बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 661–670

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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[ अध्याय३ और स्वर्गादिका ग्रहण होना चाहिये, परंतु त्र्यरूप विशेषोंका ग्रहण है । यदि वैदिक कर्म होते तो संसार ही नहीं था । १ द्यपि कर्म श्रुति मोक्षार्थंक इसके पीछे निष्पन्न हुए स्वभाव ही संसार है, कि प्रकाश रूपदर्शन के र भी उससे वहाँ रखे प्रकाशित होते ही कर्मके मोक्षार्थक होने-नहीं रह सकता था, हीं उठानी चाहिये ] । -ऐसी बात नहीं है, कोई प्रमाण नहीं हो दि ज्ञानसहित वैदिक सार्थक माना जाय तो अन्य पदार्थंके अनु-कोई प्रमाण नहीं हो नें न प्रत्यक्ष प्रमाण हो अनुमान और इसीसे भी नहीं हो सकता । भोगके लिये उत्तमाधम जाय तो फिर संसारका ब्राह्मण २ ] शाङ्करभा ६५१ उभयम् एकेन वाक्येन प्रदर्श्यत इति चेत् कुल्या-प्रणयनालोकादिवत् । तन्नैवम्; वाक्यधर्मानुपपत्तेः । न च एकवाक्यगतस्यार्थस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिसाधनत्वमवगन्तुं शक्यते । कुल्याप्रणयनालोका -दार्थस्य प्रत्यक्षत्वाददोषः यदप्युच्यते मन्त्रा अस्मिन्नर्थे दृष्टा इति । अयमेव तु तावदर्थः प्रमाणागम्यः । मन्त्राः पुनः किम् अस्मिन्नर्थ आहोस्विदन्यस्मिन्नर्थ इति मृग्यमेतत् । तस्माद् ग्रहा-विग्रहलक्षणो मृत्युर्बन्धः, तस्मा-पूर्व ० - यदि ऐसा मानें कि नाली निकालने और प्रकाश करने आदिके समान एक ही वाक्यसे [ कर्मफल और मोक्ष ] दोनोंका प्रदर्शन हो जाता है तो? ' सिद्धान्ती - यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि ऐसा होना वाक्यका धर्म नहीं हो सकता । एक ही वाक्यका अर्थ प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंका साधन हो - यह नहीं जाना जा सकता । नाली निकालने और प्रकाश करने आदिमें तो यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है, इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है । और ऐसा जो कहा जाता है कि इस अर्थ में [ ' विद्यां चाविद्यां च ' इत्यादि ] मन्त्र देखे गये हैं, सो पहले तो यह विषय ही किसी भी प्रमाणसे अवगत होनेवाला नहीं है । मन्त्र भी क्या इसी अर्थ में हैं? अथवा किसी अन्य अर्थमें हैं? - यह बात भी विचारणीय ही है । अतः ग्रहातिग्रहरूप मृत्यु बन्धन है, उससे मुक्त होनेका उपाय १. नाली खेती सींचनेके लिये निकाली जाती है, परंतु वह आचमनादिमें भी उपयोगी होती है; प्रकाश रूपप्रकाशनके लिये किया जाता है, परंतु वह गमनादि क्रियाओंमें भी सहायक होता है, इसी प्रकार एक ही कर्मप्रतिपादक वाक्य कर्मफल और मोक्ष दोनोंकी प्राप्तिका कारण हो सकता है — यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है ।

