बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 681–690
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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[ अध्याय३ हम दोनों ही मिलकर देंगे । क्यों? क्योंकि हम वस्तुका जनसमुदायमें कर सकते; इसलिये चार करनेके लिये लेंगे इत्यादि श्रुतिका वचन वल्क्य और आर्तभागने कर क्या किया? सो ता है— उन्होंने जन-स्थान से निकलकर चार किया । पहले यों पक्षोंमेंसे एक-- मीमांसा की । इस कर समस्त पूर्वपक्षों-ण कर उन्होंने जो ; वहाँ उन्होंने पुनः आश्रय अर्थात् देह ना ही नहीं, अपितु हुए काल, कर्म, दैव, तुओंमें भी उन्होंने वह कर्मकी ही की । नः - पुनः यही निश्चय कि ग्रहातिग्रहादिरूप तका ग्रहण कर्मजनित त्र पुण्य यानी शास्त्र-य ( पुण्ययोनियुक्त ) ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ भवति, तद्विपरीतेन विपरीतो भवति पापः पापेन -इत्येवं याज्ञवल्क्येन प्रश्नेषु निर्णीतेषु, ततोऽशक्यप्रकम्पत्वाद् याज्ञ-वल्क्यस्य, ह जारत्कार -भाग उपरराम ॥ १३ ॥
६७१ | होता है और उससे विपरीत पाप-कर्मसे पापयोनियुक्त होता है— इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा प्रश्नोंका निर्णय हो जानेपर याज्ञवल्क्यको वादके द्वारा स्वसिद्धान्तसे विचलित करना अशक्य समझकर जारत्का-व आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये द्वितीयमार्तंभागन्ब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - भुज्यु - संवाद अथ हैनं भुज्युर्लाद्यायनिः ' अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ । ग्रहातिग्रह- पप्रच्छ ' । ग्रहातिग्रहरूप बन्धनका पूर्वंवृत्ता- लक्षणं बन्धनमुक्तम्; नुवादः यस्यात् सप्रयोजका-न्मुक्तो मुच्यते, येन वा बद्धः संसरति, स मृत्युः । तस्माच्च मोक्षः उपपद्यते, यस्मान्मृत्यो-मृत्युरस्ति मुक्तस्य च न गतिः क्वचित्, सर्वोत्सादो नाममात्रा-वशेषः प्रदीपनिर्वाणवत् - इति चावधृतम् । वर्णन किया गया । जिस सप्रयोजक बन्धन से मुक्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है और जिससे बँधा होनेपर वह संसारको प्राप्त होता है, वही मृत्यु है । उससे मुक्त होना सम्भव है, क्योंकि उस मृत्युका मृत्यु भी है । और जो मुक्त है, उसका कहीं गमन नहीं होता; क्योंकि वह तो प्रदीपनिर्वाणके समान सबका उच्छेद होकर केवल नाममात्र अव-शिष्ट रह जाता है - ऐसा निश्चय किया जा चुका है ।
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६७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ तत्र संसरतां मुच्यमानानां च उनमें संसारबन्धनको प्राप्त और . कार्यकरणांनां स्व- मुक्त होते हुए देह और इन्द्रियों शुभाशुभ-कर्मक्षये एव कारणसंसर्गे समाने | अपने कारणसे संसर्ग होना समान होनेपर भी मुक्त पुरुषों को उनका मोक्षसम्भवः मुक्तानामत्यन्तमेव पुनः सर्वथा अग्रहण होता है; और पुनरनुपादानम्; संस- जिसकी