे सम्बद्ध होनेमें उन दोनों की समानता है । मनुष्य-लोक ऊपरके साधनसाध्य लोकोंकी अपेक्षा अध: - नीचे ही स्थित है । अथवा अधोगमनकी अपेक्षासे वे मनुष्यलोकको ही जीतते हैं । अत: दूध या सोमकी आहुति देते समय यजमान यही सम्पादन करता है कि इससे मेरेद्वारा मनुष्यलोक ही प्राप्त किया जाता है ॥ ८ ॥

ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन वृ ० उ ० ४१-

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६४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव एवेत्यनन्तं स तेन लोकं जयति ॥ ६ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओं द्वारा यज्ञकी रक्षा करता है? ' [ याज्ञवल्क्य- ] ' एकके द्वारा । ' [ अश्वल- ] ' वह एक देवता कौन है? ' [ याज्ञवल्क्य- ] ' वह मन ही है । अनन्त हैं; अतः उस मनसे यजमान याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्व-वत् । श्रयमृत्विग्ब्रह्मा दक्षिणतो ब्रह्मासने स्थित्वा यज्ञं गोपायति । कतिभिर्देवताभिर्गोपायतीति प्रा-सङ्गिकमेतद्बहुवचनम्, एकया हि देवतया गोपायत्य सौ, एवं ज्ञाते बहुवचनेन प्रश्नो नोपपद्यते स्वयं जानतः । तस्मात् पूर्वयोः कण्डिकयोः प्रश्न प्रतिवचनेषु कतिभिः कति तिसृभिः तिस्र इति प्रसङ्गं दृष्ट्वेहापि बहुवचने-नैव प्रश्नोपक्रमः क्रियते । अथवा प्रतिवादिव्यामोहार्थं बहुवचनम् मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त लोकको जीत लेता है ' ॥ ३ ॥

' हे याज्ञवल्क्य । ' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अभिमुख करनेके लिये ] कहा ' यह ब्रह्मानामक ऋत्विक् दक्षिणकी ओर ब्रह्मा के लिये निश्चित आसनपर बैठकर यज्ञकी रक्षा करता है । वह कितने देवताओं-द्वारा उसकी रक्षा करता है? ' यहाँ देवता शब्दमें जो बहुवचन है, वह प्रसङ्गवश है; क्योंकि ब्रह्मा एक ही देवतासे यज्ञकी रक्षा करता है-यह स्वयं जानते हुए व्यक्ति के लिये बहुवचनद्वारा प्रश्न करना उचित । नहीं है । अत: पहली दो कण्डिकाओं- । के प्रश्न और उत्तरोंमें ‘ कतिभिः कति ' और ' तिसृभिः तिस्रः ' ऐसा प्रसङ्ग देखकर यहाँ भी प्रश्नका आरम्भ बहुवचन से ही किया जाता है । अथवा यह बहुवचन अपने प्रतिवादीको भ्रममें डालनेके लिये भी हो सकता है । -:.

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[ अध्याय ३ देवा अनन्तमेव स ' आज यह ब्रह्मा यज्ञमें यज्ञकी रक्षा करता है? " देवता कौन है त है और विश्वेदेव भी को जीत लेता है ' ॥ ॥ ज्ञवल्क्य । ' ऐसा अश्वलने अभिमुख करनेके लिये ] इ ब्रह्मानामक ऋत्विक् ओर ब्रह्मा के लिये निश्चित - बैठकर यज्ञकी रक्षा । वह कितने देवताओं-नकी रक्षा करता है? ' शब्द में जो बहुवचन है, वश है; क्योंकि ब्रह्मा एक से यज्ञकी रक्षा करता है-जानते हुए व्यक्ति के लिये रा प्रश्न करना उचित तः पहली दो कण्डिकाओं-और उत्तरोंमें ' कतिभिः ' तिसृभिः तिस्रः ' ऐसा कर यहाँ भी प्रश्नका बहुवचन से ही किया जाता वा यह बहुवचन अपने को भ्रममें डालनेके लिये ता है । -ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४३ इतर कयेति । एका सा! इसपर ( याज्ञवल्क्य ) कहते देवता यया दक्षिणतः स्थित्वा ब्रह्मा आसने यज्ञं गोपायति । कतमा सैकेति । मन एवेति, मनः सा देवता । मनसा हि ब्रह्मा व्याप्रियते ध्यानेनैव । " तस्य यज्ञस्य मनश्च वाक्च वर्तनी तयोरन्यतरां मनसा संस्क-रोति ब्रह्मा " ( छा ० उ ० ४ । १६ । १ ) इति श्रुत्यन्तरात् । तेन मन एव देवता तया मनसा हि गोपायति ब्रह्मा यज्ञम् । तच्च मनो वृत्तिभेदेनानन्तम् । वैशब्दः प्रसिद्धावद्योतनार्थ: । प्रसिद्धं मनस श्रानन्त्यम् । तदा- । नन्त्याभिमानिनो देवाः, अनन्ता वै विश्वे देवाः । " सर्वे देवा यत्रैकं भवन्ति ” इत्यादिश्रुत्यन्त-रात् । तेन चानन्त्य सामान्यादन-न्तमेव स तेन लोकं जयति ॥९ ॥ |

