बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 671–680
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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[ अध्याय ३ मृत्युरूप देखा गया न भक्षण कर जाता अग्नि जलका खाद्य समझ लो कि मृत्युका उस मृत्यु के मृत्युद्वारा तिग्रहसमुदाय भक्षण ता है । उस बन्धन-देनेपर अर्थात् मृत्यु-भक्षण कर लिये रसे मोक्ष होना सम्भव ग्रहातिग्रहरूप कहा उससे मोक्ष होना भी यह बात सिद्ध कर दी उस बन्धनकी निवृत्ति-का [ श्रवणादिरूप ] होता है । अतः [ ] पुरुष पुनर्मृत्युको ॥ १० । षो म्रियत उद-होवाच याज्ञ-न्यत्याध्यायत्या-य यह मनुष्य मरता नहीं? ' ' नहीं, नहीं, 7 ' ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६१ ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ' वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं । वह फूल जाता है, अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है ' ॥ ११ ॥
परेण मृत्युना मृत्यौ भक्षिते परमात्मदर्शनेन योऽसौ मुक्तो विद्वान् सोऽयं पुरुषो यत्र यस्मिन् काले म्रियते, उत् ऊर्ध्वम् अस्माद् ब्रह्मविदो म्रियमाणात्, प्राणाः- -वागादयो ग्रहाः, नामादयश्चाति -ग्रहा वासनारूपा अन्तःस्थाः प्रयो-जकाः क्रामन्त्यूर्ध्वम् उत्क्रामन्ति होस्विन्नेति १ नेति होवाच याज्ञवल्क्यो नो-क्रामन्ति, अत्रैवास्मि न परेणा-स्मनाविभागं गच्छन्ति विदुषि कार्याणि करणानि च स्वयोनौ परब्रह्म सतत्वे समवनीयन्ते एकी-भावेन समवसृज्यन्ते, प्रलीयन्ते इत्यर्थः ऊर्मय इव समुद्रे । तथा च श्रुत्यन्तरं कलाशब्द-चाच्यानां प्राणानां परस्मिन्नात्मनि प्रलयं दर्शयति – “ एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरु-गायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छ -न्ति " ( प्र ० उ ० ६ । ५ ) इति । sa परेणात्मनाविभागं गच्छन्तीति दर्शितम् । न तर्हि । ' परमात्मदर्शनरूप परमृत्युके द्वारा मृत्युके भक्षण कर लिये जाने-पर जो यह मुक्त हुआ विद्वान् है, वह जब - जिस समय मरता है, उस समय इस मरनेवाले ब्रह्मवेत्तासे प्राण - वागादि ग्रह और नामादि अतिग्रह, जो वासनारूप और भीतर स्थित रहकर प्रेरणा करने-वाले हैं, उत्क्रमण करते हैं या नहीं? ' याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, वे उत्क्रमण नहीं करते । वे यहीं -इस परमात्मामें ही अभेदको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् इस विद्वान्में ये भूत और इन्द्रियवर्ग अपने मूलभूत परब्रह्मसत्तामें एकीभावसे विसृष्ट यानी लीन हो जाते हैं, जैसे कि समुद्रमें तरङ्ग । इसी प्रकार “ ऐसे ही इस सर्वद्रष्टा की ये सोलह कलाएँ पुरुषायण हैं अर्थात् वे पुरुषको प्राप्त होकर अस्त हो जाती हैं ” यह अन्य श्रुति भी कलाशब्दवाच्य प्राणोंका परमात्मामें लय दिखलाती है । इस प्रकार यह दिखलाया गया कि वे प्राण परमात्माके साथ अभेद-को प्राप्त हो जाते हैं । तब तो यह
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६६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ मृतः — न हि, मृतश्चायं यस्मात् स उच्छ्रवयति - उच्छूनतां प्रति-पद्यते, आध्मायति बाह्येन वायुना पूर्यते इतिवत्, आध्मातो मृतः शेते निश्चेष्टः । बन्धननाशे मुक्तस्य न क्वचिद्गमनमिति वाक्यार्थः ॥ ११ ॥