प्रेरणासे संसारमें आनेवाले तां तु पुनः पुनरुपादानं येन पुरुषोंको उनका पुनर्ग्रहण होता है, प्रयुक्तानां भवति, तत् कर्म इत्यव - वह कर्म है - ऐसा विचारपूर्वक धारितं विचारणापूर्वकम् । तत्क्षये च नामावशेषेण सर्वोत्सादो मोक्षः । तच्च पुण्यपापाख्यं कर्म, ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ' ( बृ ० उ ० ३ । २ । १३ ) इत्यवधारितत्वात्, एतत्कृतः संसारः । तत्रापुण्येन स्थावरजङ्गमेषु स्व-मोक्षस्य पुष्य - भावदुःखबहुलेषु नरक-फलत्वनिरासा - - तिर्यक्प्रेतादिषु च योत्तरब्राह्मणम् दुःखमनुभवति पुनः पुनर्जायमानो म्रियमाणश्चेत्येतद राजवर्त्मवत् सर्वलोकप्रसिद्धम् । यस्तु शास्त्रीयः ‘ पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति ' तत्रैवादरः क्रियत । निर्णय किया गया है । उस ( कर्म ) का क्षय हो जानेपर जो नाममात्र शेष रहकर बाको सबका उच्छेद हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं । वह कर्म पुण्य और पाप संज्ञावाला है; ' क्योंकि ' पुण्यकर्म से पुण्यशरीरयुक्त होता है और पापकर्मसे पापशरीर-' युक्त ' ऐसा पहले निश्चय किया गया है; इसका किया हुआ ही संसार है । उनमें पापकर्म से जिनमें स्व-भावतः ही दुःखकी अधिकता है, उन नरक, तिर्यक एवं प्रेतादि स्थावर-जङ्गमयोनियों में पुनः पुनः जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ पुरुष दुःख अनुभव करता है - यह बात राजमार्गके समान समस्त जगत्में प्रसिद्ध है । यहाँ श्रुति ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति ' इस वाक्यसे प्रतिपादित जो शास्त्रीय मार्ग है, उसीमें आदर करती है । पुण्यकर्म ही
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[ अध्याय३ संसारबन्धन को प्राप्त और हुए देह और इन्द्रियोंका सें संसर्ग होना समान मुक्त पुरुषोंको उनका अग्रहण होता है; और से संसार में आनेवाले नका पुनर्ग्रहण होता है, है - ऐसा विचारपूर्वक गया है । उस ( कर्म ) जानेपर जो नाममात्र चाको सबका उच्छेद हो से मोक्ष कहते हैं । वह पाप संज्ञावाला है; नकर्मसे पुण्यशरीरयुक्त पापकर्मसे पापशरीर-हले निश्चय किया गया या हुआ हो संसार है । कर्मसे जिनमें स्व-खकी अधिकता है, उन एवं प्रेतादि स्थावर-में पुनः - पुनः जन्म प्राप्त होता हुआ पुरुष करता है - यह बात मान समस्त जगत्में श्रुति वै भवति ' इस वाक्यसे तो शास्त्रीय मार्ग है, करती है । पुण्यकर्म ही ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३ इह श्रुत्या | पुण्यमेव च कर्म सर्व पुरुषार्थसाधनमिति सर्वे श्रुति-स्मृतिवादा: । मोक्षस्यापि पुरु-पार्थत्वात् तत्साध्यता प्राप्ता । यावद्यावत्पुष्पोत्कर्षः तावत्ताव-स्फलोत्कर्षप्राप्तिः तस्मादुत्तमेन पुण्योत्कर्षेण मोक्षो भविष्यतीत्या-शङ्का स्यात्, सा निवर्तयितव्या । ज्ञानसहितस्य च प्रकृष्टस्य कर्मण एतावती गतिः, व्याकृतनाम - । रूपास्पदत्वात् कर्मणस्तत्फलस्य च, न त्वकार्ये