हैं, ' एकया इति; जिसके द्वारा दक्षिणकी ओर आसनपर बैठकर ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है, वह देवता एक है । ' ' वह एक देवता कौन है? " इसपर कहते हैं— वह मन ही है - वह देवता मन ही है । मनके द्वारा ध्यान करके ही ब्रह्मा अपना कार्य करता है । “ उस यज्ञके मन और वाक् - ये दो मार्गं हैं, उनमें से एक ( वाक् ) का संस्कार ब्रह्मा मन यानी मौनसे करता है " इस अन्य श्रुतिसे भी यही कहा गया है । अतः मन ही देवता है, उस मनसे ही ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है । और वह मन वृत्तिभेदसे अनन्त है । ' वै ' शब्द प्रसिद्ध अर्थंका द्योतन करनेके लिये है । मनका अनन्तत्व प्रसिद्ध है । उस अनन्तत्वके अभि-मानी जो देव हैं, वे सम्पूर्ण देव भी अनन्त हैं । " जिस मनमें समस्त देव एक ( अभिन्न ) हो जाते हैं " इत्यादि अन्य श्रुतिसे भी यही प्रकट होता है । अतः अनन्ततामें समानता होनेके कारण वह उसके द्वारा अनन्तलोकको ही जीत लेता है ॥ ६ ॥

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६४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कत-मास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या कि ताभिर्जयतीति पृथिवीलोक-मेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया युलोक शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥ १० ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने कहा, ' आज इस यज्ञ में उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' तीनका ' [ अश्वल - ] ' वे तीन कौन - सी हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या । ' [ अश्वल - ] इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे कौन - सी हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' प्राण ही पुरोनुवाक्या है; अपान याज्या है और व्यान शस्या है । ' [ अश्वल - ] ' इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है? ” [ याज्ञवल्क्य - ] पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर और शस्यासे द्युलोकपर

विजय प्राप्त करता है । इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥ १० ॥

याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्व- ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा अश्वलने ` चत् । कति स्तोत्रियाः स्तोष्यती- पूर्ववत् [ अभिमुख करनेके लिये ] त्ययमुद्गाता । स्तोत्रिया । कहा, ' यह उद्गाता कितनी स्तोत्रिया नाम ऋचाओंका स्तवन करेगा? " ऋक्सामसमुदायः कतिपयाना- ' स्तोत्रिया ' यह कुछ ऋचाओंके मृचाम् । स्तोत्रिया वा शस्या वा याः ऋक्सामसमुदायका नाम है । स्तोत्रिया हो अथवा शस्या, जो कुछ

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[ अध्याय ३ से प्राप्त होनेवाले यमद्योद्गातास्मिन् न कतमास्तास्तिस्र न्यैव तृतीया कत-पुरोनुवाक्यापानो बोति पृथिवीलोक-लोकं याज्यया उपरराम ॥१० ॥

