बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 81–90

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

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[ अध्याय १ है । श्रुति ( उल्लेख ) किसी अन्यका T- उस मिथुन-नशरीरी प्रजा-जो रेत यानी की आलोचना • जन्मान्तरकृत वा उस बीज-जलकी रचना के द्वारा जलमें से गर्भस्थ रह अर्थात् वह निर्माता संवत्सर संवत्सरकाल-पूर्व संवत्सर-। निर्माता गर्भस्थ कि यह प्रसिद्ध तक अर्थात् एक क मृत्युने धारण लोकमें संवत्सर मयत गर्भ चने क्या किया? रमात्र कालके की रचना की फोड़ दिया । कारण मृत्थुने ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्याथ ७५ प्रथमशरीरिणम्, अशनायावच्चा- । न्मृत्युरभिव्याददान्मुख विदारणं कृतवानत्तुम्; स च कुमारो भीतः स्वाभाविक्याविद्यया युक्तो भाणि-त्येवं शब्दमकरोत् । सैव वाग-भवत्, वाक् - शब्दोऽभवत् || ४ || इस प्रकार उत्पन्न हुए उस प्रथम-शरीरी कुमार अग्नि के प्रति, उसे खानेके लिये, मुँह फाड़ा । उस कुमारने स्वाभाविकी अविद्यासे युक्त होनेके कारण डरकर ' भाणं ' ऐसा शब्द किया । वही वाक् हुआ, वाक् यानी शब्द हुआ ॥ ४ ॥

ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अतृत्वका उपन्यास स ऐक्षत यदि वा इममभिम स्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्म नेद सर्वमसृजत यदिदंकि ञ्चर्चों यजूँ षि सामानि छन्दाँ सि यज्ञान्प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्त मधियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यैतस्यात्ता भव सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥

उसने विचार किया, ' यदि मैं इसे मार डालूँगा तो यह थोड़ा - सा ही अन्न [ भोजन ] करूँगा । ' अतः उसने उस वाणी और उन मनके द्वारा इन सबको रचा, जो कुछ भी ये ऋक्, यजुः, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु हैं । उसने जिस - जिसकी रचना की उसी - उसीको खानेका विचार किया । वह सबको खाता है, यही उस अदितिका अदितित्व है । जो इस प्रकार इस अदितिके अदितित्वको जानता है वह इस सबका अत्ता ( भोक्ता ) होता है और यह सब उसका अन्न होता है ॥ ५ ॥

स ऐक्षत - स एवं भीतं कृतरवं उसने विचार किया - इस प्रकार डरकर शब्द करनेवाले उस कुमार-कुमारं दृष्ट्वा मृत्युरैक्षतेक्षितवान् को देखकर मृत्युने क्षुधायुक्त होनेपर अशनायावानपि - यदि कदा- भी विचार किया - यदि कदाचित् मैं चिद्वा इमं SE कुमारमभिमस्ये-- इस कुमारको मार डालूँगा- ' अभि-