मुक्तस्य किं प्राणा एव. सम-बनीयन्ते, आहोस्वित् तत्प्रयोजक-मपि सर्वम् १ अथ प्राणा एव, न तत्प्रयोजकं सर्वम्, प्रयोजके विद्यमाने पुनः प्राणानां प्रसङ्गः, श्रथ सर्वमेव कामकर्मादि, ततो मोक्ष उपपद्यते, इत्येवमर्थ उत्तरः प्रश्नः । याज्ञवल्क्येति होवाच | कहना चाहिये कि वह मरता ही नहीं है; ऐसी बात नहीं है; यह मरता तो है; क्योंकि वह उच्छून-भावको प्राप्त होता है अर्थात् फूल जाता है । वह घोकनीके समान शरीरको बाह्य वायुसे भरता है और इस प्रकार भरकर मरा हुआ निश्चेष्ट पड़ा रहता है । इस वाक्य-का तात्पर्य यह है कि बन्धनका नाश हो जानेपर मुक्त पुरुषका कहीं गमन नहीं होता ॥ ११ ॥
तो क्या मुक्त पुरुषके केवल प्राणों का ही लय होता है अथवा उसके सब प्रयोजकोंका भी? यदि कहें कि प्राण ही लीन होते हैं, उसके सभी प्रयोजक लोन नहीं होते, तो प्रयोजकोंके विद्यमान रहते हुए पुनः प्राणोंकी प्राप्तिका प्रसंग हो जायगा और यदि काम-कर्मादि सभीका लय माना जाय तो ही उसका मोक्ष होना बन सकता है; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये ही आगेका प्रश्न है— यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता अनन्तमेव स तेन लोकं विश्वे देवा जयति ॥ १२ ॥
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[ अध्याय ३ ये कि वह मरता ही सी बात नहीं है; यह -; क्योंकि वह उच्छून-न होता है अर्थात् फूल बह धोकनीके समान वायुसे भरता है कार भरकर मरा हुआ - रहता है । इस वाक्य-यह है कि बन्धनका नेपर मुक्त पुरुषका कहीं नेता ॥ ११ ॥
मुक्त पुरुषके केवल लय होता है अथवा योजकों का भी? यदि - ही लीन होते हैं, प्रयोजक लोन नहीं योजकोंके विद्यमान : प्राणोंकी प्राप्तिका गा और यदि काम-का लय माना जाय नोक्ष होना बन सकता स्पष्ट करनेके लिये नहै-स्त्रियते किमेनं ता विश्वे देवा २ ॥ ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३ ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आतंभागने कहा, ' जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव के द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहा-तीति; आहेतरो - नामेति । सर्व समवनीयत इत्यर्थः, नाममात्रं तु न लीयत आकृतिसम्बन्धात् । नित्यं हि नाम; अनन्तं वै नाम । नित्यत्वमेवानन्त्यं नाम्नः । तदानन्त्याधिकृता अनन्ता वै विश्वे देवाः । अनन्तमेव स तेन । लोकं जयति । तन्नामानन्त्याधि-कृतान् विश्वान् देवानात्मत्वेनो-पेत्य तेनानन्त्यदर्शनेनानन्तमेव लोकं जयति ॥ १२ ॥
भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शन-लेता है ॥ १२ ॥
' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आतं-भागने कहा ' जिस समय यह पुरुष मर जाता है, इसे क्या नहीं छोड़ता? ' याज्ञवल्क्यने ' नाम ' ऐसा कहा । तात्पर्य यह है कि सब कुछ लीन हो जाता है, किंतु आकृति सम्बन्ध होनेके कारण केवल नाम ही लीन नहीं होता । नाम तो नित्य है, वह अनन्त ही है । ि होना ही नामका अनन्तत्व है । उस अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं । अतः इस दर्शन से वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है । अर्थात् नामके अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेवोंको आत्मभाव-से प्राप्त होकर उस आनन्त्य - दर्शन के द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥
इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार ग्रहातिग्रहरूपं बन्धनमुक्तं ग्रहातिग्रहरूप जो मृत्युरूप बन्धन है, उसका वर्णन किया गया । उस मृत्युरूपम्; तस्य च मृत्योर्मृत्युस- 1 मृत्युके मृत्युकी भी सत्ता होने के
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६६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ 2 द्भावान्मोक्षथोपपद्यते । स च मोक्षो ग्रहातिग्रहरूपाणामिव प्रलयः, प्रदीपनिर्वाणवत् । यत्तद् ग्रहातिग्रहाख्यं बन्धनं मृत्युरूपम्, । कारण उससे मोक्ष होना सम्भव है । वह मोक्ष दीपकके शान्त हो जानेके समान ग्रहातिग्रहरूपोंका । यहीं प्रलय हो जाना है । वह जो ग्रहातिग्रहसंज्ञक मृत्युरूप बन्धन है, तस्य यत् प्रयोजकं तत्स्वरूप निर्धा - उसका जो प्रयोजक है, उसके रणार्थमिदमारभ्यते- याज्ञवल्क्येति होवाच । अत्र केचिदू वर्णयन्ति ग्रहाति-ग्रहस्य सप्रयोजकस्य विनाशेऽपि किल न मुच्यते; नामावशिष्टो-ऽविद्यया ऊपरस्थानीय या स्वात्म -प्रभवया परमात्मनः परिच्छिन्नो भोज्याच्च जगतो व्यावृत्तः उच्छि-न्नकामकर्मा अन्तराले व्यव -तिष्ठते । तस्य परमात्मैकत्वदर्श-नेन द्वैतदर्शनम पनेतव्यमित्यतः परं परमात्मदर्शनमारब्धव्यम् | स्वरूपका निश्चय करनेके लिये ' याज्ञवल्क्येति होवाच ' यह कण्डिका आरम्भ की जाती है । यहाँ कुछ ( ज्ञान- कर्मसमुञ्चय-वादी ) लोग यों कहते हैं -- प्रयोजकों-के सहित ग्रहातिग्रहका नाश हो जानेपर भी विद्वान् मुक्त नहीं होता; स्वात्मासे उत्पन्न ऊषरस्थानीया अविद्याके द्वारा परमात्मासे परि-च्छिन्न तथा भोज्य जगत्से व्यावृत्त वह नाममात्रावशिष्ट विद्वान् काम और कर्मोंका उच्छेद हो जानेसे अन्त-रालावस्थामें रहता है । ' परमात्मै-कत्वदर्शनके द्वारा उसकी द्वैतदृष्टि-को निवृत्त करना है, इसलिये आगे परमात्मदर्शनका आरम्भ करना स्थानीया १. यह लेशाविद्या उसके बन्धनको हेतु नहीं होती; इसलिये कहा है । इसे ऊपर-२. तात्पर्य यह है कि ज्ञान- कर्मसमुच्चयका अनुष्ठान प्रयोजकोंके सहित स्थूल - सूक्ष्म दोनों देहोंका नाश हो करनेसे काम - कर्मादि नहीं मिलती तो भी पुनः बन्धनकी योग्यता जानेपर भी यद्यपि उसे मुक्ति बन्धनके बीच की अवस्था में रहता है न रहनेके कारण वह मुक्ति और ।
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[ अध्याय ३ मोक्ष होना सम्भव क्ष दीपकके शान्त हो न ग्रहातिग्रहरूपों का हो जाना है । वह जो तक मृत्युरूप बन्धन है, प्रयोजक है, उसके निश्चय करनेके लिये होवाच ' यह कण्डिका जाती है । ब ( ज्ञान - कर्मसमुच्चय-कहते हैं -- प्रयोजकों-हातिग्रहका नाश हो द्वान् मुक्त नहीं होता; न्न ऊषरस्थानीया परमात्मासे परि-ज्य जगत्से व्यावृत्त विशिष्ट विद्वान् काम च्छेद हो जानेसे अन्त--हता है । परमात्म-रा उसकी द्वैतदृष्टि-ना है, इसलिये आगे आरम्भ करना इसलिये इसे ऊपर-करनेसे काम - कर्मादि - भी यद्यपि उसे मुक्ति रण वह मुक्ति और ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६५ इत्येवमपवर्गाख्यामन्तरालावस्थां | चाहिये । इस प्रकार वे अपवर्ग-परिकल्प्योत्तरग्रन्थसम्बन्धं कुर्व-न्ति । तत्र वक्तव्यम् - विशीर्णेषु कर-णे विदेहस्य परमात्मदर्शन-श्रवणमनननिदिध्यासनानि कथ-मितिः समवनीतप्राणस्य हि नाममात्रावशिष्टस्येति तैरुच्यते । ' मृतः शेते ' इति ह्युक्तम् । न मनोरथेनाप्येतदुपपादयितुं शक्यते । अथ जीवन्नेवाविद्या-मात्रावशिष्टो भोज्यादपावृत्त इति परिकल्प्यते, तत्तु किन्निमित्त-मिति वक्तव्यम् । समस्त द्वैवैकत्वात्मप्राप्तिनिमि-तमिति यद्युच्यते, तत् पूर्वमेव निराकृतम् । कर्मसहितेन द्वैतै-संज्ञक अन्तरालावस्थाकी कल्पना करके आगेके ग्रन्थका सम्बन्ध लगते हैं । इसमें हमें यह कहना है कि इन्द्रियोंके उच्छिन्न हो जानेपर जो देहहीन हो गया है, उसके द्वारा · परमात्मदर्शन तथा श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन किस प्रकार किये जा सकते हैं? इसपर वे कहते हैं । कि जिसके प्राण लीन हो गये हैं और जो नाममात्र अवशिष्ट रह गया है, उसीका विद्यामें अधिकार है; क्योंकि श्रुतिके द्वारा पहले कहा गया है कि ' वह मरकर पड़ा रहता है । ' किंतु मनोरथमात्रसे भी इस बातका उपपादन नहीं किया जा सकता । और यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भोज्यवर्गसे व्यावृत्त अविद्यामात्रावशिष्ट जीवित पुरुष ही विद्याका अधिकारी है तो यह बत-लाना चाहिये कि वह किस कारण-से भोज्यवर्गसे व्यावृत्त होता है । ' यदि यह कहा जाय कि इसका कारण समस्त द्वैतैकत्वरूप आत्म-दर्शनकी प्राप्ति है तो इसका पहले । ही निराकरण किया जा चुका है । ' १. क्योंकि बिना सम्यग्दर्शनके भोज्यवर्गसे वैराग्य नहीं हो सकता । २. क्योंकि अपरविद्यासमुच्चित कर्म हिरण्यगर्भके भोगकी प्राप्ति करानेवाला है, वह भोज्यवर्गसे निवृत्त करनेवाला नहीं है - यह बात पहले अध्यायमें कही जा चुकी है ।
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६६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ - कत्वात्मदर्शनेन सम्पन्नो विद्वान् / कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनसे सम्पन्न हुआ विद्वान् मरनेपर प्राणों-मृतः समवनीतप्राणो जगदा-के लीन हो जानेपर या तो जग-त्मत्वं हिरण्यगर्भस्वरूपं वा प्राप्नु- दात्मभावको प्राप्त हो जायगा और यात्, असमवनीतप्राणो भोज्या-ज्जीवन्नेव वा व्यावृत्तो विरक्तः परमात्मदर्शनाभिमुखः स्वात् । न चोभयम् एकप्रयत्ननिष्पाद्येन साधनेन लभ्यम् | हिरण्यगर्भ-प्राप्तिसाधनं चेत्, न ततो व्या-वृत्तिसाधनम् । परमात्माभिमुखी -करणस्य भोज्याद् व्यावृत्तेः साधनं चेत्, न हिरण्यगर्भप्राप्ति साधनम् । न हि यद् गतिसाधनं तद् गतिनिवृत्तेरपि । अथ मृत्वा हिरण्यगर्भ प्राप्य ततः समवनीतप्राणो नामात्र-शिष्टः परमात्मज्ञानेऽधिक्रियते, ततोऽस्मदाद्यर्थ परमात्मज्ञानोप-देशोऽनर्थकः स्यात् । सर्वेषां हि ब्रह्मविद्या पुरुषार्थायोपदिश्यते— या हिरण्यगर्भस्वरूप हो जायगा; अथवा जबतक उसके प्राणोंका लय नहीं होगा तबतक वह जीवित रहता हुआ ही भोज्यवर्गसे व्यावृत्त यानी विरक्त रहकर परमात्मदर्शन-के अभिमुख होगा । दोनों फल एक ही