ज इस यज्ञमें उद्गाता याज्ञवल्क्य - ] ' तीनका ' वल्क्य - ] ' पुरोनुवाक्या, जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे क्या है; अपान याज्या यजमान किनपर जय पृथिवीलोकपर ही जय र शस्यासे द्युलोकपर - चुप हो गया ॥ १० ॥

वल्क्य! ' ऐसा अश्वलने भिमुख करनेके लिये ] दुगाता कितनी स्तोत्रिया स्तवन करेगा? ” यह कुछ ऋचाओं के दायका नाम है । अथवा शस्या, जो कुछ ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५ काश्चन ऋचः, ताः सर्वास्तिस्र । एवेत्याह । ताश्च व्याख्याताः-पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीयेति । तत्र पूर्वमुक्तम् - यत्किञ्चेदं प्राणभृत् सर्वं जयतीति तत् केन सामान्येन? इत्युच्यते - कतमा-स्तास्तिस्र ऋचो या अध्यात्मं भवन्तीति । प्राण एव पुरोनु -वाक्या, पशब्दसामान्यात् । अपानो याज्या, आनन्तर्यात् । अपानेन हि प्रतं हविर्देवता ग्रसन्ति, यागश्च प्रदानम् । व्यानः शस्या - – “ अप्राणन्ननपा -नन्नृचमभिव्याहरति " ( छा ० उ ० १ । ३ । ४ ) । इति श्रुत्य-न्तरात् । १. प्रगीत ऋचाओंको स्तोत्र कहते इनमें स्तोत्र ही स्वोत्रिया ऋचाएं हैं और भी ऋचाएँ हैं, वे सब तीन ही प्रकारकी हैं - यही बात अब बतायी जाती है । उन्हींकी पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या - ऐसा कहकर व्याख्या की गयी है । यहाँ पहले ( मन्त्र ७ में ) जो यह कहा गया है कि यह जो कुछ प्राणिवर्ग है, उस सभीको जीत लेता है, सो किस समानताके कारण है - यह कहते हैं अर्थात् ' इनमें जो अध्यात्म ( देहान्तर्वर्ती ) हैं, वे तीन ऋचाएँ कौन - सी हैं'- इस प्रश्नद्वारा यह बतलाया जाता है - प्राण ही पुरोनुवाक्या है; क्योंकि ' प ' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है । अपान याज्या है क्योंकि आनन्तर्य में दोनों-की समानता है । इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसे ही ग्रहण करते हैं; और प्रदान ही याग हे [ अत: अपान याज्या ऋचाएँ हैं ] । व्यान शस्या है, जैसा कि " प्राण अपान- व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है " इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है । हैं और अप्रगीत ऋचाओंको शस्त्र । शस्त्र शस्या हैं । २. कारण जैसे अपान प्राणके अनन्तर है, उसी प्रकार याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं ।

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६४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ कि ताभिर्जयतीति व्याख्या-तम् । तत्र विशेषसम्बन्धसामा-न्यमनुक्तमिहोच्यते, सर्वमन्यद् " व्याख्यातम् । लोकसम्बन्ध-सामान्येन पृथिवी लोकमेव पुरोनु-वाक्यया जयति, अन्तरिक्षलोकं याज्यया, मध्यमत्वसामान्यात् । द्युलोकं शस्ययोर्ध्वत्वसामान्यात् । ततो ह तस्मादात्मनः प्रश्ननिर्ण-यादसौ होता अश्वल उपरराम नायमस्मद्गोचर इति ॥ १० ॥

' कि ताभिर्जयति ' ( उनसे किस-पर विजय प्राप्त करता है ) — इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । वहाँ जो इनका विशेषसम्बन्ध सामान्य नहीं बतलाया गया, वह यहाँ बतलाया जाता है; और सब ( संख्यासामान्यादि ) की व्याख्या तो कर दी गयी है । लोकसम्बन्धी सामान्य होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही विजय प्राप्त करता है | मध्यमत्वमें समानता | होनेके कारण याज्यासे अन्तरिक्ष-लोकपर जय प्राप्त करता है तथा ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेसे शस्यासे द्युलोकपर जय प्राप्त करता है । तब उस अपने प्रश्नके निर्णयसे होता अश्वल यह समझकर कि ' यह याज्ञवल्क्य हमारे काबूका नहीं है ' चुप हो गया ॥ १० ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये प्रथममश्वलब्राह्मणम् ॥ १ ॥