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७६. बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ अभिपूर्वो मन्पतिहिंसार्थः- हिंसि - । य इत्यर्थः कनीयोऽन्नं करिष्ये कनीयोऽल्पमन्नं करिष्य इति । एवमीक्षित्वा तद्भक्षणादुपरराम बहु ह्यनं कर्तव्यं दीर्घकालभत-रणाय न कनीयः । तद्भक्षणे हि कनीयोऽन्नं स्याद्वीजभक्षण इव सस्याभावः । स एवम्प्रयोजन-मनबाहुन्यमालोच्य तथैव त्रय्या चाचा पूर्वोक्तया तेनैव चात्मना मनसा मिथुनीभावमालोचनमु-पगम्योपगम्येदं सर्वं स्थावरं जङ्गमं चासृजत यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदम् ॥ किं तत्? ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि च सप्त गायवादीनि स्तोत्रशस्त्रादिक र्माङ्गभूतां स्त्रिविधान् मन्त्रान्गाय-ज्यादिच्छन्दोविशिष्टान् यज्ञांच तत्साध्यान्प्रजास्तत्कर्त्रीः पशुंच ग्राम्यानारण्यान्कर्मसाधनभूतान् ननु त्रय्या मिथुनीभूतया-ब्राह्म पूर्वक ' मन ' धातुका अर्थ हिंसा होता है - अतः ' अभिमस्ये ' का अर्थ ' मार सृजत डालूँगा ' ऐसा होगा, तो मैं कनीय अन्न करूँगा; कनीय यानी बहुत ही कथम थोड़ा अन्न भोजन करूंगा । नै ऐसा सोचकर वह उसे भक्षण मिथु करनेसे रुक गया, [ और सोचने लगा दीना कि ] बहुत समयतक खानेके लिये मुझे बहुत - सा अन्न [ संग्रह ] करना विनि चाहिये, थोड़ा - सा नहीं । जिस प्रकार सगं बीजको खा लेनेपर अनाज नहीं होता उसी प्रकार इसे खानेसे तो ध्वा मेरे लिये थोड़ा - सा ही अन्न होगा । फलं ऐसे उद्देश्यसे श्रन्नकी बहुलताके लिये भक्षा विचारकर उसने उस पूर्वोक्त त्रयी- सर्व रूपा वाणीसे तथा उसी आत्मा यानी मनसे मिथुनीभाव अर्थात् आलो- स्माद चनाको प्राप्त हो - होकर यह जो कुछ दिति है उस इस सारे स्थावर और जङ्गम जगत्को रचना की । वह क्या है? तिम ऋक्, यजुः " साम, गायत्री आदि २५ सात छन्द यानी गायत्री आदि छन्दों- सव से युक्त स्तोत्र शस्त्रादि - कर्मोंके अङ्गभूत तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे सम्पन्न त्ता स होनेवाले यज्ञ, उन्हें करनेवाली प्रजा । तथा कर्मके साधनभूत ग्राम्य और धात वन्य पशु [ इन सबको रचा ] । शंका- किंतु पहले तो कहा

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[ अध्याय १ नर्थ हिंसा होता " का अर्थ ' मार तो मैं कनीय यानी बहुत ही रूँगा । वह उसे भक्षण सोचने लगा - खानेके लिये [ संग्रह ] करना हीं । जिस प्रकार अनाज नहीं इसे खानेसे तो ही अन्न होगा । -बहुलता के लिये पूर्वोक्तत्रयी-सी आत्मा यानी अर्थात् आलो-कर यह जो कुछ वर और जङ्गम । वह क्या है? गायत्री आदि त्री आदि छन्दों-= कर्मोंके अङ्गभूत - उनसे सम्पन्न करनेवाली प्रजा भूत ग्राम्य और को रचा ] । पहले तो कहा ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७ सृजतेत्युक्तम्, ऋगादीनीह । कथमसृजतेति? नैष दोषः, मनसस्त्वव्यक्तोऽयं मिथुनीभावखय्या, बाह्यस्तु ऋगा-दीनां विद्यमानानामेव कर्मसु विनियोगभावेन व्यक्तीभावः सर्ग इति । स प्रजापतिरेवमन्नवृद्धिं बुद्-ध्वा यद्यदेव क्रियां क्रियासाधनं फलं वा किञ्चिदसृजत तत्तदत्तुं भक्षयितुमधियत धृतवान्मनः । सर्वं कृत्स्नं वै यस्मादत्तीति तत्त-स्माददितेरदितिनाम्नो मृत्योर-दितित्वं प्रसिद्धम् । तथा च मन्त्र: -" अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदि विर्माता स पित । ” ( यजुः ० सं ० २५ | २३ ) इत्यादिः । सर्वस्यैतस्य जगतोऽनभूतस्या-त्ता सर्वात्मनैव भवत्यन्यथा विरो- । धात् । न हि कश्चित्सर्वस्यैकोऽत्ता दृश्यते तस्मात्सर्वात्मा भवतीत्यर्थः । गया था कि मिथुनीभूत त्रयीरूपा वाणीसे उसने रचना की, फिर उसके द्वारा उसने ऋगादिको कैसे रचा? समाधान- यह कोई दोष नहीं है । मनका जो त्रयीके साथ मिथुनी-भाव है वह तो अव्यक्त है । उन [ अव्यक्तरूपसे ] विद्यमान ऋगा--दिका ही कर्ममें विनियोगरूपसे जो बाह्य व्यक्तीभाव है वही उनकी रचना है । उस प्रजापतिने इस प्रकार अन्न-की वृद्धि होती जानकर जिस - जिस भी क्रिया या क्रियाके साधनभूत फलकी रचना की उसी - उसीको भक्षण करनेके लिये मनमें विचार किया । इस प्रकार क्योंकि वह सभीको भक्षण करता है, इसलिये उस अदिति अर्थात् अदितिनामक मृत्युका अदितित्वं प्रसिद्ध है । इस विषयमें यह मन्त्र प्रमाण है- " अदिति द्यलोक है, अदिति अन्तरिक्ष है, अदिति माता है और वही पिता है " इत्यादि । इस अन्नभूत -सम्पूर्ण जगत्का ' वह सर्वात्मभावसे ही अत्ता ( भक्षण करनेवाला ) है, क्योंकि बिना सर्वात्मभावके सबका अत्ता होनेमें विरोध आता है । कोई भी एक सबका अत्ता हो, ऐसा देखा नहीं जाता; इसलिये तात्पर्य यह है कि