पृष्ठ 662

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६५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ न्मोक्षो वक्तव्य इत्यत इदमारभ्यते । । बतलाना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । जैसे न च जानीमो विषय सन्धावि- जाग्रत् - स्वप्न आदि दो विषयोंकी सन्धिमें स्थित होना असम्भव है, वान्तरालेऽवस्थान मर्धजरतीयं कौ- उसी प्रकार वैदिक कर्मोंसे न बन्धन शलम् । यत्तु मृत्योरतिमुच्यत इत्युक्त्वा ग्रहातिग्रहावुच्येते, तत्त्व-र्थसम्बन्धात् । सर्वोऽयं साध्य साधनलक्षणो बन्धः, ग्रहातिग्रहा चिनिर्मोकात् । निगडे हि निर्ज्ञाते । निगडितस्य मोक्षाय यत्नः कर्तव्यो भवति; तस्मात्तादर्थ्येनारम्भः । | ग्रह और प्रतिग्रहकी अथ हैनं जारत्कारव वल्क्येति होवाच कति ग्रहाः होता है न मोक्ष, अपितु बीचको अवस्था प्राप्त होती है - ऐसी कल्पना भी असङ्गत है, अतः हम इस प्रकार अर्धजरतीय व्याख्या करनेकी युक्ति नहीं जानते । ' यहाँ जो मृत्युसे अतिमुक्त हो जाता है - ऐसा कहकर ग्रह और अतिग्रहका वर्णन किया जाता है, वह तो अर्थके सम्बन्धसे है, यह सब साध्य साधनरूप बन्धन है; क्योंकि उसके द्वारा ग्रह और अतिग्रहसे उसकी मुक्ति नहीं होती । बन्धनका ज्ञान होनेपर ही उसमें बँधे हुए पुरुषका उससे मुक्त होनेके लिये यत्न करना आवश्यक होता है; अतः मोक्षके लिये ही इसका आरम्भ हुआ है । संख्या एवं स्वरूप आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञ-कत्यतिग्रहा इति । अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥

यह १. अर्धजरतीय जैसे आधी कल्पना गाय बूढ़ी हो जाय और आधी जवान रहकर बन्धनका नहीं, दोनोंके बोचकी असम्भव है, उसी प्रकार कर्मकाण्ड साक्षात् बच्चा देती रहे । स्थितिका कारण है - ऐसा अर्थ भी असंगत मोक्ष या ही है ।

पृष्ठ 663

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[ अध्याय३ है, इसलिये आगेका ग्रन्थ किया जाता है । जैसे वप्न आदि दो विषयोंकी स्थित होना असम्भव है, वैदिक कर्मोंसे न बन्धन मोक्ष, अपितु बीचकी T प्त होती है - ऐसी कल्पना न्त है, अतः हम इस प्रकार न्य व्याख्या करनेकी युक्ति बते । यहाँ जो मृत्युसे हो जाता है - ऐसा कहकर अतिग्रहका वर्णन किया वह तो अर्थके सम्बन्धसे - साध्य - साधनरूप बन्धन उसके द्वारा ग्रह और उसकी मुक्ति नहीं होती । ज्ञान होनेपर ही उसमें ऋषका उससे मुक्त होनेके करना आवश्यक होता के लिये ही इसका है । चं स्वरूप ः पप्रच्छ याज्ञ-ग्रहा इति । अष्टौ हा अष्टावतिग्रहाः न रहकर बच्चा देती रहे । कर्मकाण्ड साक्षात् मोक्ष या बा अर्थ भी असंगत ही है । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३ फिर उस ( याज्ञवल्क्य ) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा; वह बोला, ' याज्ञवल्क्य! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं? [ याज्ञवल्क्य - ] ‘ आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं । ' और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन - से हैं अथ हैनम् - हशब्द ऐति-ह्यार्थः । अथानन्तरमश्चले उपरते प्रकृतं याज्ञवल्क्यं जरत्कारुगोत्रो जारत्कारवः - ऋत भागस्यापत्य-मार्तभागः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाचेत्यभिमुखीकरणाय । पूर्व-वत् प्रश्नः - कति ग्रहाः कत्यति-ग्रहा इति । इतिशब्दो वाक्य-परिसमाप्त्यर्थः । तत्र निर्ज्ञातेषु वा ग्रहाति-ग्रहेषु प्रश्नः स्यादनिर्ज्ञातेषु वा १ यदि तावद्ग्रहा श्रतिग्रहाश्च निर्ज्ञाताः, तदा तद्गतस्यापि गुणस्य सङ्ख्याया निर्ज्ञातत्वात् कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति सङ्ख्याविषयः प्रश्नो नोपपद्यते । अथानिर्ज्ञातास्तदा [ आर्तभाग- ] ' वे जो आठ ग्रह ? ' ॥ १ ॥

