बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 691–700
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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[ अध्याय३ करनी आवश्यक त्तिका हो है तो पर्यवसान कर्मके विषयों ( उत्पत्ति, आप्ति और विकार ) में ही होनेके, उन्हीं की कल्पना करनी नत्य मोक्ष अथवा मोक्षके त अज्ञानको निवृत्ति - ये कलरूप से कल्पना नहीं नकते; क्योंकि कर्म और अविरोध है और जिन दि ) में उनका सामर्थ्यं ना है, वे ही उनके पारिशेष्यन्यायसे मोक्षको कर्मो का फल मानना -सा कहें तो? तात्पर्यं ब कुछ समस्त कर्मोंका नित्य कर्मोंके सिवा कर्म हैं, उनके फलोंसे और ऐसी वस्तु नहीं है, कर्मोंके फलरूपसे जानेयोग्य हो; ऐसा क्ष ही अवशिष्ट रहता त्ताओंको वही उसका इसलिये उसीकी उसके ना करनी चाहिये-नें तो? - यह ठीक नहीं है, लकी व्यक्तियाँ तो लिये उनमें पारिशेष्य-- उचित नहीं है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ न हि पुरुषेच्छाविषयाणां कर्म फलानामेतावत्वं नाम केनचिद् सर्वज्ञेनावधृतम्, तत्साधनानां वा पुरुषेच्छानां वा अनियतदेश-कालनिमित्तत्वात् पुरुषेच्छा-विषयसाधनानां च पुरुषेष्टफल-प्रयुक्तत्वात् । प्रतिप्राणि चेच्छा-वैचित्र्यात् फलानां तत्साधनानां चानन्त्यसिद्धिः । तदानन्त्याच्चा-शक्यमेतावत्वं पुरुषैर्ज्ञातुम् । अज्ञाते च साधनफलैतावच्चे कथं मोक्षस्य परिशेषसिद्धिरिति । कर्मफल जातिपारिशेष्यमिति चेत् — सत्यपि इच्छाविषयाणां तत्साधनानां चानन्त्ये, कर्मफल-जातित्वं नाम सर्वेषां तुल्यम् । मोक्षस्त्वकर्मफलत्वात् परिशिष्ट: स्यात् । तस्मात् परिशेषात् स एव युक्तः कल्पयितुमिति चेत् १ ६८१ | पुरुषकी इच्छाके विषयभूत कर्म-फलोंकी इयत्ताका किसी भी अस-वंज्ञ जीवने निश्चय नहीं किया; क्योंकि उनके साधन अथवा पुरुष-की इच्छाओंके देश, काल और निमित्त नियत नहीं हैं; कारण, वे पुरुषको इच्छाके विषय और उनके साधन पुरुषके इष्ट फलोंद्वारा प्रेरित हैं । अतः प्रत्येक प्राणीकी इच्छाओं-में विचित्रता रहनेके कारण उनके साधन और फलोंकी अनन्तताकी भी सिद्धि होती है । उनकी अनन्तता होनेके कारण पुरुषोंको उनकी इयत्ताका ज्ञान होना असम्भव है तथा साधन और फलोंकी इयत्ताका ज्ञान न होनेपर मोक्षकी परिशेषता कैसे सिद्ध हो सकती है? पूर्व ० - कर्मफलोंकी जातिक परिशेषता तो सिद्ध हो ही सकती है? इच्छा के विषय और उनके साधन अनन्त होनेपर भी उन सबमें कर्मफलजातित्व तो समान ही है किंतु मोक्ष कर्मफल है नहीं, अत: वही अवशिष्ट होना चाहिये; • इसलिये परिशेषतः उसीको नित्य कमका फल कल्पना करना उचित है - यदि ऐसा मानें तो?