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७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ सर्वमस्यान्नं भवति श्रत एव । सर्वात्मनो ह्यत्तु: सर्वमन्नं भवतीत्युपपद्यते । य एवमेतद्य-थोक्तमदितेमृत्योः प्रजापतेः सर्वस्य अदनाददितित्वं वेद तस्यै-तत् फलम् ॥ ५ ॥

ब्राह [ इस प्रकार उपासना करनेवाला] वह सर्वात्मा हो जाता है । सब कुछ शब्द उसका अन्न हो जाता है, अतः जो सर्वात्मभावसे अत्ता है उसीका सब कुछ अन्न होना सम्भव है । यह भा फल उसे से मिलता मिलता है है जो इस प्रकार सोऽ इस उपर्युक्त अदितिसंज्ञक मृत्यु त्वेन प्रजापतिका सबका अदन ( भक्षण ) करनेसे अदितित्व जानता है ॥ ५ ॥ यज्ञे

महत प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण श्राम एवं वीर्यका निष्क्रमण स सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सो- तप्त -ऽभ्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्य- मुद मुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीर माह श्वयितुमधियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥ यश

उसने यह कामना की कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ । ख्य इससे वह श्रमित हो गया । उसने तप किया । उस श्रमित और तपे मस्ि हुए मृत्युका यश और वीर्यं निकल गया । प्राण ही यश वीर्य हैं । यश तब प्राणोंके निकल जानेपर शरीरने मन शरीर में ही रहा ॥ ६ ॥

सोऽकामयतेत्यश्वाश्वमेधयोनि-चचनार्थमिदमाह - भूयसा महता यज्ञेनं भूयः पुनरपि यजेयेति ॥ जन्मान्तरकरणापेक्षया भूयः फूलना आरम्भ किया । किंतु उसका तस्म चाि ' सोऽकामयत ' इत्यादि वाक्यसे लत श्रुति अव और raha का निर्वचन न्तव करनेके! लिये यह कहती है — में त पुनः महान् यज्ञसे यजन करूँ । | यहाँ जन्मान्तरमें यज्ञानुष्ठान करने की का | अपेक्षासे ' भूयस् ' ( महान् ) शब्द

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[ अध्याय १ ना करनेवाला ] है | सब कुछ ता है, अतः जो है उसीका सब नम्भवका है । यह जो इस प्रकार इतिसंज्ञक मृत्यु अदन ( भक्षण ) नता है ॥ ५ ॥