प्रथम १. लोकोंमें पृथिवीलोक प्रथम है और ऋचाओं में पुरोनुवाक्या हैं । इस प्रकार ' प्रथमत्व ' रूप सम्बन्धकी दोनोंमें ऋचाएँ पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकको हो जीतता है समानता होनेसे ।

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[ अध्याय३ भिर्जयति ' ( उनसे किस-प्राप्त करता है ) — इसको ले की जा चुकी है । इनका विशेषसम्बन्ध-हीं बतलाया गया, वह या जाता है; और सब मान्यादि ) की व्याख्या गयी है । लोकसम्बन्धी होनेसे पुरोनुवाक्यासे पर ही विजय प्राप्त मध्यमत्वमें समानता ण याज्यासे अन्तरिक्ष-प्राप्त करता है तथा मानता होनेसे शस्यासे जय प्राप्त करता है । नपने प्रश्नके निर्णयसे. यह समझकर कि क्य हमारे काबुका हो गया ॥ १० ॥

में पुरोनुवाक्या ऋचाएँ दोनों में समानता होने से द्वितीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - ग्रार्तभाग - संवाद आख्यायिकासम्बन्धः प्रसिद्ध एव । मृत्योरतिमुक्ति-उपक्रमः व्र्याख्याता काललत-णात् कर्मलक्षणाच्च । कः पुनरसौ मृत्युर्यस्मादतिमुक्तिर्व्याख्याता?! सच स्वाभाविकाज्ञानासङ्गास्पदो -ऽध्यात्माधिभूतविषयपरिच्छिन्नो ग्रहातिग्रहलक्षणो मृत्युः । तस्मात् परिच्छिन्नरूपान्मृत्योरतिमुक्तस्य रूपाण्यग्न्यादित्यादीन्युद्गीथप्रक-रणे व्याख्यातानि । अश्वलप्रश्ने च तङ्गतो विशेषः कश्चित् । तच्चैतत् कर्मणां ज्ञानसहितानां फलम् । एतस्मात् साध्यसाधनरूपांत् संसारान्मोक्षः कर्तव्य इत्यतो-बन्धनरूपस्य मृत्योः स्वरूपमुच्यते । बद्धस्य हि मोक्षः कर्तव्यः । यद-यतिमुक्तस्य स्वरूपमुक्तं तत्रापि ग्रहातिग्रहाभ्यामविनिर्मुक्त एव १. अर्थात् अग्न्यादिमें ही दृष्टिभेदका आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध ही है । कालरूप और कर्म-रूप मृत्युसे अतिमुक्तिको व्याख्या की गयी । किंतु जिससे अतिमुक्ति-की व्याख्या की गयी है, वह मृत्यु क्या है? वह मृत्यु स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिका स्थान, अध्यात्म और अधिभूत विषयसे परिच्छिन्न ग्रह - अतिग्रहरूप है । उस परिच्छिन्न रूप मृत्युसे अतिमुक्त हुए पुरुषके अग्नि - आदित्यादि [ अपरि-च्छिन्न ] रूपोंकी व्याख्या उद्गीथ-प्रकरण में की गयी है । अश्वलके प्रश्न में उसीके अन्तर्वर्ती किसी विशेषका वर्णन है । वह यह विशेष ज्ञानसहित कर्मोंका फल है । इस साध्यसाधनरूप संसारसे मोक्ष क्ष करना है, इसलिये यहाँसे बन्धनरूप मृत्युका स्वरूप बतलाया जाता है; क्योंकि बद्धको ही मुक्त करना होता है । तथा जो अतिमुक्त-का स्वरूप बतलाया गया है, वहाँ भी वह मृत्युरूप ग्रह और अतिग्रहसे । २. देवताज्ञान अर्थात् उपासनासहित ।