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६८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय NA ३ न तस्यापि नित्यकर्मफलत्वा- सिद्धान्ती - ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि यदि उसे भी नित्य कर्मोंका, म्युपगमे कर्मफलसमानजातीय-फल माना जायगा तो उसमें भी त्वोपपत्तेः कर्मफलसे सजातीयताकी उपपत्ति परिशेषानुपपत्तिः । होनेसे परिशेषकी उपपत्ति नहीं हो तस्मादन्यथाप्युपपत्तेः क्षीणा सकेगी । इससे भिन्न प्रकारसे भी श्रुतार्थापत्तिः । उत्पस्याप्ति -विकारसंस्काराणामन्यतममपि नित्यानां कर्मणां फलमुपपद्यत इति क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । चतुर्णामन्यतम एव मोक्ष इति चेत् १ न तावदुत्पाद्यो नित्यत्वात्, अत एवाविकार्य:, असंस्का-र्यश्वात एवासाधनद्रव्यात्मक-। त्वाच्च, साधनात्मकं हि द्रव्यं संस्क्रियते, यथा पात्राज्यादि प्रोक्षणादिना न च संस्क्रिय -माणः, संस्कारनिर्वस्य वा यूपा-नित्यकर्मोंके फलकी उपपत्ति हो सकती है, इसलिये वहीं यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है । तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, आप्ति, विकार और संस्कारोंमें से कोई भी नित्यकर्मो का फल हो सकता है, इसलिये उन्हीं में यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है । पूर्व ० - यदि ऐसा मानें कि मोक्ष भी इन चारोंमेंसे ही कोई एक तो? सिद्धान्ती - नहीं, वह नित्य है, इसलिये उत्पाद्य नहीं हो सकता और इसी कारण विकार्य भी नहीं हो सकता और इसी कारणसे तथा साधनात्मक द्रव्य न होनेसे संस्कार्यं भी नहीं हो सकता, क्योंकि संस्कार साधनात्मक द्रव्यका ही होता है, जैसे प्रोक्षणादिसे पात्र और घृत आदि । मोक्ष न तो संस्कृत किया जानेवाला है और न यूपादि-के समान संस्कारद्वारा निष्पन्न होते-
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[ अध्याय३ -ऐसा नहीं कह सकते, द उसे भी नित्य कर्मोंका जायगा तो उसमें भी सजातीयताकी उपपत्ति षकी उपपत्ति नहीं हो ससे भिन्न प्रकारसे भी फलकी उपपत्ति हो इसलिये वहीँ यह क्षीण हो जाती है । है कि उत्पत्ति, आप्ति, संस्कारों में से कोई भी फल हो सकता है, में यह श्रुतार्थापत्ति है । दि ऐसा मानें कि मोक्ष मेंसे ही कोई एक नहीं, वह नित्य है, द्य नहीं हो सकता विकार्य भी नहीं - इसी कारण से तथा य न होनेसे संस्कार्य सकता, क्योंकि त्मक द्रव्यका ही प्रोक्षणादिसे पात्र । मोक्ष न तो संस्कृत है और न यूपादि-रद्वारा निष्पन्न होने-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३ दिवत् । पारिशेष्यादाप्यः स्यात्, । नाप्योऽपि, आत्मस्वभावत्वादेक-त्वाच्च । इतरैः कर्मभिर्वैलक्षण्याभि-त्यानां कर्मणां तत्फलेनापि विलक्षणेन भवितव्यमिति चेत् १ । न, कर्मत्वसालक्षण्यात् सलत्तणं कस्मात् फलं न भवतीतरकर्म -फलैः १ निमित्तवैलक्षण्यादिति चेत्? न, क्षामवत्यादिभिः समान-स्वात् यथा हि गृहदाहादौ । निमित्ते तामवत्यादीष्टिः, यथा भिन्ने जुहोति स्कन्ने जुहोतीत्ये-वमादौ नैमित्तिकेषु कर्मसु न मोक्षः फलं कल्प्यते, तैश्चाविशे-षान्नैमित्तिकत्वेन, जीवनादिनि-मित्ते च श्रवणात्, तथा नित्या-नामपि न मोक्षः फलम् । आलो -वाला है । परिशेषत: आप्प हो सकता है, सो