' अथ हैनम् ' इसमें ' ह ' शब्द इतिहासको सूचित करनेके लिये है | अथ - अनन्तर यानी अश्वलके चुप हो जानेपर उस प्रकृत याज्ञ-वल्क्यसे जो जरत्कारुगोत्रवाला था उस जारत्कारव आर्तभाग — ऋत-भागके पुत्र ने पूछा । वह अपने अभिमुख करनेके लिये बोला — ' हे याज्ञवल्क्य! ' | ‘ कितने ग्रह हैं और कितने अतिग्रह हैं । यह प्रश्न पहले-ही के समान है । इसमें ' इति ' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करने के लिये है । किंतु यह प्रश्न सम्यक् प्रकार-से जाने हुए ग्रह और अतिग्रहोंके विषयमें है अथवा न जाने हुओंके विषयमें? यदि ग्रह और अतिग्रह सम्यक् प्रकारसे ज्ञात हों तो उनमें रहनेवाला गुण जो संख्या है, वह भी ज्ञात ही रहेगी; उस अवस्थामें ' ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं, ऐसा संख्याविषयक प्रश्न उपपन्न नहीं होगा । | और यदि उन्हें अज्ञात माना

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६५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सङ्घथेयविषयप्रश्न इति के ग्रहाः केऽतिग्रहा इति प्रष्टव्यं न तु कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति प्रश्नः । अपि च निर्ज्ञातसामान्यकेषु विशेषविज्ञानाय प्रश्नो भवति-यथा कतमेऽत्र कठाः कतमेऽत्र कालापा इति । न चात्र ग्रहाति-ग्रहा नाम पदार्थाः केचन लोके । प्रसिद्धाः, येन विशेषार्थः प्रश्नः स्यात् । ननु च ' अतिमुच्यते ' इत्यु-कम्, ग्रहगृहीतस्य हि मोक्षः; ' समुक्तिः सातिमुक्तिः ' इति । हि द्विरुक्तम्, तस्मात्प्राप्ता ग्रहा अतिग्रहाथ । ननु तत्रापि चत्वारो ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्शाता वाक्चक्षुः । । जाय तो संख्येयविषयक प्रश्न होगा । ऐसी दशामें ' ग्रह कौन हैं और अतिग्रह कौन हैं ' इस प्रकार प्रश्न करना चाहिये । ' ग्रह हैं और अतिग्रह कितने हैं । ' ऐसा प्रश्न नहीं । इसके सिवा, जिनके सामान्य स्वरूपका ज्ञान होता है, उन्हींके विशेषरूप जाननेके लिये ऐसा प्रश्न हुआ करता है, जिस प्रकार [ ये ब्राह्मण कठशाखा और कलाप-शाखाके हैं- ऐसा सामान्य ज्ञान होनेपर ] यह प्रश्न हो सकता है कि ' इनमें कठशाखाके कौन - से हैं और कलापशाखाके कौन - से हैं? ' किंतु यहाँ ग्रह और अतिग्रह नाम वाले कोई पदार्थ लोकमें प्रसिद्ध नहीं हैं, जिससे कि उनके विशेष ज्ञानके लिये प्रश्न किया जाय । किंतु पहले ' अतिमुच्यते ' - अति-मुक्त होता है - ऐसा कहा गया है और मुक्ति ग्रहगृहीतकी ही होती है; और वहाँ ' वह मुक्ति है, वह अतिमुक्ति है ' इस प्रकार दो बार कहा है, इससे ग्रह और अतिग्रह दोनोंहीकी प्राप्ति होती है । शङ्का - किंतु वहाँ तो वाक्, चक्षु, प्राण और मन - इन चार ग्रह और अतिग्रहोंका ज्ञान है ही; अतः