नित्येऽव्याकृत-धर्मिणि अनामरूपात्मके क्रिया-कारक फलस्वभाववर्जिते कर्मणो व्यापारोऽस्ति यत्र च व्यापारः स संसार एवेत्यस्यार्थस्य प्रदर्श-नाय ब्राह्मणमारभ्यते । यत्त कैश्चिदुच्यते - विश्वास हितं विद्यासहितस्य कर्म निरभिसन्धि विध-कर्मण एव दध्यादिवत् कार्यान्तर- । वृ ० उ ० ४३-| समस्त पुरुषार्थोंका साधक है— ऐसा समस्त श्रुति - स्मृतियोंका सिद्धान्त है । अतः पुरुषार्थं होने के कारण मोक्षका भी उस पुण्यकर्मसे साध्य होना प्राप्त होता है जितनी-जितनी पुण्यकी उत्कृष्टता होती है, उतनी उतनी ही फलकी उत्कृष्टता प्राप्त होती है; इसलिये ऐसी आशङ्का हो सकती है कि उत्तम पुण्योत्कर्षसे मोक्ष प्राप्त होगा, सो इसकी निवृत्ति करनी चाहिये । ज्ञानसहित प्रकृष्ट कर्मकी तो इतनी ( संसारमात्र ) ही गति है; क्योंकि कर्म और उसके फलके आश्रय व्याकृत नाम - रूप ही हैं । जो किसी-का कार्य नहीं है, उस नित्य अव्या-कृतधर्मा, नामरूपरहित, क्रिया-कारकफलस्वभावहीन मोक्षमें कर्म-का कोई व्यापार नहीं हो सकता; और जहाँ व्यापार है, वहाँ संसार ही है - इस बातको प्रदर्शित करने-के लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है । कुछ लोगोंका जो कथन है कि फलाकाङ्क्षासे रहित होकर किया हुआ विद्यासहित कर्म विष और दधि आदिके समान कार्यान्तरका आरम्भ
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६७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ मोक्षजनकत्व- मारभत इति; तन्न; | करता है, ' सो ठीक नहीं है; क्योंकि मित्यच अनारम्यत्वान्मोक्षस्य । मोक्षका आरम्भ होनेवाला नहीं है । मोक्ष तो बन्धनका दूषयति बन्धननाश एव हि नाशमात्र मोक्षः, न कार्यभूतः बन्धनं चाविद्येत्यवोचाम; श्रविद्यायाश्च न कर्मणा नाश उपपद्यते, दृष्ट-विषयत्वाच्च कर्मसामर्थ्यस्य । उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्कारा हि कर्मसामर्थ्यस्य विषयाः । उत्पाद-यितुं प्रापयितुं विकर्तुं संस्कर्तु च सामर्थ्य कर्मणो नातो व्यति-रिक्तविषयोऽस्ति कर्मसामर्थ्यस्य लोके अप्रसिद्धत्वात् न च मोक्ष एषां पदार्थानामन्यतमः, अवि-द्यामात्रव्यवहित इत्यवोचाम । बाढम् भवतु केवलस्यैव कर्मण एवंस्वभावता, विद्यासं-ही है, वह किसीका कार्य नहीं है और बन्धन अविद्या है - ऐसा हम कह चुके हैं । तथा अविद्याका कर्म-से नाश होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जिनमें कर्मका सामर्थ्य है, वे विषय तो प्रत्यक्ष हैं । उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार ही कर्मके सामर्थ्य के विषय हैं । उत्पन्न करने, प्राप्त कराने, विकार करने और संस्कार करनेमें ही कर्मका सामर्थ्यं है; कर्मके सामर्थ्यका इनसे भिन्न कोई विषय नहीं है; कारण, लोकमें कर्मके सामर्थ्यका कोई अन्य विषय प्रसिद्ध नहीं है; और इनमेंसे ही किसी एक पदार्थका नाम मोक्ष है नहीं, वह तो केवल अविद्यासे ही व्यवधानयुक्त है— ऐसा हम कह चुके हैं । पूर्व ० - ठीक है, केवल कर्मका ऐसा ही स्वभाव रहे, किंतु युक्तस्य तु निरभिसन्धेः भवत्य- | ज्ञानसहित जो १. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार और फलाशासे रहित है, कारण होते हैं किंतु औषव विशेष और केवल विष और दही मृत्यु तथा ज्वरादिके आरोग्यवर्द्धक हो जाते हैं, उसी प्रकार शर्कराके यद्यपि साथ सेवन किये जानेपर वे ही तथापि निष्काम और ज्ञानके सहित होनेपर केवल कर्म बन्धनका कारण है, वही मुक्तिका कारण हो जाता है ।
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[ श्रध्याय३ १ सो ठीक नहीं है; क्योंकि आरम्भ होनेवालानहीं तो बन्धनकानाशमात्र - किसीका कार्य नहीं है न अविद्या है - ऐसा हम हैं । तथा अविद्याका कर्म-होना सम्भव नहीं है; नमें कर्मका सामर्थ्य है, तो प्रत्यक्ष हैं । उत्पत्ति, कार और संस्कार ही के विषय हैं । उत्पन्न कराने, विकार करने करनेमें ही कर्मका कर्म सामर्थ्यका इनसे विषय नहीं है; कारण, के सामर्थ्यका कोई प्रसिद्ध नहीं है; और किसी एक पदार्थका नहीं, वह तो केवल व्यवधानयुक्त है— -चुके हैं ।. क है, केवल कर्मका भाव रहे, किंतु जो र फलाशासे रहित है, ही मृत्यु तथा ज्वरादिके न किये जानेपर वे ही बन्धनका कारण है, कारण हो जाता है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७५ न्यथा स्वभावः । दृष्टं ह्यन्यशक्ति त्वेन निर्ज्ञातानामपि पदार्थानां विषदध्यादीनां विद्यामन्त्रशर्करा-दिसंयुक्तानामन्यविषये सामर्थ्यम् तथा कर्मणोऽप्यस्त्विति चेत्? न, प्रमाणाभावात् । तत्र हि कर्मण उक्तविषयव्यतिरेकेण वि-षयान्तरे सामर्थ्यास्तित्वे प्रमाणं न प्रत्यक्षं नानुमानं नोपमानं नार्थापत्तिर्न शब्दोऽस्ति । ननु फलान्तराभावे चोदना-न्यथानुपपत्तिः प्रमाणमिति । न । उसका दूसरा स्वभाव है । यह बात देखी गयी है कि जो अन्य शक्तिवाले माने गये हैं, उन विष एवं दधि आदि पदार्थोंका विद्या, मन्त्र एवं शर्करादिसे संयुक्त होनेपर अन्य विषयमें सामर्थ्य हो जाता । है । इसी प्रकार विद्यासहित कर्मका भी अन्य स्वभाव हो सकता है-ऐसा माना जाय तो! सिद्धान्ती – ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यहाँ कर्मके उक्त विषयोंसे भिन्न | किसी अन्य विषयमें सामर्थ्यं होनेका न प्रत्यक्ष प्रमाण है, न अनुमान है, न उपमान है, न अर्थापत्ति है और न शब्दप्रमाण है । पूर्व ० - किंतु [ नित्य और निष्काम कर्मोंका मोक्षके सिवा ] कोई अन्य फल न होनेपर किसी | अन्य कारणसे इनकी विधिको उप-पत्ति न होना ही इसमें [ अर्थापत्ति ] हि नित्यानां कर्मणां विश्वजिन्या - प्रमाण है । [ तात्पर्य यह है कि ] नित्य कर्मोंका विश्वजितॄन्यायसे तो कोई फल कल्पना किया नहीं येन फलं कल्प्यते, नापि श्रुतं । जाता और उनका कोई १. ' विश्वजिता यजेत ' - विश्वजित्यागसे यजन करे – इस वाक्यमें याग-कर्तव्यतारूप विधि देखी जाती है । इस विधिका कोई नियोज्य पुरुष होना चाहिये अर्थात् यह बतलाना