आत्माका स्वभाव और एकमात्र होनेके कारण आप्य भी नहीं है । पूर्व ० - किंतु नित्य कर्म अन्य कर्मोंसे विलक्षण हैं, इसलिये उनका फल भी विलक्षण ही होना चाहिये । सिद्धान्ती- नहीं, कर्मत्वमें तो वे समान लक्षणवाले हैं, फिर उसका फल भी अन्य कर्मफलोंके समान लक्षणोंवाला ही क्यों न होगा? पूर्व ० - यदि कहें, अन्य कर्मोंसे निमित्तमें विलक्षणता होनेके कारण तो फलमें विलक्षणता होनी हो चाहिये तो? सिद्धान्ती- नहीं, क्योंकि क्षाम-वती आदि इष्टियोंसे इनकी समा-नता है; जिस प्रकार गृहदाहादि निमित्त होनेपर क्षामवती आदि इष्टियोंका विधान है और जैसे ' भिन्ने जुहोति ' ' स्कन्ने जुहोति ’ इत्यादि विधियोंमें भेदन और स्कन्दनके प्रायश्चित्तरूपसे किये हुए नैमित्तिक कर्मोका फल मोक्ष नहीं कल्पना किया जा सकता, क्योंकि नैमित्तिकत्वमें ये भी उनके समान ही हैं, कारण, श्रुति जीवनादि निमित्तसे इनका विधान करती है, इसी प्रकार नित्य कर्मोंका फल भी मोक्ष नहीं हो सकता । प्रकाश
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६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ कस्य सर्वेषां रूपदर्शनसाधनत्वे । उलूकादय श्रालोकेन रूपं न पश्यन्तीत्युलूकादिचक्षुषो चैल-क्षण्यादितरलोकचक्षुभिर्न रसादि-विषयत्वं परिकल्प्यते; रसादि-विषये सामर्थ्यस्यादृष्टत्वात् । सूदूरमपि गत्वा यद्विषये दृष्टं सामर्थ्यं तत्रैव कश्चित् विशेषः कल्पयितव्यः । यत् पुनरुक्तं विद्यामन्त्रशर्करा-दिसंयुक्त विषदध्यादिवन्नित्यानि कार्यान्तरमारभन्त इति; आर-म्यतां विशिष्टं कार्यं तदिष्टत्वाद-विरोधः । निरभिसन्धेः कर्मणो विद्यासंयुक्तस्य विशिष्टकार्यान्त-रारम्भे न कश्चिद् विरोधः । देव याज्यान्मयाजिनोरात्मयाजिनो विशेषश्रवणात् " देवयाजिनः श्रेयानात्मयाजी " इत्यादौ “ यदेव सबके लिये रूपदर्शनका साधन है, तथापि उल्लू आदिको प्रकाशसे रूपकी उपलब्धि नहीं होती; इस प्रकार उल्लूकी दृष्टिमें अन्य जीवों-की दृष्टिसे विलक्षणता होनेसे भी उसका विषय रसादि नहीं कल्पना किया जाता; क्योंकि रसादि विषयमें नेत्रका सामर्थ्य नहीं देखा जाता । बहुत दूर जाकर भी जिस विषय में जिसका सामर्थ्यं देखा जाता है, उसी में कुछ विशेष-की कल्पना करनी चाहिये; [ सबंधा विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है ] । और ऐसा जो कहा कि विद्या, मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदिके समान नित्यकर्म किसी अन्य कार्यका आरम्भ करते हैं, सो वे भले ही किसी विशिष्ट कार्यका आरम्भ करें, वह इष्ट होनेके कारण उससे हमारा कोई विरोध नहीं है । फलाशारहित विद्या-संयुक्त कर्मके विशिष्ट कार्यान्तर आरम्भ करनेमें हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि " देव-याजीसे आत्मयाजी श्रेष्ठ है " तथा " जो भी विद्यासे करता है वह बलवत्तर होता है " इत्यादि