प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले साधनसे प्राप्त नहीं हो सकते । यदि वह प्रयत्न हिरण्यगर्भ की प्राप्तिका साधन होगा तो उससे व्यावृत्त होनेका साधन नहीं हो सकता; और यदि वह परमात्माके सम्मुख करने और भोज्यवर्गसे विरक्ति करानेका साधन होगा तो हिरण्य-गर्भको प्राप्तिका साधन नहीं हो सकता; क्योंकि जो गतिका साधन होता है, वही गतिकी निवृत्तिका भी साधन नहीं होता । यदि कहो कि वह मरकर हिरण्य-गर्भको प्राप्त होने के पश्चात् लीनप्राण और नाममात्रावशिष्ट होकर पर-मात्मज्ञानका अधिकारी होता है तो हम लोगों के लिये तो परमात्मज्ञान-का उपदेश व्यर्थं ही होगा । किंतु “ तद्यो यो देवानाम् " इत्यादि श्रुतिके
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[ अध्याय ३ तैकत्वरूप आत्मदर्शनसे विद्वान् मरनेपर प्राणों-जानेपर या तो जग-- प्राप्त हो जायगा और र्भस्वरूप हो जायगा; -क उसके प्राणोंका लय तबतक वह जीवित हो भोज्यवर्गसे व्यावृत्त रहकर परमात्मदर्शन-होगा । दोनों फल एक निष्पन्न होनेवाले नहीं हो सकते । यदि रण्यगर्भ की प्राप्तिका तो उससे व्यावृत्त न नहीं हो सकता; परमात्माके सम्मुख नोज्यवर्गसे विरक्ति न होगा तो हिरण्य-T साधन नहीं हो जो गतिका साधन गतिकी निवृत्तिका होता । वह मरकर हिरण्य-के पश्चात् लीनप्राण वशिष्ट होकर पर-धिकारी होता है तो तो परमात्मज्ञान-ही होगा । किंतु म " इत्यादिश्रुति के ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७ " तद्यो यो देवानाम् " ( वृ ० । उ ० १ । ४ । १० ) इत्याद्यया श्रुत्या । तस्मादत्यन्तनिकृष्टा शास्त्रबाद्यैवेयं कल्पना । प्रकृतं तु वर्तयिष्यामः । तत्र केन प्रयुक्तं ग्रहाविग्रहलक्षणं बन्धनमित्येत-निर्दिधारयिषया श्रह — याज्ञवल्क्येति होवाच द्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश सभीके पुरुषार्थसाधनके लिये किया गया है । अतः यह कल्पना अत्यन्त निकृष्ट और शास्त्रविरुद्ध ही है । अब हम प्रकृत विषयका अनुसरण करेंगे । यहाँ, यह निश्चय करने के लिये कि वह ग्रहातिग्रहरूप बन्धन किसकी प्रेरणासे प्राप्त हुआ है? श्रुति कहती है-यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्या-ग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवी शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वन-स्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्कायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामे-वैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयाञ्चक्राते तो ह यदूचतुः कर्म हैव यदूचतुरथ यत् प्रशश ँ सतुः कर्म हैव तत् प्रशशँ सतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥। १३ ॥ ' हे याज्ञवल्क्य! ' ऐसा आर्तभागने कहा ' जिस समय इस मृतपुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्य में, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, हृदयाकाश भूताकाशमें, लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा लोहित और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है? ' [ याज्ञव-ल्क्य- ] ' हे प्रियदर्शन आर्तभाग! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे; यह प्रश्न जनसमुदायमें होने योग्य नहीं है । '