पृष्ठ 665

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[ अध्याय३ - संख्येयविषयक ऐसी दशा में ' ग्रह कौन प्रश्न हैं ग्रह कौन है ' इस प्रकार ना चाहिये । ' ग्रह कितने प्रतिग्रह कितने हैं । ' ऐसा - सिवा, जिनके सामान्य ज्ञान होता है, उन्हींके जानने के लिये ऐसा प्रश्न ता है, जिस प्रकार [ ये कठशाखा और कलाप-हैं - ऐसा सामान्य ज्ञान यह प्रश्न हो सकता है कि -शाखाके कौन - से हैं और चाके कौन - से हैं? ' किंतु और अतिग्रह नामवाले चं लोक में प्रसिद्ध नहीं हैं, क उनके विशेष ज्ञान के किया जाय । पहले ' अतिमुच्यते ' - अति-है - ऐसा कहा गया है ग्रहगृहीतकी ही होती हाँ ' वह मुक्ति है, वह है ' इस प्रकार दो बार ससे ग्रह और अतिग्रह. प्राप्ति होती है । किंतु वहां तो वाक्, चक्षु, मन – इन चार ग्रह हों का ज्ञान है ही; अतः ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५ प्राणमनांसि, तत्र कतीति प्रश्नो नोपपद्यते निर्ज्ञातत्वात् । न अनवधारणार्थस्यात् न हि चतुष्टुं तत्र विवक्षितम्, इह तु ग्रहातिग्रहृदर्शनेऽष्टत्वगुणविवक्षया कतीति प्रश्न उपपद्यत एव । तस्मात् ' स मुक्तिः सातिमुक्तिः ' इति मुक्त्यतिमुक्ती द्विरुक्ते । ग्रहातिग्रहा अपि सिद्धाः, अतः कति सङ्ख्याका ग्रहाः कति वा अतिग्रहा इति पृच्छति । इतर आह- अष्टौ ग्रहा श्रष्टावतिग्रहा 2 | सम्यक् प्रकारसे ज्ञान होनेके कारण उनके विषयमें ' वे कितने हैं ' ऐसा. प्रश्न होना उपपन्न नहीं है । समाधान - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वहाँ ऐसा निश्चय नहीं किया गया अर्थात् वहाँ यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि वे चार ही हैं; | यहाँ तो ग्रह - अतिग्रह दर्शन में उनका आठ होना - यह गुण बतलाना अभीष्ट है, इसलिये वे कितने हैं? ऐसा प्रश्न बन ही सकता है । पूर्व ब्राह्मणवाक्यसे ' स मुक्तिः साति-मुक्ति: ' इस प्रकार मुक्ति और अति-मुक्ति दो बतलाये गये हैं, इसलिये ग्रह और अतिग्रह भी सिद्ध हो जाते हैं । इसीसे आर्तंभाग यह प्रश्न करता है कि ग्रह कितनी संख्यावाले. हैं और अतिग्रह कितने हैं । इसपर इति । ये तेऽष्टौ ग्रहा अभिहिताः । याज्ञवल्क्य कहते हैं - आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं । तब आर्त-कतमे ते नियमेन ग्रहीतव्या भाग पूछता है - वे जो आठ ग्रह बतलाये गये, सो नियमसे किन्हें इति ॥ १ ॥ ग्रहण करना चाहिये ॥ १ ॥

घारणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका प्रतिग्रहत्वनिरूपण तत्राह- इसपर याज्ञवल्क्य कहता है -प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतो-S पानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ २ ॥

पृष्ठ 666

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६५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्राहसे गृहीत है, क्योंकि प्राण अपानसे ही गन्धोंको सू ँघता है ॥ २ ॥