चाहिये कि विश्वजित् यागसे कौन यजन करे । तो वहाँ ' स स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात् ' अर्थात् ' जहाँ किसी कर्मका कोई विशिष्ट फल न वतलाया गया हो, वहाँ उसका फल स्वर्ग ही समझना चाहिये, क्योंकि स्वर्गं सभी कर्मोंका सामान्य फल है, इस न्यायसे स्वर्गकाम ( स्वर्गकी इच्छावाला ) ही विश्वजित्यागका नियोज्य है - ऐसी कल्पना कर ली जायगी । यही विश्वजित्-न्याय है ।
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६७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ फलमस्ति; चोद्यन्ते च तानि | श्रुत फल भी है नहीं; तथा उनकी पारिशेष्यान्मोक्षस्तेषां फलमिति विधि है ही; इसलिये परिशेषतः मोक्ष ही उनका फल है - ऐसा गम्यते; अन्यथा हि पुरुषा न जाना जाता प्रवर्तेरन् । ननु विश्व जिन्न्याय एव आ-यातो मोक्षस्य फलस्य कल्पित-स्वात् । मोक्षे वान्यस्मिन् वा फलेऽकल्पिते पुरुषा न प्रवर्तेर-न्निति मोक्षः फलं कल्प्यते श्रुता-र्थापच्या, यथा विश्वजिति । नन्वे-वं सति कथमुच्यते विश्वजिन्न्या-यो न भवतीति । फलं च कल्प्य ते विश्वजिन्न्नायश्च न भवतीति विप्रतिषिद्धमभिधीयते । मोक्षः फलमेव न भवतीति चेन्नः प्रतिज्ञाहानात् ॥ कर्म कार्या! न्तरं विषदध्यादिवदारभतइति । १. जहाँ कोई बात स्वीकार किये है । नहीं तो पुरुषोंकी उनमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी । सिद्धान्ती- - तब तो यहाँ भी विश्वजित्न्याय ही आ जाता है; क्योंकि मोक्षरूप फलकी कल्पना की गयी है । मोक्ष अथवा किसी अन्य फलकी कल्पना न करनेपर पुरुषोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी, इसीसे विश्वजित्यागके स्वर्गंरूप फलके समान यहाँ ' श्रुतार्थापत्तिसे मोक्ष-रूप फलकी कल्पना की जाती है । किंतु ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि यहाँ विश्वजित्न्याय नहीं है । फलकी कल्पना भी की जाती है और विश्वजित्न्याय भी नहीं है- यह कथन तो विरुद्ध है । यदि कहो कि मोक्ष तो किसीका फल ही नहीं है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा भङ्ग होती है । तुमने यह प्रतिज्ञा की है कि विष और दधि आदिके समान बिना अनुपपत्ति आती हो, वहाँ उसे स्वीकार करना किसी श्रुत अर्थ में आपत्ति या है । मोक्षरूप फल स्वीकार किये बिना पड़ता है- यही श्रुतार्थापत्ति प्रमाण उसकी विधि व्यर्थ हो जायगी, इसलिये नित्यकर्मों में किसीकी प्रवृत्ति न होनेसे पड़ता है । श्रुतार्थापत्ति प्रमाणसे वह स्वीकार करना