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६६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ तब उन दोनोंने उठकर [ एकान्तमें ] विचार किया । उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी ही प्रशंसा की । वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मंसे पापी होता है, इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
यत्रास्य पुरुषस्यासम्यग्दर्शिनः • जिस समय इस सम्यग्ज्ञानहीन शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले शिरःपाण्यादिमतो मृतस्य वागग्नि- मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है, प्राण वायुमें लीन हो मप्येति, वातं प्राणोऽप्येति चक्षु जाता है और चक्षु आदित्यमें लीन रादित्यमप्येतीति हो जाता है - इस प्रकार ' अप्येति ' सर्वत्र सम्बध्य- इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध ते । मनश्वन्द्रम्, दिशः श्रोत्रम्, पृथिवीं शरीरम्, आकाशमात्मेति अत्रात्मा अधिष्ठानं हृदयाकाश-मुच्यते स आकाशमप्येति; श्रोषधीरपियन्ति लोमानि वनस्पतीन पियन्ति केशाः; अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयत इति पुनरादानलिङ्गम् । सर्वत्र हि वागादिशब्देन देवताः परिगृह्यन्ते, न तु करणा-है । इसी प्रकार मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, आत्मा , आकाश में - ' आत्मा ' शब्दसे यहाँ उसका आश्रयभूत हृदयाकाश कहा गया है, वह आकाशमें लीन हो जाता है - लोम ओषधिमें लोन हो जाते हैं, केश वनस्पति में विलुप्त हो जाते हैं और लोहित तथा शुक्र जलमें स्थापित हो जाते हैं-' निधीयते ' यह. क्रियापद लोहित और शुक्रके पुनर्ग्रहणको सूचित करनेवाला है [ क्योंकि जो वस्तु कहीं स्थापित होती या रक्खी जाती है, उसको पुनः ग्रहण किया जा सकता है ] | यहाँ वागादि शब्दोंसे सर्वत्र देवता ही ग्रहण किये जाते हैं, मोक्ष होनेसे
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[ अध्याय ३ या । उन्होंने जो कुछ वह कर्मकी ही प्रशंसा - और पापकर्मसे पापी गया ॥ १३ ॥
य इस सम्यग्ज्ञानहीन व आदि अवयवोंवाले चाक् अग्निमें लीन हो वायुमें लीन हो चक्षु आदित्य में लीन - इस प्रकार ' अप्येति ' सर्वत्र सम्बन्ध है । न चन्द्रमामें, श्रोत्र पृथिवीमें, आत्मा वात्मा ' शब्द से यहाँ हात हृदयाकाश कहा आकाशमें लीन हो औषधिमें लोन हो वनस्पतिमें विलुप्त - लोहित तथा शुक्र हो जाते हैं-क्रियापद लोहित नर्ग्रहणको सूचित क्योंकि जो वस्तु होती या रक्खी पुनः ग्रहण किया 1 ब्दोंसे सर्वत्र देवता हैं, मोक्ष होने ब्राह्मण २ ]... शाङ्करभाष्यार्थ न्येवापक्रामन्ति प्राङ्मोक्षात् तत्र । देवताभिरनधिष्ठितानि करणानि न्यस्तदात्राद्युपमानानि, विदेश्व कर्ता पुरुषोऽस्वतन्त्रः किमाश्रितो भवति? इति पृच्छयते -क्वायं तदा पुरुषो भवतीति, किमाश्रित-स्तदा पुरुषो भवति? इति यमाश्रयमाश्रित्य पुनः कार्य-करणसङ्घातमुपादत्ते, येन ग्रहाति-ग्रहलक्षणं बन्धनं प्रयुज्यते, तत् किम्? इति प्रश्नः । अत्रोच्यते -- स्वभावयदृच्छाका-लकर्मद्वैवविज्ञानमात्रशून्यानि वा दिभिः परिकल्पितानि; अतो-ऽनेकविप्रतिपत्तिस्थानत्वान्नैव