प्राणो वै ग्रहः – प्राण इति घ्राणमुच्यते, प्रकरणात् । वायुसहितः सः । अपानेनेति गन्धेनेत्येतत् । अपानसचिव- पथ | त्वादपानो गन्ध उच्यते । अपा-नोपहृतं हि गन्धं घ्राणेन सर्वो लोको जिघ्रति ॥ तदेतदुच्यते— अपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रतीति । २ ॥ प्राण ही ग्रह है- ' प्राण ' शब्द-से यहाँ घ्राणेन्द्रिय कही गयी है, क्योंकि उसीका प्रकरण है । वह वायुके सहित है । अपानसे अर्थात् गन्धसे । अपान गन्धका साथी है, इसलिये अपानको गन्ध कहा गया है, क्योंकि सम्पूर्ण लोक अपानद्वारा लाये गये गन्धको ही घ्राणेन्द्रिय-द्वारा सूंघता है । इसीसे यह कहा जाता है कि प्राणी अपानसे हो गन्धोंको सूघता है ॥ २ ॥

वाग् वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥ ३ ॥ जिह्वा वै ग्रहः स रसे-' नातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति

॥ ४ ॥ चक्षुर्वे ग्रहः स रूपेणातिग्राहेण गृहीतश्चक्षुषा

हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥ श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्दे -नातिगाहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञ्शृणोति ॥ ६ ॥

मनो वै गुहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसाहि कामान् कामयते ॥ ७ ॥ हस्तौ वै ग्रहः स कर्मणा-तिगाहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥

त्वग् वे गुहः स स्पर्शेनातिग्राहेण गृहीतस्त्वचा स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ हि गूहा अष्टावतिगृहाः ॥६ ॥

पृष्ठ 667

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[ अध्याय ३ गृहीत है, क्योंकि ही ग्रह है- ' प्राण ' शब्द-न्द्रिय कही गयी है, सीका प्रकरण है । वह है । अपानसे अर्थात् पान गन्धका साथी है, नानको गन्ध कहा गया सम्पूर्ण लोक अपानद्वारा गन्धको ही घ्राणेन्द्रिय-है । इसीसे यह कहा क प्राणी अपानसे ही घता है ॥२ ॥

हे गृहीतो वाचा वै ग्रहः स रसे-सान् विजानाति ड्रेण गृहीतश्चक्षुषा गृहः सशब्दे -शृणोति ॥ ६ ॥

तो मनसा हि गृहः स कर्मणा-करोति ॥ ८ ॥

गृहीतस्त्वचा हि वतिगृहाः ॥६ ॥

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थं: ६५७ वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्से ही नामोंका उच्चारण करता है ॥ ३ ॥ जिह्वा ही ग्रह है, वह

रसरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेषरूपसे जानता है ॥ ४ ॥ चक्षु ही ग्रह है, वह रूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि

प्राणी चक्षुसे ही रूपों को देखता है ॥ ५ ॥ श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप

अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है ॥ ६ ॥

मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है ॥ ७ ॥ हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे

गृहीत हैं; क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है ॥ ८ ॥ त्वचा ही ग्रह है,

वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है; जानता है । इस प्रकार ये आठ ग्रह वाग्व ग्रहः - वाचा ह्यध्यात्म-परिच्छिन्नया आसङ्गविषयास्पद -या असत्यानृतासम्यबीभत्सादि-वचनेषु व्यापृतया गृहीतो लोको-क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोको हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ ९ ॥

वाक् ही ग्रह है; क्योंकि असत्य, अनृत, असभ्य एवं बीभत्सादि वचनों-में प्रवृत्ता आसक्तिकी विषयभूता अध्यात्मपरिच्छिन्नावा क्से हो गृहीत होकर लोक भूला हुआ है, इसलिये ऽ पहृतः, तेन वाग् ग्रहः । स नाम्ना - वाक् ग्रह है । वह नामरूप अति-ग्रहसे गृहीत है - वह वाक्संज्ञक तिग्राहेण गृहीतः - स वागाख्यो ग्रह नाम अर्थात् वक्तव्य विषयरूप ग्रहः; नास्ना वक्तव्येन विषयेणाति- अतिग्रहसे गृहीत है । ' अतिग्रहेण ' के ग्रहेण, अतिग्राहेणेति दैर्घ्यं छान्द-सं नाम । वक्तव्यार्था हि वाक्; तेन वक्तव्येनार्थेन तादर्थ्येन प्रयुक्ता वाक् तेन वशीकृता; तेन तत्कार्य-मकृत्वा नैव तस्या मोक्षः । अतो धृ ० उ ० ४२-स्थानमें ' अतिग्राहेण ' ऐसा दीर्घं प्रयोग छान्दस ( वैदिकप्रक्रिया के अनुसार ) है । वाक् वक्तव्य विषय-के ही लिये होती है; उस वक्तव्य अर्थसे उसीके लिये प्रयुक्त होनेवाली वाक् उसीके वशीभूत है; अत: उस | कार्यको किये बिना उसकी मुक्ति