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[ अध्याय३ न भी है नहीं; तथा उनकी - ही; इसलिये परिशेषतः 7 उनका फल है - ऐसा ता है । नहीं तो पुरुषोंकी वृत्ति ही नहीं होगी । हान्ती - तब तो यहाँ भी न्याय ही आ जाता है; नोक्षरूप फलकी कल्पना है । मोक्ष अथवा किसी की कल्पना न करनेपर त्रवृत्ति नहीं होगी, इसीसे नागके स्वर्गरूप फलके श्रुतार्थापत्तिसे मोक्ष-T कल्पना की जाती है । स्थिति में यह कैसे कहा कि यहाँ विश्वजित्न्याय कलकी कल्पना भी की और विश्वजित्न्याय भी ह कथन तो विरुद्ध है । हो कि मोक्ष तो किसीका है तो यह भी ठीक इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा । तुमने यह प्रतिज्ञा की और दधि आदिके समान न्यूत अर्थ में आपत्ति या - यही श्रुतार्थापत्ति प्रमाण कसीकी प्रवृत्ति न होनेसे कणसे वह स्वीकार करना ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७ हि प्रतिज्ञातम् । स चेन्मोक्षः कर्मणः कार्य फलमेव न भवतीति सा प्रतिज्ञा हीयेत 1 । कर्मकार्यत्वे च मोक्षस्य स्वर्गादिफलेभ्यो वि -शेषो वक्तव्यः ", अथ कर्मकार्य न भवति, ' नित्यानां कर्मणां फलं मोक्षः ' इत्यस्या वचनव्यक्तेः कोऽर्थ इति वक्तव्यम् । न च कार्य फल शब्दभेदमात्रेण विशेषः शक्यः कल्पयितुम् | अफलं च मोक्षः, नित्यैश्च कर्मभिः क्रियते 13; नित्यानां कर्मणां फलम्; न कार्यम्; इति चैषोऽर्थो विप्रति -षिद्धोऽभिधीयते यथाग्निः शीत इति । ज्ञानवदिति चेत् — यथा ज्ञा-नस्य कार्य मोक्षो ज्ञानेनाक्रियमा णो s प्युच्यते, तद्वत् कर्म कार्यस्वमि ति चेत्? न; अज्ञान निवर्तकत्वा-ज्ज्ञानस्य अज्ञानव्यवधाननिवर्त- । [ नित्य और निष्काम ] कर्म कार्यान्तरका आरम्भ करता है । यदि वह मोक्ष कर्मका कार्य- - फल ही न हो तो वह प्रतिज्ञा भंग हो जाती है । यदि मोक्ष कर्मका कार्य है तो स्वर्गादि फलोंसे उसका भेद बतलाना चाहिये और यदि वह कर्मका कार्य नहीं है तो | ' मोक्ष नित्य कर्मोंका फल है ' इस वाक्यका क्या अर्थं होगा — यह बतलाना चाहिये । ' कार्यं ' और ' फल ' शब्दोंके भेदमात्रसे ही किसी भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती । मोक्ष किसीका फल नहीं है और नित्य कर्मोंसे होता है, वह नित्य कर्मोंका फल है और कार्य नहीं है - यह सब विषय तो विरुद्ध ही कहा जाता है, जैसे कोई कहे-' अग्नि शीतल है । ' यदि कहो कि वह ज्ञानके समान उसका फल है अर्थात् जैसे ज्ञानद्वारा न किया जानेपर भी मोक्ष ज्ञानका कार्य कहा जाता है, उसी प्रकार वह कर्मका भी कार्य हो सकता है - तो यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि ज्ञान तो अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है । ज्ञान मोक्षके अज्ञानरूप व्यवधान की निवृत्ति करने-
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६७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय३ कत्वाज्ज्ञानस्य मोक्षो ज्ञानकार्यमि- | वाला है, इसलिये उपचारसे ऐसा त्युपचर्यते, न तु कर्मणा निवर्त - | कहा जाता है कि मोक्ष ज्ञानका कार्य है; किंतु कर्मसे अज्ञानकी यितव्यमज्ञानम्, न चाज्ञानव्य-निवृत्ति हो नहीं सकती और अज्ञान-तिरेकेण मोक्षस्य व्यवधानान्तर के सिवा मोक्षके किसी अन्य कल्पयितुं शक्यम्, नित्यत्वा -न्मोक्षस्य साधकस्वरूपाव्यति-रेकाच — यत्कर्मणा निवर्त्येत । अज्ञानमेव निवर्तयतीति चेन्न, विलक्षणत्वात् ॥ श्रनभिव्यक्तिर-व्यव-। धानकी कल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी कि कर्मसे निवृत्ति हो; क्योंकि मोक्ष नित्य है और साधकके स्वरूपसे अभिन्न है । यदि कहो कि कर्म भी अज्ञान-की ही निवृत्ति करता है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि कर्म ज्ञानसे ज्ञानम्, अभिव्यक्तिलक्षणेन ज्ञानेन विलक्षण है । अज्ञान अप्रकाशरूप विरुध्यते; कर्म तु नाज्ञानेन वि-रुभ्यते; तेन ज्ञानविलक्षणं कर्म । यदि ज्ञानाभावो यदि संशय ज्ञानं यदि विपरीतज्ञानं वोच्य तेऽज्ञानमिति, सर्वं हि तज्ज्ञाने -नैव निवर्त्यते, न तु कर्मणा, अन्यतमेनापि विरोधाभावात् । अथादृष्टं कर्मणामज्ञाननिवर्त-कत्वं कल्प्यमिति चेन्न, ज्ञानेन अज्ञाननिवृत्तौ गम्यमानायाम् । है, वह प्रकाशरूप ज्ञानका ही विरोधी है, कर्मका अज्ञानसे विरोध नहीं है; इसलिये कर्म ज्ञानसे विलक्षण है । यदि ज्ञानाभावको, संशयज्ञान-को अथवा विपरीत ज्ञानको अज्ञान कहा जाय तो इन सभीकी निवृत्ति ज्ञानसे ही हो सकती है; किसी भी कर्मसे नहीं हो सकती, क्योंकि उसका [ इनमें से किसी भी प्रकार -के ] अज्ञानके साथ विरोध नहीं है । यदि कहो कि कर्मोंका अज्ञान-निवर्तकत्व - यह अदृष्ट फल है ऐसी कल्पना कर लेनी चाहिये तो ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति
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[ अध्याय३ , इसलिये उपचारसे ऐसा ता है कि मोक्ष ज्ञानका किंतु कर्मसे अज्ञान की हो नहीं सकती और अज्ञान-मोक्षके किसी अन्य व्यव-कल्पना नहीं की जा जिसकी कि कर्मसे निवृत्ति कि मोक्ष नित्य है और स्वरूपसे अभिन्न है । कहो कि कर्म भी अज्ञान-नवृत्ति करता है तो यह ; क्योंकि कर्म ज्ञानसे है । अज्ञान अप्रकाशरूप प्रकाशरूप ज्ञानका ही कर्मका अज्ञानसे विरोध लिये कर्म ज्ञानसे विलक्षण नाभावको, संशयज्ञान-विपरीत ज्ञानको अज्ञान तो इन सभीकी निवृत्ति हो सकती है; किसी भी हो सकती, क्योंकि मेंसे किसी भी प्रकार-साथ विरोध नहीं है । हो कि कर्मोंका अज्ञान-यह अदृष्ट फल है ऐसी लेनी चाहिये तो ठीक ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७ ९ अदृष्ट निवृत्ति कल्पनानुपपत्तेः ॥ यथा अवघातेन व्रीहीणां तुष-निवृत्तौ गम्यमानायाम् अग्नि-होत्रादिनित्यकर्म कार्या अदृष्टा न कल्प्यते तुषनिवृत्तिः । तद्वद -ज्ञाननिवृत्तिरपि नित्यकर्मकार्या श्रदृष्टा न कल्प्यते । ज्ञानेन चिरुद्धस्वं चासकृत् कर्मणाम-वोचाम । यदविरुद्धं ज्ञानं कर्म-भिस्तद्देवलोक प्राप्तिनिमित्तमित्यु-• क्तम् " विद्यया देवलोकः " ( १ । ५ । १६ ) इति श्रुतेः । किञ्चान्यत्, कल्प्ये च फले नित्यानां कर्मणां श्रुतानां यत् कर्म -भिर्विरुध्यते द्रव्यगुणकर्मणां कार्य मेव न भवति, किं तत् कल्प्यताम्, यस्मिन् कर्मणः सामर्थ्यमेव न दृष्टम् १ किं वा यस्मिन् दृष्टं सामर्थ्यम्, यच्च कर्मणां फलम् अविरुद्धम्, तत् कल्प्यताम् १ इति । पुरुषप्रवृत्तिजननायावश्यं