रण नेयेति । सो-व्य यशो वीर्य-तेषु शरीर नीत् ॥ ६ ॥

से यजन करूँ । समित और तपे और वीर्य हैं । किंतु उसका इत्यादि वाक्यसे मेघका निर्वचन कहती है - में यजन करूं । ज्ञानुष्ठान करनेकी ( महान् ) शब्द ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ? ७ ९ शब्दः । स प्रजापतिः जन्मान्त- । रेऽश्वमेधेनायजत । सद्भाव भावित एव कल्पादौ व्यावर्तत 1 । सोऽश्वमेध क्रियाकारकफलात्म त्वेन निर्वृत्तः सन्नक्रामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति गवत । एव एवं महत्कार्यं कामयित्वा लोकवद-श्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्येति पूर्ववत्, यशो वीर्य-सुदक्रामदिति । स्वयमेव पदार्थ-माह - प्राणाश्चक्षुरादयो वै यशो यशोहेतुत्वात् तेषु हि सत्सु ख्यातिर्भवति, तथा वीर्य बल- । मस्मिञ्शरीरे । न ह्युत्क्रान्तप्राणो यशस्त्री बलवान्वा भवति । तस्मात्प्राणा एव यशो वीर्यं चास्मिञ्शरीरे । तदेवं प्राण लक्षणं यशो वीर्यमुदक्रामदुत्क्रा-न्तवत् । तदेवं यशोवीर्यभूतेषु प्राणेषू-त्क्रान्तेषु शरीरान्निष्क्रान्तेषु त-दिया है । उस प्रजापतिने जन्मान्तर-में अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन किया था । इसलिये उसकी भावनासे युक्त हुआ ही वह कल्पके आरम्भमें प्रजापति हुआ । अश्वमेध क्रिया, कारक और फलरूपसे सम्पन्न होकर उसने कामना की कि मैं पुनः महान् यज्ञद्वारा यजन करूं । इस प्रकार महान् कार्यके लिये कामना करके वह अन्य लोगोंके समान श्रमित हो गया । उसने तप किया । उस श्रान्त और तपे हुएका — ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये - यश और वीर्य निकल गया । अ श्रुति स्वयं ही [ यश और वीर्य ] पदोंका अर्थ बतलाती है । चक्षु आदि जो प्राण हैं वे ही यशके हेतु होनेके कारण यश हैं क्योंकि उनके रहनेपर ही ख्याति होती है । तथा वे ही इस शरीर में वीर्यं यानी बल हैं । जिसके प्राण निकल गये हैं वह पुरुष यशस्वी या बलवान् नहीं होता । अतः इस शरीरमें प्राण ही यश और वीर्य हैं । वे इस प्रकारके प्राणरूप यश और वीर्य निकल निकल गये । तब इस प्रकार यश और वीर्य-भूत प्राणोंके करनेपर अर्थात् शरीरसे निकल जानेपर

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८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ च्छरीरं प्रजापतेः श्वयितुमुच्छून / भावं गन्तुमधियतामेध्यं चाभवत् तस्य प्रजापतेः शरीरान्निर्गतस्यापि तस्मिन्नेत्र शरीरे मन आसीद्यथा कस्यचित्प्रिये विषये दूरं गत-स्यापि मनो भवति तद्वत् ॥ ६ ॥

अश्वमेधोपासना सं तस्मिन्नेव नव शरीरे शरीर गतमनाः म सन्किमकरोत्? इत्युच्यते-ब्राह्म प्रजापतिके उस शरीरने श्वयन-उच्छूनता ( फूलनारूप विकार ) मृत को प्राप्त होना आरम्भ किया अर्थात् वह अमेध्य ( अपवित्र ) हो; शरीर गया । किंतु जिस प्रकार किसी अश्व वह प्रिय वस्तुके दूर हो जानेपर भी उसने उसीमें मन रहता है वैसे ही शरीरसे संवत्स निकल जानेपर भी उस प्रजापतिका है— प्रति । मन उस शरीर में ही रहा ॥ ६ ६ ॥ ॥ देवस उसक और उसका फल और जान उस शरीरमें ही जिसका मन जाता मृत्यु लगा हुआ है ऐसे उस प्रजापतिने क्या किया? सो बतलाया जाता है- स मेधा सोऽकामयत मेध्यं म इद ँ स्यादात्मन्व्यनेन स्या- स्यात मिति । ततोऽश्वः समभवद्यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवा- वाने श्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एन- मिति मेवं वेद । तमनवरुध्यैवामन्यत । तँ संवत्सरस्य परस्ता- तद्वि दात्मन आलभत । पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते । एष ह वा अश्व-समभ मेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायमग्निरर्कस्तस्येमे प्रजा लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति

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[ अध्याय १ रीरने श्वयन-रूप विकार ) आरम्भ किया; - ( अपवित्र ) हो प्रकार किसी हो जानेपर भी है वैसे ही शरीरसे उस प्रजापतिका ही रहा ॥ ६ ॥

ही जिसका मन उस प्रजापतिने न्तलाया जाता है-न्व्यनेन स्था-नूदिति तदेवा-वेद य एन-नरस्य परस्ता-इत् । तस्मात् वह वा अश्व-ग्निरर्कस्तस्येमे नरेकैव देवता मृत्युराप्नोति ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥७ ॥

उसने कामना की मेरा यह शरीर मेध्य ( यज्ञिय ) हो, मैं इसके द्वारा शरीरवान् होऊँ; क्योंकि वह शरीर अश्वत् अर्थात् फूल गया था, इसलिये वह अश्व हो गया और वह मेध्य हुआ । अतः यही अश्वमेधका अश्वमेधत्व है 1 । जो इसे इस प्रकार जानता है वही अश्वमेधको जानता है । उसने उसे अवरोधरहित ( बन्धनशून्य ) ही चिन्तन किया । उसने संवत्सरके पश्चात् उसका अपने ही लिये [ अर्थात् इसका देवता प्रजापति है — ऐसे भावसे ] आलभन किया तथा अन्य पशुओंको भी देवताओंके प्रति पहुँचाया । अतः याज्ञिकलोग मन्त्रद्वारा संस्कार किये हुए सर्वं-देवसम्बन्धी प्राजापत्य पशुका आलभन करते हैं । यह जो [ सूर्य ] तपता है वही अश्वमेध है । उसका संवत्सर शरीर है, यह अग्नि अर्क है तथा उसके ये लोक आत्मा हैं । ये ही दोनों ( ( अग्नि और आदित्य ) अर्क और अश्वमेध हैं । किंतु वे मृत्युरूप एक ही देवता हैं । जो इस प्रकार जानता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है, उसे मृत्यु नहीं पा सकता, मृत्यु उसका आत्मा हो जाता है तथा वह इन देवताओंमेंसे ही एक हो जाता है ॥ ७ ॥

सोऽकामयत, कथम्? मेध्यं मेधाहं यज्ञियं मे ममेदं शरीरं स्यात् । किञ्च आत्मन्व्यात्मवां-थानेन शरीरेण शरीरवान्स्या-मिति प्रविवेश । यस्मात्तच्छरीरं तद्वियोगाद्गतयशोवीर्य सद् अश्वद् अश्वयत् ततस्तस्मादश्वः समभवत् । ततोऽश्वनामा प्रजापतिरेव साक्षादिति उसने कामना की । किस प्रकार? – मेरा यह शरीर मेध्य— यज्ञिय हो जाय । तथा मैं आत्मन्वी - आत्मवान् अर्थात् इस शरीरसे शरीरवान् हो जाऊँ । ऐसा विचार-कर उसने उसमें प्रवेश किया । क्योंकि वह शरीर उसके वियोगसे यशोवीर्यंहीन होकर अश्वत्— अश्वयत् अर्थात् फूल गया था, अतः उससे अश्व उत्पन्न हुआ । इसीसे | अश्व नामका साक्षात् प्रजापति ही वृ ० उ ० ६-

