बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 701–710

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

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[ अध्याय ३ NNNNN के अनुसार ] भिन्न-= किया जा सकता हुआ है । अत: कर्मफलों-दर्शित करनेके लिये आरम्भ किया - याज्ञवल्क्येति... लिस्य काप्यस्य ना तमपृच्छाम इति तं यदा रिक्षिता अभ-बच्छामि याज्ञ-॥ वह बोला ' र रहे थे कि कपि-ही थी । [ अर्थात् तू कौन है? " वह न्तके विषयमें पूछा रिक्षित कहाँ रहे? " ३ ॥सके पश्चात् भ चुप - भुज्युनाम वाले ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९ १ लाह्मस्तदपत्यं लाह्यायनिः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाच । आदावु क्तमश्वमेधदर्शनम्; समष्टिव्यष्टिफलश्वाश्वमेधक्रतुः, ज्ञानसमुच्चितो वा केवलज्ञान-सम्पादितो वा, सर्वकर्मणां परा काष्ठा; भ्रूणहत्याश्वमेधाभ्यां न परं पुण्यपापयोरिति हि स्मरन्तिः तेन हि समष्टि व्यष्टीश्च प्राप्नोति तत्र व्यष्टयो निर्ज्ञाता अन्तरण्ड-विषया अश्वमेधयागफलभूताः; ' मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेका भवति ' ( १ । २ । ७ ) इत्युक्तम् । मृत्युश्वाशनायालक्षणो बुद्ध्या-त्मा समष्टिः प्रथमजो वायुः सूत्रं सत्यं हिरण्यगर्भः; तस्य व्याकृतो विषयः - यदात्मकं सर्वं द्वैतैकत्वम् । लाह्यायनि लाके पुत्रको लाह्य कहते ' हैं, उसके पुत्र लाह्यायनिने पूछा । उसने कहा, ' हे याज्ञवल्क्य! ' [ इस उपनिषद्के ] आरम्भमें अश्वमेधदर्शन कहा गया है । अश्व-मेघ यज्ञ समष्टि और व्यष्टि फल देनेवाला है । वह ज्ञानसमुच्चित हो अथवा केवल ज्ञानसम्पादित हो समस्त कर्मोंकी पराकाष्ठा है । भ्रूण-हत्यासे बढ़कर कोई पाप और अश्व-मेघसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं है -ऐसी स्मृति है । उस ( अश्वमेब ) के द्वारा हो पुरुष समष्टि या व्यष्टि फलको प्राप्त करता है 1 । उनमें जो अश्वमेधयागके फलभूत [ अग्नि, वायु और आदित्यादि ] अण्डान्तर्गत देवता हैं, वे व्यष्टि जाने गये हैं तथा [ समष्टि देवताके विषयमें ] ' मृत्यु इसका आत्मा हो जाता है, यह इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है ' ऐसा कहा है । वह मृत्यु क्षुधारूप बुद्धयात्मा और समष्टि है, वह प्रथमोत्पन्न वायु, सूत्रात्मा, सत्य और हिरण्यगर्भ है । जितना भी सम्पूर्ण द्वैत ( व्यष्टि ) और एकत्व ( समष्टि ) है, उसका जो स्वरूपभूत है, वह व्याकृत उसका