जब साक्षात् अनुभव होती है, तो अदृष्टफल के रूपमें निवृत्तिकी कल्पना करनी उपयुक्त नहीं है । जिस प्रकार [ मुसलसे. ] कूटनेपर धानके तुषको निवृत्ति होती है— यह स्पष्टतया ज्ञात होनेपर ऐसी कल्पना नहीं की जाती कि वह अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका अदृष्ट कार्यं है । इसी प्रकार अज्ञान निवृत्ति भी नित्यकर्मोंका कार्य एवं अदृष्ट फल है — ऐसी कल्पना नहीं की जाती । ज्ञानसे कर्मोंका विरोध है-यह तो हम अनेकों बार कह चुके हैं । जो ज्ञान कर्मोंसे अविरुद्ध है, वह तो " विद्यासे देवलोककी प्राप्ति होती है " इस श्रुतिके अनुसार देव-लोककी प्राप्तिका कारण है - ऐसा पहले बतलाया गया है । इसके सिवा, यदि श्रुति - प्रति-पादित नित्य कर्मों के फलकी कल्पना करनी ही है तो जो कर्मोंसे विरुद्ध स्वभाववाला है - जो द्रव्य, गुण और कर्मोंका कार्य ही नहीं हो सकता तथा जिसमें कर्मका सामर्थ्य ही नहीं देखा गया, क्या उसीकी कल्पना करनी चाहिये अथवा जिसमें कर्मोंका सामर्थ्य देखा गया है तथा जो कर्मोंका अविरुद्ध फल है, उसकी कल्पना की जाय? यदि पुरुषों की प्रवृत्ति करानेके लिये कर्मफलकी
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६८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ चेत् कर्मफलं कल्पयितव्यम्, 1 कल्पना करनी आवश्यक ही श्रुतार्थापत्तिका है तो पर्यवसान कर्मके कर्माविरुद्ध विषय एव श्रुताथापचः आप्ति, संस्कार और विकार ) में ही होने के क्षीणत्वान्नित्यो मोक्षः फलं कल्प- कारण उन्हींकी कल्पना करनी चाहिये, नित्य मोक्ष अथवा मोक्षके यितुं न शक्यः, तद्वचवधाना- व्यवधानभूत अज्ञानको निवृत्ति - ये कर्मोंके फलरूपसे कल्पना नहीं किये जा सकते; क्योंकि कर्म और ज्ञाननिवृत्तिर्वा अविरुद्धत्वाद् | अज्ञानका अविरोध है और जिन दृष्ट सामर्थ्य विषयत्वाच्चेति । पारिशेष्यन्यायान्मोक्ष एव क-ल्पयितव्य इति चेत् — सर्वेषां हि कर्मणां सर्वं फलम्, न चान्यदि-तरकर्मफलव्यतिरेकेण फलं कल्प. नायोग्य मस्ति; परिशिष्टश्च मोक्षः चेष्टो वेदविदां फलम्; तस्मात् स एव कल्पयितव्य इति चेत् १ न कर्मफलव्यक्तीनाम् आन-न्स्यादपारिशेष्यन्यायानुपपत्तेः । ( उत्पत्ति आदि ) में उनका सामर्थ्यं देखा गया है, वे ही उनके विषय हैं । पूर्व ० - पारिशेष्यन्यायसे मोक्षको ही नित्यकर्मों का फल मानना चाहिये - ऐसा कहें तो? तात्पर्यं यह है कि सब कुछ समस्त कर्मोंका ही फल है, नित्य कर्मोंके सिवा अन्य जितने कर्म हैं, उनके फलोंसे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है, जो नित्य कर्मोंके फलरूप से कल्पना किये जानेयोग्य हो; ऐसा तो केवल मोक्ष ही अवशिष्ट रहता है, अतः वेदवेत्ताओंको वही उसका फल इष्ट है; इसलिये उसीकी उसके फलरूपसे कल्पना करनी चाहिये-यदि ऐसा मानें तो? क्योंकि सिद्धान्तीय -यह ठीक नहीं है, कर्मफलको व्यक्तियाँ तो अनन्त हैं, इसलिये उनमें पारिशेष्य-न्याय लगाना उचित नहींहै ।