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६५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ नाम्नातिग्राहेण गृहीता वागित्यु च्यते । वक्तव्यासङ्गेन हि प्रवृत्ता सर्वानर्थैर्युज्यते । समानमन्यत् । इत्येते त्वक्पर्यन्ता अष्टौ ग्रहाः स्पर्शपर्यन्ताश्चैतेऽष्टावतिग्रहा इति ॥ ३ - ९ ॥ । नहीं है । इसीसे यह कहा जाता है कि वाक् नामरूप अतिग्राहसे गृहीत है; क्योंकि वक्तव्यकी आसक्तिसे प्रवृत्त होनेपर वह समस्त अनर्थोंसे युक्त होती है । शेष मन्त्रोंका अर्थ इसीके समान है । इस प्रकार ये त्वपर्यन्त आठ ग्रह हैं और स्पर्श-पर्यन्त आठ अतिग्रह हैं ॥ ३-६ ॥ सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है? उपसंहृतेषु ग्रहातिग्रहेषु आइ । ग्रह और अतिग्रहों का उपसंहार हो जानेपर आर्तभाग फिर पुनः- कहता है-याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद । सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सो-ऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० १० ॥ ॥ ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आर्तभागने कहा, ' यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है; सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है । ' [ इसपर याज्ञ-वल्क्य कहता है- ] ' अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है । [ इस प्रकारके ज्ञानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है ' ॥ १० ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच, यदिदं सर्व मृत्योरन्नम् -- यदिदं व्याकृतं सर्व मृत्योरनम्, सर्वं जायते विपद्यते च ग्रहातिग्रहलक्षणेन मृत्युना ग्रस्तम् —का स्वित् का नु ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आर्तभागने कहा, ' वह जो कुछ है, सब मृत्युका खाद्य है - यह जितना व्याकृत जगत् है, सब मृत्युका खाद्य है; क्योंकि ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे ग्रस्त होकर सब उत्पन्न होता और | नाशको प्राप्त होता है, अत: वह