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ६ ९ २ यः सर्वभूतान्तरात्मा लिम . अमूर्तरसो यदाश्रितानि सर्वभूत कर्माणि, यः कर्मणां कर्म-सम्बद्धानां च विज्ञानानां परा गतिः परं फलम्, तस्य कियान् गोचरः कियती व्याप्तिः सर्वतः परिमण्डलीभूता सा वक्तव्या; तस्याम् उक्तायां सर्वः संसारो बन्धगोचर उक्तो भवति । तस्य च समष्टिव्यष्टद्यात्मदर्शनस्य अलौकिकत्व प्रदर्शनार्थमाख्या-यिम्रकित्मिनो वृत्तां प्रकुरुते; तेन च प्रतिवादिबुद्धिं व्यामोहयिष्या-मीति मन्यते । सद्वेषु मद्रा नाम जनपदास्तेषु, चरका अध्ययनार्थं व्रतचरणाच्चर-का अध्वर्यवो वा, पर्यव्रजाम पर्य-टितवन्तः ते पतञ्चलस्य - ते वयं पर्यटन्तः, पतञ्चलस्य नामतः, का-प्यस्य कपिगोत्रस्य, गृहान् ऐम गतवन्तः । तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता - गन्धर्वेण अमानु पेण सत्त्वेन केनचिदाविष्टा; गन्धर्वो वा धिष्ण्योऽग्निर्ऋत्विग्-देवता विशिष्टविज्ञानत्वादव-विषय है । जो समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, लिङ्ग और अमूर्त रस है, सम्पूर्ण भूत भूत जिसके जिसके आश्रित आश्रित हैं हैं,, जो जो सम्पूर्ण कर्मों और कर्मोंसे सम्बद्ध वि विज्ञानोंकी परा गति और परम फल है, उसका कितना विषय है – सब ओरसे मण्डलाकार फैली हुई कितनी व्याप्ति है - यह बतलानी चाहिये; उसे बतला दिये जानेपर बन्धका विषय-भूत सारा संसार बता दिया जायगा । उस समष्टि - व्यष्टिरूप दर्शनका अलौकिकत्व प्रदर्शित करनेके लिये भुज्यु अपने साथ बीती हुई आख्या-यिका कहता है और समझता है कि इससे में अपने प्रतिवादीकी बुद्धिमें व्यामोह पैदा कर दूँगा ।. हम मद्रोंमें- -मद्र नामके जो देश हैं, उनमें ",, चरक — अध्ययनक लिये व्रताचरण करनेसे चरक अथवा अध्वर्यु होकर विचर रहे थे; वे हम विचरते - विचरते काप्य- य - कपि-गोत्रोत्पन्न पतञ्चल नामवाले. पुरुषके यहाँ पहुँचे । उसकी पुत्री गन्धर्व - गृहीता थी— गन्धर्व अर्थात् किसी अमानवजीवसे आविष्ट थी । अथवा विशिष्ट ज्ञानवान् होनेसे ' गन्धर्व ' शब्दसे धिष्ण्य यानी गृह्य अग्नि ऋत्विग्देवता निश्चय किया

पृष्ठ 703

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[ अध्याय ३ जो समस्त भूतोंका और अमूर्त रस है, सके आश्रित हैं, जो से सम्बद्ध विज्ञानोंकी - परम फल है, उसका न्य है- - सब ओरसे ली हुई कितनी व्याप्ति नानी चाहिये; उसे नेपर बन्धका विषय-र बता दिया जायगा । व्यष्टिरूप दर्शनका दर्शित करनेके लिये बीती हुई आख्या-और समझता है कि प्रतिवादीकी बुद्धिमें कर दूँगा ।. -मद्र नामके जो देश क - अध्ययन के लिये रनेसे चरक अथवा विचर रहे थे; वे हम काप्य - कपि-पतञ्चल नामवाले पहुँचे । उसकी पुत्री थी — गन्धर्व अर्थात् वजीवसे आविष्ट थी । ष्ट ज्ञानवान् होनेसे सेधिष्ण्य यानी गृह्य देवता निश्चय किया ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९ ३ सीयते न हि सत्रमात्रस्येदृशं । विज्ञानमुपपद्यते । तं सर्वे वयं परिवारिताः सन्तो पृच्छाम - कोऽसीति,, कस्त्वमसि किन्नामा किंसतच्चः । सोऽब्रवीद् गन्धर्वः — सुधन्वा नामतः, आङ्गिरसो गोत्रतः । तं यदा यस्मिन् काले लोकानामन्तान् पर्यवसानानि अपृच्छाम अथैनं गन्धर्वमब्रूम — भुवनकोशपरि-माणज्ञानाय प्रवृत्तेषु सर्वेष्वात्मानं श्लाघयन्तः पृष्टवन्तो वयम्; कथम्? क पारिक्षिता श्रम-वन्निति । स च गन्धर्वः सर्वमस्मभ्यमत्र-वीत् । तेन दिव्येभ्यो मया लब्धं ज्ञानम्, तत्तव नास्ति, अतो निगृहीतोऽसि, इत्यभिप्रायः । सोऽहं विद्यासम्पन्नो लब्धागमो गन्धर्वात् त्वा त्वां पृच्छामि याज्ञ-वल्क्य- - क्क पारिक्षिता अभवन्-तत् त्वं किं जानासि? हे याज्ञ-चल्क्य ' कथय व पृच्छामि पारि-. क्षिता भवन्निति ॥ १ ॥