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८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्तूयते । यस्माच्च पुनस्तत्प्रवेशा- । द्गतयशोवीर्यत्वादमेध्यं सन्मे-ध्यमभूत्तदेव तस्मादेवाश्वमेधस्या-श्वमेधनाम्नः क्रतोरश्वमेधत्वम् अश्वमेघनामलाभः । क्रियाकार-कफलात्मको हि क्रतुः । स च प्रजापतिरेवेति स्तूयते । क्रतुनिर्वर्तकस्याश्वस्य प्रजा-पतित्वमुक्तम् ' उषा वा श्रश्वस्य मेध्यस्य ' इत्यादिना । तस्यैवा -श्वस्य मेध्यस्य प्रजापतिस्वरूप-स्याग्नेश्च यथोक्तस्य क्रतुफलात्म-रूपतया समस्योपासनं विधा-तव्यमित्यारभ्यते । पूर्वत्र क्रिया -है - इस प्रकार उसकी स्तुति की ब्राह्र जाती है । क्योंकि उसकेपुनः य प्रवेशसे वह यशोवीर्यंहीन और अमेध्य होनेपर भी मेध्य हो गया य ए था इसीसे अश्वमेधका यानी अश्व- मश्व मेघनामक यज्ञका अश्वमेधत्व है; चक्ष्य अर्थात् उसे ' अश्वमेघ ' नाम मिला है । मान यज्ञ क्रिया, कारक और फलरूप स ए होता है, अत: ' वह प्रजापति ही है ' तस्म ऐसा कहकर उसकी स्तुति की जाती है । क ' उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः ' ताव भूय इत्यादि वाक्यसे यज्ञ निर्वाहक अश्वका काम प्रजापतित्व कहा गया । अब उसी मेध्य प्रजापतिरूप मेध्य अश्वकी और यज्ञफलरूपसे उसीके समान उपर्युक्त रुध्यै अग्निकी उपासनाका विधान करना मुक्त संवत है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ मात्म किया जाता है । पहले श्रुतिवाक्य में विधिबोधक क्रियापदका श्रवण नहीं प्रजा पदस्य विधायकस्याश्रुतत्वात् हुआ है और [ उपासनासम्बन्धी आल क्रियापदापेक्षत्वाच्च प्रकरणस्य वाक्योंमें ] क्रियापदकी अपेक्षा नन्य होती है; इसलिये इस प्रकरणका भ्यो श्रयमर्थोऽवगम्यते । यह अर्थ जाना जाता है । " तवान १ यद्यपि पहले ‘ य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ' ऐसा विधायक वाक्य आया है, परंतु यह् प्रकरण अश्वमेधोपासनाका है, इसलिये वह मुख्य वाक्य नहीं है 1 । अतः तस्म उस अभाव की पूर्ति करनेके लिये वहाँ श्रुति ' एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं नात्म वेद ' इस प्रकार साक्षाद्रूपसे उसका विधान करती है ।

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[ अध्याय१ इसकी स्तुति की उसके पुनः वीर्यहीन और मेध्य हो गया का यानी अश्व-अश्वमेधत्व है: ' नाम मिला है । - और फलरूप प्रजापति ही है ' सकी स्तुति की स्य मेध्यस्य शिरः ' निर्वाहक अश्वका गया । अब उसी य अश्वकी और के समान उपर्युक्त का विधान करना का ग्रन्थ आरम्भ नहले श्रुतिवाक्यमें दका श्रवण नहीं उपासनासम्बन्धी पदकी अपेक्षा - इस प्रकरणका ता है । यक वाक्य आया है, क्य नहीं है । अतः वेदय एन ब्राह्मण २ ] एष ह वा अश्वमेधं क्रतुं वेद य एनमेवं वेद, यः कश्चिदेन-मश्वमग्निरूपमकं च यथोक्तमेवं वक्ष्यमाणेन समासेन प्रदर्श्य -मानेन विशेषणेन विशिष्टं वेद, स एषोऽश्वमेधं वेद नान्यः । तस्मादेवं वेदितव्य इत्यर्थः । कथम्? तत्र पशुविषयमेव तावद्दर्शनमाह । तत्र प्रजापति-भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति कामयित्वा आत्मानमेव पशुं मेध्यं कल्पयित्वा तं पशुमनव -रुध्यैवोत्सृष्टं पशुमवरोधमकृत्वैव मुक्तप्रग्रहममन्यता चिन्तयत् । तं संवत्सरस्य पूर्णस्य परस्तादूर्ध्व-मात्मने श्रात्मार्थमालभत- — प्रजापतिदेवताकत्वेनेत्येतत्-आलभतालम्भं कृतवान् । पशू- । नन्यान्ग्राम्यानारण्यांश्च देवता-यो यथादैवतं प्रत्यौहत्प्रतिगमि-तवान् । यस्माच्चैवं प्रजापतिरमन्यत तस्मादेवमन्योऽप्युक्तेन विधि -नात्मानं पशुमश्वं मेध्यं कल्पयित्वा ८३ 2 । जो इसे इस प्रकार जानता है, निश्चय वही अश्वमेधको जानता है । जो कोई भी इस अश्वको और ऊपर बतलाये हुए अग्निरूप अर्कैको आगे कहे जानेवाले संक्षिप्तरूपसे प्रदर्शित विशेषणसे विशिष्ट जानता है वही अश्वमेधको जानता है, कोई दूसरा नहीं । अतः तात्पर्य यह है कि इसे इसी प्रकार जानना चाहिये । ' प्रकार ' जानना चाहिये? सो इस विषय में पहले श्रुति पशु-विषयक दृष्टिका ही निरूपण करती है । प्रजापतिने ऐसी इच्छा करके कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ अपनेही को यज्ञिय पशु कल्पना कर उस पशुका अनवरोध कर उसे छूटा हुआ माना अर्थात् उसकी रोक - टोक न करते हुए उसे बन्धन-हीन चिन्तन किया । फिर पूरे एक संवत्सरके पीछे उसे अपने ही लिये आलभन किया अर्थात् प्रजापति देवता - सम्बन्धी पशुरूपसे उसका आलभन किया; तथा अन्य देव-ताओंको भी तत्तद्द वसम्बन्धी अन्यान्य ग्राम्य एवं वन्य पशु प्राप्त कराये । क्योंकि प्रजापतिने ऐसा माना था, इसलिये दूसरे यज्ञकर्ताको भी उपर्युक्त विधिसे ही अपनेको यज्ञिय