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६४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ मृत्युरूपाभ्याम् । तथा चोक्तं । अतिमुक्त ( विशेषरूपसे मुक्त " शनाया हि मृत्यु: ( बृ ० उ ० है । इस विषयमें कहा ) नहीं भी है--१ । २ । १ ) " एष एव मृत्युः " । " भूख ही मृत्यु है " " यही इति । श्रादित्यस्थं पुरुषमङ्गी -कृत्याह " एको मृत्युर्बईवा ” इति च । तदात्मभावापन्नो हि मृत्योरा-तिमतिमुच्यत इत्युच्यते । न च तत्र ग्रहातिग्रहौ मृत्युरूपौ न स्तः । “ अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यः" ( वृ ० उ ० १ । ५ । १२ ) “ मंनश्च ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतः " ( ३ । २ । ७ ) इति, वक्ष्यति “ प्राणो वै इत्यादि 1 । आदित्यान्तर्गत मृत्यु है " पुरुषको अङ्गीकार करके श्रुति कहती है “ एक ही मृत्यु बहुत प्रकारकी है । " अग्न्यादिके तादात्म्यको प्राप्त हुआ पुरुष मृत्युकी प्राप्तिसे अति-मुक्त हो जाता है - ऐसा कहा जाता है; किंतु वहाँ मृत्यु के रूप ग्रह और अतिग्रह न हों- ऐसी बात नहीं है । “ तथा इस मनका द्युलोक शरीर है और ज्योतीरूप वह आदित्य है ' ' ' ' मन | ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्राह-से गृहीत है " ऐसा श्रुति कहेगी भी, तथा " प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण ” । अतिग्राहसे ही गृहीत है " और " वाक् ( ३ । २ । २ ) इति, “ वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण ” ( ३।२।३ ) इति च । तथा त्र्यन्नविभागे व्याख्या-तमस्माभिः । सुविचारितं चैतद् यदेव प्रवृत्तिकारणं तदेव निवृत्ति-कारणं न भवतीति । १. उपनिषद् में ' मनो वै ' पाठ है । ग्रह है, वह नामरूप अतिग्राहसे गृहीत है " ऐसा भी श्रुति कहेगी । तीन अन्नोंका विभाग करते समय हमने इनकी ऐसी ही व्याख्या भी की है । तथा इस बातका भी अच्छी तरह विचार किया जा चुका है कि जो प्रवृत्तिका कारण होता है, वही निवृत्तिका भी कारण नहीं होता । २. अर्थात् कर्म तो फलभोगका निमित्त है, वह मुक्तिका कारण नहीं हो सकता होनेके कारण बन्धनका ही कारण ।