जाता है; क्योंकि केवल किसी जीव-मात्रका ऐसा ज्ञान होना सम्भव नहीं है । हम सबने उसे चारों ओरसे घेरकर पूछा, ' तुम कौन हो? तुम्हारा क्या नाम है और क्या स्वरूप है? ' उस गन्धर्वने कहा, ' नामसे में सुधन्वा हूँ और गोत्रसे आङ्गिरस हूँ । ' फिर जब उससे लोकोंके अन्त यानी पर्यंवसानके विषय में पूछा तो हमने उस गन्धर्वसे कहा, अर्थात् भुवनकोशका परिमाण जाननेके लिये प्रवृत्त होनेपर हम सबने अपनी प्रशंसा करते हुए पूछा । किस प्रकार पूछा — ' पारि-क्षित कहाँ रहे? ' और उस गन्धर्वने हमें सब बातें बता दीं । अत: मैंने दिव्य जीवोंसे ज्ञान प्राप्त किया है, वह तुमको प्राप्त नहीं है; इसलिये अब तुम हरा दिये गये – ऐसा इसका अभिप्राय है । मैं विद्यासम्पन्न हूँ और मुझे गन्धर्वसे शास्त्रज्ञान प्राप्त हुआ है, वही मैं तुमसे पूछता हूँ कि हे याज्ञवल्क्य! क्या तुम जानते हो कि पारिक्षित कहाँ रहे? हे याज्ञ-वल्क्य! बताओ, में पूछता हूँ कि पारिक्षित कहाँ रहे? ॥ १ ॥

पृष्ठ 704

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६ ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ पारिक्षितों की गतिका वर्णन स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्व-मेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिशतं वै देवरथाह्वयान्ययं लोकस्त ँ समन्तं पृथिवी 7 द्विस्तावत् पर्येति ता ँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्राय-च्छत्तान् वायुरात्मनिधित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधया-जिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशश ँ स तस्मा-द्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेघ यज्ञ करनेवाले जाते हैं । ' [ भुज्यु ] ' अच्छा तो, अश्वमेघयाजी कहाँ जाते हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' यह लोक बत्तीस देवरथा-ह्रय है । उसे चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है । उस पृथिवीको सब ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है । सो जितनी पतली छुरेकी धार होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पंख होता है, उतना उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है । इन्द्र ( चित्य अग्नि ) ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया । उन्हें वायु अपने स्वरूप में स्थापित कर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी । अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है 1 । जो ऐसा जानता है,

वह पुनमृत्युको जीत लेता है । ' तब लाह्यायनि भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥

स होवाच याज्ञवल्क्यः; उवाच उस याज्ञवल्क्यने कहा- ' उसने व सः - वैशब्दः स्मरणाथः- निश्चय यही कहा था ' — यहाँ ' वै ' शब्द स्मरणके लिये है -- उस गन्धर्वने उवाच वै स गन्धर्वस्तुभ्यम् | निश्चय तुमसे यही कहा था कि बे

पृष्ठ 705

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[ अध्याय ३ चैते तद्यत्राश्व-जेनो गच्छन्तीति समन्तं पृथिवी विस्तावत् समुद्रः मक्षिकायाः पत्र वायवे प्राय-नद्यत्राश्वमेधया-शशस तस्मा-जयति य एवं । २ ॥ यह कहा था कि वे - [ भुज्यु ] ' अच्छा तो, लोक बत्तीस देवरथा-उस पृथिवीको सब छुरेकी धार होती है, उन अण्डकपालों के कर उन पारिक्षितोंको र वहाँ ले गया, जहाँ युकी ही प्रशंसा की जो ऐसा जानता है, चुप हो गया ॥ २ ॥

ल्क्यने कहा- ' उसने हा था ' – यहां ' वै ' लिये है -- उस गन्धर्वने यही कहा था कि वे ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९ ५ अगच्छन् वै ते पारिक्षिताः, तत् । तत्र; क्व १ यत्र यस्मिन्नश्वमेध -याजिनो गच्छन्ति इति निर्णीते प्रश्ने आह- कनु कस्मिन्नश्वमेध -याजिनो गच्छन्तीति । तेषां गतिविवक्षया भुवनकोशपरि-माण माह-द्वात्रिंशतं वै द्वे अधिके त्रिंशद् द्वात्रिंशतं वै, देवरथाया-निदेव आदित्यस्तस्य रथो देवरथस्तस्य रथस्य गत्या श्रद्धा यावत् परिच्छिद्यते देशपरिमाणं तद् देवरथाह्वयम्, तद् द्वात्रिंशद् -गुणितं देवरथाह्वयानि, तावत्परि-माणोऽयं लोको लोकालोक गिरि-. णा परिक्षिप्तः; यत्र वैराजं शरीरं यत्र च कर्मफलोपभोगः प्राणिनां स एष लोकः; एतावन्लोकः, । अतः परम् आलोकः । तं लोकं समन्तं समन्ततः -लोकविस्ताराद् द्विगुणपरिमाण-विस्तारेण परिमाणेन, तं लोकं परिक्षिप्ता पर्येति पृथिवी; तां पृथिवीं तथैव समन्तम्, द्विस्तावद् पारिक्षित वहाँ चले गये । कहाँ? -जहाँ अर्थात् जिस लोक में अश्वमेघ-याजी जाते हैं - इस प्रकार प्रश्न-का निर्णय हो जानेपर भुज्यु बोला- ' कहाँ अर्थात् किस लोकमें अश्वमेवयाजी जाते हैं? ' तब याज्ञ वल्क्य उनकी गति बतलाने की इच्छासे भुवनकोशका परिमाण · बताते हैं— यह लोक द्वात्रिंशत् - दो अधिक तीस अर्थात् बत्तीस देवरथाह्न्न्य है । देव हे आदित्य ( सूर्य ) उसका रथ ही देवरथ है, उस रथकी गति-से एक दिनमें संसारका जितना भाग मापा जाता है, उतना देव रथाह्न्य कहलाता है, उसको बत्तीसगुना करनेपर बत्तीस देव-रथान्य होते हैं । लोकालोकपर्वत-से घिरा हुआ यह लोक इतने परि-माणवाला है; जहाँ वैराज शरीर है और जिसमें प्राणियोंके कर्मफल-का उपभोग होता है, वह यही लोक है । इतना तो लोक है; इससे आगे अलोक है । उस लोकको चारों ओरसे लोकविस्तारको अपेक्षा दूने परिमाणके विस्तारवाले परिमाण-से पृथिवी घेरे हुए है । इसी प्रकार उस पृथिवीको उससे दूने परिमाणसे सब ओरसे

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. ६ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ द्विगुणेन परिमाणेन समुद्रः पर्यति, यं घनोदमाचक्षते पौराणिका: । तत्र. अण्डकपालयोविंवर-परिमाणमुच्यते, येन विवरेण मार्गेण बहिर्निर्गच्छन्तौ व्याप्तु-वन्त्यश्वमेधयाजिनः । तत्र यावती यावत्परिमाणा क्षुरस्य धारा अग्रम्, यावद्वा सौक्ष्म्येण युक्तं मक्षिकायाः पत्रम्, तावां-स्तावत्परिमाणः, अन्तरेण मध्ये अण्डकपालयोः, आकाश-श्छिद्रम्, तेनाकाशेनेत्येतत् । तान् पारिक्षितानश्वमेधया-जिनः प्राप्तानिन्द्रः परमेश्वरः-योऽश्वमेधेऽग्निश्चितः, सुपर्णः -यद्विषयं दर्शनमुक्तम् —'तस्य प्राची दिक्शिरः ' इत्यादिना, सुपर्णः पक्षी भूत्वा पक्षपुच्छा-द्यात्मकः सुपर्णो भूत्वा, वायवे प्रायच्छत् - मूर्तत्वान्नास्त्यात्मनो गतिस्तत्रेति; तान् पारिक्षितान् वायुरात्मनि धित्वा स्थापयित्वा स्वात्मभूतान् कृत्वा तत्र तस्मिन्न-गमयत्; क्क १ यत्र पूर्वेऽतिक्रान्ताः पारिक्षिता अश्वमेधयाजिनोऽभव-समुद्र घेरे हुए है, जिसे पौराणिक ' घनोद ' कहते हैं । अब अण्डकपालोंके छिद्रका परिमाण बतलाया जाता है, छिद्ररूप मार्गसे बाहर जानेवाले अश्वमेधयाजी व्याप्त होते हैं । जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली छुरेकी धार होती है, यानी जितना छुरेका अग्रभाग होता है, अथवा जितनी सूक्ष्मतासे युक्त मक्खीका पंख होता है, उतने परिमाणवाला अण्डकपालों के मध्य में आकाश - छिद्र होता है । उस आकाशसे [ वे जाते हैं ] - ऐसा इसका तात्पर्य है । उन प्राप्त हुए पारिक्षितों— अश्वमेधयाजियोंको इन्द्र- परमेश्वर-ने— जो अश्वमेधयागमें चयन किया हुआ अग्नि ही है, सुपर्णं होकर जिसके विषयमें कि ' उसका प्राची दिशा शिर है ' इत्यादि मन्त्र-से दृष्टि करना बताया गया है, सुपर्ण - पक्षी होकर अर्थात् पंख और पूँछवाला पक्षी होकर वायुको दे दिया, क्योंकि मूर्त होनेके कारण उसे वहां अपनी गति दिखायी नहीं देती; उन पारिक्षितोंको वायुने अपने में स्थापित कर-उन्हें अपने स्वरूपभूत कर वहीं पहुँचा दिया । कहाँ? – जहाँ पूर्ववर्ती अर्थात् अतीत पारि-क्षित - अश्वमेघयाजी रहे । इस

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[ अध्याय ३ है, जिसे पौराणिक हैं । कपालोंके छिद्रका लाया जाता है, जिस से बाहर जानेवाले व्याप्त होते हैं । जितने परिमाणवाली होती है, यानी जितना नाग होता है, अथवा तासे युक्त मक्खीका , उतने परिमाणवाला के मध्य में आकाश - छिद्र स आकाशसे [ वे जाते सका तात्पर्य है । स हुए पारिक्षितों-योंको इन्द्र - परमेश्वर-श्वमेधयागमें चयन अग्नि ही है, सुपर्ण विषयमें कि ' उसका शिर है ' इत्यादि मन्त्र-ना बताया गया है, होकर अर्थात् पंख - पक्षी होकर वायुको कि मूर्त होनेके कारण अपनी गति दिखायी उन पारिक्षितोंको में स्थापित कर-स्वरूपभूत कर वहाँ । कहाँ? – जहाँ त् अतीत पारि-सयाजी रहे । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९ ७ निति । एवमिव वै— एवमेव । स गन्धर्वो वायुमेव प्रशशंस पारिक्षितान । गतिम् । समाप्ता आख्यायिका । श्रा-ख्यायिका निर्वृत्तं त्वर्थमाख्या-यिकातोऽपसृत्य स्वेन श्रुतिरूपे-जैव चष्टेऽस्मभ्यम्; यस्मा-द्वायुः स्थावरजङ्गमानां भूताना -मन्तरात्मा, बहिश्च स एव, तस्मादध्यात्माधिभूताधिदैव-भावेन विविधा या अष्टिर्व्याप्तिः स वायुरेव - तथा समष्टिः केव-लेन सूत्रात्मना वायुरेव । एवं वायु-मात्मानं समष्टिव्यष्टिरूपात्म-कत्वेनोपगच्छति यः - एवं वेद । तस्य किं फलमित्याह- अप पुनर्मृत्युं जयति, सकृन्मृत्वा । पुनर्नयिते । तत आत्मनः प्रश्ननिर्णयाद् भुज्युर्लायायनि रुपरराम ॥ २ ॥

प्रकार उस गन्धर्वने पारिक्षितों की गतिरूप वायुकी ही प्रशंसा की थी । आख्यायिका तो समाप्त हुई । आख्यायिकासे सिद्ध होनेवाला जो अर्थ है, उसे आख्यायिकासे निकाल-कर अपने श्रुतिरूपसे ही बतलावे हैं; क्योंकि वायु ही स्थावर - जङ्गम प्राणियोंका अन्तरात्मा है और वही बाहर भी है, अतः अध्यात्म, अधिभूत और अधिदेवभावसे जो भी विविध प्रकारकी अष्टि ( व्यष्टि ) यानी व्याप्ति है, वह वायु ही है तथा केवल सूत्ररूपसे वायु ही समष्टि है । इस प्रकार जो ऐसा जानता है, वह समष्टि व्यष्टिभावसे अपने स्वरूपभूत वायुको ही प्राप्त होता है । उसे क्या फल मिलता है सो बतलाते हैं - वह अपमृत्यु – पुन-मृत्युको जीत लेता है अर्थात् एक बार मरकर फिर नहीं मरता । तब अपने प्रश्नका निर्णय हो जानेसे लायका पुत्र भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये तृतीयं भुज्युन्ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

पृष्ठ 708

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चतुर्थ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - उषस्त - संवाद अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः प-प्रच्छ ॥ पुण्यपापप्रयुक्तैर्ब्रहातिग्रहै गृहीतः पुनः पुनर्ग्रहातिग्रहांस्त्य-जन् उपाददत् संसरतीत्युक्तम् । पुण्यस्य च पर उत्कर्षो व्या-ख्यातो व्याकृतविषयः समष्टि-व्यष्टिरूपो द्वैतैकत्वात्मप्राप्तिः । यस्तु ग्रहातिग्रहैर्ग्रस्तः संसरति, सोऽस्ति वा नास्ति १ अस्तित्वे च किंलक्षणः १ - – इत्यात्मन एव विवेकाधिगमायोषस्त प्रश्न आरभ्यते । तस्य च निरुपाधि-स्वरूपस्य क्रियाकारकविनिर्मुक्त-स्वभावस्य अधिगमाद् यथोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते सप्रयोजकात् आख्यायिकासम्बन्धस्तु प्रसिद्धः । हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ ' पहले यह कहा जा चुका है कि पुण्य - पापप्रयुक्त ग्रहातिग्रहोंस गृहीत हुआ पुरुष पुनः - पुनः ग्रहाति-ग्रहोंको त्यागता और ग्रहण करता हुआ संसारको प्राप्त होता है । तथा पुण्यके परम उत्कर्षकी भी व्याख्या कर दी गयी, जो व्याकृत-विषयक समष्टि व्यष्टिरूप द्वैत और एकस्वभावको प्राप्त होना है । [ अब प्रश्न होता है कि ] जो ग्रह और अतिग्रहोंसे ग्रस्त होकर संसारको प्राप्त होता है, वह है या नहीं और यदि है तो किन लक्षणों-वाला है? इस प्रकार आत्माका ही विवेक करनेके लिए उषस्तका प्रश्न आरम्भ किया जाता है । उस निरुपाधिस्वरूप क्रियाकारक-विनिर्मुक्तस्वभाव आत्माका साक्षात्कार होनेपर ही पुरुष स प्रयोजकसहित उपर्युक्त बन्धनसे मुक्त होता है । आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध हो है । सर्वान्तर आत्माका निरूपरण अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

पृष्ठ 709

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हैनमुषस्तश्चाक्रायणः यह कहा जा चुका है पप्रयुक्त ग्रहातिग्रहोंसे पुरुष पुनः पुनः ग्रहाति-ता और ग्रहण करता को प्राप्त होता है । परम उत्कर्षकी भी दी गयी, जो व्याकृत-ष्टि व्यष्टिरूप द्वेत और प्राप्त होना है । श्न होता है कि ] जो तिग्रहोंसे ग्रस्त होकर स होता है, वह है या दि है तो किन लक्षणों-इस प्रकार आत्माका करनेके लिए उषस्तका भ किया जाता है । धिस्वरूप क्रियाकारक-भाव आत्माका होनेपर ही पुरुष न्त उपर्युक्त बन्धनसे है | आख्यायिकाका सिद्ध ही है । I च्छ याज्ञवल्क्येति मा सर्वान्तरस्तं मे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६ ९९ व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमोयाज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो-S पानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्या-नीति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥

53 फिर उस याज्ञवल्क्यसे चाक्रायण उषस्तने पूछा । वह बोला, ' हे याज्ञवल्क्य! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है । ' [ उषस्त ] ' याज्ञवल्क्य! वह सर्वान्तर कौन - सा है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जो प्राणसे प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो अपान-से अपानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो व्यानसे व्यान-क्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है । यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है ' ॥ १ ॥