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[ अध्याय ३ से यह कहा जाता है मरूप अतिग्राहसे गृहीत वक्तव्यकी आसक्तिसे - वह समस्त अनर्थोंसे । शेष मन्त्रोंका अर्थ न है । इस प्रकार ये ठग्रह हैं और स्पर्श-नतिग्रह हैं ॥ ३-६ ॥ है? अतिग्रहों का उपसंहार - आर्तभाग फिर मृत्योरन्नं का निर्वै मृत्युः सो-I कुछ है सब मृत्युका है । ' [ इसपर याज्ञ-का खाद्य है । [ इस Foll य! ' ऐसा आर्तभागने जो कुछ है, सब है- यह जितना है, सब मृत्युका खाद्य हातिग्रहरूप मृत्युसे ब उत्पन्न होता और होता है, अत: वह ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ स्यात् सा देवता, यस्या देवताया मृत्युरपि श्रन्नं भवेत् “ मृत्युर्य-स्योपसेचनम् " ( क ० उ ० १ । २ । २५ ) इति श्रुत्यन्तरात् । अयमभिप्रायः प्रष्टुः -- यदि मृत्योर्मृत्युं वक्ष्यति, अनवस्था स्यात् । अथ न चक्ष्यति, अस्माद् ग्रहातिग्रहलक्षणान्मृत्योः मोतो नोपपद्यते; ग्रहातिग्रह-मृत्युविनाशे हि मोक्षः स्यात्; स यदि मृत्योरपि मृत्युः स्याद् भवेद् ग्रहातिग्रहलक्षणस्य मृत्यो-विनाशः, अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्वानः पृच्छति का स्वित् सा ' देवता ' इति । अस्ति तावन्मृत्योमृत्युः । नन्वनवस्था स्यात् तस्या-व्यन्यो मृत्युरिति । नानवस्था सर्वमृत्योर्मृत्व-न्तरानुपपत्तेः । कथं पुनरवगम्यतेऽस्ति मृत्योमृत्युरिति । दृष्टत्वात्; अग्भिस्तावत् सर्वस्य ६५ ९ 2 | देवता कौन है जिसका मृत्यु भी खाद्य है, जैसा कि " मृत्यु जिसके लिये साग है " इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है । यहाँ प्रश्नकर्ताका यह अभिप्राय है – यदि याज्ञवल्क्यने कोई मृत्युका मृत्यु बता दिया, तब तो अनवस्था-दोष होगा और यदि न बतलाया तो इस ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे छुटकारा नहीं हो सकेगा; क्योंकि मोक्ष तो ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका नाश होनेपर ही होगा, अतः यदि कोई मृत्युका भी मृत्यु होगा, तभी ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका विनाश होगा, इसलिये इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन समझ-कर पूछता है कि ' वह कौन देवता है? " सिद्धान्तों - मृत्युका मृत्यु तो है । पूर्व०- - तब तो अनवस्था - दोष होगा; क्योंकि फिर उसका भी कोई अन्य मृत्यु हो सकता है । सिद्धान्ती - अनवस्था - दोष नहीं होगा; क्योंकि जो सबका मृत्यु है, उसके लिये किसी दूसरे मृत्युका होना सम्भव नहीं है । पूर्व ० - किंतु यह कैसे जाना जाता है कि मृत्युका मृत्यु भी है । सिद्धान्ती क्योंकि ऐसा देखा गया है; सबका नाश करनेवाला

पृष्ठ 670

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६६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ दृष्टो मृत्युः, विनाशकत्वात्; सोऽद्भिर्भक्ष्यते सोऽग्निरपामन्नम् गृहाण तर्क्षस्ति मृत्योर्मृत्युरिति । तेन सर्वं ग्रहातिग्रहजातं भक्ष्यते मृत्योर्मृत्युना तस्मिन् बन्धने नाशिते मृत्युना भक्षिते संसारा-न्मोक्ष उपपन्नो भवति । बन्धनं हि ग्रहातिग्रहलक्षणमुक्तम्, तस्माच्च मोक्ष उपपद्यत इत्येतत् प्रसाधितम्; अतो बन्धमोक्षाय पुरुषप्रयासः सफलो भवति । श्चतोऽपजयति पुनमृत्युम् । १० ।. । ACN होनेसे अग्नि मृत्युरूप देखा गया है, उसे जल भक्षण कर जाता है, अत: वह अग्नि जलका खाद्य है; अत: यह समझ लो कि मृत्युका मृत्यु भी है । उस मृत्युके मृत्युद्वारा सम्पूर्ण ग्रहातिग्रहसमुदाय भक्षण कर लिया जाता है । उस बन्धन-को नष्ट कर देनेपर अर्थात् मृत्यु-द्वारा उसका भक्षण कर लिये जानेपर संसारसे मोक्ष होना सम्भव है । बन्धन ग्रहातिग्रहरूप कहा गया है और उससे मोक्ष होना भी सम्भव है - यह बात सिद्ध कर दी गयी है, अत: उस बन्धनकी निवृत्ति-के लिये पुरुषका [ श्रवणादिरूप ] प्रयत्न सफल होता है । अतः [ ज्ञानके द्वारा ] पुरुष पुनर्मृत्युको जीत लेता है ॥ १० ॥

तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो त्रियत उद-स्मात् प्राणाः क्रामन्त्याहो ३ नेति नेति होवाच याज्ञ-वल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्यायत्या-ध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥

' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आर्तभागने कहा, ' जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं? ' ' नहीं, नहीं, '