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[ अध्याय ३ दर्शनका साधन है, आदिको प्रकाशसे नहीं होती; इस दृष्टिमें अन्य जीवों-नणता होनेसे भी नादि नहीं कल्पना क्योंकि रसादि सामर्थ्य नहीं हुत दूर जाकर भी जिसका सामर्थ्य उसी में कुछ विशेष-चाहिये; [ सर्वथा - करनी उचित कहा कि विद्या, दियुक्त विष और समान नित्यकर्म का आरम्भ करते ही किसी विशिष्ट करें, वह इष्ट ससे हमारा कोई लाशा रहित विद्या-शिष्ट कार्यान्तर - हमारा कोई क्योंकि " देव-जी श्रेष्ठ है " विद्यासे करता होता है " इत्यादि ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८५ ALMANNA विद्यया करोति " ( छा ० उ ०१ । १ । १० ) इत्यादौ च । यस्तु परमात्मदर्शनविषये मनुनोक्त श्रात्मयाजिशब्दः " समं पश्यन्नात्मयाजी " ( मनु ० १२ । ९ १ ) इत्यत्र, समं पश्यन्नात्म-याजी भवतीत्यर्थः, अथवा भूत-पूर्वगत्या । आत्मयाजी आत्म संस्कारार्थं नित्यानि कर्माणि करोति " इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते " इति श्रुतेः । तथा “ गार्भैर्होमैः ” इत्यादिप्रकरणे कार्यकरणसंस्कारा-र्थत्वं नित्यानां कर्मणां दर्शयति । संस्कृतश्च य आत्मयाजी तैः कर्मभिः समं द्रष्टुं समर्थो भवति । तस्येह वा जन्मान्तरे वा सम-मात्मदर्शनमुत्पद्यते । समं पश्यन् स्वाराज्यमधिगच्छतीत्येषोऽर्थः । आत्मयाजिशब्दस्तु भूतपूर्वगत्या प्रयुज्यते, ज्ञानयुक्तानां नित्यानां कर्मणां ज्ञानोत्पत्तिसाधनत्वप्रद-र्शनार्थम् । | वाक्योंमें देवयाजी और आत्मया-जियोंमें आत्मयाजी विशेष सुना गया है । मनुजीने जो " समं पश्यन्नात्म-याजी " इत्यादि वाक्यमें ‘ आत्मयाजी ’ | शब्दका परमात्मदर्शनके विषयमें प्रयोग किया है, उसका तात्पर्यं तो यह है कि समस्त भूतोंमें समदृष्टि रखनेवाला आत्मयाजी है, अथवा वहाँ भूतपूर्वं गतिसे इसका प्रयोग हो सकता है । " इसके द्वारा मेरा यह अङ्ग संस्कारयुक्त होता है " इस श्रुतिके अनुसार आत्मयाजी आत्माके संस्कारके लिये नित्य कर्मोंका अनु-ष्ठान करता है तथा " गर्भसम्बन्धी होमोंसे [ वीजगत पाप निवृत्त होते हैं ] " इत्यादि प्रकरणमें भी नित्य कर्मो का प्रयोजन देहेन्द्रियसंघातका संस्कार दिखाया गया है । जो आत्म-याजी उन कर्मोंसे संस्कृत हो गया है, वही समदर्शन में समर्थ होता है । उसको ही इस जन्ममें या जन्मान्तर-में सम आत्मदर्शन होना सम्भव है । इसका अर्थ यह है कि समदर्शन करनेवाला पुरुष स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है । यहाँ ' आत्मयाजी ' शब्दका प्रयोग तो ज्ञानयुक्त नित्य कर्मोंको ज्ञानोत्पत्तिकी साधनता प्रदर्शित करनेके लिये भूतपूर्वं गतिसे किया जाता है ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ६८६ किञ्चान्यत् " ब्रह्मा विश्वसृजो सकामानां नित्य - धर्मो महानव्यक्त-कर्मणां फलम् मेव च । उत्तमां सास्विकीमेतां गतिमाहुर्मनी-षिणः ” इति च देवसार्ष्टिव्यति-रेकेण भूताप्ययं दर्शयति " भूता -न्यप्येति पञ्च चै " । भूतान्यत्ये-तीति पाठं ये कुर्वन्ति, तेषां वेद -विषये परिच्छिन्नषु द्वित्वाददोषः । न चार्थवादत्वमध्यायस्य ब्रह्मान्तकर्मविपाकार्थस्य तद्वयति-रिक्तात्मज्ञानार्थस्य च कर्मकाण्डो-पनिषद्भयां तुल्यार्थत्वदर्शनात् ॥ विहिताकरणप्रतिषिद्धकर्मणां च स्थावरश्वसू करादिफलदर्शनात् वान्ताश्यादिप्रेतदर्शनाच्च । इसके सिवा दूसरी बात यह भी कही है कि " ब्रह्मा, विश्वस्रष्टा ( प्रजापति ), धर्म, महत्तत्त्व और अव्यक्त - इन्हें विचारवान् पुरुष उत्तम सात्त्विकी गति बतलाते हैं । " ' तथा " पाँच भूतोंमें लीन हो जाता है " यह स्मृति देवंसाष्टिसे भूतोंमें लय होनेको पृथक् दिखलाती है 1 । जो लोग यहाँ ' भूतान्यप्येति ' के स्थानमें ' भूतान्यत्येति ' ( भूतोंको पार कर जाता है ) ऐसा पाठ करते हैं, उनकी बुद्धि ही वेदके विषयमें सङ्कु-चित है, अतः उनका कोई दोष नहीं है । ब्रह्मलोकपर्यन्त कर्मविपाक जिसका विषय है तथा उससे भिन्न जो आत्मज्ञान है, वह जिसका प्रयोजन हैं, ऐसे इस अध्यायको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि कर्मकाण्ड और उपनिषद् इत देखी जाती है । तथा विहित कर्मों के न करने और प्रतिषिद्धोंके करनेका फल स्थावर एवं श्वान - सूकरादि योनियोंकी प्राप्ति देखा जाता है और उन्हें वमन भक्षण करनेवाले आदि प्रेत होते भी देखा जाता है । १. इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानयुक्त नित्य कर्मों का फल संसार ही है, अवश्य ही है वह सात्विक । २. इष्टदेवके समान ऐश्वर्यप्राप्ति ।
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अध्याय ३ दूसरी बात यह " ब्रह्मा, विश्वस्रष्टा में, महत्तत्त्व और रवान् पुरुष उत्तम ताते हैं । " " तथा तीन हो जाता है " ष्टिसे भूतोंमें लय दिखलाती है । जो न्यप्येति ' के स्थान में भूतोंको पार कर पाठ करते हैं, -दके विषयमें सङ्कु-उनका कोई दोष त कर्मविपाक तथा उससे भिन्न है, वह जिसका इस अध्यायको कहा जा सकता; ड और उपनिषद् सकी समानार्थता था विहित कर्मों के तिषिद्धों के करनेका श्वान - सूकरादि न देखा जाता है । भक्षण करनेवाले भी देखा जाता है । का फल संसार ही है, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८७ न च श्रुतिस्मृतिविहितप्रति-षिद्धव्यतिरेकेण विहितानि वा प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि केन-चिदवगन्तुं शक्यन्ते, येषाम-करणादनुष्ठानाच्च प्रेतश्वसूकरस्था-वरादीनि कर्मफलानि प्रत्यक्षानु-मानाभ्यामुपलभ्यन्तेः न चैषां कर्मफलत्वं केनचिदभ्युपगम्यते । और श्रुति - स्मृतिद्वारा जो विहित एवं प्रतिषिद्ध कर्म हैं, उनके सिवा दूसरे विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्मोंका किसीको भी ज्ञान नहीं हो सकता, जिनके न करने और करनेसे प्रत्यक्ष एवं अनुमानद्वारा प्रेत, श्वान, सूकर एवं स्थावरादि कर्मफल प्राप्त होते हैं । उनके कर्मफलोंकी कोई कल्पना ही कर लेता हो — ऐसी बात नहीं तस्माद्विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवानां है । अतः जिस प्रकार विहित कर्मों-यथैवे कर्मविपाकाः प्रेततिर्यक्स्था चरादयः, तथोत्कृष्टेष्वपि ब्रह्मा-न्तेषु कर्मविपाकत्वं वेदितव्यम् । तस्मात् ' स आत्मनो वपामुद-खिदत् ' ' सोऽरोदीत् ' इत्यादिव-न्नाभूतार्थवादत्वम्! तत्राप्यभूतार्थवादत्वं माभ्रू-दिति चेत् १ भवत्वेवम् न चैताबता अस्य न्यायस्य बाधो भवति न चास्मत्पक्षो वा दुष्यति, न च " ब्रह्मा विश्व-सृजः? इत्यादीनां काम्यकर्म-फलत्वं शक्यं वकुम्, तेषां देवसाष्टितायाः फलस्योक्तत्वात् । १. उस ( ब्रह्मा ) ने अपना वीर्य के न करने और प्रतिषिद्धोंके करने-के ये प्रेत, तिर्यक एवं स्थावरादि कर्मफल हैं, उसी प्रकार ब्रह्मा-पर्यन्त ' उत्कृष्ट पदोंको भी कर्मफल ही समझना चाहिये । अतः ‘ स ’ आत्मनो वपामुदखिदत् ' " सोऽरो-दीत् ' इत्यादि प्रकरणोंके समान इस अध्यायकी अभूतार्थवादता नहीं है । यदि कहो कि इन प्रकरणों में भी अभूतार्थंवादता नहीं माननी चाहिये तो ऐसा ही