पृष्ठ 659

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[ अध्याय३ ( विशेषरूपसे मुक्त ) नहीं विषयमें कहा भी है--मृत्यु है ” “ यही मृत्यु है ” आदित्यान्तर्गत पुरुषको करके श्रुति कहतीहै मृत्यु बहुत प्रकारकी है । " दि तादात्म्यको प्राप्त मृत्युकी प्राप्तिसे अति-बता है - ऐसा कहा जाता हाँ मृत्यु के रूप ग्रह और हों - ऐसी बात नहीं है । मनका द्युलोक शरीर है रूप वह आदित्य हे ' ' ' " मन वह कामरूप अतिग्राह-' ऐसा श्रुति कहेगी भी, ही ग्रह है, वह अपानरूप गृहीत है " और " बाक् ह नामरूप अतिग्राहसे सभी श्रुति कहेगी । विभाग करते समय ऐसी ही व्याख्या भी इस बातका भी अच्छी - किया जा चुका है तका कारण होता है, का भी कारण नहीं ण बन्धनका ही कारण ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ केचित्तु सर्वमेव निवृत्तिकारणं कर्मणां निवृत्ति - मन्यन्ते । अतः कारणात् कारणस्वं मीमां - पूर्वस्मात् पूर्वस्मान्मृ-स्पते त्योर्मुच्यते उत्तरमुत्तरं प्रतिपद्यमानो व्यावृत्यर्थमेव प्रति-पद्यते न तु तादर्थ्यम्, इत्यत श्रा द्वैतक्षयात् सर्वं मृत्युः, द्वैतक्षये तु परमार्थ तो मृत्योराप्ति म तिम्रुच्यते । अतश्च आपेक्षिकी गौणी मुक्ति-रन्तराले । सर्वमेतद् एवम् अबार्हदारण्यकम् । ननु सर्वैकत्वं मोक्षः " तस्मा-तत्सर्वमभवत् ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) इति श्रुतेः । बाढं भवत्येतदपि, न तु “ ग्रा-मकामो यजेत, पशुकामो यजेत " इत्यादिश्रुतीनां तादर्थ्यम् । यदि ह्यद्वतार्थत्वमेव आसां ग्रामपशु-स्वर्गाद्यर्थत्वं नास्तीति ग्रामपशु- । ६४ ९ कोई - कोई तो सारे ही साधनों-को निवृत्तिका कारण मानते हैं । इस कारणसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट फलको प्राप्त होनेवाला कर्मठ भी पूर्व- पूर्वं मृत्युसे मुक्त हो जाता है, अत: वह उस उत्कृष्ट फलको त्यागने-के लिये ही प्राप्त करता है, तद्रूप होनेके लिये नहीं । इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेतक सब मृत्यु ही है, द्वैतका क्षय होनेपर तो वह पर-मार्थतः मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है । इसलिये बीचमें जो मुक्ति बतलायी जाती है, वह आपेक्षिकी और गौणी ही है । इस प्रकार यह सब कल्पनाएँ बृहदार-ण्यकसे बाहरकी ही हैं । सबकी एकता तो मोक्ष ह ही है, क्योंकि “ इसलिये वह सर्वं हो गया " ऐसी श्रुति है । सिद्धान्ती - ठीक है, यह तो बृहदारण्यकका विषय है । परंतु " ग्रामकी इच्छावाला यजन करे, पशुओं की इच्छावाला यजन करे " इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्यं मोक्षमें नहीं हो सकता । यदि इनका तात्पर्यं अद्वैतमें ही हो तो इनका ग्राम, पशु अथवा स्वर्गादिके लिये होना सम्भव नहीं है और इनसे

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६५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ स्वर्गादयो न गृह्येरन्, गृह्णन्ते तु कर्मफलवैचित्र्यविशेषाः । यदि च वैदिकानां कर्मणां तादर्थ्य मेव, संसार एव नाभविष्यत् । अथ तादर्थ्येऽपि श्रनुनिष्पा-दितपदार्थस्वभावः संसार इति चेत् । यथा च रूपदर्शनार्थ । श्रालोके सर्वोऽपि तत्रस्थः प्रकाश्यत एव । न; प्रमाणानुपपत्तेः । अद्वैतार्थ-स्वे वैदिकानां कर्मणां विद्यासहि-तानाम् अन्यस्यानुनिष्पादितत्वे | प्रमाणानुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानमत एव च नागमः । १. संसारका मूल तो कर्मफल ही योनियोंकी प्राप्ति | ग्राम, पशु और स्वर्गादिका ग्रहण भी नहीं होना चाहिये, परंतु कर्मफलवैचित्र्यरूप विशेषों का ग्रहण होता ही है । यदि वैदिक कर्म मोक्षार्थं ही होते तो संसार ही नहीं रह सकता था । १ पूर्व ० - यद्यपि कर्म श्रुति मोक्षार्थंक है, तो भी उसके पीछे निष्पन्न हुए पदार्थंका स्वभाव ही संसार है, जिस प्रकार कि प्रकाश रूपदर्शनके लिये होनेपर भी उससे वहाँ रखे हुए सभी पदार्थ प्रकाशित होते ही हैं । [ अतः कर्मके मोक्षार्थंक होने-पर संसार ही नहीं रह सकता था, ऐसी शङ्का नहीं उठानी चाहिये ] । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता । यदि ज्ञानसहित वैदिक कर्मोंको मोक्षार्थंक माना जाय तो उनसे किसी अन्य पदार्थंके अनु-निष्पन्न होने में कोई प्रमाण नहीं हो सकता । इसमें न प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है न अनुमान और इसीसे आगम प्रमाण भी नहीं हो सकता । है । उसीके भोगके लिये उत्तमाधम कोई कारण होती है । यदि कमौका फल मोक्ष ही माना जाय तो फिर संसारका ही नहीं रहता ।