ज-न्पन्यायेन वस्तुनिर्णयः । अत्र वस्तुनिर्णयं चेदिच्छसि श्राहर सोम्य हस्तमार्तभाग हे, यावामेव ६६ ९ । पूर्वं इन्द्रियोंका उच्छेद नहीं होता । उस अवस्थामें देवताओंसे अनधि-ष्ठित इन्द्रियाँ कर्ताके हाथसे छूटे हुए दराँत आदि औजारोंके समान हो जाती हैं, अतः अस्वतन्त्र कर्ता पुरुष देहहीन होनेपर किसके आश्रित रहता है । यही ' कायं तदा पुरुषो भवति ' इस वाक्यसे पूछा जाता है, अर्थात् उस समय यह पुरुष किसके आश्रित रहता है? जिस आश्रयको आश्रित करके यह पुनः कार्यं - करण संघातको ग्रहण करता है और जिसकी प्रेरणा से ग्रहातिग्रहरूप बन्धन प्राप्त होता है, वह आश्रय क्या है? ऐसा प्रश्न है । इस विषय में यह कहा जाता है - वादियोंने स्वभाव, यदृच्छा, काल, कर्म, दैव, विज्ञानमात्र और शून्य ऐसे अनेकों आश्रयस्थानोंकी कल्पना की है; इसलिये अनेक विरोधोंका स्थान होनेके कारण केवल जल्पन्यायसे वस्तुका निर्णय नहीं हो सकता । इस विषयमें यदि तुम वस्तुका निर्णय सुनना चाहते हो तो हे प्रियदर्शन आर्तभाग! तुम मुझे अपना हाथ पकड़ाओ । तुम्हारे प्रश्नका जो ज्ञातव्य १. जीतकी इच्छासे किये हुए व्यर्थ उत्तर- प्रत्युत्तर या विवादको ' जल्प ' कहते हैं ।
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६७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ V एतस्य त्वत्पृष्टस्य वेदितव्यं यत, वेदिष्यावो निरूपयिष्यावः क-स्मात् १ न नौ श्रावयोरेतद्वस्तु सजने जनसमुदाये निर्णेतुं शक्य-ते; अत एकान्तं गमिष्यावो विचारणाय । तौ हेत्यादि श्रुतिवचनम्, तौ याज्ञवल्क्यार्त भागावेकान्तं गत्वा किं चक्रतुः १ इत्युच्यते - तौ होत्क्रम्य सजनाद्देशान्मन्त्रयाञ्च है, उसे हम दोनों ही मिलकर निरूपण करेंगे । क्यों? क्योंकि हम दोनों इस वस्तुका जनसमुदायमें निर्णय नहीं कर सकते; इसलिये | इसका विचार करनेके ये एकान्तमें चलेंगे I ' तौ ह ' इत्यादि श्रुतिका वचन है; उन याज्ञवल्क्य और आर्तभागने एकान्तमें जाकर क्या किया? सो बतलाया जाता है— उन्होंने जन-समुदाययुक्त स्थानसे निकलकर क्राते; आदौ लौकिकवा दिपक्षाणा - परस्पर विचार किया । पहले मेकैकं परिगृह्य विचारितवन्तौ । तौह विचार्य यदूचतुरपोस पूर्व-पक्षान् सर्वानेव, तच्छृणु; कर्म हैव श्राश्रयं पुनः पुनः कार्य-करणोपादान हेतुं तत्तत्रोचतुरुक्त-वन्तौ । न केवलम्; कालकर्म -देवेश्वरेष्वभ्युपगतेषु हेतुषु यत् प्रशशंसतुस्तौ कर्म हैव तत् प्रशशंसतुः । यस्मान्निर्धारितमेतत् कर्म-प्रयुक्तं ग्रहातिग्रहादिकार्यकरणो-पादानं पुनः पुनः, तस्मात् पुण्यो चे शास्त्रविहितेन पुण्येन लौकिक वादियोंके पक्षोंमेंसे एक-एकको लेकर मीमांसा की । इस प्रकार मीमांसा कर समस्त पूर्वपक्षों-का निराकरण कर उन्होंने जो कहा, सो सुनो; वहाँ उन्होंने पुनः पुनः कर्मको ही आश्रय अर्थात् देह और इन्द्रियोंके ग्रहणका हेतु बतलाया । इतना ही नहीं, अपितु स्वीकार किये हुए काल, कर्म, देव, ईश्वर आदि हेतुओंमें भी उन्होंने जो प्रशंसा की वह कर्मकी ही की । क्योंकि पुनः - पुनः यही निश्चय किया गया है कि ग्रहातिग्रहादिरूप कार्यं - करणसंघातका ग्रहण कर्मजनित है, इसलिये पुरुष पुण्य यानी शास्त्र-कर्मणा विहित कर्मसे पुण्य ( पुण्ययोनियुक्त)