सही; किंतु इतनेहीसे इस न्यायका बाघ नहीं होता और न हमारा पक्ष ही दूषित होता है । " ब्रह्मा विश्व-सृजः " इत्यादिको काम्य कर्मोंका फल भी नहीं बतलाया जा सकता; क्योंकि उन काम्यकर्मों का फल तो देवसाष्टिता बतलाया गया पतन किया । २. वह ( रुद्र ) रोया ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ६८८ तस्मात् साभिसन्धीनां नित्यानां । कर्मणां सर्वमेधाश्वमेधादीनां च ब्रह्मत्वादीनि फलानि । येषां पुनर्नित्यानि निरभि-निष्कामानां नि- सन्धीन्यात्मसंस्का-त्यकर्मणामात्म- रार्थानि, तेषां ज्ञा-संस्कारार्थत्व-निरूपणम् नोत्पत्त्यर्थानि तानि । " ब्राह्मीयं क्रियते तनुः " इति स्मरणात् तेषामारादुपकारक-त्वान्मोक्षसाधनान्यपि कर्माणि भवन्तीति न विरुध्यते । यथा चायमर्थः षष्ठे जनकाख्यायिका-समाप्तौ वक्ष्यामः । यत्तु विषदध्यादिवदित्युक्तम्, तत्र प्रत्यक्षानुमानविषयत्वाद-विरोधः । यस्तु अत्यन्तशब्द-गम्योऽर्थः, तत्र वाक्यस्याभावे तदर्थप्रतिपादकस्य न शक्यं कल्पयितुं विषदध्यादिसाधर्म्यम् । है | अतः ये ब्रह्मत्वादि फला-काङ्क्षासहित नित्यकर्मोके ' और सर्वमेध, अश्वमेधादि यज्ञोंके फ़ल हैं । किंतु जिनके फलाशाशून्य नित्यकर्म चित्तशुद्धिके लिये होते हैं, उनके वे ज्ञानोत्पत्तिके कारण होते हैं, जैसा कि " यह शरीर ब्रह्म-भावकी प्राप्तिके योग्य किया जाता है " इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है । उन ( मुमुक्षुओं ) के समीपसे उपकारक होनेके कारण वे कर्म मोक्षके भी साधन होते हैं, इस-लिये इसमें कोई विरोध नहीं है । यह किस प्रकार मोक्षका साधन है, यह बात हम छठे [ अर्थात् इस उपनिषट्के चौथे ] अध्यायमें जनक-आख्यायिकाकी समाप्ति में कहेंगे । ऊपर जो विष और दधि आदिके समान – ऐसा कहा है, सो वे ( मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदि ) तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणके विषय हैं, इस-लिये उनके विषयसे वैसा कहनेमें कोई विरोध नहीं है । परंतु जो विषय सर्वथा शब्दसे ही जाना जा सकता है, उसके विषयमें उस अर्थंका प्रतिपादन करनेवाला कोई वाक्य न होनेके कारण उसका विष एवं दधि आदिसे साधर्म्य नहीं कल्पना किया जा सकता ।
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[ श्रध्याय ३ ब्रह्मत्वादि फला-नित्यकर्मों और बादि यज्ञोंके फल हैं । नके फलाशाशून्य शुद्धिके लिये होते नोत्पत्तिके कारण क " यह शरीर ब्रह्म-योग्य किया जाता प्रमाणित होता शुओं ) के समीपसे के कारण वे कर्म धन होते हैं, इस-ई विरोध नहीं है । - मोक्षका साधन छठे [ अर्थात् इस ] अध्यायमें जनक-समाप्तिकहेंगे । विष और दधि ऐसा कहा है, वं शर्करादियुक्त विष ब ) तो प्रत्यक्ष और के विषय हैं, इस-यसे वैसा कहने में नहीं है । परंतु जो शब्दसे ही जाना जा सके विषय में उस दन करनेवाला कोई के कारण उसका आदिसे साधर्म्यं नहीं जा सकता । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८ ९ न च प्रमाणान्तर विरुद्धार्थविषये । श्रुतेः प्रामाण्यं कल्प्यते, यथा शीतोऽग्निः क्लेदयतीति । श्रुते तु तादयै वाक्यस्य प्रमाणान्तरस्य आभासत्वम् । यथा खद्योतोऽग्नि-रिति, तलमलिनमन्तरिक्षमिति बालानां यत् प्रत्यक्षमपि तद्विषय-प्रमाणान्तरस्य यथार्थत्वे निश्चिते, निश्चितार्थमपि बालप्रत्यक्षम् आभासी भवति । तस्माद् वेदप्रामाण्यस्याव्यमि-प्रकरणार्थ- चारात्तादयें सति वा-निर्धारणम् क्यस्य तथात्वं स्यात्, न तु पुरुषमतिकौशलम् । न हि पुरुषमतिकौशलात् सविता रूपं न प्रकाशयति । तथा वेदवाक्यानि १. यह बात प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध वह प्रमाण नहीं माना जा सकता । और जो विषय प्रमाणान्तरसे विरुद्ध है, उसमें श्रुतिप्रामाण्यकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, जैसे कोई कहे कि ' अग्नि शीतल होता है और भिगो देता है । " वाक्यका बेसा अर्थं यदि श्रुतिसम्मत हो तो अन्य प्रमाण प्रमाणाभास हो जाते हैं । जैसे मूर्खोको यह प्रत्यक्ष होता कि खद्योत अग्नि है, अन्तरिक्षका तल मलिन होता है; तथापि उनके विषय में यथार्थताका प्रमाणान्तरसे निश्चय हो जानेपर वह मूर्खोद्वारा प्रत्यक्ष किया हुआ निश्चित अर्थ भी मिथ्या हो जाता है । • अतः वेदके प्रामाण्यका सर्वदा अव्यभिचार होनेके कारण उसका वैसा तात्पर्य होनेपर ही वाक्यकी यथार्थता होती है, केवल मनुष्यकी बुद्धिका कौशल ही वाक्यार्थंका निर्णय नहीं कर सकता । ' पुरुषकी बुद्धिके कौशलसे ही यह सिद्ध नहीं हो सकता कि सूर्य प्रकाश नहीं करता । इसी प्रकार वेदवाक्योंका भी है, इसलिये यदि कोई ऐसा वाक्य हो तो २. तात्पर्य यह है कि उपक्रम और उपसंहारादि लिङ्गोंसे जिस वाक्यत्रा जैसा तात्पर्य होता है, वही प्रमाणभूत माना जाता है, केवल बुद्धिकौशल से कल्पना किया हुआ अर्थ प्रामाणिक नहीं होता । बृ ० उ ० ४४-
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६ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ श्रपि नान्यार्थानि भवन्ति तस्मान्न । मोक्षार्थानि कर्माणीति सिद्धम् । अत: काफिलानां संसारत्वप्रदर्श नायैव ब्राह्मणमारभ्यते -. NNNNN [ विभिन्न बुद्धियों के अनुसार ] भिन्न-भिन्न अर्थ नहीं किया जा सकता अतः यह सिद्ध हुआ फल मोक्ष नहीं है 1 । अत: कर्मफलों-का संसारत्व प्रदर्शित करनेके लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है-पारिक्षित कहाँ रहे? N अथ हैनं भुज्युलह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानेम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् सुधन्वाङ्गिरस इति तं यदा लोकानामन्तानपृच्छामाथैनमब्र म क पारिक्षिता अभ-वन्निति क्क पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञ-वल्क्य क पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे लाह्यायनि भुज्युने पूछा । वह बोला ' हे याज्ञवल्क्य! हम व्रताचरण करते हुए मद्रदेशमें विचर रहे थे कि कपि-गोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर पहुँचे । उसकी पुत्री गन्धर्वसे गृहीत थी । [ अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था ] हमने उससे पूछा, ' तू कौन है? ' वह बोला ' आङ्गिरस सुधन्वा हूँ । ' जब उससे लोकोंके अन्तके विषय में पूछा तो हमने उससे यों कहा, ' पारिक्षित कहाँ रहे? पारिक्षित कहाँ रहे? " सो हम तुमसे पूछते हैं कि ' पारिक्षित कहाँ रहे? ' ॥ १ ॥
अथानन्तरम् उपरते जारत्कारवे, फिर — इसके पश्चात् भुज्युरिति नामतो लह्यस्यापत्यं जरत्कारुपुत्र 1 आर्तभागके चुप | हो जानेपर भुज्युनाम वाले