अथ हैनं प्रकृतं याज्ञवल्क्यम्. उपस्तो नामतः; चक्रस्यापत्यं चाक्रायणः, पप्रच्छ । यद् ब्रह्म साक्षाद् श्रव्यवहितं केनचिद् द्रष्टु-रपरोक्षाद् अगौणम् न श्रोत्र-ब्रह्मादिवत्? किं तत् १ य आत्मा आत्मशब्देन प्रत्यगात्मोच्यते, तत्र आत्मशब्दस्य प्रसिद्धत्वात्, फिर इस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो नामसे उषस्त था उस चाक्रायण-चक्रके पुत्रने पूछा, ' जो ब्रह्म साक्षात् किसी भिन्न वस्तुसे व्यवधानको न प्राप्त हुआ और द्रष्टासे अपरोक्ष-अगौण है, ( ' श्रोत्रं ब्रह्म मनो ब्रह्म ' इत्यादि वाक्यमें कहे हुए ) श्रोत्र-ब्रह्मादिके समान नहीं है, वह क्या है? जो आत्मा है - यहाँ ' आत्मा ' शब्दसे प्रत्यगात्मा कहा गया है, क्योंकि इसी अर्थ में ‘ आत्मा ' शब्द

पृष्ठ 710

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७०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वस्याभ्यन्तरः सर्वान्तरः; यद्यः -शब्दाभ्यां प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्मति-तमात्मानम्, मे मह्यम्, व्या-चक्ष्वेति, विस्पष्टं शृङ्गे गृहीत्वा यथा गां दर्शयति, तथा आचक्ष्त्र, सोऽयमित्येवं कथयस्वेत्यर्थः । एवमुक्तः प्रत्याह याज्ञवल्क्य: -एष ते तवात्मा सर्वान्तरः सर्व-स्याभ्यन्तरः; सर्वविशेषणोपल-क्षणार्थं सर्वान्तरग्रहणम्; यत् साक्षाद् अव्यवहितम् अपरोक्षा-दगौणं ब्रह्म बृहत्तमम् आत्मा सर्वस्य सर्वस्याभ्यन्तरः, एतै-गुणैः समस्तैर्युक्त एषः, कोऽसौ १ तवात्मा; योऽयं कार्यकरणसङ्घा-तस्तव, स येनात्मना आत्मवान् स एष तव आत्मा - तव कार्य-करणसङ्घातस्येत्यर्थः । तत्र पिण्डः, तस्याभ्यन्तरे लिङ्गात्मा करणसङ्घातः, तृतीयो यश्च सन्दिह्यमानः - – तेषु कतमो प्रसिद्ध है - तथा जो सर्वान्तर सबके अभ्यन्तर है — श्रुतिमें ' यत् ' और ' य: ' इन पदोंसे यह प्रदर्शि किया जाता है कि यह प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्म है 1 – उस आत्माकां मेरे प्रति व्याख्यान करो - जिस प्रकार सींगोंको पकड़कर गौ दिख-लाते हैं, उसी प्रकार स्पष्ट बतलाओ अर्थात् वह यह है— इस प्रकार उसका वर्णन करो । इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञ-वल्क्यने उत्तर दिया, ' तेरा यह आत्मा सर्वान्तर— सबका अन्त-वर्ती है । ' सर्वान्तर ' शब्दका ग्रहण समस्त विशेषणोंके उपलक्षणके लिये है । जो साक्षात् – अव्यवहित और अपरोक्ष - अंगौण ब्रह्म — बृहत्तम आत्मा सबके अभ्यन्तर है, यह इन समस्त गुणोंसे युक्त है; वह कौन है? - तेरा आत्मा है; यह जो तेरा कार्य - करण ( देह - इन्द्रिय ) संघात के, बंद जिस बात्माके द्वारा आत्म-वान् है, वही यह तेरा आत्मा है; तेरा अर्थात् कार्य - करणसंघातका । अब, भुज्युके यह कहनेपर किं पहला तो पिण्ड है, उसके भीतर इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गदेह है और घ तीसरा वह है, जिसके विषयमें सन्देह