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८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ CAVALA बा - सर्वदेवत्योऽहं प्रोक्ष्यमाण | अश्व मानकर ' मैं वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त होकर सर्वदेवसम्बन्धी सा श्रलभ्यमानस्त्वहं मद्देवत्य एव होता हूँ, किंतु आलभन किये णेव जानेपर केवल अपने ही देवताके रक स्याम्, अन्य इतरे पशवो ग्राम्या-रण्या यथादैवतमन्याभ्यो देवता -भ्यालभ्यन्ते मदवयवभूताम्य एव – इति विद्यात् । अत एवेदानीं सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमा -लभन्ते याज्ञिकाः । ' एवमेष ह वा श्रश्वमेधो य एष तपति ' - - यस्त्वेवं पशुसाधनकः क्रतुः स एष साक्षात्फलभूतो निर्दिश्यत एष ह वा श्रश्वमेधः । कोऽसौ १ य एव सविता तपति जगदवभासयति तेजसा । तस्यास्य ऋतुफलात्मनः संवत्सरः काल-विशेषः, आत्मा शरीरं तन्निर्वर्त्य -त्वात्संवत्सरस्य । तस्यैव क्रत्वात्मनः अग्नि-लिये होऊँ; तथा दूसरे ग्राम्य और वन्य पशु अन्यान्य देवताओंके त्म अनुसार मेरे ही अवयवभूत विभिन्न व्य देवोंके लिये आलभन किये जाते हैं-ऐसा जाने | इस इत्य याज्ञिकलोग समस्त देवताओंके लिये यथ [ मन्त्रोंद्वारा ] अभिषिक्त किये हुए फल प्रजापतिसम्बन्धी पशुका आलभन करते हैं । सा ' एवमेष हं वा अश्वमेधो य एष क्र तपति ' इसकी व्याख्या की जाती देश हे — इस प्रकार यह जो पशुद्वारा साध्य ऋतु है वही ' एष ह वा अश्व- क्रत मेध: ' इस वाक्यसे साक्षात् फलस्व- मे रूपसे बतलाया जाता है । वह कौन - सा है? जो कि सूर्य तपता अर्थात् अपने तेजसे जगत्को प्रका- चर शित करता है । उस इस यज्ञफल-रूप सूर्यका संवत्सर --- काल- विशेष आत्मा यानी शरीर है, क्योंकि मृत उसीके द्वारा संवत्सर निष्पन्न सा होता है । " चो उस यज्ञात्माका साधनभूत यह ( १ क्योंकि सूर्यके उदयास्तसे दिन - रातके द्वारा संवत्सर होता है । यहाँतक अश्वमेधकी सूर्यरूपता बतलाकर अब उसके साधनभूत अग्निका सूर्यत्व